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खबर

  • "डे ज़ीरो" और संयुक्त राष्ट्र (UN) द्वारा दी गई उस चेतावनी के बारे में है, जो बताती है कि दुनियाविशेषकर भारत एक गंभीर जल संकट की ओर बढ़ रही है।
  • हाल ही में (जनवरी 2026) आई रिपोर्ट्स और UN के आंकड़ों के अनुसार, यह समस्या अब केवल भविष्य की बात नहीं, बल्कि एक वर्तमान वास्तविकता बन गई है। इस पूरी खबर का मुख्य सार नीचे दिया गया है:

डे ज़ीरो क्या है?

"डे ज़ीरो" उस दिन को कहा जाता है जब किसी शहर या क्षेत्र का पानी का स्तर इतना गिर जाता है कि नलों से पानी आना बंद हो जाता है

  • इस स्थिति में अधिकारियों को नलों की सप्लाई काटनी पड़ती है।
  • लोगों को पानी के लिए सार्वजनिक टैप या आपातकालीन वितरण केंद्रों पर कतार लगानी पड़ती है, जहाँ पानी की मात्रा सीमित (प्रति व्यक्ति कुछ लीटर) तय कर दी

चर्चा में क्यों है?

  • ग्लोबल वॉटर बैंकरप्सी: UN ने जनवरी 2026 में चेतावनी दी है कि दुनिया "वैश्विक जल दिवालियापन" के युग में प्रवेश कर गई है। इसका मतलब है कि हम पानी का इस्तेमाल उसकी पुनर्भरण क्षमता से कहीं ज़्यादा तेज़ी से कर रहे हैं।
  • भारत पर खतरा: UN की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, भारत के चेन्नई, दिल्ली, बेंगलुरु और कोलकाता जैसे बड़े शहर 'डे ज़ीरो' के सबसे करीब हैं।

यह संकट क्यों रहा है?

UN की 2023 और 2026 की रिपोर्ट्स के अनुसार, इसके पीछे कोई एक कारण नहीं बल्कि कई कारक हैं:

  • भूजल का अत्यधिक दोहन: भारत दुनिया में भूजल का सबसे बड़ा उपभोक्ता है। हम जमीन से इतना पानी निकाल रहे हैं कि वह वापस भर नहीं पा रहा।
  • शहरीकरण: बिना योजना के बढ़ते शहरों ने झीलों और जल निकायों को खत्म कर दिया है (जैसे बेंगलुरु में 1400+ से घटकर अब केवल 190 के करीब झीलें बची हैं)
  • जलवायु परिवर्तन: बारिश का पैटर्न बदल गया हैकभी बहुत ज़्यादा बारिश तो कभी लंबा सूखा।
  • खराब प्रबंधन: पानी की बर्बादी और पाइपलाइनों में लीकेज एक बड़ी समस्या है।

इसके गंभीर परिणाम क्या होंगे?

UN के अनुसार, 'डे ज़ीरो' सिर्फ पानी की समस्या नहीं है, यह एक सामाजिक और आर्थिक आपदा है:

  • सार्वजनिक स्वास्थ्य: सफाई और पीने के साफ पानी की कमी से बीमारियां (जैसे हैजा) बढ़ेंगी।
  • खाद्य और बिजली संकट: खेती के लिए पानी नहीं होगा और बिजली बनाने वाले प्लांट ठप हो सकते हैं।
  • सामाजिक अशांति: पानी के लिए दंगे और समुदायों के बीच संघर्ष बढ़ सकते हैं।

क्या इसे रोका जा सकता है?

UN का कहना है कि 'डे ज़ीरो' अपरिहार्य नहीं है, इसे इन कदमों से रोका जा सकता है:

  • रेन वॉटर हार्वेस्टिंग: बारिश के पानी को सहेजना।
  • वेस्ट वॉटर रीसाइक्लिंग: इस्तेमाल किए हुए पानी को दोबारा साफ कर इस्तेमाल करना।
  • किफायती सिंचाई: खेती में ड्रिप इरिगेशन जैसी तकनीकों का उपयोग।
  • जागरूकता: पानी के उपयोग के तरीके में बदलाव।

निष्कर्ष: UN की चेतावनी के अनुसार, 2030 तक भारत की लगभग 40-50% शहरी आबादी गंभीर जल संकट का सामना कर सकती है। यह दशक (2020-2030) यह तय करने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है कि हम इस संकट से बचेंगे या इसका सामना करेंगे।

सामान्य अध्ययन पेपर – III  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन

संदर्भ

भारत की अर्थव्यवस्था वर्तमान में एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है, जहाँ पारंपरिक '9 से 5' की नौकरियों के स्थान पर एक लचीली कार्य संस्कृति विकसित हुई है। इसे 'गिग इकोनॉमी' कहा जाता है। आज भारत दुनिया के सबसे बड़े गिग मार्केट के रूप में उभर रहा है। सूचना प्रौद्योगिकी और स्मार्टफोन की बढ़ती पहुँच ने सेवा क्षेत्र में क्रांति ला दी है, जिससे -कॉमर्स, लॉजिस्टिक्स और फूड डिलीवरी जैसे क्षेत्रों में करोड़ों युवाओं को रोज़गार मिला है। यह बदलता परिप्रेक्ष्य केवल आर्थिक विकास को गति दे रहा है, बल्कि श्रम बाज़ार के पारंपरिक ढाँचे को भी चुनौती दे रहा है।

गिग वर्कर्स क्या हैं?

