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समाचार
- दो नए स्थल: हाल ही में गुजरात के कच्छ स्थित 'छारी-ढंड' और उत्तर प्रदेश के एटा स्थित 'पटना पक्षी अभयारण्य' को अंतर्राष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमियों (रामसर साइट्स) के रूप में मान्यता दी गई है।
- पीएम की सराहना: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस उपलब्धि पर बधाई देते हुए कहा कि यह मान्यता जैव विविधता के संरक्षण और पारिस्थितिक तंत्र की रक्षा के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाती है।
- विशेषता: ये स्थल न केवल प्रवासी पक्षियों का घर हैं, बल्कि चिंकारा, भेड़िये और मरुस्थलीय लोमड़ियों जैसे जीवों के लिए भी महत्वपूर्ण आवास प्रदान करते हैं।
रामसर कन्वेंशन क्या है?
- यह आर्द्रभूमियों के संरक्षण और उनके संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय संधि है।
- इस संधि पर 2 फरवरी 1971 को ईरानी शहर रामसर में हस्ताक्षर किए गए थे, इसीलिए इसे 'रामसर कन्वेंशन' कहा जाता है।
- दुनिया भर में आर्द्रभूमियों के पारिस्थितिक तंत्र को नष्ट होने से बचाना, क्योंकि इन्हें "पृथ्वी के गुर्दे" के रूप में जाना जाता है जो जल को शुद्ध करने और बाढ़ नियंत्रण में मदद करते हैं।
भारत में वर्तमान रामसर साइट्स
कुल संख्या: इन दो नए स्थलों के जुड़ने के बाद भारत में रामसर साइट्स की कुल संख्या 98 हो गई है।
विस्तार: 2014 में भारत में केवल 26 रामसर साइट्स थीं। पिछले एक दशक में इसमें 276% से अधिक की वृद्धि हुई है।
सर्वाधिक साइट्स वाला राज्य: वर्तमान में तमिलनाडु (18) सबसे अधिक रामसर साइट्स वाला राज्य है, जिसके बाद उत्तर प्रदेश (11) का स्थान आता है।
संदर्भ
हाल ही में वैश्विक भू-राजनीति और समुद्री सुरक्षा के संदर्भ में चीन द्वारा विवादित जलक्षेत्र में अपनी सैन्य उपस्थिति को आक्रामक रूप से बढ़ाने की खबरें चर्चा का विषय बनी हुई हैं।
वर्तमान समाचार
- सरकारी मीडिया (CCTV) की रिपोर्ट के अनुसार, चीन के कोस्ट गार्ड ने पिछले पांच वर्षों में सेनकाकू द्वीपों के आसपास कुल 134 गश्त आयोजित की हैं।
- इस दौरान चीन ने 5,50,000 जहाजों और 6,000 विमानों की विशाल तैनाती की है। विशेष रूप से वर्ष 2025 में, चीन ने साल के 357 दिन इस क्षेत्र में गश्त की, जो इस विवादित क्षेत्र पर अपना प्रभुत्व जमाने की बीजिंग की सोची-समझी रणनीति को दर्शाता है।
सेनकाकू द्वीप: स्थान और प्रशासनिक स्थिति
- यह निर्जन द्वीपों का एक समूह है, जो पूर्वी चीन सागर में स्थित है। यह जापान के ओकिनावा के पश्चिम और चीन के मुख्य भूभाग के पूर्व में स्थित है।
- जापान में इन्हें 'सेनकाकू' कहा जाता है, जबकि चीन इन्हें 'दियाओयू' और ताइवान इन्हें 'तियाओयुताई' के नाम से पुकारता है।
- वर्तमान में ये द्वीप जापान के प्रशासनिक नियंत्रण में हैं। जापान का तर्क है कि 1895 से ये उसके क्षेत्र का हिस्सा हैं, जबकि चीन 1970 के दशक से इन पर अपना ऐतिहासिक दावा पेश करता रहा है।
द्वीप का महत्व
- रणनीतिक स्थिति: यह द्वीप समूह प्रमुख समुद्री व्यापार मार्गों के निकट स्थित है, जो सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- प्राकृतिक संसाधन: इन द्वीपों के आसपास के समुद्र में मछली पकड़ने के समृद्ध क्षेत्र हैं। इसके अतिरिक्त, समुद्री तल के नीचे तेल और प्राकृतिक गैस के विशाल भंडार होने की संभावना है।
- विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ): इन द्वीपों पर नियंत्रण का अर्थ है एक विशाल विशेष आर्थिक क्षेत्र पर अधिकार, जो किसी भी देश की आर्थिक शक्ति को बढ़ा सकता है।
भारत एवं सेनकाकू द्वीप:
- यद्यपि भारत इस क्षेत्रीय विवाद में सीधे तौर पर शामिल नहीं है, लेकिन 'इंडो-पैसिफिक' क्षेत्र की स्थिरता भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- चीन की यह 'सैलमी स्लाइसिंग' (धीरे-धीरे क्षेत्र पर कब्जा करने की रणनीति) भारत के लिए चिंता का विषय है, क्योंकि इसी तरह का आक्रामक व्यवहार भारत की हिमालयी सीमाओं और हिंद महासागर में भी देखा जाता है।
निष्कर्ष:
सेनकाकू द्वीप पर बढ़ता तनाव अंतरराष्ट्रीय नियमों पर आधारित समुद्री व्यवस्था के लिए एक चुनौती है। भारत एक स्वतंत्र, खुले और समावेशी इंडो-पैसिफिक का पक्षधर है। जापान के साथ भारत की प्रगाढ़ रणनीतिक साझेदारी को देखते हुए, भारत इस क्षेत्र में शांतिपूर्ण समाधान और 'यथास्थिति' को बनाए रखने का समर्थन करता है, ताकि वैश्विक व्यापार और सुरक्षा निर्बाध रूप से जारी रहे।
न्यूज़
- हाल ही में 22 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने शिक्षा मंत्रालय के सुझावों पर प्रतिक्रिया देते हुए केंद्र सरकार से PM पोषण योजना के तहत काम करने वाले रसोइयों और सहायकों के मानदेय को बढ़ाने का आग्रह किया है।
- वर्तमान में यह मानदेय काफी समय से स्थिर है, और राज्य सरकारों का तर्क है कि बढ़ती महंगाई के कारण इसे संशोधित करना अनिवार्य है।
- सरकार ने मुद्रास्फीति को ध्यान में रखते हुए PM पोषण बास्केट के लिए 'सामग्री लागत' में 9.5% की वृद्धि का प्रावधान किया था, जो वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए लागू है।
- नए बजट सत्र से पहले इस लागत और केंद्र-राज्य के बीच फंड शेयरिंग (60:40) की समीक्षा की जा रही थी
प्रधानमंत्री पोषण योजना
- पूर्ण नाम और पुनर्संरचना: इसका पूरा नाम 'प्रधानमंत्री पोषण शक्ति निर्माण' है। सितंबर 2021 में केंद्र सरकार ने पूर्ववर्ती 'मिड-डे मील योजना' को अगले 5 वर्षों (2021-22 से 2025-26) के लिए नया स्वरूप देते हुए इसका नाम बदल दिया था।
- नोडल मंत्रालय: यह शिक्षा मंत्रालय द्वारा संचालित एक केंद्र प्रायोजित योजना है। इसमें केंद्र और राज्यों के बीच लागत का बंटवारा सामान्य राज्यों के लिए 60:40 और उत्तर-पूर्वी राज्यों/हिमालयी राज्यों के लिए 90:10 के अनुपात में होता है।
- लाभार्थी: यह योजना सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों के कक्षा 1 से 8 तक के बच्चों को कवर करती है। नए प्रारूप में अब इसमें 'बालवाटिका' (प्री-प्राइमरी कक्षाओं) के बच्चों को भी शामिल किया गया है।
- मुख्य विशेषताएं:
- तिथि भोजन: सामुदायिक भागीदारी को बढ़ावा देना, जहाँ लोग विशेष अवसरों पर बच्चों को अतिरिक्त पौष्टिक भोजन प्रदान करते हैं।
- पोषण वाटिका: स्कूलों में ताजी सब्जियां और फल उगाने के लिए छोटे बगीचे विकसित करना।
- सोशल ऑडिट: योजना के पारदर्शी क्रियान्वयन के लिए बाहरी एजेंसियों द्वारा ऑडिट अनिवार्य किया गया है।
- DBT (डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर): खाना पकाने की लागत और मानदेय का भुगतान सीधे संबंधित खातों में सुनिश्चित करना।
निष्कर्ष:
PM पोषण योजना का लक्ष्य न केवल बच्चों की स्कूल में उपस्थिति और नामांकन बढ़ाना है, बल्कि देश के भविष्य (बच्चों) में कुपोषण की समस्या को जड़ से समाप्त करना है। आगामी बजट में इसके आवंटन में वृद्धि भारत के 'सक्षम भारत-सशक्त भारत' के संकल्प को और मजबूती देगी।
संदर्भ:
भारत के आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26 ने पहली बार 'पावर गैप इंडेक्स' का संदर्भ देते हुए भारत की वैश्विक स्थिति पर एक गंभीर बहस छेड़ दी है। सर्वेक्षण के अनुसार, भारत एक 'रणनीतिक विरोधाभास' का सामना कर रहा है।
पावर गैप इंडेक्स क्या है?
- यह सिडनी स्थित लोवी इंस्टीट्यूट द्वारा जारी 'एशिया पावर इंडेक्स' का एक विश्लेषणात्मक हिस्सा है।
- यह सूचकांक किसी देश की 'शक्ति दक्षता' को मापता है। यह बताता है कि एक देश अपने संसाधनों (धन और सेना) को वास्तविक क्षेत्रीय प्रभाव (कूटनीति और नेटवर्क) में कितनी कुशलता से बदल पाता है।
- शक्ति अंतराल = व्यापक शक्ति स्कोर – प्रत्याशित शक्ति स्कोर
- संकेत:
- धनात्मक (+) स्कोर: 'स्मार्ट पावर' या अपनी क्षमता से अधिक प्रदर्शन करने वाला (जैसे ऑस्ट्रेलिया +8.0)।
- ऋणात्मक (-) स्कोर: 'अप्रतिपादित क्षमता' या अपनी क्षमता से कम प्रदर्शन करने वाला।
भारत की वर्तमान स्थिति: 'प्रमुख शक्ति' बनाम 'अल्प-प्रदर्शन'
एशिया पावर इंडेक्स 2025 में भारत के आंकड़े एक मिश्रित तस्वीर पेश करते हैं:
मानक | भारत की स्थिति | विवरण |
रैंकिंग | तीसरी (3rd) | अमेरिका और चीन के बाद सबसे शक्तिशाली देश। |
व्यापक शक्ति स्कोर | 40.0 / 100 | पहली बार ‘मेजर पावर' की श्रेणी में प्रवेश। |
पावर गैप स्कोर | -4.0 | एशिया में सबसे कम (रूस और उत्तर कोरिया को छोड़कर)। |
रणनीतिक विरोधाभास: भारत अब एक 'मेजर पावर' है, लेकिन इसका नकारात्मक स्कोर (-4.0) यह दर्शाता है कि भारत अपनी पूर्ण रणनीतिक क्षमता का उपयोग नहीं कर पा रहा है।
भारत के पिछड़ने के मुख्य कारण
सर्वेक्षण के अनुसार, भारत संसाधन के मामले में मजबूत है लेकिन प्रभाव के मामले में कमजोर:
- आर्थिक संबंधों की कमी (9वीं रैंक): भारत की जीडीपी बड़ी है, लेकिन वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और व्यापारिक संबंधों में हम चीन या वियतनाम जितने एकीकृत नहीं हैं।
- रक्षा नेटवर्क की कमजोरी (11वीं रैंक): विशाल सेना के बावजूद, क्षेत्रीय रक्षा गठबंधन और सैन्य कूटनीति में भारत का प्रभाव अभी भी विकसित हो रहा है।
- सॉफ्ट पावर में गिरावट: ग्लोबल सॉफ्ट पावर इंडेक्स 2026 में भारत 32वें स्थान पर खिसक गया है। इसका कारण सुशासन और सतत विकास संकेतकों में धीमी गति को माना गया है।
आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 का 'कॉल टू एक्शन'
