CURRENT-AFFAIRS

Read Current Affairs

मोबाइल फोन विनिर्माण योजना (MPMS)

संदर्भ

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा भारत को वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण का प्रमुख केंद्र बनाने तथा घरेलू विनिर्माण क्षमता को विस्तार देने के लिए 'मोबाइल फोन विनिर्माण योजना' (MPMS) को स्वीकृति दी गई है। यह योजना 31 मार्च  2026 को समाप्त हुई पूर्ववर्ती PLI-LSEM (बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण हेतु उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजना) की सफलता को आगे बढ़ाते हुए उसका स्थान लेती है।

मोबाइल फोन विनिर्माण योजना (MPMS)

  • कुल बजटीय परिव्यय: 62,500 करोड़ रुपये।

  • योजना की अवधि: 5 वर्ष,  वित्तीय  वर्ष  2026-27 से वित्तीय  वर्ष  2030-31 तक।
  • प्रशासनिक निकाय: इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY), भारत सरकार।
  • मूल संकल्पना: भारत में मोबाइल फोन के उत्पादन को व्यापक स्तर पर बढ़ाना, घरेलू मूल्य संवर्धन को गहरा करना, आपूर्ति श्रृंखला के लचीलेपन को मजबूत करना, वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता में सुधार करना तथा भारतीय ब्रांडों व पेटेंट का निर्माण करना।

चर्चा में क्यों? 

  • 15 जुलाई 2026 को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 62,500 करोड़ रुपये के बजटीय आवंटन के साथ 'मोबाइल फोन विनिर्माण योजना' (MPMS) को मंजूरी प्रदान की।

  • बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण के लिए संचालित PLI-LSEM योजना का कार्यकाल 31 मार्च  2026 को समाप्त हो जाने के पश्चात् इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र की विकास दर और निर्यात गतिशीलता को बनाए रखने हेतु इस नई योजना को लागू किया गया है।

महत्त्व एवं प्रमुख विशेषताएं

  • प्रोत्साहन सहायता संरचना:

    • भारत में मोबाइल फोन के विनिर्माण हेतु पात्र बिक्री पर 2.25% से 5% तक की विभिन्न दरों पर वित्तीय प्रोत्साहन सहायता।
    • प्रमुख घटकों एवं उप-इकाइयों की घरेलू सोर्सिंग से जुड़ने पर 1.5% तक का अतिरिक्त प्रोत्साहन।
  • भारतीय ब्रांडों, R&D एवं तकनीकी संप्रभुता पर बल:
    • तकनीकी संप्रभुता प्राप्त करने, उच्च आर्थिक मूल्य हासिल करने तथा डिज़ाइन एवं R&D में भारतीय पेटेंट निर्मित करने का लक्ष्य।
    • भारतीय ब्रांडों के निर्माण, उत्पाद डिज़ाइन और अनुसंधान एवं विकास (R&D) के लिए पात्र बिक्री पर 3% का अतिरिक्त प्रोत्साहन।
  • इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण क्षेत्र की पृष्ठभूमि एवं प्रगति:
    • 'मेक इन इंडिया' का प्रभाव: वित्तीय वर्ष  2014-15 के बाद से भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण में 7 गुना और निर्यात में 11 गुना की अभूतपूर्व वृद्धि हुई है।
    • वैश्विक स्थिति: भारत मात्रा के आधार पर विश्व का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल फोन निर्माता बन चुका है तथा भारत में उपयोग किए जाने वाले 99.2% मोबाइल फोन का निर्माण अब घरेलू स्तर पर हो रहा है।
    • निर्यात में ऐतिहासिक उपलब्धि: वर्ष  2025 में स्मार्टफोन भारत से निर्यात होने वाली सबसे बड़ी एकल उत्पाद श्रेणी बनकर उभरा, जिसने पारंपरिक निर्यात मदों जैसे डीजल ईंधन और तराशे गए हीरों को पीछे छोड़ दिया।
    • रोजगार एवं समावेशी विकास: यह क्षेत्र विशेष रूप से दूर-दराज के ग्रामीण क्षेत्रों के युवाओं और महिलाओं के लिए एक प्रमुख नियोक्ता बनकर उभरा है, जहाँ कई संयंत्रों में एक ही स्थान पर 5,000 से अधिक कर्मचारी कार्यरत हैं।

परिणाम एवं प्रत्याशित उपलब्धियां

  • उत्पादन लक्ष्य: योजना की 5 वर्षों की अवधि के दौरान देश में कुल संचयी मोबाइल फोन उत्पादन लगभग ₹39 लाख करोड़ तक पहुँचने का अनुमान है।

  • निर्यात वृद्धि: मोबाइल फोन के वैश्विक निर्यात में अत्यधिक वृद्धि होगी, जिससे भारत वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं और मजबूत स्थिति हासिल करेगा।
  • रोजगार सृजन: योजना के क्रियान्वयन से लगभग 60,000 प्रत्यक्ष रोजगार उत्पन्न होंगे।
  • आर्थिक विकास: घरेलू विनिर्माण क्षमता मजबूत होगी और भारत एक वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण हब के रूप में और अधिक सुदृढ़ होगा।


