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सेवा उत्पादन सूचकांक (ISP)


संदर्भ

सेवा क्षेत्र भारत के सकल मूल्य संवर्धन (GVA) में लगभग 53% का योगदान देता है, परंतु अब तक केवल औद्योगिक क्षेत्र के लिए IIP उपलब्ध था और सेवाओं के लिए कोई मासिक उच्च-आवृत्ति सूचकांक नहीं था।

सेवा उत्पादन सूचकांक (ISP) क्या है?

यह सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) द्वारा विकसित एक मासिक मैक्रोइकॉनॉमिक सूचकांक है, जो भारत के औपचारिक सेवा क्षेत्र के वास्तविक उत्पादन की अल्पकालिक मात्रात्मक वृद्धि को मापता है।

हाल ही में चर्चा में क्यों?

जुलाई 2026 में, सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) ने आधार वर्ष 2024-25 के साथ भारत का पहला 'सेवा उत्पादन सूचकांक (ISP)' का प्रायोगिक सूचकांक आधिकारिक तौर पर जारी किया है, जो देबजानी घोष की अध्यक्षता वाली तकनीकी सलाहकार समिति (TAC) की सिफारिशों पर आधारित है।

ISP से जुड़ी सभी प्रमुख बातें

  • जारीकर्ता एजेंसी: राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO), सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI)

  • आधार वर्ष: 2024-25 (यह नई CPI श्रृंखला से सुसंगत है)
  • आवृत्ति और समय-सीमा: मासिक आधार पर संकलित; संदर्भ माह के 60 दिनों के भीतर (प्रत्येक माह की 29 तारीख को) जारी किया जाएगा।
  • दायरा:
    • यह केवल औपचारिक सेवा क्षेत्र को कवर करता है।
    • इसमें 19 प्रमुख उप-क्षेत्र शामिल हैं (जैसे- थोक एवं खुदरा व्यापार, परिवहन, बैंकिंग, बीमा, दूरसंचार, रियल एस्टेट, आईटी आदि)
    • अपवाद: स्वास्थ्य और शिक्षा क्षेत्र (गैर-सरकारी) को ASISSE (सेवा क्षेत्र प्रतिष्ठानों का वार्षिक सर्वेक्षण) के आंकड़े आने के बाद बाद में जोड़ा जाएगा।

ISP की गणना कैसे की जाती है?

  • लासपेयरेस फॉर्मूला: ISP का संकलन एक फिक्स्ड-वेट लासपेयरेस वॉल्यूम इंडेक्स के आधार पर किया जाता है।

  • भार प्रणाली : प्रत्येक सेवा उप-क्षेत्र को उसके राष्ट्रीय सकल मूल्य संवर्धन (GVA) में योगदान के अनुपात में भार दिया जाता है।  
  • डेटा के स्रोत:
    • GST आउटवर्ड सप्लाइज डेटा: व्यापार, होटल, दूरसंचार आदि के लिए।
    • प्रशासनिक डेटा : रेलवे, नागरिक उड्डयन, बैंकिंग और बीमा के लिए।
  • मूल्य अपस्फीतिकारक: सेवा डेटा मूल्य के रूप में प्राप्त होता है, इसलिए मुद्रास्फीति का प्रभाव हटाने के लिए सीपीआई (नॉन-फूड), सीपीआई-सर्विसेज और डब्ल्यूपीआई जैसे अपस्फीतिकारकों का उपयोग करके इसे वास्तविक उत्पादन में बदला जाता है।

ISP का महत्व

  • डेटा अंतराल को भरना: IIP केवल विनिर्माण, खनन और बिजली को मापता है; ISP अर्थव्यवस्था के सबसे बड़े हिस्से (सेवा क्षेत्र) के मासिक प्रदर्शन को मापकर डेटा अंतराल को समाप्त करता है।

  • आर्थिक आकलन में सटीकता: उच्च-आवृत्ति डेटा उपलब्ध होने से तिमाही एवं वार्षिक जीडीपी (GDP) अनुमानों की गुणवत्ता और सटीकता में सुधार होगा।
  • मौद्रिक एवं राजकोषीय नीति का सुदृढ़ीकरण: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और वित्त मंत्रालय को मुद्रास्फीति तथा विकास के रुझानों का समय पर सटीक आकलन करने में मदद मिलेगी।

ISP की उपयोगिता

  • साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण: सरकार को सेवा क्षेत्र के विशिष्ट उद्योगों (जैसे IT, परिवहन, पर्यटन) के लिए समय पर लक्षित नीतियां बनाने में सहायता मिलती है।

