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नालसार विवाद: असंतोष व्यक्त करने का अधिकार और बीसीआई के अति-अधिकार की समीक्षा

सामान्य अध्ययन पेपर – II:  शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध।


संदर्भ

किसी भी लोकतंत्र में विचारों की अभिव्यक्ति और असंतोष का अधिकार मौलिक अधिकारों का मुख्य हिस्सा है। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश (CJI) और देश के एक प्रतिष्ठित राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों के बीच उत्पन्न संवाद के मामले में भारतीय बार परिषद (BCI) का हस्तक्षेप संवैधानिक अधिकारों और संस्थागत स्वायत्तता पर चर्चा का विषय बन गया है।

बीसीआई क्या है?

भारतीय बार परिषद (BCI) 'अधिवक्ता अधिनियम, 1961' के तहत गठित एक वैधानिक निकाय है। इसका मुख्य कार्य भारत में कानूनी पेशे और कानूनी शिक्षा के मानकों को तय विनियमित करना है। यह राज्य बार परिषदों के कार्यों की देखरेख करती है और अधिवक्ताओं के लिए पेशेवर आचार संहिता निर्धारित करती है।

चर्चा के कारण

  • शीर्ष अदालत का कड़ा रुख: सर्वोच्च न्यायालय के तीन जजों की पीठ (जिसकी अध्यक्षता स्वयं CJI कर रहे थे) ने बीसीआई द्वारा नालसार (NALSAR) के छात्रों के खिलाफ की गई कार्रवाई को अनुचित हस्तक्षेप करार दिया।

  • नामांकन पर रोक का प्रयास: बीसीआई ने एक पत्र जारी कर नालसार के 2026 बैच के छात्रों का राज्य बार परिषदों में नामांकन रोकने का निर्देश दिया था, जिसे तीखी आलोचना के बाद वापस ले लिया गया।
  • सुप्रीम कोर्ट का निर्देश: अदालत ने बीसीआई को छात्रों या विश्वविद्यालय प्रशासन के खिलाफ किसी भी दंडात्मक कार्रवाई से रोक दिया है और दो सप्ताह में स्पष्टीकरण हलफनामा माँगा है।

विवाद/मुद्दा क्या है?

मूल विवाद तब शुरू हुआ जब नालसार विश्वविद्यालय के कुछ छात्रों ने दीक्षांत समारोह में मुख्य न्यायाधीश को आमंत्रित करने पर अपनी असहमति और विरोध व्यक्त किया। इस पर बीसीआई के अध्यक्ष ने विश्वविद्यालय के कुलपति को पत्र लिखकर विरोध के पीछे के लोगों की पहचान के लिए जांच रिपोर्ट मांगी और 2026 बैच के नामांकन पर रोक लगाने का निर्देश दे दिया। बीसीआई के इस कदम को छात्रों के अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार पर आघात और 'भय का माहौल' पैदा करने वाला माना गया।

नालसार के बारे में

'नेशनल एकेडमी ऑफ लीगल स्टडीज एंड रिसर्च' (NALSAR), हैदराबाद, तेलंगाना में स्थित भारत के प्रमुख राष्ट्रीय कानून विश्वविद्यालयों (NLUs) में से एक है। इसकी स्थापना 1998 में एक राज्य अधिनियम के तहत की गई थी। यह विश्वविद्यालय कानूनी शिक्षा में उत्कृष्टता, शोध और छात्रों में स्वतंत्र एवं विश्लेषणात्मक सोच को बढ़ावा देने के लिए जाना जाता है।

बीसीआई के पास अधिकार और सीमाएँ

  • कानूनी दायरा: अधिवक्ता अधिनियम, 1961 के तहत बीसीआई की शक्तियाँ वकील के रूप में पंजीकृत अधिवक्ताओं के आचरण और विधि शिक्षा के पाठ्यक्रम/मानकों के नियमन तक सीमित हैं।

  • अधिकार क्षेत्र से बाहर: बीसीआई के पास किसी विश्वविद्यालय के छात्रों के आंतरिक अनुशासनिक मामलों को नियंत्रित करने या विश्वविद्यालयों को अपने छात्रों के खिलाफ जांच का आदेश देने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।
  • अयोग्यता के तय नियम: किसी स्नातक को अधिवक्ता के रूप में नामांकित होने से केवल नैतिक अधमता से जुड़े अपराध में दोषसिद्धि या विशेष वैधानिक प्रावधानों के तहत ही रोका जा सकता है; 'वैचारिक असंतोष' नामांकन रद्द करने का आधार नहीं हो सकता।

पुराने मामले/पूर्व उदाहरण

  • अति-अधिकार का इतिहास: यह पहली बार नहीं है जब बीसीआई के नियमों को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई है।

