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सामान्य अध्ययन पेपर – III प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन
संदर्भ
बजट 2026-27 भारत के आर्थिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ का संकेत देता है। जहाँ सरकार ने राजकोषीय घाटे को 4.3% तक सीमित रखने और पूंजीगत व्यय को ₹12.2 लाख करोड़ तक बढ़ाने का साहसिक निर्णय लिया है, वहीं यह नीतिगत झुकाव विकास की 'पूंजी-प्रधान' प्रकृति और 'श्रम के विस्थापन' के बीच एक गहरे विरोधाभास को जन्म दे रहा है। यह लेख 'दृश्यमान' बुनियादी ढांचे के विकास और 'अदृश्य' होते जा रहे रोजगार के अवसरों के बीच की खाई का विश्लेषण करता है।
विकास का स्वरूप: पूंजी बनाम श्रम
- "जॉबलेस ग्रोथ" (रोजगार विहीन विकास) के एक नए और अधिक चिंताजनक चरण में प्रवेश कर रहा है।
- रोजगार लोच में गिरावट: निर्माण क्षेत्र, जो पारंपरिक रूप से सबसे अधिक अकुशल श्रमिकों को खपाता था, उसकी रोजगार लोच 0.59 (2011-20) से गिरकर 0.42 (2021-24) रह गई है। इसका अर्थ है कि बुनियादी ढांचे पर किया गया रिकॉर्ड निवेश अब आनुपातिक रूप से रोजगार पैदा करने में विफल हो रहा है।
- पूंजी-प्रधान विनिर्माण: 'विकसित भारत' के विजन के तहत ऑटोमेशन और उन्नत लॉजिस्टिक्स पर जोर दिया जा रहा है। बड़ी कंपनियों की उत्पादकता तो बढ़ रही है, लेकिन वे कम कार्यबल के साथ अधिक उत्पादन कर रही हैं, जिससे मुनाफे का संकेंद्रण 'पूंजी' में हो रहा है, न कि 'मजदूरी' में।
सामाजिक-आर्थिक निहितार्थ
- विकास का यह मॉडल समाज के एक बड़े हिस्से को आर्थिक लाभों से बाहर कर रहा है, जिसे लेखकों ने 'अदृश्य बहिष्कार' कहा है।
- युवा शक्ति का संकट (The NEET Crisis): वर्तमान में 15-29 वर्ष के लगभग 23-25% युवा NEET (न शिक्षा में, न रोजगार में, न प्रशिक्षण में) की श्रेणी में हैं। यह न केवल एक आर्थिक नुकसान है, बल्कि भविष्य में सामाजिक अस्थिरता का कारक भी बन सकता है।
- द्वि-स्तरीय अर्थव्यवस्था: भारत में दो समानांतर अर्थव्यवस्थाएं उभर रही हैं। एक वह जो डिजिटल, संगठित और उच्च उत्पादकता वाली है, और दूसरी वह जो असंगठित, निम्न आय वाली और असुरक्षित श्रम पर टिकी है। इन दोनों के बीच की दूरी 'समावेशी विकास' के लक्ष्य को धूमिल कर रही है।
प्रमुख चुनौतियां
- श्रम उत्पादकता बनाम वेतन: श्रमिकों की उत्पादकता में वृद्धि के बावजूद वास्तविक मजदूरी स्थिर बनी हुई है। इससे मांग का आधार कमजोर हो रहा है।
- संरचनात्मक प्रतिवर्तन: श्रमिक औद्योगिक रोजगार के अभाव में वापस 'निर्वाह कृषि' की ओर लौट रहे हैं, जो आर्थिक विकास के प्राकृतिक क्रम के विपरीत है।
- कौशल अंतराल: तकनीकी प्रगति की गति और श्रमिकों के कौशल विकास के बीच का अंतर 'अदृश्य बहिष्कार' को और अधिक गहरा बना रहा है।
आगे की राह
- श्रम-प्रधान क्षेत्रों को प्रोत्साहन: केवल मेगा-इंफ्रास्ट्रक्चर ही पर्याप्त नहीं है; वस्त्र, खाद्य प्रसंस्करण और चमड़ा जैसे श्रम-प्रधान उद्योगों (MSMEs) के लिए विशिष्ट वित्तीय प्रोत्साहन की आवश्यकता है।
