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दो दशकों की लंबी बातचीत के बाद, यह संधि 17 जनवरी, 2026 को अंतर्राष्ट्रीय कानून बन गई है। सितंबर 2025 में 60 देशों द्वारा इसकी पुष्टि किए जाने के बाद 120 दिनों का काउंटडाउन शुरू हुआ था, जो अब पूरा हो चुका है।
'हाई सी' क्या है?
- परिभाषा: किसी भी देश के तट से 200 समुद्री मील (EEZ) के बाद का विशाल समुद्री क्षेत्र 'हाई सी' कहलाता है।
- विस्तार: यह दुनिया के कुल महासागरों का लगभग दो-तिहाई (2/3) हिस्सा है।
- महत्व: अब तक यह क्षेत्र "नो-मैन्स लैंड" की तरह था, जहाँ नियम बहुत कम थे। यहाँ कोई भी देश मछली पकड़ सकता था या खनन कर सकता था।
संधि के मुख्य उद्देश्य और प्रावधान
इस संधि के चार मुख्य स्तंभ हैं:
- समुद्री संरक्षित क्षेत्र (MPAs): 2030 तक दुनिया के 30% महासागरों को सुरक्षित करने का लक्ष्य । इसके तहत हाई सी में ऐसे क्षेत्र बनाए जाएंगे जहाँ मछली पकड़ना या खनन करना प्रतिबंधित होगा।
- पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA): अब किसी भी व्यावसायिक गतिविधि (जैसे गहरे समुद्र में खनन) से पहले यह जांचना अनिवार्य होगा कि इससे पर्यावरण को क्या नुकसान होगा।
- समुद्री आनुवंशिक संसाधन (MGRs): समुद्र की गहराई में मिलने वाले जीवों के डीएनए से बनने वाली दवाओं या कॉस्मेटिक्स से होने वाले लाभ को अमीर और गरीब देशों के बीच समान रूप से साझा किया जाएगा।
- क्षमता निर्माण और तकनीक: विकसित देश विकासशील देशों को समुद्री तकनीक और अनुसंधान में मदद करेंगे।
इसकी आवश्यकता क्यों पड़ी?
- अत्यधिक मछली पकड़ना: बिना नियमों के समुद्री प्रजातियां खत्म हो रही थीं।
- प्रदूषण: प्लास्टिक और रसायनों का बढ़ता ढेर।
- जलवायु परिवर्तन: समुद्र का बढ़ता तापमान और अम्लीकरण।
चुनौतियाँ और भारत की स्थिति
- चुनौतियां: संधि को लागू करना कठिन है क्योंकि समुद्र बहुत विशाल है और इसकी निगरानी के लिए एक मजबूत अंतर्राष्ट्रीय एजेंसी की कमी है।
- भारत: भारत ने इस संधि पर हस्ताक्षर कर दिए हैं, जो समुद्री संसाधनों के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। हालांकि, पूर्ण क्रियान्वयन के लिए सभी प्रमुख देशों (जैसे अमेरिका, चीन) का सहयोग अनिवार्य होगा।
निष्कर्ष: यह संधि महासागरों के लिए "संविधान" की तरह है। यह सुनिश्चित करती है कि समुद्र केवल शोषण का जरिया न रहकर आने वाली पीढ़ियों के लिए भी सुरक्षित रहे।
जनवरी 2026 में आयोजित यह अभ्यास ब्रिक्स समूह के विस्तार के बाद पहला बड़ा बहुपक्षीय सैन्य आयोजन है। यह अभ्यास वैश्विक भू-राजनीति में 'ग्लोबल साउथ' की बढ़ती सैन्य शक्ति और रणनीतिक स्वायत्तता का प्रतीक है।
प्रमुख बिंदु
- नाम: शांति के लिए संकल्प 2026।
- समय: 9 जनवरी से 16 जनवरी 2026।
- स्थान: दक्षिण अफ्रीका का प्रादेशिक जल क्षेत्र, विशेष रूप से केप टाउन के पास साइमन्स टाउन नौसेना बेस और फॉल्स बे।
- नेतृत्व: इस अभ्यास का नेतृत्व चीन ने किया।
- मेजबानी: दक्षिण अफ्रीका इस अभ्यास का मेजबान देश था।
प्रतिभागी और पर्यवेक्षक देश
यह अभ्यास ब्रिक्स प्लस प्रारूप में आयोजित किया गया था, जिसमें भागीदारी के विभिन्न स्तर थे:
श्रेणी | देश |
सक्रिय प्रतिभागी | चीन, रूस, ईरान, दक्षिण अफ्रीका और संयुक्त अरब अमीरात (UAE)। |
पर्यवेक्षक देश | ब्राजील, मिस्र, इथियोपिया और इंडोनेशिया। |
अनुपस्थित सदस्य | भारत (भारत ने इस अभ्यास से दूरी बनाई और स्पष्ट किया कि यह ब्रिक्स की कोई संस्थागत या अनिवार्य गतिविधि नहीं है)। |
अभ्यास के मुख्य उद्देश्य
- समुद्री सुरक्षा: शिपिंग मार्गों की सुरक्षा और समुद्री आर्थिक गतिविधियों को सुनिश्चित करना।