  • व्यावसायिक और निवेश संबंधी निर्णय: निजी निवेशकों और विश्लेषकों को अर्थव्यवस्था के वास्तविक सेवा मांग रुझानों का मासिक अद्यतन प्राप्त होता है।
  • अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप: IMF और संयुक्त राष्ट्र (UN) के अंतर्राष्ट्रीय आधिकारिक सांख्यिकी मानकों के अनुकूल डेटा ढांचा तैयार होता है।

निष्कर्ष

सेवा उत्पादन सूचकांक (ISP) का शुभारंभ भारत के सांख्यिकीय ढांचे में एक ऐतिहासिक सुधार है। यह केवल अर्थव्यवस्था के सबसे गतिशील घटक 'सेवा क्षेत्र' की रीयल-टाइम निगरानी सुनिश्चित करेगा, बल्कि नीति निर्माताओं को अधिक सटीक, समयबद्ध और साक्ष्य-आधारित आर्थिक निर्णय लेने में सशक्त बनाएगा।


थुक्काच्ची आबाथसहायेश्वरर मंदिर जीर्णोद्धार एवं यूनेस्को पुरस्कार

संदर्भ

सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण, ऐतिहासिक प्रामाणिकता को बनाए रखने और स्थानीय समुदायों की भागीदारी को प्रोत्साहित करने के लिए यूनेस्को द्वारा प्रतिवर्ष एशिया-प्रशांत क्षेत्र में उत्कृष्ट संरक्षण कार्यों को सम्मानित किया जाता है।

हाल ही में चर्चा में क्यों?

यूनेस्को पुरस्कार की सटीक घोषणा: तमिलनाडु के तंजावुर जिले में स्थित थुक्काच्ची के 'आबाथसहायेश्वरर मंदिर संरक्षण परियोजना' को 'यूनेस्को एशिया-प्रशांत सांस्कृतिक विरासत संरक्षण पुरस्कार 2024' के अंतर्गत " अवार्ड ऑफ डिस्टिंक्शन" प्रदान किया गया है।

  • ऐतिहासिक प्रामाणिकता एवं तकनीक: यह सम्मान मंदिर की ऐतिहासिक प्रामाणिकता को अक्षुण्ण रखते हुए पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक तकनीकों जैसे डिजिटल मैपिंग, ड्रोन सर्वे, तथा ऐनास्टिलोसिस का उपयोग करके किए गए वैज्ञानिक पुनरुद्धार के लिए दिया गया है।
  • लंबे उपेक्षा काल का अंत: लगभग छह दशकों तक जर्जर, उपेक्षित और वनस्पतियों से ढकी रही इस 12वीं सदी की धरोहर का हाल के वर्षों में सफलतापूर्वक वैज्ञानिक संरक्षण किया गया है।

थुक्काच्ची मंदिर (आबाथसहायेश्वरर मंदिर) के बारे में संपूर्ण विवरण

  • स्थान / अवस्थिति: तमिलनाडु के तंजावुर जिले में कुंभकोणम के समीप 'थुक्काच्ची' गाँव में स्थित।

  • मुख्य देवता एवं प्रतिमाएँ:
    • यह भगवान शिव को समर्पित मंदिर है, जिन्हें यहाँ 'आबाथसहायेश्वरर' (आपत्ति/संकट में सहायता करने वाले ईश्वर) के रूप में पूजा जाता है।
    • मंदिर परिसर में भगवान शिव के एक दुर्लभ रूप 'शरभेश्वरर' की अत्यंत प्राचीन और विशिष्ट प्रतिमा भी स्थापित है।
  • निर्माण काल एवं शासक:
    • निर्माण: 12वीं शताब्दी ईस्वी
    • राजवंश: यह उत्तरवर्ती चोल राजवंश के शासनकाल की उत्कृष्ट कृति है। विशेष रूप से यह चोल सम्राट कुलोत्तुंग प्रथम और विक्रम चोल के संरक्षण शासनकाल से संबद्ध है।
  • स्थापत्य शैली:
    • द्रविड़ शैली की 'कारा कोविल'उपशैली: यह मंदिर द्रविड़ वास्तुकला की विशेष 'कारा कोविल' योजना का एक दुर्लभ और उत्कृष्ट उदाहरण है।
    • रथाकार  गर्भगृह: मंदिर की मुख्य पहचान इसका रथाकार गर्भगृह है, जिसमें नक्काशीदार पहिये और घोड़े/हाथी उकेरे गए हैं, जो संपूर्ण मंदिर को एक खींचते हुए रथ का रूप देते हैं।
    • संरक्षण तकनीक: मंदिर के ढहे हुए विशाल ग्रेनाइट ब्लॉकों को बिना नुकसान पहुँचाए ऐनास्टिलोसिस तकनीक (जहाँ गिरे हुए मूल पत्थरों को चिह्नों नक्शों के आधार पर पुनः उनके मूल स्थान पर स्थापित किया जाता है) द्वारा जोड़ा गया है।
    • अन्य संरचनाएँ: विशाल अलंकृत गोपुरम, बाहरी प्राकार दीवारें, महामंडपम और परिसर में स्थित देवी काली का मंदिर।


निष्कर्ष

थुक्काच्ची का आबाथसहायेश्वरर मंदिर उत्तरवर्ती चोलों के स्थापत्य वैभव और कलात्मक निपुणता का अनूठा उदाहरण है। दीर्घकालिक उपेक्षा के बाद 'ऐनास्टिलोसिस' जैसी वैज्ञानिक तकनीकों और पारंपरिक शिल्प कौशल के संगम से इसका पुनरुद्धार होना और इसे 'यूनेस्को एशिया-प्रशांत सांस्कृतिक विरासत संरक्षण पुरस्कार' मिलना भारत के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। यह परियोजना यह सिद्ध करती है कि आधुनिक तकनीक (जैसे ड्रोन सर्वे डिजिटल मैपिंग) और पारंपरिक ज्ञान का संतुलन भारत की जीवंत विरासत को अक्षुण्ण रखने का सबसे प्रभावी मार्ग है।

कुडनकुलम न्यूक्लियर प्लांट डेटा लीक: भारत में साइबर सुरक्षा और एक विस्तृत विश्लेषण

सामान्य अध्ययन पेपर – III  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन।

संदर्भ

डिजिटल क्रांति के इस दौर में जहाँ एक ओर सूचना प्रौद्योगिकी ने मानव जीवन को सुगम बनाया है, वहीं दूसरी ओर बुनियादी ढाँचे की इंटरनेट पर निर्भरता ने सुरक्षा संबंधी गंभीर चुनौतियाँ भी खड़ी की हैं। आधुनिक युग में डेटा को "नया ईंधन" माना जाता है। ऐसे में किसी भी देश की रणनीतिक संपत्तियों, ऊर्जा संयंत्रों और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े संस्थानों की सुरक्षा केवल शारीरिक होकर साइबर स्पेस तक विस्तृत हो चुकी है। हाल की घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि साइबर हमले केवल वित्तीय धोखाधड़ी तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ये राष्ट्रीय संप्रभुता और सामरिक अवसंरचना के लिए बड़ा खतरा बन चुके हैं।

साइबर अपराध क्या है?

साइबर अपराध से तात्पर्य ऐसी गैर-कानूनी गतिविधियों से है जहाँ कंप्यूटर, नेटवर्क या डिजिटल उपकरणों का उपयोग किसी अपराध को अंजाम देने के लिए एक 'माध्यम' या 'लक्ष्य' के रूप में किया जाता है।

  • लक्ष्य के रूप में: जब किसी सिस्टम या नेटवर्क को हैक करना, वायरस/रैंसमवेयर फैलाना या सर्वर को ठप करना (DoS/DDoS) उद्देश्य हो।
  • साधन के रूप में: जब डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग धोखाधड़ी, पहचान की चोरी, साइबर-जासूसी या फिरौती माँगने के लिए किया जाता है।

चर्चा का कारण:

हाल ही में कुडनकुलम न्यूक्लियर पावर प्लांट (KKNPP) से संबंधित महत्वपूर्ण परिचालन डेटा  के लीक होने की खबर के कारण भारत की साइबर सुरक्षा और रणनीतिक अवसंरचना की संवेदनशीलता एक बार फिर चर्चा के केंद्र में गई है।

  • मुख्य बिंदु:
    • डार्क वेब पर 'वर्ल्ड लीक्स'  नामक प्लेटफ़ॉर्म के माध्यम से लगभग 14.3 GB संवेदनशील डेटा लीक होने का दावा किया गया।
    • रिपोर्टों के अनुसार, यह घुसपैठ रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड के डेटा/नेटवर्क सिस्टम के माध्यम से हुई, जिसमें पावर प्लांट के परिचालन संबंधी दस्तावेज शामिल थे।
    • साइबर अपराधियों द्वारा फिरौती मिलने की स्थिति में डेटा को डार्क वेब पर सार्वजनिक रूप से लीक कर दिया गया।

कुडनकुलम न्यूक्लियर पावर प्लांट:

  • अवस्थिति: यह संयंत्र तमिलनाडु के तिरुनेलवेली जिले में स्थित है।

  • महत्व: यह भारत का सबसे बड़ा परमाणु ऊर्जा केंद्र है, जिसका निर्माण रूस के राज्य परमाणु ऊर्जा निगम के तकनीकी सहयोग से किया गया है।
  • क्षमता: यहाँ 1000 मेगावॉट (MW) की दो VVER-1000 परमाणु इकाइयाँ कार्यरत हैं तथा अन्य इकाइयों का निर्माण कार्य जारी है।
  • सुरक्षा दृष्टिकोण: परमाणु संयंत्र राष्ट्र के 'अति-महत्वपूर्ण सूचना अवसंरचना' (CII) का हिस्सा हैं। यहाँ किसी भी प्रकार का साइबर हस्तक्षेप केवल ऊर्जा आपूर्ति बाधित कर सकता है, बल्कि परमाणु सुरक्षा और राष्ट्रीय संप्रभुता के लिए गंभीर संकट पैदा कर सकता है।

तकनीकी अवधारणाएँ: रैंसमवेयर, डार्क वेब और वर्ल्ड लीक्स

इन घटनाओं के तकनीकी स्वरूप को समझने के लिए निम्नलिखित अवधारणाओं का परस्पर संबंध जानना आवश्यक है:

  • रैंसमवेयर: यह एक प्रकार का दुर्भावनापूर्ण सॉफ़्टवेयर (मैलवेयर) है जो पीड़ित के कंप्यूटर, सर्वर या डेटा फाइलों को एनक्रिप्ट (लॉक) कर देता है। अपराधी इस डेटा को डि-क्रिप्ट करने के बदले 'फिरौती' की माँग करते हैं।
  • डार्क वेब: यह इंटरनेट का वह भाग है जिसे सामान्य सर्च इंजनों द्वारा एक्सेस नहीं किया जा सकता। इसे विशेष ब्राउज़र (जैसे Tor) के माध्यम से चलाया जाता है। यहाँ एनक्रिप्शन और पहचान गुप्त रहने के कारण साइबर अपराधी अवैध व्यापार और डेटा लीक के लिए इसका उपयोग करते हैं।
  • वर्ल्ड लीक्स: यह डार्क वेब पर सक्रिय एक अवैध डेटा-लीक प्लेटफ़ॉर्म/साइट है, जहाँ रैंसमवेयर गिरोह फिरौती देने वाली पीड़ित संस्थाओं का चोरी किया गया डेटा सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित और नीलाम करते हैं।

साइबर अपराधी रैंसमवेयर के ज़रिए किसी सहयोगी संस्था का डेटा एनक्रिप्ट चोरी करते हैं, फिरौती मिलने पर डार्क वेब पर स्थित 'वर्ल्ड लीक्स' जैसी साइटों पर उस डेटा को लीक कर देते हैं।

साइबर अपराध रोकने हेतु कानूनी प्रावधान

भारत में साइबर सुरक्षा और डेटा संरक्षण के लिए कानूनी ढाँचा निम्नलिखित कानूनों पर आधारित है:

  • सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (IT एक्ट , 2000):
    • धारा 43 एवं 66: अनधिकृत पहुँच, हैकिंग और डेटा चोरी के लिए दंड।
    • धारा 66F (साइबर आतंकवाद): राष्ट्र की एकता, अखंडता, सुरक्षा या संप्रभुता को खतरा पहुँचाने अथवा CII (धारा 70 के तहत परिभाषित) को नुकसान पहुँचाने वाले साइबर हमलों के लिए आजीवन कारावास का प्रावधान।
    • धारा 70 एवं धारा 70A (अंतर): धारा 70 अति-महत्वपूर्ण सूचना अवसंरचना (CII) को परिभाषित करती है और किसी सिस्टम को "संरक्षित प्रणाली" घोषित करने की शक्ति देती है। जबकि धारा 70A राष्ट्रीय नोडल एजेंसी के रूप में NCIIPC के गठन और उसके अधिकारों का प्रावधान करती है।
  • डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 (DPDP एक्ट , 2023):
    • डेटा की सुरक्षा में गंभीर चूक होने पर संस्थाओं पर ₹250 करोड़ तक के भारी वित्तीय जुर्माने का आधिकारिक प्रावधान है (धारा 8(5))
    • डेटा लीक की सूचना डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड और प्रभावित व्यक्तियों को देने पर ₹200 करोड़ तक के दंड का प्रावधान है (धारा 8(6))
  • भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS): पारंपरिक अपराधों के साथ-साथ डिजिटल माध्यमों से की जाने वाली धोखाधड़ी, वित्तीय धोखाधड़ी और पहचान की चोरी से निपटने के लिए सख्त प्रावधान जोड़े गए हैं।

संवैधानिक प्रावधान

यद्यपि भारतीय संविधान में "साइबर सुरक्षा" शब्द का प्रत्यक्ष उल्लेख नहीं है, लेकिन इसके सिद्धांत संविधान के विभिन्न अनुच्छेदों से जुड़े हैं:

  • अनुच्छेद 21 (प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार): के.एस. पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ (2017) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने 'निजता के अधिकार' को मूल अधिकार घोषित किया। डिजिटल डेटा और नागरिकों के व्यक्तिगत रिकॉर्ड की सुरक्षा इसका अनिवार्य हिस्सा है।
  • अनुच्छेद 19(2): वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर 'भारत की संप्रभुता और अखंडता', 'राज्य की सुरक्षा' और 'लोक व्यवस्था' के आधार पर युक्तियुक्त निर्बंधन लगाए जा सकते हैं, जो साइबर स्पेस पर भी लागू होते हैं।
  • सातवीं अनुसूची: 'पुलिस' और 'लोक व्यवस्था' राज्य सूची के विषय हैं, जबकि 'संचार, डाक-तार और प्रौद्योगिकी' संघ सूची के अंतर्गत आते हैं। अतः साइबर सुरक्षा में केंद्र-राज्य समन्वय अनिवार्य है।

अद्यतन आंकड़े एवं प्रामाणिक रिपोर्टें

  • राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB):

    • NCRB की आधिकारिक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में साइबर अपराधों के दर्ज मामलों में 31.2% की वार्षिक वृद्धि दर्ज की गई (मामले 65,893 से बढ़कर 86,420 पहुँचे)
    • दर्ज साइबर अपराधों में से 68.9% मामले धोखाधड़ी और ऑनलाइन वित्तीय धोखाधड़ी से संबंधित थे।
  • CERT-In (भारतीय कंप्यूटर आपातकालीन प्रतिक्रिया दल) आधिकारिक आँकड़े:
    • CERT-In (धारा 70B के तहत स्थापित) द्वारा दर्ज और हल की गई साइबर सुरक्षा घटनाओं की संख्या 29.44 लाख (2025 तक) के पार पहुँच चुकी है, जिनमें सरकारी विभागों और CII पर रैंसमवेयर तथा फ़िशिंग हमलों की बढ़ती तीव्रता स्पष्ट होती है।
  • सोफोस:
    • सोफोस की 2023 की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 73% संगठनों ने रैंसमवेयर हमलों का सामना किया था (जो कि 2024 में घटकर 64% और हालिया 2026 की रिपोर्ट में लगभग 48% के स्तर पर दर्ज हुआ है, जिससे सुरक्षा सुधार के संकेत मिलते हैं)
  • सिस्को (साइबर सुरक्षा तैयारी सूचकांक):
    • सिस्को के रेडीनेस इंडेक्स के अनुसार, भारत में केवल 7% संगठन ही आधुनिक और जटिल साइबर खतरों से निपटने के लिए 'परिपक्व' सुरक्षा श्रेणी में आते हैं।

सरकार की अन्य महत्वपूर्ण पहलें

  • CERT-In: IT एक्ट  की धारा 70B के तहत गठित साइबर सुरक्षा घटनाओं की चेतावनी देने, प्रतिक्रिया देने और आपातकालीन उपाय करने वाली राष्ट्रीय नोडल एजेंसी।

  • NCIIPC (नेशनल क्रिटिकल इन्फॉर्मेशन इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोटेक्शन सेंटर):
    • यह राष्ट्रीय तकनीकी अनुसंधान संगठन (NTRO) की एक समर्पित इकाई है, जो सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) के अधीन कार्य करती है और IT एक्ट  की धारा 70A के तहत नोडल एजेंसी है।
    • NCIIPC के आधिकारिक रूप से पहचाने गए मुख्य क्षेत्र हैं: 1. विद्युत एवं ऊर्जा, 2. बैंकिंग, वित्तीय सेवाएँ एवं बीमा (बीएफएसआई), 3. दूरसंचार, 4.परिवहन, 5.सरकार, 6.सामरिक एवं सार्वजनिक उपक्रम (जिसके अंतर्गत परमाणु एवं रक्षा अवसंरचनाएँ शामिल हैं), 7.स्वास्थ्य सेवा
  • I4C (इंडियन साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर): गृह मंत्रालय (MHA) के अधीन साइबर अपराधों से व्यापक, समन्वित और प्रभावी तरीके से निपटने के लिए स्थापित केंद्र।
  • साइबर सुरक्षित भारत पहल: मंत्रालयों और PSU के मुख्य सूचना सुरक्षा अधिकारियों (CISOs) तथा IT टीमों को साइबर सुरक्षा का प्रशिक्षण देने की पहल।
  • राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा नीति: भारत के संपूर्ण साइबर स्पेस को सुरक्षित, विश्वसनीय और लचीला बनाने के लिए एकीकृत नीतिगत ढाँचा।

अंतरराष्ट्रीय कानून और व्यवस्थाएँ

  • बुडापेस्ट कन्वेंशन: साइबर अपराध पर एकमात्र अंतर्राष्ट्रीय बहुपक्षीय संधि, जो कंप्यूटर अपराधों के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देती है। भारत संप्रभुता और डेटा-शेयरिंग संबंधी चिंताओं के कारण वर्तमान में इसका सदस्य/हस्ताक्षरकर्ता नहीं है।

  • संयुक्त राष्ट्र जीजीई (ग्रुप ऑफ गवर्नमेंटल एक्सपर्ट्स) एवं ओईडब्ल्यूजी (ओपन-एंडेड वर्किंग ग्रुप)साइबर स्पेस में राज्यों के जिम्मेदार आचरण के लिए अंतर्राष्ट्रीय मानदंडों और नियमों के निर्माण हेतु UN के मंच।
  • पेरिस कॉल (पेरिस कॉल फॉर ट्रस्ट एंड सिक्योरिटी इन साइबरस्पेस): साइबर स्पेस में सुरक्षा, विश्वास और बुनियादी ढाँचे की सुरक्षा को बढ़ावा देने की वैश्विक पहल।
  • INTERPOL साइबर अपराध कार्यक्रम: विश्व स्तर पर साइबर अपराधियों के नेटवर्क का पता लगाने और पुलिस एजेंसियों के बीच खुफिया जानकारी साझा करने की व्यवस्था।

अन्य महत्वपूर्ण बिंदु

  • तृतीय-पक्ष विक्रेता जोखिम: कुडनकुलम जैसी घटनाओं से यह स्पष्ट होता है कि मुख्य परमाणु/रणनीतिक संस्थान स्वयं सुरक्षित (एयर-गैप्ड) हो सकते हैं, लेकिन उनके ठेकेदारों या थर्ड-पार्टी सहयोगी कंपनियों के कमजोर सिस्टम संपूर्ण सुरक्षा शृंखला में सबसे कमजोर कड़ी बन जाते हैं।

  • एयर-गैप्ड सिस्टम की सीमाएँ : यद्यपि परमाणु संयंत्रों के परिचालन नियंत्रण कक्ष इंटरनेट से कटे (एयर-गैप्ड) होते हैं, फिर भी प्रशासनिक फाइलों, मेंटेनेंस टूल्स या वेंडर नेटवर्क के माध्यम से संवेदनशील डेटा लीक होने का खतरा बना रहता है।
  • साइबर कौशल की कमी: भारत में उद्योग की आवश्यकताओं के अनुरूप योग्य और प्रशिक्षित साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों की भारी कमी है।

विश्लेषण

कुडनकुलम संयंत्र से जुड़ा हालिया डेटा लीक यह दर्शाता है कि भारत का अति-महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचा (CII) केवल प्रत्यक्ष साइबर हमलों से ही नहीं, बल्कि आपूर्ति शृंखला की सुरक्षा कमियों से भी अति-संवेदनशील है। यह घटना स्पष्ट करती है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के दृष्टिकोण से केवल भौतिक सीमा सुरक्षा पर्याप्त नहीं है, बल्कि एक मजबूत और अभेद्य 360-डिग्री डिजिटल सुरक्षा आवरण अनिवार्य हो चुका है।

आगे की राह

  • अनिवार्य आपूर्ति शृंखला ऑडिट: महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे से जुड़ी सभी निजी और तृतीय-पक्ष वेंडर कंपनियों के लिए अनिवार्य और कड़े साइबर सुरक्षा ऑडिट लागू किए जाने चाहिए।

  • शून्य-विश्वास मॉडल: सभी सरकारी और रणनीतिक संस्थानों में 'जीरो ट्रस्ट' मॉडल अपनाया जाए, जहाँ हर नेटवर्क रिक्वेस्ट और यूजर एक्सेस को हर स्तर पर बार-बार सत्यापित करना अनिवार्य हो।
  • AI और ML आधारित थ्रेट डिटेक्टर्स: साइबर हमलों की वास्तविक समय में पहचान और त्वरित बचाव के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और मशीन लर्निंग (ML) आधारित सुरक्षा प्रणालियों का उपयोग बढ़ाना।
  • नियमित साइबर हाइजीन एवं मॉक ड्रिल: सभी रणनीतिक संस्थानों के कर्मचारियों और वेंडरों के लिए नियमित 'साइबर हाइजीन' प्रशिक्षण तथा साइबर हमले से निपटने के लिए सिम्युलेटेड मॉक ड्रिल आयोजित की जानी चाहिए।


