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न्यूज़
- आर्टेमिस II (Artemis II) नासा (NASA) का एक ऐतिहा सिक अंतरिक्ष मिशन है, जो 50 से अधिक वर्षों के बाद इंसानों को चंद्रमा के करीब ले जाएगा। यह नासा के 'आर्टेमिस प्रोग्राम' का दूसरा चरण है।
मिशन का मुख्य उद्देश्य क्या है?
- आर्टेमिस II मिशन का लक्ष्य 4 अंतरिक्ष यात्रियों को चंद्रमा के चारों ओर ले जाना और उन्हें सुरक्षित वापस धरती पर लाना है।
- नोट: यह मिशन चंद्रमा की सतह पर लैंड नहीं करेगा। यह केवल चंद्रमा का चक्कर लगाकर वापस आएगा।
- इसका उद्देश्य 'ओरियन' अंतरिक्ष यान और 'स्पेस लॉन्च सिस्टम' (SLS) रॉकेट की क्षमता की जांच करना है ताकि अगले मिशन “आर्टेमिस -III” में इंसानों को चांद पर उतारा जा सके।
अंतरिक्ष यात्री कौन हैं?
इस मिशन के लिए 4 अंतरिक्ष यात्रियों को चुना गया है, जो विविधता का प्रतीक हैं:
- रीड वाइसमैन : कमांडर (NASA)
- विक्टर ग्लोवर: पायलट (NASA) - चंद्रमा मिशन पर जाने वाले पहले अश्वेत व्यक्ति।
- क्रिस्टीना कोच : मिशन स्पेशलिस्ट (NASA) - चंद्रमा मिशन पर जाने वाली पहली महिला।
- जेरेमी हैनसन: मिशन स्पेशलिस्ट (CSA - कनाडा) - चंद्रमा पर जाने वाले पहले गैर-अमेरिकी।
रॉकेट और यान
- रॉकेट: यह दुनिया के सबसे शक्तिशाली रॉकेट SLS (Space Launch System) द्वारा लॉन्च किया जाएगा।
- अंतरिक्ष यान: यात्री ओरियन कैप्सूल के अंदर रहेंगे।
मिशन कैसे काम करेगा?
- लॉन्च: रॉकेट फ्लोरिडा के केनेडी स्पेस सेंटर से उड़ान भरेगा।
- यात्रा: यान चंद्रमा की ओर बढ़ेगा और उसके चारों ओर एक 'फ्री-रिटर्न प्रक्षेपवक्र' बनाएगा। यानी चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण यान को घुमाकर वापस धरती की ओर धकेल देगा।
- समय: यह पूरा मिशन लगभग 10 दिन का होगा।
- वापसी: यान प्रशांत महासागर में 'स्प्लैशडाउन' (समुद्र में गिरना) करेगा।
यह महत्वपूर्ण क्यों है?
- अपोलो के बाद पहली बार: 1972 के 'अपोलो 17' मिशन के बाद पहली बार इंसान चंद्रमा के इतने करीब जाएंगे।
- मंगल ग्रह की तैयारी: यह मिशन भविष्य में मंगल ग्रह (Mars) पर इंसानों को भेजने के लिए एक 'टेस्ट बेड' की तरह है।
अगला कदम: अगर आर्टेमिस II सफल होता है, तो आर्टेमिस III मिशन में पहली बार एक महिला और एक अश्वेत व्यक्ति चंद्रमा की सतह पर कदम रखेंगे।
न्यूज़
- मोज़ाम्बिक की मानवाधिकार कार्यकर्ता और मानवतावादी ग्रासा माशेल (Graca Machel) को वर्ष 2025 के लिए 'इंदिरा गांधी शांति, निरस्त्रीकरण और विकास पुरस्कार' के लिए चुना गया है।
- इंदिरा गांधी मेमोरियल ट्रस्ट ने बुधवार (21 जनवरी, 2026) को इसकी आधिकारिक घोषणा की।
- पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन की अध्यक्षता वाली एक अंतरराष्ट्रीय जूरी ने शिक्षा, स्वास्थ्य और मानवीय कार्यों (विशेष रूप से संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में) में उनके परिवर्तनकारी योगदान के लिए उन्हें इस सम्मान के लिए चुना है।
इस पुरस्कार की मुख्य बातें
- पुरस्कार राशि: इसके तहत ₹1 करोड़ नकद, एक ट्रॉफी और प्रशस्ति पत्र प्रदान किया जाता है।
- ट्रॉफी की विशेषता: यह ट्रॉफी 'बैंडेड हेमेटाइट जैस्पर' पत्थर से बनी है, जो लगभग 2,000 मिलियन वर्ष पुराना माना जाता है।
- इतिहास: इस पुरस्कार की स्थापना 1986 में इंदिरा गांधी की स्मृति में की गई थी।
ग्रासा माशेल को क्यों चुना गया?
