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16वें वित्त आयोग की सिफारिशें: वित्तीय संघवाद, दक्षता बनाम समानता और भावी परिदृश्य
सामान्य अध्ययन पेपर – III: प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन।
संदर्भ
हाल ही में अरविंद पनगड़िया की अध्यक्षता वाले 16वें वित्त आयोग (FC-16) ने वर्ष 2026-31 की अवधि के लिए अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की है। इस रिपोर्ट में केंद्रीय करों में राज्यों की हिस्सेदारी को 41% पर बरकरार रखते हुए सहायता अनुदान और हस्तांतरण के ढांचे में व्यापक बदलाव किए गए हैं।
वित्तीय संघवाद क्या है?
वित्तीय संघवाद से तात्पर्य केंद्र और राज्य सरकारों के बीच वित्तीय संसाधनों (कर राजस्व), व्यय की जिम्मेदारियों और ऋण लेने की शक्तियों के संवैधानिक विभाजन एवं समन्वय से है। इसका मुख्य उद्देश्य देश की एकता को बनाए रखते हुए क्षेत्रीय विषमताओं को दूर करना और सभी राज्यों को बुनियादी सार्वजनिक सेवाएं प्रदान करने में सक्षम बनाना है।
चर्चा में क्यों?
कर हस्तांतरण: केंद्रीय करों के विभाज्य पूल में राज्यों का हिस्सा 41% पर स्थिर रखा गया है (18 राज्यों ने इसे 50% करने की मांग की थी।
- सहायता अनुदान में कटौती: सहायता अनुदान को घटाकर ₹9.47 लाख करोड़ (कुल हस्तांतरण का 8.3%) कर दिया गया है, जो 15वें वित्त आयोग में ₹10.1 लाख करोड़ (19.4%) था।
- राजस्व घाटा अनुदान (RDG) की समाप्ति: 16वें वित्त आयोग ने राजस्व घाटा अनुदान (RDG), क्षेत्र-विशिष्ट और राज्य-विशिष्ट अनुदानों को समाप्त कर दिया है।
- प्रदर्शन-आधारित अनुदान: तीसरे स्तर (स्थानीय निकायों) के लिए ₹7.91 लाख करोड़ आवंटित किए गए हैं, लेकिन इसे सख्त शर्तों (जल, स्वच्छता, राजस्व जुटाने) से जोड़ा गया है।
- मानदंडों में बदलाव: आय दूरी के भार को 45% से घटाकर 42.5% किया गया है तथा राज्य के जीडीपी योगदान को 10% का भार दिया गया है।
मुख्य मुद्दा क्या है?
मूल मुद्दा द दक्षता बनाम समानता के बीच संतुलन का है। आयोग ने वित्तीय अनुशासन और उच्च आर्थिक प्रदर्शन करने वाले राज्यों को प्राथमिकता दी है, जिससे संरचनात्मक कमियों और भौगोलिक विषमताओं का सामना कर रहे राज्यों (जैसे पूर्वोत्तर राज्य और पश्चिम बंगाल) के वित्तीय संसाधनों में कमी आने का जोखिम बढ़ गया है।
वित्त आयोग
वित्त आयोग भारत के वित्तीय ढांचे को संतुलित करने वाली एक प्रमुख संवैधानिक संस्था है।
- उद्देश्य:
- केंद्र और राज्यों के बीच करों की शुद्ध प्राप्तियों का वितरण करना।
- लंबवत और क्षैतिज वित्तीय असंतुलन को दूर करना।
- राज्यों के राजस्व में सहायता अनुदान को नियंत्रित करने वाले सिद्धांतों को निर्धारित करना।
- कार्य इतिहास:
- अनुच्छेद 280 के तहत हर 5 साल में गठित।
- पहला वित्त आयोग 1951 में के. सी. नियोगी की अध्यक्षता में गठित हुआ था।
- 14वें (वाई. वी. रेड्डी) आयोग ने कर हस्तांतरण को 32% से बढ़ाकर 42% करके एक ऐतिहासिक बदलाव किया था। 15वें (एन. के. सिंह) आयोग ने इसे जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन के बाद 41% किया।
- 16वें वित्त आयोग की सिफारिशें:
- विभाज्य पूल में 41% लंबवत हस्तांतरण।
- अनुदान को केवल स्थानीय निकायों और आपदा प्रबंधन तक सीमित करना।
- उपकरों और अधिभारों को धीरे-धीरे विभाज्य पूल में मिलाने का "ग्रैंड बार्गेन" प्रस्ताव।
राज्यों का सहयोग
