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गृहिणियां: 'राष्ट्र निर्माता' के रूप में नई वैधानिक पहचान
सामान्य अध्ययन पेपर – II: शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध।
संदर्भ
भारतीय समाज में सदियों से घरेलू कार्यों को 'अवैतनिक श्रम' के रूप में देखा गया है, जिसे अक्सर आर्थिक उत्पादकता के दायरे से बाहर रखा जाता रहा है। हालाँकि, समय के साथ न्यायिक दृष्टिकोण में बदलाव आया है और सर्वोच्च न्यायालय ने घरेलू कार्यों के सामाजिक-आर्थिक मूल्य को मान्यता देते हुए इसे 'राष्ट्र निर्माण' के समतुल्य माना है, जो भारतीय कानूनी और सामाजिक व्यवस्था में एक मील का पत्थर है।
गृहिणी से 'राष्ट्र निर्माता' तक का सफर
गृहिणी को मात्र एक 'हाउसवाइफ' (हाउसवाइफ) के बजाय 'होममेकर' (राष्ट्र निर्माता) के रूप में परिभाषित करना उनके द्वारा किए जाने वाले अवैतनिक श्रम के प्रति सम्मान का प्रतीक है।
- यह परिवर्तन केवल शब्दावली का नहीं, बल्कि उस दृष्टिकोण का है जो यह स्वीकार करता है कि घर को सुचारू रूप से चलाने वाली महिला न केवल परिवार का आधार है, बल्कि वह मानव पूंजी के निर्माण में भी सक्रिय भूमिका निभाती है, जो अंततः देश की प्रगति का आधार बनती है।
चर्चा के कारण
हालिया चर्चा का केंद्र सुप्रीम कोर्ट का वह ऐतिहासिक फैसला है जो एक मोटर दुर्घटना दावे (केस: रेशमा बनाम अन्य, नवंबर 2001) से उपजा है।
- अदालत ने पाया कि 25 वर्षों से लंबित इस मामले में पीड़ित गृहिणी की भूमिका और उसके घरेलू योगदान का उचित मूल्यांकन नहीं किया गया था।
- इस मामले ने यह स्पष्ट किया कि अदालतों को अब घरेलू देखभाल के आर्थिक मूल्य को नजरअंदाज करने के बजाय, उसे मुआवजे का एक अनिवार्य हिस्सा मानना चाहिए।
सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय और महत्वपूर्ण बिंदु
न्यायमूर्ति संजय करोल और एन. कोटिश्वर सिंह की खंडपीठ ने निर्णय दिया कि:
- गृहिणी की मृत्यु पर 'घरेलू देखभाल' के नुकसान के लिए ₹30,000 प्रति माह का न्यूनतम आधार माना जाए।
- यह राशि भविष्य के प्रॉस्पेक्टस, मल्टीप्लायर और अन्य मदों को जोड़कर तय होगी।
- कामकाजी महिला होने पर भी यह मुआवजा उसकी आय के अतिरिक्त दिया जाएगा।
- यह मानक हर तीन साल में 10% की दर से बढ़ेगा।
- न्यायालय ने माना कि पुरुष भी 'होममेकर' हो सकते हैं, किंतु ₹30,000 का यह विशिष्ट मानक अभी महिलाओं के लिए है।
पूर्व में दी जाने वाली मुआवजे की गणना
अब तक, गृहिणियों की मृत्यु पर मुआवजा तय करते समय उनकी आय को अक्सर 'काल्पनिक आय' के रूप में देखा जाता था। उन्हें या तो अकुशल या अर्ध-कुशल श्रमिक मानकर न्यूनतम मजदूरी के आधार पर मुआवजा दिया जाता था, जो उनके द्वारा किए जाने वाले अथक मानसिक और शारीरिक श्रम का बहुत छोटा और अपमानजनक हिस्सा होता था।
भारत निर्माण में महिलाओं की भूमिका
महिलाओं का घरेलू योगदान देश की जीडीपी में लगभग 17% के बराबर आंका गया है।
- 15 से 59 वर्ष की महिलाएं प्रतिदिन औसतन 7 घंटे से अधिक अवैतनिक घरेलू कार्य करती हैं।
- यह कार्य न केवल परिवार को आधार प्रदान करता है, बल्कि अगली पीढ़ी के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को सुनिश्चित कर देश के भविष्य की नींव रखता है।
निर्णय का महत्व