ग्रासा माशेल एक वैश्विक स्तर की राजनेता और कार्यकर्ता हैं, जिन्होंने अपना जीवन वंचितों की आवाज उठाने में समर्पित कर दिया है:
- शिक्षा में सुधार: मोज़ाम्बिक की पहली शिक्षा मंत्री (1975-1989) के रूप में उन्होंने स्कूल नामांकन दर को 40% से बढ़ाकर लड़कों के लिए 90% और लड़कियों के लिए 75% से अधिक किया।
- बाल संरक्षण: 1990 के दशक में उन्होंने 'सशस्त्र संघर्ष का बच्चों पर प्रभाव' विषय पर संयुक्त राष्ट्र (UN) के एक महत्वपूर्ण अध्ययन का नेतृत्व किया, जिसने युद्ध प्रभावित बच्चों के संरक्षण के वैश्विक नियमों को बदल दिया।
- वैश्विक नेतृत्व: वह 'द एल्डर्स' की संस्थापक सदस्य हैं और 'ग्रासा माशेल ट्रस्ट' के माध्यम से महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण के लिए काम करती हैं।
ऐतिहासिक गौरव
ग्रासा माशेल के नाम एक अद्वितीय रिकॉर्ड है—वह दुनिया की एकमात्र महिला हैं जो दो अलग-अलग देशों की 'प्रथम महिला' (First Lady) रही हैं:
- मोज़ाम्बिक: राष्ट्रपति समोरा माशेल की पत्नी के रूप में।
- दक्षिण अफ्रीका: राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला की पत्नी के रूप में।
यह पुरस्कार उनके आत्म-शासन, सामाजिक न्याय और एक न्यायपूर्ण दुनिया बनाने के उनके आजीवन संघर्ष का सम्मान है।
सामान्य अध्ययन पेपर – III प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन
संदर्भ:
भारत सरकार द्वारा जारी हालिया श्वेत पत्र, “AI बुनियादी ढांचे तक पहुंच का लोकतंत्रीकरण” , एक सरल लेकिन गहन सत्य को रेखांकित करता है: "AI तक पहुंच ही राष्ट्र की नियति है।" वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में, वे राष्ट्र जो AI इन्फ्रास्ट्रक्चर को नियंत्रित और सुलभ बनाएंगे, वही नवाचार की दिशा तय करेंगे। शेष राष्ट्र केवल 'प्रौद्योगिकी के उपभोक्ता' बनकर रह जाएंगे।
AI बुनियादी ढांचे के मुख्य स्तंभ
श्वेत पत्र के अनुसार, AI केवल जटिल एल्गोरिदम का खेल नहीं है, बल्कि यह तीन भौतिक संसाधनों पर टिका है:
- कंप्यूट पावर: उच्च प्रदर्शन वाले ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट (GPU) और सुपरकंप्यूटर, जो विशाल डेटा को प्रोसेस करते हैं।
- डेटासेट्स: AI को प्रशिक्षित करने के लिए उच्च गुणवत्ता वाला, विविध और स्थानीयकृत डेटा।
- मॉडल इकोसिस्टम: मूलभूत मॉडल्स तक पहुंच, जिन पर स्टार्टअप्स अपने विशिष्ट समाधान बना सकें।
'लोकतंत्रीकरण' की आवश्यकता:
वर्तमान में AI की शक्ति कुछ मुट्ठी भर वैश्विक तकनीकी दिग्गजों के हाथों में केंद्रित है।
- एकाधिकार की चुनौती: यदि कंप्यूट पावर और डेटा केवल बड़ी कंपनियों तक सीमित रहा, तो छोटे स्टार्टअप और शोधकर्ता प्रतिस्पर्धी नवाचार नहीं कर पाएंगे।
- पहुंच का लोकतंत्रीकरण: सरकार का लक्ष्य एक ऐसी प्रणाली बनाना है जहाँ एक ग्रामीण उद्यमी को भी वही कंप्यूट पावर मिले जो एक बहुराष्ट्रीय कंपनी के पास है। यह 'इंडिया एआई मिशन' के माध्यम से संभव होगा।
AI इन्फ्रास्ट्रक्चर:
श्वेत पत्र तर्क देता है कि कंप्यूट पावर को अब बिजली, पानी या सड़क की तरह एक 'सॉवरेन इकोनॉमिक एसेट' माना जाना चाहिए।
- नवाचार बनाम निर्भरता: अपना बुनियादी ढांचा होने से भारत 'एल्गोरिदम' की दुनिया में आत्मनिर्भर बनेगा। इसके बिना, हमें हर छोटे नवाचार के लिए विदेशी क्लाउड सर्वर (जैसे AWS या Google Cloud) पर निर्भर रहना होगा।
- डेटा संप्रभुता स्वदेशी इंफ्रास्ट्रक्चर यह सुनिश्चित करेगा कि भारतीयों का डेटा देश की सीमाओं के भीतर रहे और सुरक्षा संबंधी चिंताओं का समाधान हो।
चुनौतियाँ और बाधाएँ
भारत के सामने AI इन्फ्रास्ट्रक्चर निर्माण में तीन बड़ी चुनौतियां हैं:
- पूंजी की सघनता: जीपीयू क्लस्टर्स और डेटा सेंटर बनाना अत्यंत खर्चीला है।
- ऊर्जा की खपत: विशाल AI सर्वर के लिए निरंतर और स्वच्छ ऊर्जा की आवश्यकता।
- कौशल अंतराल: अत्याधुनिक हार्डवेयर और मॉडल्स को संचालित करने के लिए उच्च स्तरीय विशेषज्ञता की कमी।
भावी राह
सरकार के विजन को धरातल पर उतारने के लिए निम्नलिखित कदम अनिवार्य हैं:
- पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप: सरकार को निजी क्षेत्र के साथ मिलकर 'कंप्यूट क्लस्टर्स' स्थापित करने चाहिए।
- स्वदेशी चिप विकास: 'सेमीकॉन इंडिया' मिशन को AI विशिष्ट चिप्स के उत्पादन से जोड़ना।
- डेटा गवर्नेंस: एक ऐसा ढांचा तैयार करना जहाँ सार्वजनिक डेटा का उपयोग गोपनीयता से समझौता किए बिना AI प्रशिक्षण के लिए किया जा सके।
निष्कर्ष
भारत की AI बहस अक्सर केवल 'उपयोग' (चैटबॉट्स, ऑटोमेशन) तक सीमित रहती है, लेकिन वास्तविक शक्ति उस 'इंजन' (इन्फ्रास्ट्रक्चर) में है जो इन ऐप्स को चलाता है। श्वेत पत्र स्पष्ट करता है कि भविष्य के एल्गोरिदम नहीं, बल्कि उन तक पहुंच का अधिकार यह तय करेगा कि भारत 'प्रौद्योगिकी का स्वामी' बनेगा या केवल एक 'बाजार'।
"AI बुनियादी ढांचे में निवेश केवल तकनीक में निवेश नहीं है, बल्कि यह भारत की भावी आर्थिक स्वतंत्रता और संप्रभुता में निवेश है।"
सामान्य अध्ययन पेपर – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध
संदर्भ:
भारत में किशोर न्याय की अवधारणा इस दर्शन पर आधारित रही है कि "बच्चे सुधरने योग्य होते हैं और उन्हें वयस्कों के समान दंडित नहीं किया जाना चाहिए।"
- जेजे अधिनियम, 1986 एवं 2000: इन कानूनों में पुनर्वास पर जोर था। 2000 के अधिनियम ने किशोर की आयु स्पष्ट रूप से 18 वर्ष निर्धारित की।
- 2012 का मोड़: दिल्ली सामूहिक बलात्कार मामले (निर्भया कांड) के बाद जनता के आक्रोश ने कानून को सख्त बनाने की मांग की। इसके परिणामस्वरूप किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 अस्तित्व में आया।
'ट्रांसफर सिस्टम'
2015 के अधिनियम ने भारतीय कानून में पहली बार 'ट्रांसफर सिस्टम' पेश किया।
- प्रक्रिया: जब 16 से 18 वर्ष का कोई किशोर 'जघन्य अपराध' (जिसमें न्यूनतम 7 वर्ष की सजा हो) करता है, तो उसे सीधे जेल नहीं भेजा जाता।
- प्रारंभिक मूल्यांकन: किशोर न्याय बोर्ड (JJB) यह जांच करता है कि क्या किशोर के पास अपराध के परिणामों को समझने की मानसिक और शारीरिक क्षमता थी।
- चिल्ड्रन कोर्ट की भूमिका: यदि JJB उसे वयस्क की तरह मानने का सुझाव देता है, तो मामला 'चिल्ड्रन कोर्ट' को हस्तांतरित कर दिया जाता है। यहाँ न्यायालय यह तय करता है कि उस पर वयस्क के रूप में मुकदमा चलाया जाए या उसे बच्चा मानकर सुधार गृह भेजा जाए।
नया प्राइवेट मेंबर बिल
हाल ही में संसद में पेश किए गए प्राइवेट मेंबर बिल ने इस बहस को और तीव्र कर दिया है। इसके मुख्य बिंदु हैं:
- आयु सीमा में कटौती: जघन्य अपराधों के लिए 'ट्रांसफर सिस्टम' की पात्रता आयु 16 वर्ष से घटाकर 14 वर्ष करने का प्रस्ताव।
- कठोर दंड: 14-15 वर्ष के किशोरों को भी वयस्क जेलों और नियमित अदालती प्रक्रियाओं के दायरे में लाना।
NCRB एवं अन्य रिपोर्ट
- NCRB डेटा: रिपोर्टों के अनुसार, किशोरों द्वारा किए गए अपराध कुल अपराधों का एक छोटा हिस्सा (लगभग 1%) हैं। हालांकि, इनमें हत्या और बलात्कार जैसे जघन्य मामलों की संख्या में मामूली वृद्धि देखी गई है। किशोरों द्वारा किए गए अपराधों में 'जघन्य अपराधों' (हत्या, बलात्कार) की तुलना में 'संपत्ति के विरुद्ध अपराध' (चोरी, झपटमारी) अधिक हैं।
- 16 वर्ष से कम आयु के मामले: विशेषज्ञों का तर्क है कि 14-15 वर्ष की आयु में किए गए अपराध अक्सर खराब परवरिश, गरीबी और शिक्षा के अभाव का परिणाम होते हैं, न कि जन्मजात आपराधिक प्रवृत्ति का। इस आयु वर्ग के बच्चे अक्सर 'संगठित आपराधिक गिरोहों' के आसान शिकार बनते हैं। उन्हें कानून की नरमी का लालच देकर अपराध के लिए उकसाया जाता है।
नोट- यहाँ प्रश्न यह है कि सजा बच्चे को मिलनी चाहिए या उस 'मास्टरमाइंड' को जिसने उसे मोहरा बनाया? |
किशोरों में बढ़ते अपराध के कारण और समाधान
कारण:
- सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियाँ: झुग्गी-बस्तियों में रहने वाले बच्चों का असामाजिक तत्वों के संपर्क में आना।
- डिजिटल जोखिम: इंटरनेट पर हिंसक और अश्लील सामग्री तक आसान पहुंच।
- मनोवैज्ञानिक कारक: आवेग नियंत्रण की कमी और सहकर्मी दबाव।
समाधान:
- प्रारंभिक हस्तक्षेप: स्कूलों में परामर्श और नैतिक शिक्षा।
- सामुदायिक पुलिसिंग: किशोरों को अपराध की ओर मुड़ने से पहले ही रोकना।
- ट्रैक चाइल्ड पोर्टल और अर्ली वार्निंग सिस्टम: उन बच्चों की पहचान करना जो स्कूल छोड़ चुके हैं या अपराधी पृष्ठभूमि वाले परिवारों से हैं, ताकि उन्हें अपराध की ओर मुड़ने से पहले रोका जा सके।
संवैधानिक दृष्टिकोण और मानवाधिकार
- अनुच्छेद 15(3): बच्चों के हित में विशेष कानून बनाने का अधिकार।
- अनुच्छेद 39(f): बच्चों को शोषण से बचाने और उन्हें स्वतंत्रता एवं गरिमा के साथ विकास के अवसर देने का निर्देश।
- UNCRC: भारत ने 'बाल अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन' पर हस्ताक्षर किए हैं, जो किसी भी स्थिति में बच्चों के पुनर्वास को प्राथमिकता देने की वकालत करता है।
वैश्विक परिदृश्य:
विभिन्न देशों ने किशोर आयु को लेकर अलग-अलग दृष्टिकोण अपनाए हैं:
- संयुक्त राज्य अमेरिका (USA): कई राज्यों में 'ट्रांसफर कानून' हैं जहाँ 14 साल (या उससे कम) के बच्चों पर भी वयस्क अदालत में मुकदमा चल सकता है। परिणाम? वहां किशोरों में पुनरावृत्ति दर बहुत अधिक है।
- यूनाइटेड किंगडम (UK): यहाँ 'आपराधिक उत्तरदायित्व की आयु' मात्र 10 वर्ष है, जिसकी अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने कड़ी आलोचना की है।
- यूरोपीय देश (जैसे जर्मनी, नॉर्वे): यहाँ पुनर्वास पर इतना अधिक जोर है कि 18 वर्ष तक के बच्चों को शायद ही कभी जेल भेजा जाता है। यहाँ अपराध दर भारत और अमेरिका की तुलना में काफी कम है।
वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक आधार
न्यूरोसाइंस के अनुसार, मानव मस्तिष्क का 'प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स' (जो निर्णय लेने और आवेगों को नियंत्रित करने के लिए जिम्मेदार है) 25 वर्ष की आयु तक पूरी तरह विकसित नहीं होता।
- 14-15 वर्ष के किशोर जैविक रूप से 'जोखिम लेने' और 'सहकर्मी दबाव' के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं।
- कानून में उनकी उम्र घटाना उनके जैविक विकास की वास्तविकता को नजरअंदाज करना है।
क्या आयु घटाने से अपराध कम होगा?
अपराध विज्ञान का सिद्धांत कहता है कि अपराध केवल 'सजा के डर' से कम नहीं होता, बल्कि 'पकड़े जाने के डर' और 'सामाजिक सुरक्षा' से कम होता है।
जेल का प्रभाव:
14 साल के बच्चे को वयस्क जेलों या कठोर न्यायिक प्रक्रिया में डालने से उसके 'सुधरने' की संभावना शून्य हो जाती है। जेल अक्सर ऐसे बच्चों के लिए 'क्राइम यूनिवर्सिटी' बन जाती है जहाँ वे खूंखार अपराधियों के संपर्क में आकर अधिक खतरनाक बन जाते हैं
बहस के मुख्य बिंदु: पक्ष और विपक्ष
पक्ष (सख्त कानून की मांग) | विपक्ष (पुनर्वास का तर्क) |
अपराध की गंभीरता उम्र से अधिक महत्वपूर्ण है। | जेल बच्चों को 'अभ्यस्त अपराधी' बना देती है। |
अपराधियों में कानून का भय होना चाहिए। | विज्ञान कहता है कि 14 साल के बच्चे का 'प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स' अविकसित होता है। |
समाज की सुरक्षा और प्रतिशोध आवश्यक है। | यह अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संधियों का उल्लंघन है। |
विश्लेषण एवं भावी राह
आयु सीमा घटाना एक "पीछे हटने वाला कदम" साबित हो सकता है।
- व्यवस्था में सुधार: आवश्यकता आयु घटाने की नहीं, बल्कि 'सुधार गृहों' की स्थिति सुधारने की है।
- न्यायिक बारीकी: सर्वोच्च न्यायालय ने बड़िन्दर सिंह मामले में भी कहा है कि 'प्रारंभिक मूल्यांकन' को यांत्रिक नहीं होना चाहिए।
- सुझाव: सरकार को दंडात्मक कानूनों के बजाय 'निवारक' उपायों पर निवेश करना चाहिए।
- JJB की मजबूती: आयु घटाने के बजाय, वर्तमान 'प्रारंभिक मूल्यांकन' प्रक्रिया को अधिक वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक-आधारित बनाने की आवश्यकता है।
- वयस्क अपराधियों को कड़ी सजा: जो लोग बच्चों का उपयोग अपराध के लिए करते हैं (अनुच्छेद 39e का उल्लंघन), उनके लिए 'मृत्युदंड' या 'आजीवन कारावास' जैसे कठोर प्रावधान होने चाहिए।
निष्कर्ष
किसी समाज की सभ्यता इस बात से मापी जाती है कि वह अपने बच्चों के साथ कैसा व्यवहार करता है। आयु सीमा 16 से 14 वर्ष करना प्रतिशोध की भावना को तो संतुष्ट कर सकता है, लेकिन यह अपराध की जड़ों को खत्म नहीं करेगा। न्याय प्रणाली का अंतिम उद्देश्य 'सामाजिक एकीकरण' होना चाहिए, न कि स्थायी बहिष्कार। भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में, जहाँ गरीबी और शिक्षा का अभाव किशोर अपराध के प्राथमिक कारण हैं, वहाँ केवल आयु घटाना एक 'लोकप्रिय' समाधान तो हो सकता है, लेकिन 'प्रभावी' नहीं।
"न्याय का उद्देश्य केवल अपराधी को दंड देना नहीं, बल्कि समाज से अपराध को कम करना है। बच्चों को जेल भेजना भविष्य के अपराधियों की पौध तैयार करना है”
सामान्य अध्ययन पेपर – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध
प्रस्तावना:
भारतीय संसदीय लोकतंत्र में राष्ट्रपति और राज्यपाल के 'विशेष अभिभाषण' (अनुच्छेद 87 और 176) को लेकर एक बुनियादी प्रश्न खड़ा होता है: "यदि संवैधानिक प्रमुख केवल निर्वाचित सरकार का 'मुखपत्र' है और वह कैबिनेट द्वारा तैयार आलेख में एक शब्द भी नहीं बदल सकता, तो इस प्रतीकात्मक औपचारिकता की आवश्यकता क्या है?" वर्तमान में तमिलनाडु के राज्यपाल आर.एन. रवि और केरल के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर द्वारा अभिभाषण के अंशों को छोड़ने या उनमें बदलाव करने की घटनाओं ने इस संवैधानिक प्रश्न को एक राष्ट्रीय विमर्श में बदल दिया है।
वर्तमान घटनाक्रम: विवाद के केंद्र में 'अभिभाषण'
जनवरी 2026 में तमिलनाडु और केरल की विधानसभाओं में जो घटित हुआ, वह केंद्र-राज्य संबंधों की कड़वाहट का चरम है:
- तमिलनाडु: राज्यपाल आर.एन. रवि ने यह कहते हुए भाषण पढ़ने से मना कर दिया कि इसमें "भ्रामक तथ्य" हैं। उन्होंने सदन से वॉक-आउट कर संवैधानिक परंपरा को चुनौती दी।
- केरल: मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने सार्वजनिक रूप से राज्यपाल के भाषण को "सुधारा", क्योंकि राज्यपाल ने कैबिनेट द्वारा स्वीकृत कुछ महत्वपूर्ण नीतिगत अंशों को छोड़ दिया था।
ऐतिहासिक संदर्भ:
यह विवाद नया नहीं है। 1967 के विधानसभा चुनावों के बाद जब कई राज्यों में गैर-कांग्रेसी सरकारें (संविद सरकारें) बनीं, तब राज्यपाल और राज्य सरकारों के बीच टकराव की शुरुआत हुई।
- प्रथम टकराव: 1967 में पश्चिम बंगाल के राज्यपाल धर्मवीर ने सरकार द्वारा तैयार भाषण के उन हिस्सों को पढ़ने से मना कर दिया था, जिनमें केंद्र सरकार की आलोचना की गई थी।
- संवैधानिक परंपरा: भारत ने ब्रिटेन के वेस्टमिंस्टर मॉडल को अपनाया है, जहाँ 'क्राउन' (राजा/रानी) सरकार के भाषण को बिना किसी बदलाव के पढ़ता है। भारत में भी यही परंपरा रही है कि राज्यपाल अपनी 'मन की बात' भाषण में शामिल नहीं कर सकता।
राज्यपाल: केंद्र का एजेंट या संवैधानिक सेतु?
राज्यपाल के पद का सबसे विवादास्पद आयाम उनका केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त होना है।
- पूर्वाग्रह का संकट: यदि राज्यपाल अपनी व्यक्तिगत विचारधारा या केंद्र के निर्देशों को राज्य सरकार की नीतियों पर थोपने की कोशिश करता है, तो यह 'सहकारी संघवाद' की भावना को आहत करता है।
- संवैधानिक भूमिका: राज्यपाल का कार्य सरकार के कामकाज की निगरानी करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि सरकार संविधान के अनुरूप चले। अभिभाषण में अपनी ओर से कुछ जोड़ना या छोड़ना 'निर्वाचित जनादेश' का अपमान माना जाता है।
समीक्षा: क्या यह प्रथा अब अप्रासंगिक है?
पूर्व राष्ट्रपति आर. वेंकटरमन ने इसे "ब्रिटिश काल का अवशेष" और "अर्थहीन औपचारिकता" कहा था। इसके पीछे कई तर्क हैं:
- प्रतीकात्मकता बनाम स्वायत्तता: यदि राज्यपाल केवल रबर स्टैम्प है, तो समय और संसाधनों का यह व्यय तर्कहीन प्रतीत होता है।
- टकराव का मंच: वर्तमान में यह प्रथा स्वस्थ चर्चा के बजाय राजनीतिक दंगल का मंच बन गई है।
- विकल्प: राष्ट्रपति और राज्यपाल के पास पहले से ही अनुच्छेद 86 और 175 के तहत सदन को संदेश भेजने या संबोधित करने का अधिकार है। अनिवार्य अभिभाषण (अनुच्छेद 87/176) को हटाने से संवैधानिक संकट कम हो सकता है।
विधिक विश्लेषण:
सुप्रीम कोर्ट ने शमशेर सिंह बनाम पंजाब राज्य (1974) मामले में स्पष्ट किया था कि राष्ट्रपति और राज्यपाल अपनी शक्तियों का प्रयोग मंत्रिपरिषद की सलाह पर ही करेंगे। अभिभाषण सरकार की 'नीति' होती है, राज्यपाल की 'राय' नहीं।
आगे की राह
राज्यपाल और राज्य सरकारों के बीच बढ़ती खाई को पाटने के लिए निम्नलिखित कदम अनिवार्य हैं:
- सरकारी आयोग और पुंछी आयोग की सिफारिशें: राज्यपाल की नियुक्ति में मुख्यमंत्री की सलाह और निष्पक्ष व्यक्तियों का चयन अनिवार्य होना चाहिए।
- संवैधानिक संशोधन: क्या अब समय आ गया है कि अनुच्छेद 176 की अनिवार्यता पर पुनर्विचार किया जाए? जैसा कि मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने सुझाव दिया है, इस औपचारिकता को समाप्त करने से विवाद के एक बड़े कारण को खत्म किया जा सकता है।
निष्कर्ष:
न्यायपालिका और विधायिका को यह समझना होगा कि राज्यपाल का पद संविधान की रक्षा के लिए है, न कि चुनी हुई सरकार के समानांतर सत्ता केंद्र बनने के लिए। संवैधानिक संतुलन तभी बना रहेगा जब 'मर्यादा' और 'परंपरा' का पालन अक्षरों के साथ-साथ उसकी भावना में भी किया जाए।
सामान्य अध्ययन पेपर – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध
संदर्भ
भारतीय न्यायपालिका और विधयिका के मध्य एक नया विमर्श तब उत्पन्न हुआ जब लोकसभा के 107 सांसदों (INDIA गठबंधन) ने मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन को पद से हटाने का नोटिस लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को सौंपा।
आरोप: नोटिस में न्यायाधीश पर 13 गंभीर आरोप लगाए गए हैं, जिनमें मुख्य रूप से:
- धर्मनिरपेक्ष संवैधानिक सिद्धांतों के विरुद्ध कार्य करना।
- एक विशिष्ट समुदाय के अधिवक्ताओं का पक्ष लेना।
- न्यायिक आचरण संहिता का उल्लंघन।
संवैधानिक शब्दावली: 'महाभियोग' बनाम 'निष्कासन'
अक्सर सामान्य चर्चाओं में जजों को हटाने के लिए 'महाभियोग' शब्द का प्रयोग किया जाता है, किंतु तकनीकी रूप से संविधान में स्थिति भिन्न है:
- महाभियोग: भारतीय संविधान में इस शब्द का प्रयोग केवल अनुच्छेद 61 के तहत राष्ट्रपति को हटाने की प्रक्रिया के लिए किया गया है।
- निष्कासन/हटाना: न्यायाधीशों के लिए संविधान 'निष्कासन' शब्द का प्रयोग करता है।
- अनुच्छेद: सुप्रीम कोर्ट के जजों के लिए अनुच्छेद 124(4) और हाईकोर्ट के जजों के लिए अनुच्छेद 217(1)(b) के तहत निष्कासन की प्रक्रिया दी गई है। उल्लेखनीय है कि अनुच्छेद 218 के अनुसार, हाईकोर्ट के जज को हटाने की प्रक्रिया वही होगी जो सुप्रीम कोर्ट के जज के लिए है।
न्यायाधीश निष्कासन की चरणबद्ध प्रक्रिया (न्यायाधीश जांच अधिनियम, 1968)
जजों को हटाना भारत में सबसे कठिन कानूनी प्रक्रियाओं में से एक है, जिसे न्यायपालिका की स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए जटिल बनाया गया है:
- नोटिस: लोकसभा के कम से कम 100 या राज्यसभा के 50 सदस्यों के हस्ताक्षर वाला प्रस्ताव अध्यक्ष/सभापति को सौंपा जाता है।
- अध्यक्ष का विवेक: अध्यक्ष प्रस्ताव को स्वीकार या अस्वीकार कर सकता है (यहाँ से प्रक्रिया विफल होने का पहला 'लूपहोल' शुरू होता है)।
- जांच समिति: स्वीकार होने पर, 3 सदस्यीय समिति (SC जज, HC के मुख्य न्यायाधीश और एक प्रतिष्ठित न्यायविद) आरोपों की जांच करती है।
