Read Current Affairs
भारत और आसियान (ASEAN) के बीच द्विपक्षीय व्यापार
संदर्भ:
वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय द्वारा जारी आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में भारत और आसियान (ASEAN) के बीच द्विपक्षीय व्यापार 128 बिलियन डॉलर के ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच गया है.
वर्तमान समाचार बिंदु:
व्यापारिक हिस्सेदारी: भारत के कुल वैश्विक व्यापार में आसियान देशों की हिस्सेदारी लगभग 11 प्रतिशत है, जो इसे नई दिल्ली के सबसे महत्वपूर्ण वाणिज्यिक भागीदारों में से एक बनाती है.
- 13वीं संयुक्त समिति की बैठक: दोनों पक्षों ने नई दिल्ली में 6 से 10 जुलाई 2026 तक आयोजित '13वीं आसियान-भारत वस्तु व्यापार समझौता' (AITIGA) संयुक्त समिति की बैठक में व्यापारिक संबंधों की समीक्षा की.
- बैठक की सह-अध्यक्षता: इस महत्वपूर्ण बैठक की सह-अध्यक्षता भारत के वाणिज्य विभाग के अतिरिक्त सचिव नितिन कुमार यादव और आसियान का प्रतिनिधित्व कर रहीं मलेशिया की उप महासचिव (व्यापार) मस्तूरा अहमद मुस्तफा ने की.
- सक्रिय उप-समितियां: मुख्य बैठक के समानांतर तीन प्रमुख उप-समितियों ने भी सत्र आयोजित किए, जिनमें सीमा शुल्क प्रक्रिया और व्यापार सुविधा, राष्ट्रीय उपचार और बाजार पहुंच, तथा मूल स्थान के नियम (रूल्स ऑफ ओरिजिन) शामिल हैं.
- समयबद्ध लक्ष्य: वार्ताओं की गति को बनाए रखने के लिए विभिन्न उप-समितियों को समयबद्ध कार्य सौंपे गए हैं ताकि लंबित अध्यायों को शीघ्रता से अंतिम रूप देकर सकारात्मक परिणाम प्राप्त किए जा सकें.
निष्कर्ष:
आसियान-भारत वस्तु व्यापार समझौता (AITIGA) वर्ष 2009 में हस्ताक्षरित तथा 1 जनवरी 2010 से प्रभावी हुआ। इस व्यापार समझौते की समीक्षा का मुख्य उद्देश्य द्विपक्षीय व्यापार असंतुलन और भारत के बढ़ते व्यापार घाटे को कम करना है. कड़े नियमों और बेहतर बाजार पहुंच के माध्यम से इस समझौते में होने वाले नए बदलाव इलेक्ट्रॉनिक्स, कपड़ा और फार्मास्यूटिकल्स जैसे क्षेत्रों में भारतीय निर्यातकों के लिए भविष्य में प्रगति के नए अवसर खोलेंगे.
राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड (NBWL)
संदर्भ
हाल ही में सेवानिवृत्त अधिकारियों और संरक्षणवादियों द्वारा दिल्ली उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका (PIL) दायर कर राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड (NBWL) और उसकी स्थायी समिति के कामकाज की वैधता व प्रशासनिक तटस्थता को चुनौती दी गई है।
मुख्य समाचार बिंदु
याचिकाकर्ता: यह याचिका 10 सेवानिवृत्त वन अधिकारियों और संरक्षणवादियों के एक समूह द्वारा दायर की गई है, जिसका नेतृत्व सेवानिवृत्त भारतीय वन सेवा (IFS) अधिकारी प्रकृति श्रीवास्तव कर रही हैं। इसमें वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के मुख्य प्रारूपकार माने जाने वाले 88 वर्षीय पूर्व सिविल सेवक एम.के. रंजीतसिंह भी शामिल हैं।
- आरोप (क्लियरिंग हाउस की भूमिका): याचिका में आरोप लगाया गया है कि राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड (NBWL) और उसकी स्थायी समिति केवल एक "क्लियरिंग हाउस" (मंजूरी देने वाली संस्था) बनकर रह गए हैं, जो बिना उचित समीक्षा के संरक्षित क्षेत्रों की भूमि को सड़कों, खनन, उद्योगों और अन्य गैर-संरक्षण परियोजनाओं के लिए डायवर्ट (हस्तांतरित) कर रहे हैं।
- 97% से अधिक की अभूतपूर्व मंजूरी दर: याचिकाकर्ताओं का दावा है कि स्थायी समिति ने वर्ष 2014 और 2026 के बीच संरक्षित भूमि के डायवर्जन, क्षेत्रफल में कटौती या उसे वि-अधिसूचित करने से संबंधित 97% से अधिक प्रस्तावों को आंख मूंदकर मंजूरी दी है, जिसमें कई बार एक ही दिन में 100 से अधिक प्रस्तावों को निपटाया गया।
- मुख्य बोर्ड की निष्क्रियता: नियमानुसार पूर्ण एनबीडब्ल्यूएल (NBWL) की बैठक प्रतिवर्ष आयोजित की जानी चाहिए, लेकिन यह 13 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद पहली बार वर्ष 2025 में आयोजित की गई। इस निष्क्रियता के कारण स्थायी समिति ही व्यावहारिक रूप से इसकी मुख्य कार्यकारी और परिचालन शाखा बन गई है।
- बाध्यकारी दिशानिर्देशों की मांग: याचिकाकर्ताओं ने अदालत से मांग की है कि दोनों निकायों के निर्णय लेने के तौर-तरीकों को विनियमित करने के लिए कड़े और विधिक रूप से बाध्यकारी दिशानिर्देश तय किए जाएं।
- न्यायालय की समयसीमा: दिल्ली उच्च न्यायालय ने सरकार को 18 अगस्त तक इस मामले में अपना आधिकारिक जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है, और इस मामले की अगली सुनवाई 18 सितंबर को निर्धारित की गई है।
राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड (NBWL) क्या है?
