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संदर्भ
विश्व बैंक ने अपनी हालिया 'इंडिया डेवलपमेंट अपडेट' रिपोर्ट में भारत के आर्थिक भविष्य को लेकर एक महत्वपूर्ण चेतावनी जारी की है। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और वैश्विक ऊर्जा संकट को देखते हुए, बैंक ने भारत की विकास दर के अनुमानों में कटौती की है। यह रिपोर्ट भारत की आर्थिक लचीलापन और बाहरी झटकों के प्रति संवेदनशीलता के बीच एक संतुलन का विश्लेषण प्रस्तुत करती है।
मुख्य समाचार बिंदु
रिपोर्ट से प्राप्त सभी महत्वपूर्ण आँकड़े और जानकारियाँ निम्नलिखित हैं:
- विकास दर में कटौती: वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत की जीडीपी वृद्धि का अनुमान 7.2% से घटाकर 6.6% कर दिया गया है।
- औद्योगिक सुस्ती: औद्योगिक गतिविधि वित्त वर्ष 26 के 8.8% से गिरकर वित्त वर्ष 27 में 7.5% रहने की संभावना है।
- क्षेत्रीय प्रदर्शन: विनिर्माण (विशेषकर इलेक्ट्रॉनिक्स और ऑटोमोबाइल) विकास को सहारा देंगे, लेकिन उच्च इनपुट लागत और घटती वैश्विक मांग चिंता का विषय है।
- मुद्रास्फीति: उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) आधारित महंगाई दर वित्त वर्ष 26 के 2.3% से बढ़कर वित्त वर्ष 27 में 4.9% होने का अनुमान है।
- विदेशी निवेश (FDI): शुद्ध एफडीआई अंतर्वाह जीडीपी के 0.6% रहने का अनुमान है (जो पिछले वर्ष 0.5% था)।
- सेवा क्षेत्र पर प्रभाव: वैश्विक मंदी के कारण व्यावसायिक सेवाएँ और खाद्य एवं आवास सेवाएँ (LPG संकट के कारण) प्रभावित होंगी।
विश्व बैंक की रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्ष
- युद्ध का प्रभाव: रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि यदि पश्चिम एशिया में संघर्ष नहीं होता, तो भारत की विकास दर 7.2% सुनिश्चित थी।
- ऊर्जा संकट: 2026 के अंत तक वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति में व्यवधान बने रहने की आशंका है, जो भारत के लिए प्रतिकूल है।
- दक्षिण एशियाई परिदृश्य: पूरे दक्षिण एशिया की विकास दर 2025 के 7% से गिरकर 2026 में 6.3% रहने का अनुमान है।
- सुझाव: विश्व बैंक के निदेशक पॉल प्रोसी के अनुसार, भारत को अपनी आर्थिक मजबूती के लिए निजी क्षेत्र के नेतृत्व वाले विकास और युवाओं को कार्यबल में शामिल करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
रिपोर्ट का संभावित प्रभाव
- राजकोषीय स्थिति पर दबाव: तेल की ऊंची कीमतों से बचने के लिए यदि सरकार उत्पाद शुल्क घटाती है या सब्सिडी बढ़ाती है, तो 'राजकोषीय सुदृढ़ीकरण' का लक्ष्य प्रभावित हो सकता है।
- प्रेषण में कमी: भारत के कुल प्रेषण का 38% खाड़ी देशों से आता है। वहां के श्रम बाजार में अस्थिरता से भारत में आने वाले विदेशी धन में कमी आएगी।
- रुपये और चालू खाता घाटा: विदेशी मुद्रा के कम प्रवाह और महंगे आयात से रुपया कमजोर हो सकता है और चालू खाता घाटा (CAD) बढ़ सकता है।
- लागत में वृद्धि: उद्योगों के लिए कच्चे माल और ईंधन की लागत बढ़ने से घरेलू मांग में गिरावट आ सकती है।
निष्कर्ष
