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सामान्य अध्ययन पेपर – III  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन

संदर्भ

पिछले चार दशकों से अंतरिक्ष अन्वेषण मुख्य रूप से सरकारी संस्थानों (जैसे NASA, ISRO, के एकाधिकार में था। इस दौरान 'उपभोज्य प्रक्षेपण यान'  का उपयोग होता था, जो एक बार के उपयोग के बाद नष्ट हो जाते थे। इसके कारण मिशन की लागत अत्यधिक बनी रही। हालाँकि, नई सहस्राब्दी में एक 'वाणिज्यिक क्रांति' देखी गई है, जहाँ निजी क्षेत्र (SpaceX, Blue Origin) केवल निवेश कर रहा है, बल्कि नवाचार का नेतृत्व भी कर रहा है। वर्ष 2030 तक वैश्विक अंतरिक्ष उद्योग के $1 ट्रिलियन के मूल्य को पार करने का अनुमान है।

पुन: प्रयोज्य रॉकेट:

पुन: प्रयोज्य रॉकेट वह प्रक्षेपण यान है जिसे मिशन के बाद सुरक्षित रूप से पृथ्वी पर वापस उतारा जाता है और मरम्मत के बाद पुनः लॉन्च किया जाता है।

  • लागत में भारी कमी: पारंपरिक रॉकेटों की तुलना में इसने अंतरिक्ष में प्रति किलोग्राम पेलोड भेजने की लागत को 5 से 20 गुना तक कम कर दिया है।
  • लॉन्च कैडेंस : रॉकेट के मुख्य हिस्सों (जैसे बूस्टर) को पुनः प्राप्त करने से प्रक्षेपण की आवृत्ति  बढ़ गई है।
  • प्रमुख उदाहरण: SpaceX का 'फाल्कन 9' और निर्माणाधीन 'स्टारशिप' जनवरी 2026 तक, फाल्कन 9 के एक ही बूस्टर को 30 से अधिक बार उपयोग करने का कीर्तिमान स्थापित हो चुका है।

रीयूज़ेबिलिटी की कार्यप्रणाली और धारणीयता

यह तकनीक मुख्य रूप से 'रेट्रो-प्रोपल्शन' और 'स्वायत्त लैंडिंग' पर आधारित है।

  • कार्यप्रणाली: रॉकेट का पहला चरण अलग होने के बाद अपने इंजनों को पुनः प्रज्वलित करता है ताकि गति कम हो सके और वह निर्दिष्ट स्थान पर ऊर्ध्वाधर लैंडिंग कर सके।
  • संसाधन बचत: नया रॉकेट बनाने के लिए आवश्यक धातुओं और जटिल निर्माण प्रक्रिया की बचत होती है।
  • कचरा प्रबंधन: यह महासागरों और निचली कक्षा में गिरने वाले मलबे को कम कर 'सतत अंतरिक्ष पहुँच' सुनिश्चित करता है।

बदलता स्वरूप: सरकारी बनाम निजी संस्थाएं

अंतरिक्ष क्षेत्र अब 'राष्ट्रीय प्रतिष्ठा' से बढ़कर एक 'वैश्विक व्यवसाय' बन गया है।

  • सरकारी भूमिका: सरकारें अब 'ऑपरेटर' के बजाय 'नियामक' और 'ग्राहक' की भूमिका निभा रही हैं।
  • निजी भूमिका: 3D प्रिंटिंग और 'वर्टिकल इंटीग्रेशन' के माध्यम से निजी कंपनियां लागत दक्षता में अग्रणी हैं।

भारत की स्थिति: हालिया उपलब्धियां और आगामी मिशन

इसरो भी रीयूज़ेबिलिटी की वैश्विक दौड़ में एक प्रमुख खिलाड़ी बनकर उभरा है:

  • RLV-LEX3 (जून 2024): इसरो ने 'पुन: प्रयोज्य प्रक्षेपण यान' के स्वायत्त लैंडिंग प्रयोग का तीसरा सफल परीक्षण किया।
  • TSTO (टू-स्टेज-टू-ऑर्बिट): भारत एक दो-चरणीय प्रक्षेपण यान विकसित कर रहा है जिसका उद्देश्य पूरी तरह से रीयूज़ेबल होना है।
  • ADMIRE: इसरो एक ऐसे परीक्षण यान पर काम कर रहा है जो वर्टिकल लैंडिंग (SpaceX की तर्ज पर) करने में सक्षम होगा।
  • IN-SPACe: निजी क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए बनाई गई यह संस्था भारत को वैश्विक कमर्शियल मार्केट में स्थापित कर रही है।

मानव मिशन बनाम सैटेलाइट मिशन: लागत विश्लेषण

विशेषता

उपग्रह मिशन

मानव मिशन

लागत

अपेक्षाकृत कम

3-5 गुना अधिक

जटिलता

मध्यम (सिर्फ हार्डवेयर)