- इंटरऑपरेबिलिटी: विभिन्न देशों की नौसेनाओं के बीच तकनीकी और परिचालन तालमेल बढ़ाना।
- एंटी-पायरेसी: समुद्री डकैती विरोधी अभियानों और खोज एवं बचाव (SAR) कार्यों का अभ्यास करना।
- तकनीकी विनिमय: नौसैनिक प्रणालियों और परिचालन प्रक्रियाओं (SOPs) का आदान-प्रदान।
वैश्विक प्रभाव और महत्व
यह अभ्यास केवल एक सैन्य ड्रिल नहीं, बल्कि एक बड़ा कूटनीतिक संदेश है:
- बहुध्रुवीय विश्व की ओर: यह अभ्यास अमेरिका और नाटो (NATO) के समुद्री प्रभुत्व के विकल्प के रूप में एक 'गैर-पश्चिमी' सुरक्षा ढांचे को प्रदर्शित करता है।
- चीन और रूस का बढ़ता प्रभाव: चीन के लिए यह हिंद महासागर और दक्षिण अटलांटिक में अपनी नौसेना (PLAN) की पहुंच को सामान्य बनाने का अवसर है। वहीं रूस ने दिखाया है कि वह प्रतिबंधों के बावजूद वैश्विक रूप से सक्रिय है।
- रणनीतिक स्वायत्तता: दक्षिण अफ्रीका द्वारा इस अभ्यास की मेजबानी करना पश्चिमी दबाव के बावजूद अपनी स्वतंत्र विदेश नीति का प्रदर्शन है।
- हिंद महासागर की सुरक्षा: केप मार्ग वैश्विक व्यापार का एक प्रमुख गलियारा है। यहाँ ब्रिक्स प्लस की उपस्थिति व्यापारिक मार्गों पर उनके प्रभाव को बढ़ाती है।
चुनौतियाँ और विवाद
- अमेरिका के साथ तनाव: वाशिंगटन ने इस अभ्यास को "अमेरिका विरोधी" और तनाव बढ़ाने वाला बताया है, विशेषकर रूस और ईरान की भागीदारी के कारण।
- भारत का रुख: भारत ने इस अभ्यास में भाग न लेकर संतुलन बनाने की कोशिश की है। भारत 'ब्रिक्स' को एक आर्थिक मंच के रूप में देखता है, न कि एक सैन्य गठबंधन के रूप में।
- आंतरिक मतभेद: समूह के भीतर भारत और ब्राजील जैसे देशों की अनुपस्थिति या सीमित भागीदारी यह दर्शाती है कि सुरक्षा सहयोग पर ब्रिक्स के भीतर पूर्ण सहमति नहीं है।
सामान्य अध्ययन पेपर – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध
सामान्य अध्ययन पेपर – IV नीतिशास्त्र, सत्यनिष्ठा और अभिरुचि
भूमिका
जनवरी 2026 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा राजस्थान उच्च न्यायालय के उस आदेश पर स्थगन लगाना, जिसमें राजमार्गों से 500 मीटर के भीतर 1,102 शराब दुकानों को हटाने का निर्देश दिया गया था, भारत में 'लोक सुरक्षा' बनाम 'राज्य के आर्थिक यथार्थवाद' के पुराने द्वंद्व को पुनः केंद्र में ले आया है। यह मामला न केवल न्यायिक सक्रियता का उदाहरण है, बल्कि कार्यपालिका की व्यावहारिक सीमाओं और नीतिगत जटिलताओं को भी रेखांकित करता है।
ऐतिहासिक एवं विधिक परिप्रेक्ष्य
भारत में शराब के विनियमन को लेकर संवैधानिक और न्यायिक ढांचा सदैव 'लोक कल्याण' की ओर झुका रहा है:
- संवैधानिक अधिदेश (अनुच्छेद 47): राज्य के नीति निदेशक तत्वों के अंतर्गत, राज्य का यह कर्तव्य है कि वह लोक स्वास्थ्य के सुधार हेतु मादक पेयों और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक नशीले पदार्थों के सेवन पर प्रतिषेध लगाने का प्रयास करे।
- न्यायिक मिसाल (द स्टेट ऑफ तमिलनाडु बनाम के. बालू , 2016): सर्वोच्च न्यायालय ने 'ड्रंक ड्राइविंग' से होने वाली मृत्यु दर को कम करने हेतु राजमार्गों के किनारे 500 मीटर तक शराब की बिक्री पर प्रतिबंध लगाया था। हालांकि, 2017 के स्पष्टीकरण में नगर पालिकाओं को इससे छूट प्रदान की गई, जो वर्तमान विवाद का मुख्य केंद्र है।
- व्यापार का अधिकार: न्यायालय ने कई बार स्पष्ट किया है कि शराब का व्यापार करना कोई मौलिक अधिकार नहीं है बल्कि यह राज्य द्वारा प्रदत्त एक विशेषाधिकार है।
बहुआयामी सामाजिक-आर्थिक विश्लेषण
- सामाजिक एवं नैतिक आयाम
