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सामान्य अध्ययन पेपर  – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध

संदर्भ

ब्रिक्स के साथ भारत का संबंध एक विकासवादी यात्रा रही है। 2009 में रूस के येकातेरिनबर्ग में पहले शिखर सम्मेलन से लेकर आज 2026 तक, भारत ने इस मंच को केवल एक 'वार्ता मंच' से बदलकर एक 'कार्रवाई उन्मुख' समूह बनाने में केंद्रीय भूमिका निभाई है।

  • अतीत (2012, 2016, 2021): भारत ने इससे पहले तीन बार ब्रिक्स की मेजबानी की है। 2012 (नई दिल्ली) में वैश्विक अर्थव्यवस्था पर ध्यान था, 2016 (गोवा) में आतंकवाद विरोधी सहयोग प्रमुख था, और 2021 (डिजिटल माध्यम) में 'ब्रिक्स @ 15' के तहत निरंतरता और आम सहमति पर जोर दिया गया।
  • वर्तमान (2026): 2023 के सफल G-20 शिखर सम्मेलन के बाद, भारत अब ब्रिक्स को 'ग्लोबल साउथ' की आवाज के रूप में वैश्विक मंच पर स्थापित कर रहा है। 1 जनवरी 2026 को अध्यक्षता संभालने के साथ ही भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि उसका ध्यान  “लचीलापन पर होगा।

ब्रिक्स क्या है?

ब्रिक्स (BRICS) दुनिया की प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं का एक महत्वपूर्ण बहुपक्षीय संगठन है।

  • मूल संरचना: 2001 में जिम 'नील ने आर्थिक क्षमता के आधार पर 'BRIC' शब्द दिया था। औपचारिक रूप से 2006 में इसकी नींव पड़ी।इसके बाद जून 2009 में येकातेरिनबर्ग (रूस) में पहला BRIC शिखर सम्मेलन आयोजित किया गया
  • सदस्यता विस्तार: मूल सदस्य: ब्राजील, रूस, भारत, चीन।
    • 2010: दक्षिण अफ्रीका शामिल हुआ (BRICS)
    • 2024 (BRICS+): ईरान, यूएई, मिस्र और इथियोपिया पूर्ण सदस्य बने। (नोट: अर्जेंटीना ने अंतिम समय में शामिल होने का फैसला किया)
    • 2025: इंडोनेशिया आधिकारिक रूप से 10वें सदस्य के रूप में शामिल हुआ।
    • 2026 की स्थिति: अब यह 11 सदस्यीय समूह है (सऊदी अरब की सदस्यता प्रक्रिया जारी है)
  • आर्थिक शक्ति: यह समूह वैश्विक जीडीपी का लगभग 35% (PPP आधार पर) और विश्व की 45% जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करता है।

चर्चा में क्यों है?

  • भारत ने 13 जनवरी 2026 को ब्रिक्स 2026 का आधिकारिक लोगो, वेबसाइट और थीम लॉन्च की है।
  • यह सम्मेलन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिका में ट्रंप प्रशासन की वापसी और उनकी 'व्यापारिक टैरिफ' नीतियों के बीच, ब्रिक्स देश अपनी आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए 'स्थानीय मुद्रा व्यापार' (डी-डॉलरइजेशन) और डिजिटल बुनियादी ढांचे पर चर्चा कर रहे हैं।

ब्रिक्स 2026: भारत की अध्यक्षता और थीम

भारत की अध्यक्षता का मंत्र है: " लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता

  • लोगो: इसमें कमल के फूल के साथ ब्रिक्स के रंगों को जोड़ा गया है, जो भारत की सांस्कृतिक विरासत और आधुनिकता का प्रतीक है।
  • पीपुल्स समिट: प्रधानमंत्री मोदी ने इसे 60 भारतीय शहरों में आयोजित करने का लक्ष्य रखा है ताकि यह केवल एक राजनयिक कार्यक्रम रहकर जन-आंदोलन बने।