विश्व बैंक की यह रिपोर्ट भारत के लिए एक सचेत करने वाली घंटी है। यद्यपि भारतीय अर्थव्यवस्था में आंतरिक सुधारों और नीतिगत सुरक्षा उपायों के कारण मजबूती बनी हुई है, लेकिन वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव और ऊर्जा असुरक्षा इसके विकास की गति को बाधित कर रहे हैं। आने वाले समय में भारत की आर्थिक स्थिरता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह अपने आयात स्रोतों में कितना विविधीकरण करता है और निजी निवेश को कितना आकर्षित कर पाता है।
संदर्भ
प्रधानमंत्री मुद्रा योजना ने वित्त वर्ष 2026 में ₹5.64 लाख करोड़ के ऐतिहासिक वितरण के साथ वित्तीय समावेशन की दिशा में एक नया मील का पत्थर स्थापित किया है। यह उपलब्धि न केवल सूक्ष्म उद्यमों के सशक्तिकरण को दर्शाती है, बल्कि परिसंपत्ति गुणवत्ता में सुधार (NPA में कमी) के माध्यम से बैंकिंग प्रणाली की सुदृढ़ता को भी प्रमाणित करती है।
प्रमुख समाचार बिंदु: वर्तमान प्रगति
- वितरण का शिखर: 31 मार्च, 2026 को समाप्त वित्त वर्ष में कुल ₹5,64,784 करोड़ का ऋण वितरित किया गया, जो पिछले वर्ष के ₹5.41 लाख करोड़ से अधिक है।
- ऋणों की सांख्यिकी: कुल स्वीकृत राशि ₹5,74,389 करोड़ रही, जिसके तहत 4,57,01,308 ऋण प्रदान किए गए।
- परिसंपत्ति गुणवत्ता (NPA) में सुधार: योजना की सबसे बड़ी सफलता गैर-निष्पादित आस्तियों (NPA) में कमी है, जो 5 वर्ष पूर्व के 4.86% से घटकर अब मात्र 2% रह गई है।
- ऋण श्रेणियाँ:
- शिशु: ₹50,000 तक।
- किशोर: ₹50,000 से ₹5 लाख तक।
- तरुण: ₹5 लाख से ₹10 लाख तक।
- तरुण-प्लस (नया): वित्त वर्ष 2025 में शुरू, ₹10 लाख से ₹20 लाख तक।
- निम्न-स्तरीय ऋणों की प्रधानता: 60% से अधिक ऋण ₹30,000 से कम के हैं, जो जमीनी स्तर पर स्वरोजगार की प्रभावकारिता को सिद्ध करते हैं।
- महिला भागीदारी: सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों द्वारा चलाए गए अभियानों के कारण गरीब महिलाओं के बीच योजना की पैठ बढ़ी है।
- क्रेडिट गारंटी: CGFMU के माध्यम से प्रदान किया जा रहा गारंटी कवर बैंकों को निडर होकर ऋण देने में सक्षम बना रहा है।
प्रधानमंत्री मुद्रा योजना (PMMY) क्या है?
- शुभारंभ: इस योजना की शुरुआत 8 अप्रैल, 2015 को की गई थी।
- प्रवर्तक: भारत सरकार के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय के तत्वावधान में।
- उद्देश्य: 'फंडिंग द अनफंडेड' (जिन्हें वित्त प्राप्त नहीं है, उन्हें वित्त प्रदान करना)। इसका मुख्य उद्देश्य उन छोटे उद्यमियों को वित्तीय सहायता प्रदान करना है जो औपचारिक बैंकिंग प्रणाली से दूर थे।
- संस्थागत ढांचा: इसके तहत 'MUDRA' (माइक्रो यूनिट्स डेवलपमेंट एंड रिफाइनेंस एजेंसी लिमिटेड) एक गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थान के रूप में कार्य करता है, जो बैंकों, NBFCs और माइक्रो-फाइनेंस संस्थानों को पुनर्वित्त प्रदान करता है।
- लक्ष्य समूह: छोटे विनिर्माण क्षेत्र, सेवा क्षेत्र की इकाइयाँ, दुकानदार, फल-सब्जी विक्रेता और कृषि-संबंधित गतिविधियों में लगे लोग।
पी.एम.एम.वाई. (PMMY) ऋणों में वृद्धि का विवरण
वित्तीय वर्ष | वितरित ऋण (करोड़ ₹ में) |
2021-22 | 3,31,402 |
2022-23 | 4,50,423 |
2023-24 | 5,32,358 |
2024-25 | 5,41,802 |
2025-26 | 5,64,784 |
योजना का महत्व
- वित्तीय समावेशन: समाज के वंचित वर्गों और सूक्ष्म उद्यमियों को ऋण के औपचारिक चक्र में शामिल करना।
- रोजगार सृजन: स्वरोजगार को बढ़ावा देकर यह योजना देश में रोजगार के अवसरों का विस्तार करती है।
- महिला सशक्तिकरण: ऋण प्राप्तकर्ताओं में महिलाओं की बड़ी संख्या सामाजिक और आर्थिक आत्मनिर्भरता को बल दे रही है।
- ऋण पारिस्थितिकी तंत्र सुदृढ़ता: ऋण गारंटी कवर और कम होते NPA के कारण बैंकिंग क्षेत्र का सूक्ष्म ऋणों के प्रति विश्वास बढ़ा है।
- अर्थव्यवस्था का विविधीकरण: ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में लघु व्यवसायों के माध्यम से आर्थिक गतिविधियों का विकेंद्रीकरण।
निष्कर्ष
प्रधानमंत्री मुद्रा योजना ने न केवल भारत के सूक्ष्म ऋण पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत किया है, बल्कि वित्तीय अनुशासन और समावेशी विकास के बीच एक संतुलन स्थापित किया है। ₹20 लाख तक की नई ऋण सीमा (तरुण-प्लस) और घटते NPA स्तर यह दर्शाते हैं कि भारतीय सूक्ष्म उद्यमी अब अधिक परिपक्व और ऋण-उत्तरदायी हो गए हैं। भविष्य में यह योजना 'विकसित भारत' के संकल्प को साकार करने में आधारशिला सिद्ध होगी।
सामान्य अध्ययन पेपर – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध।
सन्दर्भ
विगत दशक में भारत ने महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण प्रतिमान स्थापित किया है, जहाँ नीतियों को केवल 'सैद्धांतिक मंशा' तक सीमित न रखकर 'धरातलीय अवसंरचना' का रूप दिया गया है। वर्तमान नीतिगत ढांचे में विकास की मुख्यधारा में महिलाओं को केंद्रबिंदु बनाना महज एक सामाजिक सुधार नहीं, बल्कि एक सुनियोजित राष्ट्रीय रणनीति है। यह इस तथ्य को स्वीकार करता है कि राष्ट्र की प्रगति की गति महिला शक्ति की सक्रिय भागीदारी के बिना समग्र नहीं हो सकती।
सांख्यिकीय उपलब्धि एवं संरचनात्मक परिवर्तन
भारत की विकासात्मक यात्रा में महिलाओं की भूमिका को निम्नलिखित प्रमुख स्तंभों के माध्यम से समझा जा सकता है:
- वित्तीय समावेशन: जन धन योजना के अंतर्गत खोले गए 57 करोड़ से अधिक खातों में से 55% से अधिक महिलाओं के हैं। इसने औपचारिक बैंकिंग प्रणाली में उनकी पहुंच सुनिश्चित की है।
- उद्यमिता एवं स्वरोजगार: 'मुद्रा' (MUDRA) ऋणों का लगभग 70% महिला उद्यमियों को प्राप्त होना और 90 लाख से अधिक स्वयं सहायता समूहों (SHGs) के माध्यम से 10 करोड़ महिलाओं का संगठित होना ग्रामीण अर्थव्यवस्था में एक मूक क्रांति का परिचायक है।
- सामाजिक सुरक्षा एवं स्वास्थ्य: उज्ज्वला योजना और आयुष्मान भारत जैसी पहलों ने न केवल महिलाओं के 'जीवन की गुणवत्ता' में सुधार किया है, बल्कि उन्हें स्वास्थ्य संबंधी जोखिमों से सुरक्षा प्रदान कर सशक्त बनाया है।
- श्रम बल भागीदारी: महिला श्रम बल भागीदारी दर का बढ़कर लगभग 37% होना एक सकारात्मक संकेत है, जो लंबे समय से चली आ रही गिरावट को संबोधित करता है।
चुनौतियां: नीतिगत निर्माण से नीतिगत पैठ तक
यद्यपि योजनाओं का पैमाना विशाल है, किंतु 'अंतिम छोर तक पहुंच' अभी भी एक चुनौती बनी हुई है। जिला स्तरीय प्रशासन के लिए अब मुख्य कार्य 'पात्रता' को 'पहुंच' में बदलना है।