अत्यधिक (लाइफ सपोर्ट, सुरक्षा)

वापसी

आवश्यक नहीं

अनिवार्य

रीयूज़ेबिलिटी

वैकल्पिक

अनिवार्य (आर्थिक व्यवहार्यता हेतु)

भविष्य का प्रभाव

  • अंतरिक्ष पर्यटन : लागत कम होने से आम नागरिकों के लिए अंतरिक्ष यात्रा सुलभ होगी।
  • वैश्विक कनेक्टिविटी: हजारों छोटे उपग्रहों का नेटवर्क (जैसे Starlink) पूरी दुनिया को सस्ता इंटरनेट प्रदान करेगा।
  • गहन अंतरिक्ष अन्वेषण: चंद्रमा पर स्थायी बस्तियां और मंगल मिशन रीयूज़ेबिलिटी के बिना आर्थिक रूप से असंभव हैं।

आगे की राह

  • नीतिगत प्रोत्साहन: अंतरिक्ष नीति 2023 के तहत स्टार्टअप्स को वित्तीय और तकनीकी सहायता प्रदान करना।
  • अंतर्राष्ट्रीय मानक: अंतरिक्ष मलबे के प्रबंधन और रीयूज़ेबिलिटी के संचालन के लिए वैश्विक नियमों की आवश्यकता।
  • बुनियादी ढांचा: भारत को अपने प्रक्षेपण केंद्रों को रीयूज़ेबल बूस्टर्स की रिकवरी के अनुकूल विकसित करना होगा।

निष्कर्ष

रीयूज़ेबिलिटी केवल एक तकनीकी उपलब्धि नहीं, बल्कि अंतरिक्ष अन्वेषण का 'लोकतांत्रिकरण' है। यह अंतरिक्ष को एक 'व्यय' के बजाय 'निवेश' में बदल देता है। जैसा कि भारतीय न्यायपालिका में 'नैसर्गिक न्याय' सर्वोपरि है, वैसे ही अंतरिक्ष के भविष्य के लिए 'रीयूज़ेबिलिटी' ही 'नैसर्गिक धारणीयता' का एकमात्र मार्ग है।

सामान्य अध्ययन पेपर – III  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन

संदर्भ

पिछले एक दशक में, जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए दुनिया ने जीवाश्म ईंधन से स्वच्छ ऊर्जा की ओर रुख किया है। वर्ष 2015 में जहाँ वैश्विक स्तर पर केवल 0.55 मिलियन इलेक्ट्रिक वाहन बिके थे, वहीं 2025 तक यह आंकड़ा 20 मिलियन यूनिट तक पहुँचने का अनुमान है। इस तीव्र परिवर्तन ने कच्चे माल की मांग के पैटर्न को पूरी तरह बदल दिया है। वर्तमान में, 'कॉपर' (तांबा) इस हरित क्रांति के केंद्र में एक नई 'रणनीतिक धातु' के रूप में उभरा है।

इलेक्ट्रिक वाहन और तांबे की अनिवार्यता

इलेक्ट्रिक वाहन पारंपरिक आंतरिक दहन इंजन (ICE) वाहनों की तुलना में कहीं अधिक संसाधन-गहन होते हैं।

  • इलेक्ट्रिफिकेशन की रीढ़: तांबा अपनी उच्च विद्युत चालकता के कारण EV की बैटरी, वाइंडिंग, रोटर, और आंतरिक वायरिंग के लिए अनिवार्य है।
  • तुलनात्मक आवश्यकता: एक मानक पेट्रोल कार में जहाँ 20-25 किलोग्राम तांबा होता है, वहीं एक बैटरी-चालित इलेक्ट्रिक कार (BEV) में 80-85 किलोग्राम तांबे की आवश्यकता होती है। इसके अतिरिक्त, चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और ग्रिड अपग्रेडेशन में भी भारी मात्रा में तांबा प्रयुक्त होता है।

मांग और आपूर्ति का अंतर

वर्तमान में वैश्विक तांबा बाजार एक गंभीर 'संरचनात्मक घाटे' की ओर बढ़ रहा है:

  • अनियंत्रित मांग: 2015 में EV क्षेत्र में तांबे की खपत 27,500 टन थी, जो 2025 तक बढ़कर 1.28 मिलियन टन से अधिक हो गई है।
  • आपूर्ति की बाधाएं: तांबे की एक नई खदान को खोजने से लेकर उत्पादन शुरू करने तक 10 से 15 वर्ष का समय लगता है।
  • अल्प-निवेश: पिछले दशक में खनन क्षेत्र में निवेश की कमी और मौजूदा खदानों में 'अयस्क ग्रेड' का गिरना आपूर्ति को और सीमित कर रहा है।

'कॉपर क्रंच' के परिणाम

यदि 2026 तक तांबे की कमी बनी रहती है, तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं:

  • EV की लागत में वृद्धि: तांबे की बढ़ती कीमतें EV के निर्माण को महंगा बना देंगी, जिससे आम जनता के लिए इसे अपनाना कठिन होगा।
  • नेट-जीरो लक्ष्यों में विलंब: ऊर्जा संक्रमण की गति धीमी होने से पेरिस समझौते के लक्ष्यों को प्राप्त करना चुनौतीपूर्ण हो जाएगा।
  • भू-राजनीतिक स्पर्धा: तांबे के भंडारों (जैसे चिली, पेरू, कांगो) और प्रसंस्करण (जैसे चीन) पर नियंत्रण के लिए वैश्विक शक्तियों के बीच संघर्ष बढ़ सकता है।

भारत में EV की स्थिति और कॉपर की भूमिका

भारत का लक्ष्य 2030 तक निजी कारों में 30% और दोपहिया/तिपहिया वाहनों में 80% EV पैठ हासिल करना है।

  • आयात निर्भरता: भारत अपनी तांबे की आवश्यकता का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है। 2018 में स्टरलाइट कॉपर प्लांट (तूतीकोरिन) के बंद होने के बाद भारत एक 'शुद्ध निर्यातक' से 'शुद्ध आयातक' बन गया है।
  • रणनीतिक जोखिम: 'फेम-II' और 'PLI' जैसी योजनाएं EV निर्माण को बढ़ावा तो दे रही हैं, लेकिन कच्चे माल (लिथियम और कॉपर) की सुरक्षित आपूर्ति श्रृंखला अभी भी एक बड़ी चुनौती है।

आगे की राह

  • रीसाइक्लिंग: 'अर्बन माइनिंग' को बढ़ावा देना चाहिए। पुराने इलेक्ट्रॉनिक कचरे से तांबे का पुनर्चक्रण प्राथमिक खनन के मुकाबले कम ऊर्जा-गहन और पर्यावरण अनुकूल है।
  • नवाचार: शोधकर्ताओं को तांबे के विकल्प (जैसे उच्च चालकता वाले एल्युमीनियम मिश्र धातु) या कम तांबे के उपयोग वाली मोटर तकनीकों पर ध्यान देना चाहिए।
  • निवेश और खोज: सरकार को खनिज अन्वेषण में निजी भागीदारी बढ़ानी चाहिए और विदेशों में रणनीतिक खदानों (जैसे KABIL के माध्यम से) में हिस्सेदारी सुनिश्चित करनी चाहिए।

निष्कर्ष

इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर संक्रमण केवल एक तकनीकी बदलाव नहीं है, बल्कि यह एक 'संसाधन-गहन परिवर्तन' है। कॉपर संकट हमें सचेत करता है कि भविष्य की स्वच्छ तकनीकें केवल बाजार की मांग पर नहीं, बल्कि दुर्लभ खनिजों की उपलब्धता पर टिकी हैं। यदि समय रहते रीसाइक्लिंग और आपूर्ति श्रृंखला में सुधार नहीं किया गया, तो 'हरित भविष्य' का सपना तांबे की कमी के कारण अधूरा रह सकता है।

सामान्य अध्ययन पेपर – III  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन

संदर्भ

पिछले एक दशक में, जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए दुनिया ने जीवाश्म ईंधन से स्वच्छ ऊर्जा की ओर रुख किया है। वर्ष 2015 में जहाँ वैश्विक स्तर पर केवल 0.55 मिलियन इलेक्ट्रिक वाहन बिके थे, वहीं 2025 तक यह आंकड़ा 20 मिलियन यूनिट तक पहुँचने का अनुमान है। इस तीव्र परिवर्तन ने कच्चे माल की मांग के पैटर्न को पूरी तरह बदल दिया है। वर्तमान में, 'कॉपर' (तांबा) इस हरित क्रांति के केंद्र में एक नई 'रणनीतिक धातु' के रूप में उभरा है।

इलेक्ट्रिक वाहन और तांबे की अनिवार्यता

इलेक्ट्रिक वाहन पारंपरिक आंतरिक दहन इंजन (ICE) वाहनों की तुलना में कहीं अधिक संसाधन-गहन होते हैं।

  • इलेक्ट्रिफिकेशन की रीढ़: तांबा अपनी उच्च विद्युत चालकता के कारण EV की बैटरी, वाइंडिंग, रोटर, और आंतरिक वायरिंग के लिए अनिवार्य है।
  • तुलनात्मक आवश्यकता: एक मानक पेट्रोल कार में जहाँ 20-25 किलोग्राम तांबा होता है, वहीं एक बैटरी-चालित इलेक्ट्रिक कार (BEV) में 80-85 किलोग्राम तांबे की आवश्यकता होती है। इसके अतिरिक्त, चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और ग्रिड अपग्रेडेशन में भी भारी मात्रा में तांबा प्रयुक्त होता है।