- घरेलू हिंसा और महिला सुरक्षा: NFHS-5 के आंकड़े पुष्टि करते हैं कि मद्यपान का सीधा संबंध घरेलू हिंसा और लैंगिक अपराधों से है। यह परिवारों की आर्थिक सुरक्षा को नष्ट कर बच्चों के पोषण और शिक्षा को बाधित करता है।
- नैतिक द्वंद्व: एक 'लोक कल्याणकारी राज्य' के लिए यह नैतिक प्रश्न विचारणीय है कि क्या उसे अपने नागरिकों के व्यसन से राजस्व अर्जित करना चाहिए। गांधीवादी दर्शन पूर्ण निषेध का समर्थन करता है, जबकि आधुनिक उदारवादी दृष्टिकोण 'व्यक्तिगत स्वतंत्रता' (अनुच्छेद 21) और 'जिम्मेदार उपभोग' पर बल देता है।
- आर्थिक यथार्थवाद और राजस्व
- राजस्व की अपरिहार्यता: शराब GST के दायरे से बाहर है, जिससे यह राज्यों के लिए 'स्टेट एक्साइज ड्यूटी' के माध्यम से आय का सबसे बड़ा स्रोत (15-25%) बनी हुई है।
- व्यावहारिक बाधाएँ: राजस्थान जैसे राज्यों में जहाँ शहरी नियोजन राजमार्गों के समानांतर है, वहां 500 मीटर का प्रतिबंध पूरे व्यावसायिक क्षेत्रों को 'ड्राई ज़ोन' में बदल सकता है, जिससे पर्यटन और रोजगार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
अपराध विज्ञान और सुरक्षा संबंधी तथ्य
- NCRB एवं सड़क सुरक्षा: भारत में सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों में 'ड्रंक ड्राइविंग' का अनुपात सांख्यिकीय रूप से कम (2-3%) दिख सकता है, किंतु इन दुर्घटनाओं की घातकता दर अन्य कारणों की तुलना में 40% अधिक होती है।
- प्रवर्तन की विफलता (भारतीय जुगाड़): प्रत्यक्ष विज्ञापनों पर प्रतिबंध के बावजूद 'प्रतीकात्मक संकेतों' (जैसे तीर के निशान) और 'शैडो एडवरटाइजिंग' (सोडा, पानी के नाम पर ब्रांडिंग) के माध्यम से नियमों की अवहेलना की जाती है।
शराबबंदी वाले राज्यों की समीक्षा:
बिहार, गुजरात और नगालैंड जैसे राज्यों के अनुभव मिश्रित रहे हैं:
- सफलता: ग्रामीण आर्थिक सुदृढ़ीकरण और सामाजिक चेतना में वृद्धि।
- विफलता: 'भूमिगत अर्थव्यवस्था' का उदय, जहरीली शराब से मृत्यु, सीमावर्ती राज्यों से तस्करी और प्रशासनिक भ्रष्टाचार में वृद्धि।
आगे की राह:
न्यायपालिका और कार्यपालिका को एक 'मध्यम मार्ग' अपनाने की आवश्यकता है:
- राजस्व विविधीकरण: राज्यों को अपनी वित्तीय निर्भरता शराब से हटाकर सेवा क्षेत्र और अन्य कर स्रोतों पर बढ़ानी चाहिए।
- तकनीकी हस्तक्षेप: राजमार्गों पर 'अल्कोहल इंटरलॉक' युक्त वाहनों को प्रोत्साहन और डिजिटल निगरानी।
- व्यवहार परिवर्तन: शराबबंदी को केवल कानून के बजाय एक सामाजिक आंदोलन के रूप में विकसित करना, जिसमें नशामुक्ति केंद्रों की भूमिका प्रमुख हो।
- न्यायिक संतुलन: राजस्थान मामले की तरह, अदालतों को व्यापक आदेश जारी करने से पूर्व सभी हितधारकों की व्यावहारिक समस्याओं को सुनना चाहिए।
निष्कर्ष
शराब का मुद्दा अर्थशास्त्र, नैतिकता और सार्वजनिक स्वास्थ्य के चौराहे पर स्थित है। राजस्थान का वर्तमान विधिक प्रकरण यह स्पष्ट करता है कि 'शून्य दुर्घटना' का लक्ष्य केवल दुकानों को विस्थापित करने से नहीं, बल्कि सख्त प्रवर्तन, जिम्मेदार उपभोग और राज्य की आर्थिक नीतियों के पुनर्गठन से ही प्राप्त किया जा सकता है। न्यायपालिका का आदर्शवाद और कार्यपालिका का यथार्थवाद जब एक दिशा में कार्य करेंगे, तभी अनुच्छेद 47 के वास्तविक लक्ष्यों की प्राप्ति संभव होगी।
सामान्य अध्ययन पेपर – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध
भूमिका
यमन, जिसे ऐतिहासिक रूप से 'अरब का खुशहाल देश' (अरबिया फेलिक्स) कहा जाता था, आज वैश्विक राजनीति के सबसे दुखद अध्याय में बदल गया है। दशक भर से जारी गृहयुद्ध ने न केवल यमन को तबाह किया है, बल्कि फारस की खाड़ी की दो प्रमुख शक्तियों सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के बीच रणनीतिक मतभेदों को भी सतह पर ला दिया है। 2026 की शुरुआत में हुए सैन्य और कूटनीतिक घटनाक्रमों ने इस संकट को एक नया और अधिक जटिल मोड़ दे दिया है।
