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सामान्य अध्ययन पेपर – III प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन
संदर्भ
भारत अपने जलवायु लक्ष्यों की दिशा में एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। हाल ही में COP30 (ब्राजील) में भारत द्वारा 2035 के लिए अधिक महत्वाकांक्षी NDC (राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान) पेश करने की प्रतिबद्धता ने इस्पात क्षेत्र के 'डीकार्बोनाइजेशन' की आवश्यकता को केंद्र में ला दिया है। इस्पात क्षेत्र भारत के कुल कार्बन उत्सर्जन में लगभग 12% का योगदान देता है, जो इसे नेट-जीरो लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सबसे चुनौतीपूर्ण क्षेत्र बनाता है।
हरित इस्पात क्या है?
हरित इस्पात का तात्पर्य ऐसे इस्पात के उत्पादन से है जिसमें पारंपरिक कोयला आधारित विधियों के स्थान पर स्वच्छ ऊर्जा और कम कार्बन वाली तकनीकों का उपयोग किया जाता है।
- प्रमुख प्रक्रिया: इसमें लोहे के अयस्क को पिघलाने के लिए 'कोकिंग कोल' के बजाय ग्रीन हाइड्रोजन या बिजली का उपयोग किया जाता है।
- उत्सर्जन: इसका मुख्य उप-उत्पाद कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) के बजाय जल वाष्प (H2O) होता है।
चर्चा में क्यों?
COP30 की प्रतिबद्धता: भारत सरकार ने 2035 तक उत्सर्जन कटौती के नए और कड़े लक्ष्य निर्धारित करने का वादा किया है।
- कार्बन लॉक-इन का खतरा: विशेषज्ञ संजीव पॉल के अनुसार, यदि भारत अभी पुरानी तकनीकों में निवेश करता है, तो वह अगले 40 वर्षों के लिए कार्बन-सघन संपत्तियों में 'लॉक' हो जाएगा, जो पर्यावरण और अर्थव्यवस्था दोनों के लिए विनाशकारी होगा।
- यूरोपीय संघ का CBAM: 2026 से लागू होने वाला 'कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म' भारतीय इस्पात निर्यात पर भारी कर लगा सकता है यदि वह हरित नहीं है।
हरित इस्पात क्यों महत्वपूर्ण है?
- जलवायु लक्ष्यों की प्राप्ति: भारत के 2070 नेट-जीरो लक्ष्य के लिए इस्पात क्षेत्र का शुद्धिकरण अनिवार्य है।
- आर्थिक सुरक्षा: वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धी बने रहने के लिए स्वच्छ इस्पात का उत्पादन आवश्यक है।
- संसाधन दक्षता: यह स्क्रैप रीसाइक्लिंग और ऊर्जा दक्षता को बढ़ावा देता है।
- वायु गुणवत्ता: कोयले के उपयोग में कमी से स्थानीय स्तर पर प्रदूषण में भारी गिरावट आती है।
भारत सरकार की रणनीति
भारत ने ग्रीन स्टील के लिए एक बहुआयामी रोडमैप तैयार किया है:
- ग्रीन स्टील टैक्सोनॉमी (2024-2026): एक रेटिंग प्रणाली जो कार्बन उत्सर्जन के आधार पर स्टील को श्रेणीबद्ध करती है। सरकार ने दिसंबर 2024 में ग्रीन स्टील टैक्सोनॉमी पेश की थी, जो अब 2026-27 से प्रभावी हो रही है।
- स्टार रेटिंग सिस्टम: इस्पात को उसके कार्बन उत्सर्जन के आधार पर 1 से 5 स्टार रेटिंग दी जाएगी। 2.2 टन से कम CO2 प्रति टन स्टील उत्सर्जन वाले उत्पादों को 'ग्रीन' माना जाएगा।
- राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन: इस्पात क्षेत्र में हाइड्रोजन के पायलट प्रोजेक्ट्स के लिए वित्तीय सहायता।
- नवीकरणीय ऊर्जा: कैप्टिव पावर प्लांट के लिए सौर और पवन ऊर्जा का उपयोग।
- स्टील स्क्रैप रीसाइक्लिंग नीति: नए कच्चे माल के स्थान पर पुराने लोहे के उपयोग को बढ़ावा देना।
- कस्टमाइज़्ड इंसेंटिव्स (PLI स्कीम): स्वच्छ तकनीक अपनाने वाले उद्योगों को वित्तीय प्रोत्साहन।
वैश्विक परिदृश्य
