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सामान्य अध्ययन पेपर – III प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन
संदर्भ
जनवरी 2026 में मध्य प्रदेश के नीमच जिले (मनासा क्षेत्र) में एक दुर्लभ तंत्रिका विकार, गुइयां-बेरे सिंड्रोम (Guillain-Barre Syndrome - GBS) का प्रकोप देखा गया है। आधिकारिक सूचना के अनुसार, इस बीमारी से अब तक दो बच्चों (15 वर्षीय और 6 वर्षीय) की मृत्यु हो चुकी है और लगभग 18 पुष्ट मामले सामने आए हैं। राज्य प्रशासन ने इसे एक जनस्वास्थ्य आपातकाल के रूप में लेते हुए विशेष वार्डों की स्थापना और नमूनों की गहन जांच के आदेश दिए हैं।
गुइयां-बेरे सिंड्रोम (GBS):
GBS एक दुर्लभ ऑटोइम्यून विकार है, जिसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली गलती से अपनी ही परिधीय तंत्रिकाओं पर हमला करने लगती है।
- कार्यप्रणाली: यह मुख्य रूप से तंत्रिकाओं की रक्षा करने वाली 'माइलिन शीथ' को नुकसान पहुँचाता है, जिससे मस्तिष्क और शरीर के अन्य अंगों के बीच संकेतों का संचरण बाधित हो जाता है।
- कारक: यह संक्रामक नहीं है, परंतु अक्सर किसी संक्रमण (जैसे कैम्पिलोबैक्टर जेजुनी, बैक्टीरिया, इन्फ्लूएंजा, या गैस्ट्रोएंटेराइटिस) के 1-3 सप्ताह बाद विकसित होता है।
लक्षणों का क्रम और गंभीरता
बच्चों में GBS का विकास तीव्र गति से होता है, जिसे समझना शीघ्र उपचार के लिए अनिवार्य है:
- प्रारंभिक लक्षण: पैरों में झुनझुनी, मांसपेशियों में कमजोरी और चलने में असमर्थता।
- प्रगतिशील चरण: कमजोरी शरीर के निचले हिस्से से ऊपर की ओर फैलती है, जो हाथों और चेहरे की मांसपेशियों को प्रभावित करती है।
- गंभीर स्थिति: जब कमजोरी श्वसन मांसपेशियों तक पहुँच जाती है, तो यह जीवन के लिए खतरा बन जाती है और रोगी को मैकेनिकल वेंटिलेशन की आवश्यकता होती है।
जनस्वास्थ्य प्रबंधन और सरकारी हस्तक्षेप
नीमच प्रशासन और मध्य प्रदेश स्वास्थ्य विभाग द्वारा उठाए गए कदम:
- निगरानी: प्रभावित क्षेत्रों में 'डोर-टू-डोर' सर्वे और 150 से अधिक संदिग्ध लक्षणों वाले व्यक्तियों की निगरानी।
- जांच एवं अनुसंधान: जल शुद्धिकरण संयंत्रों का निरीक्षण और मरीजों के सीरम व खाद्य नमूनों को राष्ट्रीय विषाणु विज्ञान संस्थान (पुणे), हैदराबाद और कोलकाता के संस्थानों में भेजना।
- उपचार अवसंरचना: वेंटिलेटर ऑपरेटरों और विशेषज्ञों के साथ विशेष वार्डों की स्थापना।
उपचार पद्धतियां
GBS का कोई निश्चित 'क्यूर' (Cure) नहीं है, लेकिन इसके प्रभाव को कम करने के लिए दो मुख्य उपचार प्रभावी हैं:
- इंट्रावेनस इम्युनोग्लोबुलिन (IVIG): स्वस्थ दाताओं के एंटीबॉडीज का उपयोग करके प्रतिरक्षा हमले को कम करना।
- प्लाज्मा फेरेसिस: रक्त से उन हानिकारक एंटीबॉडीज को बाहर निकालना जो नसों पर हमला कर रहे हैं।
प्रासंगिक आयाम
स्वास्थ्य बुनियादी ढांचा: नीमच की घटना दर्शाती है कि जिला स्तर पर वेंटिलेटर और विशेषज्ञ डॉक्टरों (न्यूरोलॉजिस्ट) की उपलब्धता कितनी महत्वपूर्ण है। दुर्लभ बीमारियों के लिए 'इमरजेंसी रिस्पॉन्स' तंत्र को मजबूत करने की आवश्यकता है।
