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संदर्भ:

भारतीय सशस्त्र बलों की सर्वोच्च कमांडर, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने शुक्रवार को राजस्थान के जैसलमेर वायु सेना स्टेशन पर स्वदेश निर्मित हल्के लड़ाकू हेलीकॉप्टर (LCH) 'प्रचंड' में 25 मिनट की ऐतिहासिक उड़ान भरी। इस दौरान हेलीकॉप्टर ने गड़ीसर झील के ऊपर से गुजरते हुए एक निर्धारित टैंक लक्ष्य पर सटीक निशाना साधकर अपनी मारक क्षमता का सफल प्रदर्शन किया।

स्वदेशी लड़ाकू हेलीकॉप्टर 'प्रचंड':

  • विकास एवं निर्माण: 'प्रचंड' पूर्णतः स्वदेशी लड़ाकू हेलीकॉप्टर है, जिसे भारत की प्रमुख एयरोस्पेस कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) द्वारा विशेष रूप से भारतीय सशस्त्र बलों की आवश्यकताओं के अनुरूप डिजाइन और विकसित किया गया है।
  • अद्वितीय क्षमताएं एवं मारक शक्ति:
  • विश्व रिकॉर्ड धारक ऊंचाई: यह दुनिया का एकमात्र लड़ाकू हेलीकॉप्टर है जो 5,000 मीटर (16,400 फीट) की अत्यधिक ऊंचाई पर सफलतापूर्वक टेक-ऑफ और लैंडिंग कर सकता है। यह क्षमता इसे सियाचिन और लद्दाख जैसे दुर्गम हिमालयी क्षेत्रों के लिए सर्वश्रेष्ठ बनाती है।
  • स्टील्थ और सुरक्षा: इसमें 'लो रडार सिग्नेचर' तकनीक का उपयोग किया गया है, जिससे यह दुश्मन के रडार की पकड़ में आसानी से नहीं आता। इसके अलावा, इसमें क्रैश-प्रतिरोधी संरचना और बख्तरबंद सुरक्षा दी गई है।
  • शक्तिशाली इंजन: यह दो 'शक्ति' इंजनों द्वारा संचालित है, जो इसे 268 किमी/घंटा की अधिकतम गति और लगभग 550 किमी की रेंज प्रदान करते हैं।
  • हथियार प्रणाली: यह 20 मिमी की बुर्ज गन, 70 मिमी के रॉकेट सिस्टम, हवा से हवा में मार करने वाली 'मिस्ट्रल' मिसाइलों और टैंक-रोधी निर्देशित मिसाइलों से लैस है।
  • ग्लास कॉकपिट एवं सेंसर: इसमें आधुनिक 'ग्लास कॉकपिट', हेलमेट माउंटेड डिस्प्ले और इन्फ्रारेड सर्च एंड ट्रैक (IRST) प्रणाली लगी है, जो पायलट को रात के अंधेरे और खराब मौसम में भी सटीक लक्ष्य भेदने में मदद करती है।
  • सर्व-मौसम परिचालन: यह रेगिस्तान की 50°C की गर्मी से लेकर हिमालय की -50°C की हाड़ कपा देने वाली ठंड तक, हर विषम परिस्थिति में प्रभावी ढंग से कार्य करने हेतु सक्षम है।

निष्कर्ष

राष्ट्रपति द्वारा 'प्रचंड' में सफल उड़ान केवल उनके निजी अनुभव को समृद्ध करती है, बल्कि यह वैश्विक स्तर पर भारत की सैन्य-तकनीकी संप्रभुता और 'रक्षा आत्मनिर्भरता' की अदम्य क्षमता का उद्घोष भी है।

संदर्भ:

भारतीय नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के. त्रिपाठी ने शुक्रवार को चेन्नई बंदरगाह पर स्वदेशी रूप से निर्मित चौथे पनडुब्बी रोधी युद्ध पोत (ASW SWC) 'आईएनएस अंजदीप' को आधिकारिक रूप से नौसेना में शामिल किया।

मुख्य बिंदु:

  • स्वदेशी निर्माण: इस पोत का निर्माण कोलकाता स्थित गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (GRSE) द्वारा कट्टुपल्ली में किया गया है, जो 'आत्मनिर्भर भारत' की बढ़ती ताकत का प्रतीक है।
  • रणनीतिक उद्देश्य: यह पोत मुख्य रूप से तटीय जल में दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगाने, उन पर नज़र रखने और उन्हें बेअसर करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।
  • बहुआयामी भूमिका: यह तटीय निगरानी, कम तीव्रता वाले समुद्री संचालन (LIMO) और खोज एवं बचाव (SAR) कार्यों को सफलतापूर्वक संपन्न करने में सक्षम है।
  • ऐतिहासिक नाम: इसका नाम कारवार के तट पर स्थित ऐतिहासिक 'अंजदीप' द्वीप के शौर्य और रणनीतिक महत्व को सम्मान देने के लिए रखा गया है।
  • ट्रस्ट इन इंडिया: एडमिरल त्रिपाठी के अनुसार, यह जहाज दर्शाता है कि भारत की आत्मनिर्भरता अब 'मेक इन इंडिया' से आगे बढ़कर 'ट्रस्ट इन इंडिया' के चरण में पहुँच गई है।

आईएनएस अंजदीप?

यह भारतीय नौसेना का एक अत्याधुनिक पनडुब्बी रोधी युद्ध उथले जल शिल्प (ASW SWC) है। इसकी प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

  • आकार एवं संरचना: इसकी कुल लंबाई 77 मीटर है और इसे उथले पानी में युद्धक प्रभावशीलता के लिए इंजीनियर किया गया है।
  • हथियार प्रणाली: यह हल्के वजन वाले टॉरपीडो, पनडुब्बी रोधी रॉकेट और उन्नत युद्ध प्रबंधन प्रणाली से लैस है।
  • सेंसर तकनीक: इसमें अत्याधुनिक उथले पानी के सोनार और स्वदेशी सेंसर पैकेज लगाए गए हैं, जो समुद्र के नीचे छिपे खतरों को पहचानने में सटीक हैं।
  • युद्ध कौशल: इसे विशेष रूप से तटीय युद्ध वातावरण की चुनौतियों, जैसे चपलता और सटीकता से निपटने के लिए तैयार किया गया है।

निष्कर्ष:

आईएनएस अंजदीप का कमीशन होना केवल नौसेना की पनडुब्बी रोधी क्षमताओं को सुदृढ़ करता है, बल्कि वैश्विक स्तर पर भारत के स्वदेशी डिजाइन और औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र की बढ़ती संप्रभुता का भी प्रमाण है।

सामान्य अध्ययन पेपर – III  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन

सन्दर्भ

हाल ही में सांख्यिकी सचिव सौरभ गर्ग द्वारा जारी किए गए सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के दूसरे अग्रिम अनुमान (SAE) भारत की आर्थिक दिशा में एक महत्वपूर्ण मोड़ को दर्शाते हैं। नई श्रृंखला के आधार पर वित्तीय वर्ष 2025-26 (FY26) की वृद्धि दर को संशोधित कर 7.6% कर दिया गया है।

प्रमुख सांख्यिकीय बदलाव और आधार वर्ष

  • आधार वर्ष में परिवर्तन: आर्थिक गणना की सटीकता बढ़ाने हेतु आधार वर्ष को 2011-12 से बदलकर 2022-23 कर दिया गया है।
  • प्रतिनिधित्व में सुधार: मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन के अनुसार, नई श्रृंखला में डेटा की सूक्ष्मता और प्रतिनिधित्व क्षमता को बढ़ाने के लिए नवीन डेटा सेट जोड़े गए हैं।
  • नाममात्र GDP का संशोधन: 2023-26 की अवधि के लिए नाममात्र GDP को नीचे की ओर संशोधित किया गया है, जो सीधे तौर पर राजकोषीय घाटा-GDP अनुपात और ऋण-GDP अनुपात जैसे महत्वपूर्ण वृहद आर्थिक संकेतकों को प्रभावित करेगा।

वृद्धि दर का तुलनात्मक विवरण

तालिका के अनुसार वार्षिक GDP वृद्धि (स्थिर मूल्यों पर) का विवरण निम्नलिखित है:

वित्तीय वर्ष

अनुमान का प्रकार

संशोधित वृद्धि दर (%)

2023-24

संशोधित श्रृंखला

7.2% (पुरानी श्रृंखला के 9.2% से कम)

2024-25

प्रथम संशोधित अनुमान (FRE)

7.1% (पहले के 6.5% से अधिक)

2025-26

द्वितीय अग्रिम अनुमान (SAE)

7.6% (जनवरी के 7.4% अनुमान से अधिक)

क्षेत्रवार प्रदर्शन का विश्लेषण

A. द्वितीयक क्षेत्र: अर्थव्यवस्था का मुख्य इंजन

  • इस क्षेत्र में 9.5% की प्रभावशाली वृद्धि की उम्मीद है।
  • विनिर्माण: इसमें 12.5% की भारी वृद्धि आंकी गई है, जो पिछले वर्ष 8.3% थी। यह 'मेक इन इंडिया' और विनिर्माण क्षेत्र में बढ़ते निवेश का संकेत है।
  • निर्माण: इसकी वृद्धि दर में मामूली गिरावट (7.1% से घटकर 6.9%) देखी गई है।

B. तृतीयक क्षेत्र: निरंतर विस्तार

  • सेवा क्षेत्र में 8.9% की वृद्धि का अनुमान है।
  • व्यापार, होटल, परिवहन और संचार समूह (10.3%) तथा वित्तीय आईटी सेवाओं (10%) में दो अंकों की वृद्धि दर्ज की गई है।

C. प्राथमिक क्षेत्र: चिंता का विषय

  • प्राथमिक क्षेत्र में उल्लेखनीय मंदी दर्ज की गई है, जहाँ वृद्धि दर 5% से घटकर 2.8% रहने का अनुमान है।
  • कृषि: कृषि क्षेत्र की वृद्धि दर 4.3% से घटकर 2.5% पर गई है, जो ग्रामीण मांग और खाद्य मुद्रास्फीति के लिए एक चुनौती हो सकती है।
  • खनन: इसमें 11.2% से घटकर 5% की गिरावट देखी गई है।

तिमाही प्रदर्शन (FY26)

चालू वित्तीय वर्ष की विकास यात्रा निरंतरता को दर्शाती है:

  • प्रथम तिमाही (Q1): 6.7%
  • द्वितीय तिमाही (Q2): 8.4%
  • तृतीय तिमाही (Q3): 7.8%

विश्लेषण:भारत की आर्थिक स्थिति:

आर्थिक स्थिति

  • विनिर्माण क्षेत्र का पुनरुत्थान: विनिर्माण क्षेत्र में 12.5% की अभूतपूर्व वृद्धि यह दर्शाती है कि भारत 'असेंबली हब' से आगे बढ़कर 'प्रोडक्शन हब' बन रहा है। यह वृद्धि 'आत्मनिर्भर भारत' और PLI योजनाओं के सफल क्रियान्वयन का परिणाम है।
  • सेवा क्षेत्र की सुदृढ़ता: व्यापार, होटल और आईटी सेवाओं में 10% से अधिक की वृद्धि यह स्पष्ट करती है कि शहरी मांग और डिजिटल निर्यात भारत की अर्थव्यवस्था के मजबूत स्तंभ बने हुए हैं।
  • आधार वर्ष (2022-23) का प्रभाव: नया आधार वर्ष अर्थव्यवस्था की वास्तविक तस्वीर पेश करता है, जिसमें महामारी के बाद के डिजिटल बदलावों और नए डेटा सेटों को शामिल किया गया है। हालांकि, नाममात्र GDP में कमी ने राजकोषीय प्रबंधन के लिए नई चुनौतियाँ पेश की हैं।