घटनाक्रम का केंद्र: दक्षिण यमन में सैन्य संघर्ष
दिसंबर 2025 के अंत में यमन में एक नया आंतरिक मोर्च खुल गया, जब यूएई समर्थित सदर्न ट्रांजिशनल काउंसिल (एसटीसी ) ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार के खिलाफ विद्रोह कर दिया:
- सामरिक क्षेत्रों पर नियंत्रण: एसटीसी ने तेल और संसाधनों से संपन्न 'हधरामौत' और 'अल-महारा' प्रांतों पर अधिकार कर लिया।
- सऊदी सैन्य हस्तक्षेप: रियाद ने इसे यमन की अखंडता पर हमला माना। सऊदी वायुसेना के हस्तक्षेप और कूटनीतिक दबाव के बाद 7 जनवरी 2026 तक सरकारी सेनाओं ने अदन में पुनः प्रवेश किया और विद्रोह को नियंत्रित किया।
सऊदी अरब बनाम यूएई: कूटनीतिक गतिरोध
यमन युद्ध के शुरुआती दौर के सहयोगी अब विपरीत ध्रुवों पर खड़े हैं:
- विरोधाभासी रणनीतिक लक्ष्य: सऊदी अरब एक एकीकृत यमन का पक्षधर है ताकि उसकी दक्षिणी सीमा ईरान समर्थित हौथी विद्रोहियों से सुरक्षित रहे। इसके विपरीत, यूएई का झुकाव दक्षिण यमन के अलगाववादियों की ओर रहा है, ताकि वह बाब-अल-मंडेब जलडमरूमध्य और प्रमुख समुद्री मार्गों पर अपना प्रभाव सुरक्षित रख सके।
- हथियारों का विवाद: सऊदी अरब द्वारा मुकल्ला बंदरगाह पर हथियारों की खेप को निशाना बनाना और यूएई पर विद्रोहियों को हथियार देने का आरोप लगाना, दोनों देशों के बीच "ट्रस्ट डेफिसिट" (विश्वास की कमी) को दर्शाता है।
रियाद घोषणापत्र और एसटीसी का भविष्य
जनवरी 2026 के प्रथम सप्ताह में रियाद में आयोजित उच्चस्तरीय वार्ता के बाद एक महत्वपूर्ण बदलाव आया:
- विघटन और पलायन: सऊदी दबाव के तहत एसटीसी ने स्वयं को भंग करने की घोषणा की और इसके प्रमुख नेता ऐदरस अल-जुबैदी के अबू धाबी पलायन ने इस विद्रोह को कमजोर कर दिया है। हालांकि, स्थानीय समूहों के बीच असंतोष अभी भी बना हुआ है।
यमन संकट और भारत: सामरिक एवं आर्थिक हित
यमन की स्थिरता सीधे तौर पर भारत के राष्ट्रीय हितों को प्रभावित करती है:
- ऊर्जा सुरक्षा: भारत का कच्चा तेल और LNG आयात इसी क्षेत्र के समुद्री मार्गों से गुजरता है। लाल सागर में असुरक्षा का अर्थ है माल ढुलाई की लागत में वृद्धि और ऊर्जा संकट।
- प्रवासी सुरक्षा: सऊदी अरब और यूएई जैसे पड़ोसी देशों में करीब 90 लाख भारतीय कार्यरत हैं। इस क्षेत्र में बढ़ता तनाव भारत के लिए रेमिटेंस और प्रवासी सुरक्षा की दृष्टि से संवेदनशील है।
- आतंकवाद और समुद्री डकैती: यमन की अस्थिरता अल-कायदा (AQAP) और अन्य उग्रवादी समूहों को फलने-फूलने का मौका देती है, जो हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में भारत की सुरक्षा के लिए खतरा हैं।
भारत की कूटनीतिक स्थिति
भारत ने हमेशा एक संतुलित और "प्रिंसिपल्ड" (सैद्धांतिक) रुख अपनाया है:
- भारत यमन की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता का पूर्ण समर्थन करता है।
- भारत के सऊदी अरब और यूएई दोनों के साथ 'रणनीतिक साझेदारी' है, इसलिए भारत किसी एक का पक्ष लेने के बजाय क्षेत्रीय स्थिरता को प्राथमिकता देता है।
- भारत का मानना है कि समाधान 'यमन के नेतृत्व वाली' और 'समावेशी राजनीतिक प्रक्रिया' से ही संभव है।
मानवीय संकट: एक भयावह वास्तविकता
राजनीतिक शतरंज के बीच यमन की जनता सबसे बड़ी पीड़ित है:
- मानवीय सांख्यिकी: देश की 80% आबादी (लगभग 2.4 करोड़ लोग) मानवीय सहायता पर निर्भर है।
- आर्थिक पतन: बुनियादी ढांचा ध्वस्त हो चुका है और भीषण मुद्रास्फीति ने भोजन को आम जनता की पहुंच से बाहर कर दिया है।
