CURRENT-AFFAIRS

Read Current Affairs

वित्तीय समावेशन से वित्तीय स्वास्थ्य: भारत के आर्थिक सशक्तिकरण का नया प्रतिमान

सामान्य अध्ययन पेपर–III:  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन।

संदर्भ

हाल ही में भारत के अनौपचारिक क्षेत्र के श्रमिकों के जीवन के उदाहरण के माध्यम से यह रेखांकित किया गया कि वित्तीय समावेशन के मात्रात्मक लक्ष्यों को प्राप्त करने के पश्चात अब देश को 'वित्तीय स्वास्थ्य' की गुणात्मक दिशा में अग्रसर होने की महती आवश्यकता है। इसी क्रम में भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा मार्च 2026 के लिए 'वित्तीय समावेशन सूचकांक' जारी किया जाना इस विमर्श को और अधिक प्रासंगिक बनाता है।

वित्तीय स्वास्थ्य: अवधारणा एवं आयाम

वित्तीय स्वास्थ्य से आशय केवल एक बैंक खाता होने या औपचारिक वित्तीय सेवाओं तक पहुँच स्थापित हो जाने से नहीं है। यह एक व्यापक स्थिति है जिसके अंतर्गत कोई व्यक्ति निम्नलिखित क्षमताओं से युक्त होता है:

  • वर्तमान दायित्वों का निर्वहन: अपने दैनिक और वर्तमान वित्तीय दायित्वों को सहजता से पूरा करना।
  • आर्थिक आघातों से सुरक्षा: अप्रत्याशित आर्थिक झटकों (जैसे- गंभीर बीमारी या अकस्मात आय-हानि) को सहन करने की सुदृढ़ क्षमता।
  • भविष्य का नियोजन: अपने भविष्य के दूरगामी लक्ष्यों (जैसे- उच्च शिक्षा, आवास या सेवानिवृत्ति) के लिए प्रभावी योजना बनाना।
  • आत्मविश्वास एवं संतोष: अपने वित्तीय जीवन और निर्णयों को लेकर मानसिक रूप से सुरक्षित, आश्वस्त तथा संतुष्ट महसूस करना।

चर्चा के कारण

  • सूचकांक में ऐतिहासिक सुधार: RBI के आँकड़ों के अनुसार, वित्तीय समावेशन सूचकांक मार्च 2025 के 67.0 से बढ़कर मार्च 2026 में 70.0 के स्तर पर पहुँच गया है, जो 4.48 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि को दर्शाता है। अगस्त 2021 में इस सूचकांक की शुरुआत (53.9) से लेकर अब तक इसमें निरंतर सुधार दर्ज हुआ है।

  • सक्रिय उपयोग में वृद्धि: इस सुधार में तीनों उप-सूचकांकों (पहुँच, उपयोग और गुणवत्ता) का योगदान रहा है, किंतु मुख्य प्रेरणा शक्ति 'उपयोग' घटक रहा। यह इस बात का स्पष्ट संकेतक है कि नागरिक अब केवल खाताधारक नहीं हैं, बल्कि वे औपचारिक वित्तीय सेवाओं का सक्रिय उपयोग कर रहे हैं।
  • मात्रात्मक सफलता: प्रधानमंत्री जन-धन योजना (PMJDY) के अंतर्गत 55 करोड़ से अधिक बैंक खाते खोले जा चुके हैं, जिनमें महिलाओं की भागीदारी लगभग 55 प्रतिशत है। यह समावेशन की मात्रात्मक सफलता है, परंतु गुणात्मक वित्तीय स्वास्थ्य अभी भी एक चुनौती है।
  • असंगठित क्षेत्र तक विस्तार: राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (NPS) जैसी दूरगामी योजनाएँ अब असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों (जैसे- घरेलू सहायक, गिग-वर्कर, कैडी आदि) तक पहुँच रही हैं, जो दीर्घकालिक वित्तीय सुरक्षा और सेवानिवृत्ति नियोजन की दिशा में एक सकारात्मक प्रतिमान विस्थापन है।

अंतरराष्ट्रीय एवं शासकीय मानक

  • अंतरराष्ट्रीय मानक

  • OECD एवं G-20 (GPFI): आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (OECD) तथा जी-20 वैश्विक वित्तीय समावेशन भागीदारी (GPFI) द्वारा वर्ष 2024 में जारी नीति-पत्र में 'वित्तीय स्वास्थ्य' और 'वित्तीय कल्याण' को समतुल्य माना गया है। इसके चार प्रमुख आयाम निर्धारित किए गए हैं—वर्तमान आवश्यकताओं का सुचारु प्रबंधन, नकारात्मक आर्थिक झटकों से निपटने की क्षमता, आकांक्षाओं व अवसरों को साकार करने की शक्ति, तथा वित्तीय जीवन में संतोष।
  • CFPB (अमेरिका): अमेरिका के उपभोक्ता वित्तीय संरक्षण ब्यूरो ने भी इसे लगभग इन्हीं मानकों पर परिभाषित किया है।
  • विश्व बैंक: विश्व बैंक इसे 'वित्तीय क्षमता' के रूप में देखता है, जिसका अर्थ है वित्तीय साक्षरता को व्यावहारिक धरातल पर उतारकर अपने हित में विवेकपूर्ण निर्णय लेने की आंतरिक क्षमता।
  • भारतीय शासकीय मानक
  • भारतीय रिज़र्व बैंक वित्तीय समावेशन को 'वित्तीय स्वास्थ्य' की अनिवार्य पूर्व-शर्त मानता है।
  • RBI वित्तीय समावेशन सूचकांक: यह सूचकांक तीन प्रमुख आधार-स्तंभों और 97 संकेतकों पर आधारित है:
    1. पहुँच: 35 प्रतिशत भारांश
    2. उपयोग: 45 प्रतिशत भारांश
    3. गुणवत्ता: 20 प्रतिशत भारांश (इसके अंतर्गत वित्तीय साक्षरता, उपभोक्ता संरक्षण तथा असमानता में कमी को समाहित किया जाता है, जो प्रत्यक्षतः वित्तीय स्वास्थ्य से जुड़ा है)।
  • NSFI 2025-30: RBI द्वारा गठित वित्तीय समावेशन सलाहकार समिति ने 'राष्ट्रीय वित्तीय समावेशन रणनीति' (NSFI) 2025-30 में भी वित्तीय स्वास्थ्य को सुदृढ़ करने के लक्ष्य निर्धारित किए हैं।

वित्तीय समावेशन से वित्तीय स्वास्थ्य की ओर प्रतिमान विस्थापन क्यों आवश्यक है?

पिछले एक दशक में भारत ने 'हर घर बैंक खाता' के लक्ष्य को लगभग प्राप्त कर लिया है, परंतु केवल खातों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:

  • बड़ी संख्या में जन-धन खातों का निष्क्रिय रहना।
  • जनसामान्य में ऋण-साक्षरता का अभाव होना।
  • असंगठित क्षेत्र में औपचारिक बचत और बीमा की पहुँच का सीमित होना।
  • परिणामतः, अब राष्ट्रीय नीतियों का केंद्र-बिंदु केवल 'वित्तीय पहुँच' से हटकर 'उपयोग, गुणवत्ता और परिणाम-आधारित वित्तीय स्वास्थ्य' पर केंद्रित हो रहा है।

प्रमुख सरकारी योजनाएँ

  • प्रधानमंत्री जन-धन योजना (PMJDY, 2014): शून्य न्यूनतम शेष पर बचत खाता, इन-बिल्ट दुर्घटना बीमा एवं ओवरड्राफ्ट की सुविधा।

