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सामान्य अध्ययन पेपर – III प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन
संदर्भ
बजट 2026-27 भारत के आर्थिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ का संकेत देता है। जहाँ सरकार ने राजकोषीय घाटे को 4.3% तक सीमित रखने और पूंजीगत व्यय को ₹12.2 लाख करोड़ तक बढ़ाने का साहसिक निर्णय लिया है, वहीं यह नीतिगत झुकाव विकास की 'पूंजी-प्रधान' प्रकृति और 'श्रम के विस्थापन' के बीच एक गहरे विरोधाभास को जन्म दे रहा है। यह लेख 'दृश्यमान' बुनियादी ढांचे के विकास और 'अदृश्य' होते जा रहे रोजगार के अवसरों के बीच की खाई का विश्लेषण करता है।
विकास का स्वरूप: पूंजी बनाम श्रम
- "जॉबलेस ग्रोथ" (रोजगार विहीन विकास) के एक नए और अधिक चिंताजनक चरण में प्रवेश कर रहा है।
- रोजगार लोच में गिरावट: निर्माण क्षेत्र, जो पारंपरिक रूप से सबसे अधिक अकुशल श्रमिकों को खपाता था, उसकी रोजगार लोच 0.59 (2011-20) से गिरकर 0.42 (2021-24) रह गई है। इसका अर्थ है कि बुनियादी ढांचे पर किया गया रिकॉर्ड निवेश अब आनुपातिक रूप से रोजगार पैदा करने में विफल हो रहा है।
- पूंजी-प्रधान विनिर्माण: 'विकसित भारत' के विजन के तहत ऑटोमेशन और उन्नत लॉजिस्टिक्स पर जोर दिया जा रहा है। बड़ी कंपनियों की उत्पादकता तो बढ़ रही है, लेकिन वे कम कार्यबल के साथ अधिक उत्पादन कर रही हैं, जिससे मुनाफे का संकेंद्रण 'पूंजी' में हो रहा है, न कि 'मजदूरी' में।
सामाजिक-आर्थिक निहितार्थ
- विकास का यह मॉडल समाज के एक बड़े हिस्से को आर्थिक लाभों से बाहर कर रहा है, जिसे लेखकों ने 'अदृश्य बहिष्कार' कहा है।
- युवा शक्ति का संकट (The NEET Crisis): वर्तमान में 15-29 वर्ष के लगभग 23-25% युवा NEET (न शिक्षा में, न रोजगार में, न प्रशिक्षण में) की श्रेणी में हैं। यह न केवल एक आर्थिक नुकसान है, बल्कि भविष्य में सामाजिक अस्थिरता का कारक भी बन सकता है।
- द्वि-स्तरीय अर्थव्यवस्था: भारत में दो समानांतर अर्थव्यवस्थाएं उभर रही हैं। एक वह जो डिजिटल, संगठित और उच्च उत्पादकता वाली है, और दूसरी वह जो असंगठित, निम्न आय वाली और असुरक्षित श्रम पर टिकी है। इन दोनों के बीच की दूरी 'समावेशी विकास' के लक्ष्य को धूमिल कर रही है।
प्रमुख चुनौतियां
- श्रम उत्पादकता बनाम वेतन: श्रमिकों की उत्पादकता में वृद्धि के बावजूद वास्तविक मजदूरी स्थिर बनी हुई है। इससे मांग का आधार कमजोर हो रहा है।
- संरचनात्मक प्रतिवर्तन: श्रमिक औद्योगिक रोजगार के अभाव में वापस 'निर्वाह कृषि' की ओर लौट रहे हैं, जो आर्थिक विकास के प्राकृतिक क्रम के विपरीत है।
- कौशल अंतराल: तकनीकी प्रगति की गति और श्रमिकों के कौशल विकास के बीच का अंतर 'अदृश्य बहिष्कार' को और अधिक गहरा बना रहा है।
आगे की राह
- श्रम-प्रधान क्षेत्रों को प्रोत्साहन: केवल मेगा-इंफ्रास्ट्रक्चर ही पर्याप्त नहीं है; वस्त्र, खाद्य प्रसंस्करण और चमड़ा जैसे श्रम-प्रधान उद्योगों (MSMEs) के लिए विशिष्ट वित्तीय प्रोत्साहन की आवश्यकता है।
- रोजगार-संबद्ध प्रोत्साहन (ELI): 'उत्पादन-संबद्ध प्रोत्साहन' (PLI) की तर्ज पर 'रोजगार-संबद्ध प्रोत्साहन' योजनाएं शुरू की जानी चाहिए, जहाँ सब्सिडी का आधार 'रोजगार सृजन की संख्या' हो।
- मानव पूंजी में निवेश: बुनियादी ढांचे के साथ-साथ शिक्षा और स्वास्थ्य पर व्यय बढ़ाना अनिवार्य है, ताकि कार्यबल उभरती प्रौद्योगिकियों के अनुरूप बन सके।
- मजदूरी आधारित विकास: आर्थिक नीतियों का केंद्र केवल 'कॉर्पोरेट लाभ' न होकर 'मजदूरी में वृद्धि' होना चाहिए, ताकि उपभोग आधारित विकास चक्र को गति मिल सके।
निष्कर्ष
संक्षेप में, भारत का वर्तमान विकास मॉडल 'नैदानिक दक्षता' के साथ तो कार्य कर रहा है, परंतु इसके सामाजिक मूल्य अत्यधिक हैं। यदि भारत को वास्तव में 'विकसित भारत' बनना है, तो विकास केवल 'दृश्यमान' पुलों और राजमार्गों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि इसे समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति के हाथों में काम (रोजगार) और गरिमापूर्ण जीवन प्रदान करना चाहिए। आर्थिक प्रगति और सामाजिक समावेशन के बीच संतुलन ही दीर्घकालिक स्थिरता की एकमात्र कुंजी है।