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सामान्य अध्ययन पेपर – III प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन
संदर्भ
वर्ष 2016 में जब 'स्टार्टअप इंडिया' अभियान की आधारशिला रखी गई थी, तब इसका उद्देश्य नवाचार और उद्यमशीलता के माध्यम से देश की आर्थिक संरचना को नया रूप देना था। आज एक दशक के पश्चात, यह मिशन केवल एक सरकारी योजना न रहकर एक राष्ट्रीय आंदोलन बन चुका है, जिसने भारतीय युवाओं की आकांक्षाओं को वैश्विक मंच पर स्थापित किया है।
स्टार्टअप इंडिया मिशन:
16 जनवरी 2016 को लॉन्च किया गया स्टार्टअप इंडिया मिशन भारत सरकार की एक प्रमुख पहल है, जोकि भारत सरकार के वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (DPIIT) द्वारा संचालित होता है। जिसका उद्देश्य देश में स्टार्टअप्स को बढ़ावा देना, नवाचार को प्रोत्साहित करना और एक मजबूत पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करना है। यह मिशन मुख्य रूप से तीन स्तंभों पर आधारित है:
- सरलीकरण और हैंडहोल्डिंग।
- वित्त पोषण सहायता और प्रोत्साहन।
- उद्योग-अकादमिक साझेदारी और इन्क्यूबेशन।
चर्चा में क्यों?
- यह मिशन वर्तमान में अपनी 10वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में चर्चा का केंद्र बना हुआ है।
- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन में इसे 'आत्मनिर्भर भारत' का आधार बताया है।
- वर्ष 2025 में 44,000 से अधिक स्टार्टअप्स पंजीकरण ने अब तक के सभी कीर्तिमान ध्वस्त कर दिए हैं।
- प्रधानमंत्री मोदी ने यह भी कहा कि अब स्टार्टअपों को केवल संख्या बढ़ाने पर नहीं, बल्कि मैन्युफैक्चरिंग, डीप-टेक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के क्षेत्र में नेतृत्व स्थापित करने पर ध्यान देना चाहिए।
स्टार्टअप्स के लिए सरकारी पहलें
सरकार ने इस क्षेत्र को सशक्त बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं:
- फंड ऑफ फंड्स फॉर स्टार्टअप्स (FFS): निवेश के लिए पूंजी की उपलब्धता सुनिश्चित करना।
- स्टार्टअप इंडिया सीड फंड योजना (SISFS): प्रारंभिक चरण में प्रोटोटाइप और बाजार प्रवेश के लिए वित्तीय सहायता।
- कर अवकाश: पात्र स्टार्टअप्स के लिए तीन वर्षों तक आयकर में छूट।
- पेटेंट पंजीकरण में रियायत: बौद्धिक संपदा अधिकारों (IPR) के संरक्षण हेतु शुल्क में 80% तक की छूट।
भारत में स्टार्टअप्स का महत्व: जनसंख्या और बेरोजगारी का समाधान
भारत जैसी विशाल जनसंख्या और बेरोजगारी की चुनौती वाले देश के लिए स्टार्टअप्स एक वरदान सिद्ध हो रहे हैं:
- रोजगार सृजन: ये स्टार्टअप्स केवल 'नौकरी चाहने वाले' के बजाय 'नौकरी देने वाले' की पीढ़ी तैयार कर रहे हैं।
- नवाचार द्वारा समाधान: बढ़ती जनसंख्या की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और कृषि जैसे क्षेत्रों में तकनीक आधारित किफायती समाधान प्रदान करना।
वर्तमान स्थिति और उपलब्धियाँ
भारतीय स्टार्टअप परिदृश्य की वर्तमान स्थिति अत्यंत उत्साहजनक है:
- विश्व का तीसरा सबसे बड़ा पारितंत्र: भारत वर्तमान में संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन के बाद दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र है।
- 2025 का कीर्तिमान: वर्ष 2025 में 44,000 से अधिक स्टार्टअप्स पंजीकृत हुए हैं, जो स्टार्टअप इंडिया की शुरुआत के बाद से एक वर्ष में सर्वाधिक है।
- तुलनात्मक वृद्धि: 2016 से पूर्व स्टार्टअप्स की संख्या केवल कुछ सैकड़ों में थी, लेकिन आज यह संख्या 2 लाख से भी अधिक तक पहुँच चुकी है।
स्टार्टअप इंडिया के प्रमुख उद्देश्य
- संपूर्ण देश में स्टार्टअप संस्कृति का विस्तार करना।
- पारंपरिक व्यावसायिक बाधाओं को तकनीक के माध्यम से समाप्त करना।
- स्थानीय समस्याओं के लिए वैश्विक समाधान तैयार करना।
- इनोवेशन और स्टार्टअप को बढ़ावा देने के लिए एक मजबूत इकोसिस्टम तैयार करना
महिला सहभागिता: सशक्तिकरण का नया आयाम
भारत में स्टार्टअप आंदोलन ने समावेशी विकास को भी बल दिया है स्टार्टअप क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी निरंतर बढ़ रही है। वर्तमान में लगभग 47% मान्यता प्राप्त स्टार्टअप्स में कम से कम एक महिला निदेशक है। सरकार ने 'वीमेन एंटरप्रेन्योरशिप प्लेटफॉर्म' (WEP) जैसी पहलों के माध्यम से महिला उद्यमियों को विशेष प्रोत्साहन प्रदान किया है।
चुनौतियाँ: क्षेत्रीय विषमता और अन्य बाधाएँ
विकास के बावजूद कुछ गंभीर चुनौतियाँ अभी भी विद्यमान हैं:
- शहरी-ग्रामीण विभाजन: अधिकांश स्टार्टअप्स बेंगलुरु, दिल्ली-NCR और मुंबई जैसे महानगरों तक सीमित हैं; ग्रामीण क्षेत्रों (Tier-3) में अभी भी इसकी पहुंच सीमित है।
- वित्त पोषण की जटिलता : प्रारंभिक चरण के बाद बड़े निवेश को प्राप्त करने में स्टार्टअप्स को कठिनाई होती है।
- अनुपालन भार: विनियामक और कर संबंधी अनुपालनों की जटिलता छोटे उद्यमियों के लिए चुनौतीपूर्ण होती है।
विश्लेषण
स्टार्टअप इंडिया मिशन ने भारत की विकास गाथा को 'समावेशी' बनाया है। पहले जहाँ व्यवसाय केवल बड़े पूंजीपतियों तक सीमित था, आज मध्यमवर्गीय युवाओं के पास अपने विचारों को वास्तविकता में बदलने का अवसर है। 44,000 पंजीकरण का नया आंकड़ा दर्शाता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था अब 'सर्विस सेक्टर' से आगे बढ़कर 'इनोवेशन सेक्टर' की ओर बढ़ रही है।
आगे की राह
- ग्रामीण विस्तार: 'एग्री-टेक' और 'रूरल-टेक' को बढ़ावा देकर स्टार्टअप्स को छोटे गांवों तक ले जाना चाहिए।
- अनुसंधान पर जोर: 'डीप-टेक' और 'क्वांटम कंप्यूटिंग' जैसे क्षेत्रों में अनुसंधान हेतु अधिक सरकारी अनुदान की आवश्यकता है।
- शिक्षा प्रणाली में बदलाव: स्कूली स्तर से ही उद्यमिता कौशल को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
निष्कर्ष
निष्कर्षतः, स्टार्टअप इंडिया मिशन ने भारत को एक 'नौकरी मांगते राष्ट्र' से 'समाधान प्रदाता राष्ट्र' में बदल दिया है। 2025 के रिकॉर्ड आंकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं कि भारत 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की राह पर अग्रसर है। यदि हम क्षेत्रीय असमानता को दूर कर सकें, तो यह मिशन 'विकसित भारत @2047' के लक्ष्य को प्राप्त करने में सबसे महत्वपूर्ण कड़ी सिद्ध होगा।
सामान्य अध्ययन पेपर – III प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन
संदर्भ
भारत की वित्त मंत्री 1 फरवरी, 2026 को संसद में केंद्रीय बजट पेश करने जा रही हैं। यह बजट ऐसे समय में आ रहा है जब भारतीय अर्थव्यवस्था वैश्विक भू-राजनीतिक अस्थिरता, संरक्षणवाद की बढ़ती प्रवृत्तियों और घरेलू स्तर पर संरचनात्मक सुधारों की आवश्यकता के बीच संतुलन बनाने का प्रयास कर रही है। यह बजट 16वें वित्त आयोग की सिफारिशों के कार्यान्वयन का पहला वर्ष भी होगा।
बजट
बजट किसी भी सरकार या संस्था के आने वाले एक साल की कमाई और खर्च का पूरा लेखा-जोखा होता है। भारत के संदर्भ में इसे 'केंद्रीय बजट' कहा जाता है, जिसे हर साल वित्त मंत्री द्वारा संसद में पेश किया जाता है।
- भारतीय संविधान के अनुच्छेद 112 के तहत बजट को "वार्षिक वित्तीय विवरण"कहा गया है।
- संविधान में 'बजट' शब्द का उल्लेख कहीं नहीं है।
बजट के प्रमुख आयाम और क्षेत्रीय मांगें
- राजकोषीय संघवाद और केरल का 'विश-लिस्ट': सहकारी संघवाद के ढांचे के भीतर, राज्यों की वित्तीय स्थिति चिंता का विषय बनी हुई है। केरल सरकार ने केंद्र से ₹21,000 करोड़ के 'विशेष राजकोषीय सुधार पैकेज' की मांग की है।
