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सामान्य अध्ययन पेपर – III प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन
संदर्भ
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो ) के 'वर्कहॉर्स' कहे जाने वाले ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान (PSLV) का इतिहास स्वर्णिम रहा है। हालांकि, हालिया समय में इसकी विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगे हैं। मई 2025 में PSLV-C61 की विफलता के बाद, 12 जनवरी 2026 को PSLV-C62 का असफल होना भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए एक 'बैक-टू-बैक' झटका है। यह घटनाक्रम इसरो के तीन दशकों के सफल ट्रैक रिकॉर्ड में एक दुर्लभ और चिंताजनक मोड़ है।
PSLV-C62 मिशन:
- लॉन्च तिथि व स्थान: 12 जनवरी 2026, सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र (SDSC), श्रीहरिकोटा।
- प्रक्षेपण यान: PSLV-DL (दो स्ट्रैप-ऑन मोटर्स वाला संस्करण)।
- मुख्य पेलोड: EOS-N1 (अन्वेषा) - यह डीआरडीओ द्वारा विकसित एक अत्याधुनिक हाइपरस्पेक्ट्रल अर्थ ऑब्जर्वेशन उपग्रह था।
- सह-यात्री पेलोड: कुल 15 छोटे उपग्रह, जिनमें थाईलैंड का THEOS-2A और स्पेन का KID (प्रौद्योगिकी प्रदर्शक) शामिल थे।
- मिशन का महत्व: यह 2026 का पहला मिशन और न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड (NSIL) का 9वां समर्पित वाणिज्यिक मिशन था।
चर्चा में क्यों?
PSLV-C62 वर्तमान में वैश्विक और राष्ट्रीय मीडिया में अपनी विफलता के कारण चर्चा का केंद्र है। 32 वर्षों के इतिहास में यह पहली बार है जब PSLV लगातार दो मिशनों में असफल रहा है। विशेष रूप से, दोनों विफलताओं का केंद्र रॉकेट का तीसरा चरण (PS3) रहा है, जिसने रक्षा (डीआरडीओ) और अंतरराष्ट्रीय ग्राहकों के महत्वपूर्ण पेलोड को नष्ट कर दिया।
PSLV-C62 के साथ क्या हुआ?
लॉन्च के प्रारंभिक दो चरण (ठोस और तरल) पूरी तरह सामान्य रहे। समस्या तीसरे चरण (PS3), जो एक ठोस ईंधन मोटर है, के अंत में शुरू हुई:
- तकनीकी खराबी: रॉकेट के 'रोल रेट' (घुमाव गति) में अचानक विचलन देखा गया।
- परिणाम: रॉकेट अपने निर्धारित प्रक्षेप पथ से भटक गया और उपग्रहों को कक्षा में स्थापित करने के लिए आवश्यक वेग प्राप्त नहीं कर सका। अंततः, यान और उपग्रह हिंद महासागर के ऊपर वायुमंडल में जलकर नष्ट हो गए।
इसरो अध्यक्ष वी. नारायणन का वक्तव्य
इसरो अध्यक्ष ने प्रेस को संबोधित करते हुए कहा:
- "वाहन ने तीसरे चरण के अंत तक अपेक्षित प्रदर्शन किया, लेकिन अंतिम क्षणों में एक असामान्य विक्षोभ देखा गया।"
- उन्होंने स्वीकार किया कि डेटा विश्लेषण से पता चलता है कि उड़ान पथ में विचलन के कारण मिशन सफल नहीं हो सका।
- उन्होंने आश्वासन दिया कि विफलता के मूल कारण की गहन जांच के लिए एक उच्च-स्तरीय समिति गठित की गई है।
अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया
थाईलैंड की अंतरिक्ष एजेंसी GISTDA ने संयमित लेकिन गंभीर प्रतिक्रिया दी:
- उन्होंने THEOS-2A की हानि की पुष्टि की लेकिन इसे इंजीनियरिंग सीखने का एक हिस्सा बताया।
- GISTDA ने स्पष्ट किया कि मिशन का पूर्ण बीमा था, जिससे वित्तीय हानि की भरपाई होगी, लेकिन रणनीतिक देरी एक बड़ी चिंता है।
मिशन की विफलता के प्रभाव
- रणनीतिक क्षति: डीआरडीओ के 'अन्वेषा' उपग्रह का नष्ट होना भारत की निगरानी क्षमताओं के लिए एक झटका है।
- वाणिज्यिक छवि: अंतरराष्ट्रीय ग्राहकों (स्पेन, थाईलैंड, ब्राजील) के उपग्रहों का नुकसान भविष्य के वाणिज्यिक अनुबंधों और बीमा प्रीमियम की दरों को प्रभावित कर सकता है।
- प्रतिस्पर्धा: स्पेसएक्स (SpaceX) जैसे निजी दिग्गजों के दौर में, PSLV की 'किफायती और विश्वसनीय' होने की छवि को धक्का लगा है।
भारत के अंतरिक्ष मिशनों की वर्तमान स्थिति
विफलताओं के बावजूद, भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम दोहरे पथ पर है। एक ओर PSLV जैसी स्थापित प्रणालियों में तकनीकी चुनौतियाँ आ रही हैं, वहीं दूसरी ओर LVM-3 की सफलता (जैसे दिसंबर 2025 का M6 मिशन) और गगनयान की तैयारी भारत के बढ़ते कद को दर्शाती है। निजी क्षेत्र की भागीदारी (Start-ups) में भी अभूतपूर्व वृद्धि देखी गई है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की स्थिति:
वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में भारत की अंतरिक्ष स्थिति को निम्नलिखित तीन स्तंभों के आधार पर समझा जा सकता है:
- किफायती और विश्वसनीय विकल्प : भारत दुनिया का सबसे 'लागत-प्रभावी' अंतरिक्ष केंद्र है। मंगलयान और चंद्रयान-3 की सफलता ने यह सिद्ध किया है कि भारत पश्चिमी देशों की तुलना में बहुत कम खर्च पर जटिल मिशन पूरे कर सकता है। यह 'ग्लोबल साउथ' (विकासशील देशों) के लिए भारत को एकमात्र किफायती विकल्प बनाता है।
- रणनीतिक सॉफ्ट पावर: 'दक्षिण एशिया उपग्रह' और 'निसार' (NASA-ISRO सहयोग) के माध्यम से भारत अंतरिक्ष का उपयोग कूटनीतिक संबंधों को मजबूत करने के लिए कर रहा है। भारत अब केवल एक उपग्रह प्रक्षेपक नहीं, बल्कि वैश्विक डेटा और आपदा प्रबंधन में एक 'नेटवर्क हब' बन चुका है।
- वाणिज्यिक प्रतिस्पर्धा और Space 2.0: रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद उपजे भू-राजनीतिक संकट के बीच, भारत के LVM-3 ने वैश्विक बाजार में रूस की जगह लेने की क्षमता दिखाई है। साथ ही, 'इन-स्पेस' (IN-SPACe) के माध्यम से निजी क्षेत्र (जैसे Skyroot, Agnikul) की भागीदारी भारत को अमेरिका (SpaceX) के बाद दूसरी सबसे बड़ी निजी अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था बनाने की ओर अग्रसर है।
विफलता विश्लेषण समिति (FAC) और भारत की कार्यप्रणाली
- विफलता विश्लेषण समिति का स्वरूप: इसरो में FAC कोई 'स्थायी निकाय' नहीं है, बल्कि यह प्रत्येक विफलता के बाद गठित होने वाली एक तदर्थ समिति है।
- PSLV-C61 की रिपोर्ट: C61 की रिपोर्ट अभी तक सार्वजनिक नहीं की गई है, जिससे विशेषज्ञ पारदर्शिता पर सवाल उठा रहे हैं। C62 के लिए भी ऐसी ही समिति जांच कर रही है।
विश्लेषण
लगातार दो विफलताएं इंगित करती हैं कि समस्या केवल मानवीय त्रुटि नहीं, बल्कि प्रणालीगत हो सकती है। तीसरे चरण में बार-बार आने वाली समस्या 'क्वालिटी कंट्रोल' या 'सप्लाई चेन' में किसी गहरे दोष की ओर इशारा करती है।
आगे की राह
- पारदर्शिता: इसरो को C61 और C62 की विफलता रिपोर्टों के महत्वपूर्ण अंशों को सार्वजनिक करना चाहिए ताकि वैश्विक बाजार में विश्वास बहाल हो सके।
- तकनीकी ऑडिट: पूरे PS3 स्टेज का नए सिरे से 'एंड-टू-एंड' ऑडिट अनिवार्य है।
- निजीकरण में तेजी: प्रक्षेपण सेवाओं को निजी हाथों (जैसे NSIL के माध्यम से) में सौंपने की प्रक्रिया को तेज करना चाहिए ताकि इसरो केवल अनुसंधान और गहरे अंतरिक्ष मिशनों पर ध्यान केंद्रित कर सके।
निष्कर्ष
PSLV-C62 की विफलता इसरो के लिए आत्म-अवलोकन और गहन विश्लेषण का क्षण है। यद्यपि वैज्ञानिक अन्वेषणों में विफलताएं स्वाभाविक हैं, किंतु इसरो के 'वर्कहॉर्स' कहे जाने वाले विश्वसनीय रॉकेट में त्रुटियों की पुनरावृत्ति गंभीर चिंता का विषय है। भारत को अपनी भविष्य की अंतरिक्ष महत्वाकांक्षाओं को सुरक्षित करने हेतु अब 'गति' की तुलना में 'सटीकता, गुणवत्ता नियंत्रण और पारदर्शिता' को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी। जहाँ एक ओर अमेरिका और चीन के मध्य 'अंतरिक्ष प्रभुत्व' की प्रतिस्पर्धी होड़ व्याप्त है, वहीं भारत ने स्वयं को एक 'सहयोगी, विश्वसनीय और उत्तरदायी अंतरिक्ष शक्ति' के रूप में वैश्विक पटल पर स्थापित किया है। PSLV-C62 के रूप में सामने आई हालिया तकनीकी बाधाएं निश्चित रूप से चुनौतीपूर्ण हैं, किंतु गगनयान और वर्ष 2035 तक स्वयं के 'भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन' की स्थापना जैसे दीर्घकालिक लक्ष्य भारत की वैश्विक स्थिति और सामरिक संकल्प को अडिग रखते हैं।
सामान्य अध्ययन पेपर – III प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन
संदर्भ
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) की क्रांति ने वैश्विक अर्थव्यवस्था और उत्पादकता के नए द्वार खोले हैं, किंतु इसके समानांतर एक गंभीर संकट 'ऊर्जा की भारी खपत' के रूप में उभरा है। वर्तमान में डेटासेंटर वैश्विक बिजली खपत का लगभग 2% हिस्सा रखते हैं, जिसके 2030 तक AI के प्रभाव के कारण कई गुना बढ़ने का अनुमान है। इस चुनौती से निपटने हेतु गूगल का 'प्रोजेक्ट सनकैचर' और इसरो द्वारा अंतरिक्ष-आधारित डेटासेंटर तकनीक पर किया जा रहा अध्ययन एक युगांतरकारी कदम माना जा रहा है।
AI और डेटासेंटर: ऊर्जा का संकट क्यों?
