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सामान्य अध्ययन पेपर – III  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन

संदर्भ

पिछले चार दशकों से अंतरिक्ष अन्वेषण मुख्य रूप से सरकारी संस्थानों (जैसे NASA, ISRO, के एकाधिकार में था। इस दौरान 'उपभोज्य प्रक्षेपण यान'  का उपयोग होता था, जो एक बार के उपयोग के बाद नष्ट हो जाते थे। इसके कारण मिशन की लागत अत्यधिक बनी रही। हालाँकि, नई सहस्राब्दी में एक 'वाणिज्यिक क्रांति' देखी गई है, जहाँ निजी क्षेत्र (SpaceX, Blue Origin) केवल निवेश कर रहा है, बल्कि नवाचार का नेतृत्व भी कर रहा है। वर्ष 2030 तक वैश्विक अंतरिक्ष उद्योग के $1 ट्रिलियन के मूल्य को पार करने का अनुमान है।

पुन: प्रयोज्य रॉकेट:

पुन: प्रयोज्य रॉकेट वह प्रक्षेपण यान है जिसे मिशन के बाद सुरक्षित रूप से पृथ्वी पर वापस उतारा जाता है और मरम्मत के बाद पुनः लॉन्च किया जाता है।

  • लागत में भारी कमी: पारंपरिक रॉकेटों की तुलना में इसने अंतरिक्ष में प्रति किलोग्राम पेलोड भेजने की लागत को 5 से 20 गुना तक कम कर दिया है।
  • लॉन्च कैडेंस : रॉकेट के मुख्य हिस्सों (जैसे बूस्टर) को पुनः प्राप्त करने से प्रक्षेपण की आवृत्ति  बढ़ गई है।
  • प्रमुख उदाहरण: SpaceX का 'फाल्कन 9' और निर्माणाधीन 'स्टारशिप' जनवरी 2026 तक, फाल्कन 9 के एक ही बूस्टर को 30 से अधिक बार उपयोग करने का कीर्तिमान स्थापित हो चुका है।

रीयूज़ेबिलिटी की कार्यप्रणाली और धारणीयता

यह तकनीक मुख्य रूप से 'रेट्रो-प्रोपल्शन' और 'स्वायत्त लैंडिंग' पर आधारित है।

  • कार्यप्रणाली: रॉकेट का पहला चरण अलग होने के बाद अपने इंजनों को पुनः प्रज्वलित करता है ताकि गति कम हो सके और वह निर्दिष्ट स्थान पर ऊर्ध्वाधर लैंडिंग कर सके।
  • संसाधन बचत: नया रॉकेट बनाने के लिए आवश्यक धातुओं और जटिल निर्माण प्रक्रिया की बचत होती है।
  • कचरा प्रबंधन: यह महासागरों और निचली कक्षा में गिरने वाले मलबे को कम कर 'सतत अंतरिक्ष पहुँच' सुनिश्चित करता है।

बदलता स्वरूप: सरकारी बनाम निजी संस्थाएं

अंतरिक्ष क्षेत्र अब 'राष्ट्रीय प्रतिष्ठा' से बढ़कर एक 'वैश्विक व्यवसाय' बन गया है।

  • सरकारी भूमिका: सरकारें अब 'ऑपरेटर' के बजाय 'नियामक' और 'ग्राहक' की भूमिका निभा रही हैं।
  • निजी भूमिका: 3D प्रिंटिंग और 'वर्टिकल इंटीग्रेशन' के माध्यम से निजी कंपनियां लागत दक्षता में अग्रणी हैं।

भारत की स्थिति: हालिया उपलब्धियां और आगामी मिशन

इसरो भी रीयूज़ेबिलिटी की वैश्विक दौड़ में एक प्रमुख खिलाड़ी बनकर उभरा है:

  • RLV-LEX3 (जून 2024): इसरो ने 'पुन: प्रयोज्य प्रक्षेपण यान' के स्वायत्त लैंडिंग प्रयोग का तीसरा सफल परीक्षण किया।
  • TSTO (टू-स्टेज-टू-ऑर्बिट): भारत एक दो-चरणीय प्रक्षेपण यान विकसित कर रहा है जिसका उद्देश्य पूरी तरह से रीयूज़ेबल होना है।
  • ADMIRE: इसरो एक ऐसे परीक्षण यान पर काम कर रहा है जो वर्टिकल लैंडिंग (SpaceX की तर्ज पर) करने में सक्षम होगा।
  • IN-SPACe: निजी क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए बनाई गई यह संस्था भारत को वैश्विक कमर्शियल मार्केट में स्थापित कर रही है।

मानव मिशन बनाम सैटेलाइट मिशन: लागत विश्लेषण

विशेषता

उपग्रह मिशन

मानव मिशन

लागत

अपेक्षाकृत कम

3-5 गुना अधिक

जटिलता

मध्यम (सिर्फ हार्डवेयर)

अत्यधिक (लाइफ सपोर्ट, सुरक्षा)

वापसी

आवश्यक नहीं

अनिवार्य

रीयूज़ेबिलिटी

वैकल्पिक

अनिवार्य (आर्थिक व्यवहार्यता हेतु)

भविष्य का प्रभाव

  • अंतरिक्ष पर्यटन : लागत कम होने से आम नागरिकों के लिए अंतरिक्ष यात्रा सुलभ होगी।
  • वैश्विक कनेक्टिविटी: हजारों छोटे उपग्रहों का नेटवर्क (जैसे Starlink) पूरी दुनिया को सस्ता इंटरनेट प्रदान करेगा।
  • गहन अंतरिक्ष अन्वेषण: चंद्रमा पर स्थायी बस्तियां और मंगल मिशन रीयूज़ेबिलिटी के बिना आर्थिक रूप से असंभव हैं।

आगे की राह

  • नीतिगत प्रोत्साहन: अंतरिक्ष नीति 2023 के तहत स्टार्टअप्स को वित्तीय और तकनीकी सहायता प्रदान करना।
  • अंतर्राष्ट्रीय मानक: अंतरिक्ष मलबे के प्रबंधन और रीयूज़ेबिलिटी के संचालन के लिए वैश्विक नियमों की आवश्यकता।
  • बुनियादी ढांचा: भारत को अपने प्रक्षेपण केंद्रों को रीयूज़ेबल बूस्टर्स की रिकवरी के अनुकूल विकसित करना होगा।

निष्कर्ष

रीयूज़ेबिलिटी केवल एक तकनीकी उपलब्धि नहीं, बल्कि अंतरिक्ष अन्वेषण का 'लोकतांत्रिकरण' है। यह अंतरिक्ष को एक 'व्यय' के बजाय 'निवेश' में बदल देता है। जैसा कि भारतीय न्यायपालिका में 'नैसर्गिक न्याय' सर्वोपरि है, वैसे ही अंतरिक्ष के भविष्य के लिए 'रीयूज़ेबिलिटी' ही 'नैसर्गिक धारणीयता' का एकमात्र मार्ग है।