- तर्क: उधार लेने की सीमा में कटौती और GSDP गणना के नए तरीकों से राज्यों के राजस्व में कमी आई है।
- प्रस्तावित निवेश: विझिंजम, चवारा और कोच्चि को जोड़ते हुए एक 'रक्षा नवाचार गलियारा' और रबर क्षेत्र के लिए मूल्य स्थिरीकरण कोष।
- डिजिटल अर्थव्यवस्था और क्रिप्टो कराधान: भारतीय क्रिप्टो उद्योग वर्तमान कर व्यवस्था को "प्रतिबंधात्मक" मान रहा है, जिससे लगभग ₹4.87 लाख करोड़ का ट्रेडिंग वॉल्यूम विदेशी एक्सचेंजों पर स्थानांतरित हो गया है।
- प्रमुख मांगें: 1% TDS को घटाकर 0.01% करना, 30% फ्लैट टैक्स की समीक्षा और अन्य वित्तीय संपत्तियों की तरह 'नुकसान की भरपाई' की अनुमति देना।
- प्रभाव: एक संतुलित कर ढांचा घरेलू एक्सचेंजों को 'लेवल प्लेइंग फील्ड' प्रदान करेगा और पारदर्शिता बढ़ाएगा।
- शहरी आवास और रियल एस्टेट: रियल एस्टेट क्षेत्र ने 'किफायती आवास' की ₹45 लाख की वर्तमान सीमा को बाजार की वास्तविकता के अनुरूप न होने के कारण बदलने की मांग की है।
- चुनौतियां: भूमि अधिग्रहण की बढ़ती लागत और निर्माण सामग्री (स्टील, सीमेंट) की महंगाई।
- मांग: किफायती आवास की सीमा को बढ़ाकर ₹75-90 लाख करना और होम लोन ब्याज छूट (धारा 24) को ₹2 लाख से बढ़ाकर ₹5 लाख करना।
- विपक्षी स्वर: संरचनात्मक चुनौतियां और 'सांख्यिकीय भ्रम': मुख्य विपक्षी दल (कांग्रेस) ने बजट से पूर्व अर्थव्यवस्था की तीन "संरचनात्मक चुनौतियों" को रेखांकित किया है:
- सांख्यिकीय भ्रम: निम्न मूल्य डिफ्लेटर्स का उपयोग करके GDP विकास दर को बढ़ाकर दिखाना।
- राजकोषीय संघवाद पर प्रहार: मनरेगा (MGNREGA) के नए स्वरूप में 60:40 का फंडिंग फॉर्मूला राज्यों पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ डाल रहा है।
- निजी निवेश में सुस्ती: कॉर्पोरेट टैक्स में कटौती के बावजूद निजी निवेश का उम्मीद के मुताबिक न बढ़ना और बढ़ती आर्थिक असमानता।
आर्थिक विश्लेषण
बजट 2026-27 को निम्नलिखित दो विरोधाभासी लक्ष्यों के बीच संतुलन साधना होगा:
- राजकोषीय अनुशासन: राजकोषीय घाटे को लक्षित सीमा के भीतर रखना ताकि वैश्विक रेटिंग एजेंसियां और मुद्रास्फीति नियंत्रण में रहे।
- समावेशी विकास: बढ़ती बेरोजगारी और ग्रामीण मांग में सुस्ती को दूर करने के लिए पूंजीगत व्यय और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं में निवेश बढ़ाना।
मुख्य शब्दावली
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आगे की राह
- पारदर्शिता: सांख्यिकीय डेटा की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए गणना पद्धतियों में पारदर्शिता आवश्यक है।
- राज्यों के साथ समन्वय: 16वें वित्त आयोग के तहत करों के बंटवारे में राज्यों की विशिष्ट आवश्यकताओं (जैसे केरल की भौगोलिक चुनौतियां या उत्तर-पूर्व का विकास) का ध्यान रखा जाना चाहिए।
- MSME और रोजगार: बजट का मुख्य केंद्र सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSME) को ऋण सुलभ कराना होना चाहिए, क्योंकि यही क्षेत्र सबसे अधिक रोजगार सृजित करता है।
निष्कर्ष
बजट 2026-27 केवल आय-व्यय का लेखा-जोखा नहीं, बल्कि विकसित भारत के संकल्प की दिशा में एक रोडमैप होना चाहिए। इसमें 'बाजार की वास्तविकता', 'तकनीकी नवाचार' और 'सामाजिक न्याय' के बीच एक बारीक संतुलन की आवश्यकता है।
सामान्य अध्ययन पेपर – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध
संदर्भ
वर्ष 2026 की शुरुआत वैश्विक राजनीति में भारी उथल-पुथल के साथ हुई है। अमेरिकी प्रशासन (ट्रंप 2.0) द्वारा अंतरराष्ट्रीय कानूनों की परवाह किए बिना लिए जा रहे 'एकतरफा फैसलों' ने भारत जैसे देशों को एक कठिन कूटनीतिक चौराहे पर खड़ा कर दिया है। तमाम हालिया घटनाक्रमों ने भारत की वर्तमान चुप्पी पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
'ऑन म्यूट' नीति क्या है?
कूटनीति की शब्दावली में 'ऑन म्यूट' का अर्थ है—ऐसी स्थिति जब कोई राष्ट्र अपने हितों को प्रभावित करने वाली अंतरराष्ट्रीय घटनाओं पर कोई स्पष्ट स्टैंड लेने के बजाय चुप्पी साध लेता है या केवल 'प्रक्रियात्मक' प्रतिक्रिया देता है।
- भारत वर्तमान में महत्वपूर्ण वैश्विक मुद्दों पर "नाम लिए बिना चिंता जताना" या "केवल नागरिकों की सुरक्षा तक सीमित रहना" जैसी नीति अपना रहा है।
चर्चा का कारण:
पिछले कुछ दिनों में भारत के "नॉन-रिएक्टिव मोड" के पीछे निम्नलिखित घटनाएं प्रमुख हैं:
- वेनेजुएला संकट: अमेरिका द्वारा वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को पकड़ने के लिए की गई सैन्य कार्रवाई पर भारत ने केवल "गहरी चिंता" व्यक्त की, जबकि इसे अंतरराष्ट्रीय संप्रभुता का उल्लंघन माना जा रहा है।
- ईरान पर 25% टैरिफ: अमेरिका ने ईरान के साथ व्यापार करने वाले देशों पर 25% अतिरिक्त शुल्क की घोषणा की है। भारत ने इस पर कोई आधिकारिक विरोध दर्ज नहीं किया है, जबकि चाबहार पोर्ट में भारत का बड़ा निवेश दांव पर है।
- रूस और तेल पर दबाव: अमेरिका ने भारत को रूसी तेल की खरीद बंद करने की चेतावनी दी है, अन्यथा निर्यात पर 500% तक टैरिफ लगाने की धमकी दी गई है।
वर्तमान अमेरिकी विदेश नीति
ट्रंप 2.0 के तहत अमेरिकी विदेश नीति अब 'ट्रांजेक्शनल' (सौदाकारी) और 'एकतरफा' हो गई है:
- आर्थिक राष्ट्रवाद: अन्य देशों को टैरिफ के जरिए डराना।
- प्रशासनिक प्रभुत्व: मित्र देशों को भी अपनी भू-राजनीतिक प्राथमिकताओं (जैसे ईरान/रूस को अलग-थलग करना) के साथ चलने पर मजबूर करना।
- पैक्स सिलिका: अमेरिका तकनीक और सेमीकंडक्टर के क्षेत्र में 'पैक्स सिलिका' (Pax Silica) जैसी नई व्यवस्था बना रहा है, जिसमें वह भारत जैसे देशों को शामिल करने के बदले नीतिगत रियायतें चाहता है।
भारत की नीति और बदलाव:
भारत की नीति में पिछले कुछ वर्षों में आए बदलावों को इन बिंदुओं से समझा जा सकता है:
- अतीत: 2019 में भी भारत ने अमेरिकी दबाव में ईरान और वेनेजुएला से तेल खरीदना बंद कर दिया था। तब किए गए समझौतों से भारत को कोई दीर्घकालिक लाभ नहीं हुआ, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा प्रभावित हुई।
- वर्तमान बदलाव: भारत अब रणनीतिक स्वायत्तता के बजाय सामरिक तालमेल की ओर बढ़ रहा है।
- कारण: चीन के साथ सीमा विवाद और अमेरिका के साथ प्रस्तावित 'द्विपक्षीय व्यापार समझौते' के कारण भारत वर्तमान में अमेरिका को नाराज करने का जोखिम नहीं उठाना चाहता।
भारत क्यों चुप है?
