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संदर्भ
हरियाणा के मंगर बानी में हालिया प्रशासनिक हस्तक्षेप ने यह सिद्ध किया है कि पवित्र उपवन केवल धार्मिक स्थल नहीं हैं, बल्कि वे वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 और FRA, 2006 के तहत संरक्षित महत्वपूर्ण पारिस्थितिक क्षेत्र हैं।
ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक पृष्ठभूमि
- प्राचीन जड़ें: भारत में पवित्र उपवनों की परंपरा पूर्व-कृषि काल से है। इन्हें 'प्रकृति के मंदिर' माना जाता है जहाँ वृक्षों, जल स्रोतों और वन्यजीवों को देवताओं का स्वरूप माना जाता है।
- सामुदायिक नैतिकता: इन वनों का संरक्षण 'डर और श्रद्धा' के मिश्रण पर आधारित था। पारंपरिक रूप से इन क्षेत्रों से सूखी लकड़ी उठाना भी वर्जित था, जिससे यहाँ एक अछूता पारिस्थितिकी तंत्र विकसित हुआ।
वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम (WLPA), 1972 और पवित्र उपवन
1972 का अधिनियम इन उपवनों को कानूनी सुरक्षा प्रदान करने के लिए मुख्य आधार प्रदान करता है:
- सामुदायिक रिजर्व: 2002 के संशोधन के बाद, WLPA के तहत 'सामुदायिक रिजर्व' की श्रेणी जोड़ी गई। इसके माध्यम से मंगर बानी जैसे निजी या सामुदायिक स्वामित्व वाले पवित्र वनों को औपचारिक संरक्षण दिया जा सकता है।
- अनुसूची: इन उपवनों में पाए जाने वाले दुर्लभ जीव (जैसे अरावली का तेंदुआ या नीलगाय) WLPA की विभिन्न अनुसूचियों के तहत संरक्षित हैं। यहाँ शिकार या आवास विनाश करना दंडनीय अपराध है।
- आवास संरक्षण: धारा 33 के तहत, मुख्य वन्यजीव वार्डन इन क्षेत्रों के प्रबंधन और सुरक्षा के निर्देश दे सकता है यदि वे वन्यजीवों के लिए महत्वपूर्ण गलियारे हों।
वन अधिकार अधिनियम (FRA), 2006: सशक्तिकरण का साधन
जहाँ WLPA 'संरक्षण' की बात करता है, वहीं FRA 'अधिकारों' की बात करता है:
- सामुदायिक वन संसाधन (CFR) अधिकार: धारा 3(1)(i) ग्राम सभा को यह अधिकार देती है कि वे अपने पारंपरिक 'पवित्र उपवनों' के भीतर जैव विविधता का संरक्षण और प्रबंधन स्वयं करें।
- सांस्कृतिक पहचान: अधिनियम स्वीकार करता है कि पवित्र उपवन समुदायों की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा हैं, इसलिए विकास के नाम पर इनका विस्थापन या विनाश कानूनन गलत है।
- ग्राम सभा की सर्वोच्चता: किसी भी निर्माण कार्य (जैसे सड़क) के लिए ग्राम सभा की पूर्व सहमति अनिवार्य है, जो मंगर बानी के मामले में एक प्रमुख कानूनी ढाल बनी।
क्षेत्रीय वितरण और पारिस्थितिक महत्व
क्षेत्र | प्रमुख राज्य | स्थानीय नाम | पारिस्थितिक भूमिका |
अरावली | हरियाणा, राजस्थान | बनी, ओरान | मरुस्थलीकरण को रोकना और जल पुनर्भरण। |
पश्चिमी घाट | महाराष्ट्र, कर्नाटक | देवराय, देवकाडू | स्थानिक प्रजातियों का संरक्षण। |