आर्थिक सर्वेक्षण ने भारत के लिए भविष्य की राह सुझाई है:
- स्थिरता का प्रदाता: भारत को केवल बाहरी झटकों से बचने वाला देश नहीं, बल्कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता और अवसर प्रदान करने वाला 'नेट सुरक्षा प्रदाता' बनना होगा।
- विकसित भारत का लक्ष्य: 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने के लिए घरेलू क्षमताओं को वैश्विक उत्पादन प्रणालियों के साथ जोड़ना अनिवार्य है।
- कूटनीतिक फोकस: रक्षा नेटवर्क और आर्थिक संबंधों में सुधार करना अब भारत की प्राथमिकता होनी चाहिए।
निष्कर्ष
पावर गैप इंडेक्स यह स्पष्ट करता है कि केवल आर्थिक या सैन्य आकार काफी नहीं है। भारत के लिए असली चुनौती अपनी हार्ड पावर (संसाधन) को स्मार्ट पावर (प्रभाव) में बदलने की है। जब तक भारत अपने नकारात्मक अंतराल (-4.0) को कम नहीं करता, तब तक वह अपनी वास्तविक रणनीतिक क्षमता का पूर्ण लाभ नहीं उठा पाएगा।
संदर्भ
भारत के घास के मैदानों से एक नन्हा जीव तेजी से विलुप्त हो रहा है, जिसे हम पिग्मी हॉग के नाम से जानते हैं। हालिया रिपोर्टों और 'पिग्मी हॉग संरक्षण कार्यक्रम' (PHCP) के आंकड़ों के अनुसार, यह जीव अब केवल असम के कुछ सीमित क्षेत्रों तक सिमट कर रह गया है। पारिस्थितिकी तंत्र के लिए इसकी महत्ता को देखते हुए संरक्षणवादी इसे बचाने के लिए "मिशन मोड" में काम कर रहे हैं।
पिग्मी हॉग के बारे में: अद्वितीय विशेषताएं
- दुनिया में सबसे छोटा: यह दुनिया का सबसे छोटा और दुर्लभ जंगली सूअर है। एक वयस्क पिग्मी हॉग की ऊंचाई मात्र 25 सेमी (लगभग 10 इंच) होती है।
- इंजीनियर और निर्माता: यह उन गिने-चुने स्तनधारियों में से एक है जो अपना घर या 'घोंसला' खुद बनाता है, जिसमें घास की एक पूरी 'छत' भी होती है।
- संकेतक प्रजाति: पिग्मी हॉग की उपस्थिति उस क्षेत्र के घास के मैदानों के स्वास्थ्य का प्रमाण होती है। यदि पिग्मी हॉग सुरक्षित हैं, तो इसका अर्थ है कि वहां का पारिस्थितिकी तंत्र संतुलित है।
चर्चा में क्यों?
- पुनरुद्धार कार्यक्रम: जनवरी 2026 तक की रिपोर्ट के अनुसार, 'पिग्मी हॉग संरक्षण कार्यक्रम' (PHCP) ने अब तक लगभग 179 से अधिक बंधक-प्रजनित पिग्मी हॉग्स को असम के सुरक्षित क्षेत्रों में सफलतापूर्वक वापस छोड़ा है।
- अफ़्रीकी स्वाइन फीवर (ASF) का खतरा: वर्तमान में इन जीवों पर 'अफ्रीकी स्वाइन फीवर' का बड़ा खतरा मंडरा रहा है, जिससे उनकी पूरी आबादी के नष्ट होने का डर है। प्रशासन इनके संरक्षण केंद्रों पर कड़ी 'बायो-सिक्योरिटी' लागू कर रहा है।
आवास और वर्तमान स्थिति
पिग्मी हॉग को नदी के किनारे वाले ऐसे घास के मैदान पसंद हैं जहाँ मानवीय हस्तक्षेप कम हो और जहाँ ऊँची व घनी घास (जैसे हाथी घास) मौजूद हो।
- वर्तमान ठिकाना: ऐतिहासिक रूप से यह हिमालय की तलहटी में उत्तर प्रदेश से लेकर असम तक पाया जाता था, लेकिन वर्तमान में यह केवल असम के मानस और ओरांग राष्ट्रीय उद्यानों तक ही सीमित रह गया है।
पारिस्थितिक भूमिका
यह नन्हा जीव घास के मैदानों के लिए किसी 'माली' से कम नहीं है:
- मिट्टी का वातन: यह अपनी थूथन से जड़ों, कंदों और कीड़ों के लिए खुदाई करता है, जिससे मिट्टी में हवा का संचार बढ़ता है और उसकी गुणवत्ता में सुधार होता है।
- बीज प्रसार: यह विभिन्न जंगली फलों और बीजों को खाता है, जिससे बीजों के फैलाव और नई वनस्पतियों के उगने में मदद मिलती है।
संरक्षण स्थिति
पिग्मी हॉग को लुप्तप्राय होने से बचाने के लिए उच्चतम स्तर की सुरक्षा प्राप्त है:
- IUCN रेड लिस्ट: अति संकटग्रस्त
- वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972: अनुसूची-I यह भारत में किसी भी वन्यजीव को दी जाने वाली सर्वोच्च कानूनी सुरक्षा है।
- CITES: परिशिष्ट-I
अस्तित्व पर मंडराते खतरे
- आवास का विनाश: कृषि और बस्तियों के लिए घास के मैदानों का लगातार कटना।
- अवैध चराई: मवेशियों द्वारा घास के मैदानों का अत्यधिक दोहन।
- घास जलाना: शुष्क मौसम में घास के मैदानों में अनियंत्रित आग लगाने से इनके घोंसले और जीवन नष्ट हो जाते हैं।
निष्कर्ष
पिग्मी हॉग केवल एक जानवर नहीं, बल्कि हमारे घास के मैदानों के स्वास्थ्य का "बैरोमीटर" है। यदि यह विलुप्त होता है, तो पूरा ग्रासलैंड इकोसिस्टम खतरे में पड़ जाएगा। कुड्डालोर या असम जैसे क्षेत्रों में चल रही संरक्षण पहलें यह दर्शाती हैं कि सामूहिक प्रयासों से हम इन 'अदृश्य नायकों' को विलुप्त होने की कगार से वापस ला सकते हैं।
विंग्स इंडिया 2026