निष्कर्ष

62,500 करोड़ रुपये के आवंटन वाली मोबाइल फोन विनिर्माण योजना (MPMS) भारत को असेंबली-आधारित निर्माण से आगे बढ़ाकर डिज़ाइन, अनुसंधान एवं विकास (R&D) और घटक विनिर्माण में आत्मनिर्भर बनाएगी। यह योजना 'मेक इन इंडिया' पहल को नई ऊंचाइयों पर ले जाते हुए भारत को वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण का एक मजबूत, प्रतिस्पर्धी और संप्रभु केंद्र स्थापित करने में निर्णायक सिद्ध होगी।

भारतीय धूसर धनेश (इंडियन ग्रे हॉर्नबिल)

संदर्भ:

गुजरात के गीर जंगलों से 1950-60 के दशक में स्थानीय रूप से विलुप्त हो चुके 'भारतीय धूसर धनेश' (इंडियन ग्रे हॉर्नबिल) ने पुनर्वास के पश्चात् लगातार चौथे वर्ष सफलतापूर्वक प्रजनन दर्ज किया है।

वर्तमान समाचार बिंदु:

  • अंतरराष्ट्रीय सहकर्मी-समीक्षित वैज्ञानिक पत्रिका 'बर्ड्स' में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, वर्ष 2021 से 2023 के बीच दो चरणों में (2021-22 में 28 और 2023 में 12) कुल 40 धनेश पक्षी गीर राष्ट्रीय उद्यान में छोड़े गए थे, जिनकी आबादी अब वहाँ सफलतापूर्वक स्थापित हो चुकी है।

  • गुजरात में वन्यजीव संरक्षण की एक और सफलता का उल्लेख है, जहाँ 'जंप-स्टार्ट' तकनीक से जन्मे दूसरे ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (गोडावण) के बच्चे ने संवेदनशील 40 दिनों की अवधि पार कर जीवन रक्षा में सफलता पाई है।

भारतीय धूसर धनेश:

  • वैज्ञानिक वर्गीकरण:

    • वैज्ञानिक नाम: ओसीसेरोस बाइरोस्ट्रिस (Ocyceros birostris)
    • कुल: बुसेरोटिडे (Bucerotidae)
    • वंश: ओसीसेरोस (Ocyceros)
  • शारीरिक पहचान:
    • यह मध्यम आकार का भूरे/धूसर रंग का पक्षी है। इसकी चोंच के ऊपर एक छोटा मुड़ा हुआ सींग जैसा उभार (कैस्क / Casque) होता है।
  • पारिस्थितिक भूमिका ("जंगल का किसान"):
    • इसे "जंगल का किसान" कहा जाता है, क्योंकि यह बीज प्रकीर्णन  के माध्यम से जंगलों के प्राकृतिक पुनरुत्पादन एवं वनीकरण में मुख्य भूमिका निभाता है।
  • आवास एवं वितरण:
    • भारत, नेपाल और पाकिस्तान के मैदानी व निचले पहाड़ी क्षेत्रों में विस्तृत।
    • शुष्क पर्णपाती वन, कांटेदार वन, पुराने वृक्षों वाले ग्रामीण क्षेत्र तथा शहरी उद्यान।
  • खाद्य आदतें :
    • यह मुख्य रूप से फलभक्षी है (विशेष रूप से पीपल, बरगद व गूलर जैसे फिकस/अंजीर कुल के फल)।
    • हालाँकि, प्रजनन काल  के दौरान यह कीड़े-मकोड़े, छिपकली और छोटे सरीसृप भी खाता है।
  • स्थानीय विलुप्ति के मुख्य कारण:
    • पुराने एवं विशाल वृक्षों की कटाई (घोंसला बनाने के लिए उपयुक्त प्राकृतिक कोटरों/छेदों की कमी)।
    • आवास का विखंडन एवं विनाश,  शिकार तथा शहरीकरण का दबाव।

कानूनी एवं संरक्षण स्थिति:

  • IUCN रेड लिस्ट: न्यूनतम चिंतनीय (लीस्ट कंसर्न - LC)

  • भारतीय वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 (WPA): अनुसूची-II के तहत संरक्षित।

सरकारी परियोजनाएं एवं संरक्षण पहलें

  • गीर प्रजाति पुनर्वास कार्यक्रम: गुजरात वन विभाग द्वारा 2021-2023 के दौरान दो चरणों में 40 पक्षियों को गीर के पारिस्थितिकी तंत्र में पुनस्थापित किया गया।

  • समुदाय आधारित धनेश संरक्षण पहल: देश के विभिन्न क्षेत्रों (जैसे पश्चिमी घाट व पूर्वोत्तर) में स्थानीय समुदायों को शामिल कर धनेश पक्षियों के घोंसलों एवं वृक्षों की रक्षा हेतु सामुदायिक प्रहरी/रक्षक मॉडल का संचालन।
  • ग्रेट इंडियन बस्टर्ड संरक्षण: अत्यधिक संकटग्रस्त गोडावण पक्षी की आबादी बढ़ाने हेतु कृत्रिम प्रजनन व संवर्धन तकनीक का क्रियान्वयन।


निष्कर्ष

गीर के जंगलों में भारतीय धूसर धनेश का लगातार चार वर्षों तक सफल प्रजनन यह सिद्ध करता है कि सु नियोजित वैज्ञानिक पुनर्वास और संरक्षण प्रयासों से स्थानीय रूप से विलुप्त हो चुकी प्रजातियों को पुनः सफलतापूर्वक बहाल किया जा सकता है। यह सफलता गीर के जैव-विविधता पारिस्थितिकी तंत्र को सुदृढ़ करने के साथ-साथ भारत में भावी प्रजाति-पुनर्वास कार्यक्रमों के लिए एक अनुकरणीय मॉडल प्रस्तुत करती है।

बढ़ती खुदरा मुद्रास्फीति: रिजर्व बैंक के पास ब्याज दरों में कटौती की गुंजाइश?

