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सामान्य अध्ययन पेपर – III प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन
सन्दर्भ
केंद्रीय वित्त मंत्री द्वारा संसद में प्रस्तुत आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26, भारतीय अर्थव्यवस्था का आधिकारिक "रिपोर्ट कार्ड" है। यह दस्तावेज़ न केवल सांख्यिकीय सारांश है, बल्कि भारतीय शासन की भविष्य की रणनीति का एक खाका भी है।
आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 क्या है?
यह वित्त मंत्रालय का प्रमुख दस्तावेज़ है जो पिछले वित्तीय वर्ष में अर्थव्यवस्था के प्रदर्शन का विवरण देता है। यह मुख्य आर्थिक सलाहकार (CEA) के नेतृत्व में आर्थिक मामलों के विभाग द्वारा तैयार किया जाता है।
आर्थिक सर्वेक्षण बनाम केंद्रीय बजट
- सर्वेक्षण: यह विभिन्न क्षेत्रों की स्थिति, चुनौतियों और भविष्य की संभावनाओं को प्रस्तुत करते हुए बजट के लिए आधार तैयार करता है। इसे संसद में बजट से पहले प्रस्तुत किया जाता है ताकि आर्थिक नीतियों और संसाधन आवंटन को समझने में सहायता मिल सके।
- बजट: सरकार का बजट एक वार्षिक वित्तीय विवरण होता है जिसमें अगले वित्त वर्ष के लिए आय और व्यय की योजना प्रस्तुत की जाती है। यह संसाधनों के संग्रहण और उनके उपयोग का निर्धारण करता है तथा आर्थिक नीतियों का आधार बनता है। यह केवल प्राप्तियों-व्यय का बयान नहीं बल्कि विकास और नीति-निर्धारण का महत्वपूर्ण दस्तावेज होता है।
आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के प्रमुख आकर्षण
- व्यापक आर्थिक स्थिति
- जीडीपी (GDP) विकास: भारत ने अपनी मजबूत गति बनाए रखी है। वित्तीय वर्ष 2026 (FY26) के लिए वास्तविक विकास दर 7.4% अनुमानित है। FY27 के लिए यह 6.8% से 7.2% रहने का अनुमान है।
- मुद्रास्फीति: उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) आधारित मुद्रास्फीति 1.7% के ऐतिहासिक निचले स्तर पर रही।
- राजकोषीय घाटा: यह घटकर जीडीपी का 4.4% रहने का अनुमान है, जो FY21 के 9.2% से काफी कम है।
- बैंकिंग स्वास्थ्य: सकल गैर-निष्पादित संपत्ति (GNPA) कई दशकों के निचले स्तर 2.2% (सितंबर 2025 तक) पर आ गई है।
- क्षेत्रीय प्रदर्शन
- कृषि: एक ऐतिहासिक बदलाव देखा गया है जहाँ बागवानी उत्पादन (362.08 MT) पहली बार खाद्यान्न उत्पादन से आगे निकल गया है। पशुपालन (6.1%) और मत्स्य पालन (7.2%) भी विकास को गति दे रहे हैं।
- उद्योग: विनिर्माण क्षेत्र में सुधार जारी है, जिसकी विकास दर Q2 FY26 में 9.13% रही। PLI योजना ने 12.6 लाख रोजगार पैदा किए हैं।
- सेवा क्षेत्र: यह अर्थव्यवस्था का मुख्य चालक बना हुआ है, जिसकी नाममात्र जीडीपी में हिस्सेदारी बढ़कर 53.6% हो गई है।
- बुनियादी ढांचा और कनेक्टिविटी
- राजमार्ग: 2014 के बाद से हाई-स्पीड कॉरिडोर दस गुना बढ़कर 5,364 किमी हो गए हैं।
- रेलवे: 99.1% विद्युतीकरण प्राप्त कर लिया गया है।
- विमानन: भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा घरेलू विमानन बाजार बन गया है; हवाई अड्डों की संख्या बढ़कर 164 हो गई है।
- अंतरिक्ष: भारत स्वायत्त उपग्रह डॉकिंग (SpaDeX) हासिल करने वाला चौथा राष्ट्र बना।
- मानव विकास और रोजगार
- शिक्षा और स्वास्थ्य: मातृ मृत्यु दर में 1990 से 86% की कमी आई है। शिशु मृत्यु दर (IMR) गिरकर 25 (2013 में 40 से) पर आ गई है।