समानता का समर्थन: राज्यों का तर्क है कि भारत की विविधता और असमान विकास को देखते हुए केवल कर हस्तांतरण पर्याप्त नहीं है; विशेष आवश्यकताओं के लिए सहायता अनुदान आवश्यक है।
- उदाहरण: केरल का मानव विकास मॉडल (जिसे विदेशों में कार्यरत प्रवासी भारतीयों द्वारा भेजे जाने वाले धन-प्रेषण से बल मिलता है) और पंजाब की खाद्य सुरक्षा में भूमिका (गैर-कर योग्य कृषि पर निर्भरता) देश के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन इससे राज्यों के अपने राजस्व आधार पर प्रभाव पड़ता है।
सहायता अनुदान के संवैधानिक प्रावधान
अनुच्छेद 275: इसके तहत संसद को यह शक्ति प्राप्त है कि वह उन राज्यों को सहायता अनुदान प्रदान करे जिन्हें वित्तीय सहायता की आवश्यकता है। इसका उद्देश्य केवल कोष का आवंटन नहीं, बल्कि अंतर-राज्यीय विषमताओं को दूर कर समता लाना है।
- अनुच्छेद 282: संघ या राज्य द्वारा किसी सार्वजनिक उद्देश्य के लिए दिया जाने वाला विवेकधीन अनुदान।
दक्षता बनाम समानता
दक्षता: आर्थिक प्रदर्शन, जीडीपी योगदान और वित्तीय अनुशासन (राजस्व घाटा कम करने) को पुरस्कृत करना।
- सफलता/समानता: पिछड़े, पहाड़ी, सीमावर्ती और जनसांख्यिकीय दबाव झेल रहे राज्यों को उनकी आवश्यकताओं के अनुसार अधिक वित्तीय संसाधन प्रदान करना।
- तनाव: आयोग का झुकाव दक्षता की ओर अधिक होने से निष्पक्षता और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों पर प्रभाव पड़ सकता है।
अन्य महत्वपूर्ण बिंदु
उपकर और अधिभार का मुद्दा: केंद्र सरकार के कुल कर संग्रह में उपकरों का हिस्सा बढ़ा है, जो राज्यों के साथ साझा नहीं होता। इससे राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता प्रभावित होती है।
- स्थानीय निकायों की स्वायत्तता: अत्यधिक कड़े प्रदर्शन मानदंड स्थानीय निकायों के वित्तीय लचीलेपन और स्वायत्तता को सीमित कर सकते हैं।
आगे की राह
उपकरों का युक्तीकरण: उपकरों और अधिभारों को सीमित कर विभाज्य पूल का दायरा बढ़ाया जाना चाहिए ताकि राज्यों को उनका न्यायसंगत हिस्सा मिल सके।
- संतुलित दृष्टिकोण: उच्च प्रदर्शन करने वाले राज्यों को पुरस्कृत करने के साथ-साथ संरचनात्मक कमियों का सामना कर रहे राज्यों के लिए विशेष सहायता तंत्र बनाए रखना अनिवार्य है।
- राजस्व स्वायत्तता बढ़ाना: राज्यों को अपने स्वयं के कर राजस्व आधार को मजबूत करने के लिए प्रोत्साहन और संस्थागत सहायता दी जानी चाहिए।
निष्कर्ष
भारत जैसे व्यापक विविधता वाले देश में वित्तीय संघवाद को केवल प्रदर्शन या दक्षता के आधार पर नहीं चलाया जा सकता; इसे निष्पक्षता और संवैधानिक न्याय में निहित होना चाहिए। 16वें वित्त आयोग को केंद्र की वित्तीय मजबूती और राज्यों की विकास आवश्यकताओं के बीच ऐसा संतुलन कायम करना होगा जो 'सशक्त राज्य से ही सशक्त राष्ट्र' के विचार को साकार कर सके।
आरबीआई मौद्रिक नीति समीक्षा: रेपो दर, आर्थिक परिदृश्य और विश्लेषणात्मक अध्ययन
सामान्य अध्ययन पेपर– III: प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन।
संदर्भ
वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं और आपूर्ति श्रृंखला के दबावों के बीच भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति (MPC) ने अपनी हालिया 3-5 अगस्त 2026 को हुई तीन-दिवसीय समीक्षा बैठक में नीतिगत रेपो दर को 5.25% पर अपरिवर्तित (स्थिर) रखने का सर्वसम्मत निर्णय लिया है। यह वित्त वर्ष 2026-27 की तीसरी द्विमासिक बैठक थी।
रेपो दर क्या है?