"हरित और लचीला" एजेंडा

यह एजेंडा ग्लोबल साउथ के अस्तित्व के लिए महत्वपूर्ण है:

  • जलवायु न्याय: विकसित देशों से 'क्लाइमेट फाइनेंस' की मांग करना।
  • ग्रीन इन्फ्रास्ट्रक्चर: आपदा-रोधी बुनियादी ढांचे का निर्माण, जैसा कि भारत ने  आपदा प्रतिरोधी बुनियादी ढांचे के लिए गठबंधन (CDRI) के माध्यम से शुरू किया है।
  • ऊर्जा संक्रमण: जीवाश्म ईंधन से हटकर नवीकरणीय ऊर्जा (सौर, पवन) की ओर सामूहिक संक्रमण।

ब्रिक्स 2026 के मुख्य स्तंभ

  1. लचीलापन (Resilience): वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में चीन की निर्भरता कम कर विविधता लाना।
  2. नवाचार (Innovation): भारत के UPI मॉडल को अन्य ब्रिक्स देशों में लागू करना।
  3. सहयोग (Cooperation): आतंकवाद विरोधी सहयोग और सीमा सुरक्षा पर साझा समझ।
  4. स्थिरता (Sustainability): सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) को 2030 तक प्राप्त करने की गति बढ़ाना।

भारत के लिए रणनीतिक महत्व और विश्लेषण

  • चीन का संतुलन: ब्रिक्स के विस्तार के बावजूद, भारत यह सुनिश्चित करना चाहता है कि यह संगठन 'चीन-केंद्रित' बने।
  • बहुध्रुवीय विश्व: भारत ब्रिक्स का उपयोग एक ऐसी दुनिया बनाने के लिए कर रहा है जहाँ किसी एक देश (जैसे अमेरिका या चीन) का पूर्ण वर्चस्व हो।
  • वैश्विक आर्थिक नेतृत्व: भारत स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा देकर डॉलर पर निर्भरता कम करने के प्रयासों का नेतृत्व कर रहा है।

आगे की राह

  • भारत को 'न्यू डेवलपमेंट बैंक' (NDB) को और अधिक सक्रिय बनाना होगा ताकि गरीब देशों को आसान ऋण मिल सके।
  • साथ ही, सदस्यों के बीच आपसी विवादों (जैसे भारत-चीन सीमा विवाद) को दरकिनार कर साझा आर्थिक हितों पर ध्यान केंद्रित करना होगा।

निष्कर्ष

ब्रिक्स 2026 भारत के लिए अपनी 'विश्व मित्र' और 'ग्लोबल साउथ के लीडर' की भूमिका को सिद्ध करने का स्वर्ण अवसर है। एक 'हरित और लचीला' एजेंडा केवल पर्यावरण के लिए आवश्यक है, बल्कि यह विकासशील देशों को एक नई आर्थिक मजबूती प्रदान करेगा।

सामान्य अध्ययन पेपर  – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध

सन्दर्भ

जनवरी 2026 में स्विट्जरलैंड के दावोस में आयोजित विश्व आर्थिक मंच (WEF) के शिखर सम्मेलन ने वैश्विक राजनीति को एक नए मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा घोषित "बोर्ड ऑफ पीस" (BoP) ने केवल कूटनीतिक हलचल पैदा की है, बल्कि भारत जैसे वैश्विक शक्तियों के लिए 'सिद्धांत बनाम व्यावहारिकता' का एक जटिल प्रश्न भी उत्पन्न कर दिया है। भारत ने इस बोर्ड के चार्टर घोषणा कार्यक्रम से दूरी बनाकर फिलहाल अपनी सतर्कता का परिचय दिया है।

बोर्ड ऑफ पीस क्या है?

यह ट्रंप प्रशासन द्वारा प्रस्तावित एक अंतरराष्ट्रीय निकाय है जिसका प्राथमिक उद्देश्य गाजा का पुनर्निर्माण और वैश्विक संघर्षों का समाधान करना है।

  • अध्यक्षता: डोनाल्ड ट्रंप स्वयं इसके संस्थापक अध्यक्ष हैं और उनके पास 'वीटो' की शक्ति है।
  • कार्यकारी बोर्ड: इसमें जैरेड कुशनर, मार्को रुबियो और पूर्व ब्रिटिश पीएम टोनी ब्लेयर जैसे नाम शामिल हैं।
  • उद्देश्य: 'न्यू गाजा' का निर्माण करना, जहाँ तबाह हो चुकी जमीन पर आलीशान होटल, गगनचुंबी इमारतें और व्यापारिक गलियारे बनाए जाएंगे।

यह चर्चा में क्यों है?

  • 22 जनवरी 2026 को दावोस में ट्रंप ने इस बोर्ड के चार्टर पर हस्ताक्षर किए।
  • खबर की सबसे बड़ी वजह 1 बिलियन डॉलर की 'स्थायी सदस्यता फीस' और संयुक्त राष्ट्र (UN) के समानांतर एक नया ढांचा खड़ा करने की कोशिश है।

प्रस्ताव की स्वीकृति और अस्वीकृति

  • स्वीकार करने वाले प्रमुख देश:   अर्जेंटीना, आर्मेनिया, अजरबैजान, बहरीन, बेलारूस, मिस्र, हंगरी, इंडोनेशिया, इज़राइल, कोसोवो, कजाकिस्तान, जॉर्डन, मोरक्को, पाकिस्तान, पराग्वे, कतर, सऊदी अरब, तुर्की, संयुक्त अरब अमीरात, उज्बेकिस्तान, वियतनाम, कनाडा (यह देश "सैद्धांतिक रूप से" यानी 'in principle' शामिल होने के लिए सहमत हो गया है)
  • अस्वीकार/तटस्थ रहने वाले: नॉर्वे, स्वीडन, डेनमार्क और इटली ने शामिल होने से इनकार कर दिया है, फ्रांस, ब्रिटेन, कनाडा और चीन ने फिलहाल इससे दूरी बनाई है या कड़ी आपत्ति जताई है।

भारत के लिए आकर्षण के बिंदु

भारत इस बोर्ड में शामिल होने पर विचार क्यों कर सकता है? इसके कुछ ठोस कारण हैं:

  • फिलिस्तीनी हित: भारत ऐतिहासिक रूप से फिलिस्तीन का समर्थक रहा है। यह बोर्ड सीधे तौर पर प्रभावित आबादी की मदद और बुनियादी ढांचे के पुनर्निर्माण का अवसर प्रदान कर सकता है।
  • क्षेत्रीय शक्ति संतुलन: यूएई, सऊदी अरब और तुर्की जैसे क्षेत्रीय दिग्गजों ने इसमें शामिल होने का निर्णय लिया है। भारत के लिए इन शक्तियों के साथ कदम मिलाकर चलना कूटनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो सकता है।
  • द्विपक्षीय संबंधों का दबाव: अमेरिका के साथ भारत के व्यापारिक संबंध वर्तमान में नाजुक दौर से गुजर रहे हैं। ट्रंप के निमंत्रण को सीधे तौर पर ठुकराना उनके 'आक्रामक कूटनीतिक क्रोध' को आमंत्रित कर सकता है।

बोर्ड की संरचना: एक गंभीर चेतावनी

भारत के लिए इस बोर्ड में शामिल होने से पहले कई 'रेड-फ्लैग' या खतरे के निशान स्पष्ट हैं:

  • एकतरफा नियंत्रण: बोर्ड की संरचना में ट्रंप ने स्वयं को अध्यक्ष नियुक्त किया है और कार्यकारी बोर्ड में उनके परिवार मित्र शामिल हैं। यह अंतरराष्ट्रीय निकाय कम और एक 'निजी क्लब' अधिक प्रतीत होता है।
  • UN को प्रतिस्थापित करने का प्रयास: चार्टर के अनुसार, इस बोर्ड का विस्तार अन्य वैश्विक संघर्षों तक किया जाएगा, जो संयुक्त राष्ट्र की महत्ता को कम करने और उसे अप्रासंगिक बनाने की एक कोशिश लगती है।
  • प्रतिनिधित्व का अभाव: बोर्ड में इजरायली नेतृत्व को स्थान दिया गया है, किंतु फिलिस्तीनी नेतृत्व को पूर्णतः उपेक्षित किया गया है। यह उन देशों के लिए अपमानजनक है जो फिलिस्तीन की संप्रभुता को मान्यता देते हैं।

