CURRENT-AFFAIRS

Read Current Affairs

संदर्भ

भारत सरकार द्वारा रणनीतिक विनिवेश के अपने वार्षिक लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (BHEL) में अपनी हिस्सेदारी कम करने का निर्णय लिया गया है। इस कदम का प्राथमिक उद्देश्य सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में सरकारी स्वामित्व को तर्कसंगत बनाना और पूंजीगत संसाधनों का सृजन करना है।

वर्तमान समाचार बिंदु

  • सरकार द्वारा बिक्री के लिए प्रस्ताव (OFS) के माध्यम से बीएचईएल में कुल 5% हिस्सेदारी (3% आधार हिस्सेदारी तथा 2% 'ग्रीन शू' विकल्प) के विक्रय की प्रक्रिया निष्पादित की जा रही है।
  • ₹254 प्रति शेयर के न्यूनतम मूल्य (फ्लोर प्राइस) पर आधारित इस प्रस्ताव के लिए निवेश अवधि को दो श्रेणियों में विभाजित किया गया है:
  • प्रथम चरण: गैर-खुदरा निवेशकों (संस्थागत बोलीदाताओं) के लिए निर्धारित किया गया।
  • द्वितीय चरण: खुदरा निवेशकों की भागीदारी के लिए आवंटित किया गया है। इस प्रक्रिया के माध्यम से सरकार बाजार से महत्वपूर्ण पूंजी जुटाने की ओर अग्रसर है।

बीएचईएल (BHEL)

  • भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (BHEL) भारत का सबसे बड़ा विद्युत उत्पादन उपकरण निर्माता है।
  • यह एक 'महारत्न' सार्वजनिक क्षेत्र का उपक्रम है, जो ऊर्जा, उद्योग, परिवहन और रक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अपनी व्यापक उपस्थिति रखता है।
  • आत्मनिर्भर भारत अभियान के अंतर्गत, यह संस्थान वैश्विक मानकों के अनुरूप उन्नत इंजीनियरिंग समाधान प्रदान करने वाला एक प्रमुख स्तंभ है।


संदर्भ

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के युग में वैश्विक आर्थिक प्रतिस्पर्धा अब केवल तकनीकी विकास तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकारों द्वारा नवाचार और सार्वजनिक विश्वास के बीच संतुलन बनाने की क्षमता पर निर्भर है। पोर्टुलन्स इंस्टीट्यूट की नवीनतम रिपोर्ट इसी डिजिटल तत्परता के आधार पर विश्व की अर्थव्यवस्थाओं का सटीक मूल्यांकन प्रस्तुत करती है।

वर्तमान समाचार बिंदु

  • वैश्विक नेतृत्व: संयुक्त राज्य अमेरिका ने लगातार चौथे वर्ष अपनी शीर्ष रैंकिंग बरकरार रखी है, जो डिजिटल प्रौद्योगिकियों के उपयोग और पहुंच में इसके वैश्विक प्रभुत्व को दर्शाता है।
  • यूरोपीय देशों का दबदबा: शीर्ष 10 देशों की सूची में फिनलैंड और डेनमार्क जैसे यूरोपीय देशों का वर्चस्व कायम है; विशेष रूप से डेनमार्क ने लंबी छलांग लगाते हुए चौथा स्थान प्राप्त किया है।
  • भारत की प्रगति: भारत ने वैश्विक स्तर पर उल्लेखनीय सुधार करते हुए 45वां स्थान प्राप्त किया है (100 में से 54.43 स्कोर), और निम्न-मध्यम आय वाली अर्थव्यवस्थाओं की श्रेणी में भारत अब दूसरे स्थान पर है।
  • चीन और अन्य देश: चीन सात पायदान फिसलकर 24वें स्थान पर गया है, हालांकि यह अब भी शीर्ष 25 में शामिल एकमात्र मध्यम-आय वाला देश है। वहीं, डेटा की कमी के कारण वेनेजुएला और यमन जैसी छह अर्थव्यवस्थाएं इस वर्ष सूची से बाहर हो गई हैं।
  • मूल्यांकन के आधार: यह सूचकांक कुल 127 देशों को चार मुख्य स्तंभों -प्रौद्योगिकी, लोग, शासन, और प्रभाव के आधार पर मापता है।

सामान्य अध्ययन पेपर – III  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन

सन्दर्भ

भारत की वायु शक्ति को भविष्य की चुनौतियों के अनुरूप ढालने के लिए 5वीं पीढ़ी के स्वदेशी लड़ाकू विमान AMCA का विकास एक रणनीतिक आवश्यकता है। वर्तमान में, सरकार इस महत्वाकांक्षी परियोजना के पांच प्रोटोटाइप विकसित करने का अनुबंध निजी क्षेत्र की कंपनियों को देने पर विचार कर रही है, जिससे भारत में HAL के अतिरिक्त एक वैकल्पिक एयरोस्पेस विनिर्माण आधार तैयार किया जा सके।

चर्चा का कारण

  • निजी क्षेत्र का प्रवेश: रक्षा मंत्रालय द्वारा AMCA के प्रोटोटाइप निर्माण के लिए तीन निजी संस्थाओं में से एक को चुनने की संभावना है, जिससे देश में दूसरा विमान निर्माता स्थापित हो सके।
  • HAL की चुनौतियाँ: हालांकि HAL की ऑर्डर बुक भरी हुई है, लेकिन समय पर डिलीवरी और गुणवत्ता को लेकर CAG की प्रतिकूल टिप्पणियों ने सरकार को वैकल्पिक मॉडलों पर विचार करने के लिए प्रेरित किया है
  • रणनीतिक बदलाव: यह कदम भारत के रक्षा पारिस्थितिकी तंत्र में एक 'विच्छेद' का संकेत है, जहाँ पारंपरिक सरकारी एकाधिकार को निजी दक्षता के साथ संतुलित करने का प्रयास किया जा रहा है।

5वीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान:

AMCA भारत का पहला स्टील्थ लड़ाकू विमान होगा, जिसकी विशेषताएं इसे वैश्विक स्तर पर विशिष्ट बनाती हैं:

  • स्टील्थ तकनीक: इसमें रडार की नजर से बचने के लिए उन्नत ज्यामितीय डिजाइन और रडार-शोषक सामग्री का उपयोग किया जाएगा।
  • बहु-भूमिका: यह लंबी दूरी की मिसाइलों, उन्नत एवियोनिक्स और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणालियों से लैस होगा।
  • तकनीकी जटिलता: एक 5वीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान का निर्माण करना, सामान्य एयरोस्पेस पुर्जे बनाने की तुलना में अत्यधिक जटिल और उच्च विशेषज्ञता वाला कार्य है।

HAL: भारत का एयरोस्पेस स्तंभ

  • अनुभव का भंडार: HAL के पास आठ दशकों का अनुभव है और यह रूसी एवं पश्चिमी मूल के सभी लड़ाकू विमानों की मरम्मत और ओवरहाल करने वाली भारत की एकमात्र संस्था है।
  • एकीकृत पारिस्थितिकी तंत्र: बेंगलुरु में HAL का बुनियादी ढांचा, DRDO प्रयोगशालाओं और वायु सेना के परीक्षण प्रतिष्ठानों (ASTE) के साथ 10 किमी के दायरे में स्थित है, जो डिजाइन से उत्पादन तक निरंतर तालमेल सुनिश्चित करता है।

विश्लेषण: चुनौतियां और जोखिम

विश्लेषण के बिंदु

विवरण और चुनौतियां

अनुभव का संकट

निजी क्षेत्र की कंपनियां इस क्षेत्र में 'स्टार्टअप' के समान हैं; उनके पास एक जटिल लड़ाकू विमान प्रोटोटाइप विकसित करने का कोई पूर्व अनुभव नहीं है।

बुनियादी ढांचे की लागत

HAL की दशकों पुरानी सुविधाओं को निजी क्षेत्र द्वारा शून्य से तैयार करना अत्यधिक खर्चीला और समय लेने वाला होगा।

मानव संसाधन की कमी

भविष्य के प्रोटोटाइप के परीक्षण के लिए अनुभवी टेस्ट पायलटों और इंजीनियरों की आवश्यकता होती है, जिनका आधार वर्तमान में केवल सरकारी संस्थानों में है।

स्थान का सामरिक महत्व

विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि AMCA जैसी रणनीतिक इकाइयों को सीमाओं के बजाय सुरक्षित भीतरी इलाकों में, जैसे बेंगलुरु के विमानन केंद्र के पास होना चाहिए।

नीतिगत सुझाव और समाधान

  • सार्वजनिक-निजी सहयोग: AMCA एक राष्ट्रीय परियोजना है, इसलिए HAL की विशाल अचल संपत्ति और परीक्षण सुविधाओं का उपयोग निजी इकाई के साथ साझा किया जाना चाहिए ताकि सार्वजनिक धन का कुशल उपयोग हो सके।
  • स्वामित्व और नियंत्रण: डिजाइन एजेंसी (ADA) और निजी निष्पादक के बीच स्वामित्व के मुद्दों को स्पष्ट करने के लिए एक 'एकल नियंत्रण' तंत्र की आवश्यकता है।
  • लीक से हटकर सोच: भारत को सरकारी बनाम निजी की प्रतिस्पर्धा के बजाय एक ऐसे मॉडल की आवश्यकता है जहाँ HAL का संस्थागत ज्ञान और निजी क्षेत्र की नवाचार क्षमता मिलकर काम करें।