दुर्लभ रोगों के लिए राष्ट्रीय नीति: GBS जैसी बीमारियों के इलाज का खर्च (जैसे IVIG) अत्यधिक होता है। सरकार द्वारा इलाज का खर्च उठाना समावेशी स्वास्थ्य सेवाओं की दिशा में एक सही कदम है।
जल और स्वच्छता: यद्यपि प्राथमिक जांच में पानी दूषित नहीं पाया गया, लेकिन संक्रमण जनित बीमारियों (जैसे कैम्पिलोबैक्टर) का स्रोत अक्सर अस्वच्छ जल या भोजन होता है, जो 'SDG-6' (स्वच्छ जल और स्वच्छता) के महत्व को रेखांकित करता है।
चुनौतियां एवं आगे की राह
- त्वरित निदान: ग्रामीण क्षेत्रों में डॉक्टरों को GBS के शुरुआती लक्षणों (जैसे 'सिमेट्रिकल वीकनेस') की पहचान के लिए प्रशिक्षित करना।
- जन जागरूकता: माता-पिता को शिक्षित करना कि संक्रमण के बाद किसी भी प्रकार की शारीरिक कमजोरी को 'सामान्य कमजोरी' समझकर नजरअंदाज न करें।
- अनुसंधान एवं डेटा: भारत में GBS के हॉटस्पॉट की पहचान करने के लिए एक राष्ट्रीय डेटाबेस तैयार करना ताकि भविष्य के प्रकोपों का अनुमान लगाया जा सके।
निष्कर्ष
नीमच में GBS का प्रकोप हमें याद दिलाता है कि संक्रामक रोगों के साथ-साथ उनके बाद होने वाले 'इम्यूनोलॉजिकल' विकारों के प्रति भी सतर्कता आवश्यक है। सुदृढ़ स्वास्थ्य निगरानी तंत्र और समय पर चिकित्सा हस्तक्षेप ही ऐसी दुर्लभ लेकिन घातक स्थितियों में मृत्यु दर को कम करने का एकमात्र मार्ग है।
सामान्य अध्ययन पेपर – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध
संदर्भ
जनवरी 2026 में, भारत के उच्चतम न्यायालय ने 'अमित कुमार बनाम भारत संघ' (2026) मामले में देश के उच्च शिक्षा संस्थानों (HEIs) में बढ़ती छात्र आत्महत्याओं पर गहरा संज्ञान लिया है। न्यायालय ने पाया कि उच्च शिक्षा का 'मैसिफिकेशन' अर्थात गुणवत्ता और बुनियादी सुविधाओं में सुधार किए बिना निजीकरण और नामांकन में तीव्र वृद्धि, छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन गया है। इस पृष्ठभूमि में, न्यायालय ने केंद्र और राज्यों को 9 महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं।
शिक्षा में संकट
वर्तमान में भारतीय उच्च शिक्षा प्रणाली एक 'सिस्टमिक' (प्रणालीगत) संकट से जूझ रही है। आंकड़ों के अनुसार:
- मानसिक स्वास्थ्य:
- वर्ष 2023 में लगभग 13,892 छात्रों ने आत्महत्या की। यह संख्या कुल आत्महत्याओं का लगभग 8.1% थी। यह संख्या 2022 की तुलना में करीब 6.5% अधिक है।
- यह आंकड़ा पिछले दशक में एक चिंताजनक बढ़ोतरी को दर्शाता है (2013 से 2023 में करीब 65% की वृद्धि)
- छात्र केवल शैक्षणिक दबाव ही नहीं, बल्कि नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो' (NCRB) के डेटा और हालिया शोध पत्र बताते हैं कि वित्तीय संकट, जातिगत भेदभाव और सामाजिक अन्याय के कारण भी संकट में हैं।
- फैकल्टी की कमी:
- कई सार्वजनिक विश्वविद्यालयों में लगभग 50% शैक्षणिक पद रिक्त हैं। उदाहरण के तौर पर, मद्रास विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में पिछले एक दशक से नई नियुक्तियाँ न होने के कारण शोध और शिक्षण की गुणवत्ता में भारी गिरावट आई है।
- प्रशासनिक शून्यता: कुलपतियों (VCs) और कुलसचिवों के पद लंबे समय से खाली पड़े हैं या राजनीतिक गतिरोध (राज्यपाल बनाम राज्य सरकार) के कारण अटके हुए हैं।
चर्चा में क्यों?
न्यायालय ने इस मुद्दे को "राष्ट्रीय संकट" बताते हुए हस्तक्षेप किया है। 15 जनवरी 2026 को जारी आदेशों की मुख्य बातें:
- अनुच्छेद 142 का उपयोग: कोर्ट ने अपनी पूर्ण न्यायिक शक्ति का उपयोग करते हुए बाइंडिंग (अनिवार्य) निर्देश जारी किए।
- अनिवार्य रिपोर्टिंग: उच्च शिक्षा संस्थानों में छात्र आत्महत्याओं का पृथक रिकॉर्ड रखना, ट्रैकिंग करना किसी भी छात्र की आत्महत्या या अप्राकृतिक मृत्यु की सूचना तुरंत पुलिस और विनियामक निकायों (UGC, AICTE) को देना अनिवार्य कर दिया गया है।
- समय सीमा: सभी रिक्त पदों (VC, फैकल्टी आदि) को 4 महीने के भीतर भरने का कड़ा आदेश दिया गया है।
उच्च शिक्षा के समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ
- गुणवत्ता बनाम मात्रा: संस्थानों की संख्या बढ़ी है, लेकिन वे 'डिग्री-वितरण केंद्रों' तक सीमित हो गए हैं।
- वित्तीय बाधाएं: छात्रवृत्ति के वितरण में देरी से वंचित वर्गों के छात्रों पर अत्यधिक तनाव बढ़ता है।
- भ्रष्टाचार और राजनीति: नियुक्तियों में भ्रष्टाचार और विचारधारा आधारित चयन ने शैक्षणिक स्वायत्तता और गुणवत्ता को प्रभावित किया है।
- अपारदर्शी विनियमन: यूजीसी की लंबी भर्ती प्रक्रिया (कम से कम 6 महीने) और बजट की कमी लक्ष्यों की प्राप्ति में बाधा है।
संवैधानिक एवं कानूनी प्रावधान
शिक्षा से संबंधित कुछ प्रमुख संवैधानिक आधार निम्नलिखित हैं:
- अनुच्छेद 21A: शिक्षा का अधिकार (यद्यपि यह 6-14 वर्ष के लिए है, लेकिन उच्च शिक्षा को अनुच्छेद 21 के तहत 'सम्मानजनक जीवन' के विस्तार के रूप में देखा जाता है)।
- अनुच्छेद 41 (DPSP): राज्य अपनी आर्थिक क्षमता के भीतर शिक्षा के अधिकार को सुरक्षित करने का प्रयास करेगा।
- अनुच्छेद 46: अनुसूचित जातियों, जनजातियों और कमजोर वर्गों के शैक्षणिक हितों का विशेष ध्यान रखना।
- अनुच्छेद 142: न्याय के हित में सुप्रीम कोर्ट द्वारा पारित आदेश, जो पूरे भारत में लागू होते हैं।
- यूजीसी अधिनियम, 1956: उच्च शिक्षा के मानकों का समन्वय और निर्धारण।
विश्लेषणात्मक आयाम
न्यायालय का यह हस्तक्षेप 'न्यायिक सक्रियता' का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जहाँ शासन की विफलता (कार्यपालिका का रिक्त पदों को न भरना) को ठीक करने का प्रयास किया गया है।
- सामाजिक प्रभाव: छात्र आत्महत्याएं केवल व्यक्तिगत विफलता नहीं, बल्कि "संस्थागत विफलता" हैं।
- प्रशासनिक नैतिकता: उच्च शिक्षा संस्थानों का कर्तव्य केवल ज्ञान प्रदान करना नहीं, बल्कि छात्रों के लिए एक सुरक्षित और समावेशी वातावरण सुनिश्चित करना है।
- आर्थिक प्रभाव: यदि उच्च शिक्षा की गुणवत्ता गिरती है, तो भारत का 'जनसांख्यिकीय लाभांश' एक बोझ में बदल सकता है।
समाधान और आगे की राह
- पारदर्शी भर्ती: नियुक्तियों के लिए एक केंद्रीकृत लेकिन समयबद्ध तंत्र विकसित किया जाए।
- मानसिक स्वास्थ्य अवसंरचना: प्रत्येक परिसर में 24/7 चिकित्सा सहायता और पेशेवर परामर्श केंद्र अनिवार्य हों।
- छात्रवृत्ति सुरक्षा: कोर्ट के अनुसार, छात्रवृत्ति में देरी के कारण किसी भी छात्र को परीक्षा या सुविधाओं से वंचित न किया जाए।