- गरीबी: बहुआयामी गरीबी सूचकांक (MPI) 55.3% से घटकर 11.28% हो गया है।
- रोजगार: Q2 FY26 में 56.2 करोड़ लोग नियोजित थे, जिसमें इसी तिमाही में 8.7 लाख नए रोजगार जुड़े।
11 सूत्रीय सारांश
- विकास और स्थिरता: भारत लगातार चौथे वर्ष सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था बना हुआ है।
- राजकोषीय सुदृढ़ीकरण: कर आधार का विस्तार हुआ है; आयकर रिटर्न 6.9 करोड़ (FY22) से बढ़कर 9.2 करोड़ (FY25) हो गया है।
- मौद्रिक प्रबंधन: बैंकिंग क्षेत्र दशकों में अपनी सबसे स्वस्थ स्थिति में है। जन धन खातों की संख्या 55.02 करोड़ पहुँच गई है।
- बाहरी क्षेत्र: भारत का विदेशी मुद्रा भंडार $701.4 बिलियन के रिकॉर्ड स्तर पर है, जो 11 महीने के आयात के लिए पर्याप्त है।
- मुद्रास्फीति नियंत्रण: खाद्य और ईंधन की कीमतों में कमी के कारण मुद्रास्फीति ऐतिहासिक रूप से कम (1.7%) रही।
- कृषि विविधीकरण: बागवानी और डिजिटल मंडियों (e-NAM) ने किसानों की आय में सुधार किया है।
- विनिर्माण और नवाचार: ग्लोबल इनोवेशन इंडेक्स में भारत की रैंक सुधरकर 38वीं (2025) हो गई है।
- बुनियादी ढांचा गुणक: प्रभावी पूंजीगत व्यय (CapEx) जीडीपी के 4% के ऐतिहासिक स्तर पर पहुँच गया है।
- मानव पूंजी: IIT, IIM और AIIMS के विस्तार के साथ जनसांख्यिकीय लाभांश का लाभ उठाने पर ध्यान।
- सामाजिक सुरक्षा: e-Shram पोर्टल पर 31 करोड़ श्रमिक पंजीकृत हैं, जिनमें 54% महिलाएं हैं।
- रणनीतिक विजन: सर्वेक्षण भारत को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में अपरिहार्य बनाने के लिए एक तीन-स्तरीय ढांचे का प्रस्ताव करता है।
निष्कर्ष
आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 एक ऐसी अर्थव्यवस्था का चित्रण करता है जिसने मुद्रास्फीति को स्थिर किया है, बुनियादी ढांचे का विस्तार किया है और खुद को वैश्विक स्तर पर एक अनिवार्य शक्ति के रूप में स्थापित किया है। भारत अब केवल एक तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि एक "प्रणालीगत रूप से अपरिहार्य" वैश्विक शक्ति बनने की ओर अग्रसर है।
सामान्य अध्ययन पेपर – III प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन
संदर्भ
भारतीय संघीय व्यवस्था में 'राजकोषीय संघवाद' का मूल सिद्धांत केंद्र और राज्यों के बीच संसाधनों का न्यायसंगत वितरण है। हाल के वर्षों में यह देखा गया है कि राज्यों की वित्तीय स्थिति केंद्र से होने वाले कर हस्तांतरण के बजाय 'बाजार ऋण' पर अधिक टिकी हुई है। राज्यों की राजकोषीय स्वायत्तता धीरे-धीरे क्षीण हो रही है, जिससे 'सहकारी संघवाद' की अवधारणा पर प्रश्नचिह्न लग रहे हैं।
उपकर और अधिभार क्या हैं?
- उपकर: यह किसी विशेष उद्देश्य (जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य या सड़क निर्माण) के लिए कर के ऊपर लगाया गया कर है। इसका उपयोग केवल उसी विशेष कार्य के लिए किया जा सकता है जिसके लिए इसे एकत्र किया गया है।
- अधिभार: यह 'कर पर कर' है, जो मुख्य रूप से उच्च आय वर्ग पर लगाया जाता है। यह सीधे सरकारी खजाने में जाता है।
- महत्वपूर्ण तथ्य: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 270 और 271 के तहत, केंद्र द्वारा वसूले गए 'सेस' और 'सरचार्ज' को राज्यों के साथ साझा करना अनिवार्य नहीं है।
चर्चा में क्यों?
- यह विषय हाल ही में तब चर्चा में आया जब आंकड़ों से पता चला कि कई प्रमुख राज्यों (जैसे तमिलनाडु और महाराष्ट्र) ने अपनी राजस्व प्राप्तियों का एक बड़ा हिस्सा ‘राज्य विकास ऋण’ (SDLs) के माध्यम से जुटाया है।
- यह चिंता जताई जा रही है कि केंद्र द्वारा करों में राज्यों की हिस्सेदारी तो कागजों पर 41% है, लेकिन 'सेस' और 'सरचार्ज' की बढ़ती प्रवृत्ति के कारण वास्तविक हस्तांतरण बहुत कम हो गया है।
कर्ज पर बढ़ती निर्भरता (SDLs) और ऋण-जीएसडीपी अनुपात
राज्यों द्वारा अपनी दैनिक जरूरतों और कल्याणकारी योजनाओं (पेंशन, स्वास्थ्य बीमा) के लिए बाजार से लिए जाने वाले ऋण को SDL कहा जाता है।
- ऋण-जीएसडीपी अनुपात: एफआरबीएम (FRBM) समिति के अनुसार, राज्यों के लिए यह अनुपात 20% के भीतर होना चाहिए। हालांकि, वर्तमान में कई राज्यों का कर्ज उनकी जीडीपी के 26% से 35% के बीच पहुंच गया है।
- आवश्यक मानक: एक स्वस्थ अर्थव्यवस्था के लिए राज्यों का राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit) उनकी जीएसडीपी के 3% के भीतर रहना चाहिए, जिसे विशेष परिस्थितियों में 3.5% तक की अनुमति दी जाती है।
उपकर और अधिभार का प्रभाव
- चूंकि 'सेस' और 'सरचार्ज' विभाज्य पूल का हिस्सा नहीं हैं, इसलिए केंद्र की कुल कर प्राप्तियां तो बढ़ती हैं, लेकिन राज्यों को मिलने वाला वास्तविक हिस्सा घट जाता है।
- इससे राज्यों के पास विवेकाधीन खर्च के लिए धन की कमी हो जाती है और वे पूंजीगत निवेश (सड़क, पुल, उद्योग) के बजाय केवल वेतन और ऋण के ब्याज भुगतान में उलझ कर रह जाते हैं।
जीएसटी (GST) और राज्यों की स्वायत्तता
2017 में जीएसटी के आगमन ने राज्यों के कर वसूलने के संप्रभु अधिकार को सीमित कर दिया है।
- 15वां वित्त आयोग और सिफारिशें: आयोग ने राज्यों को कर हस्तांतरण के लिए 41% की सिफारिश की है।
- विभाजन के पैरामीटर: पैसे के बँवारे के लिए आयोग ने जो ६ आधार तय किए हैं, वे औद्योगिक राज्यों के लिए चुनौतीपूर्ण हैं:
- आय का अंतर (55%): यह गरीब राज्यों को अधिक पैसा देता है।
- जनसंख्या (15%): बड़े राज्यों को लाभ पहुँचाता है।
- क्षेत्रफल (15%): प्रशासनिक लागत के आधार पर।
- जनसांख्यिकीय प्रदर्शन (12.5%): जनसंख्या नियंत्रण के लिए इनाम।
- वन और पारिस्थितिकी (10%): पर्यावरण संरक्षण के लिए।
- कर प्रयास (2.5%): अपनी आय बढ़ाने वाले राज्यों के लिए 'प्रोत्साहन'।
- मुख्य विवाद: विकसित और औद्योगिक राज्य मांग कर रहे हैं कि 'कर प्रयास' (Tax Effort) का प्रतिशत 2.5% से बढ़ाकर अधिक किया जाए, ताकि जो राज्य अधिक टैक्स कमाकर केंद्र को दे रहे हैं, उन्हें उनका उचित पुरस्कार मिल सके।
भविष्य पर संकट
यदि ऋण ही वित्तीय व्यवस्था का मुख्य आधार बना रहा, तो भविष्य में निम्नलिखित संकट उत्पन्न हो सकते हैं:
- पूंजीगत व्यय में कटौती: विकास कार्यों के लिए धन की कमी।
- ऋण जाल (Debt Trap): पुराने ऋण को चुकाने के लिए नया ऋण लेना।
- निजी निवेश में कमी: सरकारी उधार बढ़ने से निजी क्षेत्र के लिए ऋण महंगा हो जाता है
विश्लेषण