भारत के लिए विशेष जोखिम

  • भारत के दृष्टिकोण से सबसे बड़ा खतरा पाकिस्तान की इस बोर्ड में सक्रिय भागीदारी है।
  • यदि ट्रंप इस बोर्ड के माध्यम से कश्मीर विवाद जैसे द्विपक्षीय मुद्दों को 'हल' करने का प्रयास करते हैं, तो भारत के लिए अपनी 'रणनीतिक स्वायत्तता' को बचाना कठिन हो जाएगा।
  • इसके अतिरिक्त, बोर्ड की 'स्थायी सदस्यता' के लिए एक अरब डॉलर की भारी फीस अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में एक अनैतिक उदाहरण स्थापित करती है।

सैन्य और कूटनीतिक विवशता

  • यदि भारत इस बोर्ड का सदस्य बनता है, तो उसे 'अंतरराष्ट्रीय स्थिरता बल' (ISF) में अपने सैनिक भेजने के लिए विवश किया जा सकता है।
  • यह एक गैर-संयुक्त राष्ट्र पहल है, जो भारत की उस परंपरा के विरुद्ध है जहाँ भारतीय सैनिक केवल संयुक्त राष्ट्र के शांति मिशनों के तहत ही विदेश जाते हैं।
  • पारदर्शिता के अभाव में, सदस्य देश केवल ट्रंप के मनमाने निर्णयों पर मुहर लगाने वाले 'रबर-स्टैम्प' बनकर रह जाएंगे।

अंतर्राष्ट्रीय विश्लेषण

  • शांति का पक्षधर या वर्चस्ववाद की सनक?
  • क्या यह शांति के लिए है या नोबेल शांति पुरस्कार मिल पाने की टीस? विश्लेषण बताते हैं कि 'बोर्ड ऑफ पीस' का चार्टर गाजा से ज्यादा ट्रंप की व्यक्तिगत शक्ति पर केंद्रित है।
  • इसमें ट्रंप को अनिश्चित काल के लिए अध्यक्ष रहने और किसी भी निर्णय को पलटने का अधिकार है, जो इसे लोकतांत्रिक संस्थान के बजाय एक 'शाही दरबार' जैसा बनाता है।
  • यूरोप की स्थिति:
  • यूरोप फिलहाल 'मजबूरी के बादलों' में घिरा हुआ प्रतीत हो रहा है
  • एक तरफ उसे अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका की जरूरत है, वहीं दूसरी तरफ ट्रंप की 'अमेरिका फर्स्ट' नीति और ग्रीनलैंड पर उनके दावे ने यूरोपीय देशों (विशेषकर डेनमार्क और फ्रांस) को असहज कर दिया है।
  • यूरोप इस प्रस्ताव को स्वीकार करके अपनी स्वतंत्र पहचान बचाने की कोशिश कर रहा है।
  • प्रासंगिकता पर सवाल: वेनेजुएला, ग्रीनलैंड और गाजा
  • वेनेजुएला के संसाधनों पर नियंत्रण और ग्रीनलैंड को खरीदने या नियंत्रित करने की ट्रंप की जिद के बाद 'बोर्ड ऑफ पीस' की नैतिकता पर सवाल उठ रहे हैं।
  •  गाजा युद्ध के दौरान जब हजारों लोग मारे जा रहे थे, पूरी दुनिया (संयुक्त राष्ट्र के जरिए) गाजा में लड़ाई को तुरंत रोकने के लिए कानून बनाने की कोशिश कर रही थी, तब अमेरिका ने अपनी विशेष शक्ति (Veto) का इस्तेमाल करके उन कानूनों को पास होने से रोक दिया।।
  • ऐसे में अब शांति की बात करना कूटनीतिक विरोधाभास लगता है।

