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सामान्य अध्ययन पेपर – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध
संदर्भ
स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव भारतीय लोकतंत्र की आत्मा हैं, किंतु वर्तमान समय में 'नकद, उपहार और लोकलुभावन घोषणाओं' का बढ़ता प्रचलन पूरे देश की निर्वाचन प्रणाली के लिए एक गंभीर अस्तित्वगत संकट बन गया है। ऐतिहासिक रूप से चुनाव आयोग ने आदर्श आचार संहिता के माध्यम से इस पर अंकुश लगाने का प्रयास किया है, लेकिन धन-बल का आधुनिक स्वरूप अब नीतिगत सुधारों और सख्त प्रशासनिक सतर्कता की मांग करता है।
आदर्श आचार संहिता
आदर्श आचार संहिता निर्वाचन आयोग द्वारा राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों की सर्वसम्मति से विकसित की गई एक 'नियमावली' है। यह कोई वैधानिक कानून नहीं है, लेकिन इसके उल्लंघन पर निर्वाचन आयोग 'जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951' के तहत सख्त कार्रवाई कर सकता है।
- सामान्य आचरण
यह नियम उम्मीदवारों और दलों के व्यवहार को नियंत्रित करते हैं:
- धार्मिक/जातीय अपील: कोई भी दल या उम्मीदवार वोट पाने के लिए जाति, संप्रदाय या धर्म के आधार पर अपील नहीं करेगा।
- आलोचना की सीमा: राजनीतिक दलों की आलोचना उनके पिछले रिकॉर्ड और नीतियों तक सीमित होनी चाहिए। किसी नेता के व्यक्तिगत जीवन या निजी मामलों पर टिप्पणी करना वर्जित है।
- सांप्रदायिक तनाव: ऐसी कोई भी गतिविधि नहीं की जाएगी जिससे विभिन्न समुदायों के बीच घृणा या तनाव पैदा हो।
- भ्रष्ट आचरण: मतदाताओं को रिश्वत देना, डराना-धमकाना या मतदान केंद्रों से 100 मीटर के भीतर प्रचार करना 'भ्रष्ट आचरण' की श्रेणी में आता है।
- सभाएं और रैलियां
- पूर्व सूचना: किसी भी सार्वजनिक सभा के लिए स्थानीय पुलिस अधिकारियों को समय और स्थान की पूर्व सूचना देनी अनिवार्य है ताकि सुरक्षा और यातायात व्यवस्था सुनिश्चित की जा सके।
- अनुमति: लाउडस्पीकर के उपयोग या जुलूस निकालने के लिए संबंधित अधिकारियों से लिखित अनुमति लेना आवश्यक है।
- टकराव से बचाव: यदि दो प्रतिस्पर्धी दल एक ही मार्ग से जुलूस निकाल रहे हैं, तो आयोजकों को पहले से समन्वय करना होगा ताकि कोई शारीरिक टकराव न हो।
- मतदान दिवस के नियम
- पहचान पत्र: मतदान केंद्रों पर केवल अधिकृत स्वयंसेवकों को ही बैज या पहचान पत्र दिए जाएंगे, जिन पर दल का नाम या प्रतीक नहीं होना चाहिए।
- भीड़ पर नियंत्रण: मतदान केंद्रों के पास अनावश्यक भीड़ जमा करना और कैंप लगाना प्रतिबंधित है।
- शांति: चुनाव आयोग द्वारा नियुक्त पर्यवेक्षकों के साथ पूर्ण सहयोग करना अनिवार्य है।
- सत्ताधारी दल के लिए विशेष नियम
MCC का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यही है, ताकि सत्ता का दुरुपयोग न हो:
- विज्ञापनों पर रोक: सरकारी खजाने की लागत पर समाचार पत्रों और अन्य मीडिया में सरकार की उपलब्धियों के विज्ञापन जारी करना पूरी तरह प्रतिबंधित है।
- नई योजनाओं की घोषणा: चुनाव की तारीखों की घोषणा के बाद मंत्री या अधिकारी किसी भी नई वित्तीय मंजूरी, नई परियोजनाओं या सड़क/पानी जैसी सुविधाओं की घोषणा नहीं कर सकते।
- सरकारी मशीनरी का उपयोग: मंत्री अपने आधिकारिक दौरों को चुनाव प्रचार के साथ नहीं जोड़ सकते। चुनाव कार्य के लिए सरकारी विमानों, वाहनों या कर्मियों का उपयोग नहीं किया जा सकता।
- नियुक्ति पर रोक: चुनाव के दौरान सरकार किसी भी प्रकार की नई एड-हॉक नियुक्तियां नहीं कर सकती जो मतदाताओं को प्रभावित करें।
- आचार संहिता का उल्लंघन होने पर क्या होता है?
यद्यपि MCC के पीछे कोई विशिष्ट कानून नहीं है, लेकिन चुनाव आयोग निम्नलिखित कदम उठा सकता है:
- नोटिस जारी करना: उम्मीदवार से स्पष्टीकरण मांगना।
- प्रचार पर रोक: उल्लंघनकर्ता को 24 से 72 घंटों तक प्रचार करने से प्रतिबंधित करना।
- FIR दर्ज करना: गंभीर मामलों में आईपीसी (IPC) की धाराओं के तहत मामला दर्ज कराना।
- उम्मीदवारी रद्द करना: अत्यंत गंभीर स्थिति में उम्मीदवार को चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित करना।
चर्चा में क्यों?
- आगामी विधानसभा चुनावों (विशेषकर तमिलनाडु जैसे संवेदनशील राज्यों) के मद्देनजर, मुख्य निर्वाचन आयुक्त ने 'कैश फॉर वोट' और 'उपहार संस्कृति' के विरुद्ध जीरो टॉलरेंस की नीति दोहराई है।
- निर्वाचन आयोग द्वारा 'स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन' (SIR) और डिजिटल निगरानी जैसे कदमों को अब पूरे देश में एक मानक प्रक्रिया के रूप में लागू करने पर विचार किया जा रहा है ताकि मतदाता सूची और मतदान प्रक्रिया विवाद-मुक्त रहे।
राष्ट्रीय महत्व
- संवैधानिक नैतिकता: अनुच्छेद 324 के तहत निर्वाचन आयोग की शक्ति का प्रयोग कर चुनावी शुचिता बनाए रखना अनिवार्य है।
- आर्थिक प्रभाव: चुनावों के दौरान अवैध धन का प्रवाह काले धन की अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देता है और ईमानदार प्रत्याशियों के लिए बाधा उत्पन्न करता है।
- लोकतांत्रिक साख: वैश्विक स्तर पर भारत की छवि एक 'सशक्त लोकतंत्र' के रूप में बनी रहे, इसके लिए पारदर्शी चुनाव अनिवार्य हैं।
विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण
भारतीय चुनावों में 'प्रलोभन' अब केवल नकद तक सीमित नहीं है; यह 'डिजिटल वॉलेट ट्रांसफर', 'मुफ्त बिजली-पानी के वादे' और 'सांप्रदायिक ध्रुवीकरण' के सूक्ष्म रूपों में बदल गया है।
- चुनौती: आचार संहिता का उल्लंघन करने वालों के विरुद्ध त्वरित कानूनी कार्यवाही का अभाव इसे अक्सर 'नैतिक सुझाव' तक सीमित कर देता है।
- तकनीकी समाधान: C-Vigil ऐप और वास्तविक समय की वेबकास्टिंग ने निगरानी को मजबूत किया है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी 'डोर-टू-डोर' प्रलोभन एक बड़ी चुनौती है।
आगे की राह
- वैधानिक शक्ति: 'लॉ कमीशन' के सुझावों के अनुसार, आदर्श आचार संहिता के कुछ महत्वपूर्ण प्रावधानों को 'जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951' में शामिल कर दंडनीय बनाया जाना चाहिए।
- राज्य वित्त पोषण: इंद्रजीत गुप्त समिति की सिफारिशों पर विचार करते हुए चुनावों के राज्य वित्त पोषण की दिशा में कदम बढ़ाना चाहिए ताकि निजी धन का प्रभाव कम हो।
- जागरूकता: 'वोटर एजुकेशन' को केवल साक्षरता तक सीमित न रखकर 'नैतिक मतदान' के रूप में प्रचारित करना होगा।
निष्कर्ष
निष्कर्षतः, आदर्श आचार संहिता केवल एक नियमावली नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र का नैतिक घोषणापत्र है। प्रलोभन मुक्त चुनाव सुनिश्चित करना केवल निर्वाचन आयोग का उत्तरदायित्व नहीं है, बल्कि यह राजनीतिक दलों की शुचिता और नागरिकों की जागरूक भागीदारी पर भी निर्भर करता है। जब तक 'वोट की कीमत' के बजाय 'वोट का मूल्य' सर्वोपरि नहीं होगा, तब तक वास्तविक लोकतंत्र की स्थापना अधूरी रहेगी।