पूर्वोत्तर | मेघालय, मणिपुर | लॉ क्यंतंग | प्राचीन वर्षावनों के अवशेष और दुर्लभ जड़ी-बूटियाँ। |
मध्य भारत | छत्तीसगढ़, झारखंड | सरना | जनजातीय संस्कृति और साल वनों का संरक्षण। |
मंगर बानी: केस स्टडी
- जैव विविधता: यहाँ 'धौ' (एनोगाइसस पेंडुला) के प्राचीन वृक्ष हैं। यह दिल्ली-NCR के लिए 'कार्बन सिंक' का काम करता है।
- कानूनी स्थिति: यद्यपि यह राजस्व रिकॉर्ड में 'गैर-मुमकिन पहाड़' के रूप में दर्ज हो सकता है, लेकिन WLPA 1972 और FRA 2006 के सिद्धांतों के तहत इसे 'वन' की श्रेणी में संरक्षित किया जाना अनिवार्य है।
- चुनौती: भूमि माफिया और अनियंत्रित शहरीकरण। हाल ही में अवैध सड़क को हटाना इस बात का प्रमाण है कि न्यायपालिका और सक्रिय नागरिकता इन पवित्र फेफड़ों को बचा सकते हैं।
निष्कर्ष
पवित्र उपवन भारत की 'इन-सिटु' (In-situ) संरक्षण पद्धति का श्रेष्ठ उदाहरण हैं। WLPA 1972 और FRA 2006 का एकीकरण इन वनों के लिए 'सुरक्षा कवच' का काम करता है। भविष्य में, इन क्षेत्रों को केवल धार्मिक मान्यताओं पर नहीं छोड़ना चाहिए, बल्कि इन्हें वैज्ञानिक प्रबंधन और कानूनी 'संरक्षित क्षेत्र' के रूप में मान्यता देना आवश्यक है ताकि आने वाली पीढ़ियाँ इस प्राकृतिक विरासत का लाभ उठा सकें।
सन्दर्भ
पहलगाम आतंकी हमले के प्रत्युत्तर में भारत द्वारा सिंधु जल संधि (IWT) 1960 को 'स्थगन' की स्थिति में डालने के उपरांत, केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर के रामबन जिले में चेनाब नदी पर विशाल सावलकोट जलविद्युत परियोजना को तीव्र गति से आगे बढ़ाने का निर्णय लिया है।
मुख्य बिंदु
- पाकिस्तान का अनुरोध और रुख:
- पाकिस्तान ने आधिकारिक तौर पर भारत से चेनाब नदी पर सावलकोट जलविद्युत परियोजना के संबंध में जानकारी और परामर्श का अनुरोध किया है। इसके लिए पाकिस्तान ने 1960 की सिंधु जल संधि (IWT) के प्रावधानों का हवाला दिया है।
- पाकिस्तान के विदेश कार्यालय ने स्पष्ट किया है कि कोई भी एकपक्षीय कार्रवाई संधि की कानूनी वास्तविकता को परिवर्तित नहीं कर सकती। उसने भारत से पूर्ण संधि अनुपालन की ओर लौटने और अपने दायित्वों को पूरा करने का आग्रह किया है।
- परियोजना का विवरण और क्षमता:
- सावलकोट परियोजना 1,856 मेगावाट (MW) की एक विशाल जलविद्युत योजना है, जिसे 'प्रोजेक्ट ऑफ नेशनल इम्पोर्टेंस' (राष्ट्रीय महत्व की परियोजना) घोषित किया गया है।
- यह प्रतिवर्ष 7,000 मिलियन यूनिट से अधिक बिजली उत्पन्न करने में सक्षम होगी, जो इसे क्षेत्र की सबसे बड़ी पनबिजली परियोजनाओं में से एक बनाती है।
- NHPC ने हाल ही में इसके निर्माण के लिए ₹5,129 करोड़ का टेंडर जारी किया है, जिसकी निविदा प्रक्रिया मार्च 2026 से प्रारंभ होगी।
- तकनीकी स्वरूप:
- यह परियोजना चेनाब नदी पर एक 'रन-ऑफ-द-रिवर' योजना है, जिसका अर्थ है कि यह नदी के प्राकृतिक प्रवाह का उपयोग करेगी और इसमें न्यूनतम जल भंडारण की आवश्यकता होगी।
- इसके अंतर्गत एक कंक्रीट ग्रेविटी डैम और सुरंगों का निर्माण किया जाएगा।
रणनीतिक और भू-राजनीतिक संदर्भ:
- संधि का स्थगन: अप्रैल 2025 में पहलगाम हमले के बाद भारत द्वारा संधि को निलंबित करना एक दंडात्मक कदम था। अब भारत का उद्देश्य 'पश्चिमी नदियों' (इंडस, झेलम, चेनाब) के जल के अपने हिस्से का अधिकतम दोहन करना है।
- पाकिस्तान की प्रतिक्रिया: पाकिस्तान ने इस परियोजना पर 'सिंधु जल संधि' के प्रावधानों के तहत सूचना और परामर्श की आधिकारिक मांग की है। पाकिस्तान का तर्क है कि कोई भी एकतरफा कार्रवाई संधि की कानूनी वास्तविकता को नहीं बदल सकती।
- क्षेत्रीय प्रभाव: चेनाब पर पहले से ही दुलहस्ती (390 MW), बगलिहार (890 MW) और सलाल (690 MW) जैसी परियोजनाएं कार्यरत हैं। सावलकोट इस श्रृंखला में भारत की नियंत्रण क्षमता को और सुदृढ़ करेगा।
सामाजिक-आर्थिक लाभ:
- इस परियोजना से जम्मू-कश्मीर में बिजली की आपूर्ति बढ़ेगी और नेशनल ग्रिड को मजबूती मिलेगी।
- रामबन जिले में रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे और बुनियादी ढांचे का विकास होगा। परियोजना को पूरा करने की समयसीमा लगभग 3,285 दिन (लगभग 9 वर्ष) निर्धारित की गई है।
निष्कर्ष
सावलकोट जलविद्युत परियोजना को तीव्र गति से आगे बढ़ाना भारत की 'रणनीतिक स्वायत्तता' और राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति कड़े रुख का परिचायक है। यह कदम न केवल जम्मू-कश्मीर की ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति करेगा, बल्कि पाकिस्तान के प्रति भारत की जल-नीति में आए बड़े बदलाव को भी दर्शाता है। यद्यपि पाकिस्तान अंतर्राष्ट्रीय कानूनी तंत्र का हवाला दे रहा है, भारत का ध्यान अब संधि के अंतर्गत अपने अधिकारों के पूर्ण उपयोग और क्षेत्रीय विकास पर केंद्रित है। इस परियोजना का सफल कार्यान्वयन भारत की सीमावर्ती अवसंरचना और सामरिक बढ़त को एक नई ऊंचाई प्रदान करेगा।
सामान्य अध्ययन पेपर – III प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन
सन्दर्भ
भारत की अर्थव्यवस्था निरंतर परिवर्तनशील है। वैश्वीकरण, शहरीकरण, डिजिटल तकनीक के प्रसार तथा सेवा क्षेत्र के तीव्र विस्तार के कारण उपभोग के स्वरूप में भी उल्लेखनीय परिवर्तन आया है। इन परिवर्तनों के परिणामस्वरूप लोगों के खर्च करने के तरीके, उपभोग की प्राथमिकताएँ तथा बाजार संरचना भी बदल गई है। इसी परिप्रेक्ष्य में भारत सरकार के सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) ने उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) की नई श्रृंखला जारी की है, जिसका आधार वर्ष 2024 निर्धारित किया गया है। यह नई श्रृंखला पूर्व की 2012 आधार वर्ष वाली श्रृंखला का स्थान लेती है और वर्तमान उपभोग पैटर्न को अधिक सटीक रूप से प्रतिबिंबित करने का प्रयास करती है।
