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संदर्भ
ओडिशा की प्राचीन जनजातीय संस्कृतियों में लांजिया सौरा समुदाय अपनी अद्वितीय दृश्य परंपराओं और कलात्मक विरासत के लिए विशेष स्थान रखता है। हाल ही में यह समुदाय अपनी पारंपरिक पहचान को आधुनिक जीवनशैली के साथ सामंजस्य बिठाते हुए संरक्षित करने के अनुकरणीय प्रयासों के कारण चर्चा के केंद्र में रहा है।
समसामयिक घटनाक्रम
- विरासत का संरक्षण: लांजिया सौरा समुदाय के युवा अपनी पारंपरिक पहचान, जैसे कि विशिष्ट धातु के झुमके और टैटू को आधुनिक रूप में अपना रहे हैं, ताकि उनकी सांस्कृतिक जड़ें लुप्त न हों।
- कला को वैश्विक पहचान: इस समुदाय की प्रसिद्ध 'इडिटल' कला को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रोत्साहन मिल रहा है, जिससे आधुनिक भारतीय कपड़ा उद्योग और समकालीन कला जगत में इनकी मांग बढ़ी है।
- PVTG श्रेणी में विकास: भारत सरकार द्वारा 'विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह' (PVTG) के रूप में चिह्नित होने के कारण, इस समुदाय के सामाजिक-आर्थिक उत्थान के लिए बुनियादी ढांचे और साक्षरता पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
लांजिया सौरा समुदाय:
- परिचय एवं अवस्थिति:
- क्षेत्र: ये मुख्य रूप से दक्षिणी ओडिशा के रायगढ़ और गजपति जिलों के दुर्गम पहाड़ी और वनाच्छादित क्षेत्रों में निवास करते हैं।
- सामाजिक श्रेणी: इन्हें PVTG की श्रेणी में रखा गया है, क्योंकि इनकी जनसंख्या स्थिर है और साक्षरता दर अपेक्षाकृत कम है।
- इतिहास और धार्मिक विश्वास:
- पौराणिक संबंध: इनका उल्लेख रामायण (शबरी प्रसंग) और महाभारत में मिलता है, जो इनकी पूर्व-वैदिक प्राचीनता को प्रमाणित करता है।
- प्रकृति पूजा: इनका जीवन प्रकृति के साथ अटूट रूप से जुड़ा है। ये वन देवताओं और पूर्वजों की आत्माओं की पूजा करते हैं, जिन्हें वे अपनी फसल और स्वास्थ्य का रक्षक मानते हैं।
- परंपरा और आजीविका:
- आजीविका: ये मुख्य रूप से 'पोडू चासा' (झूम खेती), वनोपज संग्रहण और लघु स्तरीय कृषि पर निर्भर हैं।
- दृश्य कला (इडिटल): इनकी भित्ति चित्रकला 'इडिटल' विश्वप्रसिद्ध है, जिसमें गेरू और चावल के पेस्ट का उपयोग कर आध्यात्मिक संदेश उकेरे जाते हैं।
- शारीरिक अलंकरण: इनके कान के निचले हिस्से में पहने जाने वाले मोटे धातु के झुमके और शरीर पर उकेरे गए जटिल ज्यामितीय टैटू इनकी विशिष्ट पहचान हैं।
- सामाजिक संरचना: यह समाज पूर्णतः समतावादी है, जहाँ संसाधनों के साझाकरण और सामूहिक निर्णय लेने की परंपरा है।
महत्व:
- यह समुदाय पूर्वी घाट के पारिस्थितिकी तंत्र के साथ सतत सह-अस्तित्व का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है। इनका संगीत और नृत्य, जन्म से लेकर 'गुआर' (अंत्येष्टि) तक, जीवन के हर चरण का अभिन्न अंग है।
निष्कर्ष
लांजिया सौरा समुदाय की जीवनशैली यह संदेश देती है कि विकास की दौड़ में अपनी सांस्कृतिक विरासत का त्याग अनिवार्य नहीं है। उनकी 'इडिटल' कला और पारंपरिक रीति-रिवाज भारत की विविध स्वदेशी पहचान की धरोहर हैं। इस समुदाय का संरक्षण केवल एक जनजाति का संरक्षण नहीं, बल्कि भारत के उस प्राचीन इतिहास का संरक्षण है जो आज भी प्रकृति के साथ पूर्ण संतुलन में जीवित है।
संदर्भ
हाल ही में भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) द्वारा जारी एक शोध रिपोर्ट ने पारिस्थितिक गलियारों में आने वाले संकट की ओर ध्यान आकर्षित किया है। इस रिपोर्ट के अनुसार, चंबल नदी के जल स्तर में आई भारी गिरावट के कारण भारत के राष्ट्रीय जलीय जीव, गंगा नदी डॉल्फिन, अपने प्राकृतिक आवास को छोड़ने और यमुना के संगम की ओर विस्थापित होने के लिए विवश हैं।
समसामयिक घटनाक्रम
- आवास विस्थापन: चंबल नदी में जल प्रवाह की कमी ने डॉल्फिनों को सुरक्षित गहराई की तलाश में 'डाउनस्ट्रीम' (धारा के अनुकूल) प्रवास करने पर मजबूर कर दिया है।
- अस्तित्व का संकट: डॉल्फिन को जीवित रहने के लिए न्यूनतम 3 मीटर की गहराई आवश्यक है, किंतु सिंचाई और औद्योगिक दोहन के कारण चंबल का जल स्तर इस सीमा से नीचे जा रहा है।
- पारिस्थितिकी पर प्रभाव: जल स्तर कम होने से नदी के बीच बने द्वीपों तक शिकारियों (जैसे सियार और कुत्ते) की पहुँच आसान हो गई है, जो इंडियन स्किमर जैसे दुर्लभ पक्षियों के घोंसलों को नष्ट कर रहे हैं।
- विखंडित जनसंख्या: बांधों और बैराजों के निर्माण के कारण डॉल्फिनों की आबादी छोटे-छोटे समूहों में बंट गई है, जिससे उनके 'जीन पूल' को गंभीर खतरा उत्पन्न हो गया है।
गंगा नदी डॉल्फिन:
- परिचय एवं पहचान:
- इसे स्थानीय स्तर पर 'सूसू' कहा जाता है, क्योंकि यह साँस लेते समय विशिष्ट ध्वनि उत्पन्न करती है।
- यह भारत का राष्ट्रीय जलीय जीव है और नदी पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य की 'सूचक प्रजाति' मानी जाती है।
- संरक्षण स्थिति:
- IUCN रेड लिस्ट: लुप्तप्राय
- वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972: अनुसूची-I (सर्वाधिक संरक्षण)
- CITES: परिशिष्ट-I
- भौगोलिक अवस्थिति:
- यह मुख्यतः गंगा-ब्रह्मपुत्र-मेघना और कर्णफुली-सांगु नदी प्रणालियों (भारत, नेपाल, बांग्लादेश) में पाई जाती है।
- भारत में यह सात राज्यों—असम, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल में विस्तृत है।
- प्रमुख विशिष्टताएँ:
- अंधापन और नेविगेशन: यह जीव पूर्णतः अंधा होता है और शिकार के लिए 'इकोलोकेशन' या पराश्रव्य ध्वनियों का उपयोग करता है।
- अनन्य मीठा जल: अन्य डॉल्फिनों के विपरीत, यह केवल मीठे पानी में ही जीवित रह सकती है; समुद्री लवणीय जल इसके लिए घातक है।
- शारीरिक संरचना: मादाएं नर की तुलना में आकार में बड़ी होती हैं। इनका शरीर लचीला और त्वचा चिकनी (धूसर-भूरी) होती है।
निष्कर्ष
गंगा नदी डॉल्फिन का चंबल से विस्थापन केवल एक प्रजाति के आवास परिवर्तन की घटना नहीं है, बल्कि यह हमारी नदियों के सूखते प्रवाह और अनियंत्रित जल दोहन की गंभीर चेतावनी है। 'प्रोजेक्ट डॉल्फिन' जैसी पहलों की सफलता तभी सुनिश्चित हो सकती है जब हम नदियों के न्यूनतम पारिस्थितिक प्रवाह (को बनाए रखने और उनके प्राकृतिक स्वरूप को संरक्षित करने के लिए प्रतिबद्ध हों। डॉल्फिन का अस्तित्व सीधे तौर पर भारत की नदियों की शुद्धता और अविरलता से जुड़ा है।
सामान्य अध्ययन पेपर – III प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन।
संदर्भ
रूस-यूक्रेन संघर्ष की निरंतरता के मध्य पश्चिम एशिया में उत्पन्न नवीन भू-राजनीतिक अस्थिरता ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को पुनः अनिश्चितता के भंवर में डाल दिया है। ऊर्जा संसाधनों के केंद्र होने के कारण इस क्षेत्र में तनाव ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला, विशेषकर ऊर्जा और उर्वरक क्षेत्र को गंभीर रूप से बाधित किया है, जिसका प्रत्यक्ष एवं दूरगामी प्रभाव भारतीय मैक्रो-इकोनॉमिक स्थिरता पर पड़ रहा है।
ऊर्जा सुरक्षा और आपूर्ति श्रृंखला पर प्रहार
- होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकेबंदी: वैश्विक कच्चे तेल के व्यापार के लिए यह सबसे महत्वपूर्ण मार्ग है। इसकी नाकेबंदी ने कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की निर्बाध आपूर्ति को प्रतिबंधित कर दिया है।
- आयात निर्भरता: भारत अपनी कच्चे तेल की आवश्यकता का लगभग 90% आयात करता है (40 से अधिक देशों से)। आपूर्ति में मामूली बाधा भी घरेलू ऊर्जा सुरक्षा के लिए संकट उत्पन्न करती है।
- प्राइस इंडेक्स और इंडियन क्रूड बास्केट: भारत के लिए 'इंडियन क्रूड बास्केट' (Brent, Oman, और Dubai का मिश्रण) महत्वपूर्ण है। मार्च 2026 में इसमें 64.5% की तीव्र वृद्धि देखी गई, जो मार्च के अंत तक $157 प्रति बैरल के शिखर तक पहुंच गई थी। हालांकि हालिया अस्थायी संघर्षविराम से कीमतें $120 के आसपास आई हैं, फिर भी यह पूर्व के स्तरों से काफी अधिक है।
भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले बहुआयामी प्रभाव
- उत्पादन और आपूर्ति में व्यवधान: ऊर्जा-गहन क्षेत्रों जैसे कपड़ा, पेंट, रसायन, सीमेंट और टायर उद्योगों में उत्पादन लागत बढ़ेगी। इसका 'कैस्केडिंग प्रभाव' अन्य क्षेत्रों पर भी पड़ेगा।
- कृषि क्षेत्र पर संकट: उर्वरकों और आवश्यक रसायनों की आपूर्ति बाधित होने से आगामी खरीफ सीजन (जून से प्रारंभ) का कृषि उत्पादन प्रभावित हो सकता है। यह खाद्य सुरक्षा के दृष्टिकोण से चिंताजनक है।
- रसद और रसद लागत: ऊर्जा की बढ़ती कीमतों के कारण परिवहन और भंडारण महंगा हो जाएगा, जिससे अंतिम वस्तुओं की कीमतों में प्रत्यक्ष वृद्धि होगी।
- मुद्रा अवमूल्यन और विनिमय दर: डॉलर की बढ़ती मांग और बाजार की अनिश्चितता के कारण रुपये के मूल्य में गिरावट जारी है। मार्च 2026 में $13.6 बिलियन के विशाल FPI (विदेशी पोर्टफोलियो निवेश) प्रवाह के बावजूद, पूंजी बहिर्वाह ने रुपये पर दबाव बनाए रखा है।
प्रेषण और मांग का झटका:
- खाड़ी देशों में कार्यरत भारतीयों द्वारा भेजे जाने वाले धन में कमी आने की संभावना है।
- भारत के कुल व्यापारिक निर्यात का लगभग 56.4% हिस्सा (2024-25) पश्चिम एशिया, अमेरिका और यूरोप को जाता है। वहां मांग कम होने से निर्यात क्षेत्र प्रभावित होगा।
व्यापक आर्थिक चिंताएँ
- चालू खाता घाटा: निर्यात में कमी और महंगे आयात (विशेषकर तेल और उर्वरक) के कारण चालू खाता घाटा बढ़ने की प्रबल संभावना है।
- मुद्रास्फीति: 'लागत-जन्य मुद्रास्फीति' के कारण पेट्रोलियम उत्पादों और अन्य बुनियादी वस्तुओं की कीमतें बढ़ेंगी।
- राजकोषीय घाटा: सरकार को तेल विपणन कंपनियों को अतिरिक्त सब्सिडी देनी पड़ सकती है। यदि सरकार उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए उत्पाद शुल्क कम करती है, तो इससे राजस्व की हानि होगी और राजकोषीय घाटा बढ़ेगा।
मूल्यांकन
- यह संकट भारत के लिए 'दोहरी मार' जैसा है। एक तरफ वैश्विक आपूर्ति पक्ष की अड़चनें हैं, तो दूसरी तरफ घरेलू मुद्रास्फीति और राजकोषीय असंतुलन का खतरा।
- भारतीय अर्थव्यवस्था की लचीलापन इस बात पर निर्भर करेगी कि वह अपने आयात स्रोतों का कितनी कुशलता से विविधीकरण करती है और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की ओर कितनी तेजी से बढ़ती है।
निष्कर्ष
पश्चिम एशिया का संकट केवल एक क्षेत्रीय संघर्ष नहीं, बल्कि भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए एक गंभीर आर्थिक चेतावनी है। ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में त्वरित कदम, कुशल रसद प्रबंधन और सतर्क मौद्रिक नीति ही भारत को इस वैश्विक अनिश्चितता के दौर में सुरक्षित रख सकती है। जैसा कि पूर्व विशेषज्ञों (ई. रामचंद्रन और डी.के. श्रीवास्तव) ने संकेत दिया है, आपूर्ति श्रृंखला का सामान्य होना समय साध्य है, अतः सरकार को अल्पकालिक राहत और दीर्घकालिक संरचनात्मक सुधारों के बीच संतुलन बनाना होगा।
सामान्य अध्ययन पेपर – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध।
संदर्भ
वर्तमान में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों से पूर्व निर्वाचन आयोग द्वारा संचालित 'विशेष गहन पुनरीक्षण' प्रक्रिया और इसके अंतर्गत बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम विलोपन ने एक गंभीर संवैधानिक विवाद को जन्म दिया है। मतदाता सूची को 'शुद्ध' करने के नाम पर लाखों नागरिकों की मतदान पात्रता पर उपजे इस संकट को न्यायपालिका ने न केवल संवैधानिक गरिमा बल्कि राष्ट्रीयता की भावना से जोड़कर एक व्यापक विमर्श की ओर अग्रसर कर दिया है।
विशेष गहन पुनरीक्षण क्या है?
विशेष गहन पुनरीक्षण निर्वाचन आयोग द्वारा अपनाई जाने वाली एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसका उद्देश्य मतदाता सूची की सटीकता सुनिश्चित करना होता है। इसके अंतर्गत 'तार्किक विसंगतियों', दोहरी प्रविष्टियों, और मृत या स्थानांतरित मतदाताओं की पहचान कर सूची का शुद्धिकरण किया जाता है, ताकि चुनाव की निष्पक्षता बनी रहे।
चर्चा के कारण
हालिया समाचारों में यह विषय निम्नलिखित कारणों से चर्चा का केंद्र बना हुआ है:
- बड़े पैमाने पर अपील: पश्चिम बंगाल में सूची से हटाए गए मतदाताओं द्वारा 34 लाख अपीलें दायर की गई हैं, जो एक अभूतपूर्व संख्या है।
- अपीलीय न्यायाधिकरणों पर दबाव: प्रत्येक न्यायाधिकरण के पास एक लाख से अधिक मामले लंबित हैं, जबकि चुनाव की तिथियाँ अत्यंत निकट हैं।
- प्रक्रियात्मक विचलन: निर्वाचन आयोग द्वारा पूर्व में दिए गए उस आश्वासन से पीछे हटना, जिसमें कहा गया था कि 2002 की मतदाता सूची के आधार को बदला नहीं जाएगा।
सर्वोच्च न्यायालय की महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ
सर्वोच्च न्यायालय ने निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराजगी व्यक्त करते हुए निम्नलिखित बातें कहीं:
- भावनात्मक अधिकार: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि मतदाता सूची में होना और मतदान करना केवल एक संवैधानिक अधिकार नहीं, बल्कि एक 'भावनात्मक अधिकार' भी है।
- राष्ट्रीयता की अभिव्यक्ति: मतदान को किसी नागरिक के लिए उसकी राष्ट्रीयता और देशभक्ति की सबसे बड़ी अभिव्यक्ति बताया गया है।
- निष्पक्षता का प्रश्न: न्यायालय ने 'तार्किक विसंगति' की अनूठी श्रेणी पर सवाल उठाया जो केवल बंगाल में लागू की गई, जबकि बिहार जैसे राज्यों में ऐसी कोई श्रेणी नहीं थी।
- नियमों का उल्लंघन: अदालत ने कहा कि जब आयोग ने 2002 की सूची को बेंचमार्क माना था, तो नए मापदंड जोड़कर प्रक्रिया को जटिल बनाना नागरिकों के साथ अन्याय है।
मतदान के अधिकार: संवैधानिक और कानूनी प्रावधान
- अनुच्छेद 326: भारतीय संविधान का यह अनुच्छेद 'वयस्क मताधिकार' का प्रावधान करता है, जो प्रत्येक वयस्क नागरिक को मतदान का अधिकार देता है।
- लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 एवं 1951: यह अधिनियम मतदाता पंजीकरण की प्रक्रिया, पात्रता और चुनावों के संचालन को वैधानिक ढांचा प्रदान करते हैं।
- संवैधानिक स्थिति: हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने पूर्व के कई निर्णयों में इसे 'वैधानिक अधिकार' माना है, परंतु वर्तमान टिप्पणियों में इसे लोकतंत्र की भागीदारी का अनिवार्य हिस्सा और मौलिक भावना के निकट माना गया है।
मुख्य चिंताएँ
- समय का अभाव: मतदान से मात्र कुछ दिन पूर्व लाखों अपीलों का लंबित होना नागरिकों को उनके अधिकार से वंचित कर सकता है।
- प्रशासनिक दुरावस्था: अपीलीय प्रक्रिया में जल्दबाजी और उचित सुनवाई का अभाव 'प्राकृतिक न्याय' के सिद्धांतों के विरुद्ध है।
- नागरिक असुरक्षा: सूची से नाम कटने के कारण नागरिकों में अपनी राष्ट्रीयता और पहचान को लेकर अनिश्चितता का वातावरण व्याप्त हो गया है।
अन्य महत्वपूर्ण बिंदु
- पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची को 9 अप्रैल 2026 को ही 'फ्रीज' (स्थिर) कर दिया गया था, जिससे अपीलों के निपटारे के लिए समय बहुत सीमित बचा है।
- न्यायालय ने 'अन्वेषणात्मक' दृष्टिकोण की आलोचना की है, जहाँ बोझ नागरिक पर डाल दिया गया है कि वह अपनी साख सिद्ध करे।
मूल्यांकन
- यह प्रकरण 'निर्वाचन शुचिता बनाम लोकतांत्रिक समावेशन' के मध्य एक जटिल द्वंद्व को दर्शाता है। जहाँ निर्वाचन आयोग द्वारा 'तार्किक विसंगति' जैसे फिल्टर का उपयोग फर्जी प्रविष्टियों को रोकने हेतु एक अनिवार्य तकनीकी सुरक्षा कवच है, वहीं 34 लाख अपीलों की उपस्थिति 'फॉल्स पॉजिटिव' की उच्च दर की ओर संकेत करती है।
- जब एल्गोरिदम अत्यधिक कठोर होते हैं, तो वे तकनीकी विसंगति और सामान्य मानवीय त्रुटि के बीच अंतर करने में विफल रहते हैं, जिससे अनजाने में 'लोकतांत्रिक बहिष्करण' का संकट उत्पन्न होता है।
- अंततः, तकनीकी सटीकता की खोज में किसी भी वैध नागरिक का 'संवैधानिक एवं भावनात्मक' मताधिकार बाधित नहीं होना चाहिए; प्रौद्योगिकी को सदैव मानवीय विवेक और समावेशी न्याय का पूरक बने रहना चाहिए।
आगे की राह
- डेटा सुधारात्मक दृष्टिकोण: निर्वाचन आयोग को 'तार्किक विसंगतियों' के मापदंडों को पारदर्शी और सुसंगत बनाना चाहिए ताकि वे राज्यों के बीच भिन्न न हों।
- डिजिटल समाधान: लंबित अपीलों के त्वरित निस्तारण हेतु 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस' और डिजिटल सत्यापन का उपयोग किया जाना चाहिए ताकि मानवीय त्रुटि और समय की बचत हो सके।
- संवेदनशीलता: प्रशासनिक प्रक्रियाओं को नागरिक-केंद्रित होना चाहिए, जहाँ 'शुद्धिकरण' का उद्देश्य अधिकार छीनना नहीं बल्कि अधिकार सुरक्षित करना हो।
निष्कर्ष
लोकतंत्र की सफलता केवल चुनाव कराने में नहीं, बल्कि समावेशी भागीदारी में निहित है। सर्वोच्च न्यायालय की फटकार निर्वाचन आयोग के लिए एक चेतावनी है कि 'शुद्धिकरण' की तकनीक मानवीय भावनाओं और संवैधानिक अधिकारों से ऊपर नहीं हो सकती। अंततः, एक पारदर्शी और त्रुटिहीन मतदाता सूची ही जीवंत लोकतंत्र की पहचान है, जहाँ प्रत्येक नागरिक का मत उसकी राष्ट्रीयता के गौरव का प्रतीक बना रहे।
सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 1 भारतीय विरासत और संस्कृति, विश्व का इतिहास एवं भूगोल और समाज।
संदर्भ
हाल के वर्षों में बेंगलुरु का जल संकट केवल मानसून की विफलता का परिणाम नहीं है, बल्कि यह 'अनियोजित शहरीकरण' और 'प्राकृतिक संसाधनों के अति-दोहन' का एक ज्वलंत उदाहरण बन गया है। जहाँ कर्नाटक राज्य समग्र रूप से जल सुरक्षा की दिशा में प्रगति कर रहा है, वहीं बेंगलुरु की भूजल स्थिति चिंताजनक स्तर तक पहुँच गई है। यह संकट न केवल वर्तमान जल उपलब्धता को चुनौती दे रहा है, बल्कि शहर की भविष्य की 'अस्तित्वगत सुरक्षा' पर भी प्रश्नचिह्न लगा रहा है।
समसामयिक घटनाक्रम
- भूजल का अत्यधिक दोहन: वर्ष 2025 के आंकड़ों के अनुसार, जहाँ राज्य का औसत भूजल निष्कर्षण 66% है, वहीं 'बेंगलुरु ईस्ट तालुका' में यह दर 378% तक पहुँच गई है, जो पुनर्भरण क्षमता से कहीं अधिक है।
- मानसून की विफलता: 2024 के कमजोर मानसून ने संकट को और गहरा दिया, जिसके परिणामस्वरूप शहर के लगभग 14,000 बोरवेलों में से 50% सूख गए।
- बुनियादी ढांचा परियोजनाएं: सरकार ने 110 गांवों को 775 MLD जल आपूर्ति करने की योजना बनाई है, किंतु कार्यान्वयन में देरी के कारण जनता अभी भी 'टैंकर माफिया' और निजी जल प्रदाताओं पर निर्भर है।
- कावेरी नदी पर निर्भरता: शहर की जल आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा कावेरी नदी से आता है, जो न केवल उच्च पूंजीगत लागत वाला है, बल्कि अंतर-राज्यीय जल विवादों और जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशील भी है।
संकट के अंतर्निहित कारण
- क्रिस्टलीय चट्टानी भू-संरचना: बेंगलुरु की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि यहाँ की चट्टानें जल संचयन के लिए उपयुक्त नहीं हैं और इनका पुनर्भरण अत्यंत मंद है।
- ग्रे इंफ्रास्ट्रक्चर बनाम हरित बुनियादी ढांचा: कंक्रीट के बढ़ते जाल (Built-up area) ने वर्षा जल के भूमिगत रिसाव को रोक दिया है। झीलों और कुओं के पारंपरिक तंत्र को नष्ट कर दिया गया है।
- एकीकृत प्रबंधन का अभाव: पाइपलाइन, भूजल और अपशिष्ट जल प्रबंधन के बीच समन्वय की कमी है। उपभोक्ता सुविधा के लिए अनियंत्रित स्रोतों (टैंकरों) की ओर रुख कर रहे हैं।
- उच्च मांग क्षेत्र: 'टेक पार्क' और बहुमंजिला इमारतों में प्रति व्यक्ति जल की खपत और जनसंख्या घनत्व, उपलब्ध संसाधनों की तुलना में अत्यधिक है।
प्रमुख सरकारी पहल
- स्थानीय (बेंगलुरु विशिष्ट) पहल:
- कावेरी जल आपूर्ति परियोजना (चरण V): शहर के बाहरी 110 गांवों को प्रतिदिन 775 मिलियन लीटर (MLD) पानी उपलब्ध कराने हेतु।
- के.सी. एवं एच.एन. वैली परियोजना: बेंगलुरु के उपचारित अपशिष्ट जल द्वारा पड़ोसी शुष्क जिलों की झीलों का पुनर्भरण करना।
- अनिवार्य वर्षा जल संचयन (RWH): BWSSB द्वारा विशिष्ट आकार के सभी भवनों के लिए जल संचयन संरचना को कानूनी रूप से अनिवार्य बनाना।
- टैंकर विनियमन: निजी जल प्रदाताओं का अनिवार्य पंजीकरण और कीमतों का प्रशासनिक निर्धारण।
- राष्ट्रीय (भारत सरकार) पहल:
- अमृत 2.0 (AMRUT 2.0): सभी शहरी स्थानीय निकायों को 'जल सुरक्षित' बनाने और जल के पुनर्चक्रण हेतु।
- जल शक्ति अभियान: मानसून के जल को संचित करने के लिए राष्ट्रव्यापी जागरूकता और ढांचागत विकास।
- अटल भूजल योजना: सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से भूजल प्रबंधन में सुधार हेतु।
विश्लेषण
बेंगलुरु का संकट "डिमांड-सप्लाई गैप" से कहीं अधिक "कुप्रबंधन का संकट" है। जल को एक 'असीमित संसाधन' मानने की प्रवृत्ति ने पारिस्थितिक पूंजी को समाप्त कर दिया है। 378% भूजल दोहन यह दर्शाता है कि हम आने वाली पीढ़ियों के हिस्से का जल आज ही समाप्त कर रहे हैं। 'ग्रे इंफ्रास्ट्रक्चर' (सड़क, भवन) को 'ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर' (पार्क, आर्द्रभूमि) पर वरीयता देने से शहर की 'लचीलापन क्षमता' घट गई है।
आगे की राह
- स्पंज सिटी अवधारणा: शहरी नियोजन में ऐसी प्रणालियों का विकास करना जो वर्षा जल को सोख सकें और उसे पुनर्भरण के लिए उपयोग कर सकें।
- विकेंद्रीकृत अपशिष्ट जल उपचार: अपशिष्ट जल के 100% उपचार और उसके पुन: उपयोग को अनिवार्य बनाना।
- पारिस्थितिक बहाली: ऐतिहासिक झीलों और राजकालुवे (नालों) के बीच के संपर्क को पुनः स्थापित करना ताकि मानसून के पानी का संचयन हो सके।
- जल लेखांकन: प्रत्येक तालुका की पुनर्भरण क्षमता के आधार पर वहां के निर्माण कार्यों और जनसंख्या घनत्व को सीमित करना।
- वितरण हानि में कमी: पाइपलाइन लीकेज और अवैध कनेक्शनों को रोककर 'गैर-राजस्व जल' (NRW) को कम करना।
निष्कर्ष
बेंगलुरु का जल संकट एक चेतावनी है कि आर्थिक संवृद्धि को पारिस्थितिक स्थिरता की कीमत पर प्राप्त नहीं किया जा सकता। यदि समय रहते 'पारिस्थितिक पूंजी' के संरक्षण और जल के एकीकृत प्रबंधन पर ध्यान नहीं दिया गया, तो यह 'सिलिकॉन वैली' जल की कमी के कारण अपनी वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता खो सकती है। भविष्य का मार्ग 'दोहन' से हटकर 'पुनर्भरण और संरक्षण' की ओर होना चाहिए।