विश्लेषण: भारत के लिए चुनौतियां और अवसर
यह संकट भारत की 'वेस्ट एशिया पॉलिसी' की परीक्षा है। भारत भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC) जैसे महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहा है, जिसके सफल कार्यान्वयन के लिए इस क्षेत्र में शांति अनिवार्य है। सऊदी-यूएई प्रतिद्वंद्विता भारत के लिए कूटनीतिक संतुलन बनाना कठिन बना सकती है।
आगे की राह
- समुद्री सुरक्षा: भारत को 'नेवल डिप्लोमेसी' के माध्यम से लाल सागर में सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए बहुपक्षीय सहयोग बढ़ाना चाहिए।
- मानवीय नेतृत्व: भारत को 'ग्लोबल साउथ' के नेता के रूप में यमन को बड़े पैमाने पर चिकित्सा और खाद्य सहायता भेजनी चाहिए।
- ब्रिक्स की भूमिका: चूंकि सऊदी अरब और यूएई अब ब्रिक्स के सदस्य हैं, भारत को 2026 की मेजबानी के दौरान इस मंच का उपयोग कर दोनों देशों के बीच मतभेदों को कम करने का प्रयास करना चाहिए।
निष्कर्ष
यमन का संकट अब केवल एक आंतरिक संघर्ष नहीं, बल्कि पश्चिम एशिया के भू-राजनीतिक वर्चस्व की प्रयोगशाला बन गया है। भारत के लिए इस क्षेत्र में शांति का अर्थ है सुरक्षित नागरिक और स्थिर अर्थव्यवस्था। 2026 में ब्रिक्स की मेजबानी करते हुए भारत को अपनी कूटनीतिक क्षमता का उपयोग यमन को "विफल राष्ट्र" बनने से बचाने और क्षेत्रीय शक्तियों के बीच सेतु के रूप में कार्य करने में करना होगा।
सामान्य अध्ययन पेपर – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध
संदर्भ
ऐतिहासिक रूप से, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से वैश्विक व्यापार पर 'ब्रेटन वुड्स' प्रणाली और अमेरिकी डॉलर का वर्चस्व रहा है। हालांकि, हाल के वर्षों में भू-राजनीतिक अस्थिरता, प्रतिबंधों का हथियार के रूप में उपयोग (जैसे रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद ‘SWIFT’ से रूस को हटाना और अमेरिकी फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीतियों के कारण विकासशील देशों में 'डी-डॉलराइज़ेशन की आवश्यकता महसूस की गई है। इसी पृष्ठभूमि में, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने ब्रिक्स देशों के बीच अपनी डिजिटल मुद्राओं (CBDCs) को जोड़ने का प्रस्ताव दिया है, जो न केवल तकनीकी प्रगति है बल्कि एक रणनीतिक कदम भी है।
ब्रिक्स क्या है?
ब्रिक्स दुनिया की उभरती हुई प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं का एक समूह है।
- स्थापना: 2009 (दक्षिण अफ्रीका 2010 में शामिल हुआ)।
- मूल सदस्य: ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका।
- विस्तार (ब्रिक्स +): हाल ही में इसमें संयुक्त अरब अमीरात (UAE), ईरान, मिस्र और इथियोपिया जैसे देशों को शामिल किया गया है, जबकि इंडोनेशिया जैसे देश भी इसके करीब हैं।
- महत्व: यह वैश्विक जनसंख्या का लगभग 45% और वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का 28% से अधिक प्रतिनिधित्व करता है।
चर्चा में क्यों?
- हालिया रिपोर्टों के अनुसार, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने भारत सरकार को सिफारिश की है कि 2026 के ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में सदस्य देशों की 'सेंट्रल बैंक डिजिटल मुद्राओं' (CBDCs) को आपस में जोड़ने का प्रस्ताव एजेंडे में शामिल किया जाए।
- यह पहली बार है जब भारत ने आधिकारिक तौर पर इस प्रकार के बहुपक्षीय डिजिटल भुगतान तंत्र का सुझाव दिया है, जिसका उद्देश्य सीमा पार व्यापार और पर्यटन को सुगम बनाना है।
इसकी आवश्यकता क्यों?