मांग और आपूर्ति का अंतर

वर्तमान में वैश्विक तांबा बाजार एक गंभीर 'संरचनात्मक घाटे' की ओर बढ़ रहा है:

  • अनियंत्रित मांग: 2015 में EV क्षेत्र में तांबे की खपत 27,500 टन थी, जो 2025 तक बढ़कर 1.28 मिलियन टन से अधिक हो गई है।
  • आपूर्ति की बाधाएं: तांबे की एक नई खदान को खोजने से लेकर उत्पादन शुरू करने तक 10 से 15 वर्ष का समय लगता है।
  • अल्प-निवेश: पिछले दशक में खनन क्षेत्र में निवेश की कमी और मौजूदा खदानों में 'अयस्क ग्रेड' का गिरना आपूर्ति को और सीमित कर रहा है।

'कॉपर क्रंच' के परिणाम

यदि 2026 तक तांबे की कमी बनी रहती है, तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं:

  • EV की लागत में वृद्धि: तांबे की बढ़ती कीमतें EV के निर्माण को महंगा बना देंगी, जिससे आम जनता के लिए इसे अपनाना कठिन होगा।
  • नेट-जीरो लक्ष्यों में विलंब: ऊर्जा संक्रमण की गति धीमी होने से पेरिस समझौते के लक्ष्यों को प्राप्त करना चुनौतीपूर्ण हो जाएगा।
  • भू-राजनीतिक स्पर्धा: तांबे के भंडारों (जैसे चिली, पेरू, कांगो) और प्रसंस्करण (जैसे चीन) पर नियंत्रण के लिए वैश्विक शक्तियों के बीच संघर्ष बढ़ सकता है।

भारत में EV की स्थिति और कॉपर की भूमिका

भारत का लक्ष्य 2030 तक निजी कारों में 30% और दोपहिया/तिपहिया वाहनों में 80% EV पैठ हासिल करना है।

  • आयात निर्भरता: भारत अपनी तांबे की आवश्यकता का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है। 2018 में स्टरलाइट कॉपर प्लांट (तूतीकोरिन) के बंद होने के बाद भारत एक 'शुद्ध निर्यातक' से 'शुद्ध आयातक' बन गया है।
  • रणनीतिक जोखिम: 'फेम-II' और 'PLI' जैसी योजनाएं EV निर्माण को बढ़ावा तो दे रही हैं, लेकिन कच्चे माल (लिथियम और कॉपर) की सुरक्षित आपूर्ति श्रृंखला अभी भी एक बड़ी चुनौती है।

आगे की राह

  • रीसाइक्लिंग: 'अर्बन माइनिंग' को बढ़ावा देना चाहिए। पुराने इलेक्ट्रॉनिक कचरे से तांबे का पुनर्चक्रण प्राथमिक खनन के मुकाबले कम ऊर्जा-गहन और पर्यावरण अनुकूल है।
  • नवाचार: शोधकर्ताओं को तांबे के विकल्प (जैसे उच्च चालकता वाले एल्युमीनियम मिश्र धातु) या कम तांबे के उपयोग वाली मोटर तकनीकों पर ध्यान देना चाहिए।
  • निवेश और खोज: सरकार को खनिज अन्वेषण में निजी भागीदारी बढ़ानी चाहिए और विदेशों में रणनीतिक खदानों (जैसे KABIL के माध्यम से) में हिस्सेदारी सुनिश्चित करनी चाहिए।

निष्कर्ष

इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर संक्रमण केवल एक तकनीकी बदलाव नहीं है, बल्कि यह एक 'संसाधन-गहन परिवर्तन' है। कॉपर संकट हमें सचेत करता है कि भविष्य की स्वच्छ तकनीकें केवल बाजार की मांग पर नहीं, बल्कि दुर्लभ खनिजों की उपलब्धता पर टिकी हैं। यदि समय रहते रीसाइक्लिंग और आपूर्ति श्रृंखला में सुधार नहीं किया गया, तो 'हरित भविष्य' का सपना तांबे की कमी के कारण अधूरा रह सकता है।

सामान्य अध्ययन पेपर  – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध

संदर्भ

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने पश्चिम बंगाल में निर्वाचन आयोग द्वारा चलाए जा रहे 'विशेष गहन संशोधन' (SIR) प्रक्रिया की समीक्षा की। याचिकाकर्ताओं (मुख्यतः तृणमूल कांग्रेस के नेताओं) ने आरोप लगाया है कि इस प्रक्रिया के माध्यम से लाखों वास्तविक मतदाताओं के नाम सूची से हटाए जा रहे हैं, जिससे एक बड़ा लोकतांत्रिक संकट पैदा हो सकता है। 21 जनवरी, 2026 की सुनवाई में कोर्ट ने निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं।

क्या है SIR?

