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समाचार
- दो नए स्थल: हाल ही में गुजरात के कच्छ स्थित 'छारी-ढंड' और उत्तर प्रदेश के एटा स्थित 'पटना पक्षी अभयारण्य' को अंतर्राष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमियों (रामसर साइट्स) के रूप में मान्यता दी गई है।
- पीएम की सराहना: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस उपलब्धि पर बधाई देते हुए कहा कि यह मान्यता जैव विविधता के संरक्षण और पारिस्थितिक तंत्र की रक्षा के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाती है।
- विशेषता: ये स्थल न केवल प्रवासी पक्षियों का घर हैं, बल्कि चिंकारा, भेड़िये और मरुस्थलीय लोमड़ियों जैसे जीवों के लिए भी महत्वपूर्ण आवास प्रदान करते हैं।
रामसर कन्वेंशन क्या है?
- यह आर्द्रभूमियों के संरक्षण और उनके संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय संधि है।
- इस संधि पर 2 फरवरी 1971 को ईरानी शहर रामसर में हस्ताक्षर किए गए थे, इसीलिए इसे 'रामसर कन्वेंशन' कहा जाता है।
- दुनिया भर में आर्द्रभूमियों के पारिस्थितिक तंत्र को नष्ट होने से बचाना, क्योंकि इन्हें "पृथ्वी के गुर्दे" के रूप में जाना जाता है जो जल को शुद्ध करने और बाढ़ नियंत्रण में मदद करते हैं।
भारत में वर्तमान रामसर साइट्स
कुल संख्या: इन दो नए स्थलों के जुड़ने के बाद भारत में रामसर साइट्स की कुल संख्या 98 हो गई है।
विस्तार: 2014 में भारत में केवल 26 रामसर साइट्स थीं। पिछले एक दशक में इसमें 276% से अधिक की वृद्धि हुई है।
सर्वाधिक साइट्स वाला राज्य: वर्तमान में तमिलनाडु (18) सबसे अधिक रामसर साइट्स वाला राज्य है, जिसके बाद उत्तर प्रदेश (11) का स्थान आता है।
संदर्भ
हाल ही में वैश्विक भू-राजनीति और समुद्री सुरक्षा के संदर्भ में चीन द्वारा विवादित जलक्षेत्र में अपनी सैन्य उपस्थिति को आक्रामक रूप से बढ़ाने की खबरें चर्चा का विषय बनी हुई हैं।
वर्तमान समाचार
- सरकारी मीडिया (CCTV) की रिपोर्ट के अनुसार, चीन के कोस्ट गार्ड ने पिछले पांच वर्षों में सेनकाकू द्वीपों के आसपास कुल 134 गश्त आयोजित की हैं।
- इस दौरान चीन ने 5,50,000 जहाजों और 6,000 विमानों की विशाल तैनाती की है। विशेष रूप से वर्ष 2025 में, चीन ने साल के 357 दिन इस क्षेत्र में गश्त की, जो इस विवादित क्षेत्र पर अपना प्रभुत्व जमाने की बीजिंग की सोची-समझी रणनीति को दर्शाता है।
सेनकाकू द्वीप: स्थान और प्रशासनिक स्थिति
- यह निर्जन द्वीपों का एक समूह है, जो पूर्वी चीन सागर में स्थित है। यह जापान के ओकिनावा के पश्चिम और चीन के मुख्य भूभाग के पूर्व में स्थित है।
- जापान में इन्हें 'सेनकाकू' कहा जाता है, जबकि चीन इन्हें 'दियाओयू' और ताइवान इन्हें 'तियाओयुताई' के नाम से पुकारता है।
- वर्तमान में ये द्वीप जापान के प्रशासनिक नियंत्रण में हैं। जापान का तर्क है कि 1895 से ये उसके क्षेत्र का हिस्सा हैं, जबकि चीन 1970 के दशक से इन पर अपना ऐतिहासिक दावा पेश करता रहा है।
द्वीप का महत्व
- रणनीतिक स्थिति: यह द्वीप समूह प्रमुख समुद्री व्यापार मार्गों के निकट स्थित है, जो सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- प्राकृतिक संसाधन: इन द्वीपों के आसपास के समुद्र में मछली पकड़ने के समृद्ध क्षेत्र हैं। इसके अतिरिक्त, समुद्री तल के नीचे तेल और प्राकृतिक गैस के विशाल भंडार होने की संभावना है।
- विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ): इन द्वीपों पर नियंत्रण का अर्थ है एक विशाल विशेष आर्थिक क्षेत्र पर अधिकार, जो किसी भी देश की आर्थिक शक्ति को बढ़ा सकता है।
भारत एवं सेनकाकू द्वीप:
- यद्यपि भारत इस क्षेत्रीय विवाद में सीधे तौर पर शामिल नहीं है, लेकिन 'इंडो-पैसिफिक' क्षेत्र की स्थिरता भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- चीन की यह 'सैलमी स्लाइसिंग' (धीरे-धीरे क्षेत्र पर कब्जा करने की रणनीति) भारत के लिए चिंता का विषय है, क्योंकि इसी तरह का आक्रामक व्यवहार भारत की हिमालयी सीमाओं और हिंद महासागर में भी देखा जाता है।
निष्कर्ष:
सेनकाकू द्वीप पर बढ़ता तनाव अंतरराष्ट्रीय नियमों पर आधारित समुद्री व्यवस्था के लिए एक चुनौती है। भारत एक स्वतंत्र, खुले और समावेशी इंडो-पैसिफिक का पक्षधर है। जापान के साथ भारत की प्रगाढ़ रणनीतिक साझेदारी को देखते हुए, भारत इस क्षेत्र में शांतिपूर्ण समाधान और 'यथास्थिति' को बनाए रखने का समर्थन करता है, ताकि वैश्विक व्यापार और सुरक्षा निर्बाध रूप से जारी रहे।
न्यूज़
- हाल ही में 22 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने शिक्षा मंत्रालय के सुझावों पर प्रतिक्रिया देते हुए केंद्र सरकार से PM पोषण योजना के तहत काम करने वाले रसोइयों और सहायकों के मानदेय को बढ़ाने का आग्रह किया है।
- वर्तमान में यह मानदेय काफी समय से स्थिर है, और राज्य सरकारों का तर्क है कि बढ़ती महंगाई के कारण इसे संशोधित करना अनिवार्य है।
- सरकार ने मुद्रास्फीति को ध्यान में रखते हुए PM पोषण बास्केट के लिए 'सामग्री लागत' में 9.5% की वृद्धि का प्रावधान किया था, जो वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए लागू है।
- नए बजट सत्र से पहले इस लागत और केंद्र-राज्य के बीच फंड शेयरिंग (60:40) की समीक्षा की जा रही थी
प्रधानमंत्री पोषण योजना
- पूर्ण नाम और पुनर्संरचना: इसका पूरा नाम 'प्रधानमंत्री पोषण शक्ति निर्माण' है। सितंबर 2021 में केंद्र सरकार ने पूर्ववर्ती 'मिड-डे मील योजना' को अगले 5 वर्षों (2021-22 से 2025-26) के लिए नया स्वरूप देते हुए इसका नाम बदल दिया था।
- नोडल मंत्रालय: यह शिक्षा मंत्रालय द्वारा संचालित एक केंद्र प्रायोजित योजना है। इसमें केंद्र और राज्यों के बीच लागत का बंटवारा सामान्य राज्यों के लिए 60:40 और उत्तर-पूर्वी राज्यों/हिमालयी राज्यों के लिए 90:10 के अनुपात में होता है।
- लाभार्थी: यह योजना सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों के कक्षा 1 से 8 तक के बच्चों को कवर करती है। नए प्रारूप में अब इसमें 'बालवाटिका' (प्री-प्राइमरी कक्षाओं) के बच्चों को भी शामिल किया गया है।
- मुख्य विशेषताएं:
- तिथि भोजन: सामुदायिक भागीदारी को बढ़ावा देना, जहाँ लोग विशेष अवसरों पर बच्चों को अतिरिक्त पौष्टिक भोजन प्रदान करते हैं।
- पोषण वाटिका: स्कूलों में ताजी सब्जियां और फल उगाने के लिए छोटे बगीचे विकसित करना।
- सोशल ऑडिट: योजना के पारदर्शी क्रियान्वयन के लिए बाहरी एजेंसियों द्वारा ऑडिट अनिवार्य किया गया है।
- DBT (डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर): खाना पकाने की लागत और मानदेय का भुगतान सीधे संबंधित खातों में सुनिश्चित करना।
निष्कर्ष:
PM पोषण योजना का लक्ष्य न केवल बच्चों की स्कूल में उपस्थिति और नामांकन बढ़ाना है, बल्कि देश के भविष्य (बच्चों) में कुपोषण की समस्या को जड़ से समाप्त करना है। आगामी बजट में इसके आवंटन में वृद्धि भारत के 'सक्षम भारत-सशक्त भारत' के संकल्प को और मजबूती देगी।
संदर्भ:
भारत के आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26 ने पहली बार 'पावर गैप इंडेक्स' का संदर्भ देते हुए भारत की वैश्विक स्थिति पर एक गंभीर बहस छेड़ दी है। सर्वेक्षण के अनुसार, भारत एक 'रणनीतिक विरोधाभास' का सामना कर रहा है।
पावर गैप इंडेक्स क्या है?