भारतीय प्रशासनिक और पर्यावरण व्यवस्था में राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड (NBWL) एक अत्यंत महत्वपूर्ण संस्थान है। परीक्षा के दृष्टिकोण से इसके सभी प्रमुख आयाम निम्नलिखित हैं:
- स्थापना और कानूनी स्थिति:
- यह वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की धारा 5A के तहत गठित एक "वैधानिक निकाय" है।
- यह भारत में वन्यजीव संरक्षण और नीति निर्धारण के मामलों में देश का सर्वोच्च निकाय है।
- भूमिका और कार्यप्रकृति:
- इसकी भूमिका मुख्य रूप से सलाहकार प्रकृति की है। यह केंद्र सरकार को राष्ट्रीय उद्यानों, अभयारण्यों और अन्य संरक्षित क्षेत्रों के संरक्षण तथा विकास के लिए नीतियों और कार्यक्रमों को तैयार करने पर सलाह देता है।
- संगठनात्मक संरचना:
- अध्यक्ष: भारत के प्रधानमंत्री इसके पदेन अध्यक्ष होते हैं।
- उपाध्यक्ष: केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री इसके उपाध्यक्ष होते हैं।
- सदस्य: इसमें कुल 47 सदस्य होते हैं, जिनमें तीन संसद सदस्य (दो लोकसभा और एक राज्यसभा), पांच गैर-सरकारी संगठन (NGOs), दस प्रख्यात पारिस्थितिकीविद् व संरक्षणवादी और विभिन्न सरकारी विभागों के शीर्ष प्रशासनिक अधिकारी शामिल होते हैं।
- स्थायी समिति:
- अधिनियम के तहत, NBWL को दैनिक और व्यावहारिक कार्यों को संचालित करने के लिए एक 'स्थायी समिति' के गठन का अधिकार है।
- इस स्थायी समिति की अध्यक्षता केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री द्वारा की जाती है।
- व्यावहारिक स्तर पर, विभिन्न विकासात्मक परियोजनाओं के लिए वन भूमि या वन्यजीव क्षेत्रों के डायवर्जन से जुड़ी अधिकांश मंजूरियों की जांच और निर्णय इसी समिति द्वारा किया जाता है।
- शक्तियां और कार्य:
- सीमाओं में परिवर्तन की शक्ति: राष्ट्रीय उद्यानों और वन्यजीव अभयारण्यों की सीमाओं में किसी भी प्रकार का बदलाव या क्षेत्र को गैर-अधिसूचित करने का कार्य बिना NBWL की पूर्व सिफारिश के नहीं किया जा सकता।
- परियोजना मंजूरी: राष्ट्रीय उद्यानों, वन्यजीव अभयारण्यों तथा अधिसूचित पारिस्थितिकी-संवेदनशील क्षेत्रों में प्रस्तावित विकासात्मक परियोजनाओं के लिए, वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 तथा सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुसार आवश्यक होने पर राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड (NBWL) की अनुशंसा/स्वीकृति प्राप्त करना अनिवार्य होता है। जहाँ पारिस्थितिकी-संवेदनशील क्षेत्र अधिसूचित नहीं हैं, वहाँ सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप मामलों का परीक्षण किया जाता है।
- नीति निर्माण: देश में राष्ट्रीय वन्यजीव कार्य योजना को तैयार करना और उसकी समय-समय पर समीक्षा करना इसका मुख्य उत्तरदायित्व है।
- प्रभाव आकलन जांच: बोर्ड आवश्यकता पड़ने पर किसी परियोजना से वन्यजीवों पर होने वाले संभावित नुकसान का आकलन करने के लिए स्वतंत्र विशेषज्ञ समितियों का गठन कर सकता है।
निष्कर्ष
पारिस्थितिक संतुलन और सतत विकास के बीच सामंजस्य बिठाना किसी भी राष्ट्र के लिए अत्यंत आवश्यक है। राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड (NBWL) जैसी सर्वोच्च संस्था को अपनी वैधानिक जिम्मेदारी और पर्यावरण संरक्षण के प्रति जवाबदेही को पुनः बहाल करना होगा, ताकि त्वरित प्रशासनिक मंजूरियां देश की समृद्ध जैव-विविधता और भावी पीढ़ियों के अस्तित्व की कीमत पर न दी जाएं।
परफॉर्मेंस ग्रेडिंग इंडेक्स (PGI)
संदर्भ
हाल ही में केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के स्कूल शिक्षा और साक्षरता विभाग द्वारा वर्ष 2025-26 के लिए राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों (PGI-S) और जिलों (PGI-D) हेतु परफॉर्मेंस ग्रेडिंग इंडेक्स रिपोर्ट जारी की गई है।
मुख्य समाचार बिंदु
विशाल शिक्षण ढांचा: रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय शिक्षा प्रणाली विश्व की सबसे बड़ी प्रणालियों में से एक है, जिसमें विभिन्न सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि के लगभग 24.72 करोड़ छात्र, 1.03 करोड़ शिक्षक और 14.67 लाख से अधिक स्कूल शामिल हैं।
- PGI-S 2.0 (राज्य/केंद्र शासित प्रदेश स्तर): यह इंडेक्स राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को उनके प्रदर्शन के आधार पर विभिन्न ग्रेड या स्तरों में वर्गीकृत करता है, जिससे कई राज्यों को एक ही प्रदर्शन बैंड में रखकर एक संतुलित और सकारात्मक मूल्यांकन सुनिश्चित किया जा सके।
- PGI-S का संरचनात्मक भारांश: इसके तहत 70 संकेतकों के आधार पर कुल 1000 अंकों का भारांश निर्धारित किया गया है, जिन्हें 2 श्रेणियों (परिणाम और शासन व प्रबंधन) तथा 6 डोमेन में विभाजित किया गया है।
- बहु-पोर्टल डेटा संरेखण: PGI-S का डेटा यूडीआईएसई प्लस (UDISE+), परख राष्ट्रीय सर्वेक्षण 2024, पीएम पोषण पोर्टल, प्रबंध (PRABANDH) पोर्टल और विद्यांजलि पोर्टल से पूरी तरह एकीकृत और संरेखित है।
- PGI-D (जिला स्तर) का विस्तार: शिक्षा मंत्रालय ने शैक्षिक नीतियों के परिणाम-आधारित मापन पर ध्यान केंद्रित करने के लिए इस मूल्यांकन प्रणाली को जिला स्तर तक विस्तृत किया है।
- PGI-D का संरचनात्मक भारांश: जिला स्तर के इस ढांचे में 70 संकेतकों के तहत कुल 600 अंकों का भारांश तय किया गया है, जो 6 श्रेणियों और 11 विशिष्ट डोमेन (जैसे डिजिटल लर्निंग, स्कूल सुरक्षा, उपस्थिति निगरानी प्रणाली आदि) में विभाजित है।
- PGI 2025-26 के 10-स्तरीय ग्रेडिंग सिस्टम में किसी भी राज्य/UT ने शीर्ष तीन ग्रेड (71-100%) हासिल नहीं किया चंडीगढ़ अकेला चौथे सर्वोच्च ग्रेड 'उत्तम-3' तक पहुंच सका।
- सबसे ऊंचे स्कोर (चंडीगढ़) और सबसे निचले स्कोर (मेघालय) के बीच का अंतर 2017-18 के 51% से घटकर अब 31.4% रह गया है यानी राज्यों के बीच असमानता कम हो रही है।
- मध्य प्रदेश, मणिपुर, ओडिशा और उत्तराखंड के स्कोर में 2024-25 की तुलना में गिरावट आई है।
परफॉर्मेंस ग्रेडिंग इंडेक्स (PGI) क्या है?
परफॉर्मेंस ग्रेडिंग इंडेक्स (PGI) भारत में स्कूली शिक्षा प्रणाली के व्यापक मूल्यांकन और सुधार के लिए तैयार किया गया एक तकनीकी व प्रशासनिक उपकरण है। परीक्षा के दृष्टिकोण से इसके सभी महत्वपूर्ण आयाम निम्नलिखित हैं:
- नोडल मंत्रालय और उद्देश्य:
- यह केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के स्कूल शिक्षा और साक्षरता विभाग (DoSE&L) की एक प्रमुख पहल है।
- इसका मुख्य उद्देश्य राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों और जिलों को स्कूली शिक्षा के क्षेत्र में उनकी कमियों की पहचान करने तथा लक्षित हस्तक्षेप के माध्यम से सुधार करने के लिए प्रेरित करना है।
- मूल्यांकन की पद्धति:
- PGI पारंपरिक रैंकिंग प्रणाली (जैसे 1, 2, 3 स्थान देना) के स्थान पर 'ग्रेडिंग प्रणाली' का उपयोग करता है।
- लाभ: रैंकिंग प्रणाली में राज्यों के बीच अस्वस्थ प्रतिस्पर्धा होती है, जबकि ग्रेडिंग व्यवस्था कई राज्यों को एक ही बैंड (स्तर) में आने का अवसर देती है, जिससे राज्यों में सामूहिक और रचनात्मक सुधार की भावना विकसित होती है।
- PGI-S (राज्यों/UTs के लिए) के 6 प्रमुख डोमेन: यह इंडेक्स कुल 1000 अंकों के भारांश के साथ मुख्य रूप से दो श्रेणियों परिणाम और शासन व प्रबंधन के अंतर्गत निम्नलिखित छह डोमेन पर आधारित है:
- सीखने के परिणाम और गुणवत्ता: छात्रों के वास्तविक अधिगम (सीखने) के स्तर का आकलन।
- पहुंच: स्कूलों में बच्चों के नामांकन और प्रतिधारण की स्थिति।
- बुनियादी ढांचा और सुविधाएं: स्वच्छ पेयजल, शौचालय और प्रयोगशालाओं जैसी भौतिक व्यवस्था।
- समता: हाशिए पर मौजूद वर्गों, बालिकाओं और दिव्यांग बच्चों के लिए समान अवसर।
- शासन प्रक्रियाएं: डिजिटल प्रशासनिक प्रणाली और शिक्षकों की समय पर तैनाती।
- शिक्षक शिक्षा और प्रशिक्षण: शिक्षकों के व्यावसायिक विकास और प्रशिक्षण की गुणवत्ता।
- PGI-D (जिलों के लिए) के 11 डोमेन: जिलों की जमीनी वास्तविकताओं को मापने के लिए PGI-D को 600 अंकों के साथ 11 डोमेन में वर्गीकृत किया गया है,
- अधिगम परिणाम एवं गुणवत्ता
- पहुँच संबंधी परिणाम
- शिक्षकों की उपलब्धता एवं व्यावसायिक विकास संबंधी परिणाम
- अधिगम प्रबंधन
- अधिगम संवर्धन गतिविधियाँ
- अवसंरचना, सुविधाएँ एवं विद्यार्थियों के अधिकार
- विद्यालय सुरक्षा एवं बाल संरक्षण
- डिजिटल अधिगम
- निधियों का अभिसरण एवं उपयोग
- उपस्थिति निगरानी प्रणाली
- विद्यालय नेतृत्व विकास
डेटा के प्रमुख स्रोत:
इस सूचकांक की विश्वसनीयता को बढ़ाने के लिए डेटा पूरी तरह से वस्तुनिष्ठ और डिजिटल स्रोतों से लिया जाता है:
- UDISE+: स्कूलों से संबंधित वास्तविक समय का डेटाबेस।
- परख राष्ट्रीय सर्वेक्षण: छात्रों के सीखने की क्षमता का राष्ट्रीय स्तर पर मानकीकृत मूल्यांकन।
- प्रबंध (PRABANDH) पोर्टल: समग्र शिक्षा योजना के वित्तीय और भौतिक प्रगति की ट्रैकिंग।
नीतिगत महत्व:
यह सूचकांक राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के लक्ष्यों को प्राप्त करने और सतत विकास लक्ष्य-4 (SDG-4: गुणवत्तापूर्ण शिक्षा) की दिशा में प्रगति की निगरानी करने में एक अत्यंत महत्वपूर्ण उपकरण की भूमिका निभाता है।
निष्कर्ष
परफॉर्मेंस ग्रेडिंग इंडेक्स डेटा-आधारित शासन का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जो भारतीय स्कूली शिक्षा के विभिन्न स्तरों की कमियों को उजागर करता है। ज़मीनी स्तर पर शैक्षिक नीतियों के सटीक मापन और इस इंडेक्स के रचनात्मक उपयोग से ही देश में समतामूलक एवं गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित की जा सकती है।
परफॉर्मेंस ग्रेडिंग इंडेक्स (PGI)
संदर्भ
हाल ही में केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के स्कूल शिक्षा और साक्षरता विभाग द्वारा वर्ष 2025-26 के लिए राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों (PGI-S) और जिलों (PGI-D) हेतु परफॉर्मेंस ग्रेडिंग इंडेक्स रिपोर्ट जारी की गई है।
मुख्य समाचार बिंदु
विशाल शिक्षण ढांचा: रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय शिक्षा प्रणाली विश्व की सबसे बड़ी प्रणालियों में से एक है, जिसमें विभिन्न सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि के लगभग 24.72 करोड़ छात्र, 1.03 करोड़ शिक्षक और 14.67 लाख से अधिक स्कूल शामिल हैं।
- PGI-S 2.0 (राज्य/केंद्र शासित प्रदेश स्तर): यह इंडेक्स राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को उनके प्रदर्शन के आधार पर विभिन्न ग्रेड या स्तरों में वर्गीकृत करता है, जिससे कई राज्यों को एक ही प्रदर्शन बैंड में रखकर एक संतुलित और सकारात्मक मूल्यांकन सुनिश्चित किया जा सके।
- PGI-S का संरचनात्मक भारांश: इसके तहत 70 संकेतकों के आधार पर कुल 1000 अंकों का भारांश निर्धारित किया गया है, जिन्हें 2 श्रेणियों (परिणाम और शासन व प्रबंधन) तथा 6 डोमेन में विभाजित किया गया है।
- बहु-पोर्टल डेटा संरेखण: PGI-S का डेटा यूडीआईएसई प्लस (UDISE+), परख राष्ट्रीय सर्वेक्षण 2024, पीएम पोषण पोर्टल, प्रबंध (PRABANDH) पोर्टल और विद्यांजलि पोर्टल से पूरी तरह एकीकृत और संरेखित है।
- PGI-D (जिला स्तर) का विस्तार: शिक्षा मंत्रालय ने शैक्षिक नीतियों के परिणाम-आधारित मापन पर ध्यान केंद्रित करने के लिए इस मूल्यांकन प्रणाली को जिला स्तर तक विस्तृत किया है।
- PGI-D का संरचनात्मक भारांश: जिला स्तर के इस ढांचे में 70 संकेतकों के तहत कुल 600 अंकों का भारांश तय किया गया है, जो 6 श्रेणियों और 11 विशिष्ट डोमेन (जैसे डिजिटल लर्निंग, स्कूल सुरक्षा, उपस्थिति निगरानी प्रणाली आदि) में विभाजित है।
- PGI 2025-26 के 10-स्तरीय ग्रेडिंग सिस्टम में किसी भी राज्य/UT ने शीर्ष तीन ग्रेड (71-100%) हासिल नहीं किया चंडीगढ़ अकेला चौथे सर्वोच्च ग्रेड 'उत्तम-3' तक पहुंच सका।
- सबसे ऊंचे स्कोर (चंडीगढ़) और सबसे निचले स्कोर (मेघालय) के बीच का अंतर 2017-18 के 51% से घटकर अब 31.4% रह गया है यानी राज्यों के बीच असमानता कम हो रही है।
- मध्य प्रदेश, मणिपुर, ओडिशा और उत्तराखंड के स्कोर में 2024-25 की तुलना में गिरावट आई है।
परफॉर्मेंस ग्रेडिंग इंडेक्स (PGI) क्या है?
परफॉर्मेंस ग्रेडिंग इंडेक्स (PGI) भारत में स्कूली शिक्षा प्रणाली के व्यापक मूल्यांकन और सुधार के लिए तैयार किया गया एक तकनीकी व प्रशासनिक उपकरण है। परीक्षा के दृष्टिकोण से इसके सभी महत्वपूर्ण आयाम निम्नलिखित हैं:
- नोडल मंत्रालय और उद्देश्य:
- यह केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के स्कूल शिक्षा और साक्षरता विभाग (DoSE&L) की एक प्रमुख पहल है।
- इसका मुख्य उद्देश्य राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों और जिलों को स्कूली शिक्षा के क्षेत्र में उनकी कमियों की पहचान करने तथा लक्षित हस्तक्षेप के माध्यम से सुधार करने के लिए प्रेरित करना है।
- मूल्यांकन की पद्धति:
- PGI पारंपरिक रैंकिंग प्रणाली (जैसे 1, 2, 3 स्थान देना) के स्थान पर 'ग्रेडिंग प्रणाली' का उपयोग करता है।
- लाभ: रैंकिंग प्रणाली में राज्यों के बीच अस्वस्थ प्रतिस्पर्धा होती है, जबकि ग्रेडिंग व्यवस्था कई राज्यों को एक ही बैंड (स्तर) में आने का अवसर देती है, जिससे राज्यों में सामूहिक और रचनात्मक सुधार की भावना विकसित होती है।
- PGI-S (राज्यों/UTs के लिए) के 6 प्रमुख डोमेन: यह इंडेक्स कुल 1000 अंकों के भारांश के साथ मुख्य रूप से दो श्रेणियों परिणाम और शासन व प्रबंधन के अंतर्गत निम्नलिखित छह डोमेन पर आधारित है:
- सीखने के परिणाम और गुणवत्ता: छात्रों के वास्तविक अधिगम (सीखने) के स्तर का आकलन।
- पहुंच: स्कूलों में बच्चों के नामांकन और प्रतिधारण की स्थिति।
- बुनियादी ढांचा और सुविधाएं: स्वच्छ पेयजल, शौचालय और प्रयोगशालाओं जैसी भौतिक व्यवस्था।
- समता: हाशिए पर मौजूद वर्गों, बालिकाओं और दिव्यांग बच्चों के लिए समान अवसर।
- शासन प्रक्रियाएं: डिजिटल प्रशासनिक प्रणाली और शिक्षकों की समय पर तैनाती।
- शिक्षक शिक्षा और प्रशिक्षण: शिक्षकों के व्यावसायिक विकास और प्रशिक्षण की गुणवत्ता।
- PGI-D (जिलों के लिए) के 11 डोमेन: जिलों की जमीनी वास्तविकताओं को मापने के लिए PGI-D को 600 अंकों के साथ 11 डोमेन में वर्गीकृत किया गया है,
- अधिगम परिणाम एवं गुणवत्ता
- पहुँच संबंधी परिणाम
- शिक्षकों की उपलब्धता एवं व्यावसायिक विकास संबंधी परिणाम
- अधिगम प्रबंधन
- अधिगम संवर्धन गतिविधियाँ
- अवसंरचना, सुविधाएँ एवं विद्यार्थियों के अधिकार
- विद्यालय सुरक्षा एवं बाल संरक्षण
- डिजिटल अधिगम
- निधियों का अभिसरण एवं उपयोग
- उपस्थिति निगरानी प्रणाली
- विद्यालय नेतृत्व विकास
डेटा के प्रमुख स्रोत:
इस सूचकांक की विश्वसनीयता को बढ़ाने के लिए डेटा पूरी तरह से वस्तुनिष्ठ और डिजिटल स्रोतों से लिया जाता है:
- UDISE+: स्कूलों से संबंधित वास्तविक समय का डेटाबेस।
- परख राष्ट्रीय सर्वेक्षण: छात्रों के सीखने की क्षमता का राष्ट्रीय स्तर पर मानकीकृत मूल्यांकन।
- प्रबंध (PRABANDH) पोर्टल: समग्र शिक्षा योजना के वित्तीय और भौतिक प्रगति की ट्रैकिंग।
नीतिगत महत्व:
यह सूचकांक राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के लक्ष्यों को प्राप्त करने और सतत विकास लक्ष्य-4 (SDG-4: गुणवत्तापूर्ण शिक्षा) की दिशा में प्रगति की निगरानी करने में एक अत्यंत महत्वपूर्ण उपकरण की भूमिका निभाता है।
निष्कर्ष
परफॉर्मेंस ग्रेडिंग इंडेक्स डेटा-आधारित शासन का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जो भारतीय स्कूली शिक्षा के विभिन्न स्तरों की कमियों को उजागर करता है। ज़मीनी स्तर पर शैक्षिक नीतियों के सटीक मापन और इस इंडेक्स के रचनात्मक उपयोग से ही देश में समतामूलक एवं गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित की जा सकती है।
भारत-ऑस्ट्रेलिया रणनीतिक साझेदारी: हिंद-प्रशांत में सुरक्षा, ऊर्जा और स्थिरता का नया क्षितिज
सामान्य अध्ययन पेपर – II: शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध।
संदर्भ
हाल ही में वैश्विक भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के बीच भारत और ऑस्ट्रेलिया ने अपने द्विपक्षीय संबंधों को 'व्यापक रणनीतिक साझेदारी' से आगे बढ़ाते हुए रक्षा और सुरक्षा सहयोग पर एक नया संयुक्त घोषणापत्र स्वीकार किया है। यह कदम हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शक्ति संतुलन बनाए रखने और नियम-आधारित व्यवस्था को सुदृढ़ करने की दिशा में एक युगांतरकारी मील का पत्थर है।
भारत-ऑस्ट्रेलिया संयुक्त घोषणापत्र क्या है?