विशेष गहन संशोधन (SIR) निर्वाचन आयोग (EC) द्वारा चुनावी सूचियों को शुद्ध और अद्यतन करने के लिए चलाया जाने वाला एक व्यापक अभियान है।

  • उद्देश्य: फर्जी मतदाताओं, मृतकों और स्थानांतरित हो चुके लोगों के नाम सूची से हटाना तथा नए पात्र मतदाताओं को जोड़ना।
  • कानूनी आधार: जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21(3) और संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग को यह अधिकार प्राप्त है कि वह स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए विशेष संशोधन कर सके।
  • पश्चिम बंगाल का मामला: यहाँ आयोग 2002 की मतदाता सूची को 'लेगेसी डेटा' मानकर वर्तमान डेटा का मिलान कर रहा है।

चर्चा में क्यों?

यह मुद्दा तब गरमाया जब चुनाव आयोग ने लगभग 1.36 करोड़ मतदाताओं (राज्य की कुल आबादी का करीब 20%) को 'तार्किक विसंगतियों' की श्रेणी में डाल दिया। इतनी बड़ी संख्या में लोगों को नोटिस मिलने से प्रशासनिक और सामाजिक तनाव की स्थिति पैदा हो गई।

विसंगतियां: चुनाव आयोग का हलफनामा

चुनाव आयोग ने सर्वोच्च न्यायालय में हलफनामा दायर कर डेटा में मौजूद ऐसी त्रुटियों का उल्लेख किया जिन्हें आयोग ने 'विज्ञान के विरुद्ध' करार दिया:

  • अस्वाभाविक संतान संख्या: कई मामलों में एक मतदाता के 200 से अधिक बच्चे दर्ज पाए गए।
  • आयु अंतराल में त्रुटि: माता-पिता और बच्चों की आयु के बीच 15 वर्ष से भी कम का अंतर पाया गया।
  • डेटा मैपिंग: आयोग ने कहा कि 4.5 लाख से अधिक ऐसे मामले हैं जहाँ एक व्यक्ति के 5 से अधिक बच्चे दर्ज हैं, जो वर्तमान जनसांख्यिकीय मानकों (NFHS-5) के विपरीत है।

सर्वोच्च न्यायालय की सख्त टिप्पणी

मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने आयोग को फटकार लगाते हुए कहा:

  • प्राकृतिक न्याय का सिद्धांत: सूची संशोधन की प्रक्रिया 'न्यायसंगत और निष्पक्ष' होनी चाहिए।
  • विवेकाधीन शक्तियां: आयोग के पास अधिकार व्यापक हैं, लेकिन वे 'अनियंत्रित' नहीं हो सकते।
  • नियमों का पालन: कोर्ट ने पूछा कि जब नियमों में 6 दस्तावेज निर्धारित हैं, तो SIR के लिए 11 दस्तावेजों की मांग क्यों की जा रही है?
  • अनावश्यक तनाव: कोर्ट ने 'लॉजिकल विसंगतियों' के नाम पर आम जनता को हो रहे मानसिक और शारीरिक कष्ट पर चिंता जताई।

कोर्ट के निर्देश:

जनता की राहत के लिए न्यायालय ने निम्नलिखित अंतरिम निर्देश जारी किए हैं:

  • पारदर्शिता: विसंगति सूची वाले नामों का सार्वजनिक प्रदर्शन ग्राम पंचायत और ब्लॉक कार्यालयों में किया जाए।
  • प्रतिनिधि की अनुमति: मतदाता को स्वयं उपस्थित होना अनिवार्य नहीं है; वह अपने बूथ लेवल एजेंट (BLA) या अधिकृत प्रतिनिधि के माध्यम से दस्तावेज जमा कर सकता है।
  • समय सीमा: दस्तावेज और आपत्तियां जमा करने के लिए 10 दिन का अतिरिक्त समय दिया गया है।
  • प्रशासनिक सहयोग: राज्य सरकार को पर्याप्त जनशक्ति उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया है ताकि सुनवाई सुचारू रूप से हो सके।

विश्लेषण

यह मामला 'संवैधानिक मर्यादा' बनाम 'प्रशासनिक दक्षता' का है।

  • सकारात्मक पक्ष: चुनावी शुद्धता लोकतंत्र की नींव है। फर्जी मतदाताओं का हटना पारदर्शी चुनाव के लिए आवश्यक है।
  • नकारात्मक पक्ष: इतनी विशाल संख्या में नोटिस जारी करना और व्हाट्सएप जैसे अनौपचारिक माध्यमों का उपयोग करना प्रक्रियात्मक खामियों को दर्शाता है। यह गरीब और अशिक्षित आबादी के 'मताधिकार' (संवैधानिक अधिकार) को खतरे में डाल सकता है।

