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राष्ट्रीय हथकरघा दिवस: भारतीय विरासत, अर्थव्यवस्था और भावी दिशा

सामान्य अध्ययन पेपरIIIप्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन।


संदर्भ

हथकरघा की सांस्कृतिक धरोहर, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और कुटीर उद्योग का एक अनिवार्य अंग है। यह केवल कपड़ा बनाने की एक तकनीक मात्र नहीं है, बल्कि भारत की विविध कलात्मक परंपराओं, शिल्प कौशल और हस्तशिल्प की समृद्ध विरासत का सजीव प्रतीक है। प्राचीन काल से ही भारतीय वस्त्रों ने अपनी उत्कृष्ट गुणवत्ता, महीन बुनाई और जीवंत डिज़ाइनों के कारण वैश्विक स्तर पर अमिट छाप छोड़ी है। कृषि क्षेत्र के बाद हथकरघा उद्योग भारत में आजीविका प्रदान करने वाला दूसरा सबसे बड़ा क्षेत्र है, जो ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में लाखों परिवारों, विशेषकर महिलाओं को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रोजगार प्रदान करता है।

राष्ट्रीय हथकरघा दिवस: एक परिचय

प्रत्येक वर्ष 7 अगस्त को संपूर्ण भारत में 'राष्ट्रीय हथकरघा दिवस' के रूप में मनाया जाता है।

  • उद्देश्य: देश में हथकरघा क्षेत्र के महत्व के बारे में जन-जागरूकता बढ़ाना, सामाजिक-आर्थिक विकास में इसके योगदान को रेखांकित करना तथा बुनकरों के अतुलनीय प्रयास को सम्मानित करना।
  • प्रतीकात्मकता: यह दिवस भारत के हथकरघा बुनकरों के समर्पण, संघर्ष और उनकी अद्वितीय बुनाई कला का जश्न मनाने का एक राष्ट्रीय मंच है।

चर्चा में क्यों?

वर्ष 2026 में 12वें राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के अवसर पर राष्ट्रीय एवं राज्य स्तर पर निम्नलिखित प्रमुख कार्यक्रम आयोजित किए गए:

  • राष्ट्रीय स्तर का मुख्य समारोह
  • स्थान एवं मुख्य अतिथि: मुख्य राष्ट्रीय समारोह नई दिल्ली स्थित राष्ट्रपति भवन सांस्कृतिक केंद्र (RBCC) में आयोजित हुआ, जिसमें भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू मुख्य अतिथि के रूप में सम्मिलित हुईं।
  • गणमान्य उपस्थिति: केंद्रीय वस्त्र मंत्री गिरिराज सिंह, राज्य मंत्री पबित्रा मार्गेरिटा तथा वस्त्र सचिव नीलम शमी राव सहित वस्त्र मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे।
  • राष्ट्रीय सम्मान: हथकरघा क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए संत कबीर हथकरघा पुरस्कार तथा राष्ट्रीय हथकरघा पुरस्कार की श्रेणियों में कुल 22 बुनकरों को सम्मानित किया गया।
  • राज्य स्तरीय आयोजन (इरोड, तमिलनाडु)
  • विशेष प्रदर्शनी छूट: जिला कलेक्ट्रेट परिसर में आयोजित प्रदर्शनी में राज्य सरकार द्वारा चेन्निमालाई बेडशीट, भवानी जमाक्कलम, सूती सॉफ्ट सिल्क साड़ियों पर 20% की विशेष छूट दी गई।
  • कल्याणकारी एवं पर्यावरण पहल: बुनकरों के लिए निःशुल्क स्वास्थ्य जांच शिविर और मुकासिपिदारियूर एवं मेलापलायम क्षेत्रों में वृक्षारोपण अभियान चलाया गया।
  • युवा भागीदारी: वी..टी. आर्ट्स एंड साइंस कॉलेज के फैशन डिज़ाइन विभाग द्वारा हथकरघा उत्पादों को आधुनिक परिप्रेक्ष्य में बढ़ावा देने के लिए फैशन शो आयोजित किया गया।

यह महत्वपूर्ण क्यों है?