- जागरूकता अंतराल: कई महिलाएं अभी भी सूचना के अभाव में योजनाओं के लाभ से वंचित हैं।
- परिणाम-आधारित निगरानी: हमें केवल 'व्यय' या 'संख्या' को नहीं, बल्कि समाज पर पड़ने वाले वास्तविक 'प्रभाव' को मापने की आवश्यकता है।
नारी शक्ति वंदन अधिनियम: प्रतिनिधित्व से प्राधिकार तक
नारी शक्ति वंदन अधिनियम केवल एक विधायी सुधार नहीं है, बल्कि नीति निर्माण की प्रक्रिया में 'जीवंत अनुभवों' को शामिल करने का माध्यम है। जब नीति निर्माण में महिलाओं की भागीदारी बढ़ेगी, तो नीतियां अधिक संवेदनशील, व्यावहारिक और समावेशी बनेंगी। यह सुधार एक 'मल्टीप्लायर इफेक्ट' उत्पन्न करेगा, जिससे भविष्य में नेतृत्व की एक नई श्रृंखला तैयार होगी।
भविष्य की राह: 2047 की ओर
भारत जब अपनी स्वतंत्रता के शताब्दी वर्ष (2047) तक 'विकसित भारत' बनने का लक्ष्य रखता है, तो महिला नेतृत्व वाला विकास इसका आधार स्तंभ होना चाहिए। इसके लिए आगामी पांच वर्षों में निम्नलिखित क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करना अनिवार्य है:
- STEM में नेतृत्व: भारत में विज्ञान और प्रौद्योगिकी (STEM) की छात्राओं का उच्च प्रतिशत है, जिसे अब शासन और नवाचार के नेतृत्व में परिवर्तित करना होगा।
- संस्थागत समर्थन: महिलाओं को केवल निर्वाचित प्रतिनिधि के रूप में नहीं, बल्कि संस्थागत प्रमुखों के रूप में तैयार करने हेतु विशेष प्रशिक्षण और मेंटरशिप की आवश्यकता है।
- सरलीकृत प्रक्रियाएं: नीतियों तक पहुंच को इतना सरल बनाना चाहिए कि समाज का सबसे निचला तबका भी बिना किसी बाधा के लाभ प्राप्त कर सके।
निष्कर्ष
सशक्तिकरण अब केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि भारत की आर्थिक स्थिरता और सामाजिक सुदृढ़ता की पूर्व-शर्त है। 'नारी शक्ति' को प्राधिकार सौंपना भारत के विकास पथ को पुनः परिभाषित करेगा। नीति निर्माताओं और प्रशासकों के लिए यह स्पष्ट संदेश है कि नीतियों के 'संतृप्ति बिंदु' को प्राप्त करना ही विकसित भारत का मार्ग प्रशस्त करेगा।
सामान्य अध्ययन पेपर – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध।
संदर्भ
वर्तमान समय में शिक्षा को केवल एक 'डिग्री' के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक सशक्तिकरण के सबसे शक्तिशाली माध्यम के रूप में देखा जा रहा है। भारतीय समाज में आज भी एक बड़ा वर्ग ऐसा है, जहाँ प्रतिभा की कमी नहीं है, लेकिन आर्थिक संसाधनों का अभाव उनके सपनों की राह में रोड़ा अटका देता है। विशेष रूप से द्वितीय और तृतीय श्रेणी के शहरों के युवाओं के लिए उच्च शिक्षा प्राप्त करना केवल एक शैक्षणिक विकल्प नहीं, बल्कि एक 'वित्तीय जोखिम' है। समाज की कड़वी सच्चाई यह है कि कई मेधावी छात्र केवल इसलिए पीछे रह जाते हैं क्योंकि उनके पास नामांकन के लिए 'पूँजी' और 'पहुँच' का अभाव है। आज के दौर में, जब भारत एक 'ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था' बनने की ओर अग्रसर है, शिक्षा में निवेश केवल बुनियादी ढांचे तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि छात्र में निवेश करना समय की मांग है।
सकल नामांकन अनुपात (GER) क्या है?
सकल नामांकन अनुपात (GER) एक सांख्यिकीय माप है जिसका उपयोग शिक्षा के क्षेत्र में नामांकन के स्तर को निर्धारित करने के लिए किया जाता है।
उच्च शिक्षा के संदर्भ में, यह 18 से 23 वर्ष की आयु वर्ग की कुल जनसंख्या के सापेक्ष उच्च शिक्षा संस्थानों में नामांकित छात्रों के प्रतिशत को दर्शाता है।
यदि GER कम है, तो इसका अर्थ है कि एक बड़ी आबादी उच्च शिक्षा से वंचित है। भारत सरकार ने 'राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020' के तहत 2035 तक GER को 50% तक ले जाने का लक्ष्य रखा है।
चर्चा में क्यों?
हालिया रिपोर्टों (AISHE 2021-22) और चर्चाओं के आधार पर निम्नलिखित बिंदु इसे केंद्र में लाते हैं:
संस्थान बढ़े, नामांकन स्थिर: 2014-15 से संस्थानों की संख्या 51,534 से बढ़कर 70,000+ हो गई है, लेकिन GER अभी भी 28.4% पर ही टिका हुआ है।
लागत और जोखिम: उच्च शिक्षा की बढ़ती फीस और पढ़ाई के बाद नौकरी की अनिश्चितता ने छात्रों के बीच एक संशय पैदा किया है।
छात्रवृत्ति की महत्ता: विशेषज्ञ अब छात्रवृत्ति को केवल 'आर्थिक मदद' नहीं बल्कि शिक्षा तंत्र के 'मुख्य स्तंभ' के रूप में देखने की वकालत कर रहे हैं।
ऐतिहासिक से वर्तमान तक का दृष्टिकोण
भारत में शिक्षा का वित्तपोषण सदैव एक सामाजिक जिम्मेदारी रहा है:
प्राचीन काल (तक्षशिला और नालंदा): यहाँ 'योग्यता' सर्वोपरि थी। छात्रों के पास भुगतान के पांच विकल्प थे—गुरु की सेवा, दान, शासकों द्वारा प्रायोजन, या भविष्य में भुगतान। संसाधनों की कमी कभी शिक्षा में बाधा नहीं बनी।
औपनिवेशिक काल: ब्रिटिश शासन के दौरान शिक्षा कुछ खास वर्गों तक सीमित हो गई, लेकिन सावित्रीबाई फुले और डॉ. अंबेडकर जैसे समाज सुधारकों ने छात्रवृत्ति को सामाजिक न्याय के हथियार के रूप में उपयोग करने की नींव रखी।
स्वतंत्रता पश्चात: स्वतंत्र भारत में छात्रवृत्ति को केवल सहायता के रूप में देखा गया। लेकिन अब, 21वीं सदी में, इसे एक रणनीतिक निवेश के रूप में देखा जा रहा है जो आर्थिक गतिशीलता का इंजन है।
सरकारी पहल
भारत सरकार ने उच्च शिक्षा को सुलभ बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं:
राष्ट्रीय छात्रवृत्ति पोर्टल (NSP): यह विभिन्न मंत्रालयों और राज्य सरकारों की छात्रवृत्ति योजनाओं के लिए एक 'कॉमन विंडो' के रूप में कार्य करता है।
कॉलेज और विश्वविद्यालय के छात्रों के लिए केंद्रीय क्षेत्र की छात्रवृत्ति योजना: इसके तहत स्नातक और स्नातकोत्तर छात्रों को ₹20,000 तक की सहायता दी जाती है।
शिक्षा ऋण पर ब्याज सब्सिडी: कमजोर वर्गों के लिए ऋण को सस्ता बनाया गया है।
PM-USP (प्रधानमंत्री उच्चतर शिक्षा प्रोत्साहन): यह योजना मेधावी छात्रों को वित्तीय सहायता प्रदान करती है ताकि वे बिना बाधा के उच्च शिक्षा प्राप्त कर सकें।