रेपो रेट वह ब्याज दर है जिस पर देश का केंद्रीय बैंक (भारतीय रिजर्व बैंक) वाणिज्यिक बैंकों को उनकी अल्पकालिक वित्तीय आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए ऋण प्रदान करता है।
- प्रभाव: जब आरबीआई रेपो रेट बढ़ाता है, तो बैंकों के लिए कर्ज लेना महंगा हो जाता है, जिससे आम जनता के लिए लोन महंगे होते हैं। इसके विपरीत, रेपो रेट घटने से लोन सस्ते हो जाते हैं।
चर्चा के कारण
रेपो दर में कोई बदलाव नहीं: नीतिगत रेपो रेट को 5.25% पर स्थिर रखा गया है।
- अन्य संबंधित दरें:
- एसडीएफ (SDF - स्टैंडिंग डिपॉजिट फैसिलिटी) दर: 5.00%
- एमएसएफ (MSF - मार्जिनल स्टैंडिंग फैसिलिटी) दर: 5.50%
- बैंक दर: 5.50%
- नीतिगत रुख: एमपीसी ने अपना रुख 'तटस्थ' बनाए रखा है।
- जीडीपी वृद्धि अनुमान: वित्त वर्ष 2026-27 के लिए वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर 6.7% रहने का अनुमान जताया गया है।
रेपो दर स्थिर रखने के कारण
मजबूत आंतरिक मांग: पहली तिमाही (Q1: 2026-27) में निजी खपत और निवेश गतिविधियों में निरंतर मजबूती देखी गई है।
- खाद्य एवं ईंधन जनित मुद्रास्फीति: हेडलाइन मुद्रास्फीति में वृद्धि का कारण मुख्य रूप से आपूर्ति-पक्षीय दबाव (खाद्य व ईंधन) हैं, न कि व्यापक मांग।
- अनुकूल कोर मुद्रास्फीति: कोर इन्फ्लेशन नियंत्रित और मध्यम स्तर पर है।
- वैश्विक प्रतिकूल परिस्थितियाँ: वैश्विक स्तर पर अशांत आर्थिक माहौल और ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव के कारण सतर्कता बरतना आवश्यक था।
रेपो दर का निर्धारण
रेपो दर का निर्धारण भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति (MPC) द्वारा किया जाता है।
मौद्रिक नीति समिति (MPC)
बिंदु | विवरण |
वैधानिक दर्जा | आरबीआई अधिनियम, 1934 की धारा 45ZB के तहत गठित। |
सिफारिश | उर्जित पटेल समिति (2014) की सिफारिशों के आधार पर वर्ष 2016 में गठित। |
कुल सदस्य | 6 सदस्य (3 RBI से और 3 केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त बाहरी विशेषज्ञ)। |
अध्यक्ष | आरबीआई के गवर्नर (पदेन)। |
कोरम | बैठक के लिए न्यूनतम 4 सदस्यों की उपस्थिति अनिवार्य है। |
मतदान प्रणाली | प्रत्येक सदस्य का 1 वोट होता है; टाई होने की स्थिति में गवर्नर के पास कास्टिंग वोट का अधिकार होता है। |
प्राथमिक लक्ष्य | मूल्य स्थिरता बनाए रखना और साथ ही विकास की गति को समर्थन देना (मुद्रास्फीति लक्ष्य: 4% ± 2%)। |
बैठक की अनिवार्यता | वर्ष में कम से कम 4 बार बैठक होना अनिवार्य है (सामान्यता हर दो महीने में द्विमासिक बैठक होती है)। |
आरबीआई गवर्नर का वक्तव्य
आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा कि निरंतर वैश्विक प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था लचीली और मजबूत बनी हुई है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यद्यपि खाद्य व ईंधन आपूर्ति के कारण हेडलाइन मुद्रास्फीति बढ़ सकती है, किंतु कोर मुद्रास्फीति नियंत्रित है और तीसरी तिमाही (Q3) के बाद इसके घटने की संभावना है।
चिंताएं
- मानसून की अनिश्चितता: अल नीनो की परिस्थितियों के बीच अपर्याप्त और असमान दक्षिण-पश्चिम मानसून कृषि क्षेत्र और ग्रामीण मांग पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है।
- वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में बाधाएं: अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ऊर्जा कीमतों का उच्च स्तर और आपूर्ति श्रृंखला पर दबाव घरेलू आर्थिक गतिविधियों के लिए जोखिम बना हुआ है।
विश्लेषण
यह निर्णय दर्शाता है कि आरबीआई मुद्रास्फीति को नियंत्रित रखने और आर्थिक वृद्धि को समर्थन देने के बीच एक संतुलित दृष्टिकोण अपना रहा है। अल्पकालिक मौसमी व वैश्विक दबावों के बावजूद भारत का दीर्घकालिक आर्थिक आधार मजबूत बना हुआ है।
आगे की राह
आपूर्ति-पक्षीय प्रबंधन: कृषि और खाद्य वस्तुओं की कीमतों में उछाल को रोकने के लिए सरकार द्वारा आपूर्ति-पक्षीय उपायों को और मजबूत किया जाना चाहिए।
- ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सहयोग: मानसूनी अनिश्चितताओं से निपटने के लिए ग्रामीण अवसंरचना और गैर-कृषि रोजगार के अवसरों को बढ़ावा देना अनिवार्य है।
- सतत निगरानी: वैश्विक जिंस कीमतों और केंद्रीय बैंकों की मौद्रिक नीतियों पर निरंतर सतर्क निगाह रखने की आवश्यकता है।
निष्कर्ष
भारतीय रिजर्व बैंक का रेपो दर को 5.25% पर बरकरार रखने का फैसला भारतीय अर्थव्यवस्था में स्थिरता और विकास के प्रति विश्वास को दर्शाता है। वैश्विक अनिश्चितताओं और मानसूनी जोखिमों के बीच तटस्थ रुख अपनाकर आरबीआई ने मूल्य स्थिरता और समावेशी आर्थिक वृद्धि के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को पुनः रेखांकित किया है।
भारत में आरएंडडी (R&D) में क्वांटम शिफ्ट: निजी क्षेत्र की भूमिका, चुनौतियाँ और भावी परिदृश्य
सामान्य अध्ययन पेपर – III प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन।
संदर्भ
विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के हालिया आंकड़ों के अनुसार, भारत के अनुसंधान और विकास (R&D) परिदृश्य में एक ऐतिहासिक बदलाव दर्ज किया गया है। वर्ष 2023-24 में देश के कुल अनुसंधान व्यय में निजी उद्योग की हिस्सेदारी बढ़कर 51.8% हो गई है, जो भारत के इतिहास में पहली बार सरकार के सभी स्तरों के कुल योगदान से अधिक है।
अनुसंधान एवं विकास (R&D) क्या है?
