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19 महीने के उच्च स्तर पर महंगाई: खुदरा मुद्रास्फीति की चुनौती और आर्थिक परिदृश्य
सामान्य अध्ययन पेपर– III: प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन।
सन्दर्भ
अर्थव्यवस्था की स्थिरता और आम नागरिक के जीवन स्तर का सीधा संबंध बाजार में वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों से होता है। जब आम उपभोक्ता द्वारा दैनिक जीवन में उपभोग की जाने वाली वस्तुओं की खुदरा कीमतें बढ़ती हैं, तो इससे पूरी आर्थिक व्यवस्था प्रभावित होती है।
खुदरा मुद्रास्फीति
खुदरा मुद्रास्फीति, जिसे उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) मुद्रास्फीति भी कहा जाता है, उस दर को दर्शाती है जिस पर अंतिम उपभोक्ता द्वारा खरीदी जाने वाली वस्तुओं और सेवाओं के खुदरा मूल्य में समय के साथ वृद्धि होती है। यह देश में आम जनता पर महंगाई के सीधे प्रभाव को मापने का प्रमुख पैमाना है।
चर्चा में क्यों?
सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) द्वारा जारी नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, भारत की खुदरा मुद्रास्फीति जुलाई में बढ़कर 4.45% दर्ज की गई है।
- यह वृद्धि मुख्य रूप से खाद्य सामग्री, ईंधन और कुछ आवश्यक सेवाओं की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण हुई है।
आंकड़े
- मुख्य सीपीआई: जुलाई में खुदरा मुद्रास्फीति बढ़कर 4.45% हो गई, जो जून में 4.38% थी।
- खाद्य मुद्रास्फीति: उपभोक्ता खाद्य मूल्य सूचकांक (CFPI) बढ़कर 5.52% पर पहुंच गया।
- ग्रामीण बनाम शहरी मुद्रास्फीति: ग्रामीण क्षेत्रों में मुद्रास्फीति 4.84% दर्ज की गई, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह 3.96% रही।
- विशिष्ट वस्तुओं की दरें: अदरक (+83.62%), लहसुन (+35.36%) और प्याज (+22.54%) की कीमतों में भारी उछाल आया, जबकि आलू (-16.56%) और टमाटर (-4.59%) में गिरावट देखी गई।
कारण
- खाद्य सामग्री की कीमतों में तेजी: मानसून की असमानता और कुछ हिस्सों में अत्यधिक बारिश से फसल क्षति होने के कारण सब्जियों और मसालों की आपूर्ति प्रभावित हुई।
- अंतरराष्ट्रीय कारक व ईंधन: वैश्विक स्तर पर खाद्य तेलों की ऊंची कीमतों और ईंधन की लागत में वृद्धि का असर घरेलू बाजारों और परिवहन लागत पर पड़ा।
- सेवा क्षेत्र का महंगा होना: ईंधन और कच्चे माल की लागत बढ़ने से रेस्तरां, आवास और परिवहन जैसी सेवाओं की कीमतों में तेजी आई।
प्रभाव
- आम परिवारों के बजट पर असर: खाद्य पदार्थों और सेवाओं के महंगे होने से विशेष रूप से मध्यम और निम्न आय वर्ग के दैनिक खर्च बढ़ जाते हैं।
- ग्रामीण उपभोग पर दबाव: ग्रामीण क्षेत्रों में मुद्रास्फीति अधिक होने से ग्रामीण मांग और क्रय शक्ति प्रभावित होती है।
- मौद्रिक नीति पर प्रभाव: मुद्रास्फीति भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के 4% के मध्यम अवधि के लक्ष्य से ऊपर बनी हुई है, जिससे ब्याज दरों में कटौती की गुंजाइश सीमित हो जाती है।
चिंताएं