यह घोषणापत्र दोनों देशों के बीच सैन्य जुड़ाव, रक्षा औद्योगिक सहयोग और समुद्री सुरक्षा को गहरा करने का एक व्यापक विज़न दस्तावेज़ है। यह वर्ष 2009 के सुरक्षा सहयोग घोषणापत्र का उन्नत संस्करण है, जिसका उद्देश्य सुदृढ़ रणनीतिक परामर्श, उन्नत सूचना साझाकरण और दोनों देशों के सशस्त्र बलों के बीच अंतर-संचालनीयता को बढ़ाना है।
चर्चा में क्यों है?
नेताओं की बैठक: भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज़ ने मेलबर्न में एक द्विपक्षीय शिखर सम्मेलन के दौरान इस रणनीति को अपनाया।
- त्रिपक्षीय सुरक्षा आयाम: यह घोषणापत्र हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ती भू-रणनीतिक अस्थिरता और नौवहन की स्वतंत्रता पर मंडराते खतरों के बीच आया है।
- नए समझौतों पर हस्ताक्षर: रक्षा के साथ-साथ दोनों देशों ने असैन्य परमाणु ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिज और साइबर सुरक्षा जैसे भविष्योन्मुखी क्षेत्रों में महत्वपूर्ण समझौतों पर मुहर लगाई है।
रक्षा और सुरक्षा सहयोग
अभ्यासों की जटिलता: द्विपक्षीय और बहुपक्षीय (जैसे मालाबार अभ्यास) सैन्य अभ्यासों के दायरे और जटिलता को बढ़ाया जाएगा।
- परस्पर सैन्य तैनाती: दोनों देशों ने एक-दूसरे के सैन्य ठिकानों से विमानों और युद्धपोतों की तैनाती के विस्तार पर सहमति व्यक्त की है।
- औद्योगिक एकीकरण: रक्षा विज्ञान, नवाचार और उन्नत प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में दोनों देशों के रक्षा उद्योग मिलकर काम करेंगे ताकि लचीली आपूर्ति श्रृंखला का निर्माण हो सके।
- मानव संसाधन विनिमय: सैन्य शिक्षा, प्रशिक्षण और संपर्क अधिकारियों की नियुक्तियों के माध्यम से कर्मियों का आदान-प्रदान गहरा किया जाएगा।
भारत एवं प्रशांत महासागर
समान विचारधारा वाले लोकतंत्र: दोनों नेताओं ने रेखांकित किया कि हिंद-प्रशांत केवल दो महासागरों का मिलन स्थल नहीं है, बल्कि यह साझा लोकतांत्रिक मूल्यों और आकांक्षाओं का प्रतीक है।
- मुक्त और स्थिर क्षेत्र: भारत और ऑस्ट्रेलिया एक ऐसे हिंद-प्रशांत के पक्षधर हैं जो समावेशी हो, जहाँ अंतरराष्ट्रीय कानूनों (जैसे UNCLOS) का सम्मान हो और किसी एक देश का आधिपत्य न हो।
ऊर्जा और महासागर
समुद्री सुरक्षा रूपरेखा: दोनों देशों ने हिंद महासागर और व्यापक हिंद-प्रशांत में समन्वय मजबूत करने के लिए 'भारत-ऑस्ट्रेलिया समुद्री सुरक्षा सहयोग रोड मैप' को लागू करने का निर्णय लिया है।
- पारंपरिक ऊर्जा सुरक्षा: ऊर्जा सुरक्षा ढांचे के तहत कोयला, डीजल, प्राकृतिक गैस और अन्य तरल ईंधनों की स्थिर, सुरक्षित और विश्वसनीय आपूर्ति सुनिश्चित करने पर सहमति बनी है।
असैन्य परमाणु ऊर्जा और स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्य यूरेनियम की आपूर्ति: लगभग 12 वर्ष पूर्व हुए ऐतिहासिक परमाणु समझौते को अमलीजामा पहनाते हुए ऑस्ट्रेलिया से भारत को परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के लिए यूरेनियम की व्यावसायिक आपूर्ति का मार्ग प्रशस्त हुआ है।
- स्वच्छ ऊर्जा को गति: यह कदम भारत के कार्बन उत्सर्जन को कम करने और गैर-जीवाश्म ऊर्जा लक्ष्यों को प्राप्त करने में सहायक होगा।
- क्रिटिकल मिनरल्स कॉरिडोर: इलेक्ट्रिक वाहनों और नवीकरणीय ऊर्जा के लिए आवश्यक लिथियम और कोबाल्ट जैसे महत्वपूर्ण खनिजों की निर्बाध आपूर्ति के लिए एक विशेष कॉरिडोर और 'साइबर, क्रिटिकल टेक्नोलॉजीज साझेदारी' की शुरुआत की गई है।
भारत-ऑस्ट्रेलिया वर्तमान तंत्र और संस्थान
यह नया घोषणापत्र दोनों देशों के बीच पहले से स्थापित मजबूत संस्थागत ढांचों को और अधिक पूरक बनाता है, जिनमें शामिल हैं:
- विदेश मंत्रियों का रूपरेखा संवाद
- 2+2 विदेश और रक्षा मंत्रिस्तरीय संवाद
- रक्षा मंत्रियों का संवाद
- क्षेत्रीय मंच: दोनों देशों ने हिंद महासागर रिम एसोसिएशन (IORA), आसियान (ASEAN) नेतृत्व वाले क्षेत्रीय ढांचे और पैसिफिक आइलैंड्स फोरम (PIF) के प्रति अपनी साझा प्रतिबद्धता दोहराई है।
अन्य महत्वपूर्ण बिंदु
क्वाड (Quad) का सुदृढ़ीकरण: यह द्विपक्षीय समझौता परोक्ष रूप से क्वाड समूह (भारत, ऑस्ट्रेलिया, जापान, यूएसए) के रणनीतिक स्तंभों को मजबूत करता है।
- कार्यबल (Workforce) सहयोग: दोनों देशों ने अपने रक्षा और तकनीकी कार्यबल में कुशल कर्मियों की भर्ती के अवसरों को तलाशने पर भी सहमति व्यक्त की है।
विश्लेषण
यह समझौता दर्शाता है कि भारत और ऑस्ट्रेलिया अब केवल व्यापारिक साझेदार नहीं बल्कि अनिवार्य सुरक्षा भागीदार बन चुके हैं। हिंद महासागर में चीन के बढ़ते सैन्य प्रभाव (जैसे जिबूती बेस और जासूसी जहाज) को संतुलित करने के लिए दोनों देशों का यह भू-रणनीतिक संरेखण अत्यंत अपरिहार्य था।
आगे की राह
समयबद्ध क्रियान्वयन: हस्ताक्षरित घोषणापत्रों और समझौतों (विशेष रूप से यूरेनियम आपूर्ति और महत्वपूर्ण खनिज कॉरिडोर) को बिना किसी नौकरशाही देरी के धरातल पर उतारा जाना चाहिए।
- प्रौद्योगिकी हस्तांतरण: भारत को ऑस्ट्रेलिया से रक्षा विज्ञान और उन्नत साइबर प्रौद्योगिकियों के हस्तांतरण पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए ताकि 'मेक इन इंडिया' को बढ़ावा मिले।
- लॉजिस्टिक्स समझौते का पूर्ण उपयोग: 'म्युचुअल लॉजिस्टिक्स सपोर्ट एग्रीमेंट' (MLSA) का लाभ उठाकर नौसैनिक सहयोग को और अधिक सघन बनाना चाहिए।
निष्कर्ष
भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच यह नई रक्षा एवं सुरक्षा घोषणा केवल एक द्विपक्षीय समझौता नहीं है, बल्कि यह हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा वास्तुकला को एक नया आकार देने का प्रयास है। साझा लोकतांत्रिक मूल्यों, पूरक आर्थिक हितों और समान सुरक्षा चुनौतियों पर आधारित यह साझेदारी आने वाले समय में वैश्विक राजनीति में स्थिरता का एक प्रमुख स्तंभ साबित होगी, जो भारत के रणनीतिक स्वायत्तता के विज़न को भी मजबूती प्रदान करती है।
विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR): मणिपुर में चुनावी समावेशन की चुनौतियाँ और नागरिकता का संकट
सामान्य अध्ययन पेपर – II: शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध।
संदर्भ
लोकतंत्र की आधारशिला एक पारदर्शी, निष्पक्ष और सर्व-समावेशी मतदाता सूची पर टिकी होती है। हाल ही में भारत निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा प्रारंभ किया गया विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) कार्यक्रम इसी दिशा में मतदाता सूची के शुद्धिकरण की एक प्रशासनिक प्रक्रिया है। वर्तमान में यह कार्यक्रम देश भर में विभिन्न चरणों में क्रियान्वित किया जा रहा है, जो प्रशासनिक सुधारों के उद्देश्य से प्रेरित होने के बावजूद सीमांत राज्यों और संघर्षग्रस्त क्षेत्रों में समावेशन से जुड़ी गंभीर चिंताओं को जन्म दे रहा है।
विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) क्या है?
विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) निर्वाचन आयोग द्वारा मतदाता सूची को अद्यतन (अपडेट) करने की एक गहन और व्यापक प्रक्रिया है, जिसके अंतर्गत पुरानी सूचियों का पुनर्मूल्यांकन किया जाता है। इसके प्रमुख आयाम निम्नलिखित हैं:
- सत्यापन प्रक्रिया: बूथ स्तर के अधिकारियों (BLOs) द्वारा मतदाताओं का घर-घर जाकर भौतिक रूप से सत्यापन किया जाता है।
- दस्तावेजी प्रमाणन: मतदाताओं के नाम, स्थायी पते और पहचान से जुड़े विधिक दस्तावेजों का गहन मिलान किया जाता है।
- त्रुटिपूर्ण नामों का विलोपन: संदिग्ध, विस्थापित, अपूर्ण जानकारी वाले या लंबे समय से अनुपस्थित नागरिकों के नामों को नियमानुसार मतदाता सूची से हटाने की कार्रवाई की जाती है।
चर्चा के कारण
- तृतीय चरण (Phase 3) का क्रियान्वयन: निर्वाचन आयोग द्वारा वर्तमान में मणिपुर सहित 16 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में इस अभियान का तीसरा चरण संचालित किया जा रहा है।
- विगत चरणों के प्रशासनिक अनुभव: इससे पहले के चरणों में (विशेषकर बिहार और पश्चिम बंगाल में) आरोप लगे कि प्रशासनिक जल्दबाजी और त्रुटियों के कारण लाखों वैध मतदाताओं, विशेषकर अल्पसंख्यक और सीमांत समुदायों के लोगों के नाम सूची से हटा दिए गए।
- अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार निकायों की चिंताएं: संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार विशेषज्ञों ने भी भारत सरकार को पत्र लिखकर एसआईआर (SIR) प्रक्रिया के दौरान अल्पसंख्यकों के साथ होने वाले कथित पक्षपात और बड़े पैमाने पर मतदाता अधिकारों के हनन पर गहरी चिंता जताई है।
- मणिपुर की विशिष्ट परिस्थितियां: तीन वर्षों से आंतरिक संकट और विस्थापन का सामना कर रहे मणिपुर में इस प्रकार की जटिल प्रक्रिया को सामान्य परिस्थितियों की भांति लागू करने पर नागरिक समाज संगठनों ने इसकी व्यावहारिक प्रासंगिकता पर प्रश्न उठाए हैं।
मणिपुर में SIR अन्य राज्यों से भिन्न क्यों है?