- स्वीडन और जर्मनी: ये देश 'HYBRIT' जैसी परियोजनाओं के माध्यम से ग्रीन स्टील के व्यावसायिक उत्पादन में अग्रणी हैं।
- CBAM का प्रभाव: वैश्विक स्तर पर स्टील व्यापार अब 'कार्बन फुटप्रिंट' के आधार पर तय हो रहा है, जिससे भारत जैसे देशों पर दबाव बढ़ा है।
- चीन का वर्चस्व: चीन भी तेज़ी से हाइड्रोजन-आधारित इस्पात उत्पादन की ओर बढ़ रहा है, जिससे भारत के लिए प्रतिस्पर्धी चुनौती पैदा हो गई है।
कार्यान्वयन की चुनौतियाँ
- उच्च उत्पादन लागत: हरित इस्पात वर्तमान में पारंपरिक इस्पात से 20-30% अधिक महंगा है।
- ग्रीन हाइड्रोजन की उपलब्धता: औद्योगिक स्तर पर सस्ती और निरंतर हाइड्रोजन आपूर्ति अभी भी एक भविष्य की चुनौती है।
- तकनीकी परिवर्तन: पुराने ब्लास्ट फर्नेस को नए इलेक्ट्रिक आर्क फर्नेस (EAF) में बदलने के लिए भारी पूंजी निवेश की आवश्यकता है।
- कच्चे माल की कमी: उच्च गुणवत्ता वाले लोहे के अयस्क की सीमित उपलब्धता जो स्वच्छ तकनीकों के लिए आवश्यक है।
विश्लेषण
ग्रीन स्टील भारत के लिए केवल एक पर्यावरणीय विकल्प नहीं, बल्कि एक आर्थिक आवश्यकता है। इस्पात भारत के विकास की आधारशिला है। यदि भारत "औद्योगीकरण बनाम पर्यावरण" के जाल में फंसता है, तो दीर्घकालिक नुकसान होगा। ग्रीन स्टील "सतत विकास" का एक बेहतरीन उदाहरण है, जहाँ हम विकास की गति को धीमा किए बिना कार्बन पदचिह्न को कम कर सकते हैं।
आगे की राह
- ग्रीन प्रीमियम को कम करना: सरकार को कार्बन टैक्स या सब्सिडी के माध्यम से हरित इस्पात और सामान्य इस्पात के बीच कीमत के अंतर को कम करना होगा।
- सार्वजनिक खरीद: सरकार को अपनी परियोजनाओं (जैसे रेलवे, पुल) में 'ग्रीन स्टील' के उपयोग को अनिवार्य करना चाहिए।
- R&D में निवेश: कार्बन कैप्चर और स्टोरेज जैसी तकनीकों पर शोध बढ़ाना।
- सस्ती पूंजी: हरित परियोजनाओं के लिए कम ब्याज दरों पर ऋण उपलब्ध कराना।
निष्कर्ष
संक्षेप में, हरित इस्पात भारत की 'हरित क्रांति 2.0' का नेतृत्व कर सकता है। अरबों डॉलर की पुरानी तकनीकों में फंसने के बजाय, स्वच्छ तकनीक में निवेश करना भारत को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में एक विश्वसनीय और टिकाऊ भागीदार के रूप में स्थापित करेगा। जैसा कि संजीव पॉल ने संकेत दिया है, ग्रीन स्टील की ओर संक्रमण केवल उत्सर्जन कम करने के बारे में नहीं है, बल्कि यह भारत की भावी आर्थिक संप्रभुता और जलवायु नेतृत्व को सुरक्षित करने के बारे में है।
सामान्य अध्ययन पेपर – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध
संदर्भ
भारतीय उच्च शिक्षा के इतिहास में परिसरों को भेदभाव-मुक्त बनाने का संघर्ष दशकों पुराना है। रोहित वेमुला जैसे छात्रों की दुखद आत्महत्याओं और परिसरों में बढ़ते जातिगत भेदभाव के मामलों ने एक ऐसे कड़े कानूनी ढांचे की आवश्यकता को जन्म दिया, जो केवल कागजी न होकर प्रभावी हो। इसी पृष्ठभूमि में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने जनवरी 2026 में नए 'समानता प्रोत्साहन' नियम अधिसूचित किए थे, जिन पर हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने रोक लगा दी है।
यूजीसी (UGC) क्या है?
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग भारत सरकार का एक वैधानिक निकाय है, जिसकी स्थापना यूजीसी अधिनियम, 1956 के तहत की गई थी।
- कार्य: इसका मुख्य कार्य भारत में उच्च शिक्षा के मानकों का समन्वय, निर्धारण और रखरखाव करना है।
- भूमिका: यह विश्वविद्यालयों को मान्यता देता है और सरकारी धन का वितरण करता है।
चर्चा में क्यों?