निष्कर्ष

कुडनकुलम डेटा लीक घटना भारत के लिए एक गंभीर चेतावनी है कि 21वीं सदी के युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं, बल्कि साइबर स्पेस और डिजिटल अवसंरचना पर लड़े जाएंगे। डिजिटल रूप से सशक्त भारत के सपने को सुरक्षित रखने के लिए राष्ट्रीय बुनियादी ढाँचे की साइबर सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी। जब तक अत्याधुनिक तकनीकी नवाचार, कड़े कानूनी प्रवर्तन और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग का सही संतुलन स्थापित नहीं होता, तब तक राष्ट्रीय सुरक्षा को पूर्ण रूप से सुरक्षित नहीं माना जा सकता।

व्यापार घाटा बनाम निर्यात वृद्धि: भारत की आर्थिक रणनीतियों का समग्र विश्लेषण

सामान्य अध्ययन पेपर – III:  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन।

संदर्भ

वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं और पश्चिम एशिया के संकट के बीच किसी भी राष्ट्र की आर्थिक स्थिरता उसके अंतर्राष्ट्रीय व्यापार संतुलन पर निर्भर करती है। जून 2026 के हालिया व्यापार आंकड़े यह स्पष्ट करते हैं कि भारत बाह्य आघातों का सामना करते हुए अपनी निर्यात क्षमताओं को संरचनात्मक रूप से मजबूत कर रहा है।

भारत का निर्यात परिदृश्य

भारत का निर्यात क्षेत्र वर्तमान में एक परिवर्तनकारी दौर से गुजर रहा है, जहाँ पेट्रोलियम-इतर वस्तुओं और विनिर्मित सामानों का योगदान बढ़ रहा है। भारतीय निर्यातकों ने केवल पारंपरिक बाजारों को बनाए रखा है, बल्कि पश्चिम एशिया संकट के बावजूद दुनिया के अन्य सभी क्षेत्रों में अपने निर्यात का तेजी से विविधीकरण किया है।

चर्चा में क्यों?

जून 2026 के व्यापार आंकड़े निम्नलिखित प्रमुख बिंदुओं के कारण चर्चा के केंद्र में हैं:

  • व्यापार घाटे में भारी उछाल: जून 2026 में भारत के व्यापार घाटे में 430% की भारी वृद्धि दर्ज की गई।
  • आयात में तीव्र वृद्धि: घाटे में वृद्धि का मुख्य कारण कच्चे तेल, सोने, उर्वरक और इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं के आयात मूल्य में अचानक आई तेजी है।
  • मजबूत निर्यात प्रदर्शन: व्यापार घाटा बढ़ने के बावजूद भारत के मर्चेंडाइज (वस्तु) निर्यात में जून और वित्तीय वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही (Q1) के दौरान शानदार वृद्धि देखी गई।
  • शुल्क कटौती का निर्णय: सरकार ने हाई-एंड इलेक्ट्रॉनिक्स (जैसे स्मार्टफोन, लैपटॉप) के निर्माण को बढ़ावा देने के लिए डिस्प्ले असेंबली, लिथियम-आयन सेल और इंडक्टर कॉइल मॉड्यूल पर बुनियादी सीमा शुल्क समाप्त कर दिया है।
  • मुख्य आर्थिक सलाहकार की चेतावनी: मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंथा नागेश्वरन ने आगाह किया है कि ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCC) जैसे सेवा क्षेत्रों में सफलता को अंतिम नहीं माना जाना चाहिए और आत्मसंतुष्टि से बचना चाहिए।

वर्तमान प्रमुख आंकड़े

  • आयात एवं व्यापार घाटा:

  • व्यापार घाटा: जून में 430% की उछाल।
  • कच्चा तेल आयात: जून 2026 में कच्चे तेल के आयात मूल्य में 40% की वृद्धि।
  • उर्वरक आयात: पिछले जून की तुलना में उर्वरक आयात के मूल्य में 201% की भारी वृद्धि।
  • सोना एवं इलेक्ट्रॉनिक्स: पश्चिम एशिया अनिश्चितता मई में सीमा शुल्क दोगुना होने से सोने के आयात मूल्य में वृद्धि; घरेलू विनिर्माण को गति देने हेतु इलेक्ट्रॉनिक्स घटकों का अधिक आयात।
  • मर्चेंडाइज निर्यात:
  • जून 2026 मर्चेंडाइज निर्यात वृद्धि: 15.5%
  • वित्त वर्ष 2026-27 (Q1) निर्यात वृद्धि: 16.0%
  • गैर-पेट्रोलियम निर्यात (जून): 16.5% की मजबूत वृद्धि।
  • गैर-पेट्रोलियम निर्यात (Q1): 12.4% की वृद्धि।
  • सेवा निर्यात:
  • जून 2026 सेवा निर्यात वृद्धि: 2.9%
  • वित्त वर्ष 2026-27 (Q1) सेवा निर्यात वृद्धि: 6.2%