गिग वर्कर वह व्यक्ति होता है जो किसी पारंपरिक नियोक्ता-कर्मचारी संबंध के बाहर काम करता है।

  • ये लोग स्वतंत्र ठेकेदार, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म वर्कर या अस्थायी कर्मचारी होते हैं।
  • इन्हें आमतौर पर 'पार्टनर' (जैसे डिलीवरी पार्टनर, ड्राइवर पार्टनर) कहा जाता है।
  • इनकी कमाई काम की मात्रा पर आधारित होती है, कि मासिक वेतन पर।

उदाहरण: डिलीवरी बॉय, Uber/Ola के ड्राइवर्स, Urban Company के फ्रीलांस प्लंबर या ब्यूटीशियन आदि।

चर्चा के कारण -

  • हाल ही में कर्नाटक सरकार ने 'कर्नाटक प्लेटफॉर्म-आधारित गिग वर्कर्स वेलफेयर डेवलपमेंट बोर्ड' के गठन की अधिसूचना जारी की है।
  • यह कदम 'कर्नाटक प्लेटफॉर्म-आधारित गिग वर्कर्स (सामाजिक सुरक्षा और कल्याण) अधिनियम, 2025' के तहत उठाया गया है।
  • यह चर्चा का विषय इसलिए है क्योंकि कर्नाटक अब राजस्थान के बाद ऐसा दूसरा राज्य बन गया है जिसने गिग वर्कर्स को वैधानिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए एक समर्पित बोर्ड बनाया है।

गिग वर्कर्स वेलफेयर बोर्ड:

कर्नाटक द्वारा गठित यह बोर्ड एक वैधानिक निकाय है जिसका उद्देश्य गिग श्रमिकों के हितों की रक्षा करना है।

  • नेतृत्व: राज्य के श्रम मंत्री इसके पदेन अध्यक्ष होंगे।
  • संरचना: इसमें सरकार के वरिष्ठ अधिकारी, एग्रीगेटर कंपनियों (Zomato, Uber आदि) के प्रतिनिधि और श्रमिक यूनियनों के सदस्य शामिल हैं।
  • वेलफेयर फंड: कंपनियों को हर ट्रांजेक्शन पर 1% से 1.5% का 'कल्याण शुल्क' देना होगा। शुरुआत में इसे कम रखा गया है ताकि कंपनियों पर बोझ पड़े, लेकिन जरूरत पड़ने पर इसे 5% तक बढ़ाया जा सकता है।
  • पंजीकरण: सभी गिग वर्कर्स को बोर्ड के साथ पंजीकृत किया जाएगा और उन्हें एक Unique ID प्रदान की जाएगी।
  • कार्य: यह बोर्ड श्रमिकों के लिए बीमा, स्वास्थ्य सुविधाएं, बच्चों की शिक्षा के लिए सहायता और आकस्मिक मृत्यु की स्थिति में मुआवजे जैसी योजनाएं बनाएगा।

कंपनियों के लिए नियम

  • कंपनियों को 45 दिनों के भीतर खुद को और अपने सभी वर्कर्स को बोर्ड के पास रजिस्टर करना होगा।
  • कंपनियों को अपने एल्गोरिदम और काम देने के तरीकों में पारदर्शिता रखनी होगी।
  • अब कंपनियों को किसी वर्कर को निकालने से पहले लिखित कारण देना होगा और 14 दिन का नोटिस देना अनिवार्य होगा

इसकी आवश्यकता क्यों पड़ी?

गिग श्रमिकों को लंबे समय तक बिना किसी सुरक्षा के काम करना पड़ता था। बोर्ड की आवश्यकता के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:

  • सामाजिक सुरक्षा का अभाव: इन्हें तो पेंशन मिलती थी, ही पीएफ (PF) या स्वास्थ्य बीमा।
  • अनिश्चित आय: एल्गोरिदम आधारित काम के कारण इनकी आय स्थिर नहीं रहती।
  • मनमानी कटौती: कंपनियां बिना किसी पूर्व सूचना के कमीशन बढ़ा देती थीं या वर्कर की आईडी ब्लॉक कर देती थीं।
  • काम के जोखिम: सड़क दुर्घटनाओं और खराब मौसम में काम करने के बावजूद इन्हें कोई कानूनी सुरक्षा प्राप्त नहीं थी।

भारत में गिग वर्कर्स और गिग इकोनॉमी के आंकड़े

  • वर्तमान संख्या: नीति आयोग के अनुमानों और 2026 के आंकड़ों के अनुसार, भारत में वर्तमान में लगभग 1 करोड़ से अधिक गिग वर्कर्स हैं।
  • भविष्य का अनुमान: 2030 तक इस संख्या के बढ़कर 2.35 करोड़ होने की संभावना है।
  • आय का स्तर: आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, लगभग 40% गिग वर्कर्स की मासिक आय 15,000 रुपये से कम है।

अर्थव्यवस्था में योगदान और भविष्य की दिशा

  • योगदान: भारत की जीडीपी में गिग इकोनॉमी का योगदान लगातार बढ़ रहा है। यह विशेष रूप से शहरी उपभोक्ता सेवाओं की रीढ़ बन चुकी है।
  • बढ़ती संख्या के संकेत: यह इस बात की ओर इशारा करता है कि भारत का श्रम बाज़ार अब "वेतनभोगी रोज़गार" से "कौशल-आधारित फ्रीलांसिंग" की ओर बढ़ रहा है। यह युवाओं में उद्यमिता की भावना और कार्य में लचीलेपन की मांग को दर्शाता है।

संवैधानिक प्रावधान

भारतीय संविधान गिग वर्कर्स के अधिकारों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से सुरक्षा देता है:

  • अनुच्छेद 21: गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार।
  • अनुच्छेद 39: पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए समान काम के लिए समान वेतन और स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए राज्य के नीति निर्देशक तत्व।
  • अनुच्छेद 42: काम की न्यायसंगत और मानवीय परिस्थितियाँ सुनिश्चित करना।
  • अनुच्छेद 43: श्रमिकों के लिए निर्वाह मज़दूरी (Living Wage) सुनिश्चित करना।

विश्व में स्थिति बनाम भारत में कंपनियों के नियम

  • वैश्विक स्थिति: यूके और स्पेन जैसे देशों में अदालतों ने गिग वर्कर्स को 'कर्मचारी' (Employees) का दर्जा दिया है, जिससे उन्हें न्यूनतम मज़दूरी का अधिकार मिला है।
  • भारत में कंपनियों के नियम: भारत में कंपनियां इन्हें 'स्वतंत्र भागीदार' मानती हैं, जिससे वे श्रम कानूनों (जैसे ग्रेच्युटी, बोनस) की देनदारी से बच जाती हैं। हालांकि, नए सोशल सिक्योरिटी कोड 2020 के माध्यम से भारत अब इन्हें पहचान देने की कोशिश कर रहा है।

 प्रमुख विशेषताएं और श्रमिकों के अधिकार (कर्नाटक मॉडल)

  • सूचना का अधिकार: श्रमिकों को यह जानने का हक है कि एल्गोरिदम उनके काम को कैसे ट्रैक कर रहा है।
  • नोटिस की अनिवार्यता: बिना 14 दिन के नोटिस और उचित कारण के किसी वर्कर की आईडी ब्लॉक नहीं की जा सकती।
  • शिकायत निवारण: विवाद की स्थिति में वर्कर को बोर्ड के पास अपील करने का कानूनी अधिकार है।
  • हस्तांतरण सुरक्षा: एक प्लेटफॉर्म से दूसरे प्लेटफॉर्म पर जाने पर भी उनकी सामाजिक सुरक्षा की निरंतरता बनी रहेगी।

विश्लेषण

गिग वर्कर्स बोर्ड का गठन एक प्रगतिशील कदम है। यह 'डिजिटल प्लेटफॉर्म' और 'श्रमिक अधिकारों' के बीच संतुलन बनाने की कोशिश है। जहाँ एक तरफ यह कंपनियों की जवाबदेही तय करता है, वहीं दूसरी तरफ यह सुनिश्चित करता है कि इनोवेशन और तकनीक के नाम पर श्रमिकों का शोषण हो। हालांकि, एग्रीगेटर कंपनियों के लिए 1.5% का उपकर (Cess) उनकी लागत बढ़ा सकता है, जिसका असर अंततः उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है।

आगे की राह

  • राष्ट्रीय स्तर पर कानून: केवल राज्यों (राजस्थान, कर्नाटक) तक सीमित रहकर, केंद्र सरकार को 'सोशल सिक्योरिटी कोड' को प्रभावी ढंग से पूरे देश में लागू करना चाहिए।
  • कौशल विकास: गिग वर्कर्स को केवल डिलीवरी तक सीमित रखकर उन्हें डिजिटल कौशल सिखाया जाना चाहिए ताकि वे भविष्य में बेहतर अवसर पा सकें।
  • डेटा सुरक्षा: श्रमिकों के व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी एक बड़ी चुनौती है।

निष्कर्ष

गिग इकोनॉमी आधुनिक भारत की वास्तविकता है। कर्नाटक द्वारा 'गिग वर्कर्स वेलफेयर बोर्ड' का गठन इस अदृश्य कार्यबल को सम्मान और सुरक्षा देने की दिशा में एक क्रांतिकारी मील का पत्थर है। यदि इस मॉडल को सफलतापूर्वक लागू किया जाता है, तो यह केवल श्रमिकों के जीवन स्तर को सुधारेगा, बल्कि भारत को एक समावेशी और न्यायसंगत डिजिटल अर्थव्यवस्था बनाने में मदद करेगा।

सामान्य अध्ययन पेपर – III  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन

संदर्भ

जनवरी 2026 का महीना भारतीय मुद्रा बाजार के लिए अत्यधिक उतार-चढ़ाव वाला रहा है। वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता और भू-राजनीतिक बदलावों के बीच, भारतीय रुपया (INR) अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अपने अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुँच गया। यह स्थिति ऐसे समय में उत्पन्न हुई जब भारत अपना केंद्रीय बजट और आर्थिक समीक्षा प्रस्तुत करने की तैयारी कर रहा था।

गिरता रुपया

27 जनवरी 2026 के आसपास, रुपया डॉलर के मुकाबले ₹91.80 से 92.00 के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर गया। 30 जनवरी तक यह सुधरने से पहले ₹91.99 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर बंद हुआ। रुपये की इस कमजोरी ने केवल निवेशकों की चिंता बढ़ाई, बल्कि आयात लागत पर भी दबाव डाला।

चर्चा में क्यों?

  • ऐतिहासिक गिरावट: रुपया पहली बार 92 प्रति डॉलर के स्तर को छू गया।
  • आर्थिक समीक्षा 2026: वित्त मंत्री द्वारा पेश आर्थिक समीक्षा में रुपये की इस गिरावट को 'अस्थायी' बताया गया और कहा गया कि रुपया अपनी वास्तविक क्षमता से कम प्रदर्शन कर रहा है।
  • अमेरिकी टैरिफ: राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा विभिन्न देशों पर लगाए गए व्यापार शुल्क की घोषणाओं ने वैश्विक मुद्रा बाजार में डॉलर को अत्यधिक शक्तिशाली बना दिया।

गिरावट के मुख्य कारण

रुपये की इस कमजोरी के पीछे कई बहुआयामी कारक उत्तरदायी रहे हैं:

  • विदेशी पूंजी की निकासी (FPI ऑउटफ्लो): जनवरी 2026 में विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से लगभग 4 बिलियन की निकासी की।
  • मजबूत डॉलर इंडेक्स: अमेरिकी फेडरल रिजर्व के नए अध्यक्ष (केविन वॉर्श) के नाम की घोषणा और डॉलर को मजबूत रखने की अमेरिकी नीति ने अन्य मुद्राओं पर दबाव डाला।
  • व्यापार घाटा: भारत का वस्तुओं का व्यापार घाटा बढ़ने और निर्यात पर दबाव (विशेषकर अमेरिका द्वारा लगाए गए 50% टैरिफ के कारण) ने रुपये को कमजोर किया
  • भू-राजनीतिक तनाव: पश्चिम एशिया में अस्थिरता और व्यापार युद्ध की आशंकाओं ने निवेशकों को 'सुरक्षित' डॉलर की ओर मोड़ा।

मुद्रा मूल्यह्रास के प्रभाव और संकेत

जब रुपये की वैल्यू गिरती है, तो यह अर्थव्यवस्था के लिए मिश्रित संकेत देती है:

  • नकारात्मक प्रभाव: आयात (पेट्रोल, डीजल, इलेक्ट्रॉनिक्स) महंगे हो जाते हैं, जिससे 'आयातित मुद्रास्फीति' बढ़ती है।
  • सकारात्मक प्रभाव: भारतीय निर्यात (IT, कपड़ा, फार्मा) वैश्विक बाजार में सस्ते और प्रतिस्पर्धी हो जाते हैं।
  • संकेत: यह दर्शाता है कि वैश्विक स्तर पर डॉलर की मांग भारत की आपूर्ति से अधिक है और निवेशक भारतीय बाजार को लेकर वर्तमान में सतर्क हैं।

सरकार और आरबीआई द्वारा उठाए गए कदम

  • बाजार हस्तक्षेप: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने रुपये की अत्यधिक अस्थिरता को रोकने के लिए विदेशी मुद्रा भंडार से डॉलर की बिक्री की।
  • बजट 2026 प्रोत्साहन: बुनियादी ढांचे पर खर्च बढ़ाकर (12.2 लाख करोड़) विदेशी निवेशकों का भरोसा बहाल करने की कोशिश की गई।
  • व्यापार वार्ता: अमेरिका के साथ 'ट्रेड डील' के लिए सक्रिय कूटनीति ताकि टैरिफ के डर को कम किया जा सके।

आर्थिक समीक्षा

  • आर्थिक समीक्षा 2026 के अनुसार, रुपये की गिरावट केवल एक नकारात्मक खबर नहीं है।
  • इसे "Silver Lining" (आशा की किरण) के रूप में देखा जा रहा है क्योंकि यदि रुपया थोड़ा कमजोर रहता है, तो यह अमेरिका द्वारा लगाए गए 50% टैरिफ के प्रभाव को कुछ हद तक कम कर देता है।
  • कमजोर रुपया भारतीय माल को अमेरिका में अधिक प्रतिस्पर्धी बनाता है, जिससे निर्यातकों को राहत मिलती है।

'मूल्यह्रास' बनाम 'अवमूल्यन' सूक्ष्म अंतर

यद्यपि दोनों ही स्थितियों में मुद्रा की कीमत गिरती है, परंतु इनके पीछे की प्रक्रिया भिन्न है:

बिंदु

मूल्यह्रास

अवमूल्यन

कारक

बाजार की शक्तियों (मांग और आपूर्ति) द्वारा।

सरकार या केंद्रीय बैंक द्वारा जानबूझकर।

प्रणाली

यह 'फ्लोटिंग' एक्सचेंज रेट में होता है।

यह 'फिक्स्ड' एक्सचेंज रेट में होता है।

उद्देश्य

यह स्वाभाविक आर्थिक प्रक्रिया है।

जानबूझकर निर्यात बढ़ाने हेतु किया जाता है।

वर्तमान स्थिति

भारत में अभी मूल्यह्रास हो रहा है।

भारत ने अंतिम बार 1991 में किया था।

आगे की राह

  • निर्यात विविधीकरण: केवल अमेरिका पर निर्भर रहने के बजाय नए बाजारों (अफ्रीका, दक्षिण-पूर्व एशिया) की तलाश।
  • डॉलर पर निर्भरता कम करना: अंतरराष्ट्रीय व्यापार में रुपये के उपयोग को बढ़ावा देना।
  • ऊर्जा आत्मनिर्भरता: कच्चे तेल के आयात को कम करने के लिए EV और रिन्यूएबल एनर्जी में निवेश बढ़ाना।

निष्कर्ष

27 जनवरी 2026 को रुपये की गिरावट भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक चुनौतीपूर्ण क्षण था, लेकिन यह कोई संकट नहीं है। भारत के मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार और स्थिर GDP विकास दर को देखते हुए, रुपया जल्द ही अपनी वास्तविक स्थिति में लौटने की क्षमता रखता है। हालिया भारत-अमेरिका व्यापार समझौते की खबरों ने पहले ही रुपये में रिकॉर्ड रिकवरी शुरू कर दी है, जो भारतीय अर्थव्यवस्था के लचीलेपन का प्रमाण है।

सामान्य अध्ययन पेपर – III  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन

संदर्भ

भारत की बढ़ती अर्थव्यवस्था में 'लॉजिस्टिक' की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। वर्तमान में -कॉमर्स और शहरी माल ढुलाई का बड़ा हिस्सा लाइट कमर्शियल व्हीकल्स (LCVs)यानी 3.5 टन से कम वजन वाले ट्रकों द्वारा संचालित होता है। जहाँ एक ओर सरकार ने यात्री वाहनों के लिए 'कैफे' (CAFE) जैसे कड़े मानक पहले ही लागू कर दिए थे, वहीं LCVs अब तक किसी भी नियामक ढांचे से बाहर थे। इस शून्यता को भरने के लिए केंद्र सरकार ने एक नई और व्यापक नीति की रूपरेखा तैयार की है।

-एलसीवी क्या है?

  • -एलसीवी (e-LCV) का अर्थ है 'इलेक्ट्रिक लाइट कमर्शियल व्हीकल' ये ऐसे मालवाहक वाहन हैं जो पूरी तरह से बैटरी और इलेक्ट्रिक मोटर पर आधारित होते हैं। शहरों के भीतर प्रदूषण मुक्त और कम लागत वाली डिलीवरी के लिए इन्हें भविष्य का सबसे उपयुक्त विकल्प माना जा रहा है।

चर्चा में क्यों?

  • ब्यूरो ऑफ एनर्जी एफिशिएंसी (BEE) ने LCVs के लिए ईंधन खपत मानकों का एक आधिकारिक प्रस्ताव साझा किया।
  • यह प्रस्ताव 2027 से 2032 की अवधि के लिए लागू होगा। यह खबर चर्चा का विषय इसलिए है क्योंकि पहली बार छोटे व्यावसायिक वाहनों को कड़े उत्सर्जन लक्ष्यों के दायरे में लाया गया है, जो सीधे तौर पर डीजल वाहनों की जगह इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाने के लिए मजबूर करेगा।

लक्ष्य एवं मानक

प्रस्तावित नियमों के तहत निम्नलिखित मानक निर्धारित किए गए हैं:

  • उत्सर्जन लक्ष्य: एलसीवी बेड़े का औसत कार्बन उत्सर्जन 115 ग्राम CO2/किमी से कम करने का लक्ष्य रखा गया है।
  • ईंधन दक्षता: कंपनियों को 2022-23 की बेसलाइन की तुलना में अपनी औसत ईंधन खपत में लगभग 22% से 30% की कमी लानी होगी।
  • समय सीमा: ये नियम 1 अप्रैल 2027 से प्रभावी होंगे और अगले पांच वर्षों (2032 तक) के लिए औद्योगिक रोडमैप तैयार करेंगे।

-एलसीवी ट्रांजिशन के लिए यह "स्पार्क" क्यों है?

यह नीति केवल एक नियामक सीमा नहीं, बल्कि इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए एक 'उत्प्रेरक' का कार्य करेगी:

  • सुपर क्रेडिट सिस्टम: इलेक्ट्रिक एलसीवी बनाने वाली कंपनियों को अतिरिक्त 'क्रेडिट' मिलेंगे, जिससे उन्हें अपने समग्र बेड़े के उत्सर्जन लक्ष्यों को पूरा करने में आसानी होगी।
  • आर्थिक विवशता: डीजल इंजन में 30% दक्षता बढ़ाना बहुत खर्चीला है, जिससे इलेक्ट्रिक वाहन बनाना कंपनियों के लिए वित्तीय रूप से अधिक व्यवहार्य विकल्प बन जाएगा।

आवश्यकता एवं महत्व

  • ऊर्जा सुरक्षा: कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता को कम करना।
  • पर्यावरणीय प्रभाव: शहरी क्षेत्रों में बढ़ते वायु प्रदूषण और 'पार्टिकुलेट मैटर' (PM) को नियंत्रित करना।
  • लॉजिस्टिक लागत: परिचालन लागत कम होने से छोटे व्यापारियों और -कॉमर्स क्षेत्र को लाभ पहुँचेगा।

सभी आयामों पर प्रभाव

  • आर्थिक: छोटे व्यवसायों के लिए ईंधन पर होने वाले खर्च में भारी बचत।
  • सामाजिक: शहरी क्षेत्रों में शोर और धुएं से मुक्ति, जिससे जन-स्वास्थ्य में सुधार।
  • रणनीतिक: भारत का वैश्विक ऑटोमोबाइल निर्यात केंद्र के रूप में उभरना।

चुनौतियां एवं औद्योगिक प्रक्रिया

  • उच्च प्रारंभिक लागत: इलेक्ट्रिक ट्रकों की खरीद कीमत अभी भी डीजल ट्रकों से काफी अधिक है।
  • चार्जिंग ढांचा: वाणिज्यिक वाहनों के लिए बड़े और तेज चार्जिंग स्टेशनों की भारी कमी।
  • तकनीकी सीमाएं: भारी वजन ले जाने की स्थिति में इलेक्ट्रिक वाहनों की 'रेंज' एक बड़ी चिंता है।

पूर्ववर्ती सरकारी नीतियां

इससे पहले सरकार ने विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए निम्नलिखित कदम उठाए हैं:

  • FAME-II और PM E-DRIVE: इलेक्ट्रिक वाहनों पर सब्सिडी।
  • PLI योजना: ऑटोमोबाइल और एडवांस केमिस्ट्री सेल (ACC) के लिए उत्पादन आधारित प्रोत्साहन।
  • स्क्रैपेज  पॉलिसी: पुराने और प्रदूषण फैलाने वाले व्यावसायिक वाहनों को हटाने की नीति।

विश्लेषण

बजट और BEE के इन प्रस्तावों का विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट होता है कि भारत अब 'स्वैच्छिक बदलाव' से 'अनिवार्य परिवर्तन' की ओर बढ़ रहा है। अब तक कंपनियों के पास इलेक्ट्रिक वाहन बनाना एक विकल्प था, लेकिन 115 ग्राम CO2/किमी का लक्ष्य इसे एक अनिवार्यता बना देगा।

आगे की राह

  • बैटरी स्वैपिंग: एलसीवी के लिए बैटरी स्वैपिंग केंद्रों का विस्तार करना ताकि काम के घंटों में समय बचे।
  • ऋण सुगमता: छोटे ट्रांसपोर्टरों के लिए कम ब्याज दर पर 'ग्रीन लोन' की व्यवस्था।
  • कौशल विकास: मैकेनिकों और तकनीशियनों को इलेक्ट्रिक मोटर और बैटरी रिपेयर के लिए प्रशिक्षित करना।

निष्कर्ष

2027-2032 के ईंधन मानक भारतीय परिवहन के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित होंगे। यह नीति केवल पर्यावरण की रक्षा करेगी, बल्कि भारत को आधुनिक, स्वच्छ और किफायती परिवहन प्रणाली वाले विकसित राष्ट्रों की श्रेणी में खड़ा करेगी। -एलसीवी का यह 'स्पार्क' भारत के विनिर्माण क्षेत्र को नई ऊर्जा प्रदान करने के लिए तैयार है।

सामान्य अध्ययन पेपर – III  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन

संदर्भ

भारत की व्यापारिक यात्रा 'संरक्षणवाद' से 'रणनीतिक खुलेपन' की ओर बढ़ रही है। 1990 के दशक के आर्थिक सुधारों के बाद, भारत ने दक्षिण-पूर्व एशिया (ASEAN), जापान और दक्षिण कोरिया के साथ व्यापारिक समझौते किए। हाल के वर्षों में, भारत ने अपनी रणनीति बदली है, जिसका प्रमाण भारत-यूएई (CEPA) और भारत-ऑस्ट्रेलिया (ECTA) समझौते हैं।

  • भारत-ईयू एफटीए की वार्ता 2007 में शुरू हुई थी, लेकिन 'महत्वाकांक्षाओं के बेमेल' होने के कारण 2013 में इसे निलंबित कर दिया गया।
  • 2022 में वार्ता को फिर से पुनर्जीवित किया गया और 27 जनवरी 2026 को इसे अंतिम रूप दिया गया। यह समझौता भारत के 'एक्ट ईस्ट' से 'लुक वेस्ट' और अब 'ग्रो ग्लोबल' की नीति का प्रतिबिंब है।

'मदर ऑफ ऑल डील्स' क्या है?

इसे 'मदर ऑफ ऑल डील्स' इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि यह आर्थिक वजन के मामले में दुनिया का सबसे बड़ा व्यापार समझौता है।

  • यह दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था (भारत) और दुनिया के सबसे बड़े व्यापारिक गुट (ईयू) को जोड़ता है।
  • यह $24 ट्रिलियन के संयुक्त बाजार और 2 अरब लोगों की आबादी को कवर करता है, जो वैश्विक जीडीपी का लगभग 25% है।

चर्चा में क्यों?

  • हाल ही में भारत और यूरोपीय संघ ने 19 वर्षों के उतार-चढ़ाव के बाद मुक्त व्यापार समझौते (FTA) की वार्ता सफलतापूर्वक संपन्न की है।
  • इस ऐतिहासिक क्षण की घोषणा प्रधानमंत्री मोदी और यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने की।
  • वर्तमान में दस्तावेज़ का 'लीगल स्क्रबिंग' (कानूनी परिशोधन) चल रहा है, जिसके बाद इसे यूरोपीय संसद द्वारा अनुमोदित किया जाएगा।

समझौते के मुख्य बिंदु

  • असममित टैरिफ रियायतें: ईयू भारत के 99.5% उत्पादों पर तुरंत या बहुत जल्द शून्य शुल्क (0% Duty) लगाएगा। बदले में, भारत ईयू के 97.5% व्यापारिक मूल्य पर रियायतें देगा।
  • विशिष्ट उत्पादों पर प्रभाव: यूरोपीय लग्जरी कारों (110% से घटकर 10%) और वाइन (150% से घटकर 20-30%) की कीमतें कम होंगी।
  • संवेदनशील क्षेत्रों की सुरक्षा: भारत ने डेयरी, अनाज, और मुर्गी पालन जैसे कृषि क्षेत्रों को इससे बाहर रखा है ताकि भारतीय किसानों के हितों की रक्षा हो सके।

यह समझौता क्यों और अभी ही क्यों?

  • वैश्विक उथल-पुथल: अमेरिका की संरक्षणवादी नीतियों और रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच, दोनों शक्तियों को एक स्थिर और विश्वसनीय साझेदार की आवश्यकता थी।
  • चीन से 'डी-रिस्किंग': ईयू और भारत दोनों ही चीन पर अपनी आपूर्ति श्रृंखला की निर्भरता को कम करना चाहते हैं।
  • आर्थिक पूरकता: यूरोप के पास पूंजी और तकनीक है, जबकि भारत के पास बड़े पैमाने पर विनिर्माण क्षमता और कुशल युवा शक्ति है।

भारतीय संदर्भ में प्रभाव

  • रोजगार सृजन: कपड़ा, चमड़ा और रत्न-आभूषण जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों को यूरोपीय बाजार में शून्य शुल्क पहुंच मिलने से लाखों नए रोजगार पैदा होंगे।
  • मेक इन इंडिया: यूरोपीय उच्च-तकनीक मशीनरी का सस्ता आयात भारत के घरेलू उत्पादन को आधुनिक बनाएगा।
  • MSME को बढ़ावा: समझौते में एमएसएमई के लिए एक विशेष अध्याय है, जो छोटे उद्योगों को ग्लोबल वैल्यू चेन से जोड़ने के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म प्रदान करेगा।