- यह सिडनी स्थित लोवी इंस्टीट्यूट द्वारा जारी 'एशिया पावर इंडेक्स' का एक विश्लेषणात्मक हिस्सा है।
- यह सूचकांक किसी देश की 'शक्ति दक्षता' को मापता है। यह बताता है कि एक देश अपने संसाधनों (धन और सेना) को वास्तविक क्षेत्रीय प्रभाव (कूटनीति और नेटवर्क) में कितनी कुशलता से बदल पाता है।
- शक्ति अंतराल = व्यापक शक्ति स्कोर – प्रत्याशित शक्ति स्कोर
- संकेत:
- धनात्मक (+) स्कोर: 'स्मार्ट पावर' या अपनी क्षमता से अधिक प्रदर्शन करने वाला (जैसे ऑस्ट्रेलिया +8.0)।
- ऋणात्मक (-) स्कोर: 'अप्रतिपादित क्षमता' या अपनी क्षमता से कम प्रदर्शन करने वाला।
भारत की वर्तमान स्थिति: 'प्रमुख शक्ति' बनाम 'अल्प-प्रदर्शन'
एशिया पावर इंडेक्स 2025 में भारत के आंकड़े एक मिश्रित तस्वीर पेश करते हैं:
मानक | भारत की स्थिति | विवरण |
रैंकिंग | तीसरी (3rd) | अमेरिका और चीन के बाद सबसे शक्तिशाली देश। |
व्यापक शक्ति स्कोर | 40.0 / 100 | पहली बार ‘मेजर पावर' की श्रेणी में प्रवेश। |
पावर गैप स्कोर | -4.0 | एशिया में सबसे कम (रूस और उत्तर कोरिया को छोड़कर)। |
रणनीतिक विरोधाभास: भारत अब एक 'मेजर पावर' है, लेकिन इसका नकारात्मक स्कोर (-4.0) यह दर्शाता है कि भारत अपनी पूर्ण रणनीतिक क्षमता का उपयोग नहीं कर पा रहा है।
भारत के पिछड़ने के मुख्य कारण
सर्वेक्षण के अनुसार, भारत संसाधन के मामले में मजबूत है लेकिन प्रभाव के मामले में कमजोर:
- आर्थिक संबंधों की कमी (9वीं रैंक): भारत की जीडीपी बड़ी है, लेकिन वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और व्यापारिक संबंधों में हम चीन या वियतनाम जितने एकीकृत नहीं हैं।
- रक्षा नेटवर्क की कमजोरी (11वीं रैंक): विशाल सेना के बावजूद, क्षेत्रीय रक्षा गठबंधन और सैन्य कूटनीति में भारत का प्रभाव अभी भी विकसित हो रहा है।
- सॉफ्ट पावर में गिरावट: ग्लोबल सॉफ्ट पावर इंडेक्स 2026 में भारत 32वें स्थान पर खिसक गया है। इसका कारण सुशासन और सतत विकास संकेतकों में धीमी गति को माना गया है।
आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 का 'कॉल टू एक्शन'
आर्थिक सर्वेक्षण ने भारत के लिए भविष्य की राह सुझाई है:
- स्थिरता का प्रदाता: भारत को केवल बाहरी झटकों से बचने वाला देश नहीं, बल्कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता और अवसर प्रदान करने वाला 'नेट सुरक्षा प्रदाता' बनना होगा।
- विकसित भारत का लक्ष्य: 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने के लिए घरेलू क्षमताओं को वैश्विक उत्पादन प्रणालियों के साथ जोड़ना अनिवार्य है।
- कूटनीतिक फोकस: रक्षा नेटवर्क और आर्थिक संबंधों में सुधार करना अब भारत की प्राथमिकता होनी चाहिए।
निष्कर्ष
पावर गैप इंडेक्स यह स्पष्ट करता है कि केवल आर्थिक या सैन्य आकार काफी नहीं है। भारत के लिए असली चुनौती अपनी हार्ड पावर (संसाधन) को स्मार्ट पावर (प्रभाव) में बदलने की है। जब तक भारत अपने नकारात्मक अंतराल (-4.0) को कम नहीं करता, तब तक वह अपनी वास्तविक रणनीतिक क्षमता का पूर्ण लाभ नहीं उठा पाएगा।
सामान्य अध्ययन पेपर – III प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन
संदर्भ
ऐतिहासिक रूप से, ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD) एक जटिल न्यूरो-डेवलपमेंटल स्थिति रही है जिसका कोई निश्चित 'इलाज' नहीं है। पिछले एक दशक में, भारत सहित विश्व भर में 'स्टेम सेल थेरेपी' (SCT) को एक "चमत्कारी समाधान" के रूप में प्रचारित किया गया। कई निजी क्लीनिकों ने वैज्ञानिक प्रमाणों के बिना इसे व्यावसायिक सेवा के रूप में बेचना शुरू कर दिया। अगस्त 2023 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने माता-पिता की स्वायत्तता को प्राथमिकता देते हुए इसे जारी रखने की अनुमति दी थी, लेकिन हाल ही में 30 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए इसे 'अनैतिक' करार दिया है।
स्टेम सेल क्या है?