मणिपुर की विशिष्ट जमीनी और सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियां इस प्रशासनिक प्रक्रिया को एक अत्यंत संवेदनशील मानवीय और प्रशासनिक चुनौती में परिवर्तित कर देती हैं:
- गंभीर जातीय संघर्ष: राज्य पिछले तीन वर्षों से मैतेई, कुकी-ज़ो और नागा समुदायों के बीच एक गहरे सामाजिक विभाजन और संघर्ष का सामना कर रहा है। ऐसे ध्रुवीकृत माहौल में प्रशासनिक निष्पक्षता सुनिश्चित करना एक बड़ी चुनौती है।
- आंतरिक विस्थापन: संघर्ष के कारण लगभग 60,000 लोग अपने मूल निवास स्थान से विस्थापित होकर राहत शिविरों या राज्य के बाहर रह रहे हैं। इन विस्थापित नागरिकों के निष्पक्ष नामांकन और भौतिक सत्यापन के लिए कोई ठोस और व्यावहारिक तंत्र उपलब्ध नहीं है।
- वैधानिक दस्तावेजों की अनुपलब्धता: मई 2023 के बाद उत्पन्न हुई परिस्थितियों में हजारों विस्थापित परिवारों के आवास क्षतिग्रस्त हो गए, जिसके कारण उनके शैक्षणिक प्रमाण पत्र, आधार कार्ड और मतदाता पहचान पत्र जैसे आवश्यक दस्तावेज नष्ट हो गए। ऐसी स्थिति में दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत करना उनके लिए अत्यंत कठिन है।
- पारंपरिक नामकरण पद्धति: आदिवासी समुदायों (विशेष रूप से कुकी-ज़ो) में नामकरण की मौखिक और लचीली परंपराएं हैं, जहां उपनामों या माता-पिता के अंतिम अक्षरों से नाम निर्धारित होते हैं। अंग्रेजी वर्तनी में विसंगतियों को प्रशासनिक मशीनरी द्वारा तकनीकी रूप से त्रुटिपूर्ण मान लिया जाता है, जिससे उनके निष्कासन का जोखिम बढ़ जाता है।
- छठी अनुसूची के संरक्षण का अभाव: मणिपुर के पर्वतीय क्षेत्रों को संविधान की छठी अनुसूची के तहत पूर्ण सुरक्षा प्राप्त नहीं है, बल्कि वे अनुच्छेद 371C और अपेक्षाकृत कमजोर स्वायत्त परिषदों के अंतर्गत आते हैं। अतीत में संकट के समय गांव के मुखिया पहचान प्रमाणित कर देते थे, परंतु वर्तमान विधिक और प्रशासनिक परिवेश में इस पारंपरिक व्यवस्था को मान्यता नहीं मिल पा रही है।
- अवैध प्रवासन का आख्यान (नैरेटिव): राज्य के बहुसंख्यक आख्यानों में कुछ विशिष्ट समुदायों को लक्षित करते हुए "अवैध प्रवासी" होने का दावा किया जाता है। यह धारणा इस पुनरीक्षण प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है और एक निष्पक्ष वातावरण के निर्माण में बाधा उत्पन्न करती है।
इससे पहले के चरणों की स्थिति
पहले के चरणों में एसआईआर (SIR) के प्रभाव विनाशकारी रहे हैं:
- उत्तर प्रदेश में लगभग 2.05 करोड़ और पश्चिम बंगाल में लगभग 83.86 लाख मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए गए।
- बिहार में भी इसी तर्ज पर लाखों लोगों को मतदाता सूची से बाहर कर दिया गया, जिससे इसे "21वीं सदी का सबसे बड़ा चुनावी निष्कासन अभियान" तक कहा गया।
- अधिकांश प्रभावित लोग गरीब, अशिक्षित, प्रवासी मजदूर या अल्पसंख्यक समुदायों के थे, जो समय पर अपने दस्तावेजों की विसंगतियों को ठीक नहीं करा पाए।
मणिपुर में मुख्य चुनौतियाँ
भौगोलिक एवं सुरक्षा संबंधी बाधाएं: राज्य का भौगोलिक रूप से घाटी और पहाड़ियों में विभाजन अधिकारियों और नागरिकों दोनों के लिए एक-दूसरे के क्षेत्रों में जाकर भौतिक सत्यापन करने में सुरक्षा संबंधी गंभीर चुनौतियाँ उत्पन्न करता है।
- प्रशासनिक तटस्थता का संकट: स्थानीय प्रशासन और मशीनरी पर आंशिक रूप से एकपक्षीय दृष्टिकोण अपनाने के आरोप लग रहे हैं, जिससे प्रक्रिया की विश्वसनीयता प्रभावित होती है।
- न्यायिक और उपचारात्मक उपायों की धीमी गति: संकट के लंबे समय बाद भी विधिक और दंडात्मक प्रक्रियाओं का तार्किक निष्कर्ष तक न पहुंचना न्याय व्यवस्था के प्रति जनता के विश्वास को कमजोर करता है।
मणिपुर की सामाजिक स्थिति एवं आँकड़े
जनसांख्यिकीय संरचना:
- मैतेई: कुल जनसंख्या का लगभग 54% (मुख्य रूप से इंफाल घाटी में केंद्रित)।
- नागा: कुल जनसंख्या का लगभग 26% (मुख्य रूप से उत्तरी पर्वतीय जिलों में निवास)।
- कुकी-ज़ो: कुल जनसंख्या का लगभग 15% (मुख्य रूप से पर्वतीय क्षेत्रों में निवास)।
- मानवीय क्षति और विस्थापन: संघर्ष के कारण अब तक 260 से अधिक नागरिकों की मृत्यु हुई है और 60,000 से अधिक लोग आंतरिक रूप से विस्थापित हुए हैं।
- वर्तमान SIR 2026 के आंकड़े (मणिपुर ड्राफ्ट रोल):
- मणिपुर में पूर्व में कुल 20,93,076 पंजीकृत मतदाता थे।
- हाल ही में जारी ड्राफ्ट रोल के अनुसार, केवल 19,34,399 मतदाताओं के फॉर्म ही डिजिटल रूप से संसाधित हो सके हैं।
- लगभग 1.58 लाख मतदाताओं के फॉर्म जमा नहीं हो पाए या वे भौतिक रूप से अप्राप्य पाए गए, जिनके मतदाता सूची से बाहर होने की प्रबल संभावना है।
अन्य महत्वपूर्ण बिंदु