- रोजगार-संबद्ध प्रोत्साहन (ELI): 'उत्पादन-संबद्ध प्रोत्साहन' (PLI) की तर्ज पर 'रोजगार-संबद्ध प्रोत्साहन' योजनाएं शुरू की जानी चाहिए, जहाँ सब्सिडी का आधार 'रोजगार सृजन की संख्या' हो।
- मानव पूंजी में निवेश: बुनियादी ढांचे के साथ-साथ शिक्षा और स्वास्थ्य पर व्यय बढ़ाना अनिवार्य है, ताकि कार्यबल उभरती प्रौद्योगिकियों के अनुरूप बन सके।
- मजदूरी आधारित विकास: आर्थिक नीतियों का केंद्र केवल 'कॉर्पोरेट लाभ' न होकर 'मजदूरी में वृद्धि' होना चाहिए, ताकि उपभोग आधारित विकास चक्र को गति मिल सके।
निष्कर्ष
संक्षेप में, भारत का वर्तमान विकास मॉडल 'नैदानिक दक्षता' के साथ तो कार्य कर रहा है, परंतु इसके सामाजिक मूल्य अत्यधिक हैं। यदि भारत को वास्तव में 'विकसित भारत' बनना है, तो विकास केवल 'दृश्यमान' पुलों और राजमार्गों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि इसे समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति के हाथों में काम (रोजगार) और गरिमापूर्ण जीवन प्रदान करना चाहिए। आर्थिक प्रगति और सामाजिक समावेशन के बीच संतुलन ही दीर्घकालिक स्थिरता की एकमात्र कुंजी है।
सामान्य अध्ययन पेपर – III प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन
संदर्भ
2 फरवरी, 2026 को वैश्विक स्तर पर 'विश्व आर्द्रभूमि दिवस' मनाया गया, जिसकी थीम 'आर्द्रभूमि और पारंपरिक ज्ञान: सांस्कृतिक विरासत का जश्न' रखी गई। भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में आर्द्रभूमियां न केवल पारिस्थितिक संतुलन का आधार हैं, बल्कि सदियों से हमारी अर्थव्यवस्था, परंपराओं और सामुदायिक आजीविका का अभिन्न अंग रही हैं।
विश्व आर्द्रभूमि दिवस:
- इतिहास: 2 फरवरी, 1971 को ईरानी शहर रामसर में 'कैस्पियन सागर' के तट पर आर्द्रभूमियों के संरक्षण के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय संधि पर हस्ताक्षर किए गए थे, जिसे 'रामसर कन्वेंशन' कहा जाता है।
- उद्देश्य: इसका मुख्य उद्देश्य आर्द्रभूमियों के संरक्षण को बढ़ावा देना और उनके 'विवेकपूर्ण उपयोग' के प्रति वैश्विक जागरूकता पैदा करना है।
- वर्ष 2026 की थीम: ‘Wetlands and traditional knowledge: Celebrating cultural heritage’ (आर्द्रभूमि और पारंपरिक ज्ञान: सांस्कृतिक विरासत का जश्न)
- इस वर्ष का विषय पारंपरिक समुदायों के उन प्राचीन कौशलों को सम्मान देता है, जिन्होंने सदियों से आर्द्रभूमियों को बिना नुकसान पहुँचाए उनका संरक्षण किया है (जैसे तमिलनाडु के 'कुलम' या केरल की 'केनी' परंपरा)।
आर्द्रभूमि का महत्व
सामान्य महत्व:
- पारिस्थितिकी तंत्र के गुर्दे: ये जल से प्रदूषकों और अवसादों को छानकर पानी को शुद्ध करती हैं।
- प्राकृतिक स्पंज: ये अत्यधिक वर्षा के समय बाढ़ को नियंत्रित करती हैं और सूखे के समय जल स्तर बनाए रखती हैं।
- जैव विविधता: पृथ्वी की 40% प्रजातियाँ आर्द्रभूमियों में रहती हैं या प्रजनन करती हैं।