स्टेम कोशिकाएं शरीर की अविभेदित कोशिकाएं होती हैं, जिनमें स्व-नवीनीकरण और बहु-शक्तियता का अद्वितीय गुण होता है। ये कोशिकाएं शरीर की किसी भी विशिष्ट कार्यात्मक कोशिका (जैसे न्यूरॉन्स, मांसपेशियां या रक्त कोशिकाएं) के रूप में विकसित होने की क्षमता रखती हैं, जिन्हें 'मास्टर सेल्स' भी कहा जाता है।
इन्हें मुख्य रूप से दो वर्गों में विभाजित किया जाता है:
- भ्रूणीय स्टेम सेल (ESCs): ये 'ब्लास्टोसिस्ट' चरण से प्राप्त होती हैं और प्लुरिपोटेंट होती हैं, अर्थात ये शरीर की किसी भी कोशिका का रूप ले सकती हैं।
- वयस्क या दैहिक स्टेम सेल: ये विशिष्ट ऊतकों (जैसे अस्थि मज्जा या गर्भनाल) में पाई जाती हैं। इनमें मुख्य रूप से मेसेनकाइमल स्टेम सेल्स (MSCs) का प्रयोग ऑटिज्म जैसे विकारों के शोध में किया जाता है।
चर्चा में क्यों?
सुप्रीम कोर्ट ने यश चैरिटेबल ट्रस्ट बनाम भारत संघ मामले में निम्नलिखित महत्वपूर्ण बातें कहीं:
- अनैतिक अभ्यास: बिना ठोस वैज्ञानिक प्रमाण के ऑटिज्म के लिए स्टेम सेल का प्रयोग 'प्रोफेशनल मिसकंडक्ट' (व्यावसायिक कदाचार) माना जाएगा।
- सहमति की वैधता: कोर्ट ने कहा कि यदि डॉक्टर के पास स्वयं पर्याप्त जानकारी नहीं है, तो माता-पिता द्वारा दी गई 'सहमति' अवैध है क्योंकि वे उपचार के जोखिमों से अनभिज्ञ हैं।
- व्यावसायिक सेवा पर रोक: स्टेम सेल को केवल 'अनुमोदित क्लिनिकल ट्रायल' के भीतर ही इस्तेमाल किया जा सकता है, इसे क्लिनिक में 'इलाज' के रूप में नहीं बेचा जा सकता।
अब आगे क्या होगा?
- चार सप्ताह का समय: कोर्ट ने स्वास्थ्य मंत्रालय, AIIMS और राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) को निर्देश दिया है कि वे उन मरीजों के लिए 'वे फॉरवर्ड' तैयार करें जो पहले से यह थेरेपी ले रहे हैं।
- नियामक संस्था: केंद्र को एक समर्पित नियामक प्राधिकरण नियुक्त करने का सुझाव दिया गया है जो स्टेम सेल अनुसंधान की निगरानी करे।
निर्णय का प्रभाव
- मरीजों की सुरक्षा: यह निर्णय असुरक्षित और अप्रमाणित उपचारों से ऑटिस्टिक बच्चों के स्वास्थ्य और उनके परिवारों के आर्थिक शोषण को बचाएगा।
- चिकित्सा नैतिकता: डॉक्टरों की जवाबदेही बढ़ेगी और 'रीज़नेबