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संदर्भ
हाल ही में भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) ने 'क्यासानूर फॉरेस्ट डिजीज' (KFD), जिसे सामान्यतः बंदर बुखार कहा जाता है, के लिए एक उन्नत और पूरी तरह से स्वदेशी वैक्सीन का प्रथम चरण (Phase-I) का मानव नैदानिक परीक्षण शुरू कर दिया है। यह कदम दक्षिण भारत के पश्चिमी घाट क्षेत्रों में प्रतिवर्ष फैलने वाले इस घातक वायरल संक्रमण को नियंत्रित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है।
प्रमुख समाचार बिंदु
- स्वदेशी विकास: इस टीके को इंडियन इम्यूनोलॉजिकल्स लिमिटेड (IIL) और ICMR-नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी (NIV) द्वारा संयुक्त रूप से विकसित किया गया है।
- वैक्सीन का प्रकार: यह एक 'दो खुराक वाली एडजुवेंटेड इनएक्टिवेटेड' वैक्सीन है, जिसे 28 दिनों के अंतराल पर दिया जाना निर्धारित है।
- सफलतापूर्ण पूर्व-परीक्षण: मानव परीक्षण से पहले, जानवरों पर इसके प्रभाव और विषाक्तता अध्ययन को सफलतापूर्वक पूरा कर लिया गया है।
- नियामक मंजूरी: केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) से अनुमति मिलने के बाद ही जीएलपी-ग्रेड वैक्सीन सामग्री का उपयोग कर मानव परीक्षण शुरू किया गया है।
- लक्ष्य: यदि प्रथम चरण सफल रहता है, तो सुरक्षा और इम्यूनोजेनेसिटी (प्रतिरक्षा क्षमता) सुनिश्चित करने के बाद इसे व्यापक उपयोग के लिए उपलब्ध कराया जाएगा।
क्यासानूर फॉरेस्ट डिजीज (KFD)
- परिचय: KFD एक टिक-जनित वायरल रक्तस्रावी बुखार है, जो पहली बार 1957 में कर्नाटक के क्यासानूर जंगल में पहचाना गया था।
- मंकी फीवर क्यों?: इस वायरस का बंदरों की मृत्यु से गहरा संबंध है; जंगलों में बंदरों की अचानक मृत्यु अक्सर इस बीमारी के फैलने का शुरुआती संकेत होती है।
- कारक एवं संचरण: यह क्यासानूर फॉरेस्ट डिजीज वायरस (KFDV) के कारण होता है। यह मनुष्यों में संक्रमित हार्ड टिक (Haemaphysalis spinigera) के काटने या संक्रमित जानवरों (विशेषकर बंदरों) के संपर्क में आने से फैलता है।
- स्थानिक क्षेत्र: यह मुख्य रूप से भारत के पश्चिमी घाट क्षेत्र के राज्यों—कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, गोवा और महाराष्ट्र—में स्थानिक है।
- प्रमुख लक्षण: अचानक तेज बुखार, गंभीर सिरदर्द, मांसपेशियों में दर्द, मतली, और गंभीर मामलों में मसूड़ों या नाक से रक्तस्राव होना।
इलाज: वर्तमान में इसका कोई विशिष्ट एंटीवायरल उपचार नहीं है; प्रबंधन मुख्य रूप से लक्षणों के उपचार और सहायक देखभाल पर निर्भर है, जिससे इस नई वैक्सीन की आवश्यकता और अधिक बढ़ जाती है।
संदर्भ
वित्त मंत्रालय के अनुसार, 2025 के अंत तक घरेलू अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों (SCBs) का सकल एनपीए अनुपात 2.15% के ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुँच गया है। यह सुधार पिछले आठ वर्षों की निरंतर गिरावट और प्रभावी बैंकिंग रणनीतियों का परिणाम है।
एनपीए (NPA) क्या है?
गैर-निष्पादित संपत्ति (NPA) उस ऋण या अग्रिम राशि को कहते हैं जिस पर मूलधन या ब्याज का भुगतान 90 दिनों या उससे अधिक समय से बकाया रहता है। सरल शब्दों में, जब बैंक द्वारा दिया गया कर्ज वापस नहीं आता और उससे आय होना बंद हो जाती है, तो उसे 'फंसा हुआ कर्ज' या एनपीए माना जाता है।
प्रमुख समाचार बिंदु
- ऐतिहासिक गिरावट: वर्तमान 2.15% का एनपीए स्तर वर्ष 2010-11 के स्तर से भी कम है, जो बैंकिंग प्रणाली की मजबूती को दर्शाता है।
- लाभप्रदता में सुधार: एनपीए कम होने से बैंकों को 'प्रोविजनिंग' के लिए कम राशि रखनी पड़ रही है, जिससे उनकी लाभप्रदता और व्यापारिक वृद्धि पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा है।
- 4R रणनीति की सफलता: इस सुधार का मुख्य श्रेय सरकार की '4R' रणनीति को दिया गया है: पहचान, समाधान, पुनर्पूंजीकरण, और सुधार।
सशक्त बैलेंस शीट: सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (PSBs) में न केवल संपत्ति की गुणवत्ता सुधरी है, बल्कि उनकी 'अंडरराइटिंग' (ऋण मूल्यांकन प्रक्रिया) भी पहले से अधिक सटीक हुई है।
सन्दर्भ
मूडीज रेटिंग्स ने वित्त वर्ष 2026-27 (FY27) के लिए भारत की जीडीपी वृद्धि दर 6.4% रहने का अनुमान लगाया है। इस वृद्धि के साथ भारत जी-20 (G-20) देशों में सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था बना रहेगा।
मूडीज क्या है?
मूडीज एक अमेरिकी वैश्विक क्रेडिट रेटिंग एजेंसी है। यह दुनिया भर के देशों और कंपनियों की आर्थिक स्थिति का विश्लेषण कर उन्हें 'रेटिंग' देती है, जिससे उनकी वित्तीय विश्वसनीयता और कर्ज चुकाने की क्षमता का पता चलता है।
मुख्य बिंदु
- विकास के कारक: भारत की इस तीव्र वृद्धि के पीछे मजबूत घरेलू खपत, सरकारी नीतिगत उपाय और एक स्थिर बैंकिंग प्रणाली प्रमुख कारण हैं।
- बैंकिंग क्षेत्र की स्थिति: मूडीज के अनुसार भारतीय बैंकों की 'एसेट क्वालिटी' (संपत्ति की गुणवत्ता) मजबूत बनी रहेगी, हालांकि MSME (सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम) क्षेत्र में कुछ वित्तीय दबाव देखा जा सकता है।
- नीतिगत सुधारों का लाभ: सितंबर 2025 में GST के सरलीकरण और आयकर सीमा में वृद्धि से उपभोक्ताओं की खर्च करने की क्षमता बढ़ी है, जो अर्थव्यवस्था को गति दे रही है।
- तुलनात्मक विश्लेषण: मूडीज का 6.4% का यह अनुमान भारत सरकार की 'आर्थिक समीक्षा' (6.8-7.2%) और RBI के पूर्वानुमान (7.0%) से थोड़ा कम है।
सामान्य अध्ययन पेपर – III प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन
सन्दर्भ
किम्बरली प्रोसेस वैश्विक हीरा व्यापार को विनियमित करने वाला एक महत्वपूर्ण बहुपक्षीय तंत्र है, जिसका प्राथमिक उद्देश्य 'कनफ्लिक्ट डायमंड्स' (रक्त रंजित हीरों) को मुख्यधारा के बाजार से बाहर रखना है। वर्ष 2026 के लिए भारत को इस प्रतिष्ठित मंच की अध्यक्षता मिलना वैश्विक हीरा शासन में भारत के बढ़ते प्रभाव और रणनीतिक महत्व को दर्शाता है।
किम्बरली प्रोसेस:
किम्बरली प्रोसेस एक अंतर्राष्ट्रीय प्रमाणन तंत्र है, जिसका उद्देश्य 'कनफ्लिक्ट डायमंड्स' (रक्त रंजित हीरों) के व्यापार को रोकना है। यह सुनिश्चित करता है कि हीरों की बिक्री से प्राप्त धन का उपयोग विद्रोही समूह वैध सरकारों के खिलाफ हिंसा या युद्ध के वित्तपोषण के लिए न कर सकें।
इसकी शुरुआत मई 2000 में दक्षिण अफ्रीकी देशों की पहल पर हुई थी, ताकि विद्रोही समूहों द्वारा वैध सरकारों के खिलाफ युद्ध के वित्तपोषण हेतु हीरों के उपयोग को रोका जा सके।
- प्रमाणन योजना (KPCS): वर्ष 2003 में 37 देशों के हस्ताक्षर के साथ 'किम्बरली प्रोसेस सर्टिफिकेशन स्कीम' लागू की गई।
- भागीदारी: वर्तमान में इसमें 60 भागीदार हैं जो 86 देशों का प्रतिनिधित्व करते हैं और वैश्विक कच्चे हीरों के उत्पादन का लगभग 99.8% हिस्सा कवर करते हैं।
- त्रिपक्षीय संरचना: यह तंत्र तीन स्तंभों पर आधारित है:
- सरकारें
- हीरा उद्योग
- नागरिक समाज
चर्चा में क्यों?
- भारत की अध्यक्षता (2026): भारत को वर्ष 2026 के लिए किम्बरली प्रोसेस (KP) का अध्यक्ष चुना गया है, जो वैश्विक हीरा शासन में भारत की नेतृत्वकारी भूमिका को रेखांकित करता है।
- परिभाषा का विस्तार: 'कनफ्लिक्ट डायमंड' की संकीर्ण परिभाषा को बदलकर इसमें राज्य-प्रायोजित हिंसा और मानवाधिकारों को शामिल करने की वैश्विक मांग बढ़ी है।
- तकनीकी आधुनिकीकरण: आपूर्ति श्रृंखला में पारदर्शिता लाने के लिए ब्लॉकचेन और डिजिटल प्रमाणन के उपयोग पर गहन चर्चा हो रही है।
- भू-राजनीतिक तनाव: रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद रूसी हीरों पर प्रतिबंधों ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और भारत के कटिंग-पॉलिशिंग उद्योग के सामने नई चुनौतियां पेश की हैं।
- अफ्रीका और SDG: हीरों से प्राप्त राजस्व को अफ्रीका के खनन समुदायों में सतत विकास लक्ष्यों (SDG) जैसे शिक्षा और स्वास्थ्य से जोड़ने पर जोर दिया जा रहा है।
हीरा मूल्य श्रृंखला में भारत का महत्व
भारत दुनिया में हीरों का बड़ा उत्पादक नहीं है, फिर भी यह इस उद्योग की रीढ़ है:
- सबसे बड़ा आयातक: भारत दुनिया के लगभग 40% कच्चे हीरों का आयात करता है।
- पॉलिशिंग हब: दुनिया के 10 में से 9 हीरों की कटिंग और पॉलिशिंग भारत में होती है। गुजरात का सूरत और महाराष्ट्र का मुंबई इसके वैश्विक केंद्र हैं।
- रणनीतिक स्थिति: भारत अपने पॉलिश किए गए हीरों को अमेरिका, यूएई, हांगकांग और इज़राइल जैसे प्रमुख बाजारों में निर्यात करता है। मूल्य श्रृंखला के केंद्र में होने के कारण भारत के पास नीतिगत सुधारों के लिए अद्वितीय 'लेवरेज' है।
किम्बरली प्रोसेस की चुनौतियाँ
- 'कनफ्लिक्ट डायमंड' की संकीर्ण परिभाषा: वर्तमान में यह केवल 'विद्रोही समूहों' द्वारा वित्तपोषित हीरों को कवर करता है। यह राज्य द्वारा प्रायोजित हिंसा, मानवाधिकार उल्लंघन, पर्यावरण क्षति और मानव तस्करी जैसे गंभीर मुद्दों की अनदेखी करता है।
- निर्णय प्रक्रिया में बाधा: किम्बरली प्रोसेस में निर्णय 'सर्वसम्मति' से लिए जाते हैं, जिससे कोई भी एक देश महत्वपूर्ण सुधारों को वीटो कर सकता है।
- प्रभावी निगरानी का अभाव: मध्य अफ्रीकी गणराज्य (CAR) का उदाहरण दर्शाता है कि बिना जमीनी सुधारों के केवल प्रतिबंध लगाने से तस्करी और हिंसा बढ़ सकती है।
विश्लेषण: वैश्विक शासन और अंतर्राष्ट्रीय संबंध
भारत की अध्यक्षता केवल व्यापारिक नहीं, बल्कि कूटनीतिक भी है:
- ग्लोबल साउथ का नेतृत्व: अफ्रीका के उत्पादक देशों के हितों की रक्षा करके भारत 'ग्लोबल साउथ' के नेता के रूप में अपनी स्थिति मजबूत कर सकता है।
- नैतिक व्यापार: उत्तरदायी आपूर्ति श्रृंखला सुनिश्चित करके भारत वैश्विक मंच पर एक जिम्मेदार शक्ति के रूप में उभरेगा।
आगे की राह: भारत क्या भूमिका निभा सकता है?
भारत की अध्यक्षता के दौरान निम्नलिखित सुधारों पर जोर दिया जाना चाहिए:
- संस्थागत सुधार: 'कनफ्लिक्ट डायमंड' की परिभाषा को व्यापक बनाना ताकि इसमें मानवाधिकारों के जोखिमों को भी शामिल किया जा सके। साथ ही, स्वतंत्र तीसरे पक्ष के ऑडिट को बढ़ावा देना।
- तकनीकी सुधार: भारत अपनी तकनीकी शक्ति का उपयोग ब्लॉकचेन आधारित ट्रैकिंग सिस्टम और डिजिटल प्रमाणपत्रों को बढ़ावा देने के लिए कर सकता है, जिससे धोखाधड़ी कम होगी और पारदर्शिता बढ़ेगी।
- विकासोन्मुखी दृष्टिकोण (SDG लिंकेज): हीरा व्यापार से होने वाले राजस्व को अफ्रीका के खनन समुदायों के स्वास्थ्य, शिक्षा और बुनियादी ढांचे में निवेश करना, जो सतत विकास लक्ष्यों (विशेषकर SDG 1, 8 और 12) के अनुरूप है।
निष्कर्ष
भारत के पास 2026 में किम्बरली प्रोसेस को और अधिक समावेशी, पारदर्शी और नियम-आधारित बनाने का ऐतिहासिक अवसर है। 'खराब हीरों' को रोकने के साथ-साथ 'जिम्मेदार हीरा व्यापार' को बढ़ावा देकर भारत वैश्विक हीरा शासन के एक नए युग की शुरुआत कर सकता है। यह न केवल आर्थिक रूप से बल्कि नैतिक रूप से भी भारत की सॉफ्ट पावर को वैश्विक स्तर पर मजबूती प्रदान करेगा।
सामान्य अध्ययन पेपर – III प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन
सन्दर्भ
भारत को अक्सर 'विश्व की मधुमेह राजधानी' कहा जाता है। मधुमेह के बढ़ते बोझ के बीच, इसके सटीक निदान की कार्यप्रणाली सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रबंधन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। वर्तमान में 'ग्लाइकेटेड हीमोग्लोबिन' (HbA1c) को मधुमेह की पहचान और निगरानी के लिए स्वर्ण मानक माना जाता है। हालाँकि, नवीन शोधों (जैसे लैंसेट रीजनल हेल्थ में प्रकाशित रिपोर्ट) ने संकेत दिया है कि भारतीय आबादी में एनीमिया और अन्य रक्त विकारों की उच्च व्यापकता के कारण HbA1c के परिणाम भ्रामक हो सकते हैं।
HbA1c परीक्षण: मूल अवधारणा
मधुमेह प्रबंधन में HbA1c की भूमिका को समझना आवश्यक है:
- परिभाषा: HbA1c या ग्लाइकेटेड हीमोग्लोबिन परीक्षण यह मापता है कि आपके रक्त में ग्लूकोज (शर्करा) लाल रक्त कोशिकाओं (RBC) में हीमोग्लोबिन के साथ कितनी मात्रा में जुड़ा हुआ है।
- तीन महीने का औसत: चूँकि लाल रक्त कोशिकाओं का जीवनकाल लगभग 120 दिनों का होता है, इसलिए यह परीक्षण पिछले 2 से 3 महीनों के औसत रक्त शर्करा के स्तर को दर्शाता है।
- महत्व: इसका उपयोग टाइप-2 मधुमेह के निदान और दीर्घकालिक निगरानी दोनों के लिए किया जाता है।
चर्चा में क्यों?
- लैंसेट का नवीन शोध: हाल ही में 'लैंसेट रीजनल हेल्थ' में प्रकाशित अध्ययन ने भारत में मधुमेह निदान के लिए केवल HbA1c परीक्षण पर निर्भरता को 'भ्रामक' बताते हुए इसके परिणामों पर प्रश्नचिह्न लगाया है।
- एनीमिया और रक्त विकारों का प्रभाव: रिपोर्ट के अनुसार, भारत में एनीमिया, थैलेसीमिया और G6PD की कमी जैसी स्थितियों की उच्च व्यापकता HbA1c रीडिंग को विकृत कर देती है, जिससे गलत निदान का जोखिम बढ़ गया है।
- निदान में विलंब: शोध में यह महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया है कि रक्त विकारों के कारण पुरुषों में मधुमेह की पहचान में 4 वर्ष तक की देरी हो सकती है, जो गंभीर स्वास्थ्य जटिलताओं का कारण बन सकती है।
- राष्ट्रीय स्वास्थ्य लक्ष्यों के साथ अंतर्संबंध: 'राष्ट्रीय सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन मिशन' और 'एनीमिया मुक्त भारत' के बीच, यह चर्चा तीव्र हुई है कि ये बीमारियाँ गैर-संचारी रोगों (जैसे मधुमेह) के प्रबंधन को कैसे बाधित कर रही हैं।
- मानकीकरण की आवश्यकता: चिकित्सा जगत में अब केवल एक परीक्षण (HbA1c) के बजाय बहु-आयामी और स्थानीय पोषण स्थितियों के अनुरूप नैदानिक मॉडल अपनाने पर वैश्विक बहस छिड़ गई है।
भारत-विशिष्ट समस्या: एनीमिया और रक्त विकार
भारत में HbA1c की सटीकता पर प्रश्नचिह्न लगने के पीछे प्रमुख कारण यहाँ की जनसंख्या का 'हेमेटोलॉजिकल प्रोफाइल' है:
- एनीमिया की उच्च व्यापकता: भारत में महिलाओं और बच्चों के बीच आयरन की कमी से होने वाला एनीमिया एक बड़ी समस्या है। यह हीमोग्लोबिन की मात्रा को प्रभावित करता है, जिससे HbA1c की रीडिंग वास्तविक शर्करा स्तर से अधिक आ सकती है।
- रक्त विकार: भारत के विभिन्न क्षेत्रों में सिकल सेल रोग, थैलेसीमिया और G6PD एंजाइम की कमी का प्रसार अधिक है।
- तकनीकी कारण: ये स्थितियाँ लाल रक्त कोशिकाओं की संरचना या उनके जीवनकाल को बदल देती हैं। यदि RBC का जीवनकाल कम हो जाता है, तो हीमोग्लोबिन को ग्लूकोज के साथ जुड़ने का समय कम मिलता है, जिससे रिपोर्ट में शर्करा का स्तर वास्तविक स्तर से कम दिखाई दे सकता है।
नैदानिक जोखिम
HbA1c पर अत्यधिक निर्भरता के कारण उत्पन्न होने वाले जोखिम निम्नलिखित हैं:
- निदान में विलंब: शोध के अनुसार, G6PD की कमी वाले पुरुषों में मधुमेह के निदान में 4 वर्ष तक की देरी हो सकती है।
- उपचार में त्रुटि: गलत रिपोर्ट के आधार पर दी जाने वाली दवाइयाँ मरीज के स्वास्थ्य को बिगाड़ सकती हैं।
- जटिलताएँ: सटीक निगरानी के अभाव में रेटिनोपैथी (आंखों की समस्या) और नेफ्रोपैथी (किडनी की समस्या) जैसी जटिलताओं का खतरा बढ़ जाता है।
भारतीय स्वास्थ्य प्रणाली की चुनौतियाँ
शासन और स्वास्थ्य नीति के दृष्टिकोण से निम्नलिखित चुनौतियाँ महत्वपूर्ण हैं:
- कुपोषण का दोहरा बोझ: भारत कुपोषण (एनीमिया) और गैर-संचारी रोगों (मधुमेह) की दोहरी चुनौती से जूझ रहा है।
- प्रयोगशाला मानकीकरण का अभाव: कई प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में HbA1c परीक्षण की विधियाँ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानकीकृत नहीं हैं, जिससे परिणामों में भिन्नता आती है।
- संसाधनों की कमी: ग्रामीण क्षेत्रों में निरंतर ग्लूकोज निगरानी (CGM) जैसे आधुनिक उपकरणों की उपलब्धता नगण्य है।
मधुमेह: भारत की सांख्यिकीय स्थिति
- विशाल रुग्णता : भारत में लगभग 10.1 करोड़ लोग मधुमेह से प्रभावित हैं और 13.6 करोड़ लोग 'प्री-डायबिटीज' की श्रेणी में हैं।
- युवाओं में प्रसार (20-35 वर्ष): खराब जीवनशैली के कारण अब युवाओं में टाइप-2 मधुमेह के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं, जो पहले केवल वृद्धों में देखा जाता था।
- सर्वाधिक जोखिम (35-50 वर्ष): आईसीएमआर (ICMR) के अनुसार, मध्यम आयु वर्ग में शारीरिक सक्रियता की कमी से नए मरीजों की संख्या में सर्वाधिक उछाल है।
- शहरी बनाम ग्रामीण: शहरी क्षेत्रों में प्रसार (16.4%) ग्रामीण क्षेत्रों (8.9%) की तुलना में लगभग दोगुना है, जो तीव्र शहरीकरण का परिणाम है।
- क्षेत्रीय स्थिति: केरल, गोवा और पुडुचेरी जैसे राज्यों में प्रसार सर्वाधिक है, जबकि उत्तर-पूर्वी राज्यों में यह दर अपेक्षाकृत कम है।
- आर्थिक प्रभाव: कार्यबल के प्रभावित होने से देश के 'जनसांख्यिकीय लाभांश' और उत्पादकता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है।
विश्लेषण: सार्वजनिक स्वास्थ्य का व्यापक परिप्रेक्ष्य
- भारत जैसे विविध समाज में 'सबके लिए एक ही पैमाना' वाला मॉडल स्वास्थ्य सेवाओं में काम नहीं कर सकता। नैदानिक सटीकता ही बेहतर स्वास्थ्य परिणामों का आधार है। यह सतत विकास लक्ष्य-3 (SDG-3: उत्तम स्वास्थ्य और खुशहाली) की प्राप्ति के लिए भी आवश्यक है।
समाधान और आगे की राह
मधुमेह निदान को सटीक बनाने के लिए निम्नलिखित रणनीतियाँ अपनानी चाहिए:
- बहु-आयामी निदान: केवल HbA1c पर निर्भर रहने के बजाय 'ओरल ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट' (OGTT) और रक्त शर्करा की स्वयं निगरानी (SMBG) को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
- रक्त परीक्षण का एकीकरण: मधुमेह की स्क्रीनिंग के साथ-साथ एनीमिया और हीमोग्लोबिन विकारों की अनिवार्य जाँच की जानी चाहिए।
- नीतिगत सुधार: आयुषमान भारत के तहत प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में प्रयोगशालाओं का मानकीकरण करना।
- पोषण कार्यक्रमों (जैसे पोषण अभियान) को स्वास्थ्य जाँच के साथ जोड़ना ताकि एनीमिया का बोझ कम हो सके।
- परिशुद्ध सार्वजनिक स्वास्थ्य: स्वास्थ्य नीति को स्थानीय पोषण स्तर और रोगों के पैटर्न के अनुसार ढालना चाहिए।
निष्कर्ष
HbA1c परीक्षण में रक्त विकारों के कारण आने वाली त्रुटियाँ यह दर्शाती हैं कि चिकित्सा विज्ञान को सामाजिक और पोषण संबंधी वास्तविकताओं से अलग करके नहीं देखा जा सकता। भारत में मधुमेह के विरुद्ध लड़ाई तभी सफल होगी जब हम स्थानीय स्वास्थ्य चुनौतियों (जैसे एनीमिया) को ध्यान में रखते हुए अपने नैदानिक प्रोटोकॉल को अधिक समावेशी और सटीक बनाएंगे। भविष्य कॉन्टेक्स्ट -स्पेसिफिक और डेटा-संचालित स्वास्थ्य सेवाओं का है।
सामान्य अध्ययन पेपर – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध
संदर्भ:
इतिहास में 'कमोडिटी' (वस्तु) का अर्थ भूमि, श्रम और संसाधनों से था, लेकिन आज इसकी परिभाषा बदलकर 'मानवीय पहचान और डेटा' हो गई है। अब कच्चे माल का निष्कर्षण जमीन के नीचे से नहीं, बल्कि मानव मस्तिष्क और उसके सामाजिक व्यवहार के भीतर से हो रहा है।
'खनन योग्य स्वयं' का अर्थ
'खनन योग्य स्वयं' का तात्पर्य उस प्रक्रिया से है जिसमें मनुष्य के व्यक्तिगत अनुभव, भावनाएं, रिश्ते, और रुचियां एक आर्थिक संसाधन बन जाती हैं। यह केवल डेटा का संग्रह नहीं है, बल्कि हमारी 'सामाजिकता' का वस्तुकरण है, जिसे बिना किसी सीमा के बाजार में बेचा और खरीदा जा रहा है।
चर्चा में क्यों?
- हाल ही में 'जेनरेटिव एआई' के विस्तार, डेटा गोपनीयता के उल्लंघन के बढ़ते मामलों और 'सर्विलांस कैपिटलिज्म' पर वैश्विक बहस के कारण यह विषय चर्चा में है।
- विश्व आर्थिक मंच (WEF) की रिपोर्टों के अनुसार, 2026 तक वैश्विक डेटा अर्थव्यवस्था का मूल्य कई ट्रिलियन डॉलर तक पहुँचने का अनुमान है।
उपभोक्ता से उत्पाद तक का सफर
औद्योगिक पूंजीवाद में हम ग्राहक थे, लेकिन 'निगरानी पूंजीवाद' में हम स्वयं उत्पाद बन गए हैं।
- मुफ्त सेवाओं का जाल: गूगल और मेटा जैसी कंपनियाँ हमें सेवाएँ मुफ्त देती हैं क्योंकि उनका वास्तविक उत्पाद 'हमारा व्यवहार' है।
- व्यवहारगत अधिशेष: हमारी हर गतिविधि को डेटा पॉइंट्स में बदलकर भविष्यवाणियां तैयार की जाती हैं, जिन्हें विज्ञापनदाताओं को ऊँची कीमतों पर बेचा जाता है।
स्ट्रीमिंग और सोशल मीडिया: कहानियों का बाजार
मनोरंजन की दुनिया ने हमारी निजी कहानियों को 'वैश्विक उत्पाद' बना दिया है।
- ओटीटी का प्रभाव: नेटफ्लिक्स और अमेज़न प्राइम जैसे प्लेटफॉर्म स्थानीय संस्कृतियों और 'साधारण' कहानियों को खंगाल रहे हैं ताकि उन्हें वैश्विक दर्शक मिल सकें।
- अटेंशन इकोनॉमी: 'रील्स' और 'शॉर्ट्स' के माध्यम से हमारे ध्यान को बंधक बना लिया गया है। यहाँ 'सेल्फी' संस्कृति और निजी पलों का सार्वजनिक प्रदर्शन केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि एक सुनियोजित व्यवसाय है।
एआई (AI) और एल्गोरिदम का खेल
एआई अब केवल एक उपकरण नहीं, बल्कि एक 'निर्णायक' बन गया है।
- एल्गोरिथमिक प्रोफाइलिंग: एआई एल्गोरिदम हमारी पसंद-नापसंद का विश्लेषण कर हमारे लिए एक 'डिजिटल इको-चेंबर' बना देते हैं।
- मानवीय संवेदनाओं की नकल: चैटजीपीटी (ChatGPT) जैसे मॉडल मानवीय अंतर्ज्ञान और सहानुभूति की नकल कर रहे हैं, जिससे मनुष्य और मशीन के बीच का अंतर धुंधला होता जा रहा है।
सरकारी प्रयास और उनकी पर्याप्तता
विश्व स्तर और भारत में निजता को बचाने के लिए कई कदम उठाए गए हैं:
- भारत: 'डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023' (DPDP Act) एक महत्वपूर्ण कदम है। हालाँकि, विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारी एजेंसियों को दी गई छूट और डेटा स्थानीयकरण की चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं।
- वैश्विक: यूरोपीय संघ का GDPR (जनरल डाटा प्रोटेक्शन रेगुलेशन) दुनिया का सबसे सख्त मानक माना जाता है।
भारत बनाम विश्व:
- डेटा की बाढ़: भारत में 80 करोड़ से अधिक इंटरनेट उपयोगकर्ता हैं, जो दुनिया का सबसे बड़ा डेटा पूल बनाते हैं।
- रिपोर्ट: आईएएमएआई (IAMAI) के अनुसार, भारतीय डेटा बाजार 25-30% की वार्षिक दर से बढ़ रहा है। अमेरिका और चीन के बाद भारत तीसरा सबसे बड़ा डेटा माइनिंग हब बन रहा है।
विश्लेषण: क्या हम अपनी स्वायत्तता खो रहे हैं?