विशिष्ट योजनाएँ: अनुसंधान के लिए PMRF (प्रधानमंत्री अनुसंधान फेलोशिप) और अल्पसंख्यकों/पिछड़े वर्गों के लिए प्री-मैट्रिक और पोस्ट-मैट्रिक स्कॉलरशिप।
छात्रवृत्ति कार्यक्रम: महत्व और प्रभाव
छात्रवृत्ति केवल पैसा नहीं, बल्कि एक छात्र के व्यक्तित्व के लिए 'उत्प्रेरक' है:
अकादमिक निरंतरता: यह छात्रों को बीच में पढ़ाई छोड़ने से बचाती है।
विविधता: यह सुनिश्चित करती है कि कैंपस में केवल अमीर नहीं, बल्कि समाज के हर तबके का प्रतिनिधित्व हो।
मानसिक स्थिरता: बहु-वर्षीय छात्रवृत्तियाँ छात्र को आर्थिक चिंता से मुक्त कर भविष्य की योजना बनाने का साहस देती हैं।
करियर मार्गदर्शन: आधुनिक छात्रवृत्तियाँ अब 'मेंटरशिप' और 'नेतृत्व विकास' के साथ भी जोड़ी जा रही हैं।
संवैधानिक और कानूनी प्रावधान
अनुच्छेद 21A: यद्यपि यह 6-14 वर्ष के बच्चों के लिए अनिवार्य शिक्षा की बात करता है, लेकिन इसका व्यापक अर्थ शिक्षा के अधिकार को मौलिक अधिकार मानता है।
अनुच्छेद 46 (DPSP): राज्य को समाज के कमजोर वर्गों, विशेषकर SC/ST के शैक्षिक और आर्थिक हितों को विशेष सावधानी के साथ बढ़ावा देने का निर्देश देता है।
अनुच्छेद 15: राज्य को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की उन्नति के लिए विशेष प्रावधान (जैसे छात्रवृत्ति या आरक्षण) करने की अनुमति देता है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020: यह नीति छात्रवृत्ति के दायरे को बढ़ाने और इसे निजी क्षेत्र के साथ जोड़ने पर जोर देती है।
विश्लेषणात्मक मूल्यांकन
एक निष्पक्ष विश्लेषण से पता चलता है कि केवल बिल्डिंग और कॉलेज बनाना काफी नहीं है।
पहुँच बनाम वहनीयता: हमारे पास 70,000+ संस्थान तो हैं, लेकिन वे उन छात्रों से खाली हैं जो फीस नहीं भर सकते।
गुणवत्ता और रोजगार: नामांकन तभी सार्थक है जब वह गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और अंततः रोजगार में बदले।
सामाजिक गतिशीलता: छात्रवृत्ति सामाजिक स्तर को ऊपर उठाने का सबसे सस्ता और प्रभावी तरीका है। यदि हम इसे हाशिये पर रखेंगे, तो GER का 50% लक्ष्य केवल एक सपना बनकर रह जाएगा।
अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य: उच्च शिक्षा और छात्रवृत्ति के वैश्विक मॉडल
देश मॉडल का स्वरूप प्रभाव और वास्तविकता
जर्मनी सार्वजनिक वित्त पोषित मॉडल: अधिकांश सार्वजनिक विश्वविद्यालयों में शिक्षण शुल्क नहीं ली जाती। यह मॉडल उच्च शिक्षा को व्यापक सामाजिक पहुँच प्रदान करता है, जो देश के सुदृढ़ औद्योगिक और अनुसंधान आधार में सहायक रहा है।
नॉर्डिक देश
(नार्वे, फिनलैंड) कल्याणकारी राज्य मॉडल: यहाँ उच्च शिक्षा पूरी तरह राज्य द्वारा प्रायोजित है, साथ ही जीवन निर्वाह के लिए उदार अनुदान दिए जाते हैं। इन देशों में शैक्षणिक असमानता न्यूनतम है और सामाजिक गतिशीलता के सूचकांकों में ये देश निरंतर उच्च स्थान पर रहते हैं।