वर्ष 2029 के परिसीमन पर प्रभाव: इस एसआईआर (SIR) के परिणाम आगामी परिसीमन और 2029 के आम चुनावों को सीधे प्रभावित करेंगे। किसी भी समुदाय की जनसंख्या का चुनावी सूची से विलोपन उनकी भविष्य की राजनीतिक हिस्सेदारी और प्रतिनिधित्व को स्थायी रूप से संकुचित कर सकता है।
- राजनैतिक नेतृत्व में जागरूकता का अभाव: प्रारंभ में आदिवासी नेतृत्व ने इसे एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया माना, परंतु वर्तमान में इसके दूरगामी वैधानिक और नागरिकता संबंधी प्रभावों को देखते हुए नागरिक समाज संगठनों द्वारा इसका संस्थागत विरोध शुरू किया गया है।
संवैधानिक एवं कानूनी प्रावधान
मतदाता सूची का पुनरीक्षण और नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकार भारतीय संविधान और वैधानिक कानूनों के निम्नलिखित प्रावधानों द्वारा संचालित व संरक्षित होते हैं:
- संवैधानिक प्रावधान:
- अनुच्छेद 324: इसके अंतर्गत भारत निर्वाचन आयोग (ECI) को संसद और राज्य विधानमंडलों के चुनावों के लिए मतदाता सूची तैयार करने के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की पूर्ण शक्ति प्राप्त है।
- अनुच्छेद 325: यह प्रावधान करता है कि किसी भी नागरिक को धर्म, मूलवंश, जाति या लिंग के आधार पर मतदाता सूची में शामिल होने से वंचित (Exclude) नहीं किया जा सकता।
- अनुच्छेद 326 (वयस्क मताधिकार): यह प्रत्येक वयस्क नागरिक को मतदान का अधिकार देता है, जिसे केवल अनिवास, चित्तविकृति, अपराध या भ्रष्ट आचरण के आधार पर ही विधिक रूप से संकुचित किया जा सकता है।
- अनुच्छेद 21 (प्राण और दैहिक स्वतंत्रता): माननीय सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयों के अनुसार, एक वैध नागरिक का मताधिकार और लोकतांत्रिक समावेशन उसके गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार का एक अभिन्न हिस्सा है।
- अनुच्छेद 371C: यह मणिपुर के संबंध में विशेष प्रावधान करता है, जिसके तहत पहाड़ी क्षेत्रों के प्रशासन और हितों की रक्षा के लिए एक विशेष विधायी समिति का प्रावधान है।
- वैधानिक और कानूनी प्रावधान:
- लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 (RPA, 1950):
- धारा 15 से 20: मतदाता सूचियों को तैयार करने, उनके पुनरीक्षण और पंजीकरण के लिए आवश्यक योग्यताओं (जैसे सामान्य निवासी होना) को परिभाषित करती हैं।
- धारा 22: निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ERO) को मतदाता सूची से नाम हटाने या संशोधित करने का अधिकार देती है, परंतु इसके लिए उचित प्रक्रिया और 'सुनवाई का अवसर' देना अनिवार्य है।
- मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 (1960): इसके तहत घर-घर जाकर सत्यापन (Rule 21A) और दावों तथा आपत्तियों के निपटारे की विस्तृत प्रक्रिया निर्धारित है, जिसमें पारदर्शिता का पालन करना विधिक रूप से आवश्यक है।
- लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 (RPA, 1950):
विश्लेषण
यद्यपि विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) मतदाता सूची की पारदर्शिता और शुद्धता सुनिश्चित करने का एक आवश्यक संवैधानिक प्रयास है, किंतु मणिपुर जैसी जटिल जनसांख्यिकीय और आंतरिक रूप से विभाजित परिस्थितियों में इसके क्रियान्वयन के दौरान समावेशन और सामाजिक संवेदनशीलता के बीच एक बारीक संतुलन बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है, ताकि कोई भी वैध नागरिक तकनीकी या विस्थापन जनित कारणों से अपने लोकतांत्रिक अधिकारों से वंचित न होने पाए।
आगे की राह
वैकल्पिक पहचान तंत्र का विकास: विस्थापित और प्रभावित नागरिकों के लिए विधिक दस्तावेजों की अनिवार्यता में लचीलापन लाया जाना चाहिए। इसके स्थान पर पारंपरिक ग्राम प्रमुखों और विश्वसनीय नागरिक समाज संगठनों द्वारा प्रमाणित साक्ष्यों को अस्थायी मान्यता दी जानी चाहिए।
- राहत शिविरों में विशेष पंजीकरण केंद्र: आंतरिक रूप से विस्थापित व्यक्तियों (IDPs) के लिए उनके वर्तमान निवास स्थानों (शिविरों) में ही विशेष मतदाता पंजीकरण शिविर आयोजित किए जाने चाहिए।
- भाषाई और सांस्कृतिक संवेदनशीलता: सॉफ्टवेयर और डेटा प्रविष्टि में स्थानीय भाषाओं और नामकरण की पारंपरिक पद्धतियों को समाहित करने हेतु आवश्यक तकनीकी बदलाव किए जाने चाहिए ताकि वर्तनी की त्रुटियों के आधार पर किसी को निष्कासित न किया जाए।
निष्कर्ष
मतदाता सूची को त्रुटिहीन और पारदर्शी बनाना निर्वाचन आयोग का संवैधानिक दायित्व है, किंतु यह प्रक्रिया किसी भी वैध नागरिक के मौलिक लोकतांत्रिक और मताधिकार का हनन करने का साधन नहीं बननी चाहिए। मणिपुर जैसे संवेदनशील सीमांत राज्य में प्रशासनिक सुधारों को मानवीय संवेदनशीलता, समावेशिता और निष्पक्षता के साथ लागू किया जाना अनिवार्य है। यदि इस प्रक्रिया में सुधार नहीं किया गया, तो यह लोकतांत्रिक सुदृढ़ीकरण के स्थान पर राजनीतिक अलगाव और सामाजिक असंतोष को और अधिक तीव्र कर देगी।