वर्तमान परिस्थियों को देखते हुए यह कहना कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी कि आधुनिकीकरण के बढ़ते चरण के साथ हमारी हमारी 'स्वतंत्र इच्छा' पर संकट मंडरा रहा है।
- डिजिटल नियतिवाद: जब एल्गोरिदम तय करता है कि हमें क्या देखना है और क्या खरीदना है, तो हमारी निर्णय लेने की शक्ति सीमित हो जाती है।
- पहचान का विखंडन: व्यक्ति अब एक 'इकाई' नहीं, बल्कि क्रेडिट स्कोर, स्वास्थ्य डेटा और उपभोक्ता प्रोफाइल का एक अस्थिर समूह मात्र रह गया है।
आगे की राह
- डेटा संप्रभुता: नागरिकों को उनके डेटा पर पूर्ण अधिकार होना चाहिए (भूल जाने का अधिकार)।
- एथिकल एआई: एआई के विकास में मानवीय मूल्यों और नैतिकता को प्राथमिकता देनी होगी।
- डिजिटल साक्षरता: नागरिकों को केवल इंटरनेट चलाना ही नहीं, बल्कि डेटा के खेल को समझना भी सिखाना होगा।
निष्कर्ष
'खनन योग्य स्वयं' मानवता के लिए एक दोधारी तलवार है। जहाँ यह तकनीक और सेवाओं को व्यक्तिगत बनाती है, वहीं यह हमारी गरिमा और गोपनीयता के लिए गंभीर खतरा भी है। भविष्य की चुनौती तकनीक को रोकने में नहीं, बल्कि उसे मानवीय गरिमा के अधीन लाने में है। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि मनुष्य केवल एक 'डेटा पॉइंट' बनकर न रह जाए, बल्कि उसकी स्वायत्तता सुरक्षित रहे।
सामान्य अध्ययन पेपर – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध
सन्दर्भ
एक जीवंत लोकतंत्र में 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' न केवल व्यक्ति का मौलिक अधिकार है, बल्कि यह सामाजिक विचार-विनिमय और प्रगति का आधार भी है। हाल के वर्षों में फिल्मों के शीर्षक, कलात्मक कृतियों और व्यंग्य पर बढ़ती FIR तथा सेंसरशिप की प्रवृत्तियों ने एक गंभीर बहस को जन्म दिया है। लोकतंत्र की शक्ति इस बात में निहित है कि वह उन विचारों को भी स्थान दे जो सत्ता या समाज के कुछ वर्गों को अप्रिय लग सकते हैं।
संवैधानिक प्रावधान
भारतीय संविधान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और उस पर लगने वाले प्रतिबंधों के बीच एक सूक्ष्म संतुलन बनाता है:
- अनुच्छेद 19(1)(a): यह प्रत्येक नागरिक को 'भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' का मौलिक अधिकार प्रदान करता है। इसमें प्रेस की स्वतंत्रता और कलात्मक अभिव्यक्ति भी शामिल है।
- अनुच्छेद 19(2) (उचित प्रतिबंध): यह अधिकार असीमित नहीं है। राज्य निम्नलिखित आधारों पर 'उचित प्रतिबंध' लगा सकता है:
- भारत की संप्रभुता और अखंडता
- राज्य की सुरक्षा
- विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध
- सार्वजनिक व्यवस्था
- शालीनता या नैतिकता
- न्यायालय की अवमानना
- मानहानि
- अपराध के लिए उकसाना
चर्चा में क्यों?
- अभिव्यक्ति बनाम कानूनी कार्रवाई: हाल ही में एक फिल्म के शीर्षक ('घूसखोर पंडित') पर FIR दर्ज करने के प्रशासनिक निर्देश ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक भावनाओं के मध्य संतुलन पर पुनः प्रश्न खड़े किए हैं।
- अनुच्छेद 19(2) का अनुप्रयोग: 'सार्वजनिक व्यवस्था' और 'धार्मिक सद्भाव' के आधार पर की जाने वाली त्वरित दंडात्मक कार्रवाइयों के कारण 'तर्कसंगत प्रतिबंधों' की संवैधानिक व्याख्या चर्चा में है।
- कलात्मक कृतियों पर प्रतिबंध: पिछले कुछ वर्षों में 'द केरल स्टोरी', 'पद्मावत' और कई वृत्तचित्रों पर राज्यों द्वारा लगाए गए प्रशासनिक प्रतिबंधों ने नीतिगत विमर्श को तीव्र किया है।
- कार्यकारी अतिरेक: कानूनी विशेषज्ञों के बीच यह चिंता बढ़ रही है कि विवादित कलाकृतियों पर सीधा प्रतिबंध लगाना लोकतांत्रिक संवाद के स्थान पर 'अनुशासनात्मक दृष्टिकोण' की ओर झुकाव दर्शाता है।
- न्यायिक सक्रियता: माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा बार-बार यह स्पष्ट करना कि केवल वैचारिक असहमति प्रतिबंध का आधार नहीं हो सकती, इस विषय को संवैधानिक और प्रशासनिक रूप से महत्वपूर्ण बनाता है।