AI मॉडल, विशेष रूप से लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स (जैसे GPT-4), के प्रशिक्षण और परिनियोजन के लिए ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट्स (GPU) के सघन क्लस्टर की आवश्यकता होती है।
- अत्यधिक ऊष्मा उत्सर्जन: ये सर्वर काम करते समय भारी मात्रा में गर्मी उत्पन्न करते हैं।
- शीतलन लागत: पृथ्वी पर डेटासेंटरों को ठंडा रखने के लिए लाखों लीटर पानी और विशाल मात्रा में बिजली खर्च होती है।
- निवेश का दबाव: 2030 तक इस क्षेत्र में लगभग 3 ट्रिलियन डॉलर के निवेश का अनुमान है, जो पृथ्वी के संसाधनों पर अभूतपूर्व दबाव डालेगा।
इन-ऑर्बिट (अंतरिक्ष) डेटासेंटर की अवधारणा
इस तकनीक के तहत डेटासेंटर सर्वरों को पृथ्वी की निचली कक्षा (LEO) में स्थापित उपग्रहों पर रखा जाता है।
- अनंत सौर ऊर्जा: अंतरिक्ष में वायुमंडल की अनुपस्थिति के कारण सौर पैनल पृथ्वी की तुलना में 8 से 10 गुना अधिक ऊर्जा उत्पन्न कर सकते हैं।
- प्राकृतिक शीतलन: अंतरिक्ष का अत्यधिक निम्न तापमान सर्वरों की गर्मी को विकिरण के माध्यम से प्रभावी ढंग से प्रबंधित करने में सहायक है।
- गूगल का प्रोजेक्ट सनकैचर: यह परियोजना सूर्य की निरंतर रोशनी प्राप्त करने वाली 'डॉन-डस्क ऑर्बिट' का उपयोग करके 24x7 बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करने का लक्ष्य रखती है।
इसरो का दृष्टिकोण और भारतीय प्रयास
भारत की अंतरिक्ष एजेंसी इसरो भी इस दिशा में 'एज कंप्यूटिंग' पर ध्यान केंद्रित कर रही है।
- डेटा प्रोसेसिंग: इसरो का लक्ष्य है कि उपग्रहों द्वारा एकत्रित डेटा को अंतरिक्ष में ही प्रोसेस किया जाए, जिससे पृथ्वी पर डेटा भेजने की बैंडविड्थ लागत कम हो।
- तकनीकी विकास: भारत 'रेडिएशन-हार्डन' इलेक्ट्रॉनिक्स (विकिरण प्रतिरोधी) विकसित कर रहा है, जो अंतरिक्ष के कठोर वातावरण में डेटा को सुरक्षित रख सकें।
रणनीतिक और पर्यावरणीय महत्व
- कार्बन फुटप्रिंट में कमी: पारंपरिक डेटासेंटर जीवाश्म ईंधन पर निर्भर हैं; अंतरिक्ष डेटासेंटर पूरी तरह 'हरित ऊर्जा' पर आधारित होंगे।
- संसाधन संरक्षण: पृथ्वी पर भूमि और स्वच्छ जल जैसे सीमित संसाधनों की बचत होगी।
- सॉफ्ट पावर: इस तकनीक में अग्रणी होने से भारत और अन्य प्रमुख देश वैश्विक AI बुनियादी ढांचे को नियंत्रित कर सकेंगे।
प्रमुख चुनौतियाँ
अंतरिक्ष कचरा: हजारों डेटा-सैटेलाइट्स के प्रक्षेपण से कक्षा में भीड़भाड़ और 'केसलर सिंड्रोम' (टकराव का खतरा) बढ़ेगा।
- लेटेंसी : अंतरिक्ष से पृथ्वी तक डेटा सिग्नल आने-जाने में होने वाली देरी वास्तविक समय के AI अनुप्रयोगों के लिए एक बाधा हो सकती है।
- रखरखाव और मरम्मत: पृथ्वी के विपरीत, अंतरिक्ष में खराब हार्डवेयर को बदलना या ठीक करना वर्तमान में अत्यधिक महंगा और जटिल है।
- साइबर सुरक्षा: अंतरिक्ष में स्थित डेटा को हैकिंग या इलेक्ट्रॉनिक युद्ध से बचाना एक नई चुनौती होगी।
विश्लेषण
अंतरिक्ष-आधारित डेटासेंटर केवल एक तकनीकी नवाचार नहीं, बल्कि 'सतत विकास लक्ष्यों' (SDGs) को प्राप्त करने की दिशा में एक रणनीतिक आवश्यकता है। जहाँ एक ओर यह AI की ऊर्जा भूख को शांत करेगा, वहीं दूसरी ओर यह 'अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था' के व्यवसायीकरण को भी गति देगा। हालांकि, इसकी सफलता प्रक्षेपण लागत में कमी आने और प्रभावी विकिरण सुरक्षा तकनीकों पर निर्भर करेगी।
आगे की राह
- पुन: प्रयोज्य रॉकेट : डेटासेंटर उपग्रहों को लॉन्च करने की लागत कम करने के लिए इसरो के RLV और स्पेसएक्स के स्टारशिप जैसे वाहनों का विकास अनिवार्य है।
- अंतरराष्ट्रीय नियमन: अंतरिक्ष कचरे और साइबर सुरक्षा के लिए एक वैश्विक 'स्पेस डेटा गवर्नेंस' ढांचा तैयार किया जाना चाहिए।
- हाइब्रिड मॉडल: महत्वपूर्ण और संवेदनशील डेटा पृथ्वी पर तथा भारी गणना वाले AI कार्यों को अंतरिक्ष में स्थानांतरित किया जाना चाहिए।
निष्कर्ष
अंतरिक्ष-आधारित डेटासेंटर भविष्य की डिजिटल अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन सकते हैं। AI की ऊर्जा मांगों और पर्यावरणीय स्थिरता के बीच संतुलन बिठाने के लिए यह तकनीक एक वरदान सिद्ध होगी। यदि भारत और गूगल जैसे वैश्विक हितधारक इन चुनौतियों का समाधान कर लेते हैं, तो हम एक ऐसे युग में प्रवेश करेंगे जहाँ तकनीक और प्रकृति के बीच कोई द्वंद्व नहीं होगा।
सामान्य अध्ययन पेपर – III प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन।
संदर्भ
ऐतिहासिक रूप से भारत की अर्थव्यवस्था 'सेवा क्षेत्र' के नेतृत्व में आगे बढ़ी है, जिससे विनिर्माण क्षेत्र का सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में योगदान लगभग 15-16% पर स्थिर रहा। इस असंतुलन को दूर करने और भारत को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का अभिन्न हिस्सा बनाने के लिए 'मेक इन इंडिया' के तहत उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजना की नींव रखी गई। वर्तमान में, सरकार अब छोटे विमानों के निर्माण के लिए ₹15,000 करोड़ की नई पीएलआई योजना लाने की तैयारी में है, जो रक्षा और नागरिक उड्डयन में 'आत्मनिर्भर भारत' की दिशा में एक बड़ा कदम है।
पीएलआई योजना क्या है?
उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) एक 'प्रदर्शन-आधारित' प्रोत्साहन मॉडल है। इसके तहत घरेलू स्तर पर निर्मित वस्तुओं की वृद्धिशील बिक्री पर कंपनियों को नकद प्रोत्साहन दिया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य घरेलू कंपनियों को अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ाने, निर्यात को प्रोत्साहित करने और विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) को आकर्षित करने के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करना है।
- पीएलआई योजना की शुरुआत सबसे पहले मार्च 2020 में की गई थी।
- शुरुआत में इसे केवल तीन विशिष्ट क्षेत्रों के लिए लॉन्च किया गया था:
- बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण।
- फार्मास्युटिकल घटक।
- चिकित्सा उपकरण।
- इसकी सफलता को देखते हुए, नवंबर 2020 में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 10 और क्षेत्रों को इसमें शामिल करने की मंजूरी दी। वर्तमान में यह कुल 14 रणनीतिक क्षेत्रों में लागू है।
- योजना की निगरानी और नीतिगत समन्वय वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय (DPIIT) द्वारा किया जाता है।
चर्चा में क्यों?
- विमानन क्षेत्र में नई पहल: सरकार ₹15,000 करोड़ के परिव्यय के साथ छोटे विमानों (19 सीटों से कम) के निर्माण को बढ़ावा दे रही है। इसका उद्देश्य UDAN योजना के तहत क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को मजबूत करना और सेसना (Cessna) व एम्ब्रेयर (Embraer) जैसे विदेशी विमानों पर निर्भरता कम करना है।
- इलेक्ट्रॉनिक्स की सफलता: हालिया रिपोर्टों के अनुसार, इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण (विशेषकर मोबाइल फोन) में उत्पादन वित्त वर्ष 2021 के ₹2.13 लाख करोड़ से बढ़कर वित्त वर्ष 2025 में ₹5.45 लाख करोड़ (146% की वृद्धि) हो गया है।
भारत सरकार की प्रमुख पहल
सरकार ने विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने के लिए बहु-आयामी दृष्टिकोण अपनाया है:
- क्षेत्रीय विस्तार: शुरुआत में 3 क्षेत्रों से शुरू होकर, अब पीएलआई 14 रणनीतिक क्षेत्रों (जैसे- फार्मा, सौर मॉड्यूल, ऑटोमोबाइल, ड्रोन आदि) में विस्तारित है।
- बजट 2026 की तैयारी: छोटे विमानों के लिए समर्पित फंड और परीक्षण बुनियादी ढांचे (जैसे बैंगलोर में राष्ट्रीय उड़ान परीक्षण केंद्र) का उन्नयन।
- प्रधानमंत्री गति शक्ति: लॉजिस्टिक्स लागत को कम करने के लिए बुनियादी ढांचे का एकीकरण।
- रखरखाव, मरम्मत और ओवरहॉल (MRO) नीति: विमानन क्षेत्र में विनिर्माण के साथ-साथ सेवाओं को भी स्थानीय बनाना।
पीएलआई का महत्व
- आयात प्रतिस्थापन: इलेक्ट्रॉनिक्स और विमानन जैसे क्षेत्रों में उच्च आयात बिल को कम करना।
- रोजगार सृजन: विमानन विनिर्माण में 10,000 से अधिक प्रत्यक्ष और लाखों अप्रत्यक्ष नौकरियों का अनुमान।
- FDI का आकर्षण: अकेले इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र में $4 बिलियन का FDI निवेश, जिसमें से 70% पीएलआई लाभार्थियों के पास गया।
- तकनीकी हस्तांतरण: वैश्विक मूल उपकरण निर्माताओं (OEMs) के साथ संयुक्त उद्यम के माध्यम से उन्नत तकनीक का भारत में आगमन।
चुनौतियां
- संवितरण की धीमी गति: कुल ₹1.97 लाख करोड़ के बजट में से सितंबर 2025 तक केवल 12% (₹23,946 करोड़) ही वितरित किया गया है।
- निम्न मूल्यवर्धन: उत्पादन बढ़ा है, लेकिन असेंबली पर जोर अधिक है। वास्तविक 'कंपोनेंट विनिर्माण' और स्वदेशी अनुसंधान एवं विकास (R&D) अभी भी शैशवावस्था में है।
- कौशल की कमी: एयरोस्पेस इंजीनियरिंग जैसे विशिष्ट क्षेत्रों में कुशल कार्यबल का अभाव।
- नियामक बाधाएं: विमानन जैसे क्षेत्रों में वैश्विक सुरक्षा मानकों (FAA/EASA) का अनुपालन और जटिल प्रमाणन प्रक्रिया।
विश्लेषण
पीएलआई योजना ने भारत की विनिर्माण छवि को 'लो-टेक' से 'हाई-टेक' की ओर स्थानांतरित किया है। इलेक्ट्रॉनिक्स में 146% की वृद्धि इस बात का प्रमाण है कि राजकोषीय प्रोत्साहन निजी निवेश को सक्रिय कर सकते हैं। हालांकि, विमानन क्षेत्र में सफलता के लिए केवल वित्तीय सहायता पर्याप्त नहीं होगी; इसके लिए एक पूर्ण एयरोस्पेस इकोसिस्टम (धातु विज्ञान से लेकर सॉफ्टवेयर तक) की आवश्यकता है। यह चीन और वियतनाम जैसे प्रतिस्पर्धियों के मुकाबले भारत की लागत प्रतिस्पर्धात्मकता की परीक्षा भी होगी।
आगे की राह
- एम्एसएम्ई का सशक्तिकरण: पीएलआई के लाभों को आपूर्ति श्रृंखला के निचले स्तर तक पहुँचाना ताकि सूक्ष्म और लघु उद्योग भी बड़े उद्योगों के साथ जुड़ सकें।
- अनुसंधान एवं विकास पर ध्यान: सरकार को 'इनोवेशन लिंक्ड इंसेंटिव' (ILI) पर भी विचार करना चाहिए ताकि केवल उत्पादन ही नहीं, बल्कि बौद्धिक संपदा (IP) भी भारत की हो।
- प्रमाणन का सरलीकरण: डीजीसीए और अंतर्राष्ट्रीय निकायों के बीच सहयोग बढ़ाकर प्रमाणन में लगने वाले समय को कम करना।
- स्थानीय मूल्यवर्धन: चिप निर्माण और विमान के इंजनों जैसे महत्वपूर्ण घटकों के स्थानीय विनिर्माण पर अधिक ध्यान देना।
निष्कर्ष