अंतरराष्ट्रीय संबंध और कूटनीति

  • अमेरिका: यह समझौता अमेरिका को संदेश देता है कि भारत केवल एक ही ब्लॉक पर निर्भर नहीं है। यह भारत की 'रणनीतिक स्वायत्तता' को बढ़ाता है।
  • चीन: भारत-ईयू की बढ़ती निकटता चीन के आर्थिक प्रभुत्व के लिए एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि ईयू अब अपनी आपूर्ति श्रृंखला के लिए भारत को 'चीन प्लस वन' के रूप में देख रहा है।
  • पड़ोसी देश: भारत का बढ़ता आर्थिक कद दक्षिण एशिया में उसकी 'नेबरहुड फर्स्ट' नीति को और प्रभावी बनाएगा।

खुला बाजार:

जब विश्व व्यापार संगठन जैसी संस्थाएं कमजोर हो रही हैं, तब यह समझौता 'नियम-आधारित व्यापार' के लिए एक प्रकाश स्तंभ है। यह साबित करता है कि दो अलग-अलग आर्थिक स्तर वाले लोकतंत्र भी आपसी सहयोग से नियम तय कर सकते हैं। यह 'खुले व्यापार' के प्रति वैश्विक प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

बाधाओं को तोड़ना:

भारत के लिए सबसे बड़ी जीत 'मोड 4' (Mode 4) में है:

  • पेशेवरों की आवाजाही: भारतीय आईटी विशेषज्ञों, इंजीनियरों और स्वास्थ्य कर्मियों के लिए यूरोपीय संघ में काम करने के नियमों और वीजा प्रक्रियाओं को सरल बनाया गया है।
  • प्रतिभा का प्रवाह: यह समझौता केवल वस्तुओं का नहीं, बल्कि 'मानव संसाधन' का भी व्यापार है, जिससे यूरोप की 'स्किल शॉर्टेज' दूर होगी और भारत का 'रेमिटेंस' बढ़ेगा।

विश्लेषण

इस समझौते के कुछ चुनौतीपूर्ण पहलू भी हैं जिनका विश्लेषण आवश्यक है:

  • CBAM (कार्बन सीमा समायोजन तंत्र): ईयू का कार्बन टैक्स भारतीय स्टील और एल्युमीनियम निर्यातकों के लिए एक चुनौती बन सकता है।
  • गैर-टैरिफ बाधाएं: टैरिफ कम होने के बावजूद, ईयू के कड़े सैनिटरी और फाइटोसैनिटरी (SPS) मानक भारतीय कृषि निर्यात के लिए बाधा बन सकते हैं।
  • IPR (बौद्धिक संपदा): ईयू द्वारा दवाओं के डेटा एक्सक्लूसिविटी की मांग भारत के जेनेरिक दवा उद्योग के लिए चिंता का विषय हो सकती है।

आगे की राह

  • क्षमता निर्माण: भारतीय निर्यातकों, विशेषकर MSMEs को यूरोपीय मानकों के अनुरूप ढालने के लिए प्रशिक्षण और तकनीक सहायता दी जानी चाहिए।
  • लॉजिस्टिक्स में सुधार: भारत को अपने लॉजिस्टिक्स खर्च को कम करना होगा ताकि ईयू के बाजार में वियतनाम और बांग्लादेश जैसे देशों के साथ प्रतिस्पर्धा की जा सके।
  • सतत संवाद: CBAM और नियामक मानकों पर ईयू के साथ निरंतर बातचीत जारी रखनी चाहिए।

निष्कर्ष

भारत-यूरोपीय संघ एफटीए केवल एक व्यापारिक दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह 21वीं सदी की 'रणनीतिक साझेदारी' का एक नया ब्लूप्रिंट है। यह समझौता 'आत्मनिर्भर भारत' और 'विकसित भारत @2047' के लक्ष्यों को प्राप्त करने में उत्प्रेरक का काम करेगा। यह केवल आर्थिक समृद्धि लाएगा, बल्कि वैश्विक भू-राजनीति में भारत को एक निर्णायक शक्ति के रूप में स्थापित करेगा।

सामान्य अध्ययन पेपर  – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध

संदर्भ

भारतीय लोकतंत्र की नींव 'स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव' पर टिकी है, जिसके लिए एक त्रुटिहीन मतदाता सूची अनिवार्य है। हाल के समय में, भारत निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा शुरू की गई 'विशेष सघन पुनरीक्षण' (SIR) प्रक्रिया ने एक नई संवैधानिक बहस को जन्म दिया है। यह बहस मतदाता सूची में पंजीकरण के अधिकार की प्रकृति और नागरिकता के निरंतर सत्यापन के बीच संतुलन खोजने के इर्द-गिर्द घूमती है।

अनुच्छेद 326 क्या है?

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 326 'वयस्क मताधिकार' का आधार है। यह मुख्य रूप से निम्नलिखित प्रावधान करता है:

  • पात्रता: प्रत्येक व्यक्ति जो भारत का नागरिक है और जिसकी आयु 18 वर्ष (मूल रूप से 21 वर्ष, जिसे 61वें संशोधन 1988 द्वारा कम किया गया) से कम नहीं है, वह मतदाता के रूप में पंजीकृत होने का हकदार है।
  • अयोग्यता: यदि कोई व्यक्ति अनिवास, विकृत चित्त, अपराध या भ्रष्ट आचरण के आधार पर कानूनन अयोग्य नहीं है, तो उसे मताधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।

चर्चा में क्यों?

27 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट में विशेष सघन पुनरीक्षण (SIR) के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान निर्वाचन आयोग ने एक ऐतिहासिक बयान दिया:

  • आयोग का कथन: "मतदाता सूची में स्थान पाना एक 'अर्हता प्राप्त अधिकार' है, कि कोई निरपेक्ष अधिकार।"
  • सुप्रीम कोर्ट का रुख: कोर्ट ने कहा कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया को 'प्राकृतिक न्याय' के सिद्धांतों के अनुरूप होना चाहिए। न्यायालय ने निर्देश दिया कि आयोग को उन नामों को सार्वजनिक करना चाहिए जिनके खिलाफ 'तार्किक विसंगतियां' पाई गई हैं, ताकि वे अपना पक्ष रख सकें।

विशेष सघन पुनरीक्षण क्या है?