- लेनदेन लागत में कमी: वर्तमान में क्रॉस-बॉर्डर भुगतान में कई मध्यस्थ बैंक शामिल होते हैं, जिससे लागत और समय दोनों बढ़ते हैं। CBDC इसे सीधे और सस्ता बनाएगा।
- डॉलर पर निर्भरता कम करना: डॉलर की विनिमय दर में उतार-चढ़ाव विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था को अस्थिर करता है। स्थानीय मुद्रा लिंकेज इससे सुरक्षा प्रदान करेगा।
- वित्तीय संप्रभुता: प्रतिबंधों के डर के बिना स्वतंत्र भुगतान तंत्र विकसित करना।
- पर्यटन को बढ़ावा: पर्यटकों के लिए मुद्रा विनिमय की जटिलता को खत्म करना।
प्रभाव
- आर्थिक प्रभाव: यदि सफल रहा, तो यह एक "समानांतर वैश्विक भुगतान प्रणाली" का निर्माण करेगा। व्यापारिक निपटान वास्तविक समय में हो सकेगा।
- रणनीतिक प्रभाव: भारत की 'डिजिटल रुपया' को वैश्विक स्वीकार्यता मिलेगी, जिससे भारत की 'सॉफ्ट पावर' और वित्तीय कूटनीति मजबूत होगी।
- बाजार गतिशीलता: यह स्थिर सिक्कों और अनियंत्रित क्रिप्टोकरेंसी के जोखिमों को कम कर सकता है, क्योंकि इसे केंद्रीय बैंकों का समर्थन प्राप्त होगा।
प्रमुख चुनौतियां और अमेरिका का रुख
- अमेरिकी प्रतिक्रिया: अमेरिका इसे अपनी आर्थिक हेजेमनी के लिए खतरा मानता है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसे "अमेरिका विरोधी" करार दिया है और ऐसे देशों पर भारी टैरिफ लगाने की चेतावनी दी है जो डॉलर को छोड़ने का प्रयास करेंगे।
- तकनीकी बाधा: विभिन्न देशों के CBDC प्लेटफॉर्म्स की तकनीक अलग-अलग है। उन्हें एक साझा नेटवर्क पर लाना कठिन है।
- विश्वास की कमी: चीन और भारत या रूस और भारत के बीच व्यापार असंतुलन एक बड़ी बाधा है। रूस के पास जमा भारतीय रुपये का उदाहरण यह दर्शाता है कि मुद्रा अधिशेष का प्रबंधन करना जटिल है।
ब्रिक्स 2026:
- भारत 2026 के ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी करने जा रहा है। यह शिखर सम्मेलन इस वर्ष के अंत में आयोजित होगा।
- भारत के लिए यह एक बड़ा अवसर है कि वह ग्लोबल साउथ के नेता के रूप में उभरे और डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे (DPI) के अपने सफल मॉडल को दुनिया के सामने पेश करे।
ब्रिक्स मुद्रा और पायलट प्रोजेक्ट
वर्तमान में कोई साझा "ब्रिक्स मुद्रा" अस्तित्व में नहीं है, लेकिन सभी पांच मुख्य सदस्य अपने-अपने CBDC के पायलट प्रोजेक्ट चला रहे हैं।
- भारत का e-Rupee, चीन का e-CNY, और रूस का डिजिटल रूबल परीक्षण के उन्नत चरणों में हैं।
- चर्चा अब एक नई मुद्रा बनाने की नहीं, बल्कि इन मौजूदा डिजिटल मुद्राओं को 'ब्रिज' के माध्यम से जोड़ने की है।
वैश्विक विश्लेषण
- विश्व स्तर पर, 'प्रोजेक्ट एमब्रिज' जैसी पहल पहले से ही चीन, यूएई और थाईलैंड के बीच चल रही है।
- यूरोप और अमेरिका भी अपनी डिजिटल मुद्रा पर काम कर रहे हैं।
- ब्रिक्स का यह कदम वैश्विक वित्त के "लोकतांत्रितकरण" की दिशा में एक प्रयास है, जो पश्चिमी प्रभुत्व वाले SWIFT तंत्र को चुनौती दे सकता है।
विश्लेषण
यह प्रस्ताव भारत की संतुलित विदेश नीति का परिचायक है। एक ओर भारत 'क्वाड' के माध्यम से अमेरिका के साथ है, वहीं दूसरी ओर ब्रिक्स के माध्यम से वह डॉलर के प्रभुत्व को तर्कसंगत चुनौती दे रहा है। हालांकि, भारत ने स्पष्ट किया है कि उसका उद्देश्य 'डी-डॉलराइज़ेशन नहीं, बल्कि 'रुपये का अंतर्राष्ट्रीयकरण' है।
आगे की राह
- तकनीकी मानक: सदस्य देशों को एक सामान्य 'प्रोटोकॉल' और डेटा सुरक्षा मानकों पर सहमत होना होगा।
- द्विपक्षीय स्वैप व्यवस्था: व्यापार असंतुलन को दूर करने के लिए केंद्रीय बैंकों के बीच 'करेंसी स्वैप' समझौते मजबूत करने होंगे।
- क्रमिक कार्यान्वयन: पहले पर्यटन और छोटे व्यापार से शुरुआत कर धीरे-धीरे बड़े व्यापारिक निपटान की ओर बढ़ना चाहिए।
निष्कर्ष
भारतीय रिजर्व बैंक का CBDC लिंकेज का प्रस्ताव वैश्विक वित्तीय ढांचे में एक क्रांतिकारी कदम साबित हो सकता है। यह न केवल व्यापार को आसान बनाएगा, बल्कि भविष्य के आर्थिक झटकों के खिलाफ एक सुरक्षा कवच भी प्रदान करेगा। 2026 का भारत शिखर सम्मेलन इस दिशा में निर्णायक साबित होगा, बशर्ते सदस्य देश राजनीतिक मतभेदों को पीछे छोड़कर तकनीकी और आर्थिक सहयोग को प्राथमिकता दें।
