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एक्सरसाइज पिच ब्लैक 2026


संदर्भ:

भारतीय वायु सेना (IAF) ने ऑस्ट्रेलिया की मेजबानी में आयोजित होने वाले 'एक्सरसाइज पिच ब्लैक 2026' में अपनी भागीदारी की पुष्टि की है। यह अभ्यास हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सुरक्षा सहयोग को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से एक महत्वपूर्ण सामरिक कदम है।

एक्सरसाइज पिच ब्लैक क्या है?

  • यह रॉयल ऑस्ट्रेलियन एयर फोर्स (RAAF) का सबसे बड़ा और प्रमुख बहुराष्ट्रीय हवाई युद्ध अभ्यास है।

  • यह ऑस्ट्रेलिया के नॉर्दर्न टेरिटरी में आयोजित किया जाता है, जिसमें विश्व भर की वायु सेनाएँ जटिल हवाई युद्ध युद्धाभ्यासों और रणनीति के आदान-प्रदान के लिए एकत्रित होती हैं।
  • यह हर दो साल में एक बार आयोजित किया जाता है।

चर्चा के कारण:

  • हाल ही में ऑस्ट्रेलिया के उच्चायुक्त फिलिप ग्रीन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' पर भारत की भागीदारी की आधिकारिक घोषणा की है।

  • यह अभ्यास 20 जुलाई 2026 से शुरू होकर अगस्त तक चलेगा, जिसमें 19 मित्र देशों के 100 से अधिक विमान और वायु सैनिक शामिल होंगे।

अभ्यास का महत्व:

  • परिचालन अंतर-संचालनीयता: विभिन्न देशों की वायु सेनाओं के बीच समन्वय और तकनीकी तालमेल में सुधार।

  • सैन्य सहयोग: हिंद-प्रशांत क्षेत्र में मित्र देशों के बीच आपसी विश्वास और रणनीतिक साझेदारी को बढ़ावा।
  • रणनीतिक दक्षता: आधुनिक हवाई युद्ध कौशल और जटिल युद्धाभ्यासों का अभ्यास करना।

निष्कर्ष:

'एक्सरसाइज पिच ब्लैक' केवल एक सैन्य अभ्यास नहीं है, बल्कि यह हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता और शांति बनाए रखने के लिए साझा प्रतिबद्धता का प्रतीक है। इसमें भारत की सक्रिय भागीदारी रक्षा कूटनीति के प्रति हमारी गंभीरता को दर्शाती है। आधुनिक युद्ध के बदलते स्वरूप को देखते हुए, ऐसी भागीदारी भारतीय वायु सेना की परिचालन क्षमता को विश्व-स्तरीय स्तर पर निखारने में सहायक सिद्ध होगी। भविष्य में यह सहयोग 'स्वतंत्र और समावेशी हिंद-प्रशांत' की अवधारणा को और अधिक मजबूती प्रदान करेगा।

निपाह वायरस:  उद्भव, चुनौतियाँ और भविष्य की रणनीति

सामान्य अध्ययन पेपर  – II:  शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध।

सामान्य अध्ययन पेपर – III  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन।


संदर्भ

हाल ही में केरल और पश्चिम बंगाल में निपाह वायरस के मामलों की पुनरावृत्ति ने सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों की सतर्कता और 'वन हेल्थ' दृष्टिकोण की आवश्यकता को पुनः रेखांकित किया है।

निपाह वायरस: स्वरूप एवं प्रसार

  • क्या है: निपाह वायरस एक उच्च मृत्यु-दर वाला ज़ूनोटिक RNA वायरस है, जो हेनिपावायरस वंश एवं पैरामिक्सोविरिडी परिवार से संबंधित है तथा फलाहारी चमगादड़ इसका प्राकृतिक भंडार हैं।

  • प्रसार: यह मुख्य रूप से फ्रूट बैट (फल खाने वाले चमगादड़) के माध्यम से फैलता है। संक्रमण का प्रसार दूषित फलों (विशेषकर खजूर के रस) के सेवन, संक्रमित पशुओं (विशेषकर सूअरों) के संपर्क या सीधे व्यक्ति-से-व्यक्ति संपर्क के माध्यम से होता है।
  • लक्षण: इसके लक्षणों में बुखार, सिरदर्द, सांस लेने में तकलीफ, खांसी और गंभीर मामलों में एन्सेफलाइटिस (मस्तिष्क में सूजन) और कोमा शामिल हैं।

चर्चा के कारण

  • केरल में हालिया मामला (जून 2026): कोझिकोड में एक 43 वर्षीय व्यक्ति में निपाह की पुष्टि के बाद, मानसून के दौरान राज्य की संवेदनशीलता और स्वास्थ्य प्रणाली की तत्परता फिर चर्चा में है।

  • सफल नियंत्रण: स्वास्थ्य विभाग की त्वरित 'कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग' और स्क्रीनिंग के चलते संक्रमण को प्राथमिक स्तर पर ही नियंत्रित कर लिया गया है, जिससे कोई नया मामला नहीं फैला।
  • पश्चिम बंगाल की घटना (जनवरी 2026): वर्ष की शुरुआत में पश्चिम बंगाल में स्वास्थ्य कर्मियों में संक्रमण की पुष्टि ने चिकित्सा संस्थानों के भीतर 'बायो-सेफ्टी' प्रोटोकॉल और सतर्कता की आवश्यकता को रेखांकित किया।
  • एकीकृत आवश्यकता: इन घटनाओं ने 'वन हेल्थ' (One Health) दृष्टिकोण को अनिवार्य बना दिया है, क्योंकि मानव-वन्यजीव इंटरफेस के बढ़ते दबाव के बीच एकीकृत निगरानी ही महामारी रोकने का एकमात्र प्रभावी उपाय है।

WHO और निपाह वायरस

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने निपाह को अपनी 'ब्लूप्रिंट प्रायोरिटी पैथोजन' सूची में शामिल किया है। इसका अर्थ है कि इसमें महामारी पैदा करने की उच्च क्षमता है और वर्तमान में इसके लिए कोई विशिष्ट दवा या टीका उपलब्ध नहीं है, जो इसे वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा बनाता है।

निपाह वायरस का इतिहास

निपाह की पहचान पहली बार 1998 में मलेशिया के कांपुंग सुंगई निपाह में हुई थी। भारत में, इसका पहला प्रकोप 2001 में पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी में दर्ज किया गया था। तब से, भारत के विभिन्न हिस्सों में छिटपुट प्रकोप देखे गए हैं, जिसमें 2018 का केरल का प्रकोप सबसे अधिक चर्चित रहा।

निपाह घातक क्यों है?

निपाह वायरस की मृत्यु दर बहुत उच्च है, जो कि 40% से 75% तक हो सकती है। इसके अलावा, इसका लंबा ऊष्मायन काल और स्पर्शोन्मुख संक्रमण की संभावना इसे नियंत्रित करना अत्यंत चुनौतीपूर्ण बनाती है।

सरकारी पहलें

    • वन हेल्थ दृष्टिकोण: मानव, पशु एवं पर्यावरणीय स्वास्थ्य संस्थाओं के बीच समन्वय स्थापित कर जूनोटिक रोगों की शीघ्र पहचान और रोकथाम पर बल दिया जा रहा है।
    • रोगजनक निगरानी तंत्र का सुदृढ़ीकरण: NCDC, ICMR तथा WHO के सहयोग से निपाह सहित उच्च-जोखिम रोगजनकों की निगरानी एवं प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली को मजबूत किया गया है।
    • ICMR का अनुसंधान नेटवर्क: निपाह वायरस के निदान, परीक्षण क्षमता, संभावित उपचारों तथा टीका विकास से संबंधित अनुसंधान को प्रोत्साहन दिया जा रहा है।
    • एकीकृत रोग निगरानी कार्यक्रम (IDSP): राज्य एवं जिला स्तर पर रोग निगरानी तथा त्वरित प्रतिक्रिया हेतु रैपिड रिस्पॉन्स टीम (RRTs) की व्यवस्था की गई है।
    • जन-जागरूकता अभियान: फलों की स्वच्छता, चमगादड़ों से संपर्क से बचाव तथा संदिग्ध संक्रमण की शीघ्र सूचना के संबंध में जन-जागरूकता कार्यक्रम संचालित किए जाते हैं।

विश्लेषण

निपाह का बार-बार उभरना मानवजनित पर्यावरणीय हस्तक्षेप का सीधा परिणाम है, जो पारिस्थितिक संतुलन को बिगाड़ रहा है। केरल का सफल प्रबंधन यह सिद्ध करता है कि एक मजबूत प्राथमिक स्वास्थ्य ढांचा और सक्रिय निगरानी प्रणाली ही महामारियों के विरुद्ध सबसे प्रभावी ढाल है। भविष्य में हमें केवल लक्षणों के इलाज के बजाय पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण पर ध्यान केंद्रित करना होगा।

आगे की राह

  • वन हेल्थ दृष्टिकोण: पशु, पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य के बीच एकीकृत निगरानी अनिवार्य है।

  • अनुसंधान एवं विकास: टीकों और एंटी-वायरल दवाओं के विकास में वैश्विक निवेश बढ़ाना।
  • सामुदायिक जागरूकता: चमगादड़ के आवासों के पास रहने वाले लोगों को खान-पान और स्वच्छता के प्रति शिक्षित करना।
  • क्षमता निर्माण: स्थानीय स्तर पर प्रयोगशालाओं और रैपिड रिस्पांस टीमों को सशक्त बनाना।


निष्कर्ष

निपाह वायरस केवल एक स्वास्थ्य चुनौती नहीं, बल्कि पारिस्थितिक असंतुलन का संकेत है। सतत विकास और एकीकृत स्वास्थ्य नीतियां ही भविष्य की महामारियों को रोकने का एकमात्र मार्ग हैं। सतर्कता, वैज्ञानिक शोध और सामुदायिक सहयोग का सामंजस्य ही इस वायरस को नियंत्रित करने की कुंजी है।

टेलीग्राम प्रतिबंध: नीट (NEET) पुन: परीक्षा और डिजिटल सुरक्षा

सामान्य अध्ययन पेपर  – II:  शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध।

संदर्भ

नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) द्वारा आयोजित नीट (UG) 2026 पुन: परीक्षा की अखंडता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से, केंद्र सरकार ने भारत में 'टेलीग्राम' ऐप पर अस्थायी प्रतिबंध लगाने का निर्णय लिया है। यह निर्णय परीक्षा में धांधली, पेपर लीक की अफवाहों और संगठित धोखाधड़ी के गिरोहों द्वारा प्लेटफॉर्म के व्यापक दुरुपयोग के जवाब में एक प्रशासनिक 'स्टॉप-गैप' उपाय के रूप में लिया गया है।

टेलीग्राम: प्रकृति और तकनीकी उपयोग

टेलीग्राम एक क्लाउड-आधारित इंस्टेंट मैसेजिंग, वीओआईपी (VoIP) और फाइल-शेयरिंग सेवा है। अपनी एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन (सीक्रेट चैट) और विशाल ग्रुप/चैनल निर्माण क्षमता के कारण यह सूचनाओं के त्वरित आदान-प्रदान के लिए लोकप्रिय है, लेकिन यही विशेषताएँ इसे अवांछित गतिविधियों के लिए भी एक सुलभ मंच बनाती हैं।

प्रतिबंध के प्रमुख कारण

  • पेपर लीक और धोखाधड़ी: हालिया जांच में पाया गया कि पेपर लीक से संबंधित 80-90% आपराधिक गतिविधियाँ इसी प्लेटफॉर्म पर केंद्रित थीं।

  • अनाम गतिविधियाँ: टेलीग्राम उपयोगकर्ताओं की पहचान छिपाने की सुविधा देता है, जिससे सुरक्षा एजेंसियों के लिए अपराधियों को ट्रैक करना चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
  • मॉडरेशन की कमी: अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की तुलना में टेलीग्राम का कंटेंट मॉडरेशन सिस्टम और सुरक्षा एजेंसियों के साथ सहयोग का तंत्र तुलनात्मक रूप से कमजोर है।
  • बड़ी फाइल शेयरिंग: ऐप की क्षमता के कारण लीक हुए दस्तावेजों का बड़े पैमाने पर प्रसार करना बहुत आसान है।

कानूनी और संवैधानिक ढांचा

संवैधानिक स्थिति:

  • अनुच्छेद 19(1)(a): नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार देता है।
  • अनुच्छेद 19(2): राज्य को 'भारत की संप्रभुता, अखंडता, सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था' के हित में इस स्वतंत्रता पर 'उचित प्रतिबंध' लगाने का अधिकार है।
  • अनुच्छेद 21: निजता के अधिकार और लोक-व्यवस्था के बीच संतुलन बनाए रखना राज्य का दायित्व है।

कानूनी प्रावधान (आईटी कानून):

  • IT अधिनियम, 2000 (धारा 69A): सरकार को जनहित में किसी भी ऐप या ऑनलाइन कंटेंट को ब्लॉक करने की शक्ति देता है।

  • IT नियम, 2021:
    • नियम 3 (ड्यू डिलिजेंस): प्लेटफॉर्म्स के लिए शिकायत निवारण अधिकारी नियुक्त करना अनिवार्य है।
    • सहयोग: गंभीर अपराधों (जैसे पेपर लीक) की जांच के दौरान सरकारी आदेशों पर डेटा साझा करना और 24x7 नोडल संपर्क बिंदु बनाए रखना इनका कानूनी दायित्व है।
    • सुरक्षा कवच (धारा 79): मध्यस्थों को 'सेफ हार्बर' सुरक्षा तब तक मिलती है, जब तक वे स्वयं अवैध गतिविधियों में सक्रिय रूप से शामिल हों।
  • दिल्ली उच्च न्यायालय: हालिया घटनाक्रम (18 जून 2026) के अनुसार, दिल्ली उच्च न्यायालय ने भी सरकार के इस निर्णय को 'अनुपातिक' और 'जरूरी' मानते हुए इसे बरकरार रखा है।

आलोचना

  • टेलीग्राम संस्थापक पावेल डुरोव के अनुसार, यह प्रतिबंध 15 करोड़ भारतीय उपयोगकर्ताओं को सामूहिक रूप से दंडित करता है। आलोचकों का मानना है कि केवल ऐप बैन करने से समस्या समाप्त नहीं होती, बल्कि वे अन्य प्लेटफॉर्म्स (व्हाट्सएप/सिग्नल) पर स्थानांतरित हो जाते हैं। इसके साथ ही, वैध सेवाओं के लिए ऐप का उपयोग करने वाले उपयोगकर्ताओं को भारी असुविधा होती है।

प्रभाव

  • नकारात्मक: डिजिटल अर्थव्यवस्था में बाधा, सूचना के अधिकार का सीमित होना और लोकतांत्रिक संचार के माध्यमों का संकुचन।
  • सकारात्मक: पेपर लीक की सूचनाओं के प्रसार पर कुछ हद तक अंकुश, जो उम्मीदवारों के बीच डर को कम करता है।

विश्लेषण: एक 'स्टॉप-गैप' व्यवस्था

  • यह प्रतिबंध तकनीकी और प्रशासनिक चुनौतियों के बीच एक तात्कालिक समाधान है। यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और तकनीकी संस्थाओं की जवाबदेही के बीच एक जटिल संतुलन बनाने का प्रयास है। यह स्पष्ट है कि केवल प्रतिबंध ही तकनीकी अपराधों का स्थायी समाधान नहीं हो सकता।

आगे की राह

  • मजबूत साइबर निगरानी: सरकार को केवल ऐप्स बैन करने के बजाय अपनी साइबर सुरक्षा एजेंसियों की निगरानी क्षमता को विकसित करना चाहिए।

  • प्लेटफॉर्म जवाबदेही: टेलीग्राम को भारत के डेटा सुरक्षा नियमों का पालन करना होगा और 'नो-लॉग' नीतियों में सुधार करना होगा ताकि आपराधिक जांच में सहायता मिल सके।
  • तकनीकी सुरक्षा: पेपर लीक को रोकने के लिए 'डिजिटल वॉटरमार्किंग', सुरक्षित प्रश्नपत्र वितरण तंत्र और एंड-टू-एंड इंक्रिप्शन का उत्तरदायी उपयोग अनिवार्य है।

निष्कर्ष

नीट परीक्षा की पवित्रता बनाए रखने के लिए टेलीग्राम पर अस्थायी प्रतिबंध एक कठिन लेकिन आवश्यक प्रशासनिक निर्णय था। संवैधानिक रूप से, राज्य को जनहित में इंटरनेट विनियमित करने का अधिकार है, लेकिन दीर्घकालिक समाधान के लिए सरकार और तकनीकी प्लेटफॉर्मों के बीच सहयोग, कड़े नियामक कानून और परीक्षाओं के लिए अधिक पारदर्शी डिजिटल अवसंरचना का विकास अत्यंत आवश्यक है। भविष्य में हमें ऐसे प्रतिबंधों की आवश्यकता पड़े, इसके लिए डिजिटल सुरक्षा की नींव को और मजबूत करना होगा।



हिंद-प्रशांत सुरक्षा और आईओआरए (IORA): कनाडा की सदस्यता और उभरती भू-राजनीतिक चुनौतियां

सामान्य अध्ययन पेपर  – II:  शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध।

संदर्भ:

हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में अपनी रणनीतिक उपस्थिति बढ़ाने के प्रयासों के तहत, कनाडा ने 'इंडियन ओशन रिम एसोसिएशन' (IORA) में 'संवाद भागीदार' बनने के लिए आवेदन किया है। हाल ही में, 15-16 जून 2026 को नई दिल्ली में संपन्न IORA की 'वरिष्ठ अधिकारियों की समिति' (CSO) की 28वीं बैठक में इस प्रस्ताव पर समीक्षा की गई।

आईओआरए (IORA) क्या है?

  • परिचय: यह हिंद महासागर के तटवर्ती देशों का एक अंतर-सरकारी संगठन है, जिसकी स्थापना 1997 में हुई थी। इसका सचिवालय एबेने (Ebène), मॉरीशस में स्थित है।

  • उद्देश्य: यह 'क्षेत्रीय सहयोग' और 'सतत विकास' को बढ़ावा देने हेतु एक मंच प्रदान करता है।
  • सदस्यता: इसमें 23 सदस्य देश और अमेरिका, चीन, जापान, जर्मनी, ब्रिटेन, यूरोपीय संघ आदि सहित कई 'संवाद भागीदार' शामिल हैं।
  • कार्यक्षेत्र (6 प्रमुख स्तंभ और 2 क्रॉस-कटिंग थीम्स):
  1. 6 स्तंभ:
        • समुद्री सुरक्षा एवं संरक्षा,
        • व्यापार और निवेश सुविधा,
        • मत्स्य पालन प्रबंधन,
        • आपदा जोखिम प्रबंधन,
        • शैक्षिक, विज्ञान और प्रौद्योगिकी सहयोग,
        • पर्यटन और सांस्कृतिक आदान-प्रदान
  2. क्रॉस-कटिंग थीम्स:
  • ब्लू इकोनॉमी और महिलाओं का आर्थिक सशक्तिकरण

चर्चा के कारण

  • नई दिल्ली में 28वीं CSO बैठक के दौरान कनाडा के आवेदन पर समीक्षा की गई, जिसे अब सदस्य देशों के मध्य विचारार्थ रखा गया है।

  • IORA द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य क्षेत्र में तनाव कम करने और समुद्री व्यापार की सुरक्षा सुनिश्चित करने के प्रयासों का स्वागत किया गया है।

श्री संजीव रंजन का वक्तव्य:

IORA के महासचिव संजीव रंजन ने स्पष्ट किया कि कनाडा का समावेश सदस्य देशों के लिए लाभदायक हो सकता है। उन्होंने बताया कि कनाडा अपने विशाल तटीय क्षेत्रों और समुद्री सुरक्षा, कनेक्टिविटी संरक्षा में अपनी विशेषज्ञता के कारण एक बड़ी समुद्री शक्ति है, जिसका अनुभव अन्य सदस्य देशों को मिल सकता है।

आईओआरए का महत्व और भारत का दृष्टिकोण:

  • SAGAR विजन: यह भारत कीक्षेत्र में सभी के लिए सुरक्षा और विकासदृष्टि को बल देता है।

  • नियम-आधारित व्यवस्था: हिंद-प्रशांत में चीन की बढ़ती सक्रियता के बीच, यह एक महत्वपूर्ण 'नियम-आधारित समुद्री व्यवस्था' स्थापित करने का मंच है।
  • ब्लू इकोनॉमी: समुद्री संसाधनों के सतत दोहन के लिए एक साझा ढांचा।

अन्य महत्वपूर्ण बिंदु:

  • कनाडा का जुड़ाव IORA की वैश्विक पहुंच को विस्तार देगा।

  • समुद्री सुरक्षा, आर्कटिक-हिंद महासागर संपर्क और जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दों पर कनाडा की विशेषज्ञता IORA के लिए मूल्यवान सिद्ध हो सकती है।

विश्लेषण:

कनाडा का IORA से जुड़ना हिंद महासागर क्षेत्र में गैर-क्षेत्रीय शक्तियों की बढ़ती रुचि को दर्शाता है। IORA में चीन की उपस्थिति के बावजूद, भारत जैसे देशों के लिए यह मंच एक नियम-आधारित व्यवस्था को बढ़ावा देने का एक सशक्त माध्यम है, जहाँ सदस्य देश सहमति के आधार पर निर्णय लेते हैं।

आगे की राह

  • IORA को कनाडा जैसे संवाद भागीदारों की विशेषज्ञता का उपयोग 'समुद्री सुरक्षा डेटा' साझा करने और तकनीकी प्रशिक्षण में करना चाहिए।

  • जलवायु परिवर्तन के प्रति लचीलापन बनाने के लिए 'एकीकृत आपदा प्रतिक्रिया तंत्र' को मजबूत करना अनिवार्य है।

निष्कर्ष:

IORA का विस्तार हिंद महासागर क्षेत्र में शांति, स्थिरता और समावेशी विकास के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। कनाडा जैसे भागीदारों का समावेश संगठन की कार्यक्षमता में नई ऊर्जा और तकनीकी दक्षता प्रदान करेगा। वर्तमान भू-राजनीतिक अस्थिरता के दौर में, IORA का यह प्रयास हिंद महासागर को एक 'स्वतंत्र, खुले और सुरक्षित क्षेत्र' के रूप में स्थापित करने की दिशा में एक प्रभावी कदम है।

जी 7 इवियन शिखर सम्मेलन: वैश्विक नेतृत्व और विश्वास का संकट

सामान्य अध्ययन पेपर  – II:  शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध।


सन्दर्भ

हाल ही में फ्रांस के इवियन में आयोजित जी7 (G7) शिखर सम्मेलन वैश्विक कूटनीति के इतिहास में एक महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में उभरा है। इस सम्मेलन का केंद्रीय विषय "नई साझेदारियाँ बनाना और अंतर्राष्ट्रीय एकजुटता का पुनर्निर्माण" था। एक ऐसे समय में जब वैश्विक अर्थव्यवस्था मुद्रास्फीति और क्षेत्रीय संघर्षों के बीच अनिश्चितताओं से जूझ रही है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैश्विक मंच पर 'विश्वास की कमी' मुद्दा उठाकर एक नई वैचारिक बहस को जन्म दिया है।

जी7 (G7) एक अवलोकन

जी7 दुनिया की सात सबसे उन्नत अर्थव्यवस्थाओं, कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, यूनाइटेड किंगडम और अमेरिका का एक प्रभावशाली समूह है। यह समूह वैश्विक आर्थिक नीतियों और सुरक्षा एजेंडे को दिशा प्रदान करता है। इस वर्ष के इवियन सम्मेलन में भारत की उपस्थिति एक 'रणनीतिक भागीदार' के रूप में थी, जो विश्व मंच पर भारत के बढ़ते कद को रेखांकित करती है।

  • इतिहास: इसकी शुरुआत 1975 में G6 के रूप में हुई थी। 1976 में कनाडा के जुड़ने से यह G7 बना और 1997 में रूस के शामिल होने पर यह G8 हो गया। हालाँकि, 2014 में क्रीमिया विवाद के चलते रूस के निलंबन के बाद यह पुनः G7 बन गया।
  • संरचना: इसका कोई स्थायी मुख्यालय, चार्टर या सचिवालय नहीं है। इसकी अध्यक्षता और शिखर सम्मेलन हर साल सदस्य देशों में बारी-बारी से आयोजित होते हैं।
  • भारत की स्थिति: भारत G7 का आधिकारिक सदस्य नहीं है, लेकिन एक प्रमुख वैश्विक शक्ति के रूप में इसे अक्सर 'अतिथि देश' के रूप में आमंत्रित किया जाता है। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला, जलवायु परिवर्तन और डिजिटल सुरक्षा जैसे मुद्दों पर भारत की सक्रिय भागीदारी ने G7 में भारत के महत्व को वैश्विक स्तर पर अनिवार्य बना दिया है।

मुख्य चर्चा के बिंदु: विश्वास का संकट

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में स्पष्ट किया कि आज दुनिया के समक्ष संकट संसाधनों का नहीं, बल्कि 'विश्वास' का है।

  • रणनीतिक संपत्ति के रूप में विश्वास: प्रधानमंत्री ने इसे आज के दौर की सबसे बड़ी रणनीतिक संपत्ति बताया।
  • ग्लोबल साउथ की आकांक्षा: भारत ने स्वयं को 'ग्लोबल साउथ' (विकासशील देशों) की मुखर आवाज के रूप में स्थापित किया। भारत का संदेश स्पष्ट था: विकासशील राष्ट्र केवल 'सहायता' नहीं, बल्कि समान 'साझेदारी' चाहते हैं।
  • भारत का अफ्रीका मॉडल: भारत ने अपने विकास अनुभवों, विशेष रूप से प्रशिक्षण, जल प्रबंधन, कृषि और ऊर्जा क्षेत्र में क्षमता निर्माण को 'विन-विन' मॉडल के रूप में प्रस्तुत किया।

द्विपक्षीय कूटनीति: संबंधों का विस्तार

शिखर सम्मेलन के इतर, प्रधानमंत्री मोदी ने कई महत्वपूर्ण बैठकें कीं:

  • कनाडा: प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के साथ वार्ता में वर्ष के अंत तक एक ठोस व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने पर सहमति बनी।
  • यूनाइटेड किंगडम: प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर के साथ सहयोग के नए क्षेत्रों को तलाशने पर जोर दिया गया।
  • यूएई: शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाह्यान के साथ हुई मुलाकात ने खाड़ी क्षेत्र के साथ भारत के रणनीतिक और आर्थिक संबंधों को और प्रगाढ़ किया।

भारत-अमेरिका संबंध: कूटनीतिक संतुलन की परीक्षा

सम्मेलन का एक महत्वपूर्ण केंद्र भारत और अमेरिका के बीच बदलता समीकरण था। फरवरी 2025 के बाद पहली बार आमने-सामने की वार्ता में तनाव के कई बिंदु उजागर हुए:

  • ओमान तट पर भारतीय नाविकों की मृत्यु और वीजा प्रतिबंध जैसे मुद्दे संबंधों में चुनौती बने।
  • मई 2025 के भारत-पाकिस्तान संघर्ष पर राष्ट्रपति ट्रंप का 'युद्धविराम' संबंधी दावा और व्यापारिक सौदों में देरी ने संबंधों को जटिल बनाया। हालाँकि, यह बैठक दोनों देशों के बीच मतभेदों को सुलझाने और द्विपक्षीय बातचीत को पटरी पर लाने की दिशा में एक आवश्यक कदम थी।

भारत का स्वतंत्र रुख

भारत ने सम्मेलन में यह सिद्ध किया कि वह अपनी शर्तों पर वैश्विक एजेंडे का समर्थन करता है। जहाँ भारत ने इबोला प्रकोप और कैंसर से लड़ने जैसे मानवतावादी कार्यों में सहयोग दिया, वहीं उसने 'विकास वित्त पारिस्थितिकी तंत्र' के पुनर्गठन संबंधी उस घोषणापत्र पर हस्ताक्षर नहीं किए, जो उसकी नीतियों के अनुरूप नहीं था। यह भारत की 'रणनीतिक स्वायत्तता' को प्रदर्शित करता है।

आगे की राह

इवियन शिखर सम्मेलन इस बात का प्रमाण है कि भविष्य की वैश्विक व्यवस्था 'दाता-प्राप्तकर्ता' के पुराने ढांचे से हटकर 'समान भागीदारी' के सिद्धांतों पर आधारित होनी चाहिए।

  • संस्थागत सुधार: विश्व बैंक जैसे अंतरराष्ट्रीय संस्थानों को वैश्विक दक्षिण की आर्थिक वास्तविकताओं के अनुरूप ढलना होगा।
  • विश्वास बहाली: जी7 देशों को ऋण के बजाय ज्ञान हस्तांतरण और साझा वित्तीय एजेंडे पर काम करना चाहिए।
  • रणनीतिक लचीलापन: भारत को साझा हितों (स्वास्थ्य, पर्यावरण) पर सहयोग और अपने आर्थिक लक्ष्यों (मेक इन इंडिया) के बीच संतुलन बनाए रखना होगा।

निष्कर्ष

प्रधानमंत्री मोदी का संदेश कि "दुनिया साझेदारी चाहती है, सहायता नहीं", आने वाले दशक के लिए वैश्विक कूटनीति का नया मंत्र होगा। भारत केवल एक उभरती शक्ति है, बल्कि वह एक ऐसी शक्ति है जो वैश्विक समाधानों को दिशा देने और बहुध्रुवीय विश्व के निर्माण में निर्णायक भूमिका निभाने के लिए तैयार है।