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सामान्य अध्ययन पेपर – III  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन


संदर्भ

31 दिसंबर 2025 को भारत के रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने वर्ष का अंत एक बड़ी सैन्य उपलब्धि के साथ किया। ओडिशा के तट पर एकीकृत परीक्षण रेंज (ITR), चांदीपुर से दो स्वदेशी 'प्रलय' (Pralay) मिसाइलों का एक ही लॉन्चर से 'साल्वो लॉन्च' सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। यह परीक्षण 'यूजर इवैल्यूएशन ट्रायल' का हिस्सा था, जो इस मिसाइल के भारतीय सेना में शीघ्र शामिल होने का संकेत देता है।

क्या है 'साल्वो लॉन्च' और इसका महत्व?

सैन्य शब्दावली में 'साल्वो' का अर्थ हैएक ही लक्ष्य या क्षेत्र पर बहुत कम समय के अंतराल में एक के बाद एक कई मिसाइलें दागना।

  • रणनीतिक उद्देश्य: इसका मुख्य उद्देश्य दुश्मन की मिसाइल रक्षा प्रणाली (जैसे S-300 या S-400) को 'ओवरलोड' करना है। जब एक साथ दो मिसाइलें आती हैं, तो रक्षा प्रणाली के लिए दोनों को एक साथ इंटरसेप्ट करना लगभग असंभव हो जाता है, जिससे लक्ष्य के विनाश की गारंटी बढ़ जाती है।

'प्रलय' मिसाइल: तकनीकी विशेषताएँ

'प्रलय' भारत की पहली स्वदेशी सतह-से-सतह पर मार करने वाली क्वाजी-बैलिस्टिक मिसाइल है।

  • मारक क्षमता: 150 किलोमीटर से 500 किलोमीटर (कम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल - SRBM)
  • पेलोड क्षमता: यह 350 से 700 किलोग्राम तक के पारंपरिक हथियार ले जाने में सक्षम है।
  • ईंधन प्रणाली: यह ठोस प्रणोदक रॉकेट मोटर द्वारा संचालित है, जो इसे त्वरित प्रतिक्रिया क्षमता प्रदान करती है।
  • नेविगेशन: इसमें अत्याधुनिक नेविगेशन और एकीकृत एवियोनिक्स प्रणाली लगी है, जो इसे पिन-पॉइंट सटीकता प्रदान करती है।

क्वाजी-बैलिस्टिक तकनीक: दुश्मन के लिए अभेद्य

पारंपरिक बैलिस्टिक मिसाइलें एक परवलयिक पथ का अनुसरण करती हैं, जिसका अनुमान लगाना आसान होता है। लेकिन 'प्रलय' एक क्वाजी-बैलिस्टिक मिसाइल है।

  • यह हवा में अपना पथ बदलने में सक्षम है।
  • यह उड़ान के अंतिम चरण में दुश्मन की रडार और इंटरसेप्टर मिसाइलों को चकमा देने के लिए अपनी दिशा बदल सकती है, जिससे इसे मार गिराना अत्यंत कठिन हो जाता है।

सामरिक महत्व और 'रॉकेट फोर्स' की संकल्पना

भारत वर्तमान में अपनी सैन्य शक्ति को पुनर्गठित कर रहा है, और 'प्रलय' इसमें केंद्रीय भूमिका निभाएगी:

  • रॉकेट फोर्स का आधार: भारत एक समर्पित 'रॉकेट फोर्स' बनाने की योजना पर काम कर रहा है। 'प्रलय' इस बल का मुख्य आधार होगी, जो लंबी दूरी की तोपों और क्रूज मिसाइलों (जैसे ब्रह्मोस) के बीच के अंतर को भरेगी।
  • LAC और LoC पर प्रभाव: चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) के पास पहले से ही 'रॉकेट फोर्स' (PLARF) है। प्रलय मिसाइल की तैनाती से वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) और नियंत्रण रेखा (LoC) पर भारत की रक्षात्मक और आक्रामक स्थिति काफी मजबूत होगी।
  • चीन और रूस के समकक्ष: यह मिसाइल चीन की 'डोंगफेंग-12' (DF-12) और रूस की प्रसिद्ध 'इस्कंदर' मिसाइल प्रणाली का भारतीय उत्तर है।