  • किफायती सामाजिक सुरक्षा: प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना (PMSBY) एवं प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना (PMJJBY) के माध्यम से सुलभ दुर्घटना व जीवन बीमा।
  • सेवानिवृत्ति सुरक्षा: अटल पेंशन योजना (APY) एवं राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (NPS) के माध्यम से असंगठित क्षेत्र सहित सभी नागरिकों हेतु पेंशन सुरक्षा।
  • उद्यमिता को संबल: प्रधानमंत्री मुद्रा योजना एवं स्टैंड-अप इंडिया के माध्यम से सूक्ष्म व लघु उद्यमियों हेतु संस्थागत ऋण की सुलभता।
  • राष्ट्रीय वित्तीय समावेशन रणनीति (NSFI) 2025-30: यह पंचवर्षीय योजना 'पंच-ज्योति' नामक पाँच रणनीतिक उद्देश्यों तथा 47 कार्य-बिंदुओं पर आधारित है, जिसमें अंतिम-छोर तक पहुँच, लैंगिक समावेशन एवं वित्तीय शिक्षा पर विशेष बल दिया गया है।

वित्तीय स्वास्थ्य के मार्ग की प्रमुख चुनौतियाँ

  • निष्क्रिय खाते: बड़ी संख्या में जन-धन खातों का निष्क्रिय रहना तथा उनका न्यूनतम उपयोग होना।

  • लैंगिक व क्षेत्रीय असमानता: ग्रामीण तथा दूरस्थ क्षेत्रों में, विशेषकर महिलाओं में, वित्तीय साक्षरता का निम्न स्तर होना।
  • डिजिटल जोखिम: डिजिटल वित्तीय धोखाधड़ी और साइबर सुरक्षा से जुड़े बढ़ते जोखिम, जो उपभोक्ताओं के संस्थागत विश्वास को प्रभावित करते हैं।
  • जागरूकता का अभाव: असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों में सेवानिवृत्ति-बचत तथा बीमा के लाभों को लेकर चेतना की कमी।
  • ऋणग्रस्तता का कुचक्र: निम्न-आय वर्ग में वित्तीय साक्षरता की कमी के कारण अत्यधिक ऋणग्रस्तता तथा अनौपचारिक साहूकारों पर उनकी निरंतर निर्भरता।

संबंधित संस्थागत ढाँचा

भारत में वित्तीय स्वास्थ्य के बहुआयामी विकास के लिए एक एकीकृत संस्थागत ढांचा कार्यरत है, जिसमें RBI, SEBI, IRDAI तथा PFRDA की संयुक्त व समन्वित भूमिका है। इसके अतिरिक्त, सामुदायिक स्तर पर स्थापित 'वित्तीय साक्षरता केंद्र' सहभागितापूर्ण दृष्टिकोण अपनाकर अंतिम-छोर तक वित्तीय शिक्षा पहुँचाने का प्रयास कर रहे हैं।

आगे की राह:

  • गुणवत्ता स्तंभ को सुदृढ़ करना: वित्तीय समावेशन सूचकांक में 'गुणवत्ता' स्तंभ (वर्तमान भारांश 20 प्रतिशत) को और अधिक सुदृढ़ करते हुए वित्तीय साक्षरता एवं उपभोक्ता संरक्षण पर भारांश बढ़ाया जाए।

  • खातों का सक्रियण: निष्क्रिय पड़े जन-धन खातों को सक्रिय करने हेतु उन्हें प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) और आकर्षक सूक्ष्म-बचत प्रोत्साहनों से जोड़ा जाए।
  • लक्षित सामाजिक सुरक्षा: अटल पेंशन योजना तथा राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (NPS) का असंगठित क्षेत्र में लक्षित विस्तार एवं प्रचार-प्रसार किया जाए।
  • पाठ्यक्रम में समावेशन: डिजिटल वित्तीय साक्षरता और साइबर-सुरक्षा जागरूकता को स्कूली शिक्षा के पाठ्यक्रम तथा स्थानीय सामुदायिक अभियानों का अभिन्न हिस्सा बनाया जाए।
  • निगरानी तंत्र का सुदृढ़ीकरण: NSFI 2025-30 के 'पंच-ज्योति' लक्ष्यों की नियमित समीक्षा हेतु राज्य एवं जिला-स्तरीय क्रियान्वयन समितियों को प्रशासनिक रूप से सशक्त किया जाए।
  • समर्पित सूचकांक का विकास: सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) के माध्यम से नागरिकों के वित्तीय स्वास्थ्य को मापने के लिए एक समर्पित 'वित्तीय स्वास्थ्य सूचकांक' विकसित करने पर विचार किया जाए, जो मात्रात्मक पहुँच से आगे बढ़कर विशुद्ध रूप से परिणाम-आधारित मापदंडों पर केंद्रित हो।


निष्कर्ष:

वित्तीय समावेशन भारत की विकास-यात्रा की एक युगांतरकारी उपलब्धि रही है, परंतु आगामी मार्ग 'वित्तीय स्वास्थ्य' का है। इसका अंतिम ध्येय एक ऐसे भारत का निर्माण करना है जहाँ हर नागरिक न केवल औपचारिक वित्तीय तंत्र से जुड़ा हो, बल्कि आर्थिक झटकों से सुरक्षित, भविष्य के प्रति निश्चिंत और अपने वित्तीय जीवन में पूर्णतः आत्मनिर्भर हो। यदि भारत अपने वित्तीय समावेशन के वर्तमान सुधारों को गुणवत्तापूर्ण वित्तीय स्वास्थ्य में परिवर्तित करने में सफल रहता है, तो यह न केवल देश की आर्थिक सुरक्षा को सुदृढ़ करेगा, बल्कि सामाजिक न्याय की दिशा में भी एक मील का पत्थर सिद्ध होगा।

वित्तीय समावेशन से वित्तीय स्वास्थ्य: भारत के आर्थिक सशक्तिकरण का नया प्रतिमान

सामान्य अध्ययन पेपर–III:  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन।

संदर्भ

हाल ही में भारत के अनौपचारिक क्षेत्र के श्रमिकों के जीवन के उदाहरण के माध्यम से यह रेखांकित किया गया कि वित्तीय समावेशन के मात्रात्मक लक्ष्यों को प्राप्त करने के पश्चात अब देश को 'वित्तीय स्वास्थ्य' की गुणात्मक दिशा में अग्रसर होने की महती आवश्यकता है। इसी क्रम में भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा मार्च 2026 के लिए 'वित्तीय समावेशन सूचकांक' जारी किया जाना इस विमर्श को और अधिक प्रासंगिक बनाता है।

वित्तीय स्वास्थ्य: अवधारणा एवं आयाम

वित्तीय स्वास्थ्य से आशय केवल एक बैंक खाता होने या औपचारिक वित्तीय सेवाओं तक पहुँच स्थापित हो जाने से नहीं है। यह एक व्यापक स्थिति है जिसके अंतर्गत कोई व्यक्ति निम्नलिखित क्षमताओं से युक्त होता है:

  • वर्तमान दायित्वों का निर्वहन: अपने दैनिक और वर्तमान वित्तीय दायित्वों को सहजता से पूरा करना।
  • आर्थिक आघातों से सुरक्षा: अप्रत्याशित आर्थिक झटकों (जैसे- गंभीर बीमारी या अकस्मात आय-हानि) को सहन करने की सुदृढ़ क्षमता।
  • भविष्य का नियोजन: अपने भविष्य के दूरगामी लक्ष्यों (जैसे- उच्च शिक्षा, आवास या सेवानिवृत्ति) के लिए प्रभावी योजना बनाना।
  • आत्मविश्वास एवं संतोष: अपने वित्तीय जीवन और निर्णयों को लेकर मानसिक रूप से सुरक्षित, आश्वस्त तथा संतुष्ट महसूस करना।

चर्चा के कारण

  • सूचकांक में ऐतिहासिक सुधार: RBI के आँकड़ों के अनुसार, वित्तीय समावेशन सूचकांक मार्च 2025 के 67.0 से बढ़कर मार्च 2026 में 70.0 के स्तर पर पहुँच गया है, जो 4.48 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि को दर्शाता है। अगस्त 2021 में इस सूचकांक की शुरुआत (53.9) से लेकर अब तक इसमें निरंतर सुधार दर्ज हुआ है।