वर्तमान स्थिति यह दर्शाती है कि भारत का राजकोषीय ढांचा असंतुलित हो रहा है। केंद्र के पास संसाधन जुटाने के असीमित साधन हैं, जबकि राज्यों के पास जिम्मेदारियां (शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि) अधिक हैं। जीएसटी के बाद राज्यों की कर स्वायत्तता घटने और विभाज्य पूल के संकुचन ने राज्यों को बाजार का कर्जदार बना दिया है।
आगे की राह
- सेस और सरचार्ज का समावेश: सभी उपकरों और अधिभारों को विभाज्य पूल का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
- हस्तांतरण मानदंडों में सुधार: 'कर प्रयास' और 'वित्तीय दक्षता' को अधिक वेटेज (Weightage) मिलना चाहिए।
- राजकोषीय अनुशासन: राज्यों को अपने राजस्व व्यय को नियंत्रित कर उसे उत्पादक निवेश में बदलना होगा।
निष्कर्ष
भारत को "एक राष्ट्र, एक कर" के साथ-साथ "एक पारदर्शी राजकोषीय साझाकरण" की भी आवश्यकता है। राज्यों की वित्तीय स्थिरता ही राष्ट्र की प्रगति का आधार है। अतः, केंद्र को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि विकास का मार्ग ऋण से नहीं, बल्कि उचित हस्तांतरण से प्रशस्त हो।
सामान्य अध्ययन पेपर – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध
संदर्भ
हाल ही में भारत सरकार ने 'न्यू ड्रग्स एंड क्लीनिकल ट्रायल्स रूल्स, 2019' में महत्वपूर्ण संशोधन किए हैं। इन संशोधनों का मूल उद्देश्य औषधि क्षेत्र में विनियामक बाधाओं को कम करना और 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' को बढ़ावा देना है। सरकार का यह कदम भारत को 'विश्व की फार्मेसी' के रूप में अपनी स्थिति सुदृढ़ करने की दिशा में एक बड़ा प्रयास माना जा रहा है।
'क्विक पिल्स' क्या है?
क्विक पिल्स” से आशय सरकार द्वारा औषधि नियमों में किया गया ऐसा त्वरित और सरल सुधार है, जिसका उद्देश्य फार्मा अनुसंधान एवं विकास की प्रक्रिया को तेज करना और नियामकीय बाधाओं को कम करना है।
अर्थात —
- लाइसेंस की अनिवार्यता हटाकर
- पूर्व-सूचना प्रणाली लागू करके
- अनुमोदन समय घटाकर
सरकार ने दवा विकास की प्रक्रिया को शीघ्र और सुगम बनाने का प्रयास किया है, जिसे रूपक रूप में “क्विक पिल्स” कहा गया है।
चर्चा में क्यों?
- सरकार ने अनुसंधान और परीक्षण के उद्देश्य से बनाई जाने वाली दवाओं की कम मात्रा के लिए पूर्व में आवश्यक 'अनिवार्य टेस्ट लाइसेंस' को समाप्त कर दिया है।
- अब इसके स्थान पर केवल 'पूर्व-सूचना तंत्र' को लागू किया गया है, जो चर्चा का मुख्य विषय बना हुआ है।
नियमों में प्रमुख परिवर्तन
- लाइसेंस के बदले सूचना: अनुसंधान और विश्लेषण के लिए अब भौतिक लाइसेंस के बजाय SUGAM पोर्टल पर केवल 'नोटिस ऑफ इंटेंट' देना पर्याप्त होगा।
- समय सीमा में कटौती: उच्च जोखिम वाली दवाओं (नशीली और साइकोट्रोपिक) के लिए लाइसेंसिंग की वैधानिक समय सीमा 90 दिनों से घटाकर 45 दिन कर दी गई है।
- डिजिटलीकरण: संपूर्ण प्रक्रिया को कागज रहित और ऑनलाइन बनाया गया है।
- बीई/बीए अध्ययन: कम जोखिम वाले बायोअवेलेबिलिटी और बायोइक्विवेलेंस अध्ययनों के लिए भी केवल ऑनलाइन सूचना को ही अनिवार्य बनाया गया है।
इन बदलावों की आवश्यकता क्यों?