आत्मनिर्भर भारत और रक्षा निर्यात

'प्रलय' का विकास पूरी तरह से स्वदेशी है, जो 'आत्मनिर्भर भारत' अभियान की बड़ी सफलता है। यह केवल हमारी आयात पर निर्भरता कम करती है, बल्कि भविष्य में मित्र देशों को निर्यात की संभावनाएं भी खोलती है, जो कम दूरी की शक्तिशाली रक्षा प्रणालियों की तलाश में हैं।

आगे की राह

  • बड़े पैमाने पर उत्पादन: अब जबकि यूजर ट्रायल सफल रहे हैं, रक्षा मंत्रालय को इसके बड़े पैमाने पर उत्पादन और विभिन्न रेजिमेंटों में इसके एकीकरण पर ध्यान देना चाहिए।
  • साइलो और मोबाइल लॉन्चर: भविष्य में इसे भूमि आधारित मोबाइल लॉन्चर के साथ-साथ अन्य प्लेटफार्मों से भी लॉन्च करने की क्षमता विकसित करना महत्वपूर्ण होगा।
  • तकनीकी अपग्रेड: इसकी मारक क्षमता को 500 किमी से थोड़ा और बढ़ाने और इसके रडार सिग्नेचर को कम करने पर शोध जारी रहना चाहिए।

निष्कर्ष

'प्रलय' मिसाइल का सफल साल्वो लॉन्च केवल एक तकनीकी परीक्षण नहीं, बल्कि भारत की 'सक्रिय प्रतिरोध' नीति का एक सशक्त प्रदर्शन है। 2026 की पूर्व संध्या पर यह सफलता भारतीय वैज्ञानिकों और सेना के अटूट संकल्प को दर्शाती है। यह मिसाइल केवल सीमाओं की रक्षा करेगी, बल्कि दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन को भारत के पक्ष में बनाए रखने में निर्णायक भूमिका निभाएगी।

सामान्य अध्ययन पेपर – III  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन


संदर्भ

हाल ही में पूर्व इसरो प्रमुख एस. सोमनाथ ने भारत के अंतरिक्ष सफर को 'लोकतांत्रिक उपयोगिता' करार दिया है। जून 2025 में अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) पर ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला द्वारा तिरंगा फहराना और प्रधानमंत्री मोदी का इसे "अमृत काल का निर्णायक अध्याय" कहना, यह सिद्ध करता है कि अंतरिक्ष अब केवल प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं, बल्कि भारत की राष्ट्रीय पहचान और आकांक्षाओं का हिस्सा बन चुका है।

भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम

भारत के अंतरिक्ष सफर की शुरुआत 1960 के दशक में एक चर्च (थुम्बा) से हुई थी, जो आज 'न्यू स्पेस' युग का नेतृत्व कर रहा है।

  • आरंभिक चरण: 1969 में इसरो (ISRO) की स्थापना और 1975 में 'आर्यभट्ट' का प्रक्षेपण। शुरुआती दौर में ध्यान केवल सामाजिक लाभ (टेलीविजन, शिक्षा, कृषि) पर था।
  • विकास का दौर: PSLV (इसरो का वर्कहॉर्स) और GSLV का विकास, जिसने भारत को उपग्रह प्रक्षेपण में आत्मनिर्भर बनाया।
  • आधुनिक युग: 2014 में मंगलयान (MOM) की पहले ही प्रयास में सफलता और 2023 में चंद्रयान-3 की दक्षिणी ध्रुव पर ऐतिहासिक लैंडिंग।

चर्चा में क्यों?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने हालिया भाषणों में अंतरिक्ष क्षेत्र को 'अमृत काल' की प्रगति का मुख्य स्तंभ बताया है।

  • अक्सियम-4 मिशन (जून 2025): ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला का ISS दौरा भारत की मानव अंतरिक्ष उड़ान क्षमता के प्रति वैश्विक विश्वास को दर्शाता है।
  • स्पेस पॉलिसी 2023 का प्रभाव: निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ने से भारत अब "प्रदाता" की भूमिका में है।
  • राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस: 23 अगस्त (चंद्रयान-3 की लैंडिंग तिथि) को राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस के रूप में मनाना युवाओं को विज्ञान के प्रति प्रेरित कर रहा है।

प्रमुख मिशन, उनकी महत्ता और उपलब्धियाँ

  • चंद्रयान श्रृंखला: चंद्रयान-1 ने चंद्रमा पर पानी खोजा, चंद्रयान-2 ने उच्च-सटीक मानचित्रण किया और चंद्रयान-3 ने 'सॉफ्ट लैंडिंग' की तकनीक सिद्ध की।
  • आदित्य-L1: सूर्य का अध्ययन करने वाला भारत का पहला मिशन, जो सौर मौसम को समझने में मदद कर रहा है।
  • गगनयान: भारत का पहला मानव मिशन, जो 2026 के अंत तक प्रस्तावित है। यह भारत को उन चुनिंदा देशों (अमेरिका, रूस, चीन) की श्रेणी में खड़ा कर देगा जिनके पास मानव को अंतरिक्ष में भेजने की क्षमता है।

वैश्विक परिदृश्य

  • तुलनात्मक लाभ: जहाँ नासा और ईएसए के मिशन अरबों डॉलर के होते हैं, वहीं इसरो 'मितव्ययी नवाचार' के लिए जाना जाता है।
  • प्रतिस्पर्धा: स्पेस-एक्स और चीन के बढ़ते प्रभुत्व के बीच भारत अपने 'लॉन्च ऑन डिमांड' और निजी स्टार्टअप्स (जैसे स्काईरूट, अग्निकुल) के माध्यम से बाजार में अपनी जगह बना रहा है।

भविष्य की योजनाएं

इसरो ने 2047 तक के लिए एक महत्वाकांक्षी खाका तैयार किया है:

  • भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन (BAS): 2035 तक भारत का अपना स्वयं का अंतरिक्ष केंद्र स्थापित करना।
  • भारतीय चंद्रमा मिशन (चंद्रयान-4): चंद्रमा से नमूने वापस लाने की योजना।
  • शुक्रयान-1: शुक्र ग्रह के वायुमंडल का अध्ययन।
  • चंद्रमा पर मानव: 2040 तक भारतीय नागरिक को चंद्रमा की सतह पर उतारने का लक्ष्य।

विश्लेषण

भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम एक 'प्रतिष्ठा' से हटकर अब एक 'रणनीतिक आवश्यकता' बन गया है।

  • आर्थिक पहलू: वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में भारत की हिस्सेदारी 2% से बढ़ाकर 10% करने का लक्ष्य है।
  • सामरिक पहलू: 'स्पेस डिफेंस' और सैटेलाइट कनेक्टिविटी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अपरिहार्य हैं।
  • चुनौती: मलबे का प्रबंधन और निजी क्षेत्र के लिए स्पष्ट नियामक ढांचे की आवश्यकता अभी भी एक चुनौती बनी हुई है।

आगे की राह

  • पीपीपी मॉडल: निजी कंपनियों को केवल पुर्जे बनाने तक सीमित रखकर उन्हें पूर्ण मिशन सौंपने होंगे।
  • अंतरिक्ष कूटनीति: दक्षिण एशियाई उपग्रह जैसी पहलों को और विस्तार देना चाहिए ताकि 'ग्लोबल साउथ' का नेतृत्व किया जा सके।
  • प्रतिभा पलायन रोकना: युवा वैज्ञानिकों को अनुसंधान के लिए बेहतर वित्तीय और तकनीकी संसाधन उपलब्ध कराना।