सामान्य अध्ययन पेपर – III:  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन।

संदर्भ

हालिया आंकड़ों के अनुसार, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा नई उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) श्रृंखला के तहत तय किया गया 4% का मुद्रस्फीति लक्ष्य पहली बार पार हो गया है। जून 2026 में खुदरा मुद्रास्फीति बढ़कर 4.38% दर्ज की गई। ऐसे में मौद्रिक नीति समिति (MPC) के सामने आर्थिक विकास को गति देने के लिए ब्याज दरों में कटौती की गुंजाइश सीमित हो जाती है

खुदरा मुद्रास्फीति क्या है?

खुदरा मुद्रास्फीति या उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) वह दर है जो यह मापती है कि अंतिम उपभोक्ता द्वारा दैनिक उपभोग की वस्तुओं और सेवाओं (जैसे खाद्य पदार्थ, ईंधन, परिवहन, स्वास्थ्य आदि) के लिए कितना अधिक मूल्य चुकाया जा रहा है। यह सीधे तौर पर आम जनता की क्रय शक्ति और दैनिक जीवन यापन की लागत को प्रभावित करती है।

हाल में चर्चा के कारण

  • लक्ष्य से विचलन: खुदरा मुद्रास्फीति का 4% के आदर्श स्तर से ऊपर निकलना।

  • लागत का हस्तांतरण: थोक बाजार (WPI) में लंबे समय से बना हुआ मूल्य दबाव (ईंधन व परिवहन लागत) अब सीधे तौर पर खुदरा बाजार तक पहुँच गया है।
  • वैश्विक अनिश्चितता: अमेरिका-ईरान संघर्ष और कच्चे तेल की अंतर्राष्ट्रीय कीमतों का $110 प्रति बैरल पार कर जाना।
  • आगामी मौद्रिक नीति बैठक: आरबीआई की आगामी नीतिगत समीक्षा में दरों में कटौती की उम्मीदों का समाप्त हो जाना।

बढ़ती खुदरा मुद्रास्फीति के प्रभाव

  • क्रय शक्ति में कमी: उपभोक्ता की क्रय शक्ति घटती है, जिससे घरेलू उपभोग और मांग प्रभावित होती है।

  • निवेश पर विपरीत असर: उद्योगों के लिए कच्चे माल और रसद की लागत बढ़ने से व्यापारिक लाभ मार्जिन घटता है।
  • आयात बिल में वृद्धि: महंगे ईंधन और डॉलर के मुकाबले कमजोर रुपये से भारत का चालू खाता घाटा (CAD) बढ़ता है।

आरबीआई के पास ब्याज दरों में कटौती की गुंजाइश क्यों नहीं है

  • लक्षित दायरे (4%) का उल्लंघन: आरबीआई का मुख्य दायरा मुद्रास्फीति को 4% पर स्थिर रखना है। जब तक मुद्रास्फीति इस स्तर से ऊपर है, दरें घटाना जोखिम भरा है।

  • मांग-जनित मुद्रास्फीति का खतरा: यदि आरबीआई ब्याज दरें घटाता है, तो बाजार में तरलता बढ़ेगी। अत्यधिक तरलता मांग को बढ़ाएगी, जिससे मुद्रास्फीति और अधिक अनियंत्रित हो सकती है।
  • आयातित मुद्रास्फीति का दबाव: वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की ऊँची दरें और आपूर्ति श्रृंखला की बाधाएं घरेलू स्तर पर दरों को कम करने की अनुमति नहीं देतीं।

आरबीआई की मौद्रिक नीति: ब्याज दरों में कटौती और वृद्धि की कार्यप्रणाली

  • ब्याज दरों में कटौती: जब आरबीआई रेपो दर घटाता है, तो बैंकों के लिए कर्ज लेना सस्ता हो जाता है। बैंक ग्राहकों को सस्ते लोन (होम लोन, कार लोन, बिजनेस लोन) देते हैं। इससे बाजार में नकदी का प्रवाह बढ़ता है और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलता है, लेकिन इससे महंगाई बढ़ने का खतरा रहता है।

  • ब्याज दरों में वृद्धि: जब मुद्रास्फीति बढ़ती है, तो आरबीआई रेपो दर बढ़ा देता है या उसे उच्च स्तर पर बनाए रखता है। इससे कर्ज महंगे हो जाते हैं, लोग कम खर्च करते हैं, बाजार से तरलता घटती है और महंगाई पर लगाम लगती है।

इस स्थिति के सभी प्रमुख कारण

  • ऊँचे ईंधन एवं बिजली दाम: थोक स्तर पर ईंधन मुद्रास्फीति 27% से अधिक रहने से परिवहन और उत्पादन लागत में भारी वृद्धि हुई है।