आगे की राह

  • डिजिटल पारदर्शिता: आयोग को एक स्पष्ट पोर्टल बनाना चाहिए जहाँ मतदाता अपनी स्थिति की जांच कर सकें।
  • मानकीकरण: विसंगतियों की परिभाषा स्पष्ट होनी चाहिए ताकि नाम की स्पेलिंग जैसी छोटी गलतियों के लिए नोटिस भेजा जाए।
  • जन-जागरूकता: नागरिक समाज और राजनीतिक दलों को मिलकर मतदाताओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करना चाहिए।

निष्कर्ष

निर्वाचन आयोग का चुनावी सूचियों को शुद्ध करने का प्रयास सराहनीय है, किंतु इसकी प्रक्रिया 'समावेशी' होनी चाहिए कि 'बहिष्करण' वाली। जैसा कि सर्वोच्च न्यायालय ने रेखांकित किया है, प्रशासनिक सुविधा के नाम पर नागरिकों के बुनियादी अधिकारों और नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों की बलि नहीं दी जा सकती।

सामान्य अध्ययन पेपर  – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध

संदर्भ

जनवरी 2026 में संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान (MbZ) की संक्षिप्त किंतु ऐतिहासिक भारत यात्रा ने दोनों देशों के संबंधों को एक नई ऊंचाई पर पहुँचा दिया है। इस यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम भारत और यूएई के बीच 'सामरिक रक्षा साझेदारी' के लिए एक रूपरेखा समझौते की घोषणा है। यह समझौता ऐसे समय में हुआ है जब खाड़ी क्षेत्र अभूतपूर्व सुरक्षा और राजनीतिक परिवर्तनों से गुजर रहा है।

भारत-यूएई आर्थिक संबंधों की वर्तमान स्थिति

रक्षा समझौतों से परे, यूएई भारत का एक अपरिहार्य साझेदार बना हुआ है:

  • व्यापार: यूएई भारत का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार और दूसरा सबसे बड़ा निर्यात गंतव्य है।
  • निवेश: भारत में सातवां सबसे बड़ा विदेशी निवेशक।
  • नवीन समझौते: द्विपक्षीय व्यापार को $200 बिलियन तक ले जाने का लक्ष्य और $3 बिलियन का महत्वपूर्ण LNG (तरलीकृत प्राकृतिक गैस) समझौता।

खाड़ी क्षेत्र में बदलती भू-राजनीति

लेख के अनुसार, खाड़ी क्षेत्र इस समय कई जटिलताओं का सामना कर रहा है, जिसे भारत को ध्यान में रखना होगा:

  • नया शीत युद्ध: यूएई और सऊदी अरब के बीच बढ़ता शक्ति संघर्ष, विशेष रूप से सूडान संकट और क्षेत्रीय वर्चस्व को लेकर।
  • नए सैन्य गठबंधन: इजरायल द्वारा कतर में की गई बमबारी (सितंबर 2025) के बाद संवर्धित सऊदी-पाकिस्तान रक्षा संधि और इसमें तुर्की के शामिल होने की संभावना ने क्षेत्र में एक नया सैन्य ध्रुवीकरण पैदा कर दिया है।
  • अस्थिरता के केंद्र: ईरान में आंतरिक विरोध प्रदर्शन, गाजा में अनिश्चित युद्धविराम और अमेरिका की भावी 'बोर्ड ऑफ पीस' योजना।

सामरिक रक्षा साझेदारी:

भारत और यूएई के बीच प्रस्तावित रक्षा संधि के दूरगामी निहितार्थ हैं:

  • सामरिक महत्व: यह पहली बार है जब भारत किसी खाड़ी देश के साथ इस स्तर की औपचारिक रक्षा साझेदारी कर रहा है।
  • चिंताएं: इस गठबंधन को क्षेत्र के अन्य प्रतिस्पर्धी समूहों (जैसे सऊदी-पाकिस्तान-तुर्की) के विरुद्ध एक सैन्य मोर्चे के रूप में देखा जा सकता है।
  • भारत का स्पष्टीकरण: भारतीय विदेश सचिव ने स्पष्ट किया है कि यह संधि किसी भविष्य के काल्पनिक सैन्य परिदृश्य में भारत की भागीदारी के लिए नहीं है, बल्कि द्विपक्षीय सुरक्षा सहयोग के लिए है।

भारत के लिए दांव पर क्या है?