भारत की इस चुप्पी के पीछे ठोस कूटनीतिक कारण हैं:
- राष्ट्रीय सुरक्षा: चीन के खिलाफ अमेरिका का खुफिया और सैन्य सहयोग भारत के लिए अपरिहार्य है।
- आर्थिक हित: अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। भारत 'टैरिफ युद्ध' से बचकर अपने निर्यात को सुरक्षित रखना चाहता है।
- चाबहार की रियायत: भारत अमेरिका से चाबहार बंदरगाह के लिए 'प्रतिबंधों में छूट' के विस्तार पर चर्चा कर रहा है।
अंतर्राष्ट्रीय संबंधों पर भारत की ऐतहासिक पृष्ठभूमि आजादी के बाद से भारत की विदेश नीति का विकास एक 'आदर्शवाद' से शुरू होकर 'यथार्थवाद' की ओर बढ़ने की यात्रा है। इसे हम निम्नलिखित चार मुख्य चरणों में प्रभावी ढंग से समझ सकते हैं: नेहरूवादी युग (1947-1964): गुटनिरपेक्षता आजादी के तुरंत बाद दुनिया शीत युद्ध की चपेट में थी। भारत ने किसी भी सैन्य गुट (अमेरिका या सोवियत संघ) में शामिल न होने का फैसला किया।
यथार्थवाद की ओर (1964-1990): सुरक्षा और संप्रभुता नेहरू के बाद, भारत ने अपनी सुरक्षा को प्राथमिकता देना शुरू किया।
आर्थिक सुधार और रणनीतिक स्वायत्तता (1991-2014) सोवियत संघ के विघटन के बाद भारत को अपनी नीति बदलनी पड़ी।
वर्तमान युग (2014-अब तक): बहु-संरेखण वर्तमान नीति अब केवल गुटनिरपेक्ष रहने की नहीं, बल्कि सभी प्रमुख शक्तियों के साथ जुड़ने की है।
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विश्लेषण
चुप्पी हमेशा सुरक्षा नहीं देती। यदि भारत एक नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था का पक्षधर है, तो उसे अंतरराष्ट्रीय कानून के उल्लंघन पर बोलना होगा।
- प्रतिष्ठा की हानि: ग्लोबल साउथ (विकासशील देशों) के नेता के रूप में भारत की छवि प्रभावित हो सकती है।
- ब्रिक्स की चुनौती: 2026 में भारत को ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी करनी है, जहाँ ईरान और रूस जैसे देश मौजूद होंगे। वहाँ भारत का 'म्यूट मोड' उसके लिए असहज स्थिति पैदा कर सकता है।
आगे की राह
- बहु-संरेखण: भारत को किसी एक शक्ति के प्रति झुकने के बजाय अपनी 'मल्टी-एलाइनमेंट' की नीति को और मजबूत करना चाहिए।
- स्पष्ट संवाद: रूस और ईरान के साथ अपने संबंधों की अनिवार्यता को अमेरिका के सामने और अधिक स्पष्टता से रखना होगा।
- आर्थिक आत्मनिर्भरता: डॉलर पर निर्भरता कम करने के लिए स्थानीय मुद्राओं में व्यापार (जैसे रुपया-रुबल व्यापार) को तेजी से बढ़ाना चाहिए।
निष्कर्ष
कूटनीति में "मौन" कभी-कभी रणनीतिक हो सकता है, लेकिन यह लंबे समय तक "सिद्धांतहीनता" नहीं बनना चाहिए। भारत को यह समझना होगा कि एक महाशक्ति का तुष्टिकरण राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा की गारंटी नहीं है। भारत की असली ताकत उसकी स्वतंत्र सोच और रणनीतिक स्वायत्तता में है।
सामान्य अध्ययन पेपर – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध
सन्दर्भ
हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा ईरान के साथ व्यापार करने वाले देशों पर 25% टैरिफ लगाने की घोषणा और 26 अप्रैल 2026 को समाप्त हो रहे 'प्रतिबंध छूट' ने भारत के लिए एक नई कूटनीतिक चुनौती पेश कर दी है। भारत वर्तमान में वाशिंगटन के साथ चाबहार बंदरगाह को इन प्रतिबंधों से बाहर रखने के लिए गहन चर्चा कर रहा है।
चाबहार बंदरगाह
- यह बंदरगाह ईरान के दक्षिण-पूर्वी तट पर, ओमान की खाड़ी के किनारे सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत में स्थित है। यह ईरान का एकमात्र 'डीप-सी' (गहरे पानी का) बंदरगाह है, जहाँ बड़े जहाजों का आवागमन आसानी से हो सकता है।
भारत की भागीदारी
भारत का इस बंदरगाह से जुड़ाव पुराना है, लेकिन हाल के वर्षों में इसमें बड़ी प्रगति हुई है:
- शुरुआत (2003): भारत और ईरान के बीच इस बंदरगाह को विकसित करने पर पहली बार सहमति बनी थी।
- त्रिपक्षीय समझौता (2016): प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ईरान यात्रा के दौरान भारत, ईरान और अफगानिस्तान के बीच एक ऐतिहासिक समझौता हुआ।
- संचालन की शुरुआत (2018): भारत की कंपनी 'इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड' (IPGL) ने चाबहार के 'शहीद बेहिश्ती' टर्मिनल का परिचालन अपने हाथ में लिया।
- 10 वर्षीय ऐतिहासिक समझौता (मई 2024): भारत ने चाबहार के संचालन के लिए ईरान के साथ 10 साल के दीर्घकालिक अनुबंध पर हस्ताक्षर किए। यह भारत के लिए बहुत बड़ी जीत थी क्योंकि इससे पहले समझौतों का हर साल नवीनीकरण करना पड़ता था।
भारत के लिए चाबहार पोर्ट का महत्व
चाबहार केवल एक बंदरगाह नहीं, बल्कि भारत की 'कनेक्टिविटी' रणनीति का केंद्र बिंदु है:
- पाकिस्तान को बाईपास करना: भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुँचने के लिए पाकिस्तान के जमीनी रास्ते पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। यह भारत को एक स्वतंत्र व्यापारिक मार्ग प्रदान करता है।
- अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे का प्रवेश द्वार: चाबहार बंदरगाह अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो रूस और यूरोप तक माल पहुँचाने के समय और लागत को 30-40% तक कम कर सकता है।
- अफगानिस्तान में प्रभाव: तालिबान शासित अफगानिस्तान में मानवीय सहायता (जैसे गेहूं और दवाएं) पहुँचाने और वहां अपना कूटनीतिक प्रभाव बनाए रखने के लिए यह पोर्ट अनिवार्य है।
- चीन की घेराबंदी : यह पोर्ट पाकिस्तान में स्थित चीन द्वारा संचालित ग्वादर बंदरगाह से मात्र 72 किमी की दूरी पर है। यह अरब सागर में चीन की बढ़ती मौजूदगी के खिलाफ भारत का एक रणनीतिक जवाब है।
वर्तमान संकट और भारत की भूमिका
भारत इस मामले में एक "सक्रिय मध्यस्थ" और "रणनीतिक स्वायत्तता" के पैरोकार की भूमिका निभा रहा है:
- संवाद और समन्वय: विदेश मंत्रालय के माध्यम से भारत यह स्पष्ट कर रहा है कि चाबहार का उपयोग मानवीय उद्देश्यों और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए हो रहा है, न कि ईरान की सैन्य शक्ति बढ़ाने के लिए।
- वित्तीय प्रबंधन: भारत ने दूरदर्शिता दिखाते हुए चाबहार के लिए अपनी वित्तीय प्रतिबद्धताओं (लगभग $120 मिलियन) को समय से पहले व्यवस्थित करने की कोशिश की है ताकि बैंकिंग प्रतिबंधों का असर न पड़े।
- दीर्घकालिक प्रतिबद्धता: मई 2024 में भारत ने ईरान के साथ 10 साल के संचालन समझौते पर हस्ताक्षर किए, जो यह दर्शाता है कि भारत दबाव के बावजूद इस परियोजना से पीछे हटने वाला नहीं है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दृष्टिकोण
चाबहार और भारत के रुख को दुनिया अलग-अलग नजरियों से देख रही है:
हितधारक | दृष्टिकोण |
अमेरिका | ईरान पर "अधिकतम दबाव" की नीति, लेकिन भारत को एक महत्वपूर्ण सुरक्षा भागीदार के रूप में खोना नहीं चाहता। |
ईरान | भारत को एक विश्वसनीय आर्थिक साझेदार के रूप में देखता है जो उसे पश्चिमी अलगाव से बाहर निकलने में मदद कर सकता है। |
मध्य एशियाई देश | कजाकिस्तान, उजबेकिस्तान जैसे देश चाबहार को समुद्र तक पहुँचने के अपने सबसे सुरक्षित और छोटे मार्ग के रूप में देखते हैं। |
चीन | इसे अपने 'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव' (BRI) के लिए एक प्रतिस्पर्धा के रूप में देखता है। |
विश्लेषण: प्रमुख चुनौतियां
- प्रतिबंधों का दोहरा प्रभाव: यदि अमेरिका छूट नहीं बढ़ाता है, तो भारतीय शिपिंग कंपनियां और लॉजिस्टिक फर्म्स ईरान के साथ काम करने से डरेंगी।
- टैरिफ का दबाव: 25% टैरिफ भारतीय निर्यात (चावल, फार्मा) को महंगा बना देगा, जिससे द्विपक्षीय व्यापार ($1.6 बिलियन) प्रभावित हो सकता है।
- ईरान की आंतरिक अस्थिरता: ईरान में चल रहे विरोध प्रदर्शन और वहां की राजनीतिक अस्थिरता भविष्य के निवेश के लिए जोखिम पैदा करती है।
निष्कर्ष
भारत के लिए चाबहार एक 'भू-राजनीतिक आवश्यकता' है। 2026 की समय सीमा से पहले भारत को अपनी 'पड़ोस प्रथम' नीति और 'मध्य एशिया के साथ जुड़ाव' को बचाने के लिए अमेरिका को यह समझाने की जरूरत है कि चाबहार का विकास अफगानिस्तान को आतंकवाद और अस्थिरता से दूर रखने के लिए वैश्विक हित में है। भारत को अपनी "रणनीतिक स्वायत्तता" बरकरार रखते हुए अमेरिका के साथ व्यापार और ईरान के साथ कनेक्टिविटी के बीच संतुलन साधना होगा।
सामान्य अध्ययन पेपर – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध
संदर्भ
हाल ही में, माननीय उच्चतम न्यायालय ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश, जस्टिस अश्विनी कुमार वर्मा द्वारा दायर उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें लोकसभा अध्यक्ष (स्पीकर) द्वारा एक जांच समिति के 'एकतरफा' गठन को चुनौती दी गई थी। यह मामला संसदीय स्वायत्तता और न्यायिक जवाबदेही के बीच संतुलन को परिभाषित करने की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
जांच समिति
न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के तहत, आरोपों की सत्यता जांचने के लिए एक तीन सदस्यीय समिति गठित की गई है। इसमें शामिल हैं:
- न्यायमूर्ति अरविंद कुमार: उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश।
- न्यायमूर्ति मनेंद्र मोहन श्रीवास्तव: मद्रास उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश।
- बी. वासुदेव आचार्य: वरिष्ठ अधिवक्ता और प्रतिष्ठित न्यायविद्।
चर्चा में क्यों?