  • खाद्य मुद्रास्फीति (CFPI): जून में खाद्य मुद्रास्फीति बढ़कर 5.32% हो गई है, साथ ही असंतुलित मानसून की आशंका कृषि पैदावार को प्रभावित कर सकती है।
  • कमर्शियल एलपीजी व सेवाएं: व्यावसायिक एलपीजी की दरों में वृद्धि से रेस्तरां, होटल और खाद्य आपूर्ति सेवाओं के दाम बढ़े हैं।
  • कीमती धातुओं का आयात: सोने-चांदी पर आयात शुल्क 15% करने के बावजूद वैश्विक अनिश्चितता के कारण बुलियन आयात मजबूत रहा, जिससे आभूषण महंगे हुए।

आरबीआई के नियम व रूपरेखा

  • फ्लेक्सिबल इन्फ्लेशन टारगेटिंग (FIT): आरबीआई अधिनियम, 1934 के तहत सरकार और आरबीआई ने मुद्रास्फीति का लक्ष्य 4% तय किया है, जिसमें ऊपरी सहनशीलता सीमा 6% और निचली सहनशीलता सीमा 2% है।

  • प्राथमिकता निर्धारण: हालांकि 2%-6% का दायरा स्वीकार्य है, लेकिन आरबीआई का मुख्य जोर मुद्रास्फीति को टिकाऊ रूप से 4% के करीब बनाए रखना है।
  • एमपीसी का अधिदेश: 6 सदस्यीय मौद्रिक नीति समिति का कानूनी दायित्व है कि जब तक मूल्य स्थिरता सुनिश्चित न हो, तब तक वह विकास दर प्रोत्साहन पर मुद्रास्फीति नियंत्रण को प्राथमिकता दे।

विश्लेषण

वर्तमान आर्थिक परिदृश्य यह दर्शाता है कि आपूर्ति-पक्ष के झटकों के कारण मुद्रास्फीति में वृद्धि हुई है। ऐसे में यदि आरबीआई आर्थिक विकास को गति देने के लिए ब्याज दरों में कटौती करता है, तो यह मुद्रास्फीति को और अधिक भड़का सकता है। थोक और खुदरा मुद्रास्फीति के बीच बना अंतर यह संकेत देता है कि आने वाले समय में मूल्य दबाव बना रहेगा, जिससे आरबीआई कठोर या यथास्थितिवादी मौद्रिक रुख अपनाने पर मजबूर है।

आगे की राह

  • राजकोषीय एवं मौद्रिक समन्वय: केवल मौद्रिक नीति से आपूर्ति-पक्ष की महंगाई को नहीं रोका जा सकता; सरकार को ईंधन पर करों का समायोजन कर राहत देनी होगी।

  • आपूर्ति श्रृंखला सुदृढ़ीकरण: खाद्य पदार्थों के बफर स्टॉक का बुद्धिमत्तापूर्ण उपयोग और लॉजिस्टिक्स लागत को कम करना आवश्यक है।
  • विदेशी मुद्रा हस्तक्षेप: रुपये में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को रोकने के लिए आरबीआई को अपने भंडार का सही उपयोग जारी रखना चाहिए।


निष्कर्ष

वैश्विक भू-राजनीतिक तनावों और महंगे आयातित ईंधन के कारण भारत की खुदरा मुद्रास्फीति का 4% के लक्ष्य को पार कर जाना चिंता का विषय है। ऐसी स्थिति में बाजार में अत्यधिक तरलता को रोकने के लिए आरबीआई के पास ब्याज दरों में कटौती का कोई विकल्प नहीं बचता है। मूल्य स्थिरता बनाए बिना दीर्घकालिक आर्थिक विकास संभव नहीं है, इसलिए आरबीआई का प्राथमिक ध्यान महंगाई पर अंकुश लगाने पर ही केंद्रित रहेगा।

भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन: तकनीकी कार्यप्रणाली, रणनीतिक महत्व एवं चुनौतियाँ

सामान्य अध्ययन पेपर – III:  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन।

संदर्भ

परिवहन क्षेत्र को कार्बन-मुक्त बनाने और वर्ष 2070 तक भारत के 'नेट-ज़ीरो' लक्ष्य को प्राप्त करने के रणनीतिक रोडमैप के अंतर्गत भारतीय रेलवे का आधुनिकीकरण किया जा रहा है। ऐतिहासिक रूप से कोयला चालित भाप इंजनों से लेकर डीजल और इलेक्ट्रिक लोकोमोटिव्स तक का सफर तय करने के बाद, अब भारतीय रेल स्वच्छ ऊर्जा परिदृश्य में कदम रखते हुए हाइड्रोजन ईंधन चालित परिवहन प्रौद्योगिकी को अपना रही है।

हाइड्रोजन ट्रेन क्या है?