निष्कर्ष

2026 का भारत अंतरिक्ष क्षेत्र में अब केवल एक भागीदार नहीं, बल्कि एक 'नियम-निर्माता' है। एस. सोमनाथ के शब्दों में, अंतरिक्ष अब 'लोकतांत्रिक उपयोगिता' है। भारत की यह यात्रा साइकिल पर रॉकेट के पुर्जे ढोने से लेकर दुनिया के पहले दक्षिणी ध्रुव लैंडर तक की एक ऐसी गाथा है, जो आत्मनिर्भरता और वैज्ञानिक साहस का प्रतीक है। आने वाले दशक में भारत का 'भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन' और 'मून मिशन' केवल विज्ञान की सीमाओं को बढ़ाएंगे, बल्कि 140 करोड़ भारतीयों के सपनों को एक नई ऊंचाई देंगे।

सामान्य अध्ययन पेपर  – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध

सामान्य अध्ययन पेपर – III  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन


संदर्भ

भारत में सड़क दुर्घटनाओं का इतिहास विकास और विस्थापन की एक दुखद कहानी रहा है। 1960 के दशक में जहाँ वाहनों की संख्या सीमित थी, वहीं 21वीं सदी में वाहनों के विस्फोट ने सड़कों को 'डेथ ट्रैप' में बदल दिया है। पिछले एक दशक में भारत ने बुनियादी ढांचे (एक्सप्रेसवेज और हाइवेज) में अभूतपूर्व प्रगति की है, लेकिन उसी अनुपात में दुर्घटनाओं की दर में कमी नहीं आई है। 'ब्रासीलिया घोषणापत्र' पर हस्ताक्षर करने के बावजूद, भारत वैश्विक सड़क मृत्यु दर में शीर्ष पर बना हुआ है, जो हमारी नीतिगत और व्यवहारिक विफलताओं को दर्शाता है।

भारत में सड़क दुर्घटनाएं:

  • सड़क दुर्घटना भारत में अकाल मृत्यु का सबसे बड़ा कारण बनकर उभरी है।
  • भारत के पास दुनिया के कुल वाहनों का मात्र 1% है, लेकिन दुनिया की कुल सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों का 11% हिस्सा भारत में होता है।
  • यह दर्शाता है कि हमारी सड़कें प्रति वाहन के हिसाब से दुनिया में सबसे अधिक असुरक्षित हैं।

चर्चा में क्यों?

1 जनवरी 2026 का दिन भारत के लिए एक राष्ट्रीय शोक की तरह रहा। नए साल के जश्न के दौरान देश भर में 400 से अधिक सड़क दुर्घटनाएं दर्ज की गईं, जिनमें 150 से अधिक लोगों ने अपनी जान गंवाई

  • मध्य प्रदेश: अकेले एमपी में 100 से अधिक दुर्घटनाएं हुईं, जहाँ कटनी और सिवनी में मासूम बच्चों सहित 8 लोगों की मौत हुई।
  • उत्तर भारत: घने कोहरे के कारण NH-44 और यमुना एक्सप्रेसवे पर दर्जनों वाहन आपस में टकराए।
  • प्रमुख कारण: नशे में ड्राइविंग तेज रफ्तार और कोहरे के दौरान सुरक्षा मानकों की अनदेखी इस दिन की चर्चा का मुख्य केंद्र रहे।

आंकड़ों का आईना: NCRB और अन्य रिपोर्ट

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो और सड़क परिवहन मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट के आधार पर स्थिति निम्नलिखित है:

  • सालाना मौतें: भारत में हर साल लगभग 1.5 लाख से 1.7 लाख लोग सड़क हादसों में मरते हैं।
  • दैनिक औसत: भारत में प्रतिदिन लगभग 450-500 लोग सड़क पर दम तोड़ते हैं, यानी हर 3 मिनट में एक मौत
  • सर्वाधिक प्रभावित वर्ग: मरने वालों में 70% लोग 18 से 45 वर्ष के आयु वर्ग के होते हैं (राष्ट्र की उत्पादक जनसंख्या)
  • वाहन का प्रकार: दोपहिया वाहन सवार (45%) सबसे अधिक असुरक्षित हैं, उसके बाद पैदल चलने वाले लोग आते हैं।

दुर्घटनाओं के कारण और बहुआयामी प्रभाव

कारण:

  • मानवीय चूक: ओवरस्पीडिंग (60% से अधिक हादसों का कारण), हेलमेट/सीट बेल्ट लगाना और ड्राइविंग के दौरान फोन का उपयोग।
  • सड़क इंजीनियरिंग: 'ब्लैक स्पॉट्स' (असुरक्षित मोड़), दोषपूर्ण सड़क डिजाइन और खराब रोशनी।
  • पर्यावरणीय कारक: कोहरा, भारी बारिश और आवारा पशु।

सामाजिक-आर्थिक प्रभाव: एक इंसान की मृत्यु केवल एक संख्या नहीं है। जब परिवार का एकमात्र कमाने वाला सदस्य मरता है, तो पूरा परिवार आर्थिक संकट और मानसिक आघात में डूब जाता है।

  • आर्थिक प्रभाव: सड़क दुर्घटनाओं के कारण भारत की जीडीपी (GDP) को प्रतिवर्ष 3% से 5% का नुकसान होता है।
  • मानवीय प्रभाव: बच्चे अनाथ हो जाते हैं, बुजुर्ग बेसहारा हो जाते हैं, और गरीबी का एक दुष्चक्र शुरू हो जाता है।

सरकार के कदम

  • मोटर वाहन (संशोधन) अधिनियम, 2019: दंड शुल्क में भारी वृद्धि और कड़े नियमों का प्रावधान।
  • राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा माह: हर साल जनवरी में जागरूकता अभियान चलाना।
  • इंटीग्रेटेड रोड एक्सीडेंट डेटाबेस (iRAD): दुर्घटनाओं के डेटा का विश्लेषण कर ब्लैक स्पॉट्स की पहचान करना।
  • ब्लैक स्पॉट सुधार: सरकार ने हजारों असुरक्षित मोड़ों को सुधारने के लिए विशेष बजट आवंटित किया है।

संवैधानिक प्रावधान

  • अनुच्छेद 21: 'जीवन का अधिकार' में सुरक्षित सड़कों पर चलने का अधिकार भी निहित है। राज्य का कर्तव्य है कि वह नागरिकों के जीवन की रक्षा करे।
  • सातवीं अनुसूची: सड़क परिवहन 'समवर्ती सूची' का विषय है, इसलिए केंद्र और राज्य दोनों की जिम्मेदारी समान है।

सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय और दिशानिर्देश

  • एस. राजशेखरन बनाम भारत संघ: SC ने सड़क सुरक्षा पर एक स्थायी समिति (जस्टिस राधाकृष्णन समिति) का गठन किया।
  • गुड सेमेरिटन (नेक फरिश्ता) कानून: न्यायालय ने निर्देश दिया कि दुर्घटना पीड़ितों की मदद करने वाले व्यक्ति को पुलिस या अस्पताल द्वारा परेशान नहीं किया जाएगा।
  • शराब की दुकानों पर प्रतिबंध: राजमार्गों से 500 मीटर के दायरे में शराब की दुकानों को हटाने का ऐतिहासिक फैसला।

गहन विश्लेषण

भारत में समस्या 'कानून की कमी' नहीं, बल्कि 'कानून के प्रवर्तन' की है। तकनीक (CCTV, स्पीड  सेंसर्स) के बावजूद भ्रष्टाचार और मैन्युअल चेकिंग की सीमाएं दुर्घटनाओं को बढ़ावा देती हैं। साथ ही, भारतीय समाज में 'सड़क शिष्टाचार' का भारी अभाव है। हम सड़क को एक साझा संसाधन के बजाय एक प्रतिस्पर्धा क्षेत्र मानते हैं।

आगे की राह

  • 4E रणनीति पर जोर: इंजीनियरिंग  (सड़क और वाहन), इमरजेंसी केयर (गोल्डन ऑवर में इलाज), एनफोर्समेंट (कठोर दंड), और एजुकेशन (जागरूकता)
  • स्मार्ट हाईवे: एआई (AI) आधारित ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम का उपयोग।
  • एयरबैग और सुरक्षा मानक: सभी वाहनों में न्यूनतम 6 एयरबैग और बेहतर क्रैश टेस्ट रेटिंग अनिवार्य करना।
  • सामुदायिक प्राथमिक चिकित्सा: ढाबा मालिकों और स्थानीय लोगों को प्राथमिक चिकित्सा का प्रशिक्षण देना।

निष्कर्ष

सड़क दुर्घटनाएं कोई 'ईश्वरीय घटना' नहीं हैं, बल्कि यह मानवीय और व्यवस्थागत विफलताओं का परिणाम हैं। भारत का लक्ष्य 2030 तक सड़क मौतों को 50% कम करना है, लेकिन यह केवल सरकार के प्रयासों से संभव नहीं है। जब तक प्रत्येक नागरिक सड़क नियमों को अपनी जीवनशैली का हिस्सा नहीं बनाएगा, तब तक हमारी सड़कें रक्त रंजित होती रहेंगी। सुरक्षित सड़क केवल एक बुनियादी ढांचा नहीं, बल्कि एक सभ्य राष्ट्र की पहचान है।

सामान्य अध्ययन पेपर  – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध

सामान्य अध्ययन पेपर – III  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन


संदर्भ

दिसंबर 2025 के अंतिम सप्ताह में, केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने एक ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए निमेसुलाइड युक्त उन सभी ओरल फॉर्मूलेशन (टैबलेट/कैप्सूल) पर प्रतिबंध लगा दिया है, जिनकी खुराक 100 मिलीग्राम से अधिक है। यह प्रतिबंध तत्काल प्रभाव से लागू किया गया है और इसका उद्देश्य उच्च खुराक वाली दर्द निवारक दवाओं से होने वाले स्वास्थ्य जोखिमों को कम करना है।

आधिकारिक घोषणा और कानूनी आधार

केंद्र सरकार ने यह आदेश औषधि और सौंदर्य प्रसाधन अधिनियम, 1940 की धारा 26A के तहत प्रदत्त शक्तियों का उपयोग करते हुए जारी किया है।

  • परामर्श प्रक्रिया: यह निर्णय भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) की सिफारिशों और ड्रग्स टेक्निकल एडवाइजरी बोर्ड (DTAB) के साथ गहन विचार-विमर्श के बाद "जनहित" में लिया गया है।
  • तात्कालिकता: अधिसूचना में स्पष्ट किया गया है कि सरकार इस बात से संतुष्ट है कि 100 mg से अधिक डोज़ वाले निमेसुलाइड के उपयोग से मनुष्यों को गंभीर खतरा होने की संभावना है।

निमेसुलाइड क्या है और यह चर्चा में क्यों रही?