16 जनवरी 2026 को उच्चतम न्यायालय ने न्यायमूर्ति वर्मा की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष द्वारा "एकतरफा" तरीके से जांच समिति गठित करने को चुनौती दी थी।
जस्टिस वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी थी कि:
- संयुक्त समिति की मांग: चूंकि उनके खिलाफ महाभियोग का नोटिस लोकसभा और राज्यसभा दोनों में एक ही दिन दिया गया था, इसलिए नियम के अनुसार लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा सभापति को संयुक्त रूप से जांच समिति बनानी चाहिए थी।
- एकतरफा फैसला: उन्होंने आरोप लगाया कि लोकसभा अध्यक्ष ने राज्यसभा के फैसले का इंतजार किए बिना "एकतरफा" तरीके से समिति गठित कर दी, जो जजेस (इन्क्वायरी) एक्ट, 1968 का उल्लंघन है।
- उपसभापति के अधिकार पर सवाल: उन्होंने यह भी कहा कि राज्यसभा में नोटिस को उपसभापति ने खारिज किया था, जबकि उनके पास ऐसा करने का अधिकार नहीं था।
उच्चतम न्यायालय का दृष्टिकोण और निर्णय
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने जस्टिस वर्मा की सभी दलीलों को खारिज करते हुए कहा:
- हटाने की प्रक्रिया बाधित नहीं हो सकती: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जजों को मिले संवैधानिक संरक्षण का इस्तेमाल उन्हें हटाने की प्रक्रिया को पंगु बनाने के लिए नहीं किया जा सकता।
- सदन की स्वायत्तता: कोर्ट ने कहा कि अगर एक सदन नोटिस खारिज कर देता है, तो इसका मतलब यह नहीं कि दूसरे सदन की कार्यवाही भी रुक जाएगी। लोकसभा अध्यक्ष को स्वतंत्र रूप से समिति गठित करने का पूरा अधिकार है।
- उपसभापति का अधिकार: कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 91 का हवाला देते हुए कहा कि जब सभापति का पद खाली हो, तो उपसभापति के पास सभापति की सभी शक्तियां होती हैं।
- कोई व्यक्तिगत नुकसान नहीं: बेंच ने कहा कि जांच समिति केवल रिपोर्ट देगी, अंतिम फैसला संसद के सदस्यों को ही लेना है। इसलिए, वर्तमान में जस्टिस वर्मा के किसी मौलिक अधिकार का हनन नहीं हुआ है।
मुख्य विवाद
- यह पूरा मामला मार्च 2025 में शुरू हुआ था, जब दिल्ली में जस्टिस यशवंत वर्मा के आधिकारिक आवास पर आग लग गई थी।
- आग बुझाने के दौरान दमकलकर्मियों को वहां से भारी मात्रा में जले हुए और आधे जले हुए नोटों के बंडल मिले थे। इस घटना के बाद उन पर भ्रष्टाचार और कदाचार के आरोप लगे।
उच्चतम न्यायालय के निर्णय का प्रभाव
इस निर्णय ने स्पष्ट कर दिया है कि न्यायिक स्वतंत्रता का अर्थ जवाबदेही से बचना नहीं है। इससे भविष्य में किसी भी न्यायाधीश के विरुद्ध चल रही जांच को तकनीकी आधार पर रोकने की कोशिशों पर विराम लगेगा।
निष्कासन की प्रक्रिया:
संविधान के अनुच्छेद 124(4) और 218 के तहत उच्चतर न्यायपालिका के न्यायाधीशों को हटाने की प्रक्रिया इस प्रकार है:
- प्रस्ताव की शुरुआत: लोकसभा के 100 या राज्यसभा के 50 सदस्यों के हस्ताक्षर वाला नोटिस।
- पीठासीन अधिकारी का विवेक: अध्यक्ष या सभापति इसे स्वीकार या अस्वीकार कर सकते हैं।
- जांच समिति: आरोपों की जांच के लिए 3 सदस्यीय समिति।
- संसदीय चर्चा और मतदान: यदि रिपोर्ट में दोषी पाया जाता है, तो सदन में मतदान होता है।
- विशेष बहुमत: प्रत्येक सदन की कुल सदस्यता का बहुमत और उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों का 2/3 बहुमत।