हाइड्रोजन ट्रेन (हाईड्रेल) एक शून्य-उत्सर्जन वाली रेलगाड़ी है, जो किसी बाहरी ओवरहेड इलेक्ट्रिक तार से विद्युत लिए बिना या डीजल ईंधन जलाए बिना स्वयं ऑनबोर्ड बिजली उत्पन्न करती है। यह ट्रेन 'प्रोटॉन एक्सचेंज मेंब्रेन' (PEM) फ्यूल सेल तकनीक का उपयोग करती है, जिसमें संग्रहित हाइड्रोजन और वायुमंडलीय ऑक्सीजन के बीच इलेक्ट्रोकेमिकल प्रतिक्रिया कराकर विद्युत उत्पन्न की जाती है, जिससे ट्रेन की ट्रैक्शन मोटर संचालित होती है।

चर्चा के कारण

  • प्रथम वाणिज्यिक व परीक्षण परिचालन: हरियाणा के जिंद-सोनीपत 89 किलोमीटर लंबे रेलखंड पर भारत की पहली हाइड्रोजन ईंधन सेल ट्रेन ('नमो ग्रीन रेल') का परीक्षण व शुभारंभ किया गया।

  • 'हाइड्रोजन फॉर हेरिटेज' पहल: भारतीय रेलवे द्वारा देश के पहाड़ी व हेरिटेज रेल मार्गों (जैसे कालका-शिमला, दार्जिलिंग हिमालयन आदि) पर 35 हाइड्रोजन ट्रेनें चलाने की महत्वाकांक्षी योजना का यह पहला क्रियान्वयन चरण है।
  • राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन का एकीकरण: यह पहल भारत सरकार के 'नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन' (NGHM) के तहत परिवहन क्षेत्र में स्वच्छ ईंधनों के व्यावहारिक अनुप्रयोग को धरातल पर उतारने का प्रत्यक्ष उदाहरण है।
  • रेलवे का डीकार्बोनाइजेशन लक्ष्य: वर्ष 2030 तक भारतीय रेलवे को दुनिया का पहला 'नेट-जीरो कार्बन उत्सर्जक' रेल नेटवर्क बनाने के लक्ष्य को गति प्रदान करना।

हाइड्रोजन ट्रेन कैसे काम करती है?

  • ईंधन भंडारण: ट्रेन की छत पर स्थापित उच्च-दाब टैंकों में शुद्ध हाइड्रोजन गैस को सुरक्षित रूप से संग्रहित किया जाता है।

  • इलेक्ट्रोकेमिकल प्रतिक्रिया: फ्यूल सेल स्टैक के भीतर एनोड पर हाइड्रोजन अणु प्रवाहित होते हैं, जहाँ वे इलेक्ट्रॉन और प्रोटॉन में विभाजित हो जाते हैं।
  • विद्युत धारा का निर्माण: इलेक्ट्रॉन एक बाहरी परिपथ से होकर गुजरते हैं, जिससे दिष्ट धारा उत्पन्न होती है। यह बिजली ट्रेन की इलेक्ट्रिक ट्रैक्शन मोटर को चलाती है।
  • उप-उत्पाद के रूप में केवल जलवाष्प: कैथोड पर प्रोटॉन, इलेक्ट्रॉन और वायुमंडलीय ऑक्सीजन आपस में मिलकर केवल शुद्ध जलवाष्प (H2​O) और ऊष्मा का उत्सर्जन करते हैं।
  • रीजेनरेटिव ब्रेकिंग एवं बैटरी सिस्टम: ब्रेक लगाते समय रीजेनरेटिव ब्रेकिंग के माध्यम से उत्पन्न ऊर्जा को ऑनबोर्ड लिथियम-आयन बैटरियों में संग्रहित किया जाता है, जिसका उपयोग त्वरण के समय अतिरिक्त पावर देने में होता है।

भारत की हाइड्रोजन ट्रेन की विशेषताएं

  • यात्री क्षमता एवं कोच विन्यास: यह 10 डिब्बों वाली एक आधुनिक ट्रेन-सेट है, जिसकी क्षमता एक समय में लगभग 2,600 यात्रियों को ले जाने की है।

  • शून्य-उत्सर्जन तकनीक: संचालन के दौरान शून्य कार्बन डाइऑक्साइड (CO2​), शून्य नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx​) और शून्य पार्टिकुलेट मैटर (PM 2.5/10) का उत्सर्जन करती है।
  • निम्न शोर स्तर: पारंपरिक डीजल लोकोमोटिव्स की तुलना में बेहद कम शोर पैदा करती है, जिससे यात्रा अनुभव सुगम बनता है।
  • दुर्गम मार्गों हेतु उपयुक्त: जिन दूरस्थ, पहाड़ी व हेरिटेज क्षेत्रों में ओवरहेड कैटेनरी तार (OHE) बिछाना आर्थिक या भौगोलिक दृष्टि से अव्यवहारिक है, वहाँ यह डीजल इंजनों का सबसे आदर्श विकल्प है।

वैश्विक परिदृश्य: विश्व में हाइड्रोजन ट्रेन संचालन

  • जर्मनी (विश्व में अग्रणी): सितंबर 2018 में फ्रांस की अलस्टॉम कंपनी द्वारा निर्मित 'Coradia iLint' ट्रेन के साथ जर्मनी विश्व में पहली हाइड्रोजन संचालित यात्री ट्रेन शुरू करने वाला पहला देश बना।

  • चीन: वर्ष 2022 में चीन ने एशिया की पहली हाइड्रोजन-संचालित अर्बन (शहरी) ट्रेन का सफल अनावरण किया।
  • अन्य अग्रणी देश: ब्रिटेन, जापान, फ्रांस, स्विट्जरलैंड और संयुक्त राज्य अमेरिका भी अपने रेल नेटवर्क में हाइड्रोजन फ्यूल सेल तकनीक के कमर्शियल और पायलट ट्रायल कर रहे हैं।