आगे की राह:

  • नई दिल्ली को चाहिए कि वह इस प्रलोभन से बचते हुए अपने स्वतंत्र परामर्श जारी रखे।
  • भारत को फिलिस्तीनी नेतृत्व और अपने अन्य अंतरराष्ट्रीय साझेदारों के साथ विचार-विमर्श कर एक ऐसा मार्ग चुनना चाहिए जो न्यायसंगत हो।
  • शांति का अर्थ केवल गगनचुंबी इमारतों का निर्माण नहीं है, बल्कि यह आत्मसम्मान और न्याय की नींव पर टिकी होनी चाहिए।
  • अंततः, भारत को किसी भी व्यापारिक समझौते या अमेरिकी दबाव के आगे झुकने के बजाय अपनी अंतरात्मा की आवाज सुननी चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वह किसी भी ऐसे ढांचे का हिस्सा बने जो अंतरराष्ट्रीय न्याय प्रणाली के मूल सिद्धांतों को नष्ट करता हो।

निष्कर्ष:

ट्रंप का 'बोर्ड ऑफ पीस' अंतरराष्ट्रीय राजनीति में 'शांति' और 'व्यापार' का एक विवादास्पद संगम है। यह जहाँ गाजा के आर्थिक कायाकल्प का अवसर देता है, वहीं संयुक्त राष्ट्र की गरिमा और वैश्विक न्याय प्रणाली को गौण करता है। भारत के लिए इस बोर्ड से दूरी बनाना उसकी 'रणनीतिक स्वायत्तता' और सिद्धांतों के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है। भारत का मानना है कि स्थायी शांति केवल निवेश या गगनचुंबी इमारतों से नहीं, बल्कि समावेशी न्याय और मानवीय संवेदनाओं से ही संभव है। नई दिल्ली को चाहिए कि वह वैश्विक मंचों पर अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रखते हुए केवल उन्हीं प्रयासों का समर्थन करे जो 'वसुधैव कुटुंबकम' की भावना पर आधारित हों, कि किसी विशेष राष्ट्र के वर्चस्व पर।

सामान्य अध्ययन पेपर  – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध

सन्दर्भ

दावोस के बर्फीले वातावरण में जब वैश्विक नेताओं का जमावड़ा हुआ, तो सबसे बड़ी चिंता अमेरिका और यूरोप के बीच बढ़ता "ग्रीनलैंड युद्ध" थी। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने संबोधन में ग्रीनलैंड को हासिल करने के लिए 'सैन्य बल' के प्रयोग की संभावना से पीछे हटकर दुनिया को एक बड़ी राहत दी है। हालाँकि, यह 'पीछे हटना' शांति की भावना से अधिक एक सोची-समझी रणनीतिक चाल प्रतीत होती है।

ग्रीनलैंड और टैरिफ युद्ध की धमकी

  • पिछले हफ्तों में तनाव उस समय चरम पर पहुँच गया था जब ट्रंप प्रशासन ने घोषणा की थी कि यदि डेनमार्क और यूरोपीय संघ ग्रीनलैंड को अमेरिका को सौंपने (या बेचने) पर सहमत नहीं होते, तो 1 फरवरी से यूरोपीय वस्तुओं पर 10% और 1 जून से 25% तक का दंडात्मक टैरिफ (आयात शुल्क) लगाया जाएगा।
  • ट्रंप का तर्क है कि 'सुरक्षा' के नाम पर आर्कटिक के इस विशाल द्वीप पर अमेरिका का पूर्ण नियंत्रण अनिवार्य है।

यूरोप की एकजुटता: 'दबाव-विरोधी साधन'

  • इतिहास में पहली बार, यूरोपीय संघ (EU) ने अमेरिका के आर्थिक दबाव के सामने झुकने के बजाय पलटवार की रणनीति अपनाई। यू
  • रोप ने एक "दबाव-विरोधी साधन" सक्रिय किया, जिसके तहत अमेरिका की बड़ी टेक कंपनियों (Google, Apple, Meta) के यूरोपीय कारोबार को निशाना बनाने वाले 'जवाबी टैरिफ' की रूपरेखा तैयार की गई।
  • जानकारों का मानना है कि यूरोपीय संघ की इस अभूतपूर्व एकजुटता ने ही ट्रंप को अपने सैन्य रुख में बदलाव करने पर मजबूर किया।

'गोल्डन डोम' और आर्कटिक का नया समीकरण

ट्रंप ने संकेत दिया है कि ग्रीनलैंड पर उनकी नजरें अभी भी टिकी हैं, लेकिन अब इसका माध्यम 'व्यापारिक समझौता' होगा। उन्होंने इसे अपनी 175 बिलियन डॉलर की "गोल्डन डोम" मिसाइल रक्षा योजना से जोड़ दिया है।

  • रणनीतिक उद्देश्य: अंतरिक्ष और आर्कटिक में अमेरिकी हथियारों की तैनाती के लिए ग्रीनलैंड को आधार बनाना।
  • अनंत समयसीमा: ट्रंप ने इस समझौते के लिए "अनंत" समय होने की बात कहकर संकेत दिया है कि वे लंबे समय तक इस मुद्दे पर दबाव बनाए रखेंगे।

आर्थिक एकीकरण का 'हथियारीकरण'

कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने इस घटनाक्रम पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए इसे एक "संस्थागत बीमारी" करार दिया। उन्होंने चेतावनी दी कि महाशक्तियां अब:

  • व्यापारिक टैरिफ को 'दबाव के औजार' के रूप में इस्तेमाल कर रही हैं।
  • सप्लाई चेन को दूसरे देशों की 'कमजोरी' बनाकर उनका दोहन कर रही हैं।
  • अंतरराष्ट्रीय नियमों के स्थान पर 'पाशविक बल' को प्राथमिकता दे रही हैं।

मध्यम शक्तियों (भारत, कनाडा) के लिए चेतावनी

  • दुनिया की "मध्यम शक्तियां" अक्सर संकट से बचने के लिए महाशक्तियों की 'जी-हुज़ूरी' या 'समायोजन' करने लगती हैं।
  • लेकिन मार्क कार्नी का स्पष्ट कहना है कि "अनुपालन से सलामती हासिल नहीं होगी।" यदि आज नियम-आधारित व्यवस्था टूटती है, तो कल इसका खामियाजा हर छोटे-बड़े देश को भुगतना पड़ेगा।

भारत की स्थिति: सतर्कता ही सुरक्षा है

भारत और अमेरिका के सम्बन्ध पिछले कुछ समय से बहुत स्थिर नहीं रहे हैं, ट्रंप की कार्यशैली यह सिद्ध करती है कि वे अपने हितों के लिए किसी भी समय 'कानून के शासन' को ताक पर रख सकते हैं। भारत को यह विचार करना होगा कि:

  • क्या वैश्विक मंच पर अमेरिका के वादे घर (घरेलू नीतियों) में सच साबित होंगे?
  • क्या भारत को भी ऐसे ही 'आर्थिक हथियारीकरण' का सामना करना पड़ सकता है?


निष्कर्ष

दावोस 2026 में ट्रंप का भाषण तनाव घटाने वाला तो है, लेकिन यह किसी दीर्घकालिक शांति का वादा नहीं करता। ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप की महत्वाकांक्षाएं अब सैन्य बल से बदलकर 'मिसाइल रक्षा' और 'आर्थिक दबाव' के स्वरूप में गई हैं। यूरोप की जवाबी कार्रवाई ने यह तो सिद्ध कर दिया कि एकजुटता से महाशक्तियों को रोका जा सकता है, लेकिन नियम-आधारित विश्व व्यवस्था की नींव अब भी डगमगा रही है।