'विंग्स इंडिया 2026' एशिया का सबसे बड़ा नागरिक उड्डयन कार्यक्रम है। इसका आयोजन नागरिक उड्डयन मंत्रालय, भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (AAI) और फिक्की (FICCI) के सहयोग से किया गया। यह आयोजन हैदराबाद के ऐतिहासिक बेगमपेट हवाई अड्डे पर 28 से 31 जनवरी, 2026 तक चला। इसका मुख्य उद्देश्य भारत को दुनिया का प्रमुख विमानन हब बनाना और उद्योग के सभी हितधारकों को एक वैश्विक मंच प्रदान करना है।
वर्तमान समाचार और प्रमुख सुर्खियाँ
विंग्स इंडिया 2026 से जुड़ी हालिया और सबसे महत्वपूर्ण खबरें निम्नलिखित हैं:
- उद्घाटन सत्र: केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री राममोहन नायडू ने कार्यक्रम का औपचारिक शुभारंभ किया। उन्होंने घोषणा की कि भारत अब विमानों का केवल खरीदार नहीं, बल्कि 'निर्माता' बनने की ओर अग्रसर है।
- रूस की भागीदारी: रूस ने अपने अत्याधुनिक विमानों SJ-100 और Il-114-300 का प्रदर्शन किया, जिससे भारत-रूस विमानन सहयोग के नए रास्ते खुले हैं।
- एयर इंडिया की बड़ी डील: एयर इंडिया ने 30 अतिरिक्त बोइंग नैरो-बॉडी विमानों का ऑर्डर देकर अपने कुल ऑर्डर को लगभग 600 विमानों तक पहुँचा दिया है।
- मेक इन इंडिया: 'शक्ति ग्रुप' और 'ओम्निपोल' ने 19-सीटर विमानों के भारत में निर्माण के लिए समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए।
पुरस्कार वितरण: उत्तराखंड को मिला "सर्वश्रेष्ठ राज्य" का पुरस्कार
इस वर्ष के 'विंग्स इंडिया अवॉर्ड्स' में उत्तराखंड ने बाजी मारी:
- सम्मान: उत्तराखंड को “विमानन पारिस्थितिकी तंत्र को बढ़ावा देने के लिए सर्वश्रेष्ठ राज्य” के राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजा गया।
- कारण: मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में राज्य ने 'उड़ान' (UDAN) योजना को सफलतापूर्वक लागू किया, नए हेलीपोर्ट्स बनाए और दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों में हवाई कनेक्टिविटी को सुलभ बनाया।
- अन्य पुरस्कार: दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे (IGIA) को 'सर्वश्रेष्ठ हवाई अड्डा' का पुरस्कार मिला।
आयोजन की मुख्य बातें
- थीम: "भारतीय विमानन: भविष्य का मार्ग प्रशस्त करना – डिज़ाइन से तैनाती, विनिर्माण से रखरखाव, समावेशिता से नवाचार और सुरक्षा से स्थिरता तक।"
- एयरोबेटिक प्रदर्शन: भारतीय वायुसेना की 'सूर्य किरण' टीम और ब्रिटेन की 'मार्क जेफरीज ग्लोबल स्टार्स' टीम ने आसमान में रोमांचक करतब दिखाए।
- प्रदर्शन: आयोजन में लगभग 34 से अधिक विमानों और हेलीकॉप्टरों का 'स्टैटिक डिस्प्ले' किया गया।
- वैश्विक सहभागिता: 20 से अधिक देशों के मंत्रियों और प्रतिनिधियों ने इस शिखर सम्मेलन में भाग लिया।
भविष्य का फोकस
विंग्स इंडिया 2026 ने भारतीय विमानन के लिए भविष्य की दिशा तय की है:
- MRO हब: भारत को विमानों के रखरखाव, मरम्मत और ओवरहॉल (MRO) के लिए वैश्विक केंद्र के रूप में विकसित करना।
- स्थायित्व: 'सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल' (SAF) और ग्रीन एयरपोर्ट्स को बढ़ावा देकर कार्बन उत्सर्जन कम करना।
- एडवांस एयर मोबिलिटी (AAM): ड्रोन टैक्सी और इलेक्ट्रिक वर्टिकल टेक-ऑफ (eVTOL) विमानों के लिए बुनियादी ढांचा तैयार करना।
- कौशल विकास: अगले 5 वर्षों में 115 से अधिक विमानन पेशेवरों को वैश्विक नेतृत्व के लिए प्रशिक्षित करना।
निष्कर्ष:
विंग्स इंडिया 2026 ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारतीय आसमान अब 'अनंत संभावनाओं' से भरा है और भारत वैश्विक विमानन क्षेत्र में नेतृत्व करने के लिए पूरी तरह तैयार है।
सामान्य अध्ययन पेपर – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध
सामान्य अध्ययन पेपर – III प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन
संदर्भ
भारत में सड़क दुर्घटनाओं का इतिहास विकास और विस्थापन की एक दुखद कहानी रहा है। 1960 के दशक में जहाँ वाहनों की संख्या सीमित थी, वहीं 21वीं सदी में वाहनों के विस्फोट ने सड़कों को 'डेथ ट्रैप' में बदल दिया है। पिछले एक दशक में भारत ने बुनियादी ढांचे (एक्सप्रेसवेज और हाइवेज) में अभूतपूर्व प्रगति की है, लेकिन उसी अनुपात में दुर्घटनाओं की दर में कमी नहीं आई है। 'ब्रासीलिया घोषणापत्र' पर हस्ताक्षर करने के बावजूद, भारत वैश्विक सड़क मृत्यु दर में शीर्ष पर बना हुआ है, जो हमारी नीतिगत और व्यवहारिक विफलताओं को दर्शाता है।
भारत में सड़क दुर्घटनाएं:
- सड़क दुर्घटना भारत में अकाल मृत्यु का सबसे बड़ा कारण बनकर उभरी है।
- भारत के पास दुनिया के कुल वाहनों का मात्र 1% है, लेकिन दुनिया की कुल सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों का 11% हिस्सा भारत में होता है।
- यह दर्शाता है कि हमारी सड़कें प्रति वाहन के हिसाब से दुनिया में सबसे अधिक असुरक्षित हैं।
चर्चा में क्यों?
1 जनवरी 2026 का दिन भारत के लिए एक राष्ट्रीय शोक की तरह रहा। नए साल के जश्न के दौरान देश भर में 400 से अधिक सड़क दुर्घटनाएं दर्ज की गईं, जिनमें 150 से अधिक लोगों ने अपनी जान गंवाई।
- मध्य प्रदेश: अकेले एमपी में 100 से अधिक दुर्घटनाएं हुईं, जहाँ कटनी और सिवनी में मासूम बच्चों सहित 8 लोगों की मौत हुई।
- उत्तर भारत: घने कोहरे के कारण NH-44 और यमुना एक्सप्रेसवे पर दर्जनों वाहन आपस में टकराए।
- प्रमुख कारण: नशे में ड्राइविंग तेज रफ्तार और कोहरे के दौरान सुरक्षा मानकों की अनदेखी इस दिन की चर्चा का मुख्य केंद्र रहे।
आंकड़ों का आईना: NCRB और अन्य रिपोर्ट
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो और सड़क परिवहन मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट के आधार पर स्थिति निम्नलिखित है:
- सालाना मौतें: भारत में हर साल लगभग 1.5 लाख से 1.7 लाख लोग सड़क हादसों में मरते हैं।
- दैनिक औसत: भारत में प्रतिदिन लगभग 450-500 लोग सड़क पर दम तोड़ते हैं, यानी हर 3 मिनट में एक मौत।
- सर्वाधिक प्रभावित वर्ग: मरने वालों में 70% लोग 18 से 45 वर्ष के आयु वर्ग के होते हैं (राष्ट्र की उत्पादक जनसंख्या)।
- वाहन का प्रकार: दोपहिया वाहन सवार (45%) सबसे अधिक असुरक्षित हैं, उसके बाद पैदल चलने वाले लोग आते हैं।
दुर्घटनाओं के कारण और बहुआयामी प्रभाव
कारण:
- मानवीय चूक: ओवरस्पीडिंग (60% से अधिक हादसों का कारण), हेलमेट/सीट बेल्ट न लगाना और ड्राइविंग के दौरान फोन का उपयोग।
- सड़क इंजीनियरिंग: 'ब्लैक स्पॉट्स' (असुरक्षित मोड़), दोषपूर्ण सड़क डिजाइन और खराब रोशनी।
- पर्यावरणीय कारक: कोहरा, भारी बारिश और आवारा पशु।
सामाजिक-आर्थिक प्रभाव: एक इंसान की मृत्यु केवल एक संख्या नहीं है। जब परिवार का एकमात्र कमाने वाला सदस्य मरता है, तो पूरा परिवार आर्थिक संकट और मानसिक आघात में डूब जाता है।
- आर्थिक प्रभाव: सड़क दुर्घटनाओं के कारण भारत की जीडीपी (GDP) को प्रतिवर्ष 3% से 5% का नुकसान होता है।
- मानवीय प्रभाव: बच्चे अनाथ हो जाते हैं, बुजुर्ग बेसहारा हो जाते हैं, और गरीबी का एक दुष्चक्र शुरू हो जाता है।
सरकार के कदम
- मोटर वाहन (संशोधन) अधिनियम, 2019: दंड शुल्क में भारी वृद्धि और कड़े नियमों का प्रावधान।
- राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा माह: हर साल जनवरी में जागरूकता अभियान चलाना।
- इंटीग्रेटेड रोड एक्सीडेंट डेटाबेस (iRAD): दुर्घटनाओं के डेटा का विश्लेषण कर ब्लैक स्पॉट्स की पहचान करना।
- ब्लैक स्पॉट सुधार: सरकार ने हजारों असुरक्षित मोड़ों को सुधारने के लिए विशेष बजट आवंटित किया है।
संवैधानिक प्रावधान
- अनुच्छेद 21: 'जीवन का अधिकार' में सुरक्षित सड़कों पर चलने का अधिकार भी निहित है। राज्य का कर्तव्य है कि वह नागरिकों के जीवन की रक्षा करे।
- सातवीं अनुसूची: सड़क परिवहन 'समवर्ती सूची' का विषय है, इसलिए केंद्र और राज्य दोनों की जिम्मेदारी समान है।
सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय और दिशानिर्देश
- एस. राजशेखरन बनाम भारत संघ: SC ने सड़क सुरक्षा पर एक स्थायी समिति (जस्टिस राधाकृष्णन समिति) का गठन किया।
- गुड सेमेरिटन (नेक फरिश्ता) कानून: न्यायालय ने निर्देश दिया कि दुर्घटना पीड़ितों की मदद करने वाले व्यक्ति को पुलिस या अस्पताल द्वारा परेशान नहीं किया जाएगा।
- शराब की दुकानों पर प्रतिबंध: राजमार्गों से 500 मीटर के दायरे में शराब की दुकानों को हटाने का ऐतिहासिक फैसला।
गहन विश्लेषण
भारत में समस्या 'कानून की कमी' नहीं, बल्कि 'कानून के प्रवर्तन' की है। तकनीक (CCTV, स्पीड सेंसर्स) के बावजूद भ्रष्टाचार और मैन्युअल चेकिंग की सीमाएं दुर्घटनाओं को बढ़ावा देती हैं। साथ ही, भारतीय समाज में 'सड़क शिष्टाचार' का भारी अभाव है। हम सड़क को एक साझा संसाधन के बजाय एक प्रतिस्पर्धा क्षेत्र मानते हैं।
आगे की राह
- 4E रणनीति पर जोर: इंजीनियरिंग (सड़क और वाहन), इमरजेंसी केयर (गोल्डन ऑवर में इलाज), एनफोर्समेंट (कठोर दंड), और एजुकेशन (जागरूकता)।
- स्मार्ट हाईवे: एआई (AI) आधारित ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम का उपयोग।
- एयरबैग और सुरक्षा मानक: सभी वाहनों में न्यूनतम 6 एयरबैग और बेहतर क्रैश टेस्ट रेटिंग अनिवार्य करना।
- सामुदायिक प्राथमिक चिकित्सा: ढाबा मालिकों और स्थानीय लोगों को प्राथमिक चिकित्सा का प्रशिक्षण देना।
निष्कर्ष
सड़क दुर्घटनाएं कोई 'ईश्वरीय घटना' नहीं हैं, बल्कि यह मानवीय और व्यवस्थागत विफलताओं का परिणाम हैं। भारत का लक्ष्य 2030 तक सड़क मौतों को 50% कम करना है, लेकिन यह केवल सरकार के प्रयासों से संभव नहीं है। जब तक प्रत्येक नागरिक सड़क नियमों को अपनी जीवनशैली का हिस्सा नहीं बनाएगा, तब तक हमारी सड़कें रक्त रंजित होती रहेंगी। सुरक्षित सड़क केवल एक बुनियादी ढांचा नहीं, बल्कि एक सभ्य राष्ट्र की पहचान है।
खबर
- "डे ज़ीरो" और संयुक्त राष्ट्र (UN) द्वारा दी गई उस चेतावनी के बारे में है, जो बताती है कि दुनिया—विशेषकर भारत एक गंभीर जल संकट की ओर बढ़ रही है।
- हाल ही में (जनवरी 2026) आई रिपोर्ट्स और UN के आंकड़ों के अनुसार, यह समस्या अब केवल भविष्य की बात नहीं, बल्कि एक वर्तमान वास्तविकता बन गई है। इस पूरी खबर का मुख्य सार नीचे दिया गया है:
डे ज़ीरो क्या है?
"डे ज़ीरो" उस दिन को कहा जाता है जब किसी शहर या क्षेत्र का पानी का स्तर इतना गिर जाता है कि नलों से पानी आना बंद हो जाता है।
- इस स्थिति में अधिकारियों को नलों की सप्लाई काटनी पड़ती है।
- लोगों को पानी के लिए सार्वजनिक टैप या आपातकालीन वितरण केंद्रों पर कतार लगानी पड़ती है, जहाँ पानी की मात्रा सीमित (प्रति व्यक्ति कुछ लीटर) तय कर दी
चर्चा में क्यों है?
- ग्लोबल वॉटर बैंकरप्सी: UN ने जनवरी 2026 में चेतावनी दी है कि दुनिया "वैश्विक जल दिवालियापन" के युग में प्रवेश कर गई है। इसका मतलब है कि हम पानी का इस्तेमाल उसकी पुनर्भरण क्षमता से कहीं ज़्यादा तेज़ी से कर रहे हैं।
- भारत पर खतरा: UN की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, भारत के चेन्नई, दिल्ली, बेंगलुरु और कोलकाता जैसे बड़े शहर 'डे ज़ीरो' के सबसे करीब हैं।
यह संकट क्यों आ रहा है?
UN की 2023 और 2026 की रिपोर्ट्स के अनुसार, इसके पीछे कोई एक कारण नहीं बल्कि कई कारक हैं:
- भूजल का अत्यधिक दोहन: भारत दुनिया में भूजल का सबसे बड़ा उपभोक्ता है। हम जमीन से इतना पानी निकाल रहे हैं कि वह वापस भर नहीं पा रहा।
- शहरीकरण: बिना योजना के बढ़ते शहरों ने झीलों और जल निकायों को खत्म कर दिया है (जैसे बेंगलुरु में 1400+ से घटकर अब केवल 190 के करीब झीलें बची हैं)।
- जलवायु परिवर्तन: बारिश का पैटर्न बदल गया है—कभी बहुत ज़्यादा बारिश तो कभी लंबा सूखा।
- खराब प्रबंधन: पानी की बर्बादी और पाइपलाइनों में लीकेज एक बड़ी समस्या है।
इसके गंभीर परिणाम क्या होंगे?
UN के अनुसार, 'डे ज़ीरो' सिर्फ पानी की समस्या नहीं है, यह एक सामाजिक और आर्थिक आपदा है:
- सार्वजनिक स्वास्थ्य: सफाई और पीने के साफ पानी की कमी से बीमारियां (जैसे हैजा) बढ़ेंगी।
- खाद्य और बिजली संकट: खेती के लिए पानी नहीं होगा और बिजली बनाने वाले प्लांट ठप हो सकते हैं।
- सामाजिक अशांति: पानी के लिए दंगे और समुदायों के बीच संघर्ष बढ़ सकते हैं।
क्या इसे रोका जा सकता है?
UN का कहना है कि 'डे ज़ीरो' अपरिहार्य नहीं है, इसे इन कदमों से रोका जा सकता है:
- रेन वॉटर हार्वेस्टिंग: बारिश के पानी को सहेजना।
- वेस्ट वॉटर रीसाइक्लिंग: इस्तेमाल किए हुए पानी को दोबारा साफ कर इस्तेमाल करना।
- किफायती सिंचाई: खेती में ड्रिप इरिगेशन जैसी तकनीकों का उपयोग।
- जागरूकता: पानी के उपयोग के तरीके में बदलाव।
निष्कर्ष: UN की चेतावनी के अनुसार, 2030 तक भारत की लगभग 40-50% शहरी आबादी गंभीर जल संकट का सामना कर सकती है। यह दशक (2020-2030) यह तय करने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है कि हम इस संकट से बचेंगे या इसका सामना करेंगे।
संदर्भ
भारत रत्न के बाद, पद्म पुरस्कार देश के सबसे प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान हैं। इनकी स्थापना 1954 में की गई थी। प्रारंभ में इन्हें 'पहला वर्ग', 'दूसरा वर्ग' और 'तीसरा वर्ग' कहा जाता था, जिसे बाद में 1955 में बदलकर क्रमशः पद्म विभूषण, पद्म भूषण और पद्म श्री कर दिया गया। 1954 से लेकर आज तक (1978-79 और 1993-97 के संक्षिप्त अंतराल को छोड़कर), ये पुरस्कार प्रत्येक वर्ष गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर घोषित किए जाते हैं। यह सम्मान किसी भी जाति, व्यवसाय, पद या लिंग के भेदभाव के बिना 'विशिष्ट कार्यों' को मान्यता देने के लिए प्रदान किया जाता है।
पद्म पुरस्कार क्या हैं?
