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मानसून संकट: भारतीय कृषि, चुनौतियाँ एवं समाधान
सामान्य अध्ययन पेपर – III प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन।
संदर्भ
भारतीय अर्थव्यवस्था और कृषि क्षेत्र का मुख्य आधार 'दक्षिण-पश्चिम मानसून' है। मानसून की अनिश्चितता न केवल खाद्य सुरक्षा, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था और मुद्रास्फीति को सीधे प्रभावित करती है। वर्तमान में जलवायु परिवर्तन और समुद्री-वायुमंडलीय घटनाओं का मेल भारतीय मानसून के लिए एक नई चुनौती बनकर उभरा है।
अल नीनो
क्या है अल नीनो: यह मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर के सतही जल के असामान्य रूप से गर्म होने की घटना है।
- क्यों होता है: जब प्रशांत महासागर की व्यापारिक हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं, तो गर्म जल का प्रवाह दक्षिण अमेरिका के तटों की ओर बढ़ जाता है, जिससे वैश्विक मौसम पैटर्न बदल जाता है।
- प्रकार: अल नीनो की तीव्रता के आधार पर इसे 'कमजोर', 'मध्यम' और 'तीव्र' श्रेणियों में बांटा जाता है, जो मानसून को अलग-अलग स्तर पर प्रभावित करते हैं।
वर्तमान मानसून संकट:
हालिया आंकड़ों के अनुसार स्थिति गंभीर है:
- मानसून में कमी: देशव्यापी दक्षिण-पश्चिम मानसून में कमी 35% से बढ़कर 43% तक पहुंच गई है।
- मानसून का ठहराव: हवाओं का उत्तर की ओर बढ़ना मुंबई के पास रुक गया है।
- पूर्वानुमान: अमेरिकी NOAA और भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) दोनों ने इस वर्ष 'मध्यम से तीव्र अल नीनो' की चेतावनी दी है, जो वर्षा के बादलों के बनने की प्रक्रिया को बाधित करता है।
मैडेन-जूलियन ऑसिलेशन (MJO) और प्रभाव
मैडेन-जूलियन ऑसिलेशन उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में बादलों और बारिश की एक लहर है। वर्तमान में, MJO एक 'प्रतिकूल चरण' में है। इसके साथ ही, हिंद महासागर द्विध्रुव भी वर्तमान में मानसून को 'बफर' (सहारा) देने में अक्षम है, जिससे वर्षा की कमी और अधिक बढ़ गई है।
भीषण गर्मी और कम बारिश का प्रभाव
कृषि पर संकट: चावल, दालों और तिलहन की खरीफ बुवाई पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है।
- मुद्रास्फीति और सूखा: खाद्य आपूर्ति कम होने से खुदरा मुद्रास्फीति के बढ़ने का खतरा है, जिससे आम जनता पर आर्थिक बोझ बढ़ेगा।
- अन्य प्रभाव: अत्यधिक गर्मी के कारण खेत में काम करने वाले श्रमिकों की उत्पादकता कम हो रही है, और इडुक्की जैसे क्षेत्रों में इलायची जैसी बागानी फसलों पर संकट मंडरा रहा है।
सरकारी पहल और कदम
संवेदनशीलता के आधार पर प्राथमिकता: कृषि मंत्रालय ने 315 संवेदनशील जिलों में से 111 (III) जिलों को उनकी सिंचाई कवरेज के आधार पर प्राथमिकता के तौर पर चिन्हित किया है।
- आकस्मिक योजनाएं: मंत्रालय द्वारा समायोज्य बुवाई खिड़कियां और वैकल्पिक बीज किस्मों के उपयोग की योजनाएं तैयार की गई हैं।
अन्य महत्वपूर्ण बिंदु
मानसून पर अत्यधिक निर्भरता: भारत का कृषि क्षेत्र आज भी मानसून पर बहुत अधिक निर्भर है, जहाँ देश के कुल निवल बोए गए क्षेत्र का लगभग 51% से 52% हिस्सा अभी भी वर्षा-आधारित है। मानसून में मामूली सी भी अनिश्चितता या कमी सीधे तौर पर खरीफ फसलों की पैदावार को प्रभावित करती है।
- सिंचाई की स्थिति: वर्तमान में भारत में सिंचाई की क्षमता में सुधार हुआ है, लेकिन देश की सिंचाई का एक बड़ा हिस्सा अभी भी भूजल दोहन पर निर्भर है। सरकार की 'प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना' (PMKSY) का उद्देश्य 'हर खेत को पानी' सुनिश्चित करना और 'पर ड्रॉप मोर क्रॉप' के माध्यम से जल उपयोग दक्षता को बढ़ाना है।
- प्रमुख जल परियोजनाएं: मानसून की अनिश्चितता को कम करने के लिए सरकार कई बड़े प्रोजेक्ट्स पर काम कर रही है, जैसे 'केन-बेतवा लिंक परियोजना' (KBLP), जो अंतर-राज्यीय जल हस्तांतरण के माध्यम से बुंदेलखंड जैसे सूखा-प्रवण क्षेत्रों में सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराएगी। इसके अतिरिक्त, लघु सिंचाई योजनाओं और नहरों के आधुनिकीकरण पर भी बल दिया जा रहा है।
- फसल शासन और समन्वय: वर्तमान में भारत में फसल प्रबंधन कृषि मंत्रालय, जल शक्ति मंत्रालय और भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के बीच विभाजित है, जिसके कारण एकीकृत जल प्रबंधन और जलवायु-स्मार्ट कृषि के कार्यान्वयन में चुनौतियां बनी हुई हैं।
- सिंचाई कवरेज का महत्व: कृषि मंत्रालय ने 315 सबसे संवेदनशील जिलों की पहचान की है, जहाँ सिंचाई कवरेज अत्यंत कम है, ताकि वहाँ 'आकस्मिक योजनाएं' प्राथमिकता के आधार पर लागू की जा सकें।
आगे की राह
समन्वित प्राधिकरण: सरकार को एक ' राष्ट्रीय स्तर पर समन्वित जल-जलवायु प्रबंधन तंत्र' बनाना चाहिए जो अंतर-राज्यीय जल उपयोग और फसल पैटर्न में बदलाव को विस्तारित अल नीनो पूर्वानुमानों के आधार पर नियंत्रित करे।
- वर्षा-केंद्रित से जल-केंद्रित संगठन: खेती को केवल वर्षा पर निर्भर रहने के बजाय जल-संरक्षण और जल-प्रबंधन पर आधारित करना होगा।
- लचीलापन: पानी की कम खपत वाली फसलों को बढ़ावा देना और 'इंप्लीमेंटेशन एट स्केल' (बड़े पैमाने पर क्रियान्वयन) पर ध्यान देना आवश्यक है।
निष्कर्ष
भारत के कृषि-आधारित विकास के लिए यह मानसून संकट एक चेतावनी है कि हम अब अनियंत्रित ग्लोबल वार्मिंग के भरोसे नहीं रह सकते। भविष्य की सुरक्षा के लिए हमें 'वर्षा-निर्भर' अर्थव्यवस्था से 'जल-संवेदी' अर्थव्यवस्था की ओर तेजी से संक्रमण करना होगा। समन्वित शासन, उन्नत तकनीक और बेहतर फसल चक्र ही भारत को इस जलवायु परिवर्तन के दौर में सुरक्षित रख सकते हैं। एक 'विकसित भारत' की राह मजबूत सिंचाई और लचीली खेती के साथ सुनिश्चित हो सकती है।
सुरक्षित शैक्षणिक वातावरण: विकसित भारत का आधार
सामान्य अध्ययन पेपर – III प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन।
संदर्भ
भारत एक विकासशील अर्थव्यवस्था से विकसित राष्ट्र 'विकसित भारत' की ओर अग्रसर है। इस विकास यात्रा में 'मानव पूंजी' का निर्माण सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ है। हमारी युवा आबादी कौशल और शिक्षा के लिए शैक्षणिक संस्थानों पर निर्भर है। हालाँकि, शिक्षा के इस तीव्र प्रसार के साथ सुरक्षा का प्रश्न अत्यंत गंभीर हो गया है, क्योंकि किसी भी राष्ट्र की प्रगति उसके नागरिकों की सुरक्षा और उनके कल्याण पर टिकी होती है।
वर्तमान घटनाक्रम
हाल के वर्षों में शैक्षणिक संस्थानों और व्यावसायिक इमारतों में आग लगने की घटनाओं ने पूरे देश को झकझोर दिया है:
- लखनऊ कोचिंग सेंटर अग्निकांड: हाल ही में लखनऊ के एक व्यावसायिक भवन, जिसमें प्रशिक्षण/कोचिंग केंद्र एवं पुस्तकालय संचालित थे, में भीषण आग लगने से अनेक छात्रों सहित लगभग 15 लोगों की मृत्यु हुई।
- दिल्ली की दर्दनाक घटना: दिल्ली में एक कोचिंग सेंटर में बेसमेंट में पानी भर जाने के कारण छात्रों की मृत्यु की घटना ने सुरक्षा के दावों की पोल खोल दी।
- अन्य हादसे: पिछले कुछ वर्षों में देश के विभिन्न हिस्सों (जैसे सूरत, दिल्ली) में इमारतों में लगी आग ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सुरक्षा मानकों की अनदेखी किसी भी समय बड़ी आपदा का रूप ले सकती है।
आग लगने और दुर्घटनाओं के मुख्य कारण
इन त्रासदियों के पीछे मुख्य रूप से निम्नलिखित कारण जिम्मेदार हैं:
- अनियोजित शहरीकरण: इमारतों का निर्माण बिना उचित नक्शों और आपातकालीन निकास मार्गों के होना।
- बढ़ती गर्मी और लोड: तापमान बढ़ने के साथ एयर कंडीशनिंग और अन्य उपकरणों का अत्यधिक उपयोग।
- इलेक्ट्रिक शॉर्ट-सर्किट: पुरानी वायरिंग और उपकरणों पर क्षमता से अधिक भार पड़ना।
- सुरक्षा तंत्र का अभाव: अग्निशमन उपकरणों की कमी या उनका सही से काम न करना।
संस्थानों का भविष्य और बढ़ती संख्या के कारण
एआई (AI) के उदय से रोजगार का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। इस तकनीकी क्रांति के साथ तालमेल बिठाने के लिए युवाओं में कौशल सीखने की होड़ मची है।
- शिक्षा में प्रतिस्पर्धा: बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने कोचिंग संस्थानों की मांग को बढ़ा दिया है।
- संस्थानों का विस्तार: बढ़ती मांग और व्यावसायिक लाभ की प्रवृत्ति के कारण कुछ संस्थान सुरक्षा मानकों की अनदेखी करते हुए असुरक्षित व्यावसायिक इमारतों अथवा बेसमेंट में संचालित किए जा रहे हैं।
संवैधानिक प्रावधान और सरकारी नियम
भारत का संविधान अनुच्छेद 21 के तहत 'जीवन के अधिकार' की गारंटी देता है, जिसमें सुरक्षित वातावरण में रहने का अधिकार भी शामिल है।
- केंद्र और राज्य सरकारों ने 'मॉडल बिल्डिंग बाय-लॉज' और 'राष्ट्रीय भवन संहिता' (NBC) के माध्यम से कड़े नियम बनाए हैं, जो आग से बचाव के लिए अनिवार्य हैं।
सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस
सर्वोच्च न्यायालय ने विभिन्न मामलों में छात्र सुरक्षा, अग्नि सुरक्षा और भवन मानकों के पालन पर जोर दिया है, माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने समय-समय पर शैक्षणिक संस्थानों के लिए सख्त निर्देश दिए हैं:
- इमारतों में अनिवार्य फायर एनओसी (NOC) का होना।
- स्पष्ट आपातकालीन निकास और वेंटिलेशन की व्यवस्था।
- बेसमेंट के उपयोग पर प्रतिबंध या सख्त निगरानी।
सुरक्षा के लिए आवश्यक कदम
बुनियादी ढांचा: निर्माण मानकों के अनुसार ही शैक्षणिक संस्थानों को संचालित करने की अनुमति मिले।
- नियमित मॉक ड्रिल: छात्रों और स्टाफ को आपातकालीन स्थिति से निपटने के लिए प्रशिक्षित किया जाना चाहिए।
- ऑडिट: प्रत्येक संस्थान का समय -समय पर सुरक्षा ऑडिट होना चाहिए।
विश्लेषण
शैक्षणिक संस्थानों में दुर्घटनाएं केवल 'हादसे' नहीं हैं, बल्कि यह व्यवस्थागत विफलता का परिचायक हैं। जब हम एआई और भविष्य की तकनीक की बात करते हैं, तो सुरक्षा को दरकिनार करना विकास की गति को धीमा कर देता है। एक विकसित भारत का लक्ष्य तभी प्राप्त होगा जब हम शैक्षणिक संस्थानों को 'ज्ञान के मंदिर' के साथ-साथ 'सुरक्षा के दुर्ग' भी बनाएंगे।
आगे की राह
सख्त कार्यान्वयन: सुरक्षा नियमों को केवल कागजों तक सीमित न रखकर धरातल पर कड़ाई से लागू किया जाए।
- प्रशिक्षित कर्मी: प्रत्येक बड़े संस्थान में अग्निशमन और प्राथमिक उपचार में प्रशिक्षित स्टाफ की उपस्थिति अनिवार्य हो।
- स्मार्ट अर्बनाइजेशन: शहरी नियोजन में शैक्षणिक क्षेत्रों के लिए अलग से 'सुरक्षित जोन' विकसित किए जाएं।
- उत्तरदायित्व: सुरक्षा मानकों का उल्लंघन करने वाले संस्थानों के लाइसेंस तुरंत रद्द किए जाएं।
निष्कर्ष
"विकसित भारत" का स्वप्न तब तक अधूरा है जब तक हमारा युवा सुरक्षित नहीं है। सुरक्षा केवल एक नियम नहीं, बल्कि एक संस्कृति होनी चाहिए जिसे शिक्षा के हर स्तर पर अपनाया जाए। यदि हम आज सुरक्षा मानकों को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हैं, तभी हम अपने देश को वास्तव में 'सुरक्षित और विकसित' राष्ट्र के रूप में स्थापित करने में सफल होंगे।
यूनाइटेड स्टेट्स पैसिफिक कमांड (PACOM): बदलती वैश्विक भू-राजनीति एवं भारत के लिए निहितार्थ
सामान्य अध्ययन पेपर – II: शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध।
संदर्भ
किसी भी राष्ट्र की रणनीतिक नीति उसके सैन्य कमानों के नामकरण से गहराई से जुड़ी होती है। हाल ही में, अमेरिकी सेना द्वारा अपने क्षेत्रीय नौसैनिक कमान का नाम 'US INDOPACOM' से बदलकर पुनः 'US PACOM' (यूनाइटेड स्टेट्स पैसिफिक कमांड) करना वैश्विक भू-राजनीतिक विमर्श का केंद्र बन गया है। यह परिवर्तन केवल नाम परिवर्तन नहीं, बल्कि अमेरिकी विदेश एवं सुरक्षा नीति में संभावित रणनीतिक बदलाव का संकेत माना जा रहा है।
नाम का सफर: INDOPACOM से PACOM तक
2018 का बदलाव: वर्ष 2018 में तत्कालीन अमेरिकी रक्षा सचिव जिम मैटिस ने 'एशिया-पैसिफिक' की जगह 'इंडो-पैसिफिक' शब्दावली को अपनाया। इसका उद्देश्य हिंद महासागर क्षेत्र, भारतीय उपमहाद्वीप तथा भारत के बढ़ते रणनीतिक महत्व को औपचारिक मान्यता देना था।
- वर्तमान स्थिति: मई 2026 में वर्तमान अमेरिकी रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने संकेत दिया कि अमेरिकी रणनीतिक प्राथमिकताओं में बदलाव आ रहा है। 2025 में 'इंडो-पैसिफिक' शब्दावली के बार-बार उपयोग के विपरीत, इस वर्ष के आधिकारिक भाषणों में इसका उल्लेख लगभग पूरी तरह से नदारद रहा।
नाम बदलने के पीछे के कारण
इस परिवर्तन और शब्दावली के लोप के पीछे कई संभावित रणनीतिक कारण हो सकते हैं—
- नीतिगत प्राथमिकताएँ: अमेरिका अपने क्षेत्रीय फोकस का पुनर्संतुलन कर रहा है। 'इंडो-पैसिफिक' अवधारणा भारत की भूमिका को अधिक महत्व देती थी, जबकि 'PACOM' अपेक्षाकृत पारंपरिक प्रशांत-केन्द्रित दृष्टिकोण को दर्शाता है।
- चीन के प्रति दृष्टिकोण: वर्तमान में ट्रंप 2.0 प्रशासन चीन के साथ संबंधों को सुधारने के लिए नया दृष्टिकोण अपना रहा है। 'G-2' जैसी चर्चाएँ तथा 'प्रभाव के क्षेत्रों' की अवधारणा यह संकेत देती हैं कि अमेरिका वैश्विक शक्ति संतुलन को पुनः प्रशांत-केन्द्रित दृष्टिकोण से देखने लगा है।
चर्चा के प्रमुख कारण
भारत के रणनीतिक हितों पर प्रभाव: 2018 से भारत की रणनीतिक नीति में 'इंडो-पैसिफिक' अवधारणा का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। इस परिवर्तन के कारण भारत को अपनी रणनीतिक प्राथमिकताओं का पुनर्मूल्यांकन करना पड़ सकता है।
- भू-राजनीतिक पुनर्गठन: यह परिवर्तन संकेत देता है कि अमेरिका अपनी सुरक्षा प्राथमिकताओं को पुनः प्रशांत क्षेत्र की ओर केंद्रित कर रहा है। यह भारत के 'बहुध्रुवीय एशिया' के दृष्टिकोण के अनुरूप नहीं माना जा रहा।
तीन प्रमुख भू-राजनीतिक बदलाव
अमेरिकी-चीन संबंध और क्वाड की घटती प्रासंगिकता
- रणनीतिक बदलाव: 'ट्रंप 2.0' प्रशासन चीन के साथ तत्काल संबंधों को सुधारने की दिशा में कार्यरत है। बीजिंग के साथ संभावित 'G-2' संबंधों तथा 'प्रभाव के क्षेत्रों' को पुनर्परिभाषित करने की चर्चाएँ भारत के 'बहुध्रुवीय एशिया' के दृष्टिकोण के विपरीत मानी जा रही हैं।
- क्वाड का कमजोर होना: जनवरी 2026 की अमेरिकी राष्ट्रीय रक्षा रणनीति में क्वाड का उल्लेख न होना इसकी घटती प्राथमिकता को दर्शाता है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता सहयोग में आई बाधाओं तथा तकनीक हस्तांतरण पर प्रतिबंधों ने क्वाड के एजेंडे को सीमित किया है।
- पश्चिम एशिया और ईरान समझौता ज्ञापन (MoU)
- शक्ति संतुलन: ईरान के साथ अमेरिकी युद्धविराम तथा 'इस्लामाबाद MoU' क्षेत्र में नए शक्ति-संतुलन का संकेत देते हैं। ईरान के पुनर्निर्माण हेतु 300 बिलियन डॉलर की अमेरिकी प्रतिबद्धता तथा क्षेत्र से सेना हटाने का निर्णय भारत के लिए नई रणनीतिक चुनौतियाँ उत्पन्न करता है।
- नीतिगत पुनर्मूल्यांकन: नई दिल्ली का अब तक का झुकाव इज़राइल और यूएई की ओर रहा है। बदलते वैश्विक समीकरणों के बीच भारत को ईरानी तेल तथा चाबहार बंदरगाह से जुड़े अमेरिकी प्रतिबंधों के अनुपालन पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है।
- दक्षिण एशिया में अमेरिकी महत्वाकांक्षा
- क्षेत्रीय प्रभुत्व: वाशिंगटन दक्षिण एवं मध्य एशिया में अपनी सक्रियता बढ़ा रहा है। भारत-पाकिस्तान संबंधों में मध्यस्थता के प्रयास तथा क्षेत्रीय मुद्दों में 'सुप्रा एंटिटी' बनने की प्रवृत्ति भारत के हितों के अनुकूल नहीं मानी जाती।
- चीन की चुनौती: सार्क (SAARC) तथा बिम्सटेक (BIMSTEC) जैसी क्षेत्रीय संस्थाओं की सीमित प्रभावशीलता का लाभ उठाकर चीन और अमेरिका दोनों दक्षिण एशिया में अपना प्रभाव बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं।
विश्लेषण
'PACOM' में यह परिवर्तन भारत के लिए केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि गहरे रणनीतिक बदलाव का संकेत है। बदलते वैश्विक शक्ति-संतुलन के बीच भारत को अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखते हुए क्षेत्रीय एवं वैश्विक साझेदारियों को और सुदृढ़ करना होगा।
आगे की राह
क्षेत्रीय नेतृत्व: भारत को हिंद महासागर रिम एसोसिएशन (IORA) तथा आगामी बिम्सटेक एवं SCO शिखर सम्मेलनों का प्रभावी उपयोग कर अपना क्षेत्रीय नेतृत्व मजबूत करना चाहिए।
- बहुपक्षीय सहयोग: ऑस्ट्रेलिया-भारत-जापान त्रिपक्षीय सहयोग को पुनर्जीवित करने के साथ-साथ अन्य पैन-क्षेत्रीय पहलों, जैसे सार्क के पुनरुद्धार, पर भी विचार किया जाना चाहिए।
- संतुलित विदेश नीति: नई दिल्ली को अमेरिका के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध बनाए रखते हुए अपनी रणनीतिक स्वायत्तता तथा राष्ट्रीय हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए।
निष्कर्ष
अमेरिका द्वारा 'इंडो-पैसिफिक' उपसर्ग का त्याग केवल नाम परिवर्तन नहीं, बल्कि वैश्विक भू-राजनीति में उभरते रणनीतिक बदलाव का संकेत है। ऐसे परिवर्तित अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में भारत को अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखते हुए बहुध्रुवीय साझेदारियों को सुदृढ़ करना होगा, ताकि वह बदलते वैश्विक शक्ति-संतुलन में अपनी प्रभावी और स्वतंत्र भूमिका सुनिश्चित कर सके।