SIR निर्वाचन आयोग द्वारा किया जाने वाला एक समयबद्ध और घर-घर जाकर किया जाने वाला सत्यापन अभियान है।

  • उद्देश्य: फर्जी मतदाताओं, मृतकों, स्थानांतरित लोगों और विशेष रूप से 'अवैध अप्रवासियों' के नाम हटाना।
  • प्रक्रिया: बूथ स्तर के अधिकारी (BLO) व्यक्तिगत रूप से घरों का दौरा करते हैं और प्रगणन प्रपत्रों के माध्यम से डेटा सत्यापित करते हैं।

विश्लेषण: अनुच्छेद 326 और SIR

SIR को अनुच्छेद 326 के साथ जोड़कर देखने पर कुछ गंभीर विश्लेषणात्मक बिंदु उभरते हैं:

  • निरंतरता की शर्त: आयोग का तर्क है कि नागरिकता केवल पंजीकरण के समय की शर्त नहीं है, बल्कि मतदाता बने रहने के लिए इसे "निरंतर" पूरा करना आवश्यक है।
  • सत्यापन बनाम निर्धारण: आयोग ने स्पष्ट किया कि SIR नागरिकता का निर्धारण करने के लिए नहीं है (जो केंद्र सरकार का कार्य है), बल्कि यह केवल सत्यापन की प्रक्रिया है।

संवैधानिक और कानूनी आधार

इस पूरी प्रक्रिया का आधार निम्नलिखित कानूनी स्तंभ हैं:

  • अनुच्छेद 324: निर्वाचन आयोग को चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की व्यापक शक्ति देता है।
  • लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम (RPA), 1950 (धारा 16 और 19): यह धाराएं क्रमशः अयोग्यता और पंजीकरण की शर्तों को परिभाषित करती हैं।
  • निर्वाचक पंजीकरण नियम, 1960: यह मतदाता सूची की तैयारी और संशोधन की विस्तृत प्रक्रिया प्रदान करता है।

मामले का महत्व और लोकतंत्र पर प्रभाव

यह मामला केवल कागजी कार्रवाई नहीं है, बल्कि इसके गहरे लोकतांत्रिक निहितार्थ हैं:

  • लोकतांत्रिक शुचिता: त्रुटिपूर्ण सूची चुनाव परिणामों को प्रभावित कर सकती है, जिससे 'एक व्यक्ति-एक वोट' का सिद्धांत कमजोर होता है।
  • अधिकार बनाम सुरक्षा: यह व्यक्तिगत अधिकारों और राष्ट्रीय सुरक्षा (अवैध घुसपैठ रोकने) के बीच के संघर्ष को दर्शाता है।
  • समावेशिता: डर यह है कि इस प्रक्रिया में कहीं वास्तविक और गरीब नागरिक (जिनके पास दस्तावेज़ों की कमी है) मताधिकार से वंचित हो जाएं।

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

क्या अनुच्छेद 326 का उपयोग पहले भी हुआ है?

  • 1951-52: पहले आम चुनाव से पहले, प्रवासियों और शरणार्थियों के पंजीकरण के लिए गहन पुनरीक्षण किया गया था।
  • 1989 (61वां संशोधन): आयु सीमा घटाने के बाद देशव्यापी स्तर पर मतदाता सूचियों का पुनरीक्षण किया गया।
  • असम (2014-19): NRC के साथ-साथ मतदाता सूचियों के मिलान में अनुच्छेद 326 की व्याख्याओं का सहारा लिया गया था।

विश्लेषण

  • SIR प्रक्रिया को 'अप्रत्यक्ष एनआरसी' कहे जाने के कारण यह राजनीतिक रूप से संवेदनशील हो गई है।
  • आयोग के पास तकनीकी रूप से डेटा का मिलान करने की शक्ति है, लेकिन जब 20% आबादी (जैसा कि बंगाल में हुआ) को नोटिस दिए जाते हैं, तो यह 'प्रशासनिक अतिरेक' का प्रश्न खड़ा करता है।

आगे की राह

सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार भविष्य की रणनीति होनी चाहिए:

  • पारदर्शिता: विसंगतियों वाली सूचियों को ब्लॉक और वार्ड स्तर पर प्रदर्शित किया जाए।
  • प्रमाणों की स्वीकार्यता: राज्य द्वारा जारी दस्तावेज़ों (जैसे एडमिट कार्ड या स्थानीय निकाय प्रमाणपत्र) को साक्ष्य के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए।
  • प्रौद्योगिकी का उपयोग: आधार और मतदाता पहचान पत्र के मिलान में पूर्ण सुरक्षा और गोपनीयता सुनिश्चित की जाए।
  • BLO का प्रशिक्षण: प्रक्रिया को भेदभाव रहित बनाने के लिए अधिकारियों को संवेदनशील बनाया जाए।

निष्कर्ष

मतदाता सूची में पंजीकरण का अधिकार वास्तव में एक 'अर्हता प्राप्त संवैधानिक अधिकार' है। SIR का उद्देश्य त्रुटिहीन लोकतंत्र का निर्माण करना है, लेकिन इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि यह कितनी न्यायसंगत और पारदर्शी है। जैसा कि सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है, "प्रक्रिया केवल निष्पक्ष होनी चाहिए, बल्कि निष्पक्ष दिखनी भी चाहिए।" लोकतंत्र की मजबूती के लिए हर पात्र नागरिक का नाम सूची में होना और हर अपात्र का नाम बाहर होना अनिवार्य है।