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1975 का आपातकाल और एनसीईआरटी पाठ्यक्रम: लोकतांत्रिक शिक्षा, ऐतिहासिक स्मृति और निष्पक्षता का संतुलन

सामान्य अध्ययन पेपर  – II:  शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध।


संदर्भ

भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में वर्ष 1975 का आपातकाल एक अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील घटना रही है। हाल ही में, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) ने अपनी कक्षा 9 की पाठ्यपुस्तक 'अंडरस्टैंडिंग सोसाइटी: इंडिया एंड बियॉन्ड' में 1975 के आपातकाल को आधिकारिक रूप से शामिल किया है।

1975 आपातकाल

जून 1975 में तत्कालीन सरकार द्वारा संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत 'आंतरिक अशांति' के आधार पर राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा की गई थी। यह दौर मौलिक अधिकारों के निलंबन, प्रेस सेंसरशिप और राजनीतिक विरोधियों की व्यापक गिरफ्तारियों के लिए जाना जाता है।

चर्चा के कारण

  • NCERT में समावेशन: पहली बार कक्षा 9 के स्तर पर आपातकाल का संदर्भ दिया गया है, जबकि पूर्व में यह केवल कक्षा 12 की राजनीति विज्ञान की पुस्तक तक सीमित था।

  • स्वर्ण जयंती: भारत ने हाल ही में आपातकाल की घोषणा के 50 वर्ष पूरे किए हैं, जो इस विषय पर नई शैक्षणिक और राजनीतिक चर्चा को प्रेरित करता है।
  • राजनीतिक विमर्श: प्रधानमंत्री ने आपातकाल को "संविधान पर सीधा हमला" बताया है, जबकि NCERT ने इसे "लोकतंत्र के लिए एक बड़ी चुनौती" के रूप में प्रस्तुत किया है।

NCERT अध्याय में क्या-क्या शामिल किया गया है?

  • पृष्ठभूमि: इंदिरा गांधी सरकार के प्रति बढ़ता असंतोष, बेरोजगारी, मुद्रास्फीति और कुशासन के आरोप।

  • परिणाम: मौलिक अधिकारों का निलंबन, प्रेस सेंसरशिप और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर गहरा दबाव।
  • जन आंदोलन: जयप्रकाश नारायण (लोकनायक) के नेतृत्व में बिहार और गुजरात में हुए छात्र और नागरिक आंदोलनों का उल्लेख।
  • लोकतंत्र की जीत: 1977 में आपातकाल हटने और चुनावों में सत्तारूढ़ दल की हार को भारतीय लोकतंत्र की मजबूती के रूप में दिखाया गया है।

पाठ्यक्रम में अन्य प्रमुख सुधार

पाठ्यपुस्तक में आपातकाल के अलावा निम्नलिखित महत्वपूर्ण विषयों को भी स्थान दिया गया है:

  • प्राचीन लोकतांत्रिक परंपराओं और उनकी समकालीन प्रासंगिकता का विवरण।
  • चुनाव आयोग की भूमिका और 'स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनावों' का महत्व।
  • महिला अधिकार और स्थानीय निकायों में महिला आरक्षण पर एक पूर्ण पृष्ठ।
  • लोकतांत्रिक प्रथाओं के समक्ष चुनौतियां (फर्जी खबरें, गरीबी, क्षेत्रवाद, सामाजिक भेदभाव)

आपातकाल (1975) का पाठ्यक्रम में समावेशन:

समावेशन के पक्ष में तर्क

  • लोकतांत्रिक साक्षरता: लोकतंत्र में केवल 'अधिकारों' का अध्ययन पर्याप्त नहीं है; यह समझना भी अनिवार्य है कि जब संवैधानिक संस्थाओं पर संकट आता है, तो उसके परिणाम क्या होते हैं।
  • इतिहास की समग्रता: इतिहास को 'अपूर्ण' नहीं रखा जा सकता। आपातकाल भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसे पढ़ाकर छात्रों को संवैधानिक मूल्यों के प्रति अधिक जागरूक बनाया जा सकता है।
  • जागरूकता और सीख: जैसा कि शिक्षा मंत्री ने कहा, इस विषय को शामिल करने का उद्देश्य नई पीढ़ी को उन परिस्थितियों से परिचित कराना है ताकि भविष्य में संवैधानिक मूल्यों का हनन हो।

समावेशन के विरुद्ध/आलोचनात्मक तर्क

  • तटस्थता की चुनौती: आलोचकों का तर्क है कि शैक्षणिक पाठ्यक्रम में किसी भी ऐतिहासिक घटना का वर्णन पूरी तरह से वस्तुनिष्ठ होना चाहिए। यदि घटना के चयन या उसकी व्याख्या में राजनीतिक झुकाव हो, तो यह शिक्षा की निष्पक्षता को प्रभावित कर सकता है।

  • प्रसंग की पूर्णता: कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि आपातकाल का अध्ययन केवल एक 'घटना' के रूप में नहीं, बल्कि उस समय की राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों के विस्तृत विश्लेषण के साथ होना चाहिए, अन्यथा यह एकतरफा विमर्श बन सकता है।
  • चयन प्रक्रिया: यह बहस का विषय है कि किन ऐतिहासिक घटनाओं को प्राथमिकता दी जानी चाहिए और किसे नहीं। आलोचक अक्सर इस बात पर जोर देते हैं कि पाठ्यक्रम का निर्माण एक व्यापक अकादमिक सहमति के आधार पर होना चाहिए।

भारतीय संविधान में आपातकालीन प्रावधान

भारतीय संविधान के भाग XVIII (अनुच्छेद 352-360) में आपातकालीन प्रावधान दिए गए हैं:

  • अनुच्छेद 352 (राष्ट्रीय आपातकाल): युद्ध, बाहरी आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह के आधार पर। (44वें संविधान संशोधन द्वारा 'आंतरिक अशांति' को 'सशस्त्र विद्रोह' से बदला गया)
  • अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन): राज्यों में संवैधानिक तंत्र विफल होने पर।
  • अनुच्छेद 360 (वित्तीय आपातकाल): देश की वित्तीय स्थिरता को खतरा होने पर।

विश्लेषण

लोकतंत्र में इतिहास का अध्ययन केवल सूचना प्राप्त करने का साधन नहीं, बल्कि 'चिंतन' विकसित करने का एक उपकरण है। 1975 के आपातकाल का पाठ्यक्रम में होना अपने आप में 'सही' या 'गलत' नहीं है, बल्कि यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसे किस संदर्भ और किस तटस्थता के साथ पढ़ाया जा रहा है। एक मजबूत लोकतंत्र वह है जो अपने इतिहास के हर चुनौतीपूर्ण अध्याय को साहस और ईमानदारी के साथ स्वीकार करे और उससे सीख ले।

आगे की राह

  • बहुआयामी शिक्षण: शिक्षकों को छात्रों को आपातकाल के दौरान के राजनीतिक विरोध और संवैधानिक रक्षा के संघर्षों, दोनों पक्षों को समझाने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।

  • साक्ष्य-आधारित अध्ययन: पाठ्यक्रम में शामिल की गई सामग्री को अधिक डेटा, न्यायालय के निर्णयों और उस समय की ऐतिहासिक साक्ष्यों के साथ जोड़ना चाहिए, ताकि छात्र स्वयं निष्कर्ष निकाल सकें।
  • संवाद: पाठ्यक्रम में बदलाव करते समय अकादमिक विशेषज्ञों, इतिहासकारों और शिक्षाविदों के साथ निरंतर संवाद बनाए रखना चाहिए ताकि शिक्षा का लोकतंत्रीकरण सुनिश्चित हो सके।

निष्कर्ष:

पाठ्यक्रम में किसी भी विषय को जोड़ना एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। शिक्षा का उद्देश्य किसी ऐतिहासिक घटना का महिमामंडन या आलोचना करना नहीं, बल्कि उसके तथ्यों, कारणों और परिणामों का विवेकपूर्ण विश्लेषण प्रस्तुत करना है। यदि 1975 के आपातकाल को इसी दृष्टिकोण से पढ़ाया जाए, तो यह विद्यार्थियों में संवैधानिक मूल्यों, लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व और आलोचनात्मक चिंतन को विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता


  

जहाज निर्माण मेंमेक इन इंडिया: दक्षिण कोरिया के साथ नई रणनीतिक उड़ान

सामान्य अध्ययन पेपर – III  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन।


संदर्भ

भारत सरकार 'मेक इन इंडिया' और 'आत्मनिर्भर भारत' के तहत समुद्री क्षेत्र में अपनी क्षमताओं का विस्तार करना चाहती है। इसी कड़ी में, भारत के जहाज निर्माण उद्योग को पुनर्जीवित करने के लिए दक्षिण कोरिया के साथ सहयोग एक महत्वपूर्ण रणनीतिक कदम के रूप में उभर रहा है।

भारत-दक्षिण कोरिया संबंध

दोनों देशों के बीच संबंध 'विशेष रणनीतिक साझेदारी' के दायरे में आते हैं। हाल के वर्षों में रक्षा, प्रौद्योगिकी और व्यापार में सहयोग बढ़ा है। दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति ली जे म्यूंग की भारत यात्रा ने इस द्विपक्षीय संबंधों को एक नया आयाम दिया है, विशेष रूप से उच्च-स्तरीय राजनीतिक बातचीत को पुनर्जीवित कर रणनीतिक क्षेत्रों में साझेदारी का विस्तार किया है।

चर्चा के कारण: जहाज निर्माण में नया मोड़

  • ऐतिहासिक यात्रा: दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति ली जे म्यूंग की भारत यात्रा आठ वर्षों में किसी कोरियाई नेता की पहली यात्रा थी।

  • सकारात्मक गति: राष्ट्रपति ली की यात्रा ने भारत-दक्षिण कोरिया जहाज निर्माण साझेदारी को नई गति प्रदान की है।
  • समझौता ज्ञापन (MoU): यात्रा के दौरान हस्ताक्षरित समझौतों और MoUs की श्रृंखला इस सहयोग की गंभीरता को दर्शाती है।

दक्षिण कोरिया और जहाज निर्माण

दक्षिण कोरिया वैश्विक जहाज निर्माण का पावरहाउस है। 1970 के दशक में एक छोटे खिलाड़ी से शुरू होकर, मात्र 15 वर्षों में यह वैश्विक नेतृत्वकर्ता बन गया। कोरिया मरीन इक्विपमेंट एसोसिएशन (KOMEA) जैसी संस्थाएं, जिसमें 304 उद्यम शामिल हैं, जहाज डिजाइन से लेकर मरम्मत तक की पूरी चेन प्रदान करती हैं।

भारत को होने वाले लाभ

  • प्रौद्योगिकी हस्तांतरण: भारतीय शिपयार्डों को डिजाइन, इंजीनियरिंग और उत्पादन की उन्नत तकनीक मिलेगी।

  • मानव पूंजी: कौशल विकास और समुद्री शिक्षा के माध्यम से भारत की श्रमशक्ति अधिक प्रतिस्पर्धी बनेगी।
  • ग्लोबल हब: भारत वैश्विक दिग्गजों के लिए जहाज निर्माण का प्रमुख गंतव्य बनेगा।

व्यापारिक आंकड़े और संरचना

  • दक्षिण कोरिया के साथ व्यापार में समुद्री क्षेत्र की हिस्सेदारी बढ़ रही है।

  • हुंडई की सहायक कंपनी द्वारा तमिलनाडु में 4 अरब डॉलर का निवेश किया जाना व्यापार की नई ऊंचाइयों का संकेत है।
  • तटीय और सहायक उद्योगों के लिए KOMEA ने मुंबई में कार्यालय खोलकर व्यापारिक संबंधों को संस्थागत रूप दिया है।

हालिया यात्रा में मुख्य डील और समझौते

  • सैमसंग हैवी इंडस्ट्रीज (SHI): स्वान डिफेंस एंड हैवी इंडस्ट्रीज के साथ साझेदारी।

  • हुंडई सहायक: कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड के साथ MoU और तमिलनाडु में ग्रीन शिपयार्ड हेतु निवेश।
  • सरकारी सहयोग: समुद्री शिक्षा, अनुसंधान और नवाचार पर G2G (सरकार से सरकार) और B2B (व्यावसायिक) स्तर पर समझौता।

अन्य महत्वपूर्ण बिंदु

  • दृष्टिकोण: भारत का 'मैरीटाइम विजन 2030' और 'अमृत काल विजन 2047' के तहत 2047 तक टॉप 5 जहाज निर्माण देशों में शामिल होने का लक्ष्य है।

  • वित्तीय सहायता: सागरमाला फाइनेंस कॉरपोरेशन लिमिटेड (SFCL) का गठन समुद्री क्षेत्र के लिए एक क्रांतिकारी कदम है।
  • क्लस्टर विकास: उल्सान मॉडल की तर्ज पर भारत में भी जहाज निर्माण क्लस्टर विकसित किए जाएंगे।

विश्लेषण

भारत की जहाज निर्माण महत्वाकांक्षाएं महत्वाकांक्षी हैं लेकिन अव्यावहारिक नहीं। इस क्षेत्र में सफलता के लिए नीतिगत निरंतरता, दीर्घकालिक पूंजी और तकनीक के आत्मसात करने की क्षमता अनिवार्य है। यह साझेदारी भारत को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का एक अभिन्न हिस्सा बनाने की क्षमता रखती है, जो इसे चीन जैसे दिग्गजों के समकक्ष खड़ा कर सकती है।

आगे की राह

  • नियामक सुधार: विनिर्माण और निवेश के लिए कानूनी प्रक्रिया को सरल और पूर्वानुमानित बनाना होगा।

  • आपूर्ति श्रृंखला स्थानीयकरण: भारत को केवल असेंबली तक सीमित रहकर सहायक उद्योगों को स्थानीय स्तर पर विकसित करना होगा।
  • रणनीतिक तालमेल: केंद्र और राज्य सरकारों को मिलकर निवेश परियोजनाओं की बाधाओं को दूर करना होगा।

निष्कर्ष

दक्षिण कोरिया के साथ यह साझेदारी भारत के समुद्री औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र को नई पहचान देने के लिए एक 'सिद्ध मार्ग' प्रस्तुत करती है। यदि भारत निरंतर नीतिगत सहयोग, वित्तीय सहायता और कुशल कार्यबल के तीन स्तंभों पर ध्यान केंद्रित करे, तो वह निश्चित रूप से एक वैश्विक जहाज निर्माण शक्ति के रूप में उभर सकता है। यह सहयोग केवल आर्थिक विकास का इंजन होगा, बल्कि भारत की रणनीतिक समुद्री स्वायत्तता को भी सशक्त करेगा।


नेत्र


संदर्भ

भारतीय रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर हासिल करते हुए, स्वदेशी रूप से विकसित 'नेत्र' (Netra) एयरबोर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल (AEW&C) सिस्टम को 'फाइनल ऑपरेशनल क्लीयरेंस' (FOC) प्रदान की गई है।

वर्तमान समाचार

  • फाइनल ऑपरेशनल क्लीयरेंस (FOC): गुरुवार को नेत्र को आधिकारिक रूप से अंतिम परिचालन मंजूरी मिल गई है।

  • पिछला प्रदर्शन: नेत्र ने 2019 के बालाकोट हवाई हमलों और पिछले वर्ष हुए 'ऑपरेशन सिंदूर' में भारतीय वायु सेना (IAF) के लिए एक 'फोर्स मल्टीप्लायर' (सेना की मारक क्षमता को कई गुना बढ़ाने वाला) के रूप में निर्णायक भूमिका निभाई थी।
  • विकास: इसे बेंगलुरु स्थित 'सेंटर फॉर एयरबोर्न सिस्टम्स' (CABS) द्वारा स्वदेशी तकनीक से तैयार किया गया है।
  • भविष्य की योजना: सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति (CCS) ने CABS द्वारा छह और 'AEW&C Mk-1A' सिस्टम विकसित करने की मंजूरी दे दी है।
  • समर्पण: वैज्ञानिकों और वायु सेना के अधिकारियों ने यह उपलब्धि 11 जनवरी 1999 को एक हवाई दुर्घटना में जान गंवाने वाले अपने वीर सहयोगियों को समर्पित की है।

नेत्र (NETRA)

नेत्र क्या है?

नेत्र (NETRA) एक स्वदेशी 'एयरबोर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल' (AEW&C) सिस्टम है। यह हवा में उड़ता हुआ एक 'राडार' है जो दुश्मन के विमानों, मिसाइलों और समुद्री लक्ष्यों की निगरानी करता है।

यह कैसे कार्य करता है?

  • एकीकरण: नेत्र को ब्राजीलियाई 'एम्ब्रेयर EMB-145' विमान प्लेटफॉर्म पर एकीकृत किया गया है।

  • तकनीकी क्षमताएं: इसमें 'एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड एरे' (AESA) रडार, 'आइडेंटिफिकेशन फ्रेंड ऑर फो' (IFF), मिशन कंप्यूटर और सुरक्षित संचार नेटवर्क जैसी अत्याधुनिक सुविधाएं शामिल हैं।
  • निगरानी: यह दुश्मन और मित्र देशों के हवाई और समुद्री लक्ष्यों का पता लगाने, ट्रैक करने और उनकी पहचान करने में सक्षम है, जिससे वायु सेना को नेटवर्क-सेंट्रिक युद्ध में बढ़त मिलती है।

किसने बनाया और किस प्रोजेक्ट के तहत?

  • विकास: इसे रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) के तहत बेंगलुरु स्थित 'सेंटर फॉर एयरबोर्न सिस्टम्स' (CABS) द्वारा विकसित किया गया है।

  • इतिहास: इस कार्यक्रम की शुरुआत 1980 के दशक में हुई थी, लेकिन 1999 की एक दुखद दुर्घटना के कारण इसे अस्थायी रूप से बंद करना पड़ा था। यह कार्यक्रम 2004 में दोबारा शुरू किया गया।

उपलब्धियां:

  • भारत इस क्षमता को विकसित करने वाला दुनिया का पाँचवाँ देश बन गया है।

  • 2015 में नेत्र को 'इनिशियल ऑपरेशनल क्लीयरेंस' (IOC) मिली और 2017 में इसे भारतीय वायु सेना में शामिल किया गया था।
  • वर्तमान में इसे पूर्ण परिचालन (FOC) मंजूरी मिल गई है, जो इसकी विश्वसनीयता को साबित करता है।

निष्कर्ष:

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नेत्र (AEW&C) को अंतिम परिचालन मंजूरी (FOC) मिलना भारत की रक्षा आत्मनिर्भरता, उन्नत निगरानी क्षमता तथा नेटवर्क-केंद्रित युद्ध प्रणाली की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। यह केवल भारतीय वायु सेना की परिचालन दक्षता को सुदृढ़ नहीं करता, बल्कि 'आत्मनिर्भर भारत' और स्वदेशी रक्षा प्रौद्योगिकी के माध्यम से भारत की सामरिक क्षमता एवं भविष्य की सुरक्षा आवश्यकताओं को भी नई मजबूती प्रदान करता है।

वेनेज़ुएला में भूकंपीय आपदा: एक विस्तृत भू-वैज्ञानिक और मानवीय विश्लेषण

सामान्य अध्ययन पेपर – III  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन।


संदर्भ

वेनेज़ुएला में 24 जून, 2026 को आए दो शक्तिशाली भूकंपों (क्रमशः 7.2 और 7.5 तीव्रता के 'डबलेट' भूकंप) ने देश के उत्तरी हिस्से में भारी तबाही मचाई है। ये घटनाएँ दशकों से चल रही भू-गर्भीय हलचलों का परिणाम हैं, जो इस क्षेत्र को विश्व के सबसे संवेदनशील भूकंपीय क्षेत्रों में से एक बनाती हैं।

वेनेज़ुएला:

दक्षिण अमेरिका के उत्तरी तट पर स्थित वेनेज़ुएला, कैरेबियन सागर और अटलांटिक महासागर के बीच एक रणनीतिक स्थान रखता है। यह देश अपने विशाल तेल और खनिज भंडारों के लिए जाना जाता है, लेकिन वर्तमान में यह राजनीतिक और आर्थिक चुनौतियों के साथ-साथ प्राकृतिक आपदाओं के दोहरे संकट से जूझ रहा है।

चर्चा के प्रमुख कारण

  • डबलेट भूकंप: 39 सेकंड के अंतराल पर आए दो बड़े भूकंपों ने संरचनाओं को गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त कर दिया है।

  • मानवीय त्रासदी: बड़ी संख्या में लोग हताहत हुए हैं, और सैकड़ों लोग मलबे में फंसने की सूचना है।
  • आधारभूत ढांचे को क्षति: कराकस का अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा और प्रमुख पेट्रोकेमिकल सुविधाएं क्षतिग्रस्त हुई हैं।
  • द्वितीयक खतरे: भूकंप के बाद भूस्खलन और द्रवीकरण का खतरा बढ़ गया है, जिससे राहत कार्यों में कठिनाई हो रही है।

वेनेज़ुएला की भौगोलिक अवस्थिति और टेक्टोनिक प्लेट्स

वेनेज़ुएला 'कैरेबियन प्लेट' और 'दक्षिण अमेरिकी प्लेट' की सीमा पर स्थित है। यहाँ 'बोकोनो-मोरोन-एल पिलर' फॉल्ट सिस्टम है, जो 1,300 किमी लंबा है और कैलिफोर्निया के 'सैन एंड्रियास फॉल्ट' के समान है। ये प्लेटें एक-दूसरे के क्षैतिज खिसकती हैं जिससे भारी ऊर्जा संचित होती है और अचानक भूकंप के रूप में निकलती है। कोलंबिया, पनामा और कैरेबियन द्वीप समूह भी इसी तरह की प्लेट सीमाओं पर स्थित हैं।

भूकंप क्या है?

भूकंप पृथ्वी की सतह का अचानक हिलना है, जो पृथ्वी के भीतर संचित ऊर्जा के अचानक रिलीज होने के कारण होता है। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:

  • प्लेट टेक्टोनिक्स: प्लेटों का टकराना, एक-दूसरे के ऊपर चढ़ना या आपस में रगड़ना भूकंप का सबसे सामान्य कारण है।
  • ज्वालामुखी विस्फोट: ज्वालामुखी के फटने से भी ज़मीन के अंदर तीव्र कंपन उत्पन्न होते हैं।
  • मानवजनित गतिविधियाँ: खदानों में विस्फोट, परमाणु परीक्षण और फ्रैकिंग भी कंपन पैदा करते हैं।

भूकंपीय आपदा न्यूनीकरण: नीतिगत और व्यावहारिक उपाय

भूकंपीय आपदाओं के प्रति 'प्रतिक्रिया' के स्थान पर 'सक्षमता और सहनशीलता' पर आधारित दृष्टिकोण आवश्यक है:

  • भूकंपीय-अनुकूल अवसंरचना: निर्माण में 'बेस आइसोलेशन' तकनीक का एकीकरण अनिवार्य हो, जो आधार और अधिरचना के बीच शॉक-एब्जॉर्बिंग मैकेनिज्म द्वारा संरचनात्मक क्षति को रोकती है।
  • मानक सामग्री का उपयोग: निर्माण में स्टील और प्रबलित कंक्रीट (RCC) जैसे उच्च तन्यता वाले पदार्थों का प्रयोग सुनिश्चित हो, जो झटकों को अवशोषित कर ऊर्जा वितरित करने में सक्षम हैं।
  • विनियामक सुदृढ़ीकरण (जापान मॉडल): निर्माण संहिताओं का कड़ाई से अनुपालन हो। जापान की भांति नियमित ऑडिट और सख्त प्रवर्तन तंत्र द्वारा संरचनात्मक पतन को न्यूनतम किया जाए।
  • सामुदायिक तैयारी: आपदा प्रबंधन को सामुदायिक स्तर पर अपनाना अनिवार्य है। इसमें 'ड्रॉप, कवर और होल्ड-ऑन' प्रोटोकॉल की नियमित ड्रिल और प्रत्येक परिवार में आपातकालीन किट (प्राथमिक चिकित्सा, गैर-नाशवान भोजन पेयजल) की उपलब्धता सुनिश्चित करना दीर्घकालिक लचीलेपन हेतु आधारभूत है।

वैश्विक प्रतिक्रिया और भारत की भूमिका

  • विश्व: संयुक्त राष्ट्र, UNICEF और विश्व खाद्य कार्यक्रम (WFP) ने तत्काल सहायता प्रदान करने के लिए लामबंदी शुरू कर दी है।

  • भारत: भारत ने वेनेज़ुएला के साथ एकजुटता व्यक्त की है और मानवीय आधार पर हर संभव सहायता देने का आश्वासन दिया है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण

  • डबलेट भूकंप : जब अत्यल्प समयांतराल में समान क्षेत्र में लगभग समान तीव्रता के दो बड़े भूकंप आते हैं, तो उन्हें डबलेट भूकंप कहा जाता है।

  • PAGER प्रणाली (USGS): USGS की प्रॉम्प्ट असेसमेंट ऑफ ग्लोबल अर्थक्वेक्स फॉर रिस्पॉन्स (PAGER) प्रणाली भूकंप के बाद संभावित जनहानि एवं आर्थिक क्षति का त्वरित आकलन करती है, जिससे अंतरराष्ट्रीय राहत एजेंसियों को शीघ्र निर्णय लेने में सहायता मिलती है।
  • संशोधित मर्केली तीव्रता पैमाना (एमएमआई)
  • रिक्टर/मोमेंट मैग्नीट्यूड  (Mw): भूकंप द्वारा मुक्त ऊर्जा को मापता है।
  • MMI पैमाना: वास्तविक भूमि कंपन एवं संरचनात्मक क्षति का आकलन करता है।

अर्थात समान तीव्रता वाले दो भूकंप विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग स्तर की क्षति पहुँचा सकते हैं।

अंतरराष्ट्रीय मानक और दिशा-निर्देश

  • सेंडाई फ्रेमवर्क (2015-2030)

                यह आपदा जोखिम न्यूनीकरण के लिए वैश्विक स्तर पर सबसे महत्वपूर्ण नीतिगत दस्तावेज है।

  • मुख्य उद्देश्य: इसका लक्ष्य आपदाओं से होने वाली मौतों, प्रभावित लोगों की संख्या और आर्थिक नुकसान को बड़े पैमाने पर कम करना है।
  • प्रमुख प्राथमिकता: यह 'बिल्ड बैक बेटर' के सिद्धांत पर जोर देता है, यानी आपदा के बाद निर्माण ऐसा हो जो भविष्य के झटकों को झेलने में पहले से अधिक सक्षम हो।
  • अंतरराष्ट्रीय निर्माण मानक (IBC)

                 भूकंपीय सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए निर्माण क्षेत्र में वैश्विक मानक अपनाए जाते हैं:

  • भूकंपीय डिज़ाइन कोड: विभिन्न देश अपने यहाँ 'यूरोकोड 8' या अमेरिकी 'ASCE 7' जैसे मानकों का पालन करते हैं। ये मानक यह निर्धारित करते हैं कि किसी इमारत को कितनी तीव्रता के भूकंपीय बल को झेलने के लिए डिज़ाइन किया जाना चाहिए।
  • इंजीनियरिंग तकनीकें: इनमें 'बेस आइसोलेशन' और 'डैम्पिंग सिस्टम' जैसे मानक शामिल हैं, जो इमारतों को कंपन के दौरान लचीलापन प्रदान करते हैं।
  • संयुक्त राष्ट्र आपदा मूल्यांकन और समन्वय (UNDAC)

जब किसी देश में विनाशकारी भूकंप आता है, तो संयुक्त राष्ट्र का UNDAC दल अंतरराष्ट्रीय मानक        संचालन प्रक्रियाओं (SOPs) के तहत मदद करता है:

  • त्वरित प्रतिक्रिया: भूकंप के तुरंत बाद मलबे में दबे लोगों को खोजने के लिए 'अंतरराष्ट्रीय खोज और बचाव सलाहकार समूह' (INSARAG) के मानकों का पालन किया जाता है।

भारत के लिए सीख

भारत का लगभग 59% भूभाग विभिन्न भूकंपीय जोखिम क्षेत्रों में स्थित है। भारत को निम्न उपायों को और सुदृढ़ करना चाहिए

  • आईएस 1893: भवनों के भूकंपरोधी डिज़ाइन हेतु भारतीय मानक।
  • आईएस 4326: भूकंपरोधी निर्माण तकनीकों के लिए भारतीय मानक।
  • एनडीएमए दिशा-निर्देश: जोखिम न्यूनीकरण, तैयारी एवं त्वरित प्रतिक्रिया हेतु राष्ट्रीय रूपरेखा।
  • राष्ट्रीय भूकंपीय जोनिंग मानचित्र: भूकंपीय संवेदनशीलता के आधार पर क्षेत्रों का वर्गीकरण।
  • रेट्रोफिटिंग: पुराने भवनों को आधुनिक तकनीकों से अधिक सुरक्षित बनाना।
  • भूकंप प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली: भूकंपीय तरंगों के पहुँचने से पूर्व चेतावनी देकर जन-धन की हानि कम करना।

विश्लेषण

यह आपदा केवल एक प्राकृतिक घटना नहीं है, बल्कि यह वेनेज़ुएला के पुराने होते बुनियादी ढांचे की कमजोरी को भी उजागर करती है। 'डबलेट भूकंप' ने साबित कर दिया है कि किसी भी विकास योजना में भूकंपीय संवेदनशीलता को शामिल करना अब अनिवार्य है।

आगे की राह

  • दीर्घकालिक: पूरे फॉल्ट सिस्टम का पुनर्मूल्यांकन और जोखिम मैपिंग करें।

  • निर्माण नीतियों में सुधार: पुराने भवनों का रेट्रोफिटिंग (मजबूतीकरण) और नए भवनों के लिए कड़े भूकंपीय मानक लागू करें।
  • सामुदायिक प्रशिक्षण: आपदा के दौरान तत्काल प्रतिक्रिया देने के लिए स्थानीय नागरिक सुरक्षा टीमों को प्रशिक्षित करें।
  • तकनीकी निवेश: कृत्रिम बुद्धिमत्ता, GIS एवं रिमोट सेंसिंग आधारित आपदा पूर्वानुमान प्रणालियों में निवेश को प्राथमिकता दें।

निष्कर्ष

वेनेज़ुएला का यह भूकंप स्मरण कराता है कि भूकंप को रोका नहीं जा सकता, परंतु वैज्ञानिक नियोजन, भूकंपरोधी अवसंरचना, प्रभावी आपदा प्रबंधन, सामुदायिक तैयारी तथा अंतरराष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से इसके विनाशकारी प्रभावों को उल्लेखनीय रूप से कम किया जा सकता है। यही आपदा-सहिष्णु एवं सतत विकास की वास्तविक आधारशिला है।


एफसीआरए (FCRA) संशोधन 2026: नागरिक समाज और राष्ट्रीय सुरक्षा के मध्य संतुलन


सामान्य अध्ययन पेपर  – II:  शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध।

संदर्भ

नागरिक समाज संगठन (NGOs) भारत में स्वास्थ्य, शिक्षा, आपदा राहत और नागरिक अधिकारों के संरक्षण में 'फोर्स मल्टीप्लायर' की भूमिका निभाते हैं। विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (FCRA), 2010 का उद्देश्य विदेशी फंडिंग का विनियमन करना है, लेकिन हालिया 'एफसीआरए संशोधन नियम, 2026' ने इन संगठनों के कार्य करने के तरीकों पर व्यापक प्रभाव डाला है।

एफसीआरए (FCRA) नियम 2026 के मुख्य प्रावधान

  • कार्यक्षेत्र का निर्धारण: एनजीओ को अपने कार्य को केवल पंजीकरण में निर्दिष्ट श्रेणी और राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों तक सीमित करना अनिवार्य है।

  • प्रकटीकरण: सोशल मीडिया हैंडल, वेबसाइटों और प्रकाशनों का पूर्ण विवरण देना आवश्यक कर दिया गया है।
  • राजनीतिक गतिविधियों पर प्रतिबंध: "राजनीतिक सामग्री" प्रसारित करने पर कठोर रोक लगाई गई है।
  • वित्तीय अनुपालन: पहले की एकल पंजीकरण शुल्क प्रणाली को बदलकर, कार्य की प्रत्येक श्रेणी और राज्य के आधार पर अलग-अलग शुल्क का प्रावधान किया गया है।

विभिन्न हितधारकों का दृष्टिकोण

  • सरकार का पक्ष: सरकार के अनुसार, ये उपाय व्यवस्था में पारदर्शिता लाने, राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करने और विदेशी धन के दुरुपयोग को रोकने के लिए आवश्यक हैं।

  • एनजीओ और आलोचकों का मत: आलोचकों का मानना है कि ये प्रावधान अधिक 'अनुपालन बोझ' पैदा करते हैं। साथ ही, डेटा या सूचनाओं की अपारदर्शिता के कारण यह चिंता जताई जा रही है कि इससे जमीनी स्तर पर काम कर रहे संगठनों की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है।

कानूनी और संवैधानिक परिप्रेक्ष्य

  • नोएल हार्पर (2022) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने संप्रभुता और राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर कठोर संशोधनों की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा था।

  • न्यायालय ने पूर्व में यह स्पष्ट किया था कि 'अधिकार सक्रियता' और 'पार्टी राजनीति' के बीच अंतर करना आवश्यक है, ताकि सामाजिक-आर्थिक विकास कार्यों में बाधा आए।

विश्लेषण

वर्तमान नियमों के साथ मुख्य चुनौती यह है कि वे पारदर्शिता के नाम पर एनजीओ के लिए एक जटिल 'रेगुलेटरी फ्रेमवर्क' तैयार करते हैं। हालांकि राष्ट्रीय सुरक्षा सर्वोपरि है, लेकिन 'चिलिंग इफेक्ट' (डर का माहौल) पैदा होने से नागरिक समाज के उन रचनात्मक कार्यों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है जो राज्य की कल्याणकारी योजनाओं तक पहुँचने में मदद करते हैं।

आगे की राह

  • सुस्पष्ट परिभाषा: "राजनीतिक सामग्री" और "वकालत" को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जाए ताकि सामाजिक कार्यों में लगे संगठनों को अनावश्यक परेशानी हो।

  • प्रक्रियात्मक पारदर्शिता: पंजीकरण रद्दीकरण या नवीनीकरण होने के मामलों में तर्कसंगत और पारदर्शी प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए।
  • सहयोगात्मक दृष्टिकोण: सरकार और नागरिक समाज के बीच विश्वास बहाली हेतु संवाद की आवश्यकता है, जिससे राष्ट्रीय सुरक्षा और लोकतांत्रिक सक्रियता के बीच एक स्वस्थ संतुलन स्थापित हो सके।

निष्कर्ष

स्वस्थ लोकतंत्र में नागरिक समाज और राज्य एक-दूसरे के पूरक होते हैं। एफसीआरए का उद्देश्य विदेशी निधियों का दुरुपयोग रोकना होना चाहिए, कि नागरिक समाज की जीवंतता को सीमित करना। एक "आत्मनिर्भर" और मजबूत भारत के लिए यह आवश्यक है कि पारदर्शी नियमन के साथ-साथ नागरिक समाज के सार्थक योगदान को भी पर्याप्त स्थान मिले।