अनुसंधान एवं विकास (R&D) से तात्पर्य उन नवाचार और रचनात्मक गतिविधियों से है जो नए उत्पादों, प्रक्रियाओं या सेवाओं को विकसित करने या मौजूदा उत्पादों में सुधार करने के लिए की जाती हैं।
- महत्व: यह किसी भी देश की प्रतिस्पर्धात्मकता, तकनीकी आत्मनिर्भरता और विनिर्माण क्षमता को बढ़ाने का मुख्य चालक होता है।
चर्चा में क्यों?
निजी क्षेत्र का ऐतिहासिक वर्चस्व: राष्ट्रीय R&D व्यय में निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी 51.8% पहुँची (इतिहास में पहली बार सरकारी व्यय से अधिक)।
- शोधकर्ताओं की संख्या में वृद्धि: उद्योग जगत अब सरकारी संस्थानों की तुलना में अधिक मुख्य शोधकर्ताओं को रोजगार दे रहा है।
- खर्च में भारी उछाल: वर्ष 2020-21 में निजी व्यय ₹46,388 करोड़ था, जो 2021-22 में लगभग दोगुना होकर ₹82,975 करोड़ हो गया।
- कुल R&D बजट: एक ही वर्ष में कुल R&D व्यय ₹1.27 लाख करोड़ से उछलकर ₹1.95 लाख करोड़ पहुँच गया।
- अग्रणी क्षेत्र: परिवहन क्षेत्र में R&D व्यय तीन गुना बढ़ा है, जो अब बायोटेक्नोलॉजी और आईटी (IT) के साथ R&D का नेतृत्व कर रहा है।
भारत में R&D परिदृश्य की पृष्ठभूमि और स्थिति
ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य: 2010 के दशक के दौरान, R&D में निजी क्षेत्र का योगदान केवल एक-तिहाई (लगभग 33-35%) के आसपास ही सीमित था।
- वैश्विक तुलना (जीडीपी का %):
- भारत: 0.84%
- चीन: 2.58%
- संयुक्त राज्य अमेरिका (USA): 3.45%
- दक्षिण कोरिया: 4.94%
- शोधकर्ताओं का घनत्व: भारत में प्रति 10 लाख जनसंख्या पर केवल 354 शोधकर्ता हैं, जबकि दक्षिण कोरिया और इज़राइल जैसे देशों में यह संख्या कई हजार है।
निजी क्षेत्र के व्यय में उछाल के प्रमुख कारण
महामारी के बाद की रणनीतिक सोच: कोविड-19 के बाद कंपनियों को यह अहसास हुआ कि बाजार में टिके रहने और प्रतिस्पर्धात्मकता के लिए R&D अनिवार्य है।
- रिपोर्टिंग और प्रकटीकरण मानक
- सूचीबद्ध कंपनियों के लिए अनिवार्य सस्टेनेबिलिटी डिस्क्लोजर लागू होना।
- R&D रिपोर्टिंग पर RBI के कड़े नियम लागू होना।
- विदेशी संस्थाओं का समावेश: भारतीय कंपनियों की विदेशी सहायक इकाइयों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कैप्टिव सेंटर्स में होने वाले व्यय का सटीक आंकलन।
- उभरती प्रौद्योगिकियों में निवेश: आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (AI), सेमीकंडक्टर डिजाइन और चिप निर्माण में नया पूंजी प्रवाह।
अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन (ANRF)
स्थापना: अनुसंधान और नवाचार की संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए संसद द्वारा पारित अधिनियम के तहत गठित।
- वित्तीय कोष: 5 वर्षों (2023-28) के लिए ₹50,000 करोड़ का प्रावधान।
- सार्वजनिक-निजी साझेदारी: इस कोष का बड़ा हिस्सा (लगभग ₹36,000 करोड़) निजी स्रोतों और उद्योग जगत से जुटाया जाना है।