  • सक्रिय उपयोग में वृद्धि: इस सुधार में तीनों उप-सूचकांकों (पहुँच, उपयोग और गुणवत्ता) का योगदान रहा है, किंतु मुख्य प्रेरणा शक्ति 'उपयोग' घटक रहा। यह इस बात का स्पष्ट संकेतक है कि नागरिक अब केवल खाताधारक नहीं हैं, बल्कि वे औपचारिक वित्तीय सेवाओं का सक्रिय उपयोग कर रहे हैं।
  • मात्रात्मक सफलता: प्रधानमंत्री जन-धन योजना (PMJDY) के अंतर्गत 55 करोड़ से अधिक बैंक खाते खोले जा चुके हैं, जिनमें महिलाओं की भागीदारी लगभग 55 प्रतिशत है। यह समावेशन की मात्रात्मक सफलता है, परंतु गुणात्मक वित्तीय स्वास्थ्य अभी भी एक चुनौती है।
  • असंगठित क्षेत्र तक विस्तार: राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (NPS) जैसी दूरगामी योजनाएँ अब असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों (जैसे- घरेलू सहायक, गिग-वर्कर, कैडी आदि) तक पहुँच रही हैं, जो दीर्घकालिक वित्तीय सुरक्षा और सेवानिवृत्ति नियोजन की दिशा में एक सकारात्मक प्रतिमान विस्थापन है।

अंतरराष्ट्रीय एवं शासकीय मानक

  • अंतरराष्ट्रीय मानक

  • OECD एवं G-20 (GPFI): आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (OECD) तथा जी-20 वैश्विक वित्तीय समावेशन भागीदारी (GPFI) द्वारा वर्ष 2024 में जारी नीति-पत्र में 'वित्तीय स्वास्थ्य' और 'वित्तीय कल्याण' को समतुल्य माना गया है। इसके चार प्रमुख आयाम निर्धारित किए गए हैं—वर्तमान आवश्यकताओं का सुचारु प्रबंधन, नकारात्मक आर्थिक झटकों से निपटने की क्षमता, आकांक्षाओं व अवसरों को साकार करने की शक्ति, तथा वित्तीय जीवन में संतोष।
  • CFPB (अमेरिका): अमेरिका के उपभोक्ता वित्तीय संरक्षण ब्यूरो ने भी इसे लगभग इन्हीं मानकों पर परिभाषित किया है।
  • विश्व बैंक: विश्व बैंक इसे 'वित्तीय क्षमता' के रूप में देखता है, जिसका अर्थ है वित्तीय साक्षरता को व्यावहारिक धरातल पर उतारकर अपने हित में विवेकपूर्ण निर्णय लेने की आंतरिक क्षमता।
  • भारतीय शासकीय मानक
  • भारतीय रिज़र्व बैंक वित्तीय समावेशन को 'वित्तीय स्वास्थ्य' की अनिवार्य पूर्व-शर्त मानता है।
  • RBI वित्तीय समावेशन सूचकांक: यह सूचकांक तीन प्रमुख आधार-स्तंभों और 97 संकेतकों पर आधारित है:
    1. पहुँच: 35 प्रतिशत भारांश
    2. उपयोग: 45 प्रतिशत भारांश
    3. गुणवत्ता: 20 प्रतिशत भारांश (इसके अंतर्गत वित्तीय साक्षरता, उपभोक्ता संरक्षण तथा असमानता में कमी को समाहित किया जाता है, जो प्रत्यक्षतः वित्तीय स्वास्थ्य से जुड़ा है)।
  • NSFI 2025-30: RBI द्वारा गठित वित्तीय समावेशन सलाहकार समिति ने 'राष्ट्रीय वित्तीय समावेशन रणनीति' (NSFI) 2025-30 में भी वित्तीय स्वास्थ्य को सुदृढ़ करने के लक्ष्य निर्धारित किए हैं।

वित्तीय समावेशन से वित्तीय स्वास्थ्य की ओर प्रतिमान विस्थापन क्यों आवश्यक है?

पिछले एक दशक में भारत ने 'हर घर बैंक खाता' के लक्ष्य को लगभग प्राप्त कर लिया है, परंतु केवल खातों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:

  • बड़ी संख्या में जन-धन खातों का निष्क्रिय रहना।
  • जनसामान्य में ऋण-साक्षरता का अभाव होना।
  • असंगठित क्षेत्र में औपचारिक बचत और बीमा की पहुँच का सीमित होना।
  • परिणामतः, अब राष्ट्रीय नीतियों का केंद्र-बिंदु केवल 'वित्तीय पहुँच' से हटकर 'उपयोग, गुणवत्ता और परिणाम-आधारित वित्तीय स्वास्थ्य' पर केंद्रित हो रहा है।

प्रमुख सरकारी योजनाएँ

  • प्रधानमंत्री जन-धन योजना (PMJDY, 2014): शून्य न्यूनतम शेष पर बचत खाता, इन-बिल्ट दुर्घटना बीमा एवं ओवरड्राफ्ट की सुविधा।

  • किफायती सामाजिक सुरक्षा: प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना (PMSBY) एवं प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना (PMJJBY) के माध्यम से सुलभ दुर्घटना व जीवन बीमा।
  • सेवानिवृत्ति सुरक्षा: अटल पेंशन योजना (APY) एवं राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (NPS) के माध्यम से असंगठित क्षेत्र सहित सभी नागरिकों हेतु पेंशन सुरक्षा।
  • उद्यमिता को संबल: प्रधानमंत्री मुद्रा योजना एवं स्टैंड-अप इंडिया के माध्यम से सूक्ष्म व लघु उद्यमियों हेतु संस्थागत ऋण की सुलभता।
  • राष्ट्रीय वित्तीय समावेशन रणनीति (NSFI) 2025-30: यह पंचवर्षीय योजना 'पंच-ज्योति' नामक पाँच रणनीतिक उद्देश्यों तथा 47 कार्य-बिंदुओं पर आधारित है, जिसमें अंतिम-छोर तक पहुँच, लैंगिक समावेशन एवं वित्तीय शिक्षा पर विशेष बल दिया गया है।

वित्तीय स्वास्थ्य के मार्ग की प्रमुख चुनौतियाँ

  • निष्क्रिय खाते: बड़ी संख्या में जन-धन खातों का निष्क्रिय रहना तथा उनका न्यूनतम उपयोग होना।

  • लैंगिक व क्षेत्रीय असमानता: ग्रामीण तथा दूरस्थ क्षेत्रों में, विशेषकर महिलाओं में, वित्तीय साक्षरता का निम्न स्तर होना।
  • डिजिटल जोखिम: डिजिटल वित्तीय धोखाधड़ी और साइबर सुरक्षा से जुड़े बढ़ते जोखिम, जो उपभोक्ताओं के संस्थागत विश्वास को प्रभावित करते हैं।
  • जागरूकता का अभाव: असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों में सेवानिवृत्ति-बचत तथा बीमा के लाभों को लेकर चेतना की कमी।
  • ऋणग्रस्तता का कुचक्र: निम्न-आय वर्ग में वित्तीय साक्षरता की कमी के कारण अत्यधिक ऋणग्रस्तता तथा अनौपचारिक साहूकारों पर उनकी निरंतर निर्भरता।

संबंधित संस्थागत ढाँचा

भारत में वित्तीय स्वास्थ्य के बहुआयामी विकास के लिए एक एकीकृत संस्थागत ढांचा कार्यरत है, जिसमें RBI, SEBI, IRDAI तथा PFRDA की संयुक्त व समन्वित भूमिका है। इसके अतिरिक्त, सामुदायिक स्तर पर स्थापित 'वित्तीय साक्षरता केंद्र' सहभागितापूर्ण दृष्टिकोण अपनाकर अंतिम-छोर तक वित्तीय शिक्षा पहुँचाने का प्रयास कर रहे हैं।

आगे की राह:

  • गुणवत्ता स्तंभ को सुदृढ़ करना: वित्तीय समावेशन सूचकांक में 'गुणवत्ता' स्तंभ (वर्तमान भारांश 20 प्रतिशत) को और अधिक सुदृढ़ करते हुए वित्तीय साक्षरता एवं उपभोक्ता संरक्षण पर भारांश बढ़ाया जाए।

  • खातों का सक्रियण: निष्क्रिय पड़े जन-धन खातों को सक्रिय करने हेतु उन्हें प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) और आकर्षक सूक्ष्म-बचत प्रोत्साहनों से जोड़ा जाए।
  • लक्षित सामाजिक सुरक्षा: अटल पेंशन योजना तथा राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (NPS) का असंगठित क्षेत्र में लक्षित विस्तार एवं प्रचार-प्रसार किया जाए।
  • पाठ्यक्रम में समावेशन: डिजिटल वित्तीय साक्षरता और साइबर-सुरक्षा जागरूकता को स्कूली शिक्षा के पाठ्यक्रम तथा स्थानीय सामुदायिक अभियानों का अभिन्न हिस्सा बनाया जाए।
  • निगरानी तंत्र का सुदृढ़ीकरण: NSFI 2025-30 के 'पंच-ज्योति' लक्ष्यों की नियमित समीक्षा हेतु राज्य एवं जिला-स्तरीय क्रियान्वयन समितियों को प्रशासनिक रूप से सशक्त किया जाए।
  • समर्पित सूचकांक का विकास: सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) के माध्यम से नागरिकों के वित्तीय स्वास्थ्य को मापने के लिए एक समर्पित 'वित्तीय स्वास्थ्य सूचकांक' विकसित करने पर विचार किया जाए, जो मात्रात्मक पहुँच से आगे बढ़कर विशुद्ध रूप से परिणाम-आधारित मापदंडों पर केंद्रित हो।


निष्कर्ष:

वित्तीय समावेशन भारत की विकास-यात्रा की एक युगांतरकारी उपलब्धि रही है, परंतु आगामी मार्ग 'वित्तीय स्वास्थ्य' का है। इसका अंतिम ध्येय एक ऐसे भारत का निर्माण करना है जहाँ हर नागरिक न केवल औपचारिक वित्तीय तंत्र से जुड़ा हो, बल्कि आर्थिक झटकों से सुरक्षित, भविष्य के प्रति निश्चिंत और अपने वित्तीय जीवन में पूर्णतः आत्मनिर्भर हो। यदि भारत अपने वित्तीय समावेशन के वर्तमान सुधारों को गुणवत्तापूर्ण वित्तीय स्वास्थ्य में परिवर्तित करने में सफल रहता है, तो यह न केवल देश की आर्थिक सुरक्षा को सुदृढ़ करेगा, बल्कि सामाजिक न्याय की दिशा में भी एक मील का पत्थर सिद्ध होगा।

चिता आंदोलन: केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना में अंतर्निहित सामाजिक-आर्थिक चुनौतियाँ

सामान्य अध्ययन पेपर  – II:  शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध।


संदर्भ

भारत में जल सुरक्षा, कृषि संकट और क्षेत्रीय असमानता को दूर करने के लिए अधिशेष जल वाले बेसिन से जल की कमी वाले बेसिन में जल स्थानांतरित करने की अवधारणा एक दीर्घकालिक नीतिगत प्राथमिकता रही है। ऐतिहासिक रूप से 1980 के दशक की 'राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना' (NPP) से प्रेरित होकर, विकास बनाम विस्थापन की यह बहस वर्तमान में मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में 'चिता आंदोलन' के कारण पुनः चर्चा के केंद्र में आ गई है। यह मुद्दा बुनियादी स्तर पर ढांचागत विकास, पारिस्थितिकीय संरक्षण और मूल निवासियों के संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन साधने की समकालीन भारतीय विकासात्मक चुनौती को दर्शाता है।

केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना

  • यह परियोजना भारत के राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना (NPP) के तहत परिकल्पित 30 अंतर-नदी संपर्क परियोजनाओं में से सर्वप्रथम क्रियान्वित होने वाली महत्त्वाकांक्षी परियोजना है।

  • इसका मुख्य उद्देश्य मध्य प्रदेश की केन नदी (जिसमें जल अधिशेष माना गया है) से अधिशेष जल को उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में विस्तृत सूखे और जल संकट से प्रभावित बुंदेलखंड क्षेत्र की बेतवा नदी में स्थानांतरित करना है।
  • इस परियोजना का शिलान्यास 25 दिसंबर 2024 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा किया गया था। इसके अंतर्गत मुख्य रूप से दौधन बांध का निर्माण, दो बिजली संयंत्र (जलविद्युत और सौर) और एक विस्तृत लिंक नहर का निर्माण शामिल है।

चर्चा में क्यों? -

  • विरोध प्रदर्शन का पुनरुत्थान: जुलाई 2026 में मध्य प्रदेश के छतरपुर और पन्ना जिलों के स्थानीय जनजातीय ग्रामीणों (विशेषकर महिलाओं) ने इस परियोजना के भूमि अधिग्रहण और अपर्याप्त पुनर्वास नीतियों के खिलाफ अपने आंदोलन को तीव्र कर दिया है।

  • पुनर्वास पैकेज में वृद्धि की मांग: प्रभावित आदिवासियों ने राज्य सरकार द्वारा तय किए गए पुनर्वास पैकेज को ₹12.5 लाख से बढ़ाकर ₹25 लाख करने तथा संबंधित मझगाँव और रूंज सिंचाई परियोजनाओं के सभी प्रभावित परिवारों को इसमें शामिल करने की मांग की है।
  • प्रशासनिक हस्तक्षेप: आंदोलन को देखते हुए छतरपुर जिला प्रशासन द्वारा भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 163 (पूर्ववर्ती IPC/CrPC की धारा 144) लागू कर दी गई है।

मुख्य मुद्दा क्या है?

  • अनैच्छिक विस्थापन बनाम आजीविका का नुकसान: दौधन बांध और नहर निर्माण के कारण लगभग 24 से अधिक गांवों के विस्थापित होने का अनुमान है। इनमें से 8 गांव पूरी तरह जलमग्न हो जाएंगे और 16 गांवों को पन्ना टाइगर रिजर्व के बफर जोन में शामिल किया जा रहा है, जिससे आदिवासियों की पारंपरिक आजीविका और जल-जंगल-जमीन का अधिकार छिन रहा है।

  • पारदर्शिता का अभाव: प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि ग्राम सभाओं की अनिवार्य पूर्व सहमति को प्रशासनिक दबाव में बिना सार्वजनिक आम सहमति के ही प्राप्त दिखा दिया गया है।
  • परियोजना का वर्गीकरण विवाद: प्रशासनिक दृष्टिकोण के अनुसार, वर्तमान में प्रदर्शन कर रहे कुछ ग्रामीण सीधे तौर पर केन-बेतवा लिंक के कारण नहीं, बल्कि मझगाँव और रूंज सिंचाई परियोजनाओं से प्रभावित हैं, जिसके कारण मुआवजे के ढांचे में विसंगतियां उत्पन्न हो रही हैं।

चिता आंदोलन क्या है?

  • 'चिता आंदोलन' छतरपुर जिले में मुख्य रूप से जनजातीय महिलाओं और स्थानीय किसानों द्वारा शुरू किया गया एक अनूठा और प्रतीकात्मक अहिंसक प्रतिरोध है।

  • इस आंदोलन का नाम "चिता" शब्द से लिया गया है, इसका नेतृत्व 'जय किसान संगठन' और स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं के सहयोग से आदिवासी समुदाय स्वयं कर रहे हैं।
  • यह आंदोलन इस वैचारिक दृष्टिकोण को रेखांकित करता है कि बिना सम्मानजनक और उचित पुनर्वास के आदिवासियों को उनकी पैतृक भूमि से बेदखल करना उनके सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक अस्तित्व के लिए एक "मृत्युदंड" के समान है।

प्रदर्शन के तरीके

  • जल समाधि और प्रतीकात्मक चिता: प्रदर्शनकारी आदिवासी महिलाएं और पुरुष नदी के किनारे या पानी के ऊपर लकड़ी की प्रतीकात्मक चिताओं पर लेटकर अपना विरोध दर्ज करा रहे हैं।

  • गले में फंदा: हालिया विरोध प्रदर्शनों में आंदोलनकारियों ने बारना नदी के तट पर अपने गले में प्रतीकात्मक फांसी का फंदा डालकर सरकार का ध्यान आकर्षित किया है।
  • सत्याग्रह और घेराव: ग्रामीणों द्वारा कलेक्टर कार्यालयों के समक्ष निरंतर धरने, शांतिपूर्ण सत्याग्रह, और दिल्ली तक मार्च करने के प्रयास किए गए हैं。

संवैधानिक एवं कानूनी प्रावधान

  • संविधान की पांचवीं अनुसूची : यह अनुसूची अनुसूचित क्षेत्रों में जनजातीय भूमि के संरक्षण और उनके स्वायत्त प्रशासन को सुनिश्चित करती है, जहां गैर-जनजातीय लोगों को भूमि हस्तांतरण प्रतिबंधित है।

  • पेसा अधिनियम, 1996 (PESA Act): पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम के तहत अनुसूचित क्षेत्रों में किसी भी विकास परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहण और विस्थापितों के पुनर्वास से पूर्व ग्राम सभा की अनिवार्य सलाह और सहमति का प्रावधान है।
  • LARR अधिनियम, 2013: 'भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्व्यवस्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013' विस्थापितों को बाजार दर से उचित मुआवजा, सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन (SIA), और अनिवार्य पुनर्वास का कानूनी अधिकार देता है।
  • वन अधिकार अधिनियम, 2006 (FRA): यह पारंपरिक रूप से वनों में रहने वाले अनुसूचित जनजातियों के व्यक्तिगत और सामुदायिक वन अधिकारों को वैधानिक मान्यता प्रदान करता है।

सरकार का दृष्टिकोण

  • पुनर्वास पैकेज में ऐतिहासिक वृद्धि: हाल ही में राज्य कैबिनेट ने मझगाँव और रूंज परियोजनाओं के लिए पुनर्वास बजट में ₹300 करोड़ की अतिरिक्त वृद्धि को मंजूरी दी है, जिसके तहत मुआवजे को ₹5 लाख से बढ़ाकर ₹12.5 लाख प्रति परिवार कर दिया गया है।

  • प्रशासनिक स्पष्टीकरण: छतरपुर और पन्ना जिला प्रशासन का तर्क है कि चल रहा आंदोलन आंशिक रूप से स्थानीय कार्यकर्ताओं द्वारा भ्रमित है, क्योंकि केन-बेतवा के मूल विस्थापितों को नियमानुसार पूर्ण मुआवजा दिया जा रहा है। प्रशासन छूटे हुए परिवारों को जोड़ने के लिए पुनः सर्वेक्षण करा रहा है, जिसके तहत नए परिवारों को शामिल भी किया गया है।
  • कानून व्यवस्था: क्षेत्र में शांति बनाए रखने और सरकारी बुनियादी ढांचा कार्यों में व्यवधान को रोकने के लिए सिविल डिफेंस कोड की प्रतिबंधात्मक धाराएं लागू की गई हैं।

परियोजना का महत्त्व

  • बुंदेलखंड का कायाकल्प: यह परियोजना अत्यधिक सूखा प्रवण बुंदेलखंड क्षेत्र (मध्य प्रदेश के छतरपुर, पन्ना, टीकमगढ़ और उत्तर प्रदेश के झाँसी, बांदा, महोबा) के लिए वरदान है。

  • कृषि और पेयजल सुरक्षा: इससे लगभग 10.62 लाख हेक्टेयर भूमि को वार्षिक सिंचाई सुविधा मिलेगी, जिससे क्षेत्रीय खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित होगी। साथ ही, लगभग 62 लाख आबादी को शुद्ध पेयजल उपलब्ध होगा।
  • ऊर्जा उत्पादन: परियोजना से 103 मेगावाट जलविद्युत और 27 मेगावाट सौर ऊर्जा का उत्पादन होगा, जिससे क्षेत्रीय ग्रिड को स्थिरता मिलेगी।

रिपोर्ट और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय

  • रिट याचिका (सिविल) संख्या 512/2002 (In Re: Networking of Rivers): भारत के माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने 2012 के अपने ऐतिहासिक फैसले में निर्देश दिया था कि देश में नदियों को जोड़ने के कार्यक्रम को समयबद्ध तरीके से लागू किया जाए और केन-बेतवा लिंक परियोजना को सर्वप्रथम (प्राथमिकता के आधार पर) पायलट प्रोजेक्ट के रूप में क्रियान्वित किया जाए।

  • वैधानिक मंजूरियां: परियोजना को पर्यावरण मंत्रालय की विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति (EAC), वन्यजीव मंजूरी, और जनजातीय मामलों के मंत्रालय (MoTA) से आवश्यक वैधानिक अनुमतियां प्राप्त हो चुकी हैं।
  • केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (CEC) की चिंताएं: हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित CEC ने पूर्व में अपनी रिपोर्ट में पन्ना टाइगर रिजर्व के मुख्य आवास के जलमग्न होने और पारिस्थितिकीय क्षति पर चिंता व्यक्त की थी, जिसके बाद सरकार ने 'व्यापक वन्यजीव प्रबंधन योजना' (CWMP) को परियोजना में शामिल किया।

चिंताएं / चुनौतियां

  • पारिस्थितिकीय क्षति: दौधन बांध के कारण पन्ना टाइगर रिजर्व (PTR) का लगभग 6,017 हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित होगा, जिससे बाघों के गलियारे और गिद्धों के प्राकृतिक आवास को गंभीर खतरा है।

  • जल विज्ञान डेटा पर विवाद: पर्यावरणविदों (जैसे- SANDRP) का तर्क है कि केन नदी में पानी के "अधिशेष" होने का सरकारी दावा सार्वजनिक डोमेन में स्पष्ट वैज्ञानिक और जल विज्ञान संबंधी आंकड़ों द्वारा पूरी तरह पुष्ट नहीं है।
  • सामाजिक अलगाव: मूल जनजातीय आबादी का उनकी सांस्कृतिक भूमि से विस्थापन उनके सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर देता है。

अन्य महत्त्वपूर्ण बिंदु

  • जलवायु परिवर्तन का प्रभाव: बदलते मानसूनी पैटर्न के कारण भविष्य में केन नदी में स्वयं पानी की कमी हो सकती है, जिससे इस विशाल ढांचागत निवेश की दीर्घकालिक व्यवहार्यता पर सवाल उठते हैं।

  • संघात्मक जल विवाद: उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के बीच गैर-मानसून सीजन में पानी के बंटवारे को लेकर समय-समय पर होने वाले राजनीतिक मतभेद परियोजना की समयसीमा को प्रभावित करते रहे हैं।

विश्लेषण

केन-बेतवा परियोजना भारत की दीर्घकालिक जल-इंजीनियरिंग क्षमता की कसौटी है, जो बुंदेलखंड के आर्थिक पिछड़ेपन को दूर करने का सामर्थ्य रखती है। किंतु, 'चिता आंदोलन' यह स्पष्ट करता है कि किसी भी वृहद ढांचागत परियोजना की सफलता केवल उसकी तकनीकी और आर्थिक व्यवहार्यता पर नहीं, बल्कि उसकी सामाजिक स्वीकार्यता और समावेशी न्याय पर निर्भर करती है। जब तक विकास की प्रक्रिया में समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े आदिवासियों के अधिकारों को प्राथमिकता नहीं दी जाएगी, तब तक ऐसे 'सद्भावी' प्रयास भी आंतरिक संघर्षों का कारण बनते रहेंगे।