भारत की विदेश नीति के लिए खाड़ी क्षेत्र का महत्व निम्नलिखित कारणों से सर्वोपरि है:

  • प्रवासी सुरक्षा: लगभग 1 करोड़ भारतीय खाड़ी देशों में निवास करते हैं। वहां की अस्थिरता का सीधा प्रभाव उनके रोजगार और सुरक्षा पर पड़ता है।
  • ऊर्जा सुरक्षा: पश्चिमी प्रतिबंधों के कारण रूस और अन्य स्रोतों से आपूर्ति बाधित होने की स्थिति में, GCC (खाड़ी सहयोग परिषद) क्षेत्र भारत की ऊर्जा जरूरतों का मुख्य आधार है।
  • कनेक्टिविटी परियोजनाएं: चाबहार पोर्ट, INSTC और IMEC (भारत-मध्य पूर्व-यूरोप गलियारा) जैसी महत्वाकांक्षी परियोजनाओं की सफलता पूरी तरह से क्षेत्रीय शांति और सभी हितधारकों के सहयोग पर टिकी है।

विश्लेषण

भारत के लिए यह 'रणनीतिक संतुलन' की परीक्षा है। यूएई के साथ रक्षा संबंध बढ़ाना भारत के समुद्री सुरक्षा और रक्षा निर्यात (जैसे ब्रह्मोस, ध्रुव हेलिकॉप्टर) के लिए लाभकारी है, लेकिन इसे इस तरह से संतुलित करना होगा कि सऊदी अरब या ईरान जैसे अन्य महत्वपूर्ण साझेदार इसे अपने विरुद्ध समझें। भारत की नीति 'गुट-निरपेक्षता' से बढ़कर अब 'बहु-संरेखण' की ओर है।

आगे की राह

  • सतर्क कूटनीति: भारत को खाड़ी के आंतरिक मतभेदों (जैसे MbZ बनाम MbS) में पक्ष लेने से बचना चाहिए।
  • बहुपक्षीय जुड़ाव: रक्षा सहयोग को केवल सुरक्षा तक सीमित रखकर इसे आपदा प्रबंधन, समुद्री डकैती रोधी अभियानों और तकनीकी हस्तांतरण पर केंद्रित करना चाहिए।
  • स्थानीय विवादों का समाधान: भारत को अपनी सौम्य शक्ति का उपयोग कर क्षेत्र में शांति के लिए एक 'मध्यस्थ' या 'स्थिरता कारक' के रूप में उभरना चाहिए।

निष्कर्ष

खाड़ी क्षेत्र की जटिल और अस्थिर सुरक्षा व्यवस्था के बीच भारत और यूएई की रक्षा साझेदारी एक साहसिक कदम है। हालांकि, भारत को अपनी आर्थिक आकांक्षाओं और ऊर्जा सुरक्षा को सुरक्षित रखने के लिए इस क्षेत्र की 'फाल्टलाइन्स' पर अत्यंत सावधानी से चलना होगा। भारत की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह कैसे अपनी सामरिक स्वायत्तता बनाए रखते हुए सभी प्रतिस्पर्धी शक्तियों के साथ समान दूरी और समान मित्रता का संतुलन साधता है।

सामान्य अध्ययन पेपर  – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध

संदर्भ

भारतीय संसदीय लोकतंत्र में राज्यपाल का पद केंद्र और राज्यों के बीच एक सेतु के रूप में परिकल्पित किया गया था। ऐतिहासिक रूप से, स्वतंत्रता के पश्चात शुरुआती दशकों में 'एक दलीय प्रभुत्व' के कारण यह पद विवादों से मुक्त रहा। किंतु, 1967 के बाद जब राज्यों में विपक्षी दलों की सरकारें बनीं, तब से राज्यपाल की भूमिका 'संवैधानिक प्रमुख' से अधिक 'केंद्र के एजेंट' के रूप में विवादित होने लगी। वर्तमान परिदृश्य में, यह विवाद 'सहकारी संघवाद' के समक्ष एक गंभीर चुनौती बनकर उभरा है।

वर्तमान घटनाक्रम: केरल, तमिलनाडु एवं कर्नाटक

हालिया समय में दक्षिण भारतीय राज्यों में राज्यपाल और चुनी हुई सरकारों के बीच अभूतपूर्व टकराव देखा गया है:

  • तमिलनाडु: राज्यपाल आर.एन. रवि द्वारा राज्य मंत्रिमंडल द्वारा तैयार अभिभाषण के कुछ हिस्सों को छोड़ना और राष्ट्रगान से पूर्व सदन से बहिर्गमन करना।
  • केरल: राज्यपाल द्वारा नीतिगत संबोधन के दौरान सरकार की आलोचनात्मक टिप्पणियों को पढ़ने से मना करना।
  • कर्नाटक: राज्यपाल थावरचंद गहलोत द्वारा संयुक्त सत्र को संबोधित करने से इंकार करना, क्योंकि उनके अनुसार अभिभाषण का मसौदा केंद्र सरकार की योजनाओं के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रसित था।

राज्यपाल की स्थिति एवं संवैधानिक अधिकार

संविधान के भाग VI के तहत राज्यपाल की दोहरी भूमिका है:

  • राज्य का संवैधानिक प्रमुख।
  • केंद्र सरकार का प्रतिनिधि।
  • अनुच्छेद 154: राज्य की कार्यपालिका शक्ति राज्यपाल में निहित होगी।
  • अनुच्छेद 163: राज्यपाल को अपने कार्यों के निर्वहन में सहायता और सलाह देने के लिए मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में एक मंत्रिपरिषद होगी (विवेकाधीन शक्तियों को छोड़कर)