- उद्देश्य: विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों में अनुसंधान क्षमता का विकास करना और उद्योग-अकादमिक संबंधों को मजबूत करना।
चिंताएँ और सीमाएँ
जीडीपी के अनुपात में कम व्यय: 0.84% का स्तर भारत जैसे विशाल आर्थिक महत्वाकांक्षा वाले देश के लिए काफी कम है।
- विज्ञापनों पर अधिक खर्च: 2023-24 में निजी क्षेत्र ने अनुसंधान की तुलना में मार्केटिंग/विज्ञापन पर अधिक धन खर्च किया।
- केवल डेटा कैप्चरिंग का प्रभाव: वृद्धि का एक बड़ा हिस्सा अधिक धन के आगमन से ज्यादा 'सटीक डेटा रिकॉर्डिंग' का परिणाम है।
- सेवा क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता: उच्च-स्तरीय विनिर्माण की तुलना में भारत अब भी कम-लागत वाली सेवाओं के निर्यात पर अधिक निर्भर है।
आगे की राह
मानव संसाधन निर्माण: केवल R&D खर्च दर्ज करने के बजाय देश में उच्च योग्य शोधकर्ताओं और वैज्ञानिकों को प्रशिक्षित करने पर ध्यान केंद्रित करना।
- हाई-टेक विनिर्माण को बढ़ावा: R&D व्यय का सीधा उपयोग सेमीकंडक्टर, एआई और अत्याधुनिक तकनीक के विनिर्माण को मजबूत करने में होना चाहिए।
- ANRF का प्रभावी कार्यान्वयन: ANRF के तहत निजी पूंजी जुटाने और उसे रणनीतिक रूप से उपयोग करने की दिशा में त्वरित और जवाबदेह कदम उठाना।
- निजी क्षेत्र के लिए प्रोत्साहन: निजी कंपनियों को कर छूट और प्रोत्साहन देकर वास्तविक अनुसंधान पर अधिक खर्च करने के लिए प्रेरित करना।
निष्कर्ष
राष्ट्रीय अनुसंधान व्यय में निजी क्षेत्र की बढ़त भारत के आर्थिक और तकनीकी परिवर्तन के लिए एक शुभ संकेत है। हालाँकि, इस क्वांटम शिफ्ट को वास्तविक सफलता तब माना जाएगा जब यह भारत को केवल सेवा प्रदाता देश के बजाय उच्च-स्तरीय विनिर्माण और नवाचार का वैश्विक केंद्र बनाने में सक्षम बनाएगी।
जीएसटी (GST) राजस्व में उथल-पुथल: घरेलू उत्पादन बनाम आयातित निर्भरता और वित्तीय समावेशिता
सामान्य अध्ययन पेपर – III: प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन।
संदर्भ
हाल ही में जारी आंकड़ों के अनुसार, जुलाई माह में भारत का सकल जीएसटी (GST) संग्रह ₹2.11 लाख करोड़ दर्ज किया गया, जिसमें साल-दर-साल 15.4% की वृद्धि देखी गई। हालांकि यह चालू वित्त वर्ष 2026-27 (FY27) में दूसरा सबसे बड़ा कर उछाल है, जो भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती को दर्शाता है; लेकिन यह डेटा आंतरिक और बाहरी विकास के असमान रुझानों और अंतर-राज्यीय वित्तीय विषमताओं को भी उजागर करता है।
वस्तु एवं सेवा कर (GST) क्या है?
वस्तु एवं सेवा कर (GST) भारत में 1 जुलाई 2017 से लागू एक अप्रत्यक्ष, गंतव्य-आधारित और व्यापक कर प्रणाली है। यह संपूर्ण देश में एक समान कर संरचना (एक राष्ट्र, एक कर) स्थापित करने और कई अप्रत्यक्ष करों (जैसे वैट, उत्पाद शुल्क, सेवा कर आदि) को समाप्त करने के उद्देश्य से लागू किया गया था।
- महत्व: यह राज्यों और केंद्र के बीच कर आधार को एकीकृत करता है तथा भारत को एक एकल साझा बाजार बनाता है।
चर्चा में क्यों?