प्रमुख आयाम

विवरण एवं प्रभाव

महिला सशक्तिकरण

देश के कुल हथकरघा श्रमिकों में 72% से अधिक संख्या महिलाओं की है, जो इसे आर्थिक स्वावलंबन का मुख्य आधार बनाता है।

सांस्कृतिक संरक्षण

बनारसी, कांजीवरम, चंदेरी, पोचमपल्ली और भवानी जमाक्कलम जैसी पारंपरिक बुनाई शैलियों को जीवित रखने हेतु आवश्यक।

सतत विकास

उत्पादन प्रक्रिया में नगण्य बिजली की खपत होने के कारण यह शून्य या न्यूनतम कार्बन उत्सर्जन वाला हरित उद्योग है।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था

बिना किसी बड़े पूंजीगत निवेश के स्थानीय स्तर पर आजीविका प्रदान करता है, जिससे शहरों की ओर पलायन रुकता है।


भारत एवं हथकरघा

  • वैश्विक योगदान: भारत विश्व के कुल हथकरघा वस्त्र उत्पादन का 95% से अधिक अकेले उत्पादित करता है।

  • रोजगार सृजन: देश भर में लगभग 35 लाख से अधिक बुनकर संबंधित कारीगर इस क्षेत्र से जुड़े हैं।
  • क्षेत्रीय विविधता: उत्तर प्रदेश की बनारसी सिल्क, तमिलनाडु की कांजीवरम, ओडिशा की इकत, मध्य प्रदेश की चंदेरी और असम की मूगा सिल्क भारत की अनूठी भौगोलिक पहचान हैं।

वैश्विक परिदृश्य

  • 'स्लो फैशन' का उभार: वैश्विक बाजार में टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल वस्त्रों की मांग तेजी से बढ़ रही है, जहां भारतीय हथकरघा की व्यापक संभावनाएं हैं।

  • प्रतिस्पर्धा और विशिष्टता: पावरलूम और सिंथेटिक कपड़ों की तुलना में मूल्य-प्रतिस्पर्धा होने के बावजूद प्रामाणिक, हस्तनिर्मित उत्पादों के प्रति अंतरराष्ट्रीय खरीदारों का रुझान भारतीय हथकरघा को एक अनूठा लाभ (USP) प्रदान करता है।
  • निर्यात बाजार: अमरीका, यूरोपीय संघ, ब्रिटेन और मध्य पूर्व के देशों में भारतीय हथकरघा उत्पादों (गृह सज्जा सामग्री, स्कार्फ और पारंपरिक वस्त्रों) की भारी मांग है।

हथकरघा दिवस का इतिहास

राष्ट्रीय हथकरघा दिवस का इतिहास भारत के स्वतंत्रता संग्राम की चेतना से गहराई से जुड़ा हुआ है:

  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: 7 अगस्त 1905 को कोलकाता के टाउन हॉल में 'स्वदेशी आंदोलन' की शुरुआत हुई थी। इसका मुख्य उद्देश्य विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार कर स्वदेशी उत्पादों (विशेषकर भारतीय वस्त्रों) को बढ़ावा देना था।
  • घोषणा एवं स्थापना: स्वदेशी आंदोलन के इसी ऐतिहासिक महत्व को चिह्नित करने हेतु भारत सरकार ने वर्ष 2015 में प्रतिवर्ष 7 अगस्त को 'राष्ट्रीय हथकरघा दिवस' मनाने का निर्णय लिया।
  • प्रथम आयोजन: देश के पहले राष्ट्रीय हथकरघा दिवस का उद्घाटन 7 अगस्त 2015 को चेन्नई में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा किया गया था।

प्रमुख सरकारी पहलें

हथकरघा क्षेत्र को संबल प्रदान करने के लिए केंद्र राज्य सरकारों द्वारा निम्नलिखित योजनाएं चलाई जा रही हैं:

  • राष्ट्रीय हथकरघा विकास कार्यक्रम (NHDP): बुनकरों को वित्तीय सहायता, बुनियादी ढांचा, और आधुनिक उपकरण प्रदान करना।
  • हथकरघा संवर्धन योजना (HSS): तकनीकी उन्नयन, कच्चे माल की उपलब्धता और कार्यशाला निर्माण हेतु वित्तीय मदद।
  • 'इंडिया हैंडलूम' ब्रांड: उत्पादों की प्रामाणिकता, गुणवत्ता और 'शून्य-दोष, शून्य-प्रभाव' उत्पादन को प्रमाणित करने के लिए वर्ष 2015 में शुरू किया गया।
  • डिजिटल प्लेटफॉर्म्स (GeM): मध्यस्थों को हटाकर बुनकरों को सीधे गवर्नमेंट -मार्केटप्लेस (GeM) और अन्य -कॉमर्स पोर्टल्स से जोड़ना।
  • बुनकर मुद्रा योजना: बुनकरों को रियायती ब्याज दर पर कार्यशील पूंजी और ऋण उपलब्ध कराना।

विश्लेषण

  • सकारात्मक पक्ष
  • अद्वितीय हस्तशिल्प डिज़ाइनों की समृद्ध विरासत और उच्च गुणवत्ता।
  • पर्यावरण के अनुकूल, न्यूनतम ऊर्जा खपत वाली उत्पादन प्रक्रिया।
  • ग्रामीण अर्थव्यवस्था और महिला सशक्तिकरण का सुदृढ़ स्तंभ।
  • विद्यमान चुनौतियां
  • पावरलूम से असमान प्रतिस्पर्धा: स्वचालित मशीनों से बनने वाले सस्ते सिंथेटिक कपड़ों से कड़ी टक्कर।
  • कच्चे माल की समस्या: सूती रेशमी धागों की बढ़ती कीमतें और अनियमित आपूर्ति।
  • कम आय और पलायन: कठिन शारीरिक परिश्रम की तुलना में कम वित्तीय पारिश्रमिक मिलने से युवा पीढ़ी का इस पेशे से विमुख होना।
  • आधुनिक विपणन का अभाव: डिजिटल मार्केटिंग और समकालीन फैशन रुझानों तक ग्रामीण बुनकरों की सीमित पहुंच।

आगे का रास्ता

हथकरघा क्षेत्र को आधुनिक समय में आर्थिक रूप से व्यावहारिक बनाने के लिए निम्नलिखित कदम उठाने आवश्यक हैं:

  • डिज़ाइन इनोवेशन: NIFT जैसे अग्रणी फैशन संस्थानों के माध्यम से पारंपरिक बुनाई को आधुनिक अंतरराष्ट्रीय रुझानों के साथ जोड़ना।
  • जीआई टैगिंग एवं ब्रांडिंग: प्रामाणिक हथकरघा उत्पादों के लिए भौगोलिक संकेत (GI Tag) का कड़ाई से अनुपालन और उपभोक्ताओं में ब्रांड जागरूकता फैलाना।
  • वित्तीय सुरक्षा एवं न्यूनतम मूल्य: बुनकरों के लिए न्यूनतम पारिश्रमिक या उनके तैयार माल की खरीद की सरकारी गारंटी सुनिश्चित करना।
  • डिजिटल साक्षरता: बुनकरों को सीधे वैश्विक खरीदारों से जोड़ने के लिए -कॉमर्स और सोशल मीडिया मार्केटिंग का प्रशिक्षण देना।
  • युवाओं को प्रोत्साहन: युवा बुनकरों को इस कला में बनाए रखने के लिए विशेष छात्रवृत्ति, उद्यमिता प्रोत्साहन और तकनीकी सहायता प्रदान करना।

निष्कर्ष

राष्ट्रीय हथकरघा दिवस केवल एक औपचारिक उत्सव नहीं है, बल्कि यह हमारी उस ऐतिहासिक पहचान को नमन करने का दिन है जिसने भारत को विश्व पटल पर 'सोने की चिड़िया' बनाने में योगदान दिया था। इरोड (तमिलनाडु) जैसी पहलें यह दर्शाती हैं कि जब सरकार, शैक्षणिक संस्थान और समाज मिलकर प्रयास करते हैं, तो पारंपरिक उद्योगों में भी नई ऊर्जा का संचार संभव है। हथकरघा उद्योग को बचाना केवल बुनकरों की आजीविका का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह भारत की आत्मा, संस्कृति और पर्यावरण-अनुकूल जीवनशैली को संरक्षित करने का मार्ग है। आधुनिकता और परंपरा का सही संतुलन बनाकर ही हम इस ऐतिहासिक कला को भविष्य की पीढ़ियों के लिए जीवित रख सकते हैं।