नई CPI श्रृंखला के अनुसार जनवरी 2026 में खुदरा मुद्रास्फीति 2.75% दर्ज की गई, जो इस नई पद्धति के अंतर्गत जारी पहला आधिकारिक आंकड़ा है।
CPI क्या है और इसका महत्व
उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) वह सांख्यिकीय सूचक है जिसके माध्यम से समय के साथ वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में होने वाले परिवर्तन को मापा जाता है। यह सूचक सामान्य नागरिक के दैनिक जीवन से सीधे जुड़ा होता है, क्योंकि इसमें भोजन, आवास, परिवहन, स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य आवश्यक उपभोग वस्तुओं एवं सेवाओं की कीमतों को सम्मिलित किया जाता है।
- भारत में CPI को राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) द्वारा प्रतिमाह जारी किया जाता है।
- यह न केवल महँगाई का प्रमुख संकेतक है, बल्कि भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति निर्धारण प्रक्रिया का भी आधार है।
- इसलिए CPI में परिवर्तन का प्रभाव ब्याज दरों, वेतन-भत्तों, पेंशन तथा कई सरकारी नीतियों पर पड़ता है।
नई CPI श्रृंखला में प्रमुख परिवर्तन
नई CPI श्रृंखला में कई संरचनात्मक एवं पद्धतिगत परिवर्तन किए गए हैं, जिनका उद्देश्य इसे वर्तमान आर्थिक वास्तविकताओं के अधिक अनुकूल बनाना है।
- आधार वर्ष में परिवर्तन
- पूर्व में CPI का आधार वर्ष 2012 था, जिसे बदलकर 2024 कर दिया गया है। आधार वर्ष में परिवर्तन इसलिए किया जाता है ताकि अर्थव्यवस्था में आए संरचनात्मक बदलावों को सूचकांक में समुचित रूप से सम्मिलित किया जा सके और यह वर्तमान उपभोग पैटर्न को बेहतर ढंग से प्रतिबिंबित कर सके।
- उपभोग टोकरी का विस्तार
- नई CPI श्रृंखला में वस्तुओं और सेवाओं की संख्या बढ़ाकर 358 कर दी गई है, जबकि पूर्व में यह संख्या 299 थी।
- वस्तुएँ: 259 → 308
- सेवाएँ: 40 → 50
इससे CPI अब उपभोक्ताओं के वास्तविक खर्च को अधिक व्यापक रूप से दर्शाने में सक्षम होगा।
- CPI वर्गीकरण में परिवर्तन
- नई श्रृंखला में CPI को अंतरराष्ट्रीय मानक COICOP वर्गीकरण प्रणाली के अनुरूप बनाया गया है।
- पहले CPI में 6 प्रमुख समूह थे, जिन्हें बढ़ाकर अब 12 प्रमुख विभाजनों में व्यवस्थित किया गया है।
- इससे भारत के मुद्रास्फीति आँकड़ों की अंतरराष्ट्रीय तुलना अधिक आसान हो जाएगी।
- खाद्य पदार्थों का भार कम किया गया
- नई CPI श्रृंखला में खाद्य एवं पेय पदार्थों का भार 45.86% से घटाकर 36.75% कर दिया गया है।
- यह परिवर्तन इसलिए किया गया है क्योंकि समय के साथ लोगों की आय बढ़ने के साथ भोजन पर खर्च का अनुपात कम हो रहा है और सेवाओं पर खर्च बढ़ रहा है।