- उच्चतम न्यायालय ने यूजीसी द्वारा जनवरी में अधिसूचित 'उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने वाले नियम' (Promotion of Equity Rules, 2026) पर अंतरिम रोक लगा दी है।
- न्यायालय ने इन नियमों को "अत्यधिक व्यापक" करार दिया है। ये नियम परिसरों में जातिगत भेदभाव को रोकने के लिए बनाए गए थे, लेकिन इनके कुछ प्रावधानों और परिभाषाओं पर विवाद उत्पन्न होने के कारण यह मामला न्यायपालिका के समक्ष पहुंचा है।
यूजीसी के नए नियम
ये नियम प्रोफेसर थोराट समिति और न्यायमूर्ति रूपावल समिति जैसी विभिन्न समितियों की सिफारिशों और पूर्व के अदालती निर्देशों के आधार पर तैयार किए गए हैं।
- शोषण का दायरा: नियमों में मुख्य रूप से अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के छात्रों के साथ होने वाले मौखिक, शारीरिक और मानसिक शोषण को लक्षित किया गया है।
- समान अवसर केंद्र: हर संस्थान में एक केंद्र होगा जो वंचित वर्गों के छात्रों की शैक्षणिक और सामाजिक समस्याओं को सुलझाएगा।
- इक्विटी स्क्वाड और हेल्पलाइन: परिसरों में भेदभाव की घटनाओं की तत्काल रिपोर्टिंग के लिए हेल्पलाइन और 'इक्विटी स्क्वाड' (दस्ते) का गठन।
- जांच समितियों में प्रतिनिधित्व: नियमों के अनुसार, किसी भी भेदभाव की शिकायत की जांच करने वाली समिति में SC/ST/OBC वर्ग का कम से कम एक सदस्य होना अनिवार्य है।
- इसमें महिलाओं और अल्पसंख्यक वर्गों के उचित प्रतिनिधित्व की बात भी कही गई है ताकि जांच निष्पक्ष हो सके।
- समयबद्ध समाधान: शिकायत दर्ज होने के बाद एक निश्चित समयावधि (आमतौर पर 30 दिन) के भीतर समाधान सुनिश्चित करना।
- दंडात्मक प्रावधान: नियमों का पालन न करने पर संस्थानों की अनुदान राशि रोकना या उनकी मान्यता रद्द करने की सिफारिश करना।
विवाद का कारण
- भेदभाव की परिभाषा: नियमों में भेदभाव को केवल SC/ST और OBC के खिलाफ होने वाले कृत्यों तक सीमित रखा गया है, जिससे सामान्य श्रेणी के छात्रों ने उपेक्षित महसूस किया।
- झूठी शिकायतें: नए नियमों में झूठी शिकायतों के खिलाफ कार्रवाई के स्पष्ट प्रावधानों का अभाव था, जिससे इसके दुरुपयोग की आशंका जताई गई।
- स्वायत्तता का हनन: कुछ शिक्षण संस्थानों का तर्क है कि यूजीसी के ये नियम उनके आंतरिक प्रशासन में अत्यधिक हस्तक्षेप करते हैं।
उच्चतम न्यायालय की टिप्पणी
स्टे लगाते समय न्यायालय ने निम्नलिखित प्रमुख बातें कहीं:
- नियमों की भाषा इतनी व्यापक है कि यह शैक्षिक वातावरण में अनिश्चितता पैदा कर सकती है।
- कोर्ट ने पूछा कि क्या ये नियम सभी हितधारकों के अधिकारों के बीच संतुलन बनाते हैं?