- राजनीतिक सहमति: राज्यपाल और राज्य सरकारों को कुलपतियों की नियुक्ति को राजनीतिक अखाड़ा बनाने के बजाय 'अकादमिक योग्यता' को प्राथमिकता देनी चाहिए।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट का निर्देश 'विकसित भारत' के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए एक आवश्यक "कॉल टू एक्शन" है। उच्च शिक्षा प्रणाली में सुधार केवल प्रशासनिक सुधार नहीं है, बल्कि यह देश के भविष्य अर्थात युवा पीढ़ी के प्रति हमारी नैतिक जिम्मेदारी है। शिक्षा प्रणाली को केवल रोजगार के योग्य नहीं, बल्कि जीवन जीने के योग्य बनाने की आवश्यकता है।
सामान्य अध्ययन पेपर – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध
संदर्भ
13 जनवरी 2026 को, भारत के सर्वोच्च न्यायालय की दो न्यायाधीशों वाली पीठ (जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन) ने 'सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन' (CPIL) बनाम भारत संघ मामले में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम,1988 की धारा 17A की संवैधानिकता पर एक खंडित फैसला सुनाया। इस खंडित फैसले ने एक बार फिर लोक सेवकों की जवाबदेही और उनके संरक्षण के बीच चल रहे द्वंद्व को चर्चा में ला दिया है।
मामला क्या है?
- सुप्रीम कोर्ट में 'सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन' (CPIL) नामक संस्था ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 17A को चुनौती दी थी।
- जिस पर दोनों जजों ने अलग-अलग राय दी, जिसके कारण फैसला 1-1 की बराबरी पर रहा
- चूंकि फैसला बराबर रहा, अब यह मामला तीन या अधिक जजों की बड़ी बेंच के पास जाएगा।
धारा 17A क्या है?
2018 में केंद्र सरकार द्वारा संशोधित इस धारा के मुख्य प्रावधान निम्नलिखित हैं:
- पूर्व अनुमति: किसी भी पुलिस अधिकारी को किसी लोक सेवक द्वारा अपने आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान लिए गए निर्णयों या सिफारिशों की जांच शुरू करने से पहले सक्षम प्राधिकारी (सरकार) की पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य है।
- अपवाद: रंगे हाथों रिश्वत लेते पकड़े जाने के मामलों में इस अनुमति की आवश्यकता नहीं होती।
- समय सीमा: सरकार को ऐसी अनुमति पर निर्णय लेने के लिए 3 माह (विशेष परिस्थितियों में 4 माह) का समय दिया गया है।
खंडित फैसले का आधार
चूंकि दोनों न्यायाधीशों के विचार भिन्न थे, इसलिए यह मामला अब एक बड़ी पीठ को भेजा जाएगा। दोनों पक्षों के संभावित तर्क इस प्रकार हैं:
पक्ष में तर्क (लोक सेवक का संरक्षण):
- पॉलिसी पैरालिसिस से बचाव: ईमानदार अधिकारियों को इस डर से मुक्त करना कि उनके द्वारा लिए गए कठिन निर्णयों की बाद में दुर्भावनापूर्ण जांच हो सकती है।
- अनावश्यक उत्पीड़न रोकना: प्रशासनिक दक्षता बनाए रखने के लिए यह जरूरी है कि तुच्छ शिकायतों के आधार पर जांच शुरू न हो।
विपक्ष में तर्क (जवाबदेही और समानता):
- अनुच्छेद 14 का उल्लंघन: आलोचकों का तर्क है कि यह धारा भ्रष्ट अधिकारियों के लिए एक 'सुरक्षा कवच' का काम करती है और आम नागरिकों एवं लोक सेवकों के बीच अनुचित भेदभाव पैदा करती है।