- इससे CPI में खाद्य मुद्रास्फीति का अत्यधिक प्रभाव कम होगा और सूचकांक अधिक स्थिर बनेगा।
आवास का बढ़ता महत्व
- नई श्रृंखला में आवास का भार लगभग 17.66% कर दिया गया है, जो पहले लगभग 10.07% था।
- इसके अतिरिक्त पहली बार ग्रामीण क्षेत्रों के मकान किराये को भी CPI में सम्मिलित किया गया है।
सेवा क्षेत्र का बढ़ता महत्व
भारत की अर्थव्यवस्था में सेवा क्षेत्र के बढ़ते योगदान को ध्यान में रखते हुए CPI में कई नई सेवाएँ शामिल की गई हैं, जैसे—
- ऑनलाइन सेवाएँ
- ओटीटी प्लेटफॉर्म
- हवाई यात्रा (Airfares)
- दूरसंचार सेवाएँ
- ऑनलाइन मार्केटप्लेस
इससे CPI अब आधुनिक उपभोग प्रवृत्तियों को अधिक सटीक रूप से दर्शा सकेगा।
बाजार कवरेज का विस्तार
नई CPI श्रृंखला में मूल्य-संग्रहण के लिए अधिक बाजारों को शामिल किया गया है—
- ग्रामीण बाजार: 1181 → 1465
- शहरी बाजार: 1114 → 1395
इससे CPI आँकड़ों की प्रतिनिधिकता और विश्वसनीयता बढ़ेगी।
डिजिटल और ई-कॉमर्स डेटा का उपयोग
नई प्रणाली में पहली बार ई-कॉमर्स और डिजिटल प्लेटफॉर्म से भी मूल्य डेटा एकत्र किया जाएगा।
उदाहरण के लिए:
- एयरलाइन टिकट
- ओटीटी सदस्यता शुल्क
- ऑनलाइन मार्केटप्लेस की कीमतें
इससे CPI अधिक आधुनिक और वास्तविक बाजार स्थितियों को दर्शाने में सक्षम होगा।
नई CPI श्रृंखला की आवश्यकता
भारत में पिछली CPI श्रृंखला 2012 के उपभोग पैटर्न पर आधारित थी। पिछले एक दशक में भारतीय अर्थव्यवस्था में व्यापक परिवर्तन हुए हैं—
- शहरीकरण में वृद्धि
- डिजिटल अर्थव्यवस्था का विस्तार
- सेवा क्षेत्र का बढ़ता योगदान
- उपभोग व्यवहार में परिवर्तन
इन्हीं परिवर्तनों को ध्यान में रखते हुए 2023-24 के घरेलू उपभोग व्यय सर्वेक्षण (HCES) के आधार पर CPI की नई उपभोग टोकरी तैयार की गई है।
आर्थिक नीति पर प्रभाव
नई CPI श्रृंखला का प्रभाव भारत की आर्थिक नीतियों पर भी महत्वपूर्ण होगा।
- मौद्रिक नीति:भारतीय रिज़र्व बैंक CPI को महँगाई लक्ष्य निर्धारण का आधार मानता है। अधिक सटीक CPI से RBI को ब्याज दरों के संबंध में बेहतर निर्णय लेने में सहायता मिलेगी।
- राजकोषीय नीति:सरकार की कई योजनाएँ तथा वेतन-भत्ते, जैसे महँगाई भत्ता, CPI से जुड़े होते हैं। इसलिए CPI में सुधार से बजट योजना अधिक सटीक बन सकेगी।
- आर्थिक स्थिरता:खाद्य वस्तुओं के भार में कमी से CPI में अत्यधिक उतार-चढ़ाव कम होने की संभावना है, जिससे मुद्रास्फीति के आँकड़े अधिक स्थिर और विश्वसनीय बनेंगे।
निष्कर्ष
उपभोक्ता मूल्य सूचकांक की नई श्रृंखला भारत की बदलती अर्थव्यवस्था और उपभोग व्यवहार को दर्शाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। आधार वर्ष में परिवर्तन, उपभोग टोकरी का विस्तार, सेवा क्षेत्र और डिजिटल अर्थव्यवस्था का समावेश, बाजार कवरेज में वृद्धि तथा नई डेटा-संग्रहण पद्धतियाँ ये सभी सुधार CPI को अधिक सटीक, आधुनिक और प्रासंगिक बनाते हैं।