₹15,000 करोड़ की विमानन पीएलआई योजना भारत के 'विकसित भारत @2047' के विजन का एक अनिवार्य हिस्सा है। यह न केवल हमारी सामरिक स्वायत्तता को सुरक्षित करती है बल्कि भारत को वैश्विक निर्यात बाजार में एक गंभीर खिलाड़ी के रूप में स्थापित करती है। यदि क्रियान्वयन की बाधाओं को दूर कर लिया जाए, तो भारत 2030 तक विमानन और इलेक्ट्रॉनिक्स दोनों क्षेत्रों में एक शुद्ध निर्यातक बनने की क्षमता रखता है।
सामान्य अध्ययन पेपर – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध
सामान्य अध्ययन पेपर – III प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन
संदर्भ
हाल ही में वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के अंतर्गत 'उद्योग संवर्धन और आंतरिक व्यापार विभाग' (DPIIT) द्वारा 'राज्यों की स्टार्टअप इकोसिस्टम रैंकिंग' का 5वां संस्करण जारी किया गया। इस रैंकिंग में उत्तराखंड को एक सुदृढ़ और नवाचार-संचालित स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करने के लिए 'लीडर' श्रेणी में मान्यता दी गई है। 16 जनवरी 2026 को 'राष्ट्रीय स्टार्टअप दिवस' के अवसर पर राज्य के उद्योग विभाग को इस उपलब्धि हेतु 'प्रशंसा पत्र' प्रदान किया गया।
स्टार्टअप इंडिया:
भारत सरकार की एक प्रमुख पहल है, जिसे 16 जनवरी 2016 को प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा लॉन्च किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य भारत में एक ऐसा पारिस्थितिकी तंत्र बनाना है जो नवाचार को बढ़ावा दे और बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर पैदा करे।
स्टार्टअप
सरकार के अनुसार, कोई भी कंपनी 'स्टार्टअप' तब कहलाती है जब:
- वह 10 वर्ष से अधिक पुरानी न हो।
- उसका वार्षिक टर्नओवर ₹100 करोड़ से अधिक न हो।
- वह किसी पुरानी कंपनी को तोड़कर न बनाई गई हो।
- वह नवाचार, सुधार या स्केलेबिलिटी पर काम कर रही हो।
स्टार्टअप रैंकिंग: संरचना और मानक
DPIIT द्वारा जारी यह रैंकिंग राज्यों को उनके द्वारा प्रदान की जाने वाली नीतिगत सहायता, संस्थागत ढांचे और निवेश की सुगमता के आधार पर विभिन्न श्रेणियों में विभाजित करती है:
- श्रेणियां: सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शनकर्ता, शीर्ष प्रदर्शनकर्ता, लीडर, महत्वाकांक्षी लीडर और उभरते स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र।
- प्रमुख स्तंभ: संस्थागत समर्थन, नवाचार को बढ़ावा, बाजार तक पहुंच, वित्त पोषण और क्षमता निर्माण।
उत्तराखंड की सफलता के प्रमुख कारक
उत्तराखंड ने अपनी भौगोलिक चुनौतियों को अवसरों में बदलते हुए 'लीडर' का दर्जा प्राप्त किया है। इसके पीछे निम्नलिखित प्रयास महत्वपूर्ण रहे हैं:
- अनुकूल नीतिगत ढांचा: राज्य सरकार ने स्टार्टअप्स के लिए सरल पंजीकरण प्रक्रिया और 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' को प्राथमिकता दी है।
- युवा केंद्रित दृष्टिकोण: मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के अनुसार, सरकार ने स्थानीय युवाओं की नवाचार क्षमता को पहचानने और उन्हें हर स्तर पर मेंटरशिप प्रदान करने के लिए विशेष कार्यक्रम संचालित किए हैं।
- संसाधनों की सुलभता: इन्क्यूबेशन सेंटरों की स्थापना, स्टार्टअप फंड की उपलब्धता और सरकारी खरीद में स्टार्टअप्स को वरीयता देना।
- महानगरीय केंद्रों से परे नवाचार: उत्तराखंड का मॉडल यह सिद्ध करता है कि स्टार्टअप संस्कृति केवल टियर-1 शहरों तक सीमित नहीं है, बल्कि छोटे राज्यों और पहाड़ी क्षेत्रों में भी फल-फूल सकती है।
रणनीतिक और आर्थिक प्रभाव
- स्वरोजगार और रिवर्स माइग्रेशन: स्टार्टअप इकोसिस्टम का विकास राज्य में युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा कर रहा है, जो 'पलायन' जैसी गंभीर समस्या के समाधान में सहायक है।
- निवेश आकर्षण: 'लीडर' का दर्जा मिलने से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय निवेशकों का भरोसा उत्तराखंड की ओर बढ़ेगा, जिससे राज्य की अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी।
- विविधीकरण: पर्यटन के अलावा कृषि-तकनीक, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में स्टार्टअप्स का उदय राज्य के आर्थिक आधार को व्यापक बना रहा है।
चुनौतियाँ
लीडर का दर्जा प्राप्त करने के बावजूद कुछ चुनौतियाँ अभी भी विद्यमान हैं:
- भौगोलिक बाधाएं: पर्वतीय क्षेत्रों में लॉजिस्टिक और कनेक्टिविटी की समस्या।
- तकनीकी अवसंरचना: दूरस्थ क्षेत्रों में उच्च गति इंटरनेट और डिजिटल साक्षरता का अभाव।
- पूंजी की कमी: शुरुआती चरण के स्टार्टअप्स के लिए पर्याप्त निजी निवेश की उपलब्धता सुनिश्चित करना।
विभिन्न श्रेणियों में प्रमुख राज्यों की स्थिति निम्नलिखित है: |
सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शनकर्ता ये वे राज्य हैं जिन्होंने स्टार्टअप्स के लिए सबसे उत्कृष्ट और समग्र पारिस्थितिकी तंत्र तैयार किया है।
शीर्ष प्रदर्शनकर्ता ये राज्य स्टार्टअप इकोसिस्टम को तेजी से विकसित कर रहे हैं और 'सर्वश्रेष्ठ' बनने की ओर अग्रसर हैं।
लीडर्स इस श्रेणी में वे राज्य शामिल हैं जो एक मजबूत आधार तैयार कर चुके हैं और विशिष्ट क्षेत्रों में नेतृत्व कर रहे हैं।
महत्वाकांक्षी लीडर्स वे राज्य जो अभी बुनियादी ढांचे और नीतियों को सुव्यवस्थित कर रहे हैं।
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विश्लेषण
उत्तराखंड की यह उपलब्धि भारत के 'विकसित भारत @2047' के लक्ष्य की दिशा में 'सहकारी संघवाद' का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। यह दर्शाता है कि केंद्र की 'स्टार्टअप इंडिया' जैसी योजनाओं को यदि राज्य अपनी स्थानीय आवश्यकताओं (जैसे- स्थानीय जड़ी-बूटियों या हस्तशिल्प पर आधारित स्टार्टअप) के साथ जोड़ें, तो वे समावेशी विकास प्राप्त कर सकते हैं।
आगे की राह
- जिला स्तरीय फोकस: प्रत्येक जिले में विशिष्ट 'स्टार्टअप हब' विकसित करना।
- अकादमिक सहयोग: विश्वविद्यालयों और तकनीकी संस्थानों को स्टार्टअप इकोसिस्टम से जोड़ना ताकि अनुसंधान को व्यवसाय में बदला जा सके।
- सतत निगरानी: सरकारी योजनाओं के कार्यान्वयन में पारदर्शिता और फीडबैक तंत्र को मजबूत करना।
निष्कर्ष
उत्तराखंड का 'लीडर' के रूप में उभरना राज्य की उद्यमिता यात्रा में एक मील का पत्थर है। यह उपलब्धि केवल एक रैंकिंग नहीं, बल्कि उत्तराखंड के युवाओं की नवाचार शक्ति पर एक राष्ट्रीय मुहर है। यदि राज्य इसी निरंतरता और संकल्प के साथ कार्य करता रहा, तो वह भविष्य में 'सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शनकर्ता' की श्रेणी में स्थान बनाकर देश के लिए एक रोल मॉडल सिद्ध होगा।
सामान्य अध्ययन पेपर – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध
संदर्भ
भारत लंबे समय से स्वयं को एक 'वैश्विक मध्यस्थता केंद्र' के रूप में स्थापित करने का प्रयास कर रहा है। 1996 के मूल अधिनियम में 2015 और 2019 में महत्वपूर्ण संशोधन किए गए, जिनका उद्देश्य न्यायिक हस्तक्षेप को कम करना और विवादों का त्वरित समाधान सुनिश्चित करना था। वर्तमान में, अक्टूबर 2024 में सरकार द्वारा जारी 'मध्यस्थता और सुलह (संशोधन) विधेयक, 2024' का मसौदा और जनवरी 2025 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा 'भारतीय मध्यस्थता परिषद' (एसीआई) के गठन पर केंद्र से मांगा गया जवाब इस दिशा में नवीनतम घटनाक्रम हैं।
मध्यस्थता और सुलह (संशोधन) विधेयक, 2024
यह मसौदा विधेयक 1996 के अधिनियम में सुधार कर भारत को एक 'प्रदत्त-अनुकूल' क्षेत्राधिकार बनाने का प्रयास करता है। इसके मुख्य प्रस्ताव निम्नलिखित हैं:
- शब्दावली में स्पष्टता: 'मध्यस्थता का स्थान' के बजाय 'सीट' और 'वेन्यू' जैसे शब्दों का प्रयोग कर कानूनी अस्पष्टता को समाप्त करना।
- न्यायिक हस्तक्षेप में कमी: एक बार ट्रिब्यूनल गठित होने के बाद, अंतरिम राहत के लिए धारा 9 (न्यायालय) के बजाय धारा 17 (ट्रिब्यूनल) के उपयोग पर जोर।
- आपातकालीन मध्यस्थता: विदेशी और घरेलू आपातकालीन मध्यस्थों के आदेशों को कानूनी मान्यता प्रदान करना।
- स्वतंत्र सुलह अधिनियम: 'सुलह' को इस अधिनियम से अलग कर एक स्वतंत्र ढांचे के रूप में विकसित करना।
चर्चा में क्यों है?
- एसीआई का लंबित गठन: 2019 के संशोधन में प्रस्तावित होने के बावजूद, 'भारतीय मध्यस्थता परिषद' (एसीआई) का गठन अभी तक नहीं हुआ है। 23 जनवरी, 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने इस विलंब पर केंद्र सरकार से स्पष्टीकरण मांगा था।
- संस्थागत निष्पक्षता: मध्यस्थता की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और निष्पक्ष बनाने के लिए एक नियामक निकाय (एसीआई) की तत्काल आवश्यकता महसूस की जा रही है।
भारतीय मध्यस्थता परिषद (एसीआई) क्या है?
यह एक प्रस्तावित स्वायत्त वैधानिक निकाय है, जिसके मुख्य कार्य और बिंदु निम्न हैं:
- नियामक भूमिका: मध्यस्थता संस्थानों की ग्रेडिंग करना और मध्यस्थों के लिए पेशेवर मानक और मान्यता तय करना।
- अभिलेखीय कार्य: भारत में दिए गए सभी मध्यस्थता निर्णयों का एक राष्ट्रीय डेटाबेस तैयार करना।
- प्रशिक्षण: मध्यस्थता और वैकल्पिक विवाद समाधान (एडीआर ) के क्षेत्र में प्रशिक्षण और अनुसंधान को बढ़ावा देना।
यह क्यों महत्वपूर्ण है?
- न्यायालयों का बोझ कम करना: भारत की अदालतों में लंबित करोड़ों मामलों को सुलझाने के लिए एक मजबूत एडीआर तंत्र अनिवार्य है।
- ईज ऑफ डूइंग बिजनेस: विदेशी निवेशकों के लिए एक विश्वसनीय और त्वरित विवाद समाधान तंत्र भारत में निवेश बढ़ाने के लिए आवश्यक है।
- मानकीकरण: मध्यस्थों के लिए समान दिशा-निर्देश होने से प्रक्रिया की गुणवत्ता और विश्वसनीयता बढ़ती है।
संरचना एवं चिंताएं
- संरचना: एसीआई की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश, हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश या एक प्रतिष्ठित विशेषज्ञ द्वारा की जाएगी। इसमें केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त पदेन सदस्य और विशेषज्ञ शामिल होंगे।
- चिताएं
- सरकारी नियंत्रण: परिषद में कार्यपालिका के सदस्यों की उपस्थिति से इसकी स्वतंत्रता और 'संस्थागत निष्पक्षता' पर सवाल उठते हैं।
- विवादों में सरकार का पक्ष: भारत सरकार अक्सर मध्यस्थता के मामलों में खुद एक पक्ष होती है। ऐसे में सरकार द्वारा नियंत्रित निकाय द्वारा मध्यस्थों का विनियमन 'हितों के टकराव' को जन्म दे सकता है।
- सेवानिवृत्त न्यायाधीशों पर निर्भरता: मध्यस्थों की नियुक्ति में अभी भी सेवानिवृत्त न्यायाधीशों का प्रभुत्व है, जो कभी-कभी न्यायिक शैली की देरी को मध्यस्थता में भी ले आते हैं।
विश्लेषण
भारत का मध्यस्थता ढांचा अभी भी 'तदर्थ मध्यस्थता' पर अधिक निर्भर है, जो अक्सर समय लेने वाली और महंगी होती है। 2024 का संशोधन विधेयक और एसीआई का गठन भारत को 'संस्थागत मध्यस्थता' की ओर ले जाने का प्रयास है। हालांकि, जब तक सरकार की नियामक भूमिका और मध्यस्थों की स्वतंत्रता के बीच संतुलन नहीं बनता, तब तक भारत सिंगापुर या लंदन जैसे वैश्विक केंद्रों को टक्कर नहीं दे पाएगा।
आगे की राह
- भारतीय मध्यस्थता परिषद का त्वरित गठन: सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार, बिना किसी देरी के एक निष्पक्ष परिषद का गठन किया जाना चाहिए।
- निजी क्षेत्र की भागीदारी: मध्यस्थता संस्थानों को अधिक स्वायत्तता दी जानी चाहिए ताकि वे अंतरराष्ट्रीय मानकों को अपना सकें।
- प्रौद्योगिकी का एकीकरण: ऑनलाइन विवाद समाधान (ODR) और वीडियो-कॉन्फ्रेंसिंग जैसे डिजिटल माध्यमों को कानूनी मान्यता और बढ़ावा देना।
- विशेषज्ञता: केवल न्यायाधीशों के बजाय इंजीनियरिंग, वित्त और तकनीकी विशेषज्ञों को भी मध्यस्थ के रूप में प्रोत्साहित करना।
निष्कर्ष
'भारतीय मध्यस्थता परिषद' (एसीआई) का गठन और 2024 के प्रस्तावित संशोधन भारत के विवाद समाधान पारिस्थितिकी तंत्र में एक क्रांतिकारी बदलाव ला सकते हैं। यह न केवल न्यायपालिका के बोझ को कम करेगा, बल्कि भारत को वैश्विक निवेश के लिए एक सुरक्षित और विश्वसनीय गंतव्य के रूप में स्थापित करेगा। सफलता की कुंजी इन सुधारों के 'अक्षरस:' कार्यान्वयन और नियामक संस्थाओं की वास्तविक स्वायत्तता सुनिश्चित करने में निहित है।