पद्म पुरस्कार तीन श्रेणियों में दिए जाते हैं:
- पद्म विभूषण: 'असाधारण और विशिष्ट सेवा' के लिए (यह दूसरा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान है)।
- पद्म भूषण: 'उच्च क्रम की विशिष्ट सेवा' के लिए।
- पद्म श्री: किसी भी क्षेत्र में 'विशिष्ट सेवा' के लिए। ये पुरस्कार कला, सामाजिक कार्य, सार्वजनिक मामले, विज्ञान और इंजीनियरिंग, व्यापार और उद्योग, चिकित्सा, साहित्य, शिक्षा, खेल और नागरिक सेवा जैसे विविध क्षेत्रों में उत्कृष्ट योगदान के लिए दिए जाते हैं।
चर्चा में क्यों?
- हाल ही में भारत सरकार ने वर्ष 2026 के लिए पद्म पुरस्कारों की घोषणा की है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू इस वर्ष कुल 131 व्यक्तियों को इन सम्मानों से नवाजेंगी।
- इस वर्ष की सूची में कला जगत के दिग्गज अभिनेता धर्मेंद्र, क्रिकेट जगत के नायक रोहित शर्मा, अभिनेता आर. माधवन और मलयालम सुपरस्टार ममूटी जैसे नाम शामिल होने के कारण यह विषय राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का केंद्र बना हुआ है।
इन पुरस्कारों का महत्त्व
ये पुरस्कार केवल एक व्यक्ति की उपलब्धि नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण में उनके निस्वार्थ योगदान का प्रतीक हैं। इनका महत्त्व निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है:
- यह 'अनसंग हीरोज' (अनाम नायकों) को पहचान दिलाता है।
- समाज में उत्कृष्टता और नवाचार की संस्कृति को प्रोत्साहित करता है।
- यह राष्ट्रीय एकता और सेवा भाव को सुदृढ़ करता है।
पुरस्कार के स्वरूप
पद्म पुरस्कार प्राप्तकर्ता को निम्नलिखित वस्तुएं प्राप्त होती हैं:
- राष्ट्रपति के हस्ताक्षर और मुहर वाला एक सनद (प्रमाणपत्र)।
- एक पदक जिसे विशिष्ट आयोजनों में पहनने की अनुमति होती है।
- पुरस्कार के साथ कोई नकद राशि, भत्ता या रेल/हवाई यात्रा में छूट जैसी वित्तीय सुविधाएं नहीं दी जाती हैं।
संवैधानिक प्रावधान
- भारत के संविधान के अनुसार, ये पुरस्कार राज्य द्वारा दिए जाने वाले सम्मान हैं। इन्हें अनुच्छेद 18(1) के तहत 'उपाधि' नहीं माना जाता।
- संविधान की सातवीं अनुसूची और सरकार के कार्य संचालन नियमों के तहत, गृह मंत्रालय इन पुरस्कारों का समन्वय करता है।
- पद्म पुरस्कार समिति का गठन प्रतिवर्ष प्रधानमंत्री द्वारा किया जाता है।
पुरस्कार एवं अनुच्छेद 18 विवाद
संविधान का अनुच्छेद 18 'उपाधियों के अंत' की बात करता है। आलोचकों का तर्क था कि ये पुरस्कार लोकतांत्रिक समानता के विरुद्ध हैं और एक नया 'कुलीन वर्ग' पैदा करते हैं। सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय: बालाजी राघवन बनाम भारत संघ (1996) के ऐतिहासिक मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि:
- पद्म पुरस्कार 'उपाधि' नहीं बल्कि 'सम्मान' हैं।
- ये अनुच्छेद 18 का उल्लंघन नहीं करते क्योंकि इनका उपयोग नाम के आगे या पीछे उपसर्ग/प्रत्यय के रूप में नहीं किया जा सकता।
- यदि कोई व्यक्ति इनका उपयोग अपने नाम के साथ करता है, तो उससे यह सम्मान वापस लिया जा सकता है। अतः, यह समानता के अधिकार का उल्लंघन नहीं है बल्कि 'योग्यता' (Merit) का सम्मान है।
वर्ष 2026 का सांख्यिकीय विवरण
वर्ष 2026 में कुल 131 पुरस्कारों की घोषणा की गई है:
- पद्म विभूषण: 05
- पद्म भूषण: 13
- पद्म श्री: 113
राज्यवार वितरण
इस वर्ष भौगोलिक वितरण में विविधता देखी गई है:
- सर्वाधिक विजेता: महाराष्ट्र (15) राज्य प्रथम स्थान पर है।
- द्वितीय: तमिलनाडु (13) पुरस्कारों के साथ।
- अन्य प्रमुख: उत्तर प्रदेश (11), पश्चिम बंगाल (11) और केरल (8)।
- न्यूनतम: पूर्वोत्तर के छोटे राज्यों और कुछ केंद्र शासित प्रदेशों से एकल प्राप्तकर्ता शामिल हैं।
विश्लेषण
2026 की सूची का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि सरकार ने 'लोकतांतिकीकरण' पर जोर दिया है। इसमें न केवल प्रसिद्ध फिल्मी सितारों और खिलाड़ियों को जगह मिली है, बल्कि जमीनी स्तर पर काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं और वैज्ञानिकों को भी प्राथमिकता दी गई है। मरणोपरांत दिए गए पुरस्कार (जैसे धर्मेंद्र और वीएस अच्युतानंदन) उनके दीर्घकालिक प्रभाव को स्वीकार करते हैं।
आगे की राह