आगे की राह

  • संशोधित और न्यायसंगत मुआवजा: सरकार को प्रदर्शनकारियों की मांगों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करते हुए पुनर्वास पैकेज की समीक्षा करनी चाहिए और LARR अधिनियम 2013 के प्रावधानों के तहत 'भूमि के बदले भूमि' और आजीविका की बहाली सुनिश्चित करनी चाहिए।

  • ग्राम सभाओं का वास्तविक सशक्तिकरण: पेसा (PESA) अधिनियम की मूल भावना का आदर करते हुए निर्णय लेने की प्रक्रिया में स्थानीय आदिवासियों की वास्तविक भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए, न कि केवल औपचारिक कागजी सहमति।
  • विकेंद्रीकृत जल प्रबंधन: नदी जोड़ने के बड़े ढांचागत विकल्पों के साथ-साथ बुंदेलखंड के पारंपरिक चंदेलकालीन और बुंदेला तालाबों के पुनरुद्धार, वाटरशेड प्रबंधन और वर्षा जल संचयन जैसे स्थानीय वैज्ञानिक उपायों को भी समानांतर रूप से बढ़ावा दिया जाना चाहिए।


निष्कर्ष

केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना बुंदेलखंड को सूखा मुक्त बनाने की दिशा में एक युगांतरकारी कदम साबित हो सकती है, बशर्ते इसका क्रियान्वयन 'पारिस्थितिकीय धारणीयता' और 'मानवीय संवेदना' के सिद्धांतों पर आधारित हो। सतत विकास लक्ष्य (SDG) 6 (स्वच्छ जल) की प्राप्ति के क्रम में समाज के हाशिए पर मौजूद आदिवासियों के अधिकारों (SDG 10 - असमानता में कमी) की बलि नहीं दी जा सकती। अतः सरकार को विकासात्मक अनिवार्यता और नागरिक अधिकारों के मध्य एक संतुलित मध्य मार्ग अपनाना होगा, ताकि यह परियोजना वास्तव में सर्वसमावेशी कल्याण का माध्यम बन सके।

  ↵

लोकतांत्रिक सुचिता और चुनाव याचिकाएं: मद्रास उच्च न्यायालय का महत्वपूर्ण हस्तक्षेप

मान्य अध्ययन पेपर  – II:  शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध।


संदर्भ

भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में निष्पक्ष चुनाव और समयबद्ध प्रतिनिधित्व सुशासन की आधारशिला हैं। हाल ही में संपन्न हुए तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 के बाद खाली हुई सीटों पर उपचुनाव की घोषणा को लेकर एक बड़ा कानूनी प्रश्न खड़ा हो गया है। जनप्रतिनिधियों के इस्तीफे और उनके निर्वाचन को चुनौती देने वाली याचिकाओं के बीच कानूनी टकराव ने इस संवैधानिक बहस को पुनः तेज कर दिया है।

चुनाव याचिका:

भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में, यदि किसी चुनाव (लोकसभा, राज्यसभा या विधानसभा) के परिणाम में किसी भी प्रकार की धांधली, कदाचार, या प्रक्रियागत अनियमितता की आशंका हो, तो उसे चुनौती देने का एकमात्र कानूनी माध्यम 'चुनाव याचिका' है। अर्थात यह पराजित उम्मीदवार या किसी मतदाता द्वारा उच्च न्यायालय के समक्ष दायर किया जाने वाला एक विशेष मुकदमा है, जिसके तहत विजयी घोषित उम्मीदवार के निर्वाचन को अवैध ठहराने की मांग की जाती है।

चर्चा के कारण 

  • अदालती रोक: मद्रास उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी और न्यायमूर्ति जी. अरुल मुरुगन की पीठ ने भारत निर्वाचन आयोग (ECI) को पांच विधानसभा क्षेत्रों तिरुचि पूर्व, पेरुंदुरई, अंबासमुद्रम, विरलीमलै और करूर में उपचुनाव अधिसूचित करने पर 31 जुलाई, 2026 तक अंतरिम रोक लगा दी है।

  • जनहित याचिका (PIL): यह आदेश तिरुनेलवेली के वकील के. वेंकटचलापति द्वारा दायर एक जनहित याचिका पर आया है।
  • मुख्यमंत्री का इस्तीफा: तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने पेराम्बूर और तिरुचि पूर्व दोनों सीटों से चुनाव जीता था और बाद में तिरुचि पूर्व सीट से इस्तीफा दे दिया था।
  • प्रतिवादियों को समय: न्यायालय ने विधानसभा सचिव, चुनाव आयोग और संबंधित पक्षों को 31 जुलाई तक अपना जवाबी हलफनामा दायर करने का निर्देश दिया है।

मुख्य मुद्दा क्या था?

मुख्य विवाद इस बात पर है कि क्या किसी विधायक के इस्तीफे के बाद खाली हुई सीट पर उस स्थिति में उपचुनाव कराया जा सकता है, जब उस सीट के मूल चुनाव परिणाम को चुनौती देने वाली "चुनाव याचिका" अदालत में लंबित हो।

याचिकाकर्ता का तर्क है कि यदि चुनाव याचिका लंबित रहते हुए उपचुनाव कराया जाता है और बाद में अदालत मूल चुनाव याचिका को स्वीकार कर लेती है, तो एक ही निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले दो दावेदार (एक उपचुनाव विजेता और दूसरा कोर्ट द्वारा घोषित विजेता) सामने आ जाएंगे। यह एक अत्यंत विसंगतिपूर्ण स्थिति पैदा करेगा।

संवैधानिक एवं कानूनी प्रावधान

  • संविधान का अनुच्छेद 329(b): यह अनुच्छेद स्पष्ट करता है कि संसद या राज्य विधानमंडल के किसी भी चुनाव को केवल और केवल उच्च न्यायालय के समक्ष दायर 'चुनाव याचिका' के माध्यम से ही चुनौती दी जा सकती है; अन्य किसी दीवानी अदालत को इसमें हस्तक्षेप का अधिकार नहीं है।

  • जन प्रतिनिधित्व अधिनियम (RPA), 1951 की धारा 80/81: इस कानून के अनुसार, चुनाव परिणाम घोषित होने की तिथि से 45 दिनों के भीतर ही चुनाव याचिका संबंधित उच्च न्यायालय में दायर की जानी अनिवार्य है, भले ही इस बीच इस्तीफा दे दिया गया हो। इस समय-सीमा के बाद याचिका स्वीकार नहीं की जाती।
  • धारा 100: न्यायालय निम्नलिखित ठोस आधारों पर किसी प्रत्याशी का चुनाव शून्य घोषित कर सकता है:
    • उम्मीदवार की मूल योग्यता में कमी होना।
    • चुनाव के दौरान 'भ्रष्ट आचरण' जैसे—रिश्वतखोरी, धार्मिक ध्रुवीकरण, या हलफनामे में गलत जानकारी देना।
    • नामांकन पत्र का गलत तरीके से स्वीकार या अस्वीकार होना।
  • धारा 101: यदि याचिकाकर्ता यह सिद्ध कर देता है कि विजयी उम्मीदवार को मिले वोट अवैध थे, और वास्तव में उसे (याचिकाकर्ता को) सबसे अधिक वैध मत मिले थे, तो न्यायालय धारा 101 के तहत याचिकाकर्ता को सीधे विजेता घोषित कर सकता है।
  • धारा 151A: यह धारा चुनाव आयोग को रिक्ति (vacancy) होने के छह महीने के भीतर उपचुनाव कराने का निर्देश देती है। हालांकि, याचिकाकर्ता के अनुसार इसे 'स्पष्ट रिक्ति' (Clear Vacancy) नहीं माना जा सकता यदि चुनाव याचिका लंबित हो।
  • धारा 86(7): यह प्रावधान अपेक्षा करता है कि उच्च न्यायालय चुनाव याचिका का निस्तारण उसकी प्रस्तुति के छह महीने के भीतर करे, ताकि मतदाताओं का प्रतिनिधित्व प्रभावित न हो (यद्यपि व्यावहारिक रूप से इसमें अधिक समय लगता है)।