- खाद्य मुद्रास्फीति की अनिश्चितता: मौसम के मिजाज और भू-राजनीतिक तनावों के कारण भविष्य में खाद्य और ऊर्जा कीमतों में और अनिश्चितता आ सकती है।
- लागत का प्रसार: यदि ईंधन और खाद्य आपूर्ति की उच्च लागत लंबे समय तक बनी रहती है, तो यह अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों में भी व्यापक महंगाई बढ़ा सकती है।
आगे की राह
सप्लाई चेन का सुदृढ़ीकरण: आवश्यक वस्तुओं, विशेषकर कृषि उत्पादों की निर्बाध आपूर्ति बनाए रखने के लिए शीत भंडारण और लॉजिस्टिक्स ढांचे को मजबूत करना होगा।
- सटीक फसल प्रबंधन: जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिए किसानों को समय पर सलाह और फसल सुरक्षा उपाय उपलब्ध कराए जाने चाहिए।
- सक्रिय मौद्रिक व राजकोषीय नीति: भारतीय रिजर्व बैंक और सरकार को मिलकर मुख्य खाद्य वस्तुओं के बफर स्टॉक का प्रभावी प्रबंधन करना होगा और वैश्विक मूल्य झटकों से बचाव के उपाय करने होंगे।
निष्कर्ष
खुदरा मुद्रास्फीति में हालिया उछाल यह दर्शाता है कि खाद्य और ईंधन की कीमतें अर्थव्यवस्था के लिए निरंतर चुनौती बनी हुई हैं। यद्यपि यह वृद्धि अभी भी रिजर्व बैंक के निर्धारित दायरा सीमा (2%-6%) के भीतर है, फिर भी आर्थिक विकास को गति देने और आम जनता को राहत पहुंचाने के लिए कीमतों पर सतर्क निगरानी और आपूर्ति पक्ष के ठोस उपायों की आवश्यकता है।
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा (संशोधन) विधेयक, 2026: कैलोरी सुरक्षा से समग्र पोषण सुरक्षा की ओर एक समयोचित कदम
सामान्य अध्ययन पेपर – III: प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन।
संदर्भ
भारत में खाद्य सुरक्षा की नीतिगत बहस केवल भुखमरी मिटाने से आगे बढ़कर समग्र पोषण सुरक्षा के एक नए चरण में प्रवेश कर चुकी है। हालिया राष्ट्रीय उपभोग सर्वेक्षणों के अनुसार, आवश्यक संतुलित आहार का खर्च उठाने में असमर्थ परिवारों का प्रतिशत 2011-12 के 52% से घटकर 2023-24 में 52% से घटकर लगभग 25% ग्रामीण परिवारों में, जबकि शहरी परिवारों में 21% पर आ गया है। इस महत्त्वपूर्ण प्रगति के बावजूद देश की बड़ी आबादी अब भी केवल खाद्यान्न (अनाज) आधारित खुराक पर निर्भर है, जिससे 'दोहरे कुपोषण' (कुपोषण और गैर-संचारी रोग) का खतरा बढ़ रहा है।
खाद्य सुरक्षा
कानूनी परिप्रेक्ष्य में, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA), 2013 भोजन को एक कल्याणकारी योजना की जगह नागरिक का 'कानूनी अधिकार' बनाता है। यह अधिनियम देश की 75% ग्रामीण और 50% शहरी आबादी को कवर करता है।
- प्राथमिकता वाले परिवार (PHH): इन्हें प्रति व्यक्ति 5 किलोग्राम खाद्यान्न प्रतिमाह मिलता है।
- अंत्योदय अन्न योजना (AAY): समाज के सबसे निर्धनतम परिवारों को प्रति परिवार 35 किलोग्राम खाद्यान्न प्रतिमाह प्रदान किया जाता है।
केवल अनाज का कोटा बांटना ही वास्तविक खाद्य सुरक्षा नहीं है। आधुनिक संदर्भ में खाद्य सुरक्षा का अर्थ पेट भरने के साथ-साथ शरीर को प्रोटीन, सूक्ष्म पोषक तत्व और संतुलित आहार उपलब्ध कराना तथा जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों से नागरिकों की रक्षा करना है।
हालिया चर्चा में क्यों?