भारतीय संदर्भ में महत्व:
- सांस्कृतिक जुड़ाव: भारत में आर्द्रभूमियां 'पवित्र उपवनों' और त्योहारों से जुड़ी हैं।
- आजीविका: लाखों लोग मछली पालन, कृषि और पर्यटन के लिए इन पर निर्भर हैं।
- रामसर साइट्स: भारत में वर्तमान में 98 रामसर स्थल हैं, जो दक्षिण एशिया में सर्वाधिक हैं, जो वैश्विक संरक्षण में भारत की बड़ी भूमिका को दर्शाते हैं।
प्रमुख चुनौतियाँ
- लुप्त होती आर्द्रभूमियाँ: पिछले 30 वर्षों में भारत ने अपनी लगभग 40% आर्द्रभूमियाँ खो दी हैं।
- अतिक्रमण और शहरीकरण: आर्द्रभूमियों को 'बंजर भूमि' मानकर उन पर निर्माण कार्य या कचरा डंपिंग करना सबसे बड़ी समस्या है।
- प्रदूषण: औद्योगिक कचरा और शहरों का अनुपचारित सीवेज सीधे इन जल निकायों में गिरने से इनकी 'पारिस्थितिक कार्यक्षमता' नष्ट हो रही है।
- जलवायु परिवर्तन: बढ़ता तापमान और अनियमित वर्षा पैटर्न इन संवेदनशील क्षेत्रों के जल स्तर को प्रभावित कर रहे हैं।
- विदेशी प्रजातियों का आक्रमण: जलकुंभी जैसी प्रजातियाँ स्थानीय जैव विविधता को समाप्त कर रही हैं।
समाधान तथा आगे की राह
- जलग्रहण क्षेत्र शासन: आर्द्रभूमि संरक्षण को केवल जल निकाय तक सीमित न रखकर, उसके पूरे जलग्रहण क्षेत्र के प्रबंधन पर ध्यान देना चाहिए।
- प्रोजेक्ट से प्रोग्राम की ओर: संरक्षण को अस्थायी 'सुंदरीकरण प्रोजेक्ट' के बजाय एक स्थायी 'पारिस्थितिक कार्यक्रम' के रूप में अपनाया जाए।
- सामुदायिक भागीदारी: स्थानीय समुदायों के पारंपरिक ज्ञान (जैसे 'कुलम' प्रणाली) को आधुनिक विज्ञान के साथ जोड़कर 'जन-भागीदारी' सुनिश्चित की जाए।
- कठोर विधिक ढांचा: आर्द्रभूमि संरक्षण नियम, 2017 का सख्ती से अनुपालन सुनिश्चित करना और अतिक्रमणकारियों पर भारी दंड लगाना।
निष्कर्ष
आर्द्रभूमियां केवल जल संचयन के केंद्र नहीं, बल्कि एक 'राष्ट्रीय सार्वजनिक संपत्ति' हैं, जो जल सुरक्षा और जलवायु लचीलापन सुनिश्चित करती हैं। भविष्य में जल संकट से बचने के लिए हमें 'सुंदरीकरण' के मोह से निकलकर उनकी 'पारिस्थितिक कार्यक्षमता' को प्राथमिकता देनी होगी। यदि हम अपनी पारंपरिक प्रथाओं और आधुनिक तकनीक का कुशलतापूर्वक समन्वय करते हैं, तो यह न केवल पर्यावरण की रक्षा करेगा, बल्कि हमारी सांस्कृतिक विरासत को भी आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखेगा।
सामान्य अध्ययन पेपर – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध
सामान्य अध्ययन पेपर – III प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन
संदर्भ
भारत के राष्ट्रपति ने संविधान के अनुच्छेद 280 के अंतर्गत डॉ. अरविंद पनगढ़िया की अध्यक्षता में 16वें वित्त आयोग (FC-16) का गठन किया। इसकी सिफारिशें 1 अप्रैल, 2026 से 31 मार्च, 2031 तक की पांच वर्षीय अवधि के लिए प्रभावी होंगी। यह रिपोर्ट ऐसे समय में प्रस्तुत की गई है जब भारत वैश्विक स्तर पर तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है। आयोग के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती 'समानता' और 'दक्षता' के बीच संतुलन स्थापित करना था, ताकि विकसित राज्यों को उनके प्रदर्शन के लिए पुरस्कृत किया जा सके और पिछड़े राज्यों को मुख्यधारा में लाने हेतु पर्याप्त संसाधन प्रदान किए जा सकें।