सामान्य अध्ययन पेपर – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध
भूमिका
जनवरी 2026 में संयुक्त अरब अमीरात के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान की नई दिल्ली यात्रा ने भारत की 'पश्चिम एशिया नीति' को एक नई गति प्रदान की है। एक ओर जहाँ वैश्विक व्यापारिक संबंधों में 'संरक्षणवाद' और 'टैरिफ युद्ध' का प्रभाव बढ़ रहा है, वहीं दूसरी ओर भारत और यूएई ने अपने द्विपक्षीय व्यापार को वर्ष 2032 तक दोगुना कर 200 अरब डॉलर करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है।
ऊर्जा सुरक्षा: LNG समझौता और ADNOC-HPCL साझेदारी
इस यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम 3 अरब डॉलर का 'तरलीकृत प्राकृतिक गैस' (LNG) आपूर्ति समझौता है:
- दीर्घकालिक स्थिरता: अबू धाबी की सरकारी तेल कंपनी (ADNOC) और भारत की हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन (HPCL) के बीच 10 वर्ष का समझौता हुआ है, जो 2028 से प्रभावी होगा।
- भारत का प्रभुत्व: इस सौदे के साथ भारत, यूएई की LNG का सबसे बड़ा वैश्विक ग्राहक बन जाएगा, जो 2029 तक यूएई की कुल LNG बिक्री का 20% साझा करेगा।
- रणनीतिक महत्व: यह समझौता भारत की ऊर्जा टोकरी में विविधता लाने और जीवाश्म ईंधन से स्वच्छ ऊर्जा की ओर संक्रमण के लक्ष्य के अनुकूल है।
व्यापारिक विविधीकरण: अमेरिका बनाम वैकल्पिक मार्ग
भारत की कूटनीति में यह बदलाव एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है:
- अमेरिकी टैरिफ का प्रभाव: अमेरिका द्वारा भारतीय निर्यातों पर लगाए गए दंडात्मक टैरिफ और एक व्यापक व्यापार समझौते की अनिश्चितता ने भारत को वैकल्पिक बाजारों की खोज के लिए प्रेरित किया है।
- बहु-आयामी साझेदारी: भारत ने केवल यूएई ही नहीं, बल्कि ब्रिटेन, ओमान और न्यूजीलैंड के साथ भी व्यापारिक समझौतों (FTAs/CEPA) के माध्यम से अपनी वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को सुरक्षित करने का प्रयास किया है।
भू-राजनीतिक विश्लेषण
यह समझौता भारत के लिए केवल आर्थिक लाभ तक सीमित नहीं है, इसके कई सामरिक आयाम हैं:
- सामरिक स्वायत्तता: महाशक्तियों (अमेरिका-चीन) के बीच बढ़ते तनाव के बीच भारत मध्य-पूर्व की शक्तियों के साथ सीधे और सुदृढ़ संबंध स्थापित कर अपनी कूटनीतिक स्वायत्तता को पुख्ता कर रहा है।
- लघु-पक्षीय कूटनीति: भारत-यूएई के मजबूत संबंध I2U2 (भारत, इजरायल, अमेरिका, यूएई) और भारत-मध्य पूर्व-यूरोप गलियारा (IMEC) जैसे समूहों की सफलता के लिए आधारभूत स्तंभ हैं।
- प्रवासी हित और प्रेषण: यूएई में रहने वाले 35 लाख भारतीयों के आर्थिक हितों और भारत की विदेशी मुद्रा प्राप्ति के लिए यह स्थिरता अनिवार्य है।
चुनौतियाँ और सीमाएँ
- क्षेत्रीय अस्थिरता: यमन संकट और लाल सागर में तनाव जैसे मुद्दे अभी भी व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा के लिए चुनौती बने हुए हैं।
- प्रतिस्पर्धा: खाड़ी के अन्य देश (जैसे सऊदी अरब) भी भारत के साथ ऊर्जा क्षेत्र में बड़े निवेश के लिए प्रयासरत हैं, जिससे भारत को एक जटिल संतुलन साधना होगा।
निष्कर्ष
भारत और यूएई के बीच 'नियमित उच्च-स्तरीय संवाद' अब एक नई सामान्य स्थिति बन चुकी है। यह दर्शाता है कि भारत की विदेश नीति अब केवल 'प्रतिक्रियात्मक' नहीं बल्कि 'सक्रिय' और 'परिणाम-उन्मुख' है। 200 अरब डॉलर के व्यापार लक्ष्य की प्राप्ति के लिए दोनों देशों को गैर-तेल व्यापार, डिजिटल भुगतान और रक्षा विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में भी सहयोग को और गहरा करना होगा।
सामान्य अध्ययन पेपर – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध
भूमिका:
वर्ष 2026 भारतीय कूटनीति के लिए एक युगांतरकारी वर्ष है। 26 जनवरी को 'कर्तव्य पथ' पर यूरोपीय संघ (EU) के संस्थागत नेतृत्व को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित करना इस बात का उद्घोष है कि भारत अब पारंपरिक द्विपक्षीय सीमाओं को तोड़कर 'डिप्लोमैटिक व्हाइट स्पेसेस' (कूटनीतिक रिक्त स्थान) को भरने के लिए तैयार है। यह एक ऐसी रणनीति है जहाँ भारत 'बहु-संरेखण' के माध्यम से एक विभाजित दुनिया में अपनी स्थिति सुदृढ़ कर रहा है।