अंततः, एक अद्यतन और विश्वसनीय CPI न केवल महँगाई को बेहतर ढंग से मापने में सहायक होगा, बल्कि नीति-निर्माताओं को अधिक प्रभावी आर्थिक निर्णय लेने में भी सक्षम बनाएगा। इस प्रकार, नई CPI श्रृंखला भारत की आर्थिक नीति-निर्माण प्रक्रिया को अधिक सुदृढ़ और पारदर्शी बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल सिद्ध होगी।
सामान्य अध्ययन पेपर – III प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन
सन्दर्भ
भारत सरकार द्वारा अधिसूचित चार श्रम संहिताएं देश के श्रम परिदृश्य में एक युगांतरकारी परिवर्तन का प्रतिनिधित्व करती हैं। ये संहिताएं 29 केंद्रीय श्रम कानूनों को एकीकृत कर श्रम शासन को आधुनिक बनाने, सामाजिक सुरक्षा का विस्तार करने और आर्थिक विकास के लाभों का श्रमिकों के बीच न्यायसंगत वितरण सुनिश्चित करने के उद्देश्य से लाई गई हैं। भारतीय उद्योग परिसंघ (CII) के अनुसार, ये सुधार केवल नियामक बदलाव नहीं, बल्कि वित्तीय समावेशन के लिए एक संरचनात्मक हस्तक्षेप हैं।
'वेतन' की नई परिभाषा और उसके लाभ
श्रम संहिताओं में सबसे महत्वपूर्ण बदलाव 'वेतन' की परिभाषा को लेकर है।
- नियम: अब नियोक्ताओं को यह सुनिश्चित करना होगा कि 'वेतन' (मूल वेतन + महंगाई भत्ता) कुल पारिश्रमिक का कम से कम 50% हो।
- प्रभाव: पूर्व में कंपनियां सामाजिक सुरक्षा योगदान बचाने के लिए वेतन को कुल वेतन का केवल 30-35% रखती थीं। नए नियम से भविष्य निधि (PF), ग्रेच्युटी और पेंशन के लिए अंशदान बढ़ेगा।
- परिणाम: यह श्रमिकों के लिए 'परिसंपत्ति सृजन' और सेवानिवृत्ति के बाद की वित्तीय सुरक्षा को सुदृढ़ करेगा।
ग्रेच्युटी और फिक्स्ड-टर्म एम्प्लॉयमेंट
आधुनिक श्रम बाजार की आवश्यकताओं को देखते हुए संहिताओं में नियत अवधि के कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण प्रावधान किए गए हैं:
- अब एक वर्ष की सेवा पूरी करने वाले FTE कर्मचारी भी ग्रेच्युटी के हकदार होंगे।
- इससे पूर्व, अल्पकालिक अनुबंध पर कार्य करने वाले श्रमिक बिना किसी अंतिम वित्तीय लाभ के नौकरी छोड़ने को मजबूर थे। अब यह व्यवस्था उन्हें आय सुरक्षा और वित्तीय गरिमा प्रदान करेगी।
- कॉर्पोरेट प्रभाव: टीसीएस, इंफोसिस और एलएंडटी जैसी बड़ी कंपनियों की देनदारी बढ़ेगी, लेकिन यह व्यय अंततः श्रमिकों की क्रय शक्ति बढ़ाकर अर्थव्यवस्था में मांग पैदा करेगा।
असंगठित और गिग श्रमिकों का औपचारिकिकरण
पहली बार भारतीय कानूनी ढांचे में गिग वर्कर्स, प्लेटफॉर्म वर्कर्स और असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को मान्यता दी गई है:
- सामाजिक सुरक्षा कोष: इनके लिए जीवन और विकलांगता कवर, स्वास्थ्य लाभ और वृद्धावस्था सुरक्षा के लिए विशेष योजनाएं लाई जाएंगी।