- वैश्विक प्रतिस्पर्धा: कोविड-19 के बाद वैश्विक स्तर पर दवाओं की त्वरित डिलीवरी की मांग बढ़ी है।
- अनुसंधान में विलंब: पूर्व में लाइसेंस प्राप्त करने की जटिल प्रक्रिया के कारण शोध में महीनों का विलंब होता था।
- लागत में कमी: समय की बचत होने से अनुसंधान की लागत कम होती है, जिससे दवाएं सस्ती हो सकती हैं।
सुधारों के प्रभाव
- 'लाइसेंस राज' का अंत: सरकारी कार्यालयों के चक्कर काटने और भौतिक दस्तावेजों की निर्भरता समाप्त होगी।
- समय की बड़ी बचत: दवा विकास की समय-रेखा में कम से कम 3 महीने की बचत होने का अनुमान है।
- नवाचार को प्रोत्साहन: छोटे स्टार्टअप्स और शोधकर्ताओं के लिए प्रयोग करना आसान होगा।
- आर्थिक लाभ: समय की बचत से निवेशकों का भरोसा बढ़ेगा और इस क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) में वृद्धि होगी।
सीमाएं और चिंताएं
- गुणवत्ता पर संकट: नियमों के सरलीकरण से 'गुणवत्ता नियंत्रण' में ढिलाई आने का भय है।
- निगरानी का अभाव: लाइसेंसिंग हटने के बाद यह सुनिश्चित करना कठिन हो सकता है कि क्या सभी कंपनियां 'गुड मैन्युफैक्चरिंग प्रैक्टिसेज' (GMP) का पालन कर रही हैं।
- विगत घटनाएं: हाल के वर्षों में भारतीय कफ सिरप के कारण विदेशों में हुई मौतों ने भारतीय फार्मा क्षेत्र की छवि को प्रभावित किया है। ऐसे में निरीक्षण में कमी घातक हो सकती है।
- दुरुपयोग की संभावना: अनुसंधान के नाम पर उत्पादित दवाओं का व्यावसायिक दुरुपयोग होने का जोखिम बना रहता है।
गहरा विश्लेषण
यह सुधार 'गति' और 'दक्षता' के पक्ष में एक बड़ा झुकाव है। भारत के पास दुनिया में सबसे अधिक US-FDA अनुमोदित कारखाने हैं, लेकिन हमारी घरेलू विनियामक प्रणाली अक्सर जटिलताओं के लिए जानी जाती थी। हालाँकि, यह ध्यान रखना आवश्यक है कि औषधि क्षेत्र में 'रफ्तार' कभी भी 'रोगी की सुरक्षा' का विकल्प नहीं हो सकती। विनियमन की कमी केवल तभी सफल हो सकती है जब उसके साथ एक मजबूत 'पोस्ट-मार्केट सर्विलांस' (दवा बाजार में आने के बाद की निगरानी) तंत्र सक्रिय हो।
आगे की राह
- स्वचालित निगरानी: सूचना तंत्र के बाद रैंडम ऑडिट और औचक निरीक्षण की व्यवस्था होनी चाहिए।
- कठोर दंड: गुणवत्ता मानकों के उल्लंघन पर भारी अर्थदंड और ब्लैकलिस्टिंग जैसे प्रावधान होने चाहिए।
- डिजिटल ट्रैकिंग: दवाओं की आपूर्ति श्रृंखला की निगरानी के लिए ब्लॉकचेन जैसी तकनीक का उपयोग किया जा सकता है।
- क्षमता निर्माण: राज्य और केंद्रीय औषधि निरीक्षकों की संख्या और उनकी तकनीकी क्षमता में वृद्धि की जानी चाहिए।
निष्कर्ष
दवा नियमों में यह संशोधन भारतीय फार्मास्युटिकल क्षेत्र को वैश्विक पटल पर प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए एक साहसिक कदम है। 'लाइसेंस राज' को समाप्त करना सराहनीय है, किंतु गुणवत्ता के साथ समझौता 'आत्मघाती' सिद्ध हो सकता है। अंततः, भारत को एक ऐसा पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करना होगा जहाँ 'नवाचार की गति' और 'उत्पाद की गुणवत्ता' एक-दूसरे के पूरक हों, न कि बाधक।
सामान्य अध्ययन पेपर – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध
संदर्भ
21वीं सदी के तीसरे दशक में वैश्विक व्यवस्था एक ऐतिहासिक मोड़ पर है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद स्थापित 'उदारवादी वैश्विक व्यवस्था' और मुक्त व्यापार पर आधारित वैश्वीकरण अब दम तोड़ रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की हालिया 'टैरिफ चेतावनियाँ' और चीन का बढ़ता वर्चस्व इस बात का संकेत हैं कि दुनिया अब 'सहयोग' से हटकर 'व्यापारवाद' की ओर लौट रही है। ऐसे में प्रश्न यह है कि क्या भारत इस नई, कठोर व्यवस्था के लिए तैयार है?
वैश्वीकरण की मृत्यु और 'व्यापारवाद' का उदय
वैश्वीकरण केवल व्यापार का विस्तार नहीं था, बल्कि एक राजनीतिक तंत्र था जो लोकतंत्र और बहुपक्षीय संस्थानों पर टिका था।
- नया प्रतिमान: अब व्यापार को 'राज्य की शक्ति' के उपकरण के रूप में देखा जा रहा है।
- शून्य-योग खेल: व्यापार अब आपसी लाभ का सौदा नहीं, बल्कि एक युद्ध क्षेत्र बन गया है जहाँ निर्यात 'शक्ति' है और आयात 'कमजोरी'।
- प्रभुसत्ता का दावा: देश अब उदार मूल्यों के स्थान पर 'आत्मनिर्भरता' और 'स्वदेशी संरक्षणवाद' को प्राथमिकता दे रहे हैं।
चीन का प्रभाव और बहुपक्षीय व्यवस्था का पतन
चीन ने वैश्विक व्यवस्था का उपयोग तो किया, लेकिन उसके नियमों को नहीं माना।
- वैकल्पिक मॉडल: चीन ने दर्शाया कि बिना लोकतंत्र और बिना मुक्त सूचना तंत्र के भी आर्थिक महाशक्ति बना जा सकता है।
- अतिरिक्त क्षमता: चीन के व्यापार अधिशेष ने भारत जैसे विकासशील देशों के घरेलू विनिर्माण को पंगु बना दिया है।
- संस्थानों की विफलता: WTO जैसे संस्थान अब प्रभावी नहीं रहे, जिससे विकासशील देशों के पास मोलभाव करने की सामूहिक शक्ति समाप्त हो गई है।
भारतीय अर्थव्यवस्था के समक्ष आंतरिक चुनौतियाँ
, भारत "नजरअंदाज करने के लिए बहुत बड़ा है, लेकिन बदलाव लाने के लिए बहुत गरीब"।
- जनसांख्यिकीय लाभांश का क्षरण: पिछले 15 वर्षों में भारत अपनी युवा आबादी को 'उत्पादक क्षमता' में बदलने में पूरी तरह सफल नहीं रहा है।
- सामाजिक पिरामिड का असंतुलन: भारत का आर्थिक ढांचा एक संकीर्ण शीर्ष (अमीर वर्ग) और एक विशाल, शक्तिहीन आधार (गरीब वर्ग) में विभाजित हो गया है।
- बुनियादी ढांचे में कमी: शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में सार्वजनिक निवेश की कमी ने राज्य की क्षमता को सीमित कर दिया है।
'विश्वगुरु' की आकांक्षा बनाम संस्थागत नींव
भारत वैश्विक मंच पर 'विश्वगुरु' बनने का दावा करता है, लेकिन इसके लिए आवश्यक आधारभूत संरचना कमजोर है:
- राज्य क्षमता: एक ऐसी व्यवस्था जहाँ सरकार प्रभावी ढंग से नीतियों को लागू कर सके और न्याय प्रदान कर सके।
- सामाजिक एकजुटता: विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे बिना सामाजिक स्थिरता संभव नहीं है।
- नवाचार की कमी: डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे (DPI) को छोड़कर अन्य क्षेत्रों में भारत अभी भी वैश्विक मानकों से पीछे है।
भारत के लिए अवसर के क्षेत्र
इन चुनौतियों के बावजूद, भारत कुछ क्षेत्रों में नेतृत्व कर सकता है:
- डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI): UPI और आधार जैसे तंत्र वैश्विक स्तर पर भारत की पहचान हैं।
- नवीकरणीय ऊर्जा: हरित ऊर्जा के क्षेत्र में भारत की पहल उसे एक रणनीतिक बढ़त दे सकती है।
- सेवा क्षेत्र: सूचना प्रौद्योगिकी और परामर्श सेवाओं में भारत का दबदबा बरकरार है।
आगे की राह
भारत को 'बयानबाजी' से हटकर 'ठोस संस्थागत सुधारों' पर ध्यान देना होगा:
- सामाजिक अनुबंध: विकास के लाभों का समान वितरण सुनिश्चित करना होगा ताकि सामाजिक अशांति को रोका जा सके।
- मानव पूंजी में निवेश: 'विश्वगुरु' बनने के लिए केवल कूटनीति नहीं, बल्कि शिक्षित और स्वस्थ कार्यबल की आवश्यकता है।
- विविध आपूर्ति श्रृंखला: चीन पर निर्भरता कम करने के लिए 'चाइना प्लस वन' रणनीति को विनिर्माण क्षेत्र में जमीनी स्तर पर उतारना होगा।
