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संदर्भ
भारत के घास के मैदानों से एक नन्हा जीव तेजी से विलुप्त हो रहा है, जिसे हम पिग्मी हॉग के नाम से जानते हैं। हालिया रिपोर्टों और 'पिग्मी हॉग संरक्षण कार्यक्रम' (PHCP) के आंकड़ों के अनुसार, यह जीव अब केवल असम के कुछ सीमित क्षेत्रों तक सिमट कर रह गया है। पारिस्थितिकी तंत्र के लिए इसकी महत्ता को देखते हुए संरक्षणवादी इसे बचाने के लिए "मिशन मोड" में काम कर रहे हैं।
पिग्मी हॉग के बारे में: अद्वितीय विशेषताएं
- दुनिया में सबसे छोटा: यह दुनिया का सबसे छोटा और दुर्लभ जंगली सूअर है। एक वयस्क पिग्मी हॉग की ऊंचाई मात्र 25 सेमी (लगभग 10 इंच) होती है।
- इंजीनियर और निर्माता: यह उन गिने-चुने स्तनधारियों में से एक है जो अपना घर या 'घोंसला' खुद बनाता है, जिसमें घास की एक पूरी 'छत' भी होती है।
- संकेतक प्रजाति: पिग्मी हॉग की उपस्थिति उस क्षेत्र के घास के मैदानों के स्वास्थ्य का प्रमाण होती है। यदि पिग्मी हॉग सुरक्षित हैं, तो इसका अर्थ है कि वहां का पारिस्थितिकी तंत्र संतुलित है।
चर्चा में क्यों?
- पुनरुद्धार कार्यक्रम: जनवरी 2026 तक की रिपोर्ट के अनुसार, 'पिग्मी हॉग संरक्षण कार्यक्रम' (PHCP) ने अब तक लगभग 179 से अधिक बंधक-प्रजनित पिग्मी हॉग्स को असम के सुरक्षित क्षेत्रों में सफलतापूर्वक वापस छोड़ा है।
- अफ़्रीकी स्वाइन फीवर (ASF) का खतरा: वर्तमान में इन जीवों पर 'अफ्रीकी स्वाइन फीवर' का बड़ा खतरा मंडरा रहा है, जिससे उनकी पूरी आबादी के नष्ट होने का डर है। प्रशासन इनके संरक्षण केंद्रों पर कड़ी 'बायो-सिक्योरिटी' लागू कर रहा है।
आवास और वर्तमान स्थिति
पिग्मी हॉग को नदी के किनारे वाले ऐसे घास के मैदान पसंद हैं जहाँ मानवीय हस्तक्षेप कम हो और जहाँ ऊँची व घनी घास (जैसे हाथी घास) मौजूद हो।
- वर्तमान ठिकाना: ऐतिहासिक रूप से यह हिमालय की तलहटी में उत्तर प्रदेश से लेकर असम तक पाया जाता था, लेकिन वर्तमान में यह केवल असम के मानस और ओरांग राष्ट्रीय उद्यानों तक ही सीमित रह गया है।
पारिस्थितिक भूमिका
यह नन्हा जीव घास के मैदानों के लिए किसी 'माली' से कम नहीं है:
- मिट्टी का वातन: यह अपनी थूथन से जड़ों, कंदों और कीड़ों के लिए खुदाई करता है, जिससे मिट्टी में हवा का संचार बढ़ता है और उसकी गुणवत्ता में सुधार होता है।
- बीज प्रसार: यह विभिन्न जंगली फलों और बीजों को खाता है, जिससे बीजों के फैलाव और नई वनस्पतियों के उगने में मदद मिलती है।
संरक्षण स्थिति
पिग्मी हॉग को लुप्तप्राय होने से बचाने के लिए उच्चतम स्तर की सुरक्षा प्राप्त है:
- IUCN रेड लिस्ट: अति संकटग्रस्त
- वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972: अनुसूची-I यह भारत में किसी भी वन्यजीव को दी जाने वाली सर्वोच्च कानूनी सुरक्षा है।
- CITES: परिशिष्ट-I
अस्तित्व पर मंडराते खतरे
- आवास का विनाश: कृषि और बस्तियों के लिए घास के मैदानों का लगातार कटना।
- अवैध चराई: मवेशियों द्वारा घास के मैदानों का अत्यधिक दोहन।
- घास जलाना: शुष्क मौसम में घास के मैदानों में अनियंत्रित आग लगाने से इनके घोंसले और जीवन नष्ट हो जाते हैं।
निष्कर्ष
पिग्मी हॉग केवल एक जानवर नहीं, बल्कि हमारे घास के मैदानों के स्वास्थ्य का "बैरोमीटर" है। यदि यह विलुप्त होता है, तो पूरा ग्रासलैंड इकोसिस्टम खतरे में पड़ जाएगा। कुड्डालोर या असम जैसे क्षेत्रों में चल रही संरक्षण पहलें यह दर्शाती हैं कि सामूहिक प्रयासों से हम इन 'अदृश्य नायकों' को विलुप्त होने की कगार से वापस ला सकते हैं।