कारण, प्रभाव एवं चिंताएं

  • कारण:

  • व्यापार घाटा बढ़ने के कारण: वैश्विक बाजार में तेल की आसमान छूती कीमतें, पश्चिम एशिया संकट के कारण प्राकृतिक गैस की कमी से उर्वरक आयात पर निर्भरता, तथा सोने की वैश्विक कीमतों में वृद्धि।
  • इलेक्ट्रॉनिक्स आयात का कारण: भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स असेंबली और विनिर्माण का तेजी से विस्तार होना, जिससे विदेशी स्पेयर पार्ट्स की मांग बढ़ी है।
  • निर्यात वृद्धि का कारण: भारतीय निर्यातकों द्वारा व्यापारिक मार्गों और बाजारों का त्वरित विविधीकरण तथा मात्रा मूल्य दोनों में वृद्धि।
  • प्रभाव:
  • उच्च आयात बिल के कारण अल्पकालिक समय के लिए चालू खाता घाटे (CAD) पर दबाव।
  • भारत की घरेलू विनिर्माण इकाई (जैसे स्मार्टफोन लैपटॉप निर्माण) को आवश्यक कच्चे माल की सुगम उपलब्धता।
  • वैश्विक अनिश्चितता के बावजूद भारतीय निर्यात की बढ़ती प्रतिस्पर्धात्मकता।
  • चिंताएं:
  • सेवा क्षेत्र की सुस्ती: सेवा निर्यात में जून के दौरान केवल 2.9% की वृद्धि देखी गई, जो चिंताजनक है।
  • आपूर्ति श्रृंखला संवेदनशीलता: महत्वपूर्ण घटकों और उर्वरकों के लिए विदेशी आपूर्ति श्रृंखलाओं पर अत्यधिक निर्भरता।
  • वैश्विक जोखिम: पश्चिम एशिया संकट और कमजोर मानसून की आशंका का भारतीय अर्थव्यवस्था पर संभावित प्रतिकूल असर।

विश्लेषण

भारत की व्यापारिक कमजोरियाँ मुख्यतः बाह्य और सामयिक हैं, जबकि इसकी निर्यात क्षमताएँ अब एक मजबूत संरचनात्मक रूप ले रही हैं। अल्पकालिक व्यापार घाटे से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि भारत का गैर-पेट्रोलियम निर्यात कठिन वैश्विक माहौल में भी स्थिर और सकारात्मक वृद्धि दर्ज कर रहा है।

आगे की राह

  • घरेलू इनपुट का निर्माण: आपूर्ति श्रृंखला को पूर्णतः सुरक्षित करने के लिए इलेक्ट्रॉनिक घटकों, लिथियम-आयन सेल और अन्य मध्यवर्ती वस्तुओं का घरेलू स्तर पर निर्माण तेज किया जाना चाहिए।

  • सेवा क्षेत्र में प्रतिस्पर्धात्मकता: केवल ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCC) पर निर्भर रहने के बजाय सेवा क्षेत्र के अन्य उच्च-मूल्य वाले वर्टिकल्स में नवाचार और दक्षता बढ़ानी होगी।
  • कच्चे माल का विकल्प: प्राकृतिक गैस और उर्वरक की विदेशी निर्भरता को कम करने हेतु वैकल्पिक ऊर्जा और जैविक/हरित उर्वरक तकनीकों को बढ़ावा देना आवश्यक है।
  • बाजार विविधीकरण: निर्यातकों को पश्चिम एशिया के अलावा अन्य उभरते वैश्विक बाजारों में अपनी उपस्थिति और मजबूत करनी चाहिए।


निष्कर्ष

जून 2026 के व्यापार आंकड़े दर्शाते हैं कि वैश्विक उथल-पुथल के बावजूद भारत की आर्थिक बुनियाद और निर्यात क्षमता सुदृढ़ बनी हुई है। यद्यपि कच्चे तेल और उर्वरक के ऊंचे आयात मूल्य ने व्यापार घाटे को बढ़ाया है, किंतु इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र में सरकारी प्रोत्साहन और निर्यातकों का लचीलापन भारत को एक वैश्विक विनिर्माण और निर्यात केंद्र बनाने की दिशा में सकारात्मक संकेत प्रस्तुत करता है।