राज्य सरकार के अधिकार एवं अनुच्छेद 176

  • अनुच्छेद 176 (विशेष अभिभाषण): यह अनिवार्य बनाता है कि प्रत्येक वर्ष के प्रथम सत्र के आरंभ में राज्यपाल विधानसभा (और परिषद, जहाँ हो) को संबोधित करेगा।
  • संवैधानिक मर्यादा: संसदीय परंपरा के अनुसार, यह अभिभाषण राज्यपाल का 'निजी विचार' होकर 'राज्य सरकार की नीतियों और उपलब्धियों का विवरण' होता है। राज्य सरकार को अपनी नीतियों को जनता के समक्ष रखने का पूर्ण अधिकार है।

तुलनात्मक समीक्षा: राज्यपाल बनाम राज्य सरकार

पक्ष

तर्क/अधिकार

राज्यपाल

संविधान की रक्षा की शपथ (अनुच्छेद 159); असत्य या असंवैधानिक दावों को पढ़ने के लिए विवश होना।

राज्य सरकार

लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित; मंत्रिपरिषद की सलाह राज्यपाल पर बाध्यकारी (समशेर सिंह मामला)

विवादों के वास्तविक कारण:

अतीत से वर्तमान तक का विश्लेषण करने पर निम्नलिखित कारक स्पष्ट होते हैं:

  • राजनीतिक विचारधारा का टकराव: जब केंद्र और राज्य में भिन्न विचारधारा वाली सरकारें होती हैं, तो राज्यपाल का पद 'राजनीतिक हथियार' के रूप में प्रयुक्त होने लगता है।
  • नियुक्ति की प्रक्रिया: राज्यपाल की नियुक्ति पूर्णतः केंद्र की इच्छा पर निर्भर है, जिससे उनकी निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लगता है।
  • तनावपूर्ण संघवाद: केंद्र सरकार द्वारा राज्यपालों के माध्यम से राज्यों की स्वायत्तता पर अंकुश लगाने का प्रयास 'प्रतियोगी संघवाद' को नकारात्मक दिशा में ले जा रहा है।

न्यायिक निर्णय एवं दिशा-निर्देश

  • समशेर सिंह बनाम पंजाब राज्य (1974): सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राज्यपाल को मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह के अनुसार ही कार्य करना चाहिए।
  • एस.आर. बोम्मई मामला (1994): संघवाद को संविधान का 'मूल ढांचा' घोषित किया गया और राज्यपाल की शक्तियों की न्यायिक समीक्षा का मार्ग प्रशस्त हुआ।
  • नबाम रेबिया मामला (2016): न्यायालय ने कहा कि राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियां सीमित हैं और वे अपनी मर्जी से सदन की कार्यवाही में हस्तक्षेप नहीं कर सकते।

राज्यपाल के अभिभाषण की प्रासंगिकता एवं संघवाद की बहस

अभिभाषण मात्र एक रस्म नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व सुनिश्चित करने का माध्यम है। जब राज्यपाल इसे पढ़ने से मना करते हैं, तो यह 'संवैधानिक गतिरोध' उत्पन्न करता है।

  • एकात्मकता बनाम संघवाद: राज्यपाल का अति-सक्रिय होना भारत के एकात्मक झुकाव को दर्शाता है, जो क्षेत्रीय आकांक्षाओं के विरुद्ध है।

आगे की राह

  • समितियों की सिफारिशें: 'सरकारिया आयोग' और 'पुंछी आयोग' की सिफारिशों को लागू करना, जिसमें राज्यपाल की नियुक्ति से पूर्व मुख्यमंत्री से परामर्श और राजनीतिक रूप से तटस्थ व्यक्ति का चयन शामिल है।
  • संवैधानिक आचार संहिता: राज्यपालों के लिए एक स्पष्ट 'कोड ऑफ़ कंडक्ट ' विकसित की जानी चाहिए ताकि विवेकाधीन शक्तियों का दुरुपयोग हो।
  • संविधान संशोधन: जैसा कि तमिलनाडु के मुख्यमंत्री ने सुझाव दिया है, अनुच्छेद 176 की अनिवार्य बाध्यता और सीमाओं पर पुनर्विचार की आवश्यकता है।

निष्कर्ष

राज्यपाल का पद भारतीय लोकतंत्र की गरिमा का प्रतीक होना चाहिए, कि राजनीतिक खींचतान का अखाड़ा। लोकतंत्र में 'निर्वाचित सरकार' की सर्वोच्चता सर्वोपरि है। अंततः, केंद्र और राज्यों के बीच संवाद और संवैधानिक नैतिकता ही इस गतिरोध का एकमात्र स्थायी समाधान है।