प्रमुख चिंताएँ एवं चुनौतियाँ

  • कृषि क्षेत्र में मंदी: प्राथमिक क्षेत्र की वृद्धि दर का 5% से घटकर 2.8% (और कृषि का 2.5%) होना ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए चिंताजनक है। यह केवल ग्रामीण उपभोग  को प्रभावित करता है, बल्कि खाद्य मुद्रास्फीति के जोखिम को भी बढ़ाता है।
  • राजकोषीय संकेतक: नाममात्र GDP के नीचे की ओर संशोधन से राजकोषीय घाटा-GDP अनुपात को सरकार के निर्धारित लक्ष्यों (जैसे 4.5% या उससे कम) के भीतर रखना कठिन हो सकता है।
  • निर्माण क्षेत्र की स्थिरता: निर्माण क्षेत्र में 6.9% की वृद्धि पिछले वर्ष की तुलना में कम है, जो बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की गति में मामूली ठहराव का संकेत दे सकती है।

सुधारात्मक आवश्यकताएँ और भविष्य की राह

अर्थव्यवस्था को 8%+ की सतत वृद्धि दर पर ले जाने के लिए निम्नलिखित कदम अनिवार्य हैं:

  • कृषि क्षेत्र में संरचनात्मक सुधार: मानसून पर निर्भरता कम करने के लिए सूक्ष्म सिंचाई और 'सटीक कृषि' को बढ़ावा देना आवश्यक है। साथ ही, कृषि-प्रसंस्करण में निवेश बढ़ाकर किसानों की आय में सुधार करना होगा।
  • राजकोषीय सुदृढ़ीकरण: नाममात्र GDP में कमी को देखते हुए, सरकार को कर आधार  बढ़ाने और गैर-कर राजस्व (जैसे विनिवेश) पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
  • ग्रामीण मांग को प्रोत्साहन: मनरेगा और प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) जैसी योजनाओं के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में क्रय शक्ति बढ़ाने की आवश्यकता है ताकि संतुलित विकास सुनिश्चित हो सके।
  • निजी निवेश को बढ़ावा: सरकारी निवेश के साथ-साथ निजी क्षेत्र के निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए नीतिगत निरंतरता और 'इज ऑफ डूइंग बिजनेस' में और सुधार की आवश्यकता है।

निष्कर्ष

भारतीय अर्थव्यवस्था विनिर्माण और सेवाओं के दम पर मजबूत बनी हुई है,नई श्रृंखला के आधार पर FY26 की 7.6% की वृद्धि दर भारत को 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने के लक्ष्य की ओर अग्रसर करती है। लेकिन कृषि क्षेत्र में मंदी एक गंभीर संरचनात्मक चुनौती है। यदि भारत अपने द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्रों की गति को बनाए रखते हुए प्राथमिक क्षेत्र की बाधाओं को दूर कर लेता है, तो मध्यम अवधि में भारत की विकास गाथा और अधिक समावेशी और लचीली होगी।आधार वर्ष को 2022-23 में बदलने से अब जीडीपी के आँकड़े वर्तमान आर्थिक वास्तविकताओं के अधिक करीब होंगे। हालांकि, नाममात्र जीडीपी में कमी सरकार के लिए राजकोषीय घाटे के लक्ष्यों को प्राप्त करने में चुनौती पेश कर सकती है।

सामान्य अध्ययन पेपर  – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध।


संदर्भ:

वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में अमेरिका-ईरान तनाव, रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया के संघर्षों ने अंतरराष्ट्रीय कानून की उपयोगिता पर गंभीर बहस छेड़ दी है। जहाँ कुछ विद्वान इसे 'नियम-मुक्त विश्व' की आहट मान रहे हैं, वहीं अंतरराष्ट्रीय कानून के विशेषज्ञों का तर्क है कि यह मृत नहीं बल्कि 'लचीला' बना हुआ है।

बल प्रयोग का निषेध और अनुच्छेद 2(4) का संकट

संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद 2(4) अंतरराष्ट्रीय संबंधों में बल प्रयोग या उसकी धमकी को प्रतिबंधित करता है।

  • ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य: अंतरराष्ट्रीय कानून की मृत्यु की घोषणा करना 'बौद्धिक आलस्य' है। 1970 के दशक में शीत युद्ध (U.S. बनाम सोवियत संघ) के दौरान भी थॉमस फ्रैंक जैसे वकीलों ने इसे मृत मान लिया था।
  • अतीत के उल्लंघन: पिछले चार दशकों में अफ़गानिस्तान (1979 और 2001), फ़ॉकलैंड, खाड़ी युद्ध, इराक (2003), सीरिया और लीबिया जैसे युद्धों ने इस अनुच्छेद को बार-बार चोट पहुँचाई है, लेकिन इसे समाप्त नहीं कर सके।
  • जवाबदेही का एकमात्र ढांचा: यह आज भी शक्तिशालियों को जवाबदेह ठहराने का एकमात्र विधिक और मानक ढांचा बना हुआ है।

अधिनायकवाद का उदय: एक गुणात्मक परिवर्तन

वर्तमान समय में अंतरराष्ट्रीय कानून के समक्ष चुनौती अतीत से भिन्न है:

  • तर्कों का अभाव: अतीत में महाशक्तियां अपने बल प्रयोग को 'कानूनी व्याख्याओं' (जैसे आत्मरक्षा का विस्तार) के माध्यम से उचित ठहराती थीं, जिससे संवाद की संभावना बनी रहती थी।
  • वर्तमान स्वेच्छाचारिता: आज की 'लोकलुभावन-अधिनायकवादी' दुनिया में राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय नियमों की व्याख्या करने के बजाय उन्हें सीधे दरकिनार कर रहे हैं (जैसे वेनेजुएला के तेल पर अमेरिकी दावा) यह व्यवहार अंतरराष्ट्रीय कानून के लिए सैन्य हमलों से भी बड़ा खतरा है।

'अदृश्य' अंतरराष्ट्रीय कानून का प्रभाव

अंतरराष्ट्रीय कानून केवल युद्ध और शांति तक सीमित नहीं है। इसका एक विशाल हिस्सा 'मौन' रहकर विश्व व्यवस्था को संचालित करता है:

  • विविध कार्यक्षेत्र: नागरिक उड्डयन, समुद्री संसाधन, वैश्विक व्यापार (WTO), निवेश, मानवाधिकार और जलवायु परिवर्तन जैसे क्षेत्रों में यह एक 'सामाजिक घटना' के रूप में फल-फूल रहा है।
  • महत्वपूर्ण संधियाँ: हालिया 'महामारी समझौता' और भारत-यूरोपीय संघ के बीच 'मुक्त व्यापार समझौता' (FTA) वार्ता इसके जीवंत प्रमाण हैं।
  • दैनिक जीवन पर प्रभाव: यह कानून ही वस्तुओं, लोगों और संचार नेटवर्क को राष्ट्रीय सीमाओं के पार सुरक्षित प्रवाह सुनिश्चित करता है।

अंतरराष्ट्रीय संबंधों का न्यायिककरण

  • विश्व भर में अंतरराष्ट्रीय न्यायालयों (जैसे ICC, अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय और क्षेत्रीय मानवाधिकार न्यायालय) की बढ़ती संख्या यह दर्शाती है कि विवादों के समाधान के लिए विधिक मार्ग की मांग बढ़ी है। ये संस्थाएं शक्तिहीन राष्ट्रों और लोगों को अपनी बात रखने का 'सामर्थ्य' प्रदान करती हैं।

भारत के लिए प्रासंगिकता:

  • भारत जैसे राष्ट्र के लिए, जो एक 'नियम-आधारित विश्व व्यवस्था' का प्रबल समर्थक है, अंतरराष्ट्रीय कानून का अस्तित्व अत्यंत आवश्यक है। यह केवल छोटे देशों को सुरक्षा प्रदान करता है, बल्कि वैश्विक स्थिरता का आधार भी है। हमें इस व्यवस्था को नष्ट होने से बचाने और इसमें सुधार करने के लिए निरंतर प्रयास करने चाहिए।

निष्कर्ष

अंतरराष्ट्रीय कानून की मृत्यु पर उपदेश देना केवल वैश्विक दबंगों के हितों को साधने जैसा है। जिस प्रकार किसी देश में एक तानाशाही शासन के आने पर हम 'उदार संवैधानिक व्यवस्था' का परित्याग नहीं करते, उसी प्रकार वैश्विक स्तर पर नियमों के उल्लंघन का अर्थ 'कानून का अंत' नहीं है।