वित्त आयोग का संवैधानिक अधिदेश
वित्त आयोग एक अर्द्ध-न्यायिक और संवैधानिक निकाय है जिसका प्राथमिक उत्तरदायित्व केंद्र और राज्यों के मध्य वित्तीय संतुलन सुनिश्चित करना है। इसके मुख्य स्तंभ हैं:
ऊर्ध्वाधर हस्तांतरण: केंद्र के विभाज्य कर पूल में राज्यों की कुल प्रतिशत हिस्सेदारी का निर्धारण।
क्षैतिज हस्तांतरण: राज्यों के बीच संसाधनों के आवंटन हेतु वस्तुनिष्ठ मानदंड निश्चित करना।
16वें वित्त आयोग की मुख्य घोषणाएं एवं नवाचार
- फरवरी 2026 में प्रस्तुत रिपोर्ट के प्रमुख स्तंभ निम्नलिखित हैं:
- ऊर्ध्वाधर स्थिरता: आयोग ने राज्यों के लिए ऊर्ध्वाधर हस्तांतरण को 41% पर स्थिर रखा है। यह वित्तीय निरंतरता केंद्र को रक्षा, आंतरिक सुरक्षा और राष्ट्रीय बुनियादी ढांचे के लिए आवश्यक पूंजी सुरक्षित रखने की अनुमति देती है।
- 'जीडीपी योगदान' का समावेश: पहली बार राज्यों के 'जीडीपी में योगदान' को 10% का वेटेज दिया गया है। यह दक्षता आधारित संघवाद की दिशा में एक बड़ा कदम है।
- स्थानीय निकायों हेतु 'भव्य सौदा': शहरी स्थानीय निकायों (ULGs) के लिए अनुदान को बढ़ाकर ₹3.5 लाख करोड़ किया गया है। इसका उद्देश्य तीव्र शहरीकरण की चुनौतियों जैसे स्वच्छता और अपशिष्ट प्रबंधन का समाधान करना है।
- राजस्व घाटा अनुदान का अंत: आयोग ने इस अनुदान को पूरी तरह समाप्त करने की सिफारिश की है, जो राज्यों को आत्मनिर्भर बनाने और राजकोषीय अनुशासन की ओर धकेलने का संकेत है।
- विभाज्य पूल का संकुचन: आयोग ने स्वीकार किया है कि 'उपकर और अधिभार' के कारण राज्यों का वास्तविक हिस्सा 41% से घटकर अक्सर 38-39% रह जाता है। इसे सुधारने हेतु एक एकीकृत कर ढांचे का प्रस्ताव दिया गया है।
क्षैतिज हस्तांतरण: नया फॉर्मूला एवं तुलना
16वें वित्त आयोग ने हस्तांतरण के मानदंडों को व्यापक रूप से पुनर्संतुलित किया है:
मानदंड | वेटेज | उद्देश्य एवं तर्क |
आय की दूरी | 42.5% | क्षेत्रीय असमानताओं को पाटने हेतु। |
जनसंख्या (2011) | 17.5% | राज्यों की सेवा वितरण लागत और प्रशासनिक आवश्यकताओं हेतु। |
जीडीपी में योगदान | 10% | (नया) आर्थिक उत्पादन और 'दक्षता' को पुरस्कृत करने हेतु। |
क्षेत्रफल | 10% | भौगोलिक विस्तार और प्रशासनिक पहुंच की लागत हेतु। |
वन और पारिस्थितिकी | 10% | वैश्विक जलवायु लक्ष्यों और पारिस्थितिकी संरक्षण हेतु। |
जनसांख्यिकीय प्रदर्शन | 10% | जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों को प्रोत्साहन। |
विशेष: आयोग ने 'कर प्रयास' को हटाकर उसके स्थान पर 'जीडीपी योगदान' को प्राथमिकता दी है। |
महत्व एवं विश्लेषण
- दक्षता बनाम समानता का द्वंद्व
- जहाँ आय की दूरी को उच्च वेटेज देना सामाजिक न्याय सुनिश्चित करता है, वहीं जीडीपी योगदान को शामिल करना विकसित राज्यों (जैसे महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक) के लिए उत्साहजनक है।
- आलोचकों का तर्क है कि इससे उन राज्यों को नुकसान हो सकता है जो औद्योगिक रूप से पिछड़े हैं (जैसे बिहार, ओडिशा), जिससे क्षेत्रीय विकास की खाई बढ़ सकती है।
राजकोषीय अनुशासन और संरचनात्मक सुधार
- घाटे का लक्ष्य: केंद्र को 2030-31 तक राजकोषीय घाटा 3.5% और राज्यों को 3% पर लाने का निर्देश दिया गया है।
- ऑफ-बजट उधारी पर अंकुश: राज्यों द्वारा पारदर्शिता बढ़ाने के लिए बजट से बाहर जाकर ऋण लेने पर सख्त पाबंदी लगाई गई है।
- DISCOMs का सुधार: बिजली वितरण कंपनियों के निजीकरण और सुधार को वित्तीय सहायता से जोड़कर 'सुधार आधारित वित्तीयन' पर बल दिया गया है।
उत्तर-दक्षिण विमर्श
- जनसंख्या के वेटेज को स्थिर रखने और जीडीपी को महत्व देने से दक्षिणी राज्यों की यह शिकायत कुछ हद तक कम हुई है कि उन्हें उनके बेहतर प्रदर्शन के लिए दंडित किया जाता है। फिर भी, राजस्व घाटा अनुदान को समाप्त करना केरल और पंजाब जैसे राज्यों के लिए वित्तीय संकट का कारण बन सकता है।
भू-राजनीतिक एवं आर्थिक चुनौतियां
- नाममात्र जीडीपी का आकलन: लेख में यह उल्लेख करना आवश्यक है कि आयोग ने आधार वर्ष (2025-26) की जीडीपी का अनुमान NSO के डेटा से अधिक लगाया है। यदि वास्तविक विकास दर इससे कम रहती है, तो कर प्राप्ति कम होगी और राज्यों का हिस्सा स्वतः घट जाएगा।
- सहकारी बनाम प्रतिस्पर्धी संघवाद: यह रिपोर्ट राज्यों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ाती है (जीडीपी के माध्यम से) लेकिन केंद्र के 'सेस और सरचार्ज' के प्रति नरम रुख राज्यों की स्वायत्तता पर प्रश्नचिह्न लगाता है।
आगे की राह
- पारदर्शिता और एकीकरण: केंद्र को धीरे-धीरे उपकर और अधिभार को मूल कर ढांचे में समाहित करना चाहिए ताकि राज्यों को उनका वास्तविक 41% हिस्सा प्राप्त हो सके।
- क्षमता संवर्द्धन: राज्यों को अब केवल हस्तांतरण पर निर्भर रहने के बजाय अपनी जीडीपी और निवेश वातावरण (ईज ऑफ़ दोंग बिज़नेस) को सुधारने पर ध्यान केंद्रित करना होगा।
- स्थानीय शासन: स्थानीय निकायों को दिए जा रहे ₹3.5 लाख करोड़ का उपयोग 'स्मार्ट' और 'सतत' शहरों के निर्माण के लिए होना चाहिए, न कि केवल प्रशासनिक व्यय के लिए।
निष्कर्ष
16वें वित्त आयोग की रिपोर्ट भारत के राजकोषीय संघवाद में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन बिंदु है। यह समझौता केवल आर्थिक संसाधनों का वितरण नहीं है, बल्कि 21वीं सदी के 'न्यू इंडिया' की बदलती प्राथमिकताओं का प्रतिबिंब है। यह सौदा 'मेक इन इंडिया' और $5 ट्रिलियन अर्थव्यवस्था के लक्ष्यों के लिए उत्प्रेरक का कार्य करेगा। यदि भारत अपनी भू-राजनीतिक जटिलताओं और राज्यों के आंतरिक असंतोष को कुशलतापूर्वक प्रबंधित कर लेता है, तो यह आयोग भारतीय कूटनीति और राजकोषीय नीति की सबसे बड़ी सफलताओं में से एक गिना जाएगा। अंततः, सहकारी संघवाद की सफलता केवल हस्तांतरण के फॉर्मूले पर नहीं, बल्कि केंद्र और राज्यों के बीच 'परस्पर विश्वास' और 'साझा उत्तरदायित्व' पर निर्भर करेगी।
सामान्य अध्ययन पेपर – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध
सामान्य अध्ययन पेपर – III प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन
संदर्भ
फरवरी 2026 में भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच एक ऐतिहासिक व्यापार समझौते की रूपरेखा तैयार हुई है। यह समझौता ऐसे समय में आया है जब वैश्विक अर्थव्यवस्था संरक्षणवाद और आपूर्ति श्रृंखला के विखंडन से जूझ रही है। अगस्त 2025 में अमेरिका द्वारा भारतीय वस्तुओं पर लगाए गए दंडात्मक शुल्कों (25% पारस्परिक + 25% रूसी तेल खरीद हेतु दंडात्मक) के बाद उपजे व्यापारिक गतिरोध को समाप्त करने की दिशा में यह एक निर्णायक कदम है। यह समझौता न केवल आर्थिक संबंधों को पुनर्परिभाषित करता है, बल्कि 'रणनीतिक स्वायत्तता' और 'आर्थिक सुदृढ़ता' के बीच संतुलन का एक नया अध्याय है।
मुख्य बिंदु
- पारस्परिक शुल्क में कटौती: अमेरिका ने भारतीय वस्तुओं पर लगने वाले प्रभावी टैरिफ को 50% से घटाकर 18% करने पर सहमति व्यक्त की है।
- संवेदनशील क्षेत्रों का संरक्षण: भारत ने अपनी कृषि और डेयरी जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को इस समझौते के दायरे से पूर्णतः बाहर रखा है, जिससे घरेलू किसानों के हितों की रक्षा सुनिश्चित हुई है।
- ऊर्जा और तकनीक प्रतिबद्धता: भारत ने अगले पांच वर्षों में अमेरिका से ऊर्जा (तेल, गैस, कोयला), उन्नत चिप्स, डेटा सेंटर और विमानन क्षेत्र में $500 बिलियन से अधिक की खरीद का लक्ष्य रखा है।
- बाजार पहुंच: भारत अमेरिका के लिए 'शून्य टैरिफ' और गैर-टैरिफ बाधाओं को हटाने की दिशा में चरणबद्ध तरीके से कार्य करेगा।
- रूसी तेल पर प्रतिबद्धता: समझौते के एक महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में भारत ने यूक्रेन युद्ध के परिप्रेक्ष्य में रूसी तेल की खरीद को बंद करने और अमेरिकी व वेनेजुएला के तेल की ओर रुख करने का संकेत दिया है।
समझौते का महत्व और प्रभाव
भारत पर प्रभाव:
निर्यात में वृद्धि: परिधान, रत्न-आभूषण, और रसायन जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों को भारी राहत मिलेगी। 18% टैरिफ के साथ भारतीय उत्पाद वियतनाम और बांग्लादेश जैसे प्रतिस्पर्धियों के समकक्ष अधिक प्रतिस्पर्धी हो जाएंगे।
शेयर बाजार और रुपया: इस घोषणा से भारतीय बाजारों (Sensex/Nifty) में सकारात्मक उत्साह देखा गया है और रुपया मजबूत हुआ है, जो विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) को आकर्षित करेगा।
अमेरिका पर प्रभाव:
- व्यापार घाटे में कमी: भारत द्वारा $500 बिलियन की खरीद प्रतिबद्धता से अमेरिका के व्यापार घाटे की समस्या का समाधान होगा।
- रोजगार सृजन: 'बाय अमेरिकन' नीति के तहत भारत के बड़े ऑर्डर्स (विशेषकर विमानन और ऊर्जा क्षेत्र में) अमेरिकी विनिर्माण क्षेत्र को गति देंगे।
- वैश्विक परिदृश्य
- यह सौदा वैश्विक व्यापार में 'चीन प्लस वन' रणनीति को सुदृढ़ करता है। भारत और अमेरिका का निकट आना वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में चीन के प्रभुत्व को चुनौती देता है और लोकतांत्रिक देशों के बीच आर्थिक एकीकरण का संदेश देता है।
भारत-रूस संबंधों पर संभावित प्रभाव
- यह इस समझौते का सबसे चुनौतीपूर्ण कूटनीतिक पहलू है:
- ऊर्जा कूटनीति में बदलाव: रूस भारत का सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता रहा है। तेल खरीद बंद करने का निर्णय रूस के लिए एक बड़ा आर्थिक झटका हो सकता है।
- सामरिक असंतुलन: रूस के साथ भारत के दशकों पुराने रक्षा और सामरिक संबंध रहे हैं। अमेरिका के साथ इस स्तर का आर्थिक समझौता रूस को चीन के और अधिक करीब धकेल सकता है, जो भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए चिंता का विषय हो सकता है।
- विश्वसनीयता की परीक्षा: भारत को यह स्पष्ट करना होगा कि यह निर्णय विशुद्ध रूप से आर्थिक और 'राष्ट्रीय हित' पर आधारित है, न कि किसी विशेष खेमेबाजी का हिस्सा।
विश्लेषण
- यह समझौता भारत की 'व्यावहारिक विदेश नीति' का परिचायक है। एक ओर जहां भारत ने अपनी कृषि सुरक्षा से समझौता नहीं किया, वहीं दूसरी ओर अमेरिकी बाजार तक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए ऊर्जा स्रोतों में बदलाव का साहसिक निर्णय लिया।
- 18% टैरिफ अभी भी शून्य नहीं है, लेकिन 50% के मुकाबले यह एक बड़ी जीत है। भारत अब 'क्रेता' के रूप में अपनी क्रय शक्ति का उपयोग अपनी 'निर्यात क्षमता' बढ़ाने के लिए कर रहा है।
आगे की राह
- घरेलू विनिर्माण: केवल टैरिफ कटौती पर्याप्त नहीं है; भारत को अपनी लॉजिस्टिक्स लागत कम करनी होगी और वैश्विक मानकों के अनुरूप गुणवत्ता सुधारनी होगी।
- ऊर्जा विविधीकरण: अमेरिका से ऊर्जा खरीद के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचे (LNG टर्मिनल आदि) को तेजी से विकसित करना होगा।
- संतुलनकारी कूटनीति: भारत को रूस के साथ अपने गैर-तेल संबंधों (विशेषकर रक्षा और अंतरिक्ष) को बनाए रखने के लिए एक समानांतर कूटनीतिक चैनल सक्रिय रखना चाहिए।
निष्कर्ष
यह समझौता आर्थिक लाभ और रणनीतिक चुनौती का एक जटिल मिश्रण है, जो 21वीं सदी की बदलती विश्व व्यवस्था को प्रतिबिंबित करता है। जहाँ यह 'मेक इन इंडिया' और $5 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था के लिए उत्प्रेरक बन सकता है, वहीं अमेरिका द्वारा इसे 'भारत के अनुरोध' के रूप में पेश करना हमारी रणनीतिक स्वायत्तता के लिए एक गंभीर परीक्षा है। यदि भारत रूस के साथ अपने पारंपरिक संबंधों को संतुलित करते हुए इस भू-राजनीतिक जटिलता का प्रबंधन कर लेता है, तो यह भारतीय कूटनीति की बड़ी सफलता होगी, अन्यथा यह रूस-चीन धुरी को मजबूत कर नई क्षेत्रीय चुनौतियाँ पैदा कर सकता है।