न्यायालय के निर्णय का आधार

  • संवैधानिक विसंगति से बचाव: अदालत का प्राथमिक दृष्टिकोण यह है कि ऐसी स्थिति से बचा जाए जहां एक ही सीट पर दो वैध प्रतिनिधि होने का दावा पेश हो जाए।

  • लोकतांत्रिक शुद्धता: पीठ ने स्पष्ट किया कि लोकतंत्र की शुद्धता से जुड़े मामलों में 'लोकस स्टैंडी' (याचिका दायर करने का अधिकार) की संकीर्ण और तकनीकी व्याख्या नहीं की जा सकती।
  • सार्वजनिक धन की बर्बादी: अदालत ने माना कि असमय या जल्दबाजी में कराए गए उपचुनाव न केवल राजकोष पर भारी आर्थिक बोझ डालते हैं, बल्कि यदि बाद में मूल याचिका स्वीकार हो जाती है तो वह पूरी प्रक्रिया निरर्थक हो जाती है।

पूर्ववर्ती मामले और न्यायिक निर्णय

सर्वोच्च न्यायालय के तीन ऐतिहासिक निर्णयों को इस मामले में आधार बनाया गया है:

  • संजीवय्या बनाम चुनाव आयोग (1967): इस मामले में उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि यदि किसी निर्वाचन क्षेत्र से संबंधित चुनाव याचिका लंबित है, तो वहां उपचुनाव नहीं कराया जाना चाहिए क्योंकि इससे दोहरे प्रतिनिधित्व की असंभव स्थिति बन सकती है।
  • चुनाव आयोग बनाम तेलंगाना राष्ट्र समिति (2011): इस मामले में स्पष्ट और विवादित रिक्तियों के बीच का अंतर प्रतिपादित किया गया था।
  • प्रमोद लक्ष्मण गुडाधे बनाम चुनाव आयोग (2018): शीर्ष अदालत ने दोहराया कि जब तक कंपोजिट राहत (जिसमें याचिकाकर्ता खुद को विजेता घोषित करने की मांग करता है) वाली चुनाव याचिका लंबित है, रिक्ति को 'स्पष्ट रिक्ति' नहीं माना जा सकता।

चुनाव याचिकाओं में वृद्धि: कारण और परिणाम

कारण:

  • कड़े मुकाबले और कम अंतर: चुनावों में हार-जीत का बेहद कम अंतर प्रत्याशियों को तकनीकी या प्रक्रियागत कमियों को आधार बनाकर अदालत जाने के लिए प्रेरित करता है।
  • सदाचार और नियमों का उल्लंघन: तमिलनाडु चुनाव 2026 में बच्चों के चुनावी अभियान में इस्तेमाल, हलफनामे में तथ्य छिपाने और धार्मिक स्थलों के उपयोग जैसे आरोप याचिकाओं के मुख्य कारण बने हैं।
  • राजनीतिक ध्रुवीकरण: दलों के बीच बढ़ता अविश्वास और कानूनी रूप से विपक्षी जीत को चुनौती देने की आक्रामक प्रवृत्ति।

परिणाम:

  • न्यायपालिका पर अत्यधिक बोझ: मद्रास उच्च न्यायालय में इस बार चुनाव याचिकाओं में असामान्य वृद्धि देखी गई है जो न्यायपालिका के समय को प्रभावित करती है।
  • राजनीतिक अनिश्चितता: निर्वाचन क्षेत्रों के मतदाताओं के मन में अपने वास्तविक प्रतिनिधित्व को लेकर लंबे समय तक संशय और असमंजस की स्थिति बनी रहती है।

सीट खाली होने/इस्तीफे के बाद भी चुनाव याचिका का औचित्य

आम तौर पर सीट खाली होने के बाद मुकदमा निरर्थक प्रतीत होता है, परंतु इसके पीछे निम्नलिखित गंभीर कानूनी और रणनीतिक कारण होते हैं:

  • सीधे विजय की मांग: याचिकाकर्ता केवल विरोधी की जीत रद्द करने की मांग नहीं करता, बल्कि अदालत से स्वयं को उस सीट का 'वास्तविक विजेता' घोषित करने की प्रार्थना करता है। यदि कोर्ट इसे स्वीकार कर लेता है, तो बिना उपचुनाव के याचिकाकर्ता सीधे विधायक बन जाता है।
  • भविष्य के लिए अयोग्यता: यदि याचिका के माध्यम से 'भ्रष्ट आचरण' सिद्ध हो जाता है, तो इस्तीफा देने वाले नेता पर छह वर्ष तक चुनाव लड़ने का प्रतिबंध लग सकता है।

अन्य महत्वपूर्ण बिंदु

  • इस्तीफे बनाम याचिका का समय (तर्क): महाधिवक्ता ने एक महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु उठाया कि जिन विधायकों ने चुनाव याचिका दायर होने से पहले इस्तीफा दे दिया था, उनकी रिक्तियों को अलग चश्मे से देखा जाना चाहिए।

  • चुनाव आयोग की अनभिज्ञता: चुनाव आयोग के वकील ने तर्क दिया कि आयोग को अभी तक इन व्यक्तिगत चुनाव याचिकाओं के ब्योरे और उनकी वैधानिकता की आधिकारिक सूचना नहीं मिली है, अतः प्रक्रिया रोकना समय से पहले लिया गया निर्णय है।

विश्लेषण:

यह मामला दर्शाता है कि चुनाव आयोग के त्वरित चुनाव कराने के प्रशासनिक कर्तव्य (धारा 151A) और न्यायपालिका द्वारा चुनाव की वैधता तय करने के अधिकार के बीच एक महीन संवैधानिक संतुलन की आवश्यकता है, ताकि जनभावना और राजकोष दोनों का सम्मान हो सके।

आगे की राह

  • त्वरित सुनवाई तंत्र: चुनाव याचिकाओं के त्वरित निपटारे के लिए उच्च न्यायालयों में विशेष या समर्पित पीठों का गठन किया जाना चाहिए ताकि छह महीने की वैधानिक सीमा का अक्षरशः पालन हो सके।

  • कानूनी स्पष्टता: संसद को जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 151A में संशोधन करके यह स्पष्ट रूप से परिभाषित करना चाहिए कि 'लंबित याचिका' की स्थिति में 'स्पष्ट रिक्ति' का निर्धारण किस प्रकार किया जाएगा।
  • सख्त स्क्रीनिंग: चुनाव याचिकाओं की शुरुआती स्तर पर ही गंभीर समीक्षा होनी चाहिए ताकि केवल ठोस आधार वाली याचिकाओं को ही आगे बढ़ाया जाए और दुर्भावनापूर्ण मुकदमों से बचा जा सके।

निष्कर्ष

मद्रास उच्च न्यायालय का यह अंतरिम आदेश चुनावी लोकतंत्र की गरिमा को बनाए रखने की दिशा में एक स्वागत योग्य कदम है। यह स्पष्ट करता है कि चुनावी प्रक्रियाओं की जल्दबाजी में संवैधानिक सिद्धांतों और न्यायिक निर्णयों की अनदेखी नहीं की जा सकती। अंततः, इस विवाद का स्थायी समाधान केवल चुनाव याचिकाओं के तीव्र न्यायिक निस्तारण में ही निहित है ताकि मतदाताओं को बिना किसी असमंजस के उनका वास्तविक प्रतिनिधि मिल सके।  लोकतंत्र की मजबूती केवल नियमित चुनावों में नहीं, बल्कि निर्वाचित प्रतिनिधियों की निर्विवाद वैधता और मतदाताओं के विश्वास में निहित है। अतः समयबद्ध चुनाव याचिकाओं का निस्तारण ही चुनावी न्याय, संवैधानिक शासन और लोकतांत्रिक विश्वसनीयता को सुदृढ़ करने का सर्वोत्तम माध्यम है।


130वां संविधान संशोधन विधेयक: 'हिरासत से शासन' और संवैधानिक मर्यादा बनाम प्रक्रियात्मक सुरक्षा