- जांच में देरी: सरकार से अनुमति लेने की प्रक्रिया अक्सर लंबी खिंच जाती है, जिससे भ्रष्ट तत्वों को सबूत मिटाने का समय मिल जाता है।
- स्वतंत्रता का हनन: यह जांच एजेंसियों (CBI/पुलिस) की स्वायत्तता को सीमित करता है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और न्यायिक निर्णय
- सुब्रमण्यम स्वामी बनाम निदेशक, CBI (2014): इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने धारा 6A को असंवैधानिक घोषित किया था, जो संयुक्त सचिव स्तर के अधिकारियों को ऐसी ही सुरक्षा देती थी। कोर्ट ने कहा था कि भ्रष्टाचार के मामलों में पद के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता।
- धारा 17A का उदय: 2014 के फैसले के बाद, सरकार ने 2018 के संशोधन के माध्यम से सभी स्तर के लोक सेवकों के लिए धारा 17A को लागू कर दिया।
विश्लेषणात्मक आयाम
- कानून का शासन: भ्रष्टाचार शासन व्यवस्था के लिए एक कैंसर के समान है। यदि जांच की प्रक्रिया में प्रशासनिक बाधाएं उत्पन्न होती हैं, तो 'कानून के शासन' की अवधारणा कमजोर होती है।
- प्रशासनिक नैतिकता: एक लोक सेवक को निष्पक्ष और निडर होना चाहिए। धारा 17A का उद्देश्य इस निडरता को बढ़ावा देना है, लेकिन इसकी आड़ में जवाबदेही की बलि नहीं दी जा सकती।
- सहकारी संघवाद और भ्रष्टाचार: चूंकि कई मामलों में अनुमति राज्य सरकारों से लेनी होती है, इसलिए केंद्र और राज्यों के बीच राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता जांच प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है।
आगे की राह
- संतुलन की आवश्यकता: कोर्ट की बड़ी पीठ को यह तय करना होगा कि लोक सेवकों को संरक्षण देने और भ्रष्टाचार के विरुद्ध त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित करने के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
- समयबद्ध अनुमति: सरकार को अनुमति देने या अस्वीकार करने की प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी और डिजिटल बनाना चाहिए ताकि मानवीय हस्तक्षेप कम हो।
- स्वतंत्र समीक्षा निकाय: क्या अनुमति देने का अधिकार सरकार के बजाय किसी स्वतंत्र निकाय (जैसे लोकपाल या विशेष न्यायिक समिति) के पास होना चाहिए? इस पर विचार की आवश्यकता है।
निष्कर्ष
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17A पर सर्वोच्च न्यायालय का विभाजित होना इस मुद्दे की जटिलता को दर्शाता है। यह केवल एक कानूनी प्रश्न नहीं है, बल्कि यह भारत की शासन व्यवस्था की शुचिता और लोक सेवकों के मनोबल के बीच की एक गहरी कशमकश है। अंतिम निर्णय जो भी हो, उसे 'समानता के अधिकार' और 'भ्रष्टाचार मुक्त भारत' के संकल्प को सुदृढ़ करना चाहिए।
सामान्य अध्ययन पेपर – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध
संदर्भ