संयुक्त राज्य अमेरिका निजी परोपकार एवं योग्यता आधारित मॉडल: हार्वर्ड और एमआईटी जैसे संस्थानों में विशाल 'एंडोमेंट' और मेरिट स्कॉलरशिप का नेटवर्क। यह मॉडल वैश्विक प्रतिभाओं को आकर्षित करने में सफल रहा है, यद्यपि यहाँ छात्र ऋण एक गंभीर चुनौती के रूप में भी उभरा है।
चीन रणनीतिक सरकारी निवेश (CSC): वैश्विक रैंकिंग सुधारने के लिए अंतरराष्ट्रीय और घरेलू छात्रों को बड़े पैमाने पर सरकारी छात्रवृत्तियाँ। इस निवेश के परिणामस्वरूप चीनी विश्वविद्यालयों की वैश्विक प्रतिष्ठा में तेजी से सुधार हुआ है और एक विशाल कुशल कार्यबल तैयार हुआ है।
ऑस्ट्रेलिया आय-आकस्मिक ऋण (HECS-HELP): छात्र पढ़ाई के दौरान ऋण लेते हैं और पुनर्भुगतान केवल तब शुरू होता है जब उनकी आय एक निश्चित स्तर तक पहुँच जाए। इस मॉडल ने शिक्षा के तत्काल वित्तीय बोझ को कम कर दिया है, जिससे निम्न आय वर्ग के छात्रों की उच्च शिक्षा में भागीदारी बढ़ी है।
वैश्विक प्रतिवेदन के प्रमुख निष्कर्ष
OECD (Education at a Glance): ओईसीडी के आंकड़े बताते हैं कि शिक्षा पर सार्वजनिक और निजी निवेश से व्यक्तिगत आय और राष्ट्रीय आर्थिक विकास (GDP) में सकारात्मक वृद्धि देखी गई है, हालाँकि इसके लाभ अलग-अलग सामाजिक संदर्भों में भिन्न हो सकते हैं।
UNESCO (GEM Report 2020): यूनेस्को के अनुसार, वित्तीय समावेशन और लक्षित छात्रवृत्तियाँ लैंगिक समानता को बढ़ावा देने और हाशिये पर स्थित समुदायों को मुख्यधारा की शिक्षा से जोड़ने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
आगे की राह
छात्रवृत्ति का विकेंद्रीकरण: इसे केवल विशिष्ट संस्थानों तक सीमित न रखकर ग्रामीण स्तर के कॉलेजों तक पहुँचाया जाए।
निजी क्षेत्र की भागीदारी: कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR)और निजी परोपकार को छात्रवृत्ति से जोड़ने के लिए कर-छूट जैसे प्रोत्साहन दिए जाने चाहिए।
मल्टी-ईयर कमिटमेंट: छात्रवृत्ति वार्षिक नवीनीकरण के बजाय पूरे कोर्स की अवधि के लिए सुनिश्चित होनी चाहिए।
कौशल विकास से जुड़ाव: छात्रवृत्तियों को विनिर्माण, डिजिटल सेवा और स्वास्थ्य जैसे मांग वाले क्षेत्रों से जोड़ा जाए।
निष्कर्ष
भारत की 'ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था' बनने की राह में सामाजिक-आर्थिक विषमताएँ और उच्च शिक्षा की बढ़ती लागत प्रमुख बाधाएँ हैं, जो मेधावी युवाओं के लिए इसे एक 'वित्तीय जोखिम' बनाती हैं। राष्ट्र निर्माण का लक्ष्य केवल भौतिक बुनियादी ढांचे से नहीं, बल्कि उन संस्थानों तक सुलभ पहुँच हेतु 'छात्र-केंद्रित' निवेश से ही पूर्ण होगा। अतः, मानवीय पूंजी के सम्यक विकास के लिए शिक्षा प्रणाली को समावेशी, वहनीय और छात्र-हितैषी बनाना वर्तमान की अनिवार्य आवश्यकता है।"