भारत में हाइड्रोजन पर चलने वाले अन्य वाहन

  • हाइड्रोजन ईंधन सेल बसें: इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOCL) और CSIR-KPIT द्वारा विकसित हाइड्रोजन फ्यूल सेल बसों का सफल परीक्षण किया गया है। NTPC द्वारा लेह (लद्दाख) में अत्यधिक ऊंचाई व कम तापमान वाले क्षेत्रों के लिए 5 हाइड्रोजन बसों का संचालन किया जा रहा है।

  • भारी वाणिज्यिक वाहन (ट्रक्स एवं आईसीई प्रोटोटाइप): सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) तथा MNRE के सहयोग से टाटा मोटर्स और अशोक लीलैंड द्वारा हाइड्रोजन इंटरनल कंबशन इंजन (H₂-ICE) और फ्यूल सेल आधारित भारी ट्रकों का परीक्षण किया जा रहा है।

हाइड्रोजन ट्रेन का महत्व

  • पर्यावरणीय स्थिरता: डीजल चालित इंजनों को प्रतिस्थापित कर जहरीली गैसों, धुएँ और विषैले कणों के उत्सर्जन को समाप्त करती है।

  • सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) से जुड़ाव:
    • SDG 7 (सस्ती और स्वच्छ ऊर्जा): टिकाऊ व नवीकरणीय ऊर्जा साधनों के उपयोग को बढ़ावा देना।
    • SDG 9 (उद्योग, नवाचार और बुनियादी ढांचा): रेलवे इंफ्रास्ट्रक्चर में अत्याधुनिक हरित नवाचार का समावेश।
    • SDG 13 (जलवायु कार्रवाई): वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5°C तक सीमित करने के प्रयासों में योगदान।
  • अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबद्धताएँ (पेरिस समझौता और कॉप 26): भारत के 'पंचामृत' लक्ष्यों (2030 तक गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता 500 GW तथा 2070 तक नेट-जीरो) की प्राप्ति में महत्वपूर्ण भूमिका।
  • ऊर्जा सुरक्षा व आयात निर्भरता में कमी: परिवहन क्षेत्र में विदेशी कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता घटाकर देश की आर्थिक और रणनीतिक ऊर्जा सुरक्षा को सुदृढ़ करती है।

अन्य महत्वपूर्ण बिंदु एवं चुनौतियाँ

  • ग्रीन बनाम ग्रे हाइड्रोजन का द्वंद्व: यदि ट्रेन संचालन के लिए प्रयुक्त हाइड्रोजन का उत्पादन प्राकृतिक गैस या कोयले (ग्रे हाइड्रोजन) से होता है, तो इसका शुद्ध पर्यावरणीय लाभ सीमित हो जाता है। वास्तविक लाभ केवल 'ग्रीन हाइड्रोजन' (सौर/पवन ऊर्जा द्वारा संचालित इलेक्ट्रोलीसिस) से ही संभव है।

  • अत्यधिक प्रारंभिक व पूंजीगत लागत: हाइड्रोजन फ्यूल सेल, स्टोरेज टैंक तथा इलेक्ट्रोलाइज़र की निर्माण लागत डीजल व इलेक्ट्रिक इंजनों की तुलना में बहुत अधिक है।
  • रिफ्यूलिंग इंफ्रास्ट्रक्चर का अभाव: देश में हाइड्रोजन के सुरक्षित परिवहन, भंडारण और त्वरित रिफ्यूलिंग स्टेशनों का व्यापक नेटवर्क अभी अपनी शुरुआती अवस्था में है।
  • सुरक्षा जोखिम व ज्वलनशीलता: हाइड्रोजन एक अत्यधिक ज्वलनशील और सूक्ष्म अणुओं वाली गैस है, जिसके कारण इसके भंडारण और परिवहन में रिसाव नियंत्रण एवं अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा मानकों का कड़ाई से पालन आवश्यक है।

विश्लेषण

हाइड्रोजन ट्रेन का सफल परीक्षण भारत के हरित परिवहन परिवर्तन में एक रणनीतिक मोड़ है। हालाँकि, इसकी दीर्घकालिक सफलता केवल ट्रेन चलाने तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि इस बात पर निर्भर करेगी कि भारत कितनी तेज़ी से किफायती ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन और सुरक्षित बुनियादी ढांचा तैयार कर पाता है।

आगे की राह

  • उत्पादन लागत को नियंत्रित करना: 'राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन' (NGHM) के तहत इलेक्ट्रोलाइज़र निर्माण के स्वदेशीकरण द्वारा ग्रीन हाइड्रोजन की उत्पादन लागत को ₹ 100 प्रति किलोग्राम के स्तर से नीचे लाना।

  • रणनीतिक व लक्षित क्रियान्वयन: शत-प्रतिशत विद्युतीकृत मुख्य रेल मार्गों के बजाय दूरस्थ, पहाड़ी व हेरिटेज रूट्स पर ही हाइड्रोजन ट्रेनों को प्राथमिकता देना ताकि वित्तीय आवंटन का इष्टतम उपयोग हो सके।
  • सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP Model): हाइड्रोजन रिफ्यूलिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, सप्लाई चेन और सुरक्षा तकनीकों के विकास में निजी क्षेत्र के निवेश को आकर्षित करना।