ऐतिहासिक संग्रह: जुलाई में सकल जीएसटी राजस्व ₹2.11 लाख करोड़ (15.4% वार्षिक वृद्धि) तक पहुँच गया।
- आयातित बनाम घरेलू जीएसटी में बड़ा अंतर: आयातित आईजीएसटी में 26.9% की भारी वृद्धि दर्ज की गई, जबकि घरेलू राजस्व में केवल 4.5% का उछाल देखा गया।
- मुद्रास्फीति का प्रभाव: विनिर्माण स्तर पर थोक मूल्य सूचकांक (WPI) मुद्रास्फीति जून में बढ़कर 7.18% दर्ज की गई (जो एक वर्ष पूर्व 1.52% थी), जिससे मूल्य-आधारित जीएसटी संग्रह में वृद्धि हुई।
- मैन्युफैक्चरिंग PMI में गिरावट: HSBC विनिर्माण PMI के अनुसार, देश की विनिर्माण वृद्धि 5 साल के निचले स्तर पर पहुँच गई है।
- सेवा क्षेत्र की धीमी गति: सेवा क्षेत्र में 53 महीनों में सबसे धीमी वृद्धि दर्ज की गई (हालाँकि रियल एस्टेट और व्यावसायिक सेवाओं के शुल्कों में वृद्धि देखी गई)।
मुद्दा क्या है?
मूल मुद्दा "जीएसटी राजस्व की गुणवत्ता और टिकाऊपन" का है। वर्तमान कर संग्रह घरेलू उत्पादन और खपत के बजाय आयातित वस्तुओं के महंगे होने (रूपये के अवमूल्यन और वैश्विक मुद्रास्फीति) तथा स्थानीय थोक महंगाई पर अत्यधिक निर्भर है। यदि जीएसटी संग्रह मुख्य रूप से आयात पर निर्भर रहेगा, तो 'मेक इन इंडिया' की परिकल्पना केवल एक दावा बनकर रह जाएगी।
जीएसटी संग्रह के पीछे के प्रमुख कारण और गतिशीलता
वैश्विक कमोडिटी मुद्रास्फीति और रुपये की कमजोरी:
- पिछले एक वर्ष में भारतीय रुपये में 10%-12% का अवमूल्यन हुआ है।
- कच्चा तेल, इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी और रसायन जैसी सामग्रियां कुल आयात का 50% हिस्सा बनाती हैं। रुपये के कमजोर होने से इनका आयात बिल बढ़ा, जिससे आयातित IGST संग्रह में तेजी आई।
- बुलियन और स्वर्ण आयात:
- सोने के आयात पर उच्च IGST मिला, यद्यपि बुलियन आयात में 22% की गिरावट आई और आपूर्ति 6 वर्षों के निचले स्तर पर आ गई।
- मूल्य-आधारित कर प्रणाली का प्रभाव:
- चूंकि जीएसटी वस्तुओं के मूल्य पर लगता है, इसलिए विनिर्माण क्षेत्र में उच्च WPI मुद्रास्फीति (7.18%) ने वास्तविक उत्पादन में वृद्धि न होने के बावजूद कर राजस्व को बढ़ा दिया।
अंतर-राज्यीय वित्तीय असमानताएँ और क्षेत्रीय विषमताएँ
असमान विकास पथ: देश के केवल 16 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों ने ही राष्ट्रीय औसत से अधिक (निपटान-पश्चात) जीएसटी वृद्धि दर्ज की है।
- उत्पादन और सेवाओं का संकेंद्रण: विनिर्माण और संगठित सेवाएं केवल कुछ ही चुनिंदा राज्यों (जैसे महाराष्ट्र, तमिलनाडु, गुजरात आदि) में केंद्रित हैं।
- असंगठित क्षेत्र वाले राज्यों की चुनौती: जिन राज्यों में असंगठित क्षेत्र का दायरा बड़ा है, वे पर्याप्त कर उछाल उत्पन्न नहीं कर पा रहे हैं।