हाल के हफ्तों में वैश्विक राजनीति में एक अभूतपूर्व अस्थिरता देखी गई है, जिसकी शुरुआत वेनेजुएला में अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की नाटकीय गिरफ्तारी से हुई। इस घटना के तुरंत बाद, ट्रंप प्रशासन ने अपने 'अमेरिका फर्स्ट' एजेंडे को विस्तार देते हुए डेनमार्क सहित आठ प्रमुख यूरोपीय देशों के विरुद्ध आर्थिक आक्रामकता का परिचय देते हुए 1 फरवरी 2026 से सभी आयातित वस्तुओं पर 10% टैरिफ लगाने की घोषणा की है, जिसे जून तक 25% तक बढ़ाया जा सकता है। इस दबाव का मुख्य उद्देश्य डेनमार्क के अधीन स्वायत्त क्षेत्र ग्रीनलैंड पर अमेरिकी नियंत्रण स्थापित करना है। यह कदम न केवल व्यापारिक युद्ध को जन्म दे रहा है, बल्कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बने पश्चिमी गठबंधन की नींव को भी हिला रहा है।
ग्रीनलैंड का रणनीतिक महत्व
ग्रीनलैंड केवल एक बर्फ से ढका द्वीप नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरे सामरिक हित छिपे हैं:
- संसाधन प्रचुरता: यहाँ दुर्लभ मृदा तत्व और खनिजों के विशाल भंडार हैं, जो आधुनिक तकनीक के लिए अनिवार्य हैं।
- आर्कटिक नियंत्रण: जलवायु परिवर्तन के कारण आर्कटिक बर्फ पिघल रही है, जिससे नए व्यापारिक मार्ग खुल रहे हैं। ग्रीनलैंड पर नियंत्रण अमेरिका को रूस और चीन के विरुद्ध इस क्षेत्र में बढ़त प्रदान करता है।
- सैन्य अवस्थिति: अमेरिका का 'थुले एयर बेस' यहीं स्थित है, जो उत्तर अमेरिकी रक्षा प्रणाली के लिए महत्वपूर्ण है।
प्रमुख मुद्दे और उल्लंघन
ट्रंप प्रशासन की इस 'बुलिंग टैक्टिक्स' से कई कानूनी और नैतिक प्रश्न उठते हैं:
- अंतर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन: किसी संप्रभु राष्ट्र (डेनमार्क) के क्षेत्र को आर्थिक दबाव के माध्यम से हथियाने का प्रयास संयुक्त राष्ट्र चार्टर और अंतर्राष्ट्रीय संप्रभुता के सिद्धांतों के विरुद्ध है।
- शक्ति का केंद्रीकरण: अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा 'इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट' का एकतरफा उपयोग, विधायी (कांग्रेस) समर्थन के बिना किया जा रहा है, जो लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करता है।
- नव-साम्राज्यवाद: वेनेजुएला के राष्ट्रपति के साथ हुए हालिया घटनाक्रम और अब यूरोप पर दबाव, अमेरिका की 'हस्तक्षेपवादी' विदेश नीति के पुनरुत्थान को दर्शाता है।
यूरोप की प्रतिक्रिया और 'एंटी-कोअर्शन इंस्ट्रूमेंट'
यूरोपीय संघ (EU) ने इस बार केवल मौखिक विरोध नहीं किया है, बल्कि ठोस जवाबी कार्रवाई की तैयारी की है:
- प्रति-टैरिफ: यूरोपीय संघ अमेरिकी टेक दिग्गजों (गूगल,एप्पल,मेटा आदि) पर कर लगाकर जवाबी वार कर सकता है।
- स्वायत्तता की रक्षा: फ्रांस और जर्मनी जैसे देशों का मानना है कि अमेरिका पर सुरक्षा के लिए निर्भरता कम कर 'यूरोपीय रणनीतिक स्वायत्तता' को बढ़ाना चाहिए।
वैश्विक सुरक्षा और नाटो पर प्रभाव
- नाटो में फूट: यदि अमेरिका और यूरोप के बीच व्यापारिक युद्ध बढ़ता है, तो नाटो की एकता खंडित होगी।
- रूस-यूक्रेन संघर्ष: नाटो में आंतरिक कलह का सीधा लाभ रूस को मिलेगा। यूक्रेन की सहायता और पूर्वी मोर्चे पर सैन्य शक्ति कमजोर होने से वैश्विक सुरक्षा संतुलन बिगड़ सकता है।
भारत पर संभावित प्रभाव
भारत के लिए यह स्थिति एक 'दोधारी तलवार' के समान है:
- व्यापारिक चुनौतियां: यदि अमेरिका सभी देशों पर टैरिफ बढ़ाता है, तो भारतीय निर्यात भी प्रभावित हो सकता है।
- रणनीतिक अवसर: पश्चिमी गुट में फूट पड़ने पर भारत के लिए अपनी 'बहु-संरेखण' नीति को मजबूत करने और यूरोप के साथ स्वतंत्र व्यापार समझौते (FTA) की गति बढ़ाने का अवसर होगा।
- आर्कटिक काउंसिल: भारत आर्कटिक काउंसिल का पर्यवेक्षक सदस्य है; यहाँ बढ़ता तनाव भारत के वैज्ञानिक अनुसंधान हितों को प्रभावित कर सकता है।
विश्लेषण
यह घटना 'लोकतांत्रिक शांति सिद्धांत' और 'उदारवादी अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था' के पतन की ओर संकेत करती है। 'अमेरिका फर्स्ट' की नीति अब 'अमेरिका अलोन' में बदलती दिख रही है, जो बहुपक्षवाद के लिए बड़ा खतरा है।
निष्कर्ष
वाशिंगटन की वर्तमान नीतियां प्रबुद्ध नेतृत्व के अभाव को दर्शाती हैं। ग्रीनलैंड को हथियाने के लिए आर्थिक हथियारों का उपयोग न केवल अटलांटिक के दोनों पार के संबंधों को दशकों पीछे धकेल देगा, बल्कि यह वैश्विक अर्थव्यवस्था में अस्थिरता का नया दौर शुरू करेगा। वर्तमान समय में सहयोग और कूटनीति की आवश्यकता है, न कि आर्थिक डराने-धमकाने की।
सामान्य अध्ययन पेपर – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध
संदर्भ:
अक्टूबर 2023 से शुरू हुआ इजरायल-हमास संघर्ष जनवरी 2026 तक आते-आते एक अत्यंत जटिल मोड़ पर पहुँच चुका है। यद्यपि तीन माह पूर्व एक अस्थिर युद्धविराम प्रभावी हुआ था, किंतु गज़ा में मानवीय संकट और छिटपुट हिंसा अभी भी जारी है। गज़ा की अवसंरचना पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है और करीब 20 लाख लोग बेघर हैं। इस अराजकता के बीच, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी 20-सूत्रीय शांति योजना के 'दूसरे चरण' की घोषणा की है, जिसका उद्देश्य गज़ा का प्रशासन एक अराजनीतिक 'तकनीकी समिति' (NCAG) को सौंपना और उसका पूर्ण पुनर्निर्माण करना है।
'बोर्ड ऑफ पीस' और चर्चा के मुख्य कारण
18 जनवरी 2026 को ट्रंप ने भारत सहित लगभग 60 देशों को इस 'बोर्ड ऑफ पीस' (BoP) में शामिल होने का निमंत्रण दिया। यह निकाय गज़ा के शासन और पुनर्निर्माण की निगरानी करेगा। यह वर्तमान में वैश्विक चर्चा का केंद्र है क्योंकि:
- समानांतर अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था: आलोचक इसे 'ट्रंप का अपना संयुक्त राष्ट्र' कह रहे हैं। यह बोर्ड संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) को दरकिनार कर सीधे वैश्विक संघर्षों में हस्तक्षेप करने का दावा करता है।
- आजीवन नेतृत्व: बोर्ड ऑफ पीस' के प्रस्तावित चार्टर के अनुसार, डोनाल्ड ट्रंप इसके उद्घाटन अध्यक्ष होंगे। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उनकी यह भूमिका उनके राष्ट्रपति पद से जुड़ी नहीं है; यानी राष्ट्रपति पद छोड़ने के बाद भी वे इसके चेयरमैन बने रह सकते हैं।
- वित्तीय अवरोध: स्थायी सदस्यता के लिए कथित तौर पर 1 बिलियन डॉलर की 'प्रवेश राशि' मांगी गई है, जो इसे अमीर देशों का एक विशिष्ट क्लब बनाता है।
अमेरिकी वर्चस्व की ओर एक और कदम
ट्रंप की यह नीति 'अमेरिका फर्स्ट' से बढ़कर 'अमेरिका अलोन' और 'ट्रंप अलोन' की ओर जाती दिख रही है।
- संस्थागत विखंडन: WHO, UNESCO और अब UN को दरकिनार करने की कोशिशें दर्शाती हैं कि अमेरिका अब बहुपक्षीय संस्थाओं के बजाय अपने नियंत्रण वाले 'ट्रांजेक्शनल' (लेन-देन आधारित) मंचों को प्राथमिकता दे रहा है।
- सैन्य और आर्थिक दबाव: जहाँ एक ओर 'शांति' का प्रस्ताव है, वहीं दूसरी ओर ग्रीनलैंड के मुद्दे पर यूरोप को टैरिफ की धमकी और वेनेजुएला में सैन्य हस्तक्षेप अमेरिका के आक्रामक 'वर्चस्ववादी' रवैये को सिद्ध करते हैं।
भारत की स्थिति: एक पेचीदा कूटनीतिक दुविधा
भारत के लिए ट्रंप का निमंत्रण 'सम्मान' और 'संकट' दोनों लेकर आया है:
- निमंत्रण बनाम आक्रामकता: हाल ही में ट्रंप ने रूस और ईरान के साथ व्यापार जारी रखने पर भारत को 25% अतिरिक्त टैरिफ की धमकी दी है। एक तरफ आर्थिक दंड का डर और दूसरी तरफ वैश्विक शांति बोर्ड में हिस्सेदारी का न्योता, भारत की 'रणनीतिक स्वायत्तता' की परीक्षा ले रहा है।
- फिलिस्तीन नीति पर प्रभाव: भारत पारंपरिक रूप से 'दो-राष्ट्र समाधान' का पक्षधर रहा है। इस बोर्ड में शामिल होना फिलिस्तीनी संप्रभुता को सीमित करने वाले अमेरिकी एजेंडे का समर्थन माना जा सकता है।
- ग्लोबल साउथ का नेतृत्व: भारत स्वयं को विकासशील देशों की आवाज मानता है। ऐसे में एक अमेरिकी-प्रभुत्व वाले और संयुक्त राष्ट्र को कमजोर करने वाले निकाय का हिस्सा बनना भारत की छवि को प्रभावित कर सकता है।
विश्लेषणात्मक आयाम
- न्यायिक बनाम राजनीतिक कूटनीति: क्या अंतरराष्ट्रीय विवादों का समाधान संयुक्त राष्ट्र के चार्टर के बजाय किसी 'बोर्ड' द्वारा किया जा सकता है? यह अंतरराष्ट्रीय कानून की नींव पर प्रहार है।
- यथार्थवाद: ट्रंप की नीति पूर्णतः यथार्थवादी है, जहाँ शांति को एक 'डील' के रूप में देखा जा रहा है। भारत को यह तय करना होगा कि क्या यह 'डील' उसके दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों के अनुकूल है।
समाधान और आगे की राह
- कैलिब्रेटेड एंगेजमेंट (सुलझा हुआ जुड़ाव): भारत को इस बोर्ड में 'पर्यवेक्षक' के रूप में शामिल होने पर विचार करना चाहिए, न कि तत्काल स्थायी सदस्य के रूप में, ताकि वह अपनी नीतियों से समझौता किए बिना प्रक्रिया पर नजर रख सके।
- बहुपक्षवाद की रक्षा: भारत को ब्रिक्स (BRICS) और जी-20 जैसे मंचों का उपयोग कर संयुक्त राष्ट्र में सुधार पर जोर देना चाहिए, न कि इसे पूरी तरह दरकिनार करने वाले प्रयासों का हिस्सा बनना चाहिए।
- संतुलन: अमेरिका के साथ सुरक्षा संबंधों और रूस-ईरान के साथ ऊर्जा हितों के बीच संतुलन बनाना ही भारत की प्राथमिकता होनी चाहिए।
निष्कर्ष
'बोर्ड ऑफ पीस' वैश्विक कूटनीति का एक नया और विवादास्पद प्रयोग है। यह शांति स्थापना के नाम पर अमेरिकी प्रभाव को संस्थागत रूप देने का प्रयास है। भारत को इस 'शांति बोर्ड' में शामिल होने के लिए जल्दबाजी के बजाय अपनी ऐतिहासिक विदेश नीति के सिद्धांतों और उभरते हुए वैश्विक समीकरणों का सूक्ष्म विश्लेषण करना होगा। अंततः, शांति वही स्थाई होती है जो न्यायसंगत और समावेशी हो, न कि केवल शक्ति के प्रदर्शन पर आधारित।