निष्कर्ष

भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन का शुभारंभ केवल एक तकनीकी प्रदर्शन नहीं है, बल्कि कार्बन-मुक्त भविष्य की ओर एक व्यावहारिक और रणनीतिक कदम है। यदि उच्च लागत और रिफ्यूलिंग इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी शुरुआती बाधाओं का योजनाबद्ध तरीके से समाधान कर लिया जाए, तो यह पहल भारतीय रेल को वैश्विक स्तर पर एक टिकाऊ व पर्यावरण-अनुकूल परिवहन व्यवस्था के रूप में स्थापित करने में दूरगामी सिद्ध होगी।

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्देश: बुजुर्ग एवं गंभीर रूप से बीमार कैदियों की समय पूर्व रिहाई हेतु नीति

सामान्य अध्ययन पेपर  – II:  शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध।

संदर्भ

भारत की जेलों में क्षमता से अधिक कैदियों का होना और स्वास्थ्य सुविधाओं की सीमित उपलब्धता एक गंभीर मानवीय चिंता का विषय रहा है। हाल ही में राष्ट्रीय कानूनी सेवा प्राधिकरण (NALSA) द्वारा देशभर की जेलों के निरीक्षण के आधार पर दायर एक याचिका ने इस तथ्य को उजागर किया कि वृद्ध एवं गंभीर रूप से बीमार कैदियों की समय पूर्व रिहाई के लिए देश में कोई एक समान नीति या ढांचा मौजूद नहीं है। इसी याचिका पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने यह दूरगामी निर्णय सुनाया है।

राष्ट्रीय कानूनी सेवा प्राधिकरण (NALSA) क्या है?

NALSA की स्थापना विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के तहत की गई थी। इसका मुख्य उद्देश्य समाज के गरीब, कमजोर और हाशिए पर मौजूद वर्गों को मुफ़्त और सक्षम कानूनी सहायता प्रदान करना है, ताकि आर्थिक या अन्य अक्षमताओं के कारण कोई भी नागरिक न्याय से वंचित न रहे। यह देश भर में लोक अदालतों का आयोजन और कानूनी जागरूकता फैलाने का शीर्ष निकाय है।

  • राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरण (SLSA) से संबंध

NALSA राष्ट्रीय स्तर पर नीतियां और दिशा-निर्देश बनाता है, जिन्हें राज्य स्तर पर SLSA (राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरण) लागू करता है। सरल शब्दों में, NALSA केंद्रीय निकाय है और प्रत्येक राज्य का SLSA इसकी राज्य स्तरीय कार्यकारी शाखा के रूप में काम करता है।

संवैधानिक प्रावधान

  • अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार): इसके तहत मानवीय गरिमा के साथ जीने का अधिकार और गरिमापूर्ण मृत्यु/देखभाल का अधिकार भी शामिल है।

  • अनुच्छेद 161 (राज्यपाल की क्षमादान शक्ति): राज्य के राज्यपाल को किसी सजा को माफ करने, कम करने या निलंबित करने की संवैधानिक शक्ति प्राप्त है।
  • अनुच्छेद 72 (राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति): केंद्र के स्तर पर राष्ट्रपति को दंडादेश के निलंबन, परिहार या लघूकरण की शक्ति।
  • अनुच्छेद 39A (समान न्याय और मुफ़्त कानूनी सहायता): यह राज्य का नीति निदेशक तत्व (DPSP) है, जो यह सुनिश्चित करता है कि आर्थिक या अन्य अक्षमताओं के कारण कोई नागरिक न्याय से वंचित न रहे।

चर्चा का कारण

  • अमानवीय स्थितियों पर संज्ञान: देश भर की जेलों में बंद बुजुर्ग और असाध्य रोगों से पीड़ित कैदियों की दयनीय स्थिति को उजागर करते हुए NALSA द्वारा अनुच्छेद 32 के तहत दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई की।

  • समान नीति का अभाव: वर्तमान में राज्यों के पास ऐसे कैदियों की समय पूर्व रिहाई के लिए कोई एक समान, स्पष्ट और समयबद्ध कानूनी ढांचा नहीं है।
  • समयबद्ध निर्देश: सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को इस संबंध में एक निश्चित समय सीमा के भीतर नीति बनाने का कड़ा आदेश जारी किया है।

सुप्रीम कोर्ट का मुख्य आदेश

  • 3 महीने की समय सीमा:

    • सुप्रीम कोर्ट (16 जुलाई, 2026) ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को आदेश दिया कि वे तीन महीने के भीतर बुजुर्ग और गंभीर रूप से बीमार कैदियों की समय से पहले रिहाई के लिए एक समान नीति लागू करें।
  • मानवीय एवं अनुकंपा का अधिकार:
    • कोर्ट ने स्पष्ट टिप्पणी की कि ऐसे कैदी मानवीय दृष्टिकोण और समयबद्ध तंत्र के तहत समय पूर्व रिहाई या अनुकंपा के आधार पर जल्दी रिहाई के पूर्ण हकदार हैं।
  • पात्रता मानदंड और स्पष्ट प्रक्रिया:
    • पीठ: यह ऐतिहासिक आदेश न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने दिया।
    • स्पष्टता: प्रत्येक राज्य को अपनी नीति में रिहाई के लिए पात्रता मानदंड और प्रक्रियात्मक ढांचे को स्पष्ट रूप से निर्धारित करना होगा।
  • SLSA के साथ समन्वय:
    • इस नीति को तैयार करने और इसे जमीनी स्तर पर कार्यान्वित करने का काम संबंधित राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरणों (SLSAs) के समन्वय  से किया जाएगा।