- केंद्रीय हस्तांतरण पर निर्भरता: कर संग्रह में पिछड़ने वाले राज्य अपनी वित्तीय जरूरतों के लिए केंद्रीय हस्तांतरण और वित्त आयोग के हस्तांतरण पर अत्यधिक निर्भर हो रहे हैं।
जीएसटी 3.0 और अनुपालन ढांचा
घरेलू रिफंड में तेजी: आयातित IGST रिफंड की तुलना में घरेलू रिफंड का तेजी से जारी होना यह दर्शाता है कि औपचारिक व्यवसाय अपने जीएसटी अनुपालन में सुधार कर रहे हैं।
- पारिस्थितिकी तंत्र में सुधार: सरकार ने आईटी और रिटर्न फाइलिंग सिस्टम को मजबूत किया है, हालांकि व्यवसाय वर्तमान में बड़े क्रेडिट बैलेंस (व्युत्क्रम शुल्क संरचना के कारण) ले जा रहे हैं।
- सुलझे न होने वाले विवाद: इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) के दावों, ऑडिट विवादों और मुकदमों से जुड़ी कमियों का पूरी तरह समाधान होना अभी बाकी है।
चिंताएँ और सीमाएँ
घरेलू उत्पादन की धीमी गति: घरेलू कर राजस्व में केवल 4.5% की वृद्धि यह दर्शाती है कि जमीनी स्तर पर वास्तविक विनिर्माण और मांग में सुस्ती है।
- भौगोलिक संकेंद्रण: आर्थिक विस्तार के लाभ पूरे देश में समान रूप से वितरित नहीं हो रहे हैं।
- मुद्रास्फीति और मुद्रा अवमूल्यन पर निर्भरता: विनिमय दर में गिरावट और महंगाई के दम पर कर संग्रह बढ़ाना दीर्घकालिक आधार पर टिकाऊ नहीं है।
- मेक इन इंडिया के लिए चुनौती: आयातित इनपुट्स और घटकों के भारी पड़ने से घरेलू स्तर पर मूल्य संवर्धन बाधित हो रहा है।
आगे की राह
जीएसटी 3.0 का क्रियान्वयन: आर्थिक विस्तार के लाभों को भौगोलिक रूप से व्यापक और वित्तीय रूप से समावेशी बनाने के लिए अगली पीढ़ी के जीएसटी सुधार (GST 3.0) लागू किए जाने चाहिए।
- घरेलू विनिर्माण को प्रोत्साहन: केवल आयात करों पर निर्भर रहने के बजाय घरेलू उत्पादन, विनिर्माण और व्यापक खपत को बढ़ावा देने वाली नीतियां अपनाना।
- ITC विवादों का त्वरित समाधान: इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) से संबंधित विसंगतियों और अदालती मुकदमों का शीघ्र निपटारा करना ताकि व्यवसायों की कार्यशील पूंजी न फंसे।
- असंगठित क्षेत्र का औपचारिकीकरण: कम राजस्व वाले राज्यों में असंगठित इकाइयों को जीएसटी तंत्र में लाकर उनकी कर उछाल क्षमता में सुधार करना।
निष्कर्ष
जीएसटी संग्रह का ₹2.11 लाख करोड़ का आंकड़ा पहली नज़र में उत्साहजनक है, लेकिन इसका सूक्ष्म विश्लेषण यह स्पष्ट करता है कि स्वस्थ वित्तीय प्रक्षेपवक्र के लिए आयात और मुद्रास्फीति के बजाय घरेलू उत्पादन, बढ़ती आय और व्यापक उपभोक्ता मांग का योगदान सर्वोपरि होना चाहिए। तभी 'मेक इन इंडिया' की संकल्पना साकार होगी और भारत का वित्तीय संघवाद अधिक समावेशी एवं संतुलित बन सकेगा।