निष्कर्ष
वैश्वीकरण के अंत का अर्थ है कि अब कोई भी देश 'बैसाखी' के सहारे आगे नहीं बढ़ सकता। भारत के लिए यह क्षण आत्म-अवलोकन का है। यदि हम अपनी राज्य क्षमता और सामाजिक एकता को मजबूत नहीं करते, तो 'विश्वगुरु' का नारा केवल एक अलंकार बनकर रह जाएगा। वास्तविक शक्ति 'संस्थानों की मजबूती' और 'आर्थिक आत्मनिर्भरता' से आती है, केवल भाषणों से नहीं।
सामान्य अध्ययन पेपर – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध
संदर्भ
भारत और अरब जगत के संबंध अब सदियों पुराने सभ्यतागत जुड़ाव से आगे बढ़कर एक 'गहन रणनीतिक साझेदारी' में तब्दील हो चुके हैं। भारत की 'लिंक वेस्ट' और अरब देशों की 'लुक ईस्ट' नीतियों के संगम ने दोनों को एक-दूसरे के लिए अपरिहार्य बना दिया है। वर्तमान वैश्विक अस्थिरता और क्षेत्रीय संघर्षों के बीच भारत एक 'स्थिरता प्रदान करने वाली शक्ति' के रूप में उभरा है। यह बैठक केवल आर्थिक हितों तक सीमित नहीं है, बल्कि आतंकवाद, समुद्री सुरक्षा और ग्लोबल साउथ की आवाज़ को सशक्त करने के लिए एक साझा भू-राजनीतिक मोर्चा तैयार करती है, जो नई विश्व व्यवस्था में निर्णायक भूमिका निभाने हेतु तत्पर है।
अरब लीग
- उत्पत्ति: यह एक अंतर-सरकारी संगठन है जिसमें मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका के सभी अरब देश शामिल हैं। इसकी स्थापना 22 मार्च 1945 को हुई थी, जो 1944 में 'अलेक्जेंड्रिया प्रोटोकॉल' को अपनाए जाने के बाद अस्तित्व में आया।
- सदस्य: वर्तमान में इसके 22 सदस्य हैं।
- संस्थापक सदस्य: मिस्र, इराक, लेबनान, सऊदी अरब, सीरिया, ट्रांसजॉर्डन (अब जॉर्डन), और यमन।
- मुख्यालय: काहिरा, मिस्र।
चर्चा में क्यों?
यह बैठक निम्नलिखित कारणों से वैश्विक चर्चा का केंद्र बनी हुई है:
- दशक भर का अंतराल: 2016 (बहरीन) के बाद यह इस तरह का पहला बड़ा कूटनीतिक आयोजन था। जो भारत की 'लिंक वेस्ट' नीति का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। 30-31 जनवरी 2026 को नई दिल्ली में आयोजित यह भारत-अरब विदेश मंत्रियों की दूसरी बैठक है
- पहलगाम आतंकी हमला: अरब देशों द्वारा कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले की आधिकारिक निंदा करना भारत के लिए एक बड़ी कूटनीतिक सफलता मानी जा रही है।
- क्षेत्रीय तनाव: यह बैठक तब हुई जब पश्चिम एशिया लाल सागर में हूतियों के हमलों और गाजा में युद्धविराम की जटिल प्रक्रियाओं से गुजर रहा है।
भारत-अरब विदेश मंत्रियों की बैठक
- भारत और 22 सदस्यीय अरब लीग के बीच यह संवाद का सबसे उच्च संस्थागत तंत्र है।
- इसकी सह-अध्यक्षता भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के विदेश मंत्री ने की।
- इस सम्मेलन में अरब जगत के सभी महत्वपूर्ण देशों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया, जो भारत के बढ़ते वैश्विक कद को रेखांकित करता है।
बैठक का मुख्य उद्देश्य
- ऐतिहासिक वापसी: 2016 (बहरीन) के बाद यह पहली ऐसी बैठक थी, जिसमें अरब लीग के सभी 22 सदस्य देशों ने भाग लिया।
- साझा विजन: भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अरब जगत को भारत का "विस्तारित पड़ोस" बताया और तकनीक, ऊर्जा व व्यापार में नए अवसर तलाशने पर जोर दिया।