- सुवाह्यता: राशन कार्ड की तरह ही सामाजिक सुरक्षा लाभों की सुवाह्यता सुनिश्चित की जाएगी, जो विशेष रूप से प्रवासी श्रमिकों के लिए वरदान सिद्ध होगी।
व्यापक आर्थिक प्रभाव
- समावेशी विकास: आय का पूंजी से श्रम की ओर पुनर्वितरण समावेशी विकास को बढ़ावा देगा।
- घरेलू मांग: श्रमिकों की बढ़ती आय घरेलू अर्थव्यवस्था में चक्रित होती है, जिससे उपभोग बढ़ता है और मांग-आधारित विकास होता है।
- अनुपालन में आसानी: 29 कानूनों के बजाय केवल 4 कोड होने से व्यापार सुगमता बढ़ेगी और पारदर्शिता आएगी।
चुनौतियां और विरोध के स्वर
ट्रेड यूनियनों के एक वर्ग द्वारा इन सुधारों का विरोध किया जा रहा है:
- आशंकाएं: यूनियनों का तर्क है कि इससे नियोक्ताओं को 'हायर एंड फायर' की छूट मिलेगी और हड़ताल करने के अधिकार सीमित होंगे।
- कार्यान्वयन: भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में इन संहिताओं को राज्यों के स्तर पर प्रभावी ढंग से लागू करना एक बड़ी प्रशासनिक चुनौती है।
निष्कर्ष
भारत के नए श्रम कोड 'सिद्धांतवादी यथार्थवाद' की दिशा में एक साहसिक कदम हैं। ये संहिताएं न केवल श्रमिकों को अधिकार संपन्न बनाती हैं, बल्कि उन्हें देश की विकास गाथा में एक सक्रिय भागीदार के रूप में स्थापित करती हैं। इनकी वास्तविक सफलता केवल कागजों पर नहीं, बल्कि इनके प्रभावी और न्यायसंगत कार्यान्वयन में निहित है, ताकि प्रत्येक श्रमिक को वित्तीय गरिमा और सामाजिक न्याय प्राप्त हो सके।
सामान्य अध्ययन पेपर – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध।
सन्दर्भ
हाल ही में भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच 'पारस्परिक व्यापार पर अंतरिम समझौते' के लिए एक रूपरेखा की घोषणा की गई है। हालांकि यह समझौता भारतीय अर्थव्यवस्था को अमेरिकी दंडात्मक टैरिफ से राहत दिलाने के उद्देश्य से प्रेरित है, परंतु इसमें निहित शर्तें भारत की दीर्घकालिक रणनीतिक स्वायत्तता और बहु-पक्षीय विदेश नीति पर गंभीर प्रश्न खड़ा करती हैं।
समझौते के प्रमुख बिंदु और अमेरिकी शर्तें
वाशिंगटन द्वारा एकतरफा रूप से जारी सूचनाओं और कार्यकारी आदेशों के अनुसार, इस व्यापारिक मार्ग के निर्माण के पीछे निम्नलिखित जटिल शर्तें निहित हैं:
- रूसी तेल पर पूर्ण प्रतिबंध: अमेरिका ने भारत पर लगाए गए 25% दंडात्मक टैरिफ को इस शर्त पर हटाया है कि भारत रूस से तेल का आयात बंद करेगा।
- ऊर्जा विविधीकरण का दबाव: भारत को रूस के स्थान पर अमेरिका से "अत्यधिक" तेल खरीदने और लगभग 500 बिलियन डॉलर के अमेरिकी उत्पादों की खरीद के लिए प्रतिबद्ध होना पड़ेगा।
- टैरिफ संरचना: भारत अमेरिकी वस्तुओं पर टैरिफ को "शून्य" करने पर सहमत हुआ है, जबकि अमेरिका भारतीय वस्तुओं पर 18% टैरिफ बनाए रख सकता है।
