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सामान्य अध्ययन पेपर – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध
सामान्य अध्ययन पेपर – IV नीतिशास्त्र, सत्यनिष्ठा और अभिरुचि
भूमिका
जनवरी 2026 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा राजस्थान उच्च न्यायालय के उस आदेश पर स्थगन लगाना, जिसमें राजमार्गों से 500 मीटर के भीतर 1,102 शराब दुकानों को हटाने का निर्देश दिया गया था, भारत में 'लोक सुरक्षा' बनाम 'राज्य के आर्थिक यथार्थवाद' के पुराने द्वंद्व को पुनः केंद्र में ले आया है। यह मामला न केवल न्यायिक सक्रियता का उदाहरण है, बल्कि कार्यपालिका की व्यावहारिक सीमाओं और नीतिगत जटिलताओं को भी रेखांकित करता है।
ऐतिहासिक एवं विधिक परिप्रेक्ष्य
भारत में शराब के विनियमन को लेकर संवैधानिक और न्यायिक ढांचा सदैव 'लोक कल्याण' की ओर झुका रहा है:
- संवैधानिक अधिदेश (अनुच्छेद 47): राज्य के नीति निदेशक तत्वों के अंतर्गत, राज्य का यह कर्तव्य है कि वह लोक स्वास्थ्य के सुधार हेतु मादक पेयों और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक नशीले पदार्थों के सेवन पर प्रतिषेध लगाने का प्रयास करे।
- न्यायिक मिसाल (द स्टेट ऑफ तमिलनाडु बनाम के. बालू , 2016): सर्वोच्च न्यायालय ने 'ड्रंक ड्राइविंग' से होने वाली मृत्यु दर को कम करने हेतु राजमार्गों के किनारे 500 मीटर तक शराब की बिक्री पर प्रतिबंध लगाया था। हालांकि, 2017 के स्पष्टीकरण में नगर पालिकाओं को इससे छूट प्रदान की गई, जो वर्तमान विवाद का मुख्य केंद्र है।
- व्यापार का अधिकार: न्यायालय ने कई बार स्पष्ट किया है कि शराब का व्यापार करना कोई मौलिक अधिकार नहीं है बल्कि यह राज्य द्वारा प्रदत्त एक विशेषाधिकार है।
बहुआयामी सामाजिक-आर्थिक विश्लेषण
- सामाजिक एवं नैतिक आयाम
- घरेलू हिंसा और महिला सुरक्षा: NFHS-5 के आंकड़े पुष्टि करते हैं कि मद्यपान का सीधा संबंध घरेलू हिंसा और लैंगिक अपराधों से है। यह परिवारों की आर्थिक सुरक्षा को नष्ट कर बच्चों के पोषण और शिक्षा को बाधित करता है।
- नैतिक द्वंद्व: एक 'लोक कल्याणकारी राज्य' के लिए यह नैतिक प्रश्न विचारणीय है कि क्या उसे अपने नागरिकों के व्यसन से राजस्व अर्जित करना चाहिए। गांधीवादी दर्शन पूर्ण निषेध का समर्थन करता है, जबकि आधुनिक उदारवादी दृष्टिकोण 'व्यक्तिगत स्वतंत्रता' (अनुच्छेद 21) और 'जिम्मेदार उपभोग' पर बल देता है।
- आर्थिक यथार्थवाद और राजस्व
- राजस्व की अपरिहार्यता: शराब GST के दायरे से बाहर है, जिससे यह राज्यों के लिए 'स्टेट एक्साइज ड्यूटी' के माध्यम से आय का सबसे बड़ा स्रोत (15-25%) बनी हुई है।
- व्यावहारिक बाधाएँ: राजस्थान जैसे राज्यों में जहाँ शहरी नियोजन राजमार्गों के समानांतर है, वहां 500 मीटर का प्रतिबंध पूरे व्यावसायिक क्षेत्रों को 'ड्राई ज़ोन' में बदल सकता है, जिससे पर्यटन और रोजगार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
अपराध विज्ञान और सुरक्षा संबंधी तथ्य
- NCRB एवं सड़क सुरक्षा: भारत में सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों में 'ड्रंक ड्राइविंग' का अनुपात सांख्यिकीय रूप से कम (2-3%) दिख सकता है, किंतु इन दुर्घटनाओं की घातकता दर अन्य कारणों की तुलना में 40% अधिक होती है।
- प्रवर्तन की विफलता (भारतीय जुगाड़): प्रत्यक्ष विज्ञापनों पर प्रतिबंध के बावजूद 'प्रतीकात्मक संकेतों' (जैसे तीर के निशान) और 'शैडो एडवरटाइजिंग' (सोडा, पानी के नाम पर ब्रांडिंग) के माध्यम से नियमों की अवहेलना की जाती है।
शराबबंदी वाले राज्यों की समीक्षा:
बिहार, गुजरात और नगालैंड जैसे राज्यों के अनुभव मिश्रित रहे हैं:
- सफलता: ग्रामीण आर्थिक सुदृढ़ीकरण और सामाजिक चेतना में वृद्धि।
- विफलता: 'भूमिगत अर्थव्यवस्था' का उदय, जहरीली शराब से मृत्यु, सीमावर्ती राज्यों से तस्करी और प्रशासनिक भ्रष्टाचार में वृद्धि।
आगे की राह:
न्यायपालिका और कार्यपालिका को एक 'मध्यम मार्ग' अपनाने की आवश्यकता है:
- राजस्व विविधीकरण: राज्यों को अपनी वित्तीय निर्भरता शराब से हटाकर सेवा क्षेत्र और अन्य कर स्रोतों पर बढ़ानी चाहिए।
- तकनीकी हस्तक्षेप: राजमार्गों पर 'अल्कोहल इंटरलॉक' युक्त वाहनों को प्रोत्साहन और डिजिटल निगरानी।
- व्यवहार परिवर्तन: शराबबंदी को केवल कानून के बजाय एक सामाजिक आंदोलन के रूप में विकसित करना, जिसमें नशामुक्ति केंद्रों की भूमिका प्रमुख हो।
- न्यायिक संतुलन: राजस्थान मामले की तरह, अदालतों को व्यापक आदेश जारी करने से पूर्व सभी हितधारकों की व्यावहारिक समस्याओं को सुनना चाहिए।
निष्कर्ष
शराब का मुद्दा अर्थशास्त्र, नैतिकता और सार्वजनिक स्वास्थ्य के चौराहे पर स्थित है। राजस्थान का वर्तमान विधिक प्रकरण यह स्पष्ट करता है कि 'शून्य दुर्घटना' का लक्ष्य केवल दुकानों को विस्थापित करने से नहीं, बल्कि सख्त प्रवर्तन, जिम्मेदार उपभोग और राज्य की आर्थिक नीतियों के पुनर्गठन से ही प्राप्त किया जा सकता है। न्यायपालिका का आदर्शवाद और कार्यपालिका का यथार्थवाद जब एक दिशा में कार्य करेंगे, तभी अनुच्छेद 47 के वास्तविक लक्ष्यों की प्राप्ति संभव होगी।