भविष्य में, इन पुरस्कारों की नामांकन प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी और डिजिटल बनाने की आवश्यकता है। यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि देश के दूर-दराज के क्षेत्रों में छिपी प्रतिभाएं राजनीति या पहुंच के अभाव में उपेक्षित न रहें।
निष्कर्ष
पद्म पुरस्कार भारतीय संस्कृति और मेधा का गौरव हैं। यद्यपि ये संवैधानिक रूप से उपाधियां नहीं हैं, किंतु ये राष्ट्र की कृतज्ञता का सर्वोच्च माध्यम हैं। वर्ष 2026 की सूची समावेशिता और उत्कृष्टता का एक उत्कृष्ट मेल है, जो आने वाली पीढ़ी को देश सेवा के लिए प्रेरित करती रहेगी।
पद्म विभूषण 2026 विजेता:
क्रम संख्या | नाम | क्षेत्र | राज्य / देश |
1 | श्री धर्मेंद्र सिंह देओल (मरणोपरांत) | कला | महाराष्ट्र |
2 | श्री के टी थॉमस | सार्वजनिक मामले | केरल |
3 | सुश्री एन राजम | कला | उत्तर प्रदेश |
4 | श्री पी नारायणन | साहित्य और शिक्षा | केरल |
5 | श्री वी एस अच्युतानंदन (मरणोपरांत) | सार्वजनिक मामले | केरल |
पद्म भूषण 2026 विजेता:
क्रम संख्या | नाम | क्षेत्र | राज्य / देश |
1 | सुश्री अलका याग्निक | कला | महाराष्ट्र |
2 | श्री भगत सिंह कोश्यारी | सार्वजनिक मामले | उत्तराखंड |
3 | श्री कल्लापट्टी रामासामी पलानीस्वामी | चिकित्सा | तमिलनाडु |
4 | श्री ममूटी | कला | केरल |
5 | डॉ. नोरी दत्तात्रेयुडु | चिकित्सा | संयुक्त राज्य अमेरिका |
6 | श्री पीयूष पांडे (मरणोपरांत) | कला | महाराष्ट्र |
7 | श्री एस के एम मयिलानंदन | सामाजिक कार्य | तमिलनाडु |
8 | श्री शतावरधानी आर गणेश | कला | कर्नाटक |
9 | श्री शिबू सोरेन (मरणोपरांत) | सार्वजनिक मामले | झारखंड |
10 | श्री उदय कोटक | व्यापार और उद्योग | महाराष्ट्र |
11 | श्री वी के मल्होत्रा (मरणोपरांत) | सार्वजनिक मामले | दिल्ली |
12 | श्री वेल्लापल्ली नटेशन | सार्वजनिक मामले | केरल |
13 | श्री विजय अमृतराज | खेल | संयुक्त राज्य अमेरिका |
न्यूज़
- मोज़ाम्बिक की मानवाधिकार कार्यकर्ता और मानवतावादी ग्रासा माशेल (Graca Machel) को वर्ष 2025 के लिए 'इंदिरा गांधी शांति, निरस्त्रीकरण और विकास पुरस्कार' के लिए चुना गया है।
- इंदिरा गांधी मेमोरियल ट्रस्ट ने बुधवार (21 जनवरी, 2026) को इसकी आधिकारिक घोषणा की।
- पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन की अध्यक्षता वाली एक अंतरराष्ट्रीय जूरी ने शिक्षा, स्वास्थ्य और मानवीय कार्यों (विशेष रूप से संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में) में उनके परिवर्तनकारी योगदान के लिए उन्हें इस सम्मान के लिए चुना है।
इस पुरस्कार की मुख्य बातें
- पुरस्कार राशि: इसके तहत ₹1 करोड़ नकद, एक ट्रॉफी और प्रशस्ति पत्र प्रदान किया जाता है।
- ट्रॉफी की विशेषता: यह ट्रॉफी 'बैंडेड हेमेटाइट जैस्पर' पत्थर से बनी है, जो लगभग 2,000 मिलियन वर्ष पुराना माना जाता है।
- इतिहास: इस पुरस्कार की स्थापना 1986 में इंदिरा गांधी की स्मृति में की गई थी।
ग्रासा माशेल को क्यों चुना गया?
ग्रासा माशेल एक वैश्विक स्तर की राजनेता और कार्यकर्ता हैं, जिन्होंने अपना जीवन वंचितों की आवाज उठाने में समर्पित कर दिया है:
- शिक्षा में सुधार: मोज़ाम्बिक की पहली शिक्षा मंत्री (1975-1989) के रूप में उन्होंने स्कूल नामांकन दर को 40% से बढ़ाकर लड़कों के लिए 90% और लड़कियों के लिए 75% से अधिक किया।
- बाल संरक्षण: 1990 के दशक में उन्होंने 'सशस्त्र संघर्ष का बच्चों पर प्रभाव' विषय पर संयुक्त राष्ट्र (UN) के एक महत्वपूर्ण अध्ययन का नेतृत्व किया, जिसने युद्ध प्रभावित बच्चों के संरक्षण के वैश्विक नियमों को बदल दिया।
- वैश्विक नेतृत्व: वह 'द एल्डर्स' की संस्थापक सदस्य हैं और 'ग्रासा माशेल ट्रस्ट' के माध्यम से महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण के लिए काम करती हैं।
ऐतिहासिक गौरव
ग्रासा माशेल के नाम एक अद्वितीय रिकॉर्ड है—वह दुनिया की एकमात्र महिला हैं जो दो अलग-अलग देशों की 'प्रथम महिला' (First Lady) रही हैं:
- मोज़ाम्बिक: राष्ट्रपति समोरा माशेल की पत्नी के रूप में।
- दक्षिण अफ्रीका: राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला की पत्नी के रूप में।
यह पुरस्कार उनके आत्म-शासन, सामाजिक न्याय और एक न्यायपूर्ण दुनिया बनाने के उनके आजीवन संघर्ष का सम्मान है।