निमेसुलाइड एक गैर-स्टेरॉयडल एंटी-इंफ्लेमेटरी ड्रग (NSAID) है, जिसका उपयोग मुख्य रूप से तीव्र दर्द और बुखार के इलाज के लिए किया जाता है।

  • जोखिम का मुख्य कारण: इस दवा के साथ सबसे बड़ी समस्या 'हेपेटोटॉक्सिसिटी' या लिवर की विषाक्तता रही है। लंबे समय तक या उच्च खुराक में इसका सेवन लिवर को स्थायी रूप से क्षतिग्रस्त कर सकता है।
  • वैश्विक रुख: अमेरिका, कनाडा, जापान, ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन जैसे देशों ने इसकी सुरक्षा चिंताओं के कारण इसे कभी अपने बाजार में अनुमति ही नहीं दी।

प्रतिबंध के प्रमुख आयाम और प्रभाव

सरकार के इस कदम के पीछे कई महत्वपूर्ण कारण और इसके दूरगामी प्रभाव हैं:

  • लिवर सुरक्षा सुनिश्चित करना: 100 mg से अधिक की खुराक शरीर की सहनशक्ति से बाहर पायी गई है। भारत में लिवर फेलियर के कई मामलों का संबंध अनियंत्रित पेनकिलर दवाओं के सेवन से पाया गया है।
  • सुरक्षित विकल्पों की उपलब्धता: मंत्रालय के अनुसार, अब बाजार में निमेसुलाइड के मुकाबले कहीं अधिक सुरक्षित और प्रभावी विकल्प (जैसे पैरासिटामोल, इबुप्रोफेन आदि) मौजूद हैं, अतः जोखिम भरी दवा को बढ़ावा देना उचित नहीं है।
  • ऐतिहासिक क्रम: यह प्रतिबंध भारत में दवाओं के नियमन की एक सतत प्रक्रिया का हिस्सा है।
    • 2011: 12 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए इसे प्रतिबंधित किया गया था।
    • जनवरी 2025: पशु चिकित्सा के क्षेत्र में इसे पूरी तरह बैन किया गया (गिद्धों के संरक्षण हेतु)

चुनौतियाँ और नियामक अंतराल

लेख का सूक्ष्म विश्लेषण कुछ चुनौतियों की ओर भी संकेत करता है:

  • दवा विक्रेताओं की भूमिका: भारत में कई दवाएं बिना पर्ची (OTC) के बेची जाती हैं। इस प्रतिबंध को जमीन पर लागू करना और केमिस्टों को जागरूक करना एक बड़ी चुनौती है।
  • पुराना स्टॉक: बाजार में पहले से मौजूद उच्च डोज़ वाली दवाओं के स्टॉक को वापस बुलाना (Recall) फार्मा कंपनियों के लिए एक कठिन प्रक्रिया होगी।

आगे की राह

  • सख्त प्रवर्तन: राज्य औषधि नियंत्रण प्राधिकरणों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि 100 mg से ऊपर की निमेसुलाइड की बिक्री तुरंत बंद हो।
  • जन जागरूकता: मरीजों को शिक्षित किया जाना चाहिए कि वे बिना डॉक्टर की सलाह के उच्च शक्ति वाली दर्द निवारक दवाएं लें।
  • फार्माकोविजिलेंस: भारत को अपनी फार्माकोविजिलेंस (दवा सुरक्षा निगरानी) प्रणाली को और मजबूत करना चाहिए ताकि किसी भी दवा के दुष्प्रभावों का डेटा तुरंत प्राप्त हो सके और भविष्य में ऐसे निर्णय समय पर लिए जा सकें।

निष्कर्ष

निमेसुलाइड की उच्च खुराक पर प्रतिबंध केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं है, बल्कि यह "स्वस्थ भारत" की दिशा में एक निर्णायक प्रयास है। औषधि नियामक तंत्र का यह सक्रिय दृष्टिकोण दर्शाता है कि भारत अब वैश्विक मानकों के अनुरूप जन स्वास्थ्य को व्यावसायिक हितों से ऊपर रख रहा है। हालांकि, इस प्रतिबंध की वास्तविक सफलता इसके कठोर कार्यान्वयन और आम जनता की जागरूकता पर निर्भर करेगी।