  • इंडियन काउंसिल ऑफ लीगल एड एंड एडवाइस बनाम बीसीआई (1995): इस ऐतिहासिक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बीसीआई द्वारा बनाए गए उस नियम को रद्द कर दिया था, जिसमें 45 वर्ष से अधिक आयु के व्यक्तियों को अधिवक्ता के रूप में नामांकित होने से रोकने का प्रयास किया गया था। अदालत ने माना था कि बीसीआई अपनी वैधानिक शक्तियों की सीमा से बाहर जाकर नए प्रतिबंध नहीं थोप सकती।

अन्य महत्वपूर्ण बिंदु

  • भय का माहौल: भले ही बीसीआई ने अपने निर्देश वाले पत्र वापस ले लिए हैं, लेकिन इस तरह के कदमों से छात्रों और भावी वकीलों के बीच अपनी राय व्यक्त करने को लेकर भय का माहौल बनता है।

  • संवैधानिक अधिकार: भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) (वाक एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 19(1)(g) (कोई भी आजीविका या पेशा चुनने का अधिकार) नागरिकों को यह सुरक्षा प्रदान करते हैं।

आगे का रास्ता

  • संस्थागत स्वायत्तता का सम्मान: बीसीआई को विश्वविद्यालयों के आंतरिक मामलों और छात्रों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप करने से बचना चाहिए।

  • सहानुभूतिपूर्ण संवाद: मुख्य न्यायाधीश और छात्रों के बीच के विषय को संवाद के जरिए ही सुलझाया जाना चाहिए, कि प्रशासनिक या दंडात्मक दबाव बनाकर।
  • शक्तियों का संतुलन: कानूनी शिक्षा का उद्देश्य केवल कानून पढ़ाना नहीं, बल्कि सवाल पूछने की क्षमता विकसित करना है। नियामक संस्थाओं को अपनी वैधानिक सीमाओं का पालन करते हुए लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करनी चाहिए।

निष्कर्ष

यह मामला स्पष्ट करता है कि असंतोष व्यक्त करने का मौलिक अधिकार किसी भी व्यक्ति के आजीविका या पेशे के अधिकार को छीनने का आधार नहीं बन सकता। बीसीआई जैसी नियामक संस्थाओं को अपनी शक्तियों की सीमाओं का पालन करते हुए छात्रों में निडर वैचारिक अभिव्यक्ति को प्रोत्साहित करना चाहिए, कि दंडात्मक कदमों से भय का वातावरण निर्मित करना चाहिए।


जनगणना 2027: स्वतंत्र भारत की पहली व्यापक जातिगत डिजिटल जनगणना की समीक्षा

सामान्य अध्ययन पेपर – II:  शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध।


संदर्भ

गृह मंत्रालय के अधीन भारत के महारजिस्ट्रार एवं जनगणना आयुक्त (RG&CCI) ने गृह मंत्रालय की आधिकारिक अधिसूचना के तहत जनगणना 2027 के द्वितीय चरण (जनसंख्या गणना) हेतु 40 प्रश्नों की आधिकारिक अधिसूचना जारी की है। इस ऐतिहासिक पहल के साथ ही लद्दाख, जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड तथा हिमाचल प्रदेश के बर्फबारी वाले क्षेत्रों में दूसरे चरण का कार्य प्रारंभ हो चुका है।

जनगणना क्या है?

जनगणना किसी देश या एक परिभाषित क्षेत्र में एक निश्चित समय पर सभी व्यक्तियों के जनसांख्यिकी, सामाजिक और आर्थिक आंकड़ों को एकत्रित, संकलित, विश्लेषित और प्रकाशित करने की संपूर्ण प्रक्रिया है। भारत में जनगणना संवैधानिक प्रावधानों के तहत 'जनगणना अधिनियम, 1948' एवं 'जनगणना नियम, 1990' द्वारा संचालित की जाती है तथा यह संघ सूची का विषय है।

चर्चा में क्यों?

  • 40 प्रश्नों की अधिसूचना: जनगणना के द्वितीय चरण के लिए प्रश्नों की संख्या को बढ़ाकर 40 कर दिया गया है।

  • स्वतंत्र भारत में पहली बार जातिगत गणना: प्रश्न संख्या 10 "SC/ST/Caste" के तहत 1931 के बाद पहली बार सामान्य/ओबीसी श्रेणियों के लिए खुला कॉलम प्रदान किया गया है, जिसमें उत्तरदाता द्वारा घोषित जाति दर्ज होगी।
  • नए डिजिटल व्यक्तिगत डेटा फ़ील्ड: पहली बार डिजिटल साक्षरता, कोविड-19 टीकाकरण स्थल, बैंक खातों की संख्या, [आधार रेडैक्टेड], पासपोर्ट, ड्राइविंग लाइसेंस और मतदाता पहचान पत्र जैसे विवरण जोड़े गए हैं।

जनगणना 2027 के नए प्रावधान

  • दो चरणों में संचालन:

    1. मकान सूचीकरण एवं आवास गणना (अप्रैलसितंबर 2026)
    2. जनसंख्या गणना (फरवरी 2027; बर्फबारी वाले क्षेत्रों के लिए संदर्भ तिथि 1 अक्टूबर 2026)
  • डिजिटल जनगणना और स्व-गणना: उत्तरदाता स्वयंस्व-परिगणनापोर्टल के माध्यम से डेटा दर्ज कर सकते हैं या प्रगणक मोबाइल ऐप से डेटा संग्रह करेंगे।
  • खुला कॉलम डेटा संग्रह: जाति पंजीकरण के लिए पहले से निर्धारित राज्य-वार सूची के बजाय खुला टेक्स्ट कॉलम रखा गया है।

2011 जनगणना बनाम 2027 जनगणना

पैरामीटर

2011 जनगणना

2027 जनगणना

प्रश्नों की संख्या

29 प्रश्न

40 प्रश्न

जाति गणना

केवल अनुसूचित जाति (SC) एवं अनुसूचित जनजाति (ST)

SC, ST तथा अन्य सभी जातियों के लिए 'खुला कॉलम'

डेटा संग्रह का माध्यम

पूरी तरह से कागजी

पूर्णतः डिजिटल (मोबाइल ऐप एवं स्व-गणना पोर्टल)

डिजिटल पहचान संबंधी डेटा

शामिल नहीं थे

[आधार रेडैक्टेड], बैंक खाते, डिजिटल साक्षरता कोविड वैक्सिनेशन शामिल


जनगणना का इतिहास एवं महत्व

  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: भारत में प्रथम गैर-समकालिक जनगणना 1872 में लॉर्ड मेयो के काल में तथा प्रथम पूर्ण समकालिक जनगणना 1881 में लॉर्ड रिपन के काल में हुई थी। वर्ष 1931 अंतिम जनगणना थी जिसमें सभी जातियों के आंकड़े एकत्र किए गए थे।

  • महत्व:
    • नीति निर्माण: लक्षित कल्याणकारी योजनाओं (Targeted Welfare) की सटीक मैपिंग।
    • परिसीमन एवं प्रतिनिधित्व: संवैधानिक प्रावधानों के तहत लोकसभा/विधानसभा सीटों के भावी परिसीमन का आधार।
    • संसाधन आवंटन: वित्त आयोग द्वारा राज्यों के मध्य करों के बंटारे हेतु जनसांख्यिकीय आधार।

प्रमुख चिंताएं

  • खुले कॉलम से डेटा विसंगति: 2011 के सामाजिक-आर्थिक और जाति सर्वेक्षण (SECC) में खुले कॉलम के कारण 46 लाख से अधिक जातियों/उपजातियों के नाम सामने आए थे, जिससे डेटा वर्गीकरण जटिल हो गया था।

  • डेटा गोपनीयता सुरक्षा: [आधार रेडैक्टेड], पासपोर्ट और बैंक खातों जैसे व्यक्तिगत डेटा के एकत्रीकरण से निजता के अधिकार और डेटा ब्रीच का जोखिम।
  • सहानुभूति प्रामाणिकता का अभाव: पूर्व-परिभाषित सूची होने से आंकड़ों के विश्लेषण और सत्यापन में अत्यधिक समय लग सकता है।

विश्लेषण

जनगणना 2027 केवल एक जनसांख्यिकीय गिनती होकर भारत के सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य को नया रूप देने वाला एक क्रांतिकारी कदम है। डिजिटल साधनों के समावेश से डेटा प्रोसेसिंग में तेजी आएगी और मानव निर्मित त्रुटियां कम होंगी। हालांकि, जातिगत डेटा संग्रह में वैज्ञानिक मानकीकरण का अभाव और पहचान दस्तावेजों के एकत्रीकरण से उत्पन्न निजता की चुनौतियां इसके क्रियान्वयन में मुख्य बाधाएं बन सकती हैं।

आगे की राह

  • डेटा मानकीकरण सॉफ्टवेयर: खुले कॉलम में प्राप्त जातिगत प्रविष्टियों के प्रसंस्करण हेतु कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित 'फ़ज़ी लॉजिक' और प्राकृतिक भाषा प्रसंस्करण (NLP) का उपयोग किया जाना चाहिए।

  • कठोर डेटा सुरक्षा फ्रेमवर्क: व्यक्तिगत पहचान से जुड़े आंकड़ों की सुरक्षा के लिए 'डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (DPDP) अधिनियम' के मानकों का कड़ाई से अनुपालन सुनिश्चित किया जाए।
  • प्रगणक प्रशिक्षण: 30 लाख से अधिक प्रगणकों को जातिगत प्रविष्टियों और डिजिटल ऐप संचालन का गहन प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।

निष्कर्ष

डिजिटल तकनीक और समावेशी डेटा फ़ील्ड्स से लैस जनगणना 2027 भारत में साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण की दिशा में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर सिद्ध होगी। यदि डेटा गोपनीयता और जातिगत आंकड़ों के सटीक मानकीकरण को कुशलता से संभाला जाए, तो यह अभ्यास न्यायसंगत सामाजिक विकास को अभूतपूर्व गति प्रदान करेगा।