- न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि भेदभाव को रोकने के उपाय संवैधानिक सीमाओं के भीतर होने चाहिए।
2012 के नियम बनाम वर्तमान स्थिति
- 2012 के नियम: यूजीसी ने 2012 में भी इसी तरह के नियम बनाए थे, लेकिन वे प्रभावी रूप से लागू नहीं हो पाए। शिक्षण संस्थानों ने उन्हें लगभग पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया।
- अप्रासंगिकता: 2012 के नियमों में सख्त निगरानी और दंडात्मक कार्यवाही का अभाव था। पुराने नियमों के बावजूद पिछले पांच वर्षों में भेदभाव की शिकायतों में दोगुनी वृद्धि देखी गई, जिसने नए और कठोर नियमों की आवश्यकता को जन्म दिया।
कानूनी एवं संवैधानिक प्रावधान
- अनुच्छेद 15: धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध।
- अनुच्छेद 17: अस्पृश्यता का अंत।
- अनुच्छेद 21: गरिमा के साथ जीने का अधिकार।
- अनुच्छेद 46: SC/ST और अन्य कमजोर वर्गों के शैक्षिक और आर्थिक हितों को बढ़ावा देना।
विश्लेषण
- यह मामला 'सकारात्मक कार्रवाई' और 'प्रशासनिक नियंत्रण' के बीच के संघर्ष को दर्शाता है। जहाँ एक ओर परिसरों में जातिगत भेदभाव एक कड़वी हकीकत है, वहीं दूसरी ओर नियमों की अस्पष्टता उनके कार्यान्वयन में बाधा डालती है।
- 2012 के नियमों की विफलता यह सिद्ध करती है कि बिना 'निगरानी' और 'दंड' के सामाजिक सुधार कठिन हैं। कोर्ट का स्टे नियमों को खत्म करने के लिए नहीं, बल्कि उन्हें अधिक संतुलित और संवैधानिक रूप से सटीक बनाने के लिए एक अवसर हो सकता है।
आगे की राह
- समावेशी परिभाषा: नियमों में भेदभाव की परिभाषा को व्यापक बनाया जाए ताकि किसी भी पृष्ठभूमि का छात्र इसका लाभ ले सके।
- दुरुपयोग के खिलाफ सुरक्षा: झूठी शिकायतों को रोकने के लिए सुरक्षा उपाय जोड़े जाएं, बिना शिकायतकर्ताओं को डराए।
- संवेदीकरण: केवल कानून से बदलाव नहीं आएगा; परिसरों में शिक्षकों और छात्रों के लिए संवेदीकरण कार्यक्रम अनिवार्य होने चाहिए।
- डिजिटल रिपोर्टिंग: शिकायतों की पारदर्शी और गुमनाम रिपोर्टिंग के लिए एक केंद्रीय पोर्टल बनाया जाना चाहिए।
निष्कर्ष
उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता सुनिश्चित करना भारत के भविष्य के लिए अनिवार्य है। उच्चतम न्यायालय का हस्तक्षेप इस सुधार प्रक्रिया को अधिक न्यायसंगत बना सकता है। लक्ष्य केवल नियम बनाना नहीं, बल्कि एक ऐसा वातावरण तैयार करना होना चाहिए जहाँ किसी भी छात्र को उसकी पहचान के कारण अपमान या पीड़ा न झेलनी पड़े। जैसा कि रोहित वेमुला के मामले ने सिखाया—परिसर ज्ञान के मंदिर होने चाहिए, भेदभाव के अखाड़े नहीं।
सामान्य अध्ययन पेपर – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध
संदर्भ
हाल ही में भारत के उच्चतम न्यायालय ने एक युगांतकारी निर्णय सुनाते हुए स्पष्ट किया कि मासिक धर्म स्वास्थ्य तक पहुँच केवल एक स्वास्थ्य सुविधा नहीं, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत 'जीवन के अधिकार' का अभिन्न हिस्सा है। न्यायालय ने माना कि स्कूलों में मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन (MHM) की कमी छात्राओं को शिक्षा से वंचित करती है और उन्हें सामाजिक अपमान की ओर धकेलती है।
मासिक धर्म स्वास्थ्य क्या है?
मासिक धर्म जिसे सामान्य भाषा में 'पीरियड्स' या 'माहवारी' भी कहा जाता है, महिलाओं के शरीर में होने वाली एक स्वाभाविक और स्वस्थ जैविक प्रक्रिया है।
यह क्यों होता है?
हर महीने, एक महिला का शरीर संभावित गर्भावस्था के लिए खुद को तैयार करता है। इस प्रक्रिया में, गर्भाशय की दीवार पर रक्त और ऊतकों की एक नरम परत बन जाती है।
- जब महिला गर्भधारण नहीं करती है, तो शरीर को इस परत की आवश्यकता नहीं रहती।
- परिणामस्वरुप, यह परत टूटकर योनि के रास्ते शरीर से बाहर निकल जाती है। इसी को मासिक धर्म कहते हैं।
चर्चा में क्यों?
- 30 जनवरी, 2026 को जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने डॉ. जया ठाकुर बनाम भारत संघ मामले में फैसला सुनाया।
- न्यायालय ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया कि वे स्कूलों में मुफ्त सैनिटरी नैपकिन, वेंडिंग मशीनें और 'MHM कॉर्नर' सुनिश्चित करें।
- कोर्ट ने स्पष्ट किया कि "पीरियड एक लड़की की शिक्षा का अंत नहीं होना चाहिए।"
संवैधानिक प्रावधान
न्यायालय ने इस मुद्दे को तीन प्रमुख संवैधानिक स्तंभों से जोड़ा है:
- अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता): गरिमा के साथ जीने के अधिकार में स्वास्थ्य और स्वच्छता शामिल है।
- अनुच्छेद 15 (भेदभाव का निषेध): मासिक धर्म के आधार पर शैक्षिक अवसरों से वंचित करना लिंग आधारित भेदभाव है।
- समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14 & 15): लड़कों की तुलना में लड़कियों के पास संसाधनों की कमी उनके शैक्षिक विकास में बाधा है, जिसे दूर करना अब राज्य की जिम्मेदारी है।
- अनुच्छेद 21A (शिक्षा का अधिकार): यदि बुनियादी सुविधाओं के अभाव में लड़की स्कूल छोड़ती है, तो यह उसके शिक्षा के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है।
- निजता का अधिकार: सुरक्षित और निजी स्थान पर मासिक धर्म प्रबंधन करना छात्र की व्यक्तिगत निजता का हिस्सा है।
उच्चतम न्यायालय के मुख्य दिशानिर्देश और निर्णय
- संवैधानिक घोषणा
- अनुच्छेद 21 का हिस्सा: कोर्ट ने घोषित किया कि मासिक धर्म स्वास्थ्य और प्रबंधन (MHM) तक पहुँच संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत 'जीवन और गरिमा के अधिकार' का अभिन्न हिस्सा है।
- शारीरिक स्वायत्तता: स्वच्छता सुविधाओं का अभाव छात्राओं की 'शारीरिक स्वायत्तता' और 'निजता के अधिकार' का उल्लंघन है।
- बुनियादी ढांचे के लिए निर्देश
- लिंग-पृथक शौचालय: प्रत्येक स्कूल (सरकारी, सहायता प्राप्त और निजी) में छात्राओं के लिए अलग, क्रियाशील और सुरक्षित शौचालयों का होना अनिवार्य है।
- पानी की उपलब्धता: शौचालयों में निरंतर स्वच्छ पानी की आपूर्ति सुनिश्चित की जानी चाहिए।
- MHM कॉर्नर: स्कूलों में विशेष 'मासिक धर्म स्वच्छता कोने' बनाए जाएं, जहाँ आकस्मिक स्थिति के लिए अतिरिक्त कपड़े, अंतःवस्त्र और तौलिए उपलब्ध हों।
- सैनिटरी उत्पादों की उपलब्धता
- मुफ्त वितरण: सभी छात्राओं को मुफ्त सैनिटरी नैपकिन प्रदान किए जाएं।
- वेंडिंग मशीनें: स्कूलों में सैनिटरी नैपकिन वेंडिंग मशीनें लगाई जाएं, अधिमानतः शौचालय परिसर के भीतर ताकि छात्राओं की गोपनीयता बनी रहे।
- उत्पाद की गुणवत्ता: कोर्ट ने 'ऑक्सो-बायोडिग्रेडेबल' सैनिटरी नैपकिन के उपयोग को प्राथमिकता दी है ताकि पर्यावरण को नुकसान न पहुंचे।
- अपशिष्ट प्रबंधन
- सुरक्षित निपटान: इस्तेमाल किए गए नैपकिन के निपटान के लिए शौचालयों में 'इनसिनेरेटर' या उचित कचरा प्रबंधन प्रणाली होनी चाहिए।
- जागरूकता और संवेदीकरण
- पुरुषों की भूमिका: कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि केवल छात्राओं को शिक्षित करना पर्याप्त नहीं है। पुरुष शिक्षकों और छात्रों को भी मासिक धर्म की 'जैविक वास्तविकता' के प्रति संवेदनशील बनाया जाए ताकि छात्राओं को किसी भी प्रकार के उत्पीड़न या शर्मिंदगी का सामना न करना पड़े।
- कलंक मिटाना: शैक्षिक पाठ्यक्रम और कार्यक्रमों के माध्यम से मासिक धर्म से जुड़ी सामाजिक वर्जनाओं को खत्म करने के प्रयास किए जाएं।
भारत सरकार द्वारा उठाये गए कदम:
- मासिक धर्म स्वच्छता योजना (MHS): स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा शुरू की गई इस योजना का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों की किशोरियों (10-19 वर्ष) में जागरूकता बढ़ाना और उन्हें रियायती दरों पर (जैसे 'स्वच्छ' ब्रांड के तहत) सैनिटरी नैपकिन उपलब्ध कराना है।
- स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण और शहरी): इसके तहत स्कूलों में विशेष रूप से छात्राओं के लिए अलग और कार्यात्मक शौचालयों के निर्माण पर जोर दिया गया है। साथ ही, इस्तेमाल किए गए पैड के निपटान के लिए 'इंसिनेरेटर' (भस्मक) लगाने के दिशा-निर्देश भी जारी किए गए हैं।
- राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम (RKSK): इस कार्यक्रम के माध्यम से सामुदायिक स्तर पर 'पीयर एजुकेटर्स' (साथी शिक्षक) और आशा कार्यकर्ताओं द्वारा मासिक धर्म से जुड़ी भ्रांतियों को दूर करने और स्वास्थ्य शिक्षा प्रदान करने का कार्य किया जाता है।
- प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि परियोजना (PMBJP): सरकार अपने जन औषधि केंद्रों के माध्यम से मात्र 1 रुपये में 'सुविधा' नामक ऑक्सो-बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी नैपकिन उपलब्ध करा रही है, ताकि यह आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग की पहुँच में हो।
- शिक्षा मंत्रालय के दिशा-निर्देश: समग्र शिक्षा अभियान के तहत स्कूलों को सैनिटरी पैड वेंडिंग मशीनें और निपटान प्रणाली स्थापित करने के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है।
भारत में महिलाओं एवं छात्राओं की वर्तमान स्थिति
- NFHS-5 डेटा: भारत में 15-24 वर्ष की लगभग 77.3% महिलाएं स्वच्छ तरीकों का उपयोग करती हैं, लेकिन आज भी लगभग 23% महिलाएं असुरक्षित साधनों (राख, गंदा कपड़ा, पत्ते) पर निर्भर हैं।
- शिक्षा पर प्रभाव: विभिन्न शोध बताते हैं कि मासिक धर्म के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग 20-25% लड़कियां हर महीने कुछ दिन स्कूल नहीं जातीं या पूरी तरह पढ़ाई छोड़ देती हैं।
समाज बनाम समस्या: रूढ़िवादिता और स्वास्थ्य चुनौतियां
- सामाजिक स्वीकार्यता: भारत के कई हिस्सों में आज भी मासिक धर्म को 'अपवित्र' माना जाता है। धार्मिक स्थलों और रसोई में प्रवेश की मनाही जैसे प्रतिबंध मनोवैज्ञानिक दबाव पैदा करते हैं।
- स्वास्थ्य जोखिम: असुरक्षित प्रथाओं के कारण सर्वाइकल कैंसर और रिप्रोडक्टिव ट्रैक्ट इन्फेक्शन्स (RTI) जैसे गंभीर रोगों का खतरा बढ़ जाता है।
- जागरूकता की कमी: किशोरावस्था में पहुंचने वाली कई लड़कियों को पहले पीरियड के बारे में कोई वैज्ञानिक जानकारी नहीं होती, जिससे वे भय और हीन भावना का शिकार हो जाती हैं।
कार्यान्वयन में प्रमुख बाधाएँ
- अवसंरचना व संसाधन: ग्रामीण स्कूलों में अलग शौचालयों, निरंतर पानी और वेंडिंग मशीनों के लिए बिजली की भारी कमी है।
- वित्तीय व लॉजिस्टिक: मुफ्त उत्पादों की निरंतर आपूर्ति और मशीनों के रखरखाव के लिए स्थायी बजट व सुदृढ़ सप्लाई चेन का अभाव है।
- सामाजिक वर्जनाएँ: समाज में व्याप्त गहरी रूढ़िवादिता और शर्म के कारण छात्राएं सहायता मांगने या सुविधाओं का उपयोग करने में हिचकिचाती हैं।
- प्रशासनिक व पर्यावरणीय: प्रभावी निगरानी तंत्र की कमी और इस्तेमाल किए गए पैड के सुरक्षित व पर्यावरण-अनुकूल निपटान की बड़ी चुनौती है।
- असंवेदनशीलता: पुरुष शिक्षकों और छात्रों में वैज्ञानिक जागरूकता की कमी एक सहायक वातावरण बनने में बाधा डालती है।
विश्लेषण
यह निर्णय न्यायिक सक्रियता का एक सकारात्मक उदाहरण है। न्यायालय ने केवल आदेश नहीं दिया, बल्कि उसे शिक्षा का अधिकार अधिनियम के मानदंडों से जोड़कर लागू करने योग्य बनाया है। हालांकि, केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं है; चुनौती ग्रामीण स्तर पर इसके 'कार्यान्वयन' और समाज की 'मानसिकता' बदलने में है। पुरुष शिक्षकों और छात्रों का संवेदीकरण इस समस्या के समाधान की कुंजी है।
आगे की राह
- सामुदायिक भागीदारी: आंगनवाड़ी और आशा कार्यकर्ताओं के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता बढ़ाना।
- सस्ते विकल्प: स्थानीय स्वयं सहायता समूहों (SHGs) को सैनिटरी पैड बनाने के लिए प्रोत्साहित करना ताकि लागत कम हो।
- डिजिटल मॉनिटरिंग: स्कूलों में सुविधाओं की स्थिति की निगरानी के लिए एक डैशबोर्ड तैयार करना।
- पुरुष संवेदीकरण: मासिक धर्म को एक 'महिला समस्या' के बजाय एक 'मानवीय वास्तविकता' के रूप में पेश करना।
निष्कर्ष
उच्चतम न्यायालय का यह फैसला भारत में लैंगिक न्याय की दिशा में एक 'मग्ना कार्टा' (Magna Carta) के समान है। यह केवल सैनिटरी पैड बांटने के बारे में नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था को तोड़ने के बारे में है जो लड़कियों को उनकी जैविक स्थिति के कारण पीछे रखती है। जब देश की आधी आबादी गरिमा और स्वास्थ्य के साथ शिक्षित होगी, तभी वास्तविक 'विकसित भारत' का सपना साकार हो सकेगा।
सामान्य अध्ययन पेपर– II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध
संदर्भ
भारत जैसे विशाल देश में सुरक्षित पेयजल पहुँचाना हमेशा से एक बड़ी चुनौती रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 2019 में शुरू किया गया 'जल जीवन मिशन' इसी दिशा में एक क्रांतिकारी कदम था। फरवरी 2026 के बजट में इस मिशन को लेकर दो विरोधाभासी खबरें सामने आईं—पहला, ₹67,600 करोड़ का बड़ा आवंटन और दूसरा, राज्यों में भारी अनियमितताओं के कारण वास्तविक खर्च में आई भारी गिरावट।
जल जीवन मिशन योजना
जल जीवन मिशन (JJM) भारत सरकार का एक प्रमुख और महत्वाकांक्षी कार्यक्रम है, जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त 2019 को लाल किले से घोषित किया था।
- लक्ष्य: 2024 (अब बढ़ाकर 2028) तक प्रत्येक ग्रामीण घर में 'कार्यात्मक घरेलू नल कनेक्शन' (FHTC) के माध्यम से प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 55 लीटर पानी की आपूर्ति सुनिश्चित करना।
- फंडिंग पैटर्न: हिमालयी और उत्तर-पूर्वी राज्यों के लिए केंद्र-राज्य का हिस्सा 90:10, अन्य राज्यों के लिए 50:50, और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए 100% केंद्र द्वारा।
- दृष्टिकोण: यह एक 'जन आंदोलन' है जो सामुदायिक भागीदारी, जल प्रबंधन और जल संरक्षण पर आधारित है।
चर्चा में क्यों?
- राज्यसभा में केंद्र का बयान: जल शक्ति राज्य मंत्री वी. सोमन्ना ने राज्यसभा में स्पष्ट किया कि केंद्र ने कई राज्यों (जैसे असम) को 2025-26 में कोई नया फंड जारी नहीं किया है।
- राज्यों को निर्देश: केंद्र ने राज्यों से कहा है कि वे अपनी परियोजनाओं को अपने संसाधनों से पूरा करें। इसका मुख्य कारण पिछली फंडिंग का पूरा उपयोग न होना और ऑडिट रिपोर्ट की कमी है।
- समय सीमा में विस्तार: 2024 के अपने मूल लक्ष्य को पूरा न कर पाने के कारण, अब इस मिशन की अवधि को दिसंबर 2028 (या कुछ संदर्भों में मार्च 2028) तक बढ़ा दिया गया है।
भारत में आवश्यकता एवं प्रासंगिकता
- स्वास्थ्य सुरक्षा: सुरक्षित पानी से ग्रामीण क्षेत्रों में डायरिया, हैजा और जलजनित बीमारियों के बोझ में कमी आई है। आंकड़ों के अनुसार, इसने लगभग 4 लाख डायरिया मौतों को रोका है।
- उपलब्धि: वर्तमान डैशबोर्ड के अनुसार, लगभग 15.79 करोड़ (81.5%) परिवारों के पास नल का कनेक्शन पहुँच चुका है।