सहयोगवाद से वर्चस्ववाद: बदलता वैश्विक परिदृश्य
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की 'नियम-आधारित व्यवस्था' अब पतन की ओर है। वैश्विक राजनीति 'सहयोग' से हटकर पुनः 'वर्चस्व' और 'संरक्षणवाद' की ओर मुड़ गई है।
- अमेरिका की टैरिफ कूटनीति: अमेरिका अब आर्थिक शक्ति को एक हथियार की तरह उपयोग कर रहा है। डॉलर के विकल्प की तलाश करने वाले देशों पर 'टैरिफ' की धमकी और वेनेजुएला व ईरान जैसे देशों पर कठोर प्रतिबंधों ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को बाधित किया है।
- चीन का विस्तारवाद: चीन की 'वुल्फ वारियर' कूटनीति और बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के माध्यम से ऋण-जाल कूटनीति ने छोटे देशों की संप्रभुता के लिए खतरा पैदा कर दिया है।
बहुपक्षीय मंचों का संकट
संयुक्त राष्ट्र (UN) और विश्व व्यापार संगठन (WTO) जैसे विशाल मंच वर्तमान में अपनी प्रासंगिकता खोते नजर आ रहे हैं:
- यूक्रेन और गाजा संकट में UN सुरक्षा परिषद की विफलता ने यह सिद्ध कर दिया है कि ये मंच महाशक्तियों के 'वीटो' की राजनीति के बंधक हैं।
- जब बड़े मंच विफल होते हैं, तब भारत के लिए सफलता की संभावना 'लघु मंचों' में निहित होती है।
'डिप्लोमैटिक व्हाइट स्पेसेस' और लघु मंचों की रणनीति
'व्हाइट स्पेसेस' वे क्षेत्र हैं जहाँ कोई नियम स्पष्ट नहीं हैं (जैसे- AI नैतिकता, डेटा संप्रभुता, अंतरिक्ष कूटनीति)। भारत इन रिक्त स्थानों को भरने के लिए 'स्मॉल टेबल्स' का उपयोग कर रहा है:
- I2U2, क्वाड, और इंडिया -यूरोपियन यूनियन: ये मंच भारत को निर्णय लेने में स्वायत्तता और गति प्रदान करते हैं।
- चाबहार और आईएम्ईसी: ईरान के चाबहार बंदरगाह और 'भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा' (IMEC) के माध्यम से भारत अमेरिका-चीन के द्वंद्व के बीच अपना स्वतंत्र व्यापारिक मार्ग प्रशस्त कर रहा है, भले ही उसे अमेरिकी प्रतिबंधों (CAATSA) की चुनौतियों का सामना करना पड़े।
चीन और रूस के साथ संतुलन का समीकरण
भारत की विदेश नीति 'शून्य-संचय खेल' नहीं है:
- आरआईसी (रूस-भारत-चीन) बनाम क्वाड: भारत एक ओर रूस के साथ अपनी 'विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त' साझेदारी को बनाए हुए है, वहीं दूसरी ओर चीन को हिंद महासागर में प्रतिसंतुलित करने के लिए अमेरिका के साथ 'क्वाड' में सक्रिय है।
- आर्कटिक और ग्रीनलैंड: ग्रीनलैंड के संसाधनों पर अमेरिका-चीन की नज़र के बीच भारत अपनी 'आर्कटिक नीति' के माध्यम से भविष्य की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित कर रहा है।
वर्चस्ववाद के बीच भारत: 'विश्व मित्र' और 'ब्रिजिंग पावर'
भारत स्वयं को एक 'समाधान प्रदाता' के रूप में पेश कर रहा है:
- ब्रिक्स में संतुलन: रूस और चीन ब्रिक्स को 'पश्चिम-विरोधी' बनाना चाहते हैं, लेकिन भारत इसे 'गैर-पश्चिम' रखते हुए ग्लोबल साउथ की आवाज बना रहा है।
- आर्थिक संप्रभुता: अमेरिकी टैरिफ और डॉलर के वर्चस्व से बचने के लिए भारत अपनी डिजिटल मुद्रा और 'स्थानीय मुद्रा व्यापार' (LCT) को बढ़ावा दे रहा है।
आगे की राह
भारत के लिए आगामी समय 'रणनीतिक स्वायत्तता' की कठोर परीक्षा का होगा:
- संस्थागत क्षमता: लघु मंचों पर प्रभावी नेतृत्व के लिए भारत को अपने राजनयिक कोर और तकनीकी विशेषज्ञों की संख्या बढ़ानी होगी।
- आर्थिक आत्मनिर्भरता: टैरिफ युद्ध के इस युग में 'आत्मनिर्भर भारत' केवल एक नारा नहीं बल्कि सुरक्षा की ढाल है।
- परिणाम-आधारित कूटनीति: भारत को केवल चर्चाओं तक सीमित न रहकर चाबहार और AI इम्पैक्ट समिट जैसे प्रोजेक्ट्स से ठोस परिणाम निकालने होंगे।
निष्कर्ष
2026 का भारत कूटनीति के पुराने ढर्रे को त्याग चुका है। वर्चस्ववाद की चक्की में पिसती दुनिया के लिए भारत एक 'ब्रिजिंग पावर' के रूप में उभरा है। 'कर्तव्य पथ' पर यूरोपीय संघ का स्वागत इस बात का प्रतीक है कि भारत अब वैश्विक मेज पर केवल एक प्रतिभागी नहीं, बल्कि उन नियमों का निर्माता बनने की दिशा में अग्रसर है, जो एक न्यायपूर्ण और बहु-ध्रुवीय विश्व व्यवस्था का निर्माण करेंगे।