निष्कर्ष

AMCA परियोजना भारत की तकनीकी संप्रभुता की वास्तविक परीक्षा है। तकनीकी नवाचार और मानवीय सुरक्षा के बीच संतुलन ही भविष्य के सुरक्षित 'डिजिटल और रक्षा भारत' का आधार बनेगा। यदि भारत को रक्षा क्षेत्र में वैश्विक शक्ति बनना है, तो उसे HAL के अनुभव को आधार बनाकर निजी क्षेत्र को सशक्त करना होगा।

सामान्य अध्ययन पेपर – III  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन

संदर्भ

अतीत मशहूर हस्तियों के वायरल डीपफेक और चुनावों के दौरान एआई के दुरुपयोग की घटनाओं से सबक लेते हुए, सरकार ने आईटी नियम 2021 में संशोधन कर फोटोयथार्थवादी एआई सामग्री के लिए 20 फरवरी 2026 से अनिवार्य प्रकटीकरण नियम लागू कर दिए हैं।

एआई सामग्री क्या है?

सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) संशोधन नियम, 2026 के अनुसार एआई सामग्री की परिभाषा अत्यंत व्यापक है:

  • सिंथेटिक निर्माण: ऐसी कोई भी ऑडियो, विजुअल या ऑडियो-विजुअल सूचना जिसे कंप्यूटर संसाधनों का उपयोग करके कृत्रिम रूप से बनाया, संशोधित या बदला गया हो।
  • यथार्थवादी स्वरूप: ऐसी सामग्री जो किसी प्राकृतिक व्यक्ति या वास्तविक दुनिया की घटना के समान इस प्रकार चित्रित की गई हो कि वह देखने में बिल्कुल असली और प्रामाणिक प्रतीत हो।
  • अल्गोरिदम आधारित: इसमें वह डेटा शामिल है जो केवल मानवीय हस्तक्षेप के बिना विशुद्ध रूप से एल्गोरिदम द्वारा तैयार किया गया है।

वर्तमान चर्चा का कारण

सरकार ने एआई के बढ़ते खतरों को देखते हुए तकनीकी प्लेटफॉर्म्स के लिए नियमों को कड़ा किया है:

  • अनिवार्य लेबलिंग: प्लेटफॉर्म्स को अब एआई द्वारा निर्मित फोटोयथार्थवादी सामग्री पर स्पष्ट और प्रमुख लेबल लगाना होगा ताकि उपयोगकर्ता भ्रमित हों।
  • समय सीमा में भारी कटौती: सरकार या अदालत के आदेश के बाद अवैध सामग्री हटाने की समय सीमा 36 घंटे से घटाकर मात्र 3 घंटे कर दी गई है।
  • त्वरित कार्रवाई: गैर-सहमति वाली नग्नता या डीपफेक जैसे संवेदनशील मामलों को अब 2 घंटे के भीतर हटाना अनिवार्य होगा।
  • सेफ हार्बर का खतरा: यदि कोई प्लेटफॉर्म इन नियमों का पालन नहीं करता है, तो वह अपनी 'सेफ हार्बर' (कानूनी सुरक्षा) खो देगा और उसे सामग्री के प्रकाशक के रूप में उत्तरदायी माना जाएगा।

नए नियमों का प्रभाव

  • प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी: अब सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म केवल 'कैरियर' नहीं रहेंगे, बल्कि उन्हें अपने नेटवर्क पर मौजूद एआई सामग्री की निगरानी करनी होगी।
  • सूचना की सत्यता: लेबलिंग से सूचना की विश्वसनीयता बढ़ेगी और डिजिटल हेरफेर की गुंजाइश कम होगी।
  • त्वरित न्याय: समय सीमा कम होने से पीड़ितों को जल्दी राहत मिलेगी और अपमानजनक सामग्री को वायरल होने से पहले रोका जा सकेगा।

एआई सामग्री से जुड़ी चिंताएँ

  • सत्य का लोप: डीपफेक के कारण असली और नकली के बीच का अंतर समाप्त हो रहा है, जिससे ' सत्य का अंत' का खतरा बढ़ गया है।
  • साइबर अपराध: वित्तीय धोखाधड़ी और ब्लैकमेलिंग के लिए एआई वॉयस क्लोनिंग और फोटो हेरफेर का व्यापक उपयोग हो रहा है।
  • सोशल इंजीनियरिंग: एआई के जरिए समाज में घृणा फैलाने और सांप्रदायिक तनाव पैदा करने वाले वीडियो बनाना आसान हो गया है।

अन्य नियम और संवैधानिक प्रावधान

  • आईटी अधिनियम, 2021: यह प्राथमिक ढांचा है जिसके तहत मध्यवर्ती को विनियमित किया जाता है।
  • अनुच्छेद 19(2): संविधान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर 'राज्य की सुरक्षा' और 'सार्वजनिक व्यवस्था' के हित में उचित प्रतिबंध लगाने की शक्ति देता है।
  • अनुच्छेद 21: निजता का अधिकार एक मौलिक अधिकार है, जिसका उल्लंघन डीपफेक के माध्यम से किया जाता है।

विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण

  • तकनीक हमेशा कानून से दो कदम आगे चलती है। एआई का यह विनियमन 'डिजिटल सोवरेनिटी' (डिजिटल संप्रभुता) की दिशा में भारत का एक आवश्यक कदम है। यद्यपि स्मार्टफोन कैमरों द्वारा किए जाने वाले 'ऑटोमैटिक टच-अप' को नियमों से बाहर रखा गया है ताकि सामान्य फोटोग्राफी प्रभावित हो, लेकिन 'सिंथेटिक' और 'नेचुरल' के बीच का यह कानूनी संघर्ष आने वाले समय में और जटिल होगा।

आगे की राह

  • तकनीकी वाटरमार्किंग: प्लेटफॉर्म्स को सामग्री के स्रोत (मेटाडाटा) में एआई टैग को स्थायी रूप से जोड़ना चाहिए।
  • अंतर्राष्ट्रीय समन्वय: चूंकि इंटरनेट की कोई सीमा नहीं है, इसलिए एआई के लिए वैश्विक नियामक ढांचे की आवश्यकता है।
  • जन-जागरूकता: तकनीकी सुधारों के साथ-साथ नागरिकों को 'क्रिटिकल थिंकिंग' के लिए प्रशिक्षित करना होगा ताकि वे डिजिटल झूठ को पहचान सकें।

निष्कर्ष

संशोधित आईटी नियम 2026 इस बात का प्रमाण हैं कि भारत डिजिटल सुरक्षा को लेकर गंभीर है। तकनीक का स्वागत होना चाहिए, लेकिन मानवीय गरिमा और सत्य की कीमत पर नहीं। नियमों की यह सख्ती भविष्य के 'डिजिटल इंडिया' को अधिक सुरक्षित और विश्वसनीय बनाएगी।

सामान्य अध्ययन पेपर – III  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन

परिचय

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) कंप्यूटर विज्ञान की वह शाखा है जो मशीनों को मानवीय बुद्धिमत्ता जैसेसीखने, तर्क करने और निर्णय लेने की क्षमता प्रदान करती है। आज AI केवल एक तकनीकी शब्द नहीं, बल्कि चौथी औद्योगिक क्रांति का आधार बन चुका है। जेनेरेटिव AI (जैसे ChatGPT, Sora) और डीपफेक तकनीक ने सूचना की सत्यता पर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं, जिससे यह वैश्विक विमर्श और नीति-निर्माण के केंद्र में गया है।

तकनीकी विकास और वैश्विक परिप्रेक्ष्य

AI के भीतर मशीन लर्निंग (ML) और डीप लर्निंग (DL) जैसी उप-शाखाएं डेटा के माध्यम से एल्गोरिदम को प्रशिक्षित करती हैं।

  • AI राष्ट्रवाद: वर्तमान में अमेरिका (OpenAI, Google) और चीन (Baidu, Huawei) के बीच 'AI शीत युद्ध' जैसी स्थिति है।
  • प्रतिस्पर्धा: जहां अमेरिका नवाचार और निजी क्षेत्र के नेतृत्व पर जोर देता है, वहीं चीन राज्य-नियंत्रित निगरानी और सैन्य अनुप्रयोगों में अग्रणी है। यूरोपीय संघ (EU) ने 'AI Act' के माध्यम से दुनिया का पहला व्यापक विनियामक ढांचा पेश कर 'मानव-केंद्रित AI' का मार्ग प्रशस्त किया है।

चर्चा में क्यों है?

  • सख्त विनियामक बदलाव: भारत सरकार द्वारा आईटी नियम 2026 का लागू होना, जिसमें एआई कंटेंट की 'अनिवार्य लेबलिंग' और कंटेंट हटाने की समय-सीमा 3 घंटे तय की गई है।
  • लोकतांत्रिक जोखिम: चुनावों में डीपफेक और 'सूचना के हेरफेर' द्वारा मतदाताओं को भ्रमित करने की बढ़ती घटनाएं।
  • युद्ध का नया स्वरूप: युद्ध के मैदान में स्वायत्त ड्रोन का प्रयोग, जो मानवीय नियंत्रण के बिना निर्णय लेने में सक्षम हैं।
  • तकनीकी संप्रभुता: अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती एआई-प्रतिस्पर्धा, जहाँ एआई अब केवल तकनीक नहीं, बल्कि कूटनीतिक शक्ति का हथियार बन गया है।
  • नैतिक एवं अस्तित्वगत चिंताएँ: एआई 'हैलुसिनेशन' (गलत तथ्य) और भविष्य में 'सुपरइंटेलिजेंस' द्वारा मानव नियंत्रण से बाहर होने का डर।

सकारात्मक प्रभाव

  • आर्थिक विकास: PWC की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2030 तक AI वैश्विक अर्थव्यवस्था में 15.7 ट्रिलियन डॉलर का योगदान दे सकता है।
  • प्रशासन और सेवा: भारत में 'भाषिणी' जैसे पोर्टल भाषाई बाधाओं को दूर कर रहे हैं।
  • स्वास्थ्य एवं कृषि: AI कैंसर के शुरुआती निदान और 'प्रिसिजन फार्मिंग' (सटीक कृषि) में मृदा स्वास्थ्य विश्लेषण के माध्यम से उत्पादकता बढ़ा रहा है।
  • SDG लक्ष्य: गरीबी उन्मूलन (SDG 1) और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा (SDG 4) के लक्ष्यों को प्राप्त करने में AI डेटा-संचालित समाधान प्रदान करता है।

नकारात्मक प्रभाव और जोखिम

  • बेरोजगारी: दोहराव वाले कार्यों के स्वचालन से विस्थापन का खतरा है। विश्व आर्थिक मंच (WEF) के अनुसार, मध्यम-कौशल वाली नौकरियां सबसे अधिक प्रभावित होंगी।
  • निजता और पूर्वाग्रह: एल्गोरिदम अक्सर उस डेटा से 'पूर्वाग्रह' सीख लेते हैं जिस पर उन्हें प्रशिक्षित किया जाता है, जिससे सामाजिक भेदभाव बढ़ सकता है।
  • सुरक्षा और युद्ध: 'स्वायत्त हथियार प्रणालियां' युद्ध के स्वरूप को बदल रही हैं। यूक्रेन संघर्ष ने दिखाया है कि AI-ड्रोन कैसे पारंपरिक सेनाओं को चुनौती दे सकते हैं।
  • अस्तित्वगत जोखिम: 'सुपरइंटेलिजेंस' का विचार, जहां मशीनें मानव नियंत्रण से बाहर हो जाती हैं, एक दीर्घकालिक चिंता है।

वैश्विक शासन और नीति

इंटरनेट की कोई सीमा नहीं होती, इसलिए AI के लिए 'ग्लोबल एआई गवर्नेंस' अनिवार्य है।

  • अंतरराष्ट्रीय प्रयास: ब्लेचले घोषणा और हालिया 'पेरिस AI एक्शन समिट ' में AI सुरक्षा पर वैश्विक सहमति बनाने की कोशिश की गई है।
  • UN की भूमिका: संयुक्त राष्ट्र ने AI पर एक उच्च-स्तरीय सलाहकार संस्था का गठन किया है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि तकनीक का लाभ सभी देशों को मिले।

भारत के संदर्भ में

  • नीतिगत ढांचा: नीति आयोग की रणनीति 'AI फॉर आल ' समावेशी विकास पर केंद्रित है।
  • नियमन: भारत ने आईटी नियम 2021 में संशोधन कर (20 फरवरी 2026 से प्रभावी) फोटोयथार्थवादी AI सामग्री के लिए लेबलिंग अनिवार्य कर दी है। डीपफेक हटाने की समय सीमा घटाकर 2-3 घंटे करना भारत की डिजिटल संप्रभुता के प्रति गंभीरता दर्शाता है।
  • इंडियाAI मिशन: सरकार ने कंप्यूटर संसाधन और स्टार्टअप्स को बढ़ावा देने के लिए ₹10,000 करोड़ से अधिक का आवंटन किया है।

चुनौतियाँ और समाधान

  • नैतिक संकट: 'हैलुसिनेशन' (AI द्वारा गलत जानकारी देना) न्यायिक और चिकित्सा निर्णयों में घातक हो सकता है।
  • समाधान (ह्यूमन-इन--लूप): अंतिम निर्णय हमेशा मानव द्वारा लिया जाना चाहिए, विशेषकर युद्ध और न्याय के क्षेत्रों में।
  • वाटरमार्किंग: AI-जनित सामग्री के मेटाडाटा में स्थायी टैग लगाना अनिवार्य होना चाहिए ताकि स्रोत की पहचान हो सके।

नीतिगत सुझाव:

अंतरराष्ट्रीय सहयोग, डेटा संरक्षण कानूनों का सख्त कार्यान्वयन और नागरिकों में 'डिजिटल साक्षरता' का प्रसार ही इस 'डिजिटल विच्छेद' को सुरक्षित भविष्य में बदल सकता है।

निष्कर्ष

AI एक 'दोधारी तलवार' है। यह मानवता को विकास के नए शिखर पर ले जा सकता है या 'सत्य के अंत') का कारण बन सकता है। भविष्य की सुरक्षाजिम्मेदार एआईमें निहित है। भारत को अपनी तकनीकी शक्ति और सख्त नियामक ढांचे के बीच संतुलन बनाकर एक 'ग्लोबल एआई रेगुलेटर' की भूमिका निभानी होगी।

सामान्य अध्ययन पेपर  – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध

संदर्भ

भारतीय संसदीय लोकतंत्र में लोकसभा अध्यक्ष का पद निष्पक्षता और संवैधानिक गरिमा का सर्वोच्च प्रतीक रहा है, जिसकी जड़ें औपनिवेशिक काल के 'स्पीकर' पद से लेकर स्वतंत्र भारत के विट्ठलभाई पटेल जैसे दिग्गजों के आदर्शों तक फैली हैं। वर्तमान में सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच बढ़ता वैचारिक ध्रुवीकरण इस गौरवशाली पद की तटस्थता को चुनौती दे रहा है, जिससे संसदीय मर्यादा और जवाबदेही के बीच एक नया संघर्ष उत्पन्न हो गया है।

लोकसभा अध्यक्ष: संवैधानिक स्थिति एवं भूमिका

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 93 के तहत स्थापित लोकसभा अध्यक्ष का पद सदन की गरिमा, शक्तियों और विशेषाधिकारों के संरक्षक का प्रतीक है। इनकी भूमिका को निम्नलिखित बिंदुओं में समझा जा सकता है:

  • संवैधानिक व्याख्याकार: अध्यक्ष सदन के भीतर भारत के संविधान, 'लोकसभा की प्रक्रिया एवं कार्य संचालन नियमावली' और विधायी मिसालों के अंतिम व्याख्याकार होते हैं।
  • संसदीय निष्पक्षता: यद्यपि अध्यक्ष का चुनाव एक राजनीतिक दल के सदस्य के रूप में होता है, किंतु पद ग्रहण के पश्चात उनसे अनुच्छेद 96 की भावना के अनुरूप दलगत राजनीति से ऊपर उठकर पूर्णतः तटस्थ रहने की अपेक्षा की जाती है।
  • प्रशासनिक एवं विधायी प्रमुख: वे सदन के प्रतिनिधि और प्रवक्ता होते हैं। सदन की व्यवस्था बनाए रखना, अनुच्छेद 110 के तहत 'धन विधेयक' को प्रमाणित करना और अनुच्छेद 100 के अंतर्गत निर्णायक मत का प्रयोग करना इनकी प्रमुख संवैधानिक शक्तियां हैं।
  • दशवीं अनुसूची: दल-बदल विरोधी कानून के तहत सदस्यों की अयोग्यता पर निर्णय लेना।

चर्चा में क्यों?

विपक्षी गठबंधन (INDIA) ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के विरुद्ध 'हटाने का प्रस्ताव' पेश करने के लिए महासचिव को नोटिस दिया है, जिसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:

  • पक्षपात का आरोप: विपक्ष का दावा है कि अध्यक्ष "पूर्णतः पक्षपातपूर्ण" तरीके से सदन चला रहे हैं।
  • विपक्ष के नेता को रोकना: नोटिस में आरोप लगाया गया है कि विपक्ष के नेता राहुल गांधी को राष्ट्रपति के धन्यवाद प्रस्ताव पर अपना भाषण पूरा करने नहीं दिया गया।
  • सांसदों का निलंबन: बजट सत्र के दौरान विपक्षी सांसदों के "मनमाने निलंबन" को लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन बताया गया है।
  • मिथ्या आरोप: अध्यक्ष द्वारा कांग्रेस महिला सांसदों पर प्रधानमंत्री की सीट की ओर बढ़ने के "झूठे आरोप" लगाने को पद का दुरुपयोग कहा गया है।

नोटिस का प्रभाव

  • कार्यवाही से दूरी: नैतिक आधार पर, जब तक नोटिस का निपटारा नहीं हो जाता, अध्यक्ष सदन की अध्यक्षता नहीं करेंगे।
  • संसदीय गतिरोध: सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच तनाव चरम पर पहुंचने से विधायी कार्यों की गति प्रभावित हो सकती है।
  • प्रतिष्ठा पर प्रश्नचिह्न: इस तरह का नोटिस संसदीय लोकतंत्र की स्वस्थ परंपराओं के लिए एक गंभीर चुनौती पेश करता है।

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

भारत के संसदीय इतिहास में पहले भी ऐसे अवसर आए हैं, हालांकि किसी भी अध्यक्ष को कभी हटाया नहीं जा सका:

  • जी.वी. मावलंकर (1954): स्वतंत्र भारत के पहले अध्यक्ष के विरुद्ध भी हटाने का प्रस्ताव लाया गया था, जो चर्चा के बाद विफल रहा।
  • सरदार हुकम सिंह (1966) और बलराम जाखड़ (1987): इनके विरुद्ध भी प्रस्ताव लाए गए, लेकिन वे बहुमत के अभाव में गिर गए।
  • परिणाम: इतिहास बताता है कि ये प्रस्ताव आमतौर पर विपक्ष द्वारा अपनी आवाज दबाए जाने के विरोध में एक प्रतीकात्मक उपकरण के रूप में उपयोग किए जाते रहे हैं।

हटाने के संवैधानिक प्रावधान

संविधान के अनुच्छेद 94 और 96 में अध्यक्ष को हटाने की प्रक्रिया दी गई है:

  • अनुच्छेद 94(C): अध्यक्ष को लोकसभा के तत्कालीन समस्त सदस्यों के 'बहुमत' से पारित प्रस्ताव द्वारा हटाया जा सकता है।
  • 14 दिन का नोटिस: प्रस्ताव पेश करने से कम से कम 14 दिन पहले इसकी सूचना देना अनिवार्य है।
  • अनुच्छेद 96: जब हटाने का प्रस्ताव विचाराधीन हो, तो अध्यक्ष सदन में उपस्थित रह सकते हैं और बोल सकते हैं, लेकिन उन्हें वोट देने का अधिकार केवल पहली बार में होगा (बराबर मत की स्थिति में निर्णायक वोट नहीं)

विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण

लोकसभा अध्यक्ष के विरुद्ध हटाने का नोटिस भारतीय संसदीय प्रणाली में एक संरचनात्मक संकट का संकेत है, जिसका विश्लेषण निम्न बिंदुओं पर आधारित है:

  • लोकतांत्रिक संतुलन: लोकतंत्र केवल बहुमत का शासन नहीं, बल्कि असहमति का सम्मान है। वर्तमान गतिरोध सत्ता के संख्याबल और विपक्ष के आलोचनात्मक अधिकार के बीच 'संवैधानिक संतुलन' के बिगड़ने और 'बहुसंख्यकवाद' के उदय के जोखिम को दर्शाता है।
  • संस्थागत साख: अध्यक्ष का पद 'वेस्टमिंस्टर मॉडल' की निष्पक्षता पर आधारित है। पक्षपात के आरोप संसदीय पवित्रता को दूषित करते हैं, जिससे सदन 'स्वस्थ के स्थान पर 'टकराव की राजनीति' का केंद्र बन जाता है।
  • सामाजिक प्रभाव: संसद जन-आकांक्षाओं का दर्पण है। जब सदन नीतिगत चर्चा के बजाय 'निलंबन और विवाद' का अखाड़ा बनता है, तो नागरिकों का लोकतांत्रिक संस्थाओं से विश्वास कम होता है और 'संसदीय उत्पादकता' गिरती है।
  • संवैधानिक नैतिकता: डॉ. अंबेडकर के अनुसार, संविधान की सफलता केवल नियमों में नहीं, बल्कि उन परंपराओं में निहित है जो सदन में विश्वास पैदा करती हैं। यह विवाद नियमों से परे नैतिक और व्यवहारिक शून्यता को दर्शाता है।

आगे की राह

  • संवाद: सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच विश्वास की बहाली के लिए सदन के भीतर संवाद के द्वार खुलने चाहिए।
  • निष्पक्षता: अध्यक्ष को अपनी छवि 'निष्पक्ष रेफरी' के रूप में पुनः स्थापित करनी होगी।
  • नियमावली का सम्मान: प्रक्रिया के नियमों का पालन केवल अक्षरशः नहीं, बल्कि उसकी भावना के अनुरूप होना चाहिए।

निष्कर्ष

लोकसभा अध्यक्ष के विरुद्ध यह नोटिस संसदीय लोकतंत्र की एक असहज स्थिति को दर्शाता है। जहाँ विपक्ष का विरोध उनके लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा की मांग है, वहीं अध्यक्ष की गरिमा की रक्षा सदन की स्थिरता के लिए अनिवार्य है। अंततः, संसद की सार्थकता इस बात में है कि वह दलगत हितों से ऊपर उठकर राष्ट्रीय हितों और संवैधानिक मर्यादाओं का पोषण करे।

सामान्य अध्ययन पेपर  – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध

संदर्भ

परमाणु हथियारों की होड़ को नियंत्रित करने वाली अंतिम प्रमुख कड़ी, 'न्यू START' संधि का अंत वैश्विक शांति के लिए एक गंभीर चेतावनी और नए शक्ति संतुलन की आवश्यकता का संकेत है। यह घटनाक्रम दुनिया को असीमित परमाणु प्रतिस्पर्धा के उस दौर में वापस धकेल सकता है जिसे शीत युद्ध के बाद पीछे छोड़ दिया गया था।

स्टार्ट “START” क्या है?

'स्ट्रैटेजिक आर्म्स रिडक्शन ट्रीटी' (START) अमेरिका और रूस (तत्कालीन सोवियत संघ) के बीच सामरिक परमाणु हथियारों की संख्या को कम करने के लिए किया गया एक ऐतिहासिक समझौता था।

  • इसका उद्देश्य परमाणु वारहेड्स और उन्हें ले जाने वाली मिसाइलों/बमवर्षकों की संख्या को एक निश्चित सीमा (1,550 तैनात वारहेड) तक सीमित करना था।
  • यह केवल हथियारों को 'फ्रीज' करने के बजाय उन्हें 'नष्ट' करने और कम करने पर केंद्रित पहली प्रभावी संधि थी।

चर्चा का कारण

  • संधि की समाप्ति: 'न्यू START' संधि 5 फरवरी, 2026 को अपनी 15 साल की अवधि पूरी कर समाप्त हो गई है।
  • चीन का कारक: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का रुख है कि भविष्य की किसी भी संधि में चीन को शामिल करना अनिवार्य है, क्योंकि चीन तेजी से अपना परमाणु भंडार बढ़ा रहा है।
  • वैश्विक बिखराव: रूस-यूक्रेन युद्ध और बदलती भू-राजनीति के कारण महाशक्तियों के बीच आपसी विश्वास की कमी ने इस संधि के नवीनीकरण को रोक दिया है।

प्रभाव

  • हथियारों की नई दौड़: संधि के अभाव में अमेरिका और रूस अब असीमित संख्या में परमाणु हथियार तैनात करने के लिए स्वतंत्र होंगे।
  • निगरानी का अंत: संधि के तहत होने वाले आपसी 'ऑन-साइट' निरीक्षण बंद हो जाएंगे, जिससे पारदर्शिता खत्म होगी और गलतफहमी का जोखिम बढ़ेगा।
  • NPT और CTBT पर खतरा: इस संधि के टूटने का सीधा असर 'परमाणु अप्रसार संधि' (NPT) जैसी अन्य वैश्विक व्यवस्थाओं पर पड़ेगा, जिससे परमाणु प्रसार को रोकना कठिन होगा।
  • असुरक्षा का माहौल: चीन, उत्तर कोरिया और अन्य देशों द्वारा अपने शस्त्रागार बढ़ाने की होड़ और तेज हो सकती है।

निष्कर्ष

न्यू START का अंत केवल एक संधि का समाप्त होना नहीं, बल्कि समान और निष्पक्ष शर्तों पर परमाणु निशस्त्रीकरण की चर्चा को फिर से शुरू करने का एक अवसर है। भविष्य की सुरक्षा के लिए यह आवश्यक है कि ऐसी नई संधियां की जाएं जो केवल अमेरिका और रूस, बल्कि चीन जैसी उभरती परमाणु शक्तियों को भी जवाबदेह बनाएं, ताकि मानवीय अस्तित्व पर मंडराते इस खतरे को टाला जा सके।