यह निर्णय अदालती प्रक्रिया में आने वाले लैंगिक पूर्वाग्रहों को समाप्त करता है। यह पितृसत्तात्मक सोच पर प्रहार है जो घरेलू कार्य को 'तुच्छ' मानती थी। यह अदालतों को एक दिशा देता है कि मानवीय और सामाजिक योगदान को केवल बाजार मूल्य से न मापा जाए, बल्कि उसकी व्यापक सामाजिक उपयोगिता के आधार पर आर्थिक मूल्य प्रदान किया जाए।
संवैधानिक और विधिक प्रावधान
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (गरिमा के साथ जीने का अधिकार) इस निर्णय का वैधानिक आधार है।
- मोटर वाहन अधिनियम के तहत दी जाने वाली 'न्यायसंगत मुआवजे' की अवधारणा के अंतर्गत घरेलू योगदान को शामिल करना अब कानूनी रूप से अनिवार्य हो गया है, जो महिलाओं के आर्थिक अधिकारों की रक्षा करता है।
विश्लेषण
यह ऐतिहासिक निर्णय भारतीय न्यायपालिका की प्रगतिशीलता को दर्शाता है। यह घरेलू श्रम की अदृश्यता को समाप्त कर उसे आर्थिक सुरक्षा के दायरे में लाता है। हालांकि, इसे लागू करने में न्यायपालिका को यह सुनिश्चित करना होगा कि वर्षों तक चलने वाली केस की पेंडेंसी इस मुआवजे के प्रभाव को कम न करे।
आगे की राह
भविष्य में, सरकार को घरेलू श्रम के मूल्य को श्रम कानूनों के अंतर्गत भी औपचारिक रूप से मान्यता देनी चाहिए।
- अदालतों को मुआवजे की गणना करते समय मुद्रास्फीति और जीवन स्तर को ध्यान में रखते हुए नियमित अंतराल पर ₹30,000 के मानक की समीक्षा करनी चाहिए ताकि न्याय समय के साथ प्रासंगिक बना रहे।
निष्कर्ष
सर्वोच्च न्यायालय का यह कदम गृहिणियों के संघर्ष को वह सम्मान और आर्थिक गरिमा प्रदान करता है जिसकी वे सदैव हकदार थीं। यह फैसला न केवल सड़क दुर्घटना पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए, बल्कि पूरे समाज में महिलाओं के श्रम को एक नई दृष्टि से देखने के लिए भी एक मील का पत्थर साबित होगा।
दसवीं अनुसूची और दलबदल विरोधी कानून: एक संवैधानिक और विधिक विश्लेषण
सामान्य अध्ययन पेपर – II: शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध।
सन्दर्भ
हाल ही में तमिलनाडु विधानसभा के अध्यक्ष द्वारा 21 विधायकों के विरुद्ध अयोग्यता कार्यवाही को रोकने का निर्णय, 'दलबदल विरोधी कानून' के प्रयोग और अध्यक्ष की विवेकाधीन शक्तियों के दायरे पर एक महत्वपूर्ण विमर्श प्रस्तुत करता है।
संवैधानिक पृष्ठभूमि: दसवीं अनुसूची
भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची (52वां संशोधन अधिनियम, 1985) का मुख्य उद्देश्य दल-बदल की बुराई को रोकना है।
- व्हिप का उल्लंघन: अनुसूची के अनुसार, यदि कोई सदस्य सदन में अपनी पार्टी के निर्देशों (Whip) के विरुद्ध मतदान करता है, तो वह अयोग्यता का पात्र हो जाता है।
- माफी का प्रावधान: यदि दल का नेता या पार्टी का सक्षम प्राधिकारी मतदान के 15 दिनों के भीतर सदस्य की इस कार्रवाई को 'माफ' कर देता है, तो अध्यक्ष अयोग्यता की कार्यवाही को निरस्त कर सकता है।
इस प्रकरण का कानूनी विश्लेषण
इस मामले में अध्यक्ष का निर्णय दो प्रमुख आधारों पर टिका है:
- सहमति और क्षमा: पार्टी महासचिव द्वारा बागी विधायकों की कार्रवाई को 'माफ' करना कानूनन मान्य है। अध्यक्ष का यह निर्णय कि "व्हिप का उल्लंघन क्षम्य है", कानून के अक्षर के अनुरूप है।
- अध्यक्ष की भूमिका: स्पीकर का पद एक निष्पक्ष संवैधानिक पद है। हालांकि, ऐतिहासिक रूप से स्पीकर के निर्णयों पर दलगत राजनीति से प्रभावित होने के आरोप लगते रहे हैं । वर्तमान में, अध्यक्ष द्वारा पार्टी के आंतरिक सुलह समझौते को स्वीकार करना "प्रक्रियात्मक सुसंगतता" को दर्शाता है।
कानूनी पेंच और संवैधानिक नैतिकता
यहाँ कानूनी और नैतिक दृष्टिकोण से दो महत्वपूर्ण पहलू उभरते हैं:
- विधायकों के इस्तीफे का प्रश्न: चार विधायकों (जिनमें दो महिला विधायक भी शामिल हैं) ने दल-बदल की कार्यवाही से बचने के लिए इस्तीफा दिया। यह दलबदल विरोधी कानून के "अप्रत्यक्ष उल्लंघन" को दर्शाता है। एक संवैधानिक विशेषज्ञ के अनुसार, इस्तीफा स्वीकार करने से पहले अयोग्यता की कार्यवाही का निपटारा अधिक तार्किक होता, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि अयोग्यता की प्रक्रिया को इस्तीफे के माध्यम से "नकारा" तो नहीं गया है।
- शक्तियों का पृथक्करण: यह मामला इस बात पर भी जोर देता है कि स्पीकर को 'न्यायिक अधिकरण' की तरह कार्य करना चाहिए। उन्होंने पलानीस्वामी के सबमिशन को आधार बनाया, जो कि एक औपचारिक कानूनी प्रक्रिया है, परंतु इसमें राजनीतिक लाभ-हानि का सूक्ष्म विश्लेषण भी निहित है।
सुप्रीम कोर्ट का दृष्टिकोण:
दल-बदल विरोधी कानून के संदर्भ में 'कीहोतो होलोहन बनाम जाचिल्हू (1992)' मामले में सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय एक मील का पत्थर है। न्यायालय ने यह स्थापित किया कि दसवीं अनुसूची के तहत अध्यक्ष का निर्णय अंतिम नहीं है और यह 'न्यायिक पुनरावलोकन' के दायरे में आता है। न्यायालय के अनुसार, यदि अध्यक्ष का निर्णय प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध हो, असंवैधानिक हो, या दुर्भावनापूर्ण हो, तो अदालत उसमें हस्तक्षेप कर सकती है। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि हालांकि अध्यक्ष एक अर्ध-न्यायिक प्राधिकारी के रूप में कार्य करता है, परंतु उसकी शक्तियां पूर्ण नहीं हैं और वे संवैधानिक उत्तरदायित्व के अधीन हैं। हालांकि, न्यायालय ने यह सीमित किया कि न्यायिक हस्तक्षेप आमतौर पर स्पीकर के अंतिम निर्णय के बाद ही संभव है, ताकि विधायी कार्यवाही में अनावश्यक बाधा न आए।
आगे की राह
स्पीकर की संस्थागत तटस्थता सुनिश्चित करने हेतु उनके निर्णयों को राजनीतिक प्रभाव से मुक्त बनाने के उपाय किए जाएँ।
- केशम मेघचंद्र सिंह बनाम मणिपुर विधानसभा अध्यक्ष (2020) के अनुरूप दलबदल याचिकाओं के निपटारे के लिए तीन माह की समय-सीमा निर्धारित की जाए।
- दिनेश गोस्वामी समिति की सिफारिशों के अनुरूप दलबदल मामलों के निर्णय हेतु स्वतंत्र न्यायिक अथवा अर्ध-न्यायिक तंत्र स्थापित किया जाए।
- दलबदल कानून से बचने के लिए इस्तीफे के दुरुपयोग को रोकने हेतु स्पष्ट कानूनी प्रावधान किए जाएँ।
- कीहोतो होलोहन मामला (1992) के सिद्धांतों के अनुरूप संसदीय स्वायत्तता और न्यायिक पुनरावलोकन के बीच संतुलन बनाए रखा जाए।
निष्कर्ष
कानून की आत्मा की रक्षा के लिए प्रक्रियात्मक कठोरता और नैतिक उत्तरदायित्व का सामंजस्य अनिवार्य है। इन संस्थागत सुधारों को अपनाकर ही हम दल-बदल की बुराई को नियंत्रित कर सकते हैं और संसदीय लोकतंत्र की गरिमा को सुदृढ़ कर सकते हैं, जिससे विधायिका का जनता के प्रति जवाबदेह स्वरूप और अधिक स्पष्ट होगा।