- रणनीतिक संरेखण: सबसे विवादास्पद बिंदु यह है कि भारत को राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेश नीति और आर्थिक मामलों में अमेरिका के साथ "पर्याप्त रूप से संरेखित" होना होगा।
भारत के लिए चिंताजनक पहलू
- रणनीतिक स्वायत्तता का क्षरण
- भारत ऐतिहासिक रूप से अपनी निर्णय लेने की स्वतंत्रता के लिए जाना जाता है। रूस से तेल आयात बंद करने और ईरान के साथ व्यापारिक संबंधों (विशेष रूप से चाबहार बंदरगाह) को सीमित करने का दबाव भारत की 'बहु-संरेखण' नीति के विरुद्ध है।
- व्यापारिक असंतुलन और अन्य भागीदारों पर प्रभाव
- $500 बिलियन की प्रतिबद्धता: यदि भारत इतनी बड़ी राशि का आयात केवल अमेरिका से करता है, तो अन्य व्यापारिक भागीदारों (जैसे यूरोपीय संघ, न्यूजीलैंड, EFTA) के लिए भारतीय बाजार में स्थान सीमित हो जाएगा।
- ग्लोबल साउथ का नेतृत्व: भारत को विकासशील देशों की आवाज़ माना जाता है। अमेरिका के एकतरफा प्रतिबंधों के आगे झुकना भारत की इस छवि को प्रभावित कर सकता है।
- ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक लागत
- एक ओर रूस भारत को रियायती दरों पर तेल उपलब्ध करा रहा है, वहीं दूसरी ओर अमेरिकी दबाव में महंगे ऊर्जा स्रोतों की ओर मुड़ना भारत के राजकोषीय घाटे और मुद्रास्फीति को प्रभावित कर सकता है।
भू-राजनीतिक प्रभाव
- चीन को लाभ: यदि भारत ईरान के साथ संबंधों और चाबहार जैसी परियोजनाओं से पीछे हटता है, तो यह मध्य एशिया में चीन के 'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव' (BRI) के लिए निर्विवाद मार्ग प्रशस्त कर देगा।
- ब्रिक्स (BRICS) की प्रासंगिकता: भारत आगामी ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी करने वाला है। ऐसे में रूस और ईरान के विरुद्ध अमेरिकी शर्तों को स्वीकार करना कूटनीतिक रूप से असहज स्थिति पैदा कर सकता है।
ऐतिहासिक संदर्भ: RCEP बनाम वर्तमान समझौता
वर्ष 2019 में, भारत ने क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (RCEP) से केवल इसलिए बाहर निकलने का निर्णय लिया था क्योंकि वह चीनी आर्थिक प्रभुत्व और घरेलू उद्योगों के हितों के साथ समझौता नहीं करना चाहता था। आलोचकों का तर्क है कि वर्तमान अमेरिका-भारत समझौता संप्रभुता और आर्थिक चयन पर RCEP से भी अधिक "कठोर" मांगें कर रहा है।
निष्कर्ष
भारत-अमेरिका संबंध वर्तमान वैश्विक व्यवस्था के सबसे महत्वपूर्ण स्तंभों में से एक हैं, परंतु आर्थिक लाभ की कीमत सामरिक संप्रभुता नहीं होनी चाहिए। भारत को व्यापारिक समझौतों को अंतिम रूप देने से पहले "महात्मा गांधी के ताबीज" (सबसे कमजोर व्यक्ति पर प्रभाव) और "राष्ट्रीय हित की दीर्घकालिक स्थिरता" के मापदंडों पर इसे परखना होगा। किसी भी समझौते को "सिद्धांतहीन व्यावहारिकता" के बजाय "सिद्धांतवादी यथार्थवाद" पर आधारित होना चाहिए।