- वैश्विक चुनौतियां: यह बैठक ऐसे समय में हुई जब दुनिया अमेरिका की नई नीतियों (ट्रंप प्रशासन), ईरान-इजरायल तनाव और लाल सागर में अस्थिरता जैसी चुनौतियों से जूझ रही है।
दिल्ली घोषणापत्र के मुख्य बिंदु
बैठक के बाद एक साझा बयान जारी किया गया जिसे 'दिल्ली घोषणापत्र' कहा गया। इसके प्रमुख स्तंभ इस प्रकार हैं:
- शांति और सुरक्षा: दोनों पक्षों ने बहुपक्षवाद और राज्यों की संप्रभुता का सम्मान करने का संकल्प लिया।
- आतंकवाद पर कड़ा प्रहार: आतंकवाद के खिलाफ "जीरो टॉलरेंस" की नीति दोहराई गई। विशेष रूप से अरब देशों ने कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले की कड़ी निंदा की, जिसे भारत अपनी बड़ी कूटनीतिक जीत मान रहा है।
- फिलिस्तीन का मुद्दा: भारत और अरब देशों ने 1967 की सीमाओं के आधार पर एक स्वतंत्र और संप्रभु फिलिस्तीन राष्ट्र का समर्थन किया, जो इजरायल के साथ शांति से रह सके।
- क्षेत्रीय स्थिरता: यमन में हूतियों द्वारा जहाजों पर किए जा रहे हमलों की निंदा की गई और लाल सागर में सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने पर जोर दिया गया।
आर्थिक और रणनीतिक महत्व
भारत और अरब देशों का रिश्ता केवल राजनीति तक सीमित नहीं है, इसके ठोस आर्थिक आधार हैं:
- व्यापार: भारत और अरब देशों के बीच व्यापार 240 अरब डॉलर से अधिक का है।
- ऊर्जा सुरक्षा: भारत अपनी जरूरत का 47% कच्चा तेल और 50% से अधिक उर्वरक इन्हीं देशों से आयात करता है।
- प्रवासी भारतीय: लगभग 90 लाख (9 million) भारतीय इन देशों में रहते हैं और काम करते हैं, जो दोनों क्षेत्रों के बीच एक मजबूत सेतु का काम करते हैं।
- नई पहल: आर्थिक एकीकरण को बढ़ावा देने के लिए STREAM (स्वेज नहर-लाल सागर आर्थिक विकास पहल) जैसे क्षेत्रीय ढांचे पर चर्चा की गई।
कूटनीतिक संतुलन
इस बैठक की सबसे खास बात भारत की "रणनीतिक परिपक्वता" रही:
- भारत ने इजरायल का नाम लिए बिना शांति की अपील की, ताकि चल रहे युद्धविराम प्रयासों में बाधा न आए।
- भारत एक तरफ इजरायल के साथ मजबूत संबंध रखता है, वहीं दूसरी तरफ अरब देशों और फिलिस्तीन के साथ अपने ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों को भी पूरी मजबूती से निभा रहा है।
विश्लेषण
यह बैठक दर्शाती है कि भारत अब केवल एक 'क्रेता' (Buyer) नहीं, बल्कि अरब जगत के लिए एक 'सुरक्षा प्रदाता' और 'प्रौद्योगिकी साझेदार' बन गया है। अरब देशों का कश्मीर मुद्दे पर भारत के प्रति नरम और सहयोगी रुख यह संकेत देता है कि वे भारत को पाकिस्तान के चश्मे से देखना बंद कर चुके हैं।
आगे की राह
- संस्थागत निरंतरता: इस तरह की उच्च स्तरीय बैठकों में 10 साल का अंतराल नहीं होना चाहिए; इन्हें द्विवार्षिक किया जाना चाहिए।
- डिजिटल अर्थव्यवस्था: UPI और रूपे (RuPay) जैसे डिजिटल बुनियादी ढांचे को पूरे अरब जगत में फैलाना।
- खाद्य सुरक्षा: 'इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर' (IMEC) के माध्यम से कृषि और रसद में निवेश बढ़ाना।
निष्कर्ष
भारत-अरब बैठक केवल एक कूटनीतिक औपचारिकता नहीं, बल्कि एक "सभ्यतागत पुनर्मिलन" है। दिल्ली घोषणापत्र ने यह स्पष्ट कर दिया है कि नई दिल्ली और काहिरा से लेकर रियाद तक, शांति और प्रगति के लिए एक साझा दृष्टिकोण रखते हैं। यह साझेदारी आने वाले दशक में 'ग्लोबल साउथ' की दिशा तय करने में निर्णायक भूमिका निभाएगी।