- राष्ट्रपति का आदेश: अंत में राष्ट्रपति द्वारा निष्कासन का आदेश जारी किया जाता है।
संवैधानिक प्रभाव
यह मामला शक्ति के पृथक्करण और चेक एंड बैलेंस के सिद्धांत को पुष्ट करता है। यह दर्शाता है कि कार्यपालिका या न्यायपालिका का कोई भी सदस्य कानून से ऊपर नहीं है।
चुनौतियां और चिंताएं
- प्रक्रिया की जटिलता: भारत के इतिहास में आज तक किसी भी न्यायाधीश को इस प्रक्रिया के माध्यम से हटाया नहीं जा सका है, जो इसकी जटिलता को दर्शाता है।
- राजनीतिकरण: महाभियोग की प्रक्रिया में राजनीतिक दलों की भागीदारी से निष्पक्षता पर सवाल उठ सकते हैं।
- छवि पर प्रभाव: इस तरह के मामले जनता का न्यायपालिका पर से विश्वास कम कर सकते हैं।
पुराने मामले:
भारत में जजों के खिलाफ महाभियोग बहुत कम हुआ है और अब तक किसी भी सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के जज को महाभियोग के जरिए हटाया नहीं गया है, लेकिन कुछ मामलों में महाभियोग की प्रक्रिया शुरू हुई थी और जजों ने इस्तीफा देकर प्रक्रिया से बचा लिया।
- न्यायमूर्ति सौमित्र सेन (कलकत्ता हाई कोर्ट): 2011 में राज्यसभा ने उन्हें महाभियोग प्रस्ताव के तहत दोषी पाया। उन पर कोर्ट के द्वारा नियुक्त काम में धन के गलत इस्तेमाल और तथ्यों में गड़बड़ी के आरोप लगे थे। हालांकि लोकसभा में वोटिंग से पहले ही उन्होंने इस्तीफा दे दिया, इसलिए महाभियोग पूरी तरह नहीं हो सका।
- न्यायमूर्ति पी.डी. दिनाकरण (सिक्किम हाई कोर्ट): उन पर भ्रष्टाचार और दुरुपयोग के गंभीर आरोप लगे और महाभियोग प्रक्रिया शुरू हो गई। लेकिन 2011 में उन्होंने इस्तीफा दे दिया, इससे पहले कि प्रक्रिया पूरी हो पाती।
- न्यायमूर्ति ए.एम. भट्टाचार्जी (बॉम्बे हाई कोर्ट): 1995 में उन पर एक विदेशी प्रकाशक से अधिक रॉयल्टी लेने संबंधी आरोप लगे और वकीलों के दबाव के बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया।
ये मामले दिखाते हैं कि ज्यादातर जज महाभियोग प्रक्रिया से पहले स्वयं इस्तीफा दे देते हैं, ताकि महाभियोग की नौबत ही न आए और वे पद से हटने से पहले ही बाहर हो जाएँ। लेकिन न्यायमूर्ति वर्मा का इस्तीफा न देना इस मामले को अलग बनाता है, क्योंकि वे अब भी महाभियोग की प्रक्रिया का सामना कर रहे हैं।
विश्लेषण
न्यायमूर्ति वर्मा मामले में सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख यह संदेश देता है कि "संस्थागत अखंडता" व्यक्तिगत सुरक्षा से ऊपर है। जजों को दी गई संवैधानिक सुरक्षा उन्हें केवल अनुचित बाहरी दबाव से बचाने के लिए है, न कि गंभीर कदाचार की जांच से बचने के लिए।
आगे की राह
- न्यायिक मानक और जवाबदेही विधेयक: लंबित सुधारों को लागू करने की आवश्यकता है ताकि छोटी शिकायतों के लिए भी एक स्पष्ट तंत्र हो।
- समयबद्ध जांच: जांच समिति और संसदीय कार्यवाही के लिए एक निश्चित समय सीमा तय होनी चाहिए।
- आंतरिक तंत्र: न्यायपालिका को अपनी "इन-हाउस" जांच प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी बनाना चाहिए।
निष्कर्ष
न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा मामला भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता का परीक्षण है। उच्चतम न्यायालय का निर्णय यह सुनिश्चित करता है कि न्याय की रक्षा करने वाले स्वयं न्याय के दायरे से बाहर नहीं हैं। यह "कानून के शासन" की सर्वोच्चता को स्थापित करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है।