सरकार ने हाल ही में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा (संशोधन) विधेयक, 2026 का मसौदा सार्वजनिक किया है। इस विधेयक को चर्चा में लाने वाले मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
- AAY कोटे में बदलाव का प्रस्ताव: AAY परिवारों के लिए निश्चित 35 किग्रा प्रति परिवार के स्थान पर 7 किग्रा प्रति व्यक्ति प्रतिमाह (अधिकतम 35 किग्रा की सीमा के साथ) का प्रावधान प्रस्तावित है।
- राज्यों का विरोध: तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों ने इसका विरोध करते हुए कहा है कि इससे छोटे एवं असहाय परिवारों का राशन कोटा घट जाएगा।
- आंकड़ों का प्रभाव (तमिलनाडु केस स्टडी): तमिलनाडु के 18.64 लाख AAY परिवारों में से 84.5% (15.75 लाख) परिवारों में 5 से कम सदस्य हैं। नए फॉर्मूले से राज्य का AAY खाद्यान्न आवंटन 65,261 टन से घटकर 42,040 टन (35.6% की कमी) रह जाएगा।
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा (संशोधन) विधेयक, 2026
यह विधेयक धारा 3(1) के पहले प्रावधान में संशोधन का प्रस्ताव करता है:
- प्रति-व्यक्ति फॉर्मूला: AAY लाभार्थियों को 7 किलोग्राम/व्यक्ति का राशन मिलेगा।
- अधिकतम सीमा (Cap): किसी भी स्थिति में प्रति परिवार कुल आवंटन 35 किलोग्राम से अधिक नहीं होगा।
- उद्देश्य: बड़े और छोटे AAY परिवारों के बीच असमानता को दूर करना, वर्तमान में 7 या 8 सदस्यों वाले बड़े AAY परिवार को प्रति व्यक्ति केवल 4.4 से 5 किग्रा राशन ही मिल पाता था जो PHH के 5 किग्रा मानक के बराबर या उससे कम था।
अधिकारिता का गणित (गैनर्स बनाम लूजर्स)
यह फॉर्मूला कागज़ पर निष्पक्ष दिखता है, लेकिन इसके परिणाम व्यावहारिक विषमता दर्शाते हैं:
परिवार के सदस्य | वर्तमान AAY आवंटन | प्रस्तावित नया आवंटन | प्रभाव / परिवर्तन |
1 से 4 सदस्य | 35 kg | 7 से 28 kg | ???? 20% से 80% की कटौती |
5 या अधिक सदस्य | 35 kg | 35 kg (अधिकतम सीमा) | ➔ कोई बदलाव नहीं (अतिरिक्त लाभ नहीं) |
कुपोषण का दोहरा बोझ
बाल स्वास्थ्य (NFHS-6: 2023-24): 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में वृद्धि में अवरोध (स्टंटिंग) घटकर 29.3% हुआ है, लेकिन क्षीणता (वेस्टिंग) (19.0%) और कम वजन (अंडरवेट) (31.8%) की स्थिति में खास सुधार नहीं हुआ है। 6-23 महीने के केवल 15% बच्चों को ही पर्याप्त आहार मिलता है।
- NCDs की चुनौती (ICMR-INDIAB): भारत में 10.1 करोड़ लोग डायबिटीज और 13.6 करोड़ प्री-डायबिटीज से पीड़ित हैं। अधिक कार्बोहाइड्रेट वाले आहार से टाइप-2 डायबिटीज का खतरा 30% बढ़ जाता है।
- ICMR-NIN 2024 दिशानिर्देश: कुल दैनिक ऊर्जा में अनाज और बाजरे का अंश अधिकतम 45% ही होना चाहिए, शेष ऊर्जा दालों, दूध, सब्जियों व वसा से आनी चाहिए।
कवरेज गैप (2011 जनगणना की समस्या)
NFSA की 81.35 करोड़ लाभार्थियों की सीमा अभी भी वर्ष 2011 की जनगणना पर आधारित है। वर्ष 2025 की 146.4 करोड़ की अनुमानित जनसंख्या के आधार पर वर्तमान में केवल 55.6% आबादी ही कवर हो पा रही है।
डिलीवरी तंत्र और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर
2025 के अंत तक 5.51 लाख में से 5.50 लाख राशन दुकानें e-PoS मशीनों से लैस हैं और 'वन नेशन वन राशन कार्ड' लागू है।
- देश के 1.86 लाख से अधिक 'आयुष्मान आरोग्य मंदिर' के माध्यम से 41.3 करोड़ लोगों की डायबिटीज स्क्रीनिंग की जा चुकी है।
प्रमुख चिंताएं
छोटे और संवेदनशील परिवारों को नुकसान: 1 से 4 सदस्यों वाले परिवारों में अक्सर एकल वृद्ध, विधवाएं या दिव्यांग व्यक्ति होते हैं। 35 किग्रा की जगह 7 या 14 किग्रा राशन मिलने से उनकी खाद्य सुरक्षा संकट में आ जाएगी।
- लेवलिंग-डाउन दृष्टिकोण: विधेयक किसी भी परिवार का कोटा बढ़ाने के बजाय आवंटन घटाकर असमानता दूर करने का प्रयास करता है।
- पुराना जनगणना आधार: नए पात्र गरीब जनगणना में देरी के कारण कानूनी अधिकारों से वंचित हैं।
- तकनीकी व प्रमाणीकरण विफलता: e-PoS पर बायोमेट्रिक या नेटवर्क विफलता के कारण सबसे वंचित वर्ग राशन से वंचित हो जाते हैं।
आगे का रास्ता
'नो-लॉस' (क्षति-रहित) सुरक्षा कवच: किसी भी AAY परिवार का मौजूदा 35 किग्रा का राशन कोटा कम न किया जाए। बड़े परिवारों को आवश्यकतानुसार अतिरिक्त कोटा अलग से दिया जाना चाहिए।
- आहार विविधीकरण का पृथक बजट: PDS में अनाज के साथ-साथ रियायती दरों पर दालें, स्थानीय बाजरा और खाद्य तेल शामिल किए जाएं। इसे केंद्रीय बजट (खाद्य सब्सिडी: ₹2,27,629 करोड़) में अलग से बजट बनाकर लागू किया जाए, अनाज का कोटा काटकर नहीं।
- जनगणना 2027 के बाद कवरेज का पुनर्गठन: नई जनसंख्या आंकड़ों के आधार पर लाभार्थी सीमाओं को तुरंत अपडेट किया जाए।
- अंतिम छोर तक सुलभता व स्वास्थ्य एकीकरण: बायोमेट्रिक विफलता पर ऑफ-लाइन व डोरस्टेप डिलीवरी की गारंटी दी जाए। राशन दुकानों का उपयोग केवल प्राथमिक पोषण जागरूकता और आयुष्मान आरोग्य मंदिरों में स्वास्थ्य जांच के रेफरल के लिए हो।
निष्कर्ष
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम में संशोधन भारत को केवल 'अनाज सुरक्षा' से निकालकर 'समग्र पोषण सुरक्षा' की ओर ले जाने का एक ऐतिहासिक अवसर है। सुधारों की सफलता का आकलन इस बात से नहीं होना चाहिए कि गोदामों से कितने टन खाद्यान्न वितरित किया गया, बल्कि इस बात से होना चाहिए कि क्या देश का प्रत्येक गरीब परिवार संतुलित भोजन प्राप्त कर सम्मानजनक और स्वस्थ जीवन जीने में सक्षम हुआ है या नहीं।
डी-डॉलरीकरण और वैश्वीकृत अर्थव्यवस्था: ब्रिक्स 2026 के संदर्भ में रणनीतिक विश्लेषण
सामान्य अध्ययन पेपर – III: प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन।
संदर्भ
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से वैश्विक व्यापार और वित्तीय प्रणालियों में अमेरिकी डॉलर का एकछत्र वर्चस्व रहा है। वर्तमान भू-राजनीतिक तनावों और आर्थिक प्रतिबंधों के युग में, विश्व की उभरती अर्थव्यवस्थाएं अपनी वित्तीय संप्रभुता को सुरक्षित करने के लिए डॉलर पर अपनी अत्यधिक निर्भरता को कम करने का प्रयास कर रही हैं।
डी-डॉलरलाइजेशन क्या है?
डी-डॉलरलाइजेशन अंतरराष्ट्रीय व्यापार, वित्तीय लेनदेन, केंद्रीय बैंकों के विदेशी मुद्रा भंडार और जिंसों (जैसे क्रूड ऑयल) के मूल्य निर्धारण में अमेरिकी डॉलर के उपयोग और निर्भरता को कम करने की एक प्रक्रिया है। इसके तहत देश डॉलर के बजाय अपनी स्थानीय मुद्राओं, डिजिटल मुद्राओं या किसी वैकल्पिक बहुपक्षीय मुद्रा प्रणाली के माध्यम से द्विपक्षीय और बहुपक्षीय व्यापार करते हैं।
हालिया चर्चा में क्यों?
वरिष्ठ सांसद शशि थरूर की अध्यक्षता वाली विदेश मामलों की संसदीय स्थायी समिति ने भारत सरकार से पूछा है कि क्या वह सितंबर 2026 में नई दिल्ली में आयोजित होने वाले 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में डी-डॉलरीकरण के एजेंडे को आगे बढ़ाएगी।
- आरबीआई की वकालत: भारतीय रिजर्व बैंक ने सीमा पार व्यापार और पर्यटन भुगतानों को सुगम बनाने के लिए ब्रिक्स देशों की आधिकारिक डिजिटल मुद्राओं (CBDC) को जोड़ने की वकालत की है।
- वित्तीय संप्रभुता का सवाल: संसदीय समिति के सदस्यों ने सरकार से सवाल किया कि वह अधिक 'वित्तीय संप्रभुता' हासिल करने और अमेरिकी प्रतिबंधों के असर को कम करने के लिए डी-डॉलरीकरण पर ठोस कदम क्यों नहीं उठा रही है।
- द्विपक्षीय तंत्र की सीमाएं: रूस के साथ स्थानीय मुद्रा (रुपया-रूबल) व्यापार तंत्र पूरी तरह से सफल न होने के बाद ब्रिक्स-आधारित बहुपक्षीय तंत्र पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है।
डी-डॉलरलाइजेशन की आवश्यकता
वित्तीय संप्रभुता और सुरक्षा: डॉलर-आधारित स्विफ्ट (SWIFT) प्रणाली से बेदखल किए जाने के जोखिम (जैसे रूस पर लगे प्रतिबंध) से बचना।
- विनिमय दर के जोखिम से बचाव: अमेरिकी फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीतियों और ब्याज दर में बदलाव से उभरती अर्थव्यवस्थाओं की स्थानीय मुद्राओं में होने वाले उतार-चढ़ाव का प्रभाव कम करना।
- सस्ते लेन-देन की लागत: डॉलर रूपांतरण शुल्क से बचत होना और सीधा स्थानीय मुद्रा में व्यापार संभव होना।
- बहुध्रुवीय वित्तीय प्रणाली: वैश्विक अर्थव्यवस्था को एकल मुद्रा के आधिपत्य से निकालकर अधिक संतुलित और समावेशी बनाना।
18वां ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन
1 जनवरी 2026 से भारत ने ब्रिक्स की अध्यक्षता संभाली है। नई दिल्ली में आयोजित होने वाला 18वां शिखर सम्मेलन इस दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण है:
- डिजिटल करेंसी लिंकेज: ब्रिक्स सदस्य देशों की सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी (CBDC) को आपस में जोड़ने का खाका प्रस्तुत करना।
- BRICS Pay: डॉलर-मुक्त भुगतान प्रणाली और अंतर-ब्रिक्स व्यापार के लिए स्थानीय मुद्राओं के उपयोग को बढ़ावा देना।
- मेजबान के रूप में भारत का रुख: भारत को अपनी रणनीतिक स्वायत्तता और अमेरिका तथा ब्रिक्स साझेदारों के साथ अपने संबंधों में संतुलन बनाना होगा।
अमेरिकी दृष्टिकोण
अमेरिका डी-डॉलरलाइजेशन की किसी भी कोशिश को अपनी वैश्विक आर्थिक और रणनीतिक वर्चस्वता के लिए सीधे खतरे के रूप में देखता है:
- डोनाल्ड ट्रम्प की चेतावनी: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ब्रिक्स देशों को स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि वे डॉलर के विकल्प के रूप में कोई नई मुद्रा बनाते हैं या डॉलर के प्रभुत्व को चुनौती देते हैं, तो उन पर दंडात्मक सीमा शुल्क (Tariffs) और अन्य कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए जाएंगे।
- डॉलर के 'हथियारीकरण' का बचाव: अमेरिका का मानना है कि डॉलर-आधारित प्रतिबंध उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा और वैश्विक नियमों को लागू करने का एक आवश्यक उपकरण हैं।
प्रमुख चिंताएं
व्यापार असंतुलन: स्थानीय मुद्रा व्यापार में व्यापार असंतुलन (जैसे भारत-रूस व्यापार में अत्यधिक रूबल/रुपया संचय) एक बड़ी बाधा है।
- मुद्राओं की तरलता और अस्थिरता: अधिकांश उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राएं अत्यधिक परिवर्तनशील होती हैं और उनमें डॉलर जैसी वैश्विक तरलता का अभाव है।
- अमेरिकी दंडात्मक कार्रवाइयों का डर: द्वितीयक प्रतिबंधों और टैरिफ की धमकियों के कारण वैश्विक वित्तीय संस्थान जोखिम लेने से कतराते हैं।
- सर्वसम्मति का अभाव: ब्रिक्स सदस्यों (जैसे चीन बनाम भारत) के भू-राजनीतिक हितों में भिन्नता के कारण किसी एक साझा ब्रिक्स मुद्रा पर आम सहमति बनना कठिन है।
विश्लेषण
डी-डॉलरलाइजेशन एक रातों-रात होने वाला बदलाव नहीं है, बल्कि यह वैश्विक वित्तीय तंत्र के क्रमिक पुनर्गठन की प्रक्रिया है। यद्यपि डॉलर का पूर्ण स्थान लेना निकट भविष्य में संभव नहीं है, लेकिन वैकल्पिक भुगतान तंत्र वैश्विक वित्तीय स्थिरता के लिए एक आवश्यक सुरक्षा कवच प्रदान करते हैं।
आगे का रास्ता
डिजिटल भुगतान नेटवर्क का सुदृढ़ीकरण: डिजिटल रिजर्व मुद्राओं और एकीकृत भुगतान प्रणालियों (जैसे UPI और अन्य देशों के नेटवर्कों के लिंकेज) को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
- संतुलित बहुपक्षवाद: भारत को 'अमेरिका-विरोधी' एजेंडे का हिस्सा बनने के बजाय 'व्यावहारिक और लचीली' वित्तीय प्रणाली बनाने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
- स्थानीय मुद्रा समाशोधन तंत्र: द्विपक्षीय व्यापार असंतुलन को दूर करने के लिए अधिक व्यावहारिक मुद्रा-स्वैप व्यवस्था विकसित की जाए।
निष्कर्ष
डी-डॉलरलाइजेशन केवल डॉलर को हटाने का प्रयास नहीं, बल्कि एक न्यायसंगत और बहुध्रुवीय वैश्विक आर्थिक व्यवस्था की स्थापना की दिशा में एक कदम है। भारत को 18वें ब्रिक्स सम्मेलन के मंच का उपयोग अपनी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं और वित्तीय संप्रभुता की रक्षा करते हुए वैश्विक आर्थिक संतुलन बनाए रखने के लिए करना चाहिए।
ग्रेट निकोबार द्वीप (GNI) विकास परियोजना और जनजातीय सरोकार: पर्यावरण, विकास और स्वदेशी अधिकारों का संघर्ष
सामान्य अध्ययन पेपर– II: शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध।
सन्दर्भ
अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के सुदूर दक्षिण में स्थित ग्रेट निकोबार द्वीप (GNI) वर्तमान में एक महत्वाकांक्षी विकास परियोजना और स्थानीय स्वदेशी जनजातियों के अधिकारों के बीच खड़े हुए गंभीर नीतिगत द्वंद्व के कारण चर्चा के केंद्र में है। हाल ही में ग्रेट और लिटिल निकोबार की जनजातीय परिषद ने द्वीप प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि इस परियोजना के क्रियान्वयन के दौरान उनकी चिंताओं को लगातार नजरअंदाज किया जा रहा है।
हालिया विवाद और प्रमुख घटनाक्रम
प्रशासन पर आरोप: प्रशासन पर शोम्पेन जनजाति को उनकी इच्छा के विरुद्ध जबरन "आधुनिक जीवनशैली" में धकेलने का आरोप है।
- मुख्य सचिव का बयान: तत्कालीन मुख्य सचिव ने कहा कि शोम्पेन अपनी पारंपरिक जीवनशैली जारी नहीं रख सकते और उन्हें आधुनिकता अपनानी होगी।
- सरकारी आश्वासनों का विरोधाभास: यह बयान पर्यावरण मंत्री के उस संसद में दिए आश्वासन के विपरीत है, जिसमें विस्थापन न होने की बात कही गई थी।
- परिषद की अनदेखी: जनजातीय परिषद का दावा है कि 16 जुलाई की बैठक में उठाए गए मुद्दों को बाद के सरकारी दिशा-निर्देशों से हटा दिया गया।
ग्रेट निकोबार परियोजना
ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना भारत सरकार की एक रणनीतिक मेगा-अवसंरचना पहल है, जिसकी अनुमानित लागत लगभग ₹91,000 करोड़ है।
ग्रेट निकोबार मेगा-प्रोजेक्ट के 4 मुख्य स्तंभ
1. अंतर्राष्ट्रीय ट्रांसशिपमेंट पोर्ट
2. ग्रीनफील्ड अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा
3. गैस और सौर-आधारित पावर प्लांट
4. एक नया योजनाबद्ध टाउनशिप (शहर)
इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य मलक्का जलडमरूमध्य के निकट भारत की रणनीतिक और सैन्य उपस्थिति को मजबूत करना, क्षेत्रीय व्यापार को बढ़ावा देना तथा पर्यटन का विकास करना है।
प्रभावित जनजातियाँ: शोम्पेन और निकोबारी
यह विकास परियोजना द्वीप पर निवास करने वाले दो प्रमुख स्वदेशी समुदायों के जीवन और पारिस्थितिकी को सीधे प्रभावित करती है:
- शोम्पेन जनजाति
- पहचान: शोम्पेन द्वीप के भीतरी घने वर्षावनों में निवास करने वाली एक शिकारी-संग्राहक जनजाति है।
- जनसंख्या: इनकी कुल आबादी 300 से भी कम है।
- स्थिति: इन्हें केंद्र सरकार द्वारा विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTG) के रूप में सूचीबद्ध किया गया है।
- जोखिम: बाहरी दुनिया से इनका संपर्क बेहद सीमित है। गैलाथिया के पास प्रस्तावित पावर प्लांट और सड़कें सीधे इनकी पारंपरिक बस्तियों और शिकार क्षेत्रों के समीप से गुजरती हैं।
- निकोबारी जनजाति
- पहचान: यह द्वीप समूह का मुख्य और अपेक्षाकृत बड़ा स्वदेशी समुदाय है।
- प्रमुख माँगें: 16 जुलाई की बैठक में निकोबारी समुदाय के प्रतिनिधियों ने ग्रेटर निकोबार के पश्चिमी तट पर स्थित अपने पैतृक गाँवों में पुनः बसने की माँग उठाई।
- सहमति का अभाव: समुदाय ने सवाल उठाया कि निकोबार द्वीप समूह में वन्यजीव अभयारण्यों और संरक्षित क्षेत्रों की अधिसूचना जारी करते समय उनकी पूर्व-सूचित सहमति क्यों नहीं ली गई।
प्रमुख नीतिगत व नैतिक चिंताएँ
सांस्कृतिक स्वायत्तता पर आघात: शोम्पेन जैसी PVTG जनजाति पर जबरन 'आधुनिक जीवनशैली' थोपना उनके प्राकृतिक अस्तित्व और सांस्कृतिक पहचान के लिए बेहद घातक साबित हो सकता है।
- जैविक और स्वास्थ्य जोखिम: अलग-थलग रहने के कारण शोम्पेन जनजाति में बाहरी बीमारियों के प्रति प्रतिरक्षा प्रणाली की कमी है। बाहरी आबादी के संपर्क से महामारी का खतरा उत्पन्न हो सकता है।
- पारिस्थितिकी का विनाश: परियोजनाओं के लिए बड़े पैमाने पर वर्षावनों की कटाई से द्वीपीय जैव विविधता और दुर्लभ वन्यजीव आवास नष्ट होने की आशंका है।
- विरोधाभासी प्रशासनिक दावे: जनजातीय कल्याण विभाग और अंडमान आदिम जनजाति विकास संगठन (AAJVS) के अधिकारियों के बयानों में पुनर्वास और विस्थापन को लेकर भारी विरोधाभास देखा गया है, जिससे स्थानीय समुदायों में अविश्वास बढ़ा है।
आगे का रास्ता
पारदर्शी संवाद व सर्वसम्मति: 'ऊपर से थोपे गए विकास' के दृष्टिकोण को बदलकर सरकार और द्वीप प्रशासन को जनजातीय परिषद के साथ पारदर्शी संवाद स्थापित करना चाहिए।
- पारंपरिक अधिकारों का संरक्षण: शोम्पेन समुदाय के पारंपरिक निवास स्थान में हस्तक्षेप न करने के अपने पिछले वचनों को पूरी निष्ठा से निभाया जाना चाहिए।
- जायज मांगों का समाधान: निकोबारी समुदाय की पुनर्वास और पैतृक भूमि से जुड़ी जायज मांगों का न्यायसंगत समाधान किया जाना चाहिए।
- संतुलित दृष्टिकोण: विकास परियोजना का निष्पादन संवैधानिक प्रावधानों (अनुसूची 5 व 6), जनजातीय अधिकारों और अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के दायरे में रखकर किया जाना चाहिए।
निष्कर्ष
ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना भारत के लिए रणनीतिक और आर्थिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। हालाँकि, इस परियोजना की सफलता तभी मानी जाएगी जब यह स्थानीय जनजातियों के अस्तित्व और अधिकारों की कीमत पर न हो। शोम्पेन और निकोबारी समुदायों की चिंताओं का सम्मान करते हुए समावेशी विकास का मार्ग अपनाना ही इस गतिरोध को समाप्त करने का एकमात्र न्यायसंगत मार्ग है।