आवश्यकता एवं प्रासंगिकता

  • मानवीय दृष्टिकोण: जीवन के अंतिम पड़ाव में या गंभीर बीमारी से जूझ रहे कैदियों को चिकित्सा और पारिवारिक देखभाल की सख्त जरूरत होती है।

  • जेलों में भीड़ कम करना : भारतीय जेलें अपनी वास्तविक क्षमता से अधिक कैदियों को रखने के लिए मजबूर हैं। रिहाई से जेलों पर दबाव कम होगा।
  • संसाधनों का इष्टतम उपयोग: गंभीर रूप से बीमार और बुजुर्ग कैदियों की देखभाल पर जेल प्रशासन का काफी बजटीय और चिकित्सीय संसाधन खर्च होता है।
  • न्यायिक समरूपता: वर्तमान में अलग-अलग राज्यों में रिहाई के नियम अलग-अलग हैं। एक समान नीति से प्रशासनिक भेदभाव खत्म होगा।

NCRB की रिपोर्ट

  • जेल क्षमता और भीड़: भारतीय कारागार सांख्यिकी (NCRB) 2024 रिपोर्ट के अनुसार,  भारत की जेलों में ऑक्यूपेंसी रेट लगभग 112.7%  से अधिक है।

  • वृद्ध कैदी: जेलों में बंद कुल कैदियों में से लगभग 3% से 5% कैदी 60 वर्ष या उससे अधिक आयु के (बुजुर्ग) हैं।
  • बीमारी एवं मृत्यु: जेलों में होने वाली प्राकृतिक मौतों में से अधिकांश मामले दिल की बीमारी, कैंसर, तपेदिक (TB) और किडनी फेलियर जैसी गंभीर बीमारियों से जुड़े होते हैं।

प्रभाव

  • कैदियों के अधिकारों का संरक्षण: कैदियों को समय पर चिकित्सा सेवा और परिवार के साथ गरिमापूर्ण समय बिताने का अवसर मिलेगा।

  • जेल प्रशासन का सुगमीकरण: जेलों में सुरक्षा और स्वास्थ्य प्रबंधन पर पड़ने वाला अतिरिक्त बोझ कम होगा।
  • समानता और पारदर्शिता: राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरण (SLSA) के शामिल होने से प्रक्रिया में पारदर्शिता आएगी और भ्रष्टाचार/मनमानी पर रोक लगेगी।

चिंताएं एवं चुनौतियां

  • अपराध की गंभीरता: क्या जघन्य अपराधों (जैसे- दुष्कर्म, आतंकवाद, देशद्रोह) के दोषियों को भी इसमें छूट मिलनी चाहिए? इस पर स्पष्ट वर्गीकरण आवश्यक है।

  • पीड़ित के अधिकार बनाम अपराधी की अनुकंपा: पीड़ित परिवार के न्याय बोध पर इसका प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।
  • फर्जी मेडिकल सर्टिफिकेट: नीतियां बनने के बाद भ्रष्ट आचरण या फर्जी मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर रिहाई के दुरुपयोग का जोखिम।
  • प्रशासनिक देरी: समयबद्ध (3 महीने) सीमा के बावजूद राज्य सरकारों की ओर से नीति निर्माण में सुस्ती की संभावना।

विश्लेषण

यह निर्णय भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली को केवल "दंडकारी" दृष्टिकोण से हटाकर "सुधारात्मक एवं मानवीय" दृष्टिकोण की ओर ले जाता है। राज्य की संप्रभु शक्ति का उपयोग केवल सजा देने के लिए नहीं, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर करुणा और गरिमा सुनिश्चित करने के लिए भी होना चाहिए।

आगे की राह

  • स्पष्ट और पारदर्शी नीतियां: राज्यों को स्पष्ट श्रेणी (जैसे- 65-70 वर्ष से अधिक आयु, 75% से अधिक विकलांगता या लाइलाज बीमारी) निर्धारित करनी चाहिए।

  • स्वतंत्र मेडिकल बोर्ड का गठन: रिहाई के लिए केवल सरकारी डॉक्टरों की एक निष्पक्ष मेडिकल टीम की सिफारिश अनिवार्य की जाए।
  • डिजिटल ट्रैकिंग: प्रक्रिया की निगरानी के लिए एक पारदर्शी पोर्टल बनाया जाए ताकि समयबद्ध तरीके से आवेदनों का निपटारा हो सके।
  • पीड़ितों का ध्यान: रिहाई से पूर्व पीड़ित पक्ष के विचारों और सुरक्षा का आंकलन भी जरूरी है।


निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश केवल एक प्रशासनिक सुधार नहीं, बल्कि मानवाधिकारों और संवैधानिक मूल्यों की पुनर्स्थापना है। बुजुर्ग और असाध्य रोगों से ग्रस्त कैदियों के लिए समयबद्ध रिहाई नीति का निर्माण यह साबित करता है कि न्याय प्रणाली की वास्तविक ताकत उसकी कठोरता में नहीं, बल्कि उसकी निष्पक्षता और मानवीय करुणा में निहित है।