सामान्य अध्ययन पेपर  – II:  शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध।

संदर्भ

भारतीय राजव्यवस्था में 'कानून के शासन' और 'संवैधानिक नैतिकता' को अक्षुण्ण रखना सदैव एक प्राथमिक चुनौती रही है, जिसके तहत आपराधिक पृष्ठभूमि के लोक सेवकों की जवाबदेही तय करना अनिवार्य माना गया है। ऐतिहासिक रूप से जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के प्रावधानों के माध्यम से दागी नेताओं को बाहर रखने का प्रयास किया जाता रहा है, किंतु हाल ही में मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों की लंबे समय तक न्यायिक हिरासत के दौरान भी पद पर बने रहने की घटनाओं ने इस विषय को समकालीन न्यायिक और राजनीतिक विमर्श के केंद्र में ला खड़ा किया है।

130वां संवैधानिक संशोधन विधेयक

यह विधेयक सरकार द्वारा लाया गया एक अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील विधायी प्रयास है, जिसका मूल उद्देश्य कार्यपालिका में 'संवैधानिक शून्यता' और 'हिरासत से शासन' की स्थिति को रोकना है। इसके प्रमुख प्रावधान निम्नलिखित हैं:

  • मूल प्रस्ताव: इस विधेयक के मूल मसौदे में यह प्रावधान किया गया था कि यदि कोई प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री लगातार 30 दिनों या उससे अधिक समय तक न्यायिक हिरासत में रहता है, तो उसे उसके पद से स्वतः "हटा" दिया जाएगा।
  • उद्देश्य: कार्यपालिका के प्रमुख पदों की गरिमा को बनाए रखना तथा यह सुनिश्चित करना कि कारावास के कारण प्रशासनिक कामकाज और नीतिगत निर्णय प्रभावित न हों।

चर्चा में क्यों?

यह विषय जुलाई 2026 में निम्नलिखित घटनाक्रमों के कारण अत्यंत चर्चा में है:

  • संसदीय समिति की रिपोर्ट: इस विधेयक की समीक्षा कर रही संयुक्त संसदीय समिति (JPC) ने अपनी मसौदा रिपोर्ट प्रस्तुत की है, जिसमें मूल विधेयक में कई महत्वपूर्ण संशोधनों का प्रस्ताव दिया गया है।
  • विपक्ष का विरोध: अधिकांश विपक्षी दलों ने इस विधेयक को "दुर्भावनापूर्ण इरादे" से प्रेरित बताते हुए समिति (JPC) की बैठकों में शामिल होने से इनकार कर दिया था, जिससे इस पर राजनीतिक गतिरोध उत्पन्न हो गया है।
  • संस्थागत चिंताएं: देश के लगभग एक दर्जन से अधिक प्रमुख विधि विश्वविद्यालयों और कानूनी संस्थानों ने राजनीति को अपराध मुक्त करने के उद्देश्य का तो समर्थन किया है, परंतु 30 दिनों की हिरासत के बाद 'स्वचालित निष्कासन' के प्रावधान का कड़ा विरोध किया है।

संयुक्त संसदीय समिति (JPC)

इस विधेयक की बारीकी से जांच करने के लिए संसद के दोनों सदनों के सदस्यों को मिलाकर एक 'संयुक्त संसदीय समिति' का गठन किया गया था।

  • नेतृत्व: इस समिति की अध्यक्षता वरिष्ठ भारतीय जनता पार्टी (BJP) सांसद अपराजिता सारंगी द्वारा की जा रही है।
  • जनादेश: समिति का कार्य विधेयक के कानूनी, संवैधानिक और प्रशासनिक प्रभावों का आकलन करना तथा सभी हितधारकों से परामर्श कर एक संतुलित रिपोर्ट तैयार करना था।

समिति की प्रमुख सिफारिशें (JPC)

समिति ने राजनीतिक दुरुपयोग को रोकने और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों की रक्षा के लिए निम्नलिखित महत्वपूर्ण सिफारिशें की हैं:

  • 'हटाने' के स्थान पर 'निलंबन': समिति ने "हटाने" या "मंत्री पद समाप्त होने" जैसे शब्दों को "निलंबन" से प्रतिस्थापित करने की सिफारिश की है। इससे पद से वंचित होने की स्थिति स्थायी होने के बजाय अस्थायी और प्रतिवर्ती हो जाएगी।
  • स्वचालित बहाली खंड: यदि संबंधित मंत्री न्यायालय द्वारा बरी (Acquitted) या डिस्चार्ज कर दिया जाता है, अथवा निर्धारित समय-सीमा के भीतर अभियोजन आगे बढ़ने में विफल रहता है, तो निलंबन स्वतः समाप्त हो जाएगा। इससे निर्दोष व्यक्ति का पद हमेशा के लिए नहीं छिनेगा।
  • गंभीर अपराधों का वर्गीकरण: राजनीतिक द्वेष के तहत की जाने वाली सामान्य गिरफ्तारियों के दुरुपयोग को रोकने के लिए, समिति ने केवल "गंभीर आपराधिक अपराधों" को इस कानून के दायरे में लाने और इसके लिए विधेयक में एक अलग अनुसूची जोड़ने का सुझाव दिया है।
  • फास्ट-ट्रैक अदालतों की स्थापना: उच्च संवैधानिक पदाधिकारियों से जुड़े इन संवेदनशील मामलों के त्वरित निपटारे के लिए विशेष या फास्ट-ट्रैक अदालतों के गठन की वकालत की गई है।

विश्लेषण

यह विधेयक संवैधानिक नैतिकता को सुदृढ़ करने की दिशा में एक साहसिक प्रयास है, किंतु बिना प्रक्रियात्मक सुरक्षा के यह "निर्दोषता के अनुमान" के मूल न्यायिक सिद्धांत को गंभीर चोट पहुंचा सकता है। दोषसिद्धि के बजाय केवल गिरफ्तारी या हिरासत को पद से हटाने का आधार बनाना, राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाने के लिए प्रशासनिक मशीनरी के दुरुपयोग का मार्ग प्रशस्त कर सकता है।

आगे की राह

  • संतुलित विधायी ढांचा : इस संवेदनशील विषय पर एक व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है, जहाँ 'शासन में शुचिता' और 'नागरिक अधिकारों' के मध्य समन्वय स्थापित हो। इसके लिए संसद जेपीसी (JPC) द्वारा सुझाए गए 'निलंबन' और 'सनसेट क्लॉज' जैसे विकल्पों पर गंभीरता से विचार कर सकती है, जिससे निर्दोषता के मूल सिद्धांत को ठेस पहुंचाए बिना एक न्यायसंगत प्रक्रिया सुनिश्चित की जा सके।

  • न्यायिक हस्तक्षेप और त्वरित न्याय: राजनीतिक वर्ग के मामलों की सुनवाई के लिए फास्ट-ट्रैक अदालतों को कड़े समय-बद्ध दायरे में काम करना चाहिए ताकि प्रशासनिक अनिश्चितता जल्द समाप्त हो सके।
  • राजनीतिक आम सहमति: चूंकि यह विधेयक संघवाद और लोकतांत्रिक ढांचे को प्रभावित करता है, अतः इसे पारित करने से पूर्व विपक्ष को विश्वास में लेकर व्यापक संसदीय आम सहमति बनाई जानी चाहिए।


निष्कर्ष

130वां संविधान संशोधन विधेयक भारतीय लोकतंत्र को शुचिता प्रदान करने की दिशा में एक युगांतरकारी कदम साबित हो सकता है, बशर्ते इसका क्रियान्वयन कानून की उचित प्रक्रिया और मानवीय गरिमा के अनुकूल हो। स्वच्छ शासन की अनिवार्यता और नागरिक व संवैधानिक अधिकारों के संरक्षण के बीच एक न्यायसंगत संतुलन ही इस विधेयक को सर्वस्वीकार्य और प्रभावी बना सकता है, जिससे 'हिरासत से शासन' की विसंगति का तार्किक अंत हो सके।