- महिला सशक्तीकरण: ग्रामीण महिलाओं को पानी के लिए मीलों पैदल चलने से मुक्ति मिली है, जिससे उनका समय और श्रम बच रहा है।
- आर्थिक लाभ: स्वच्छ पानी से कार्यक्षमता बढ़ती है और बीमारियों पर होने वाला खर्च कम होता है।
- नीति आयोग की रिपोर्ट: 2018 के अनुसार, भारत के 60 करोड़ लोग पानी की गंभीर कमी का सामना कर रहे हैं, ऐसे में यह मिशन अस्तित्व की लड़ाई है।
बजट 2026: आवंटन एवं शिकायतों का विवरण
- आवंटन: वित्त वर्ष 2026-27 के लिए ₹67,600 करोड़ का प्रावधान।
- शिकायतें: जल शक्ति मंत्रालय को राज्यों से लगभग 17,000 शिकायतें मिली हैं। उत्तर प्रदेश, राजस्थान और गुजरात जैसे राज्यों में पाइप की गुणवत्ता और फंड के दुरुपयोग की खबरें प्रमुख रही हैं।
- ऑडिट समस्या: केंद्र ने राज्यों को स्पष्ट कर दिया है कि जब तक पिछला ऑडिट पूरा नहीं होता, नया फंड नहीं मिलेगा।
राज्यों की अलग-अलग स्थिति
- सफल राज्य: गोवा, तेलंगाना, हरियाणा, गुजरात और पंजाब जैसे राज्यों ने 100% ग्रामीण कवरेज हासिल कर 'हर घर जल' का दर्जा प्राप्त किया है।
- पिछड़ रहे राज्य: पश्चिम बंगाल, राजस्थान और झारखंड में भौगोलिक चुनौतियों और प्रशासनिक ढिलाई के कारण अभी भी बड़ा लक्ष्य शेष है।
- उत्तराखंड का संकट: यहाँ 14.49 लाख घरों में से अधिकांश कवर हो चुके हैं, लेकिन बजट की कमी से ₹2000 करोड़ की देनदारियां फंसी हैं और 20% काम अधूरा है।
बजट बनाम वास्तविक खर्च
- यह इस लेख का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। 2025-26 के बजट में ₹66,770 करोड़ आवंटित थे, लेकिन संशोधित अनुमान (RE) के अनुसार केवल ₹16,944 करोड़ ही खर्च हो सके। यह 74% की गिरावट दर्शाती है कि केंद्र ने भ्रष्टाचार की शिकायतों के बाद 'सख्ती' अपनाते हुए राज्यों की फंडिंग पर रोक लगा दी है।
कार्यान्वयन एवं प्रमुख चुनौतियाँ
- भ्रष्टाचार: ठेकेदारों और अधिकारियों के बीच सांठगांठ से घटिया सामग्री का उपयोग।
- राज्यों पर आर्थिक बोझ: केंद्र द्वारा फंड रोकने पर राज्यों को अपने संसाधनों से काम पूरा करने में कठिनाई हो रही है।
- स्रोत की निरंतरता: नल लग गए हैं, लेकिन भूजल स्तर गिरने से पानी की आपूर्ति बंद हो रही है।
- पूंजीगत व्यय की कमी: बजट में सारा पैसा रखरखाव के लिए है, नए निर्माण के लिए फंड की कमी है।
विश्लेषण
यह मिशन अब अपने 'निर्माण चरण' से 'रखरखाव चरण' में प्रवेश कर चुका है। केंद्र सरकार का सख्त रुख यह संकेत देता है कि वह अब केवल 'कनेक्शन की संख्या' नहीं बल्कि 'वित्तीय पारदर्शिता' और 'काम की गुणवत्ता' चाहती है। यदि राज्यों ने अपनी व्यवस्था नहीं सुधारी, तो ₹67,600 करोड़ का आवंटन केवल कागजों तक सीमित रह जाएगा।
आगे की राह
- डिजिटल ऑडिट: फंड के दुरुपयोग को रोकने के लिए 'रियल-टाइम मॉनिटरिंग' और डिजिटल ऑडिटिंग अनिवार्य हो।
- वर्षा जल संचयन: नल में पानी बना रहे, इसके लिए 'कैच द रेन' जैसे अभियानों को मिशन के साथ जोड़ना होगा।
- थर्ड पार्टी निरीक्षण: स्वतंत्र एजेंसियों द्वारा काम की गुणवत्ता की औचक जांच होनी चाहिए।
- विवादों का समाधान: उत्तराखंड जैसे राज्यों में ठेकेदारों के लंबित बिलों का भुगतान कर रुके हुए काम को गति देनी चाहिए।
निष्कर्ष
जल जीवन मिशन केवल एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि ग्रामीण भारत की जीवनरेखा है। बजट 2026 ने मिशन को 'ऑक्सीजन' दी है, लेकिन इसकी सफलता अब केंद्र की सख्ती और राज्यों की जवाबदेही के संतुलन पर निर्भर है। यदि दिसंबर 2028 तक हर घर को शुद्ध जल पहुँचाना है, तो भ्रष्टाचार पर लगाम और जल स्रोतों का संरक्षण अनिवार्य होगा।