- संसदीय मतदान: यदि समिति दोषी पाती है, तो संसद के दोनों सदनों में 'विशेष बहुमत' (सदन की कुल सदस्यता का बहुमत और उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों का 2/3 बहुमत) से प्रस्ताव पारित होना अनिवार्य है।
- राष्ट्रपति का आदेश: अंत में राष्ट्रपति निष्कासन का आदेश जारी करते हैं।
विधिक विश्लेषण:
प्रावधान गंभीर होने के बावजूद प्रक्रिया में कई बाधाएं हैं:
- राजनीतिक इच्छाशक्ति: विशेष बहुमत जुटाना अत्यंत कठिन है, विशेषकर गठबंधन सरकारों के दौर में।
- समय की कमी: संसद के पास अक्सर ऐसे प्रस्तावों पर विस्तृत चर्चा के लिए समय का अभाव होता है, जिससे प्रक्रिया बीच में ही लटक सकती है।
- न्यायिक जवाबदेही बनाम स्वतंत्रता: प्रक्रिया इतनी कठिन है कि अब तक भारत के इतिहास में किसी भी न्यायाधीश को इस प्रक्रिया के माध्यम से पद से नहीं हटाया जा सका है (वी. रामास्वामी और सौमित्र सेन के मामले उदाहरण हैं जहाँ प्रक्रिया पूर्ण नहीं हो सकी)।
गरिमापूर्ण जीवन और न्यायपालिका की साख
- संविधान की रक्षा: यदि किसी जज पर "धर्मनिरपेक्षता के विरुद्ध" कार्य करने का आरोप है, तो यह सीधे तौर पर संविधान की मूल संरचना पर प्रहार है।
- न्यायिक शुचिता: निष्कासन की प्रक्रिया केवल एक सजा नहीं, बल्कि न्यायपालिका में जनता का विश्वास बनाए रखने का एक तंत्र है।
संवैधानिक गरिमा एवं नागरिकों के अधिकार
- अनुच्छेद 21 और निष्पक्ष न्याय: न्यायपालिका का निष्पक्ष होना नागरिकों के गरिमापूर्ण जीवन का अभिन्न हिस्सा है। यदि कोई न्यायाधीश संवैधानिक सिद्धांतों (जैसे धर्मनिरपेक्षता) के विरुद्ध कार्य करता है, तो यह जनता के न्यायिक विश्वास पर प्रहार है।
- विधि का शासन: 'विधि के शासन' की अवधारणा तभी सुरक्षित रहती है जब न्यायाधीश स्वयं को कानून के प्रति जवाबदेह समझें।
भावी राह
जस्टिस स्वामीनाथन का मामला एक बार फिर न्यायिक जवाबदेही के मुद्दे को केंद्र में ले आया है।
- सुधार की आवश्यकता: विशेषज्ञों का सुझाव है कि 'न्यायिक मानक और जवाबदेही विधेयक' जैसे कानूनों पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए, जो निष्कासन से कम सजा (जैसे चेतावनी या कार्य से विरक्ति) के लिए एक मध्यमार्ग प्रदान करें।
निष्कर्ष: न्यायपालिका की स्वतंत्रता सर्वोपरि है, लेकिन वह 'निरंकुश' नहीं हो सकती। संवैधानिक संतुलन तभी बना रहेगा जब न्यायाधीशों का आचरण संविधान की शपथ के प्रति पूर्णतः समर्पित हो।
सामान्य अध्ययन पेपर– II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध
पृष्ठभूमि
स्वतंत्रता के बाद से भारत में 'विवाह के झूठे वादे पर यौन संबंध' को भारतीय दंड संहिता (IPC), 1860 के तहत प्रत्यक्ष रूप से परिभाषित नहीं किया गया था। न्यायपालिका ऐसे मामलों को सुलझाने के लिए दो प्रमुख धाराओं का सहारा लेती थी:
- IPC धारा 375/376 (बलात्कार): यदि पुरुष ने महिला की सहमति 'तथ्यों की गलत धारणा' के आधार पर प्राप्त की हो।
- IPC धारा 90 (सहमति की वैधता): यह प्रावधान करता है कि यदि सहमति किसी भ्रम या भय के तहत दी गई है, तो वह कानूनन 'स्वतंत्र सहमति' नहीं है।
IPC के तहत ऐसे मामलों को 'बलात्कार' की श्रेणी में रखने से न केवल न्याय प्रक्रिया जटिल हो गई थी, बल्कि यह आरोपी के लिए सामाजिक कलंक और पीड़ित के लिए साक्ष्य प्रस्तुत करने की गंभीर चुनौती पेश करता था।
भारतीय न्याय संहिता (BNS) और धारा 69:
1 जुलाई, 2024 से प्रभावी भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 ने इस कानूनी रिक्तता को भरा है।
- धारा 69: यह धारा विशेष रूप से "शादी के वादे, पदोन्नति, रोजगार या पहचान छिपाकर" बनाए गए यौन संबंधों को दंडित करती है।
- विभेद: BNS ने 'बलात्कार' (धारा 64) और 'धोखे से बनाए गए संबंध' (धारा 69) को पृथक कर दिया है। यह इस बात की स्वीकारोक्ति है कि जहाँ बल प्रयोग नहीं है, वहाँ अपराध की प्रकृति 'धोखाधड़ी' की है।
- दंड का प्रावधान: इसमें 10 वर्ष तक के कारावास और अर्थदंड का प्रावधान है।
हालिया न्यायिक विमर्श: कर्नाटक उच्च न्यायालय का निर्णय
कर्नाटक हाईकोर्ट ने हाल ही में धारा 69 की व्याख्या करते हुए एक महत्वपूर्ण नजीर पेश की।
- मामला: एक विवाहित महिला (दो बच्चों की माँ) ने एक वकील पर शादी का वादा कर यौन शोषण का आरोप लगाया।
- कोर्ट का तर्क: जस्टिस एम. नागप्रसन्ना ने स्पष्ट किया कि "कानून धोखे को दंडित करता है, निराशा को नहीं।" यदि शिकायतकर्ता स्वयं कानूनी रूप से विवाह करने की स्थिति में नहीं है (पहले से विवाहित होने के कारण), तो 'शादी के वादे' पर सहमति का दावा 'तार्किक रूप से असंभव' है।
- महत्व: न्यायालय ने आगाह किया कि आपराधिक प्रक्रिया को 'उत्पीड़न के इंजन' या 'प्रतिशोध के हथियार' के रूप में उपयोग नहीं किया जाना चाहिए।
सर्वोच्च न्यायालय के मार्गदर्शक सिद्धांत
उच्चतम न्यायालय ने अनुराग सोनी बनाम छत्तीसगढ़ और सोनू बनाम उत्तर प्रदेश जैसे वादों में कुछ मानक स्थापित किए हैं:
- प्रारंभिक दुराशय: अभियोजन को यह सिद्ध करना होगा कि आरोपी की मंशा रिश्ते की शुरुआत से ही छल करने की थी।
- विवाह की विफलता बनाम छल: यदि सामाजिक, पारिवारिक या अन्य परिस्थितियों के कारण विवाह नहीं हो पाता, तो उसे आपराधिक कृत्य नहीं माना जा सकता।
संवैधानिक अधिकार और मानवीय गरिमा
- अनुच्छेद 21 (प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता): इसमें 'गरिमापूर्ण जीवन' और 'निजता का अधिकार' शामिल है। झूठे आरोपों से व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा का हनन होता है, जो अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है।
- अनुच्छेद 14 (समानता): कानून का निष्पक्ष अनुप्रयोग अनिवार्य है। जेंडर-न्यूट्रल दृष्टिकोण की कमी और कानूनों का दुरुपयोग संवैधानिक समानता को आहत करता है।
NCRB रिपोर्ट
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के अनुसार, भारत में दर्ज बलात्कार के मामलों में से लगभग 30% से 40% मामले 'विवाह के वादे' से जुड़े होते हैं।
- दोषसिद्धि की निम्न दर: इन मामलों में सजा की दर अत्यंत कम है, जो यह दर्शाता है कि अधिकांश मामले या तो आपसी सहमति के थे या प्रतिशोध की भावना से प्रेरित थे।
सूक्ष्म विश्लेषण: 'धोखा' और 'हृदय विदारण' (हर्टब्रेक)
विश्लेषण बिंदु | धोखाधड़ी (BNS 69) | संबंध विच्छेद |
मंशा | शुरुआत से ही छल करने का इरादा। | विवाह का इरादा था, पर बाद में परिस्थितियाँ बदलीं। |
कार्यप्रणाली | पहचान छिपाना, फर्जी दस्तावेज, स्पष्ट झूठ। | आपसी सहमति, लंबा संबंध, बाद में असहमति। |
कानूनी उपचार | आपराधिक अभियोजन (10 साल की सजा)। | दीवानी उपचार (मानहानि या हर्जाना)। |
क्या इससे महिलाओं की स्थिति दुर्बल होगी?
एक गंभीर प्रश्न यह उठता है कि क्या इस निर्णय से महिलाओं के लिए न्याय प्राप्त करना कठिन होगा?
- चुनौती: 'मंशा' को साबित करना कठिन होता है। इससे वास्तविक पीड़ितों को अपनी बात साबित करने में अधिक संघर्ष करना पड़ सकता है।
- अवसर: यह महिलाओं को 'स्वतंत्र और विवेकशील वयस्क' के रूप में मान्यता देता है, न कि केवल एक 'वस्तु' जिसे बहकाया जा सके। यह पितृसत्तात्मक सोच को चुनौती देता है कि महिला अपनी सहमति के परिणामों को नहीं समझती।
भावी राह
- प्रारंभिक जांच: ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के दिशानिर्देशों के अनुसार, ऐसे संवेदनशील मामलों में FIR से पूर्व गहन जांच अनिवार्य हो।
- कानूनी साक्षरता: युवाओं को सहमति के कानूनी निहितार्थों के प्रति जागरूक करना।
- न्यायिक संतुलन: न्यायालयों को 'स्वतंत्र सहमति' और 'धोखे से प्राप्त सहमति' के बीच के अंतर को केस-दर-केस आधार पर साक्ष्यों (जैसे बातचीत के स्क्रीनशॉट, गवाह आदि) के माध्यम से परखना चाहिए।
निष्कर्ष:
BNS की धारा 69 का लक्ष्य वास्तविक पीड़ितों को सुरक्षा प्रदान करना है, लेकिन इसका दुरुपयोग 'प्रक्रियात्मक अन्याय' को जन्म देता है। कर्नाटक हाईकोर्ट का निर्णय एक आवश्यक 'चेक और बैलेंस' है। न्याय प्रणाली को यह सुनिश्चित करना होगा कि वह सहमति का सम्मान करे, धोखे को दंडित करे और प्रतिशोध को हतोत्साहित करे। अंततः, कानून का उद्देश्य 'सामाजिक नैतिकता' को थोपना नहीं, बल्कि 'संवैधानिक न्याय' सुनिश्चित करना है।