'भावनाओं का आहत होना' बनाम 'हिंसा का जोखिम'
प्रशासनिक और न्यायिक दृष्टिकोण से इन दोनों के मध्य सूक्ष्म अंतर को समझना आवश्यक है:
- न्यायिक परिपक्वता: माननीय उच्चतम न्यायालय ने 'एस. रंगराजन बनाम पी. जगजीवन राम' जैसे मामलों में स्पष्ट किया है कि केवल वैचारिक असहमति या भावनाओं का आहत होना किसी कृति पर प्रतिबंध का आधार नहीं हो सकता, जब तक कि वह 'सार्वजनिक अव्यवस्था' का प्रत्यक्ष कारण न बने।
- अप्रिय भाषण बनाम अवैध भाषण: अदालतें 'अपमानजनक भाषण' और 'हिंसा भड़काने वाले भाषण' के बीच स्पष्ट अंतर करती हैं।
- सहिष्णुता की अपेक्षा: लोकतंत्र में विविध विचारों का होना स्वाभाविक है। यहाँ 'अप्रिय अभिव्यक्ति' और 'हिंसात्मक उत्तेजना' के बीच स्पष्ट विभाजन होना चाहिए ताकि लोकतांत्रिक सहिष्णुता बनी रहे।
प्रशासनिक हस्तक्षेप और संवैधानिक प्रक्रिया
राज्य द्वारा सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के प्रयासों का विश्लेषण करते समय निम्नलिखित बिंदुओं पर विचार आवश्यक है:
- कार्यकारी विवेक का प्रयोग: कभी-कभी स्थानीय शांति बनाए रखने के लिए प्रशासन त्वरित कदम उठाता है, परंतु यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि ऐसी कार्रवाई 'न्यायिक समीक्षा' के मानकों पर खरी उतरे।
- संवैधानिक प्रक्रिया का पालन: किसी भी सामग्री को प्रतिबंधित करने से पूर्व 'प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत' और 'तथ्यात्मक जांच' को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, ताकि कार्यकारी कार्रवाई अतिरेकपूर्ण प्रतीत न हो।
- कार्यकारी कार्रवाई: बिना किसी न्यायिक जांच के फिल्मों के प्रदर्शन पर रोक लगाना या लिंक्स हटाना 'संवैधानिक प्रक्रिया' का उल्लंघन है। राज्य का कर्तव्य केवल व्यवस्था बनाए रखना नहीं, बल्कि नागरिकों की स्वतंत्रता की रक्षा करना भी है।
प्रमुख उदाहरण
- द केरल स्टोरी और पद्मावत: राज्यों द्वारा कानून-व्यवस्था का हवाला देकर प्रतिबंध लगाने की कोशिशें, जिन्हें बाद में अदालतों ने खारिज कर दिया।
- बीबीसी डॉक्यूमेंट्री (2023): आईटी नियमों के तहत बिना न्यायिक स्पष्टीकरण के सामग्री को हटाना।
- इंडियाज़ डॉटर (2015): वृत्तचित्रों पर प्रतिबंध, जो वैश्विक स्तर पर मानवाधिकार चर्चाओं का हिस्सा थे।
लोकतांत्रिक प्रभाव
जब कला और विचारों को दबाया जाता है, तो इसके परिणाम दूरगामी होते हैं:
- विचारों के बाजार का क्षरण: जब विवादित सामग्री को कानून के डर से हटा दिया जाता है, तो समाज विविध दृष्टिकोणों से वंचित रह जाता है।
- न्यायिक अवसर की हानि: त्वरित कार्यकारी प्रतिबंधों के कारण अदालतों को कानूनी मानकों और अधिकारों की व्याख्या करने का मौका नहीं मिल पाता।
- कलात्मक स्वतंत्रता में गिरावट: कलाकार 'स्व-सेंसरशिप' की ओर बढ़ने लगते हैं, जिससे सृजनशीलता का ह्रास होता है।
आगे की राह
- न्यायिक मार्ग बनाम कार्यकारी निर्णय: किसी भी प्रतिबंध से पहले न्यायिक समीक्षा अनिवार्य होनी चाहिए। कार्यकारी आदेशों के बजाय अदालतों को तय करने देना चाहिए कि क्या कोई कृति वास्तव में अवैध है।
- आनुपातिकता का सिद्धांत: प्रतिबंध हमेशा उद्देश्य के अनुपात में होना चाहिए। 'न्यूनतम प्रतिबंधात्मक उपाय' अपनाया जाना चाहिए।
- लोकतांत्रिक प्रतिक्रिया को प्रोत्साहन: विवादित कला का उत्तर प्रतिबंध नहीं, बल्कि बहिष्कार, आलोचना या व्यंग्य होना चाहिए।
- संवैधानिक नैतिकता: राज्य को तटस्थ रहकर अभिव्यक्ति के सुरक्षित वातावरण का निर्माण करना चाहिए।
निष्कर्ष
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र की रीढ़ है। राज्य की असली परीक्षा अशांति के डर से विचारों को दबाने में नहीं, बल्कि स्वतंत्रता और व्यवस्था के बीच संतुलन बनाए रखने में है। लोकतंत्र में शांति बनाए रखने का सही तरीका विचारों को कुचलना नहीं, बल्कि उन्हें संवैधानिक मर्यादा के भीतर व्यक्त होने देना है। अंततः, कला और विचार ही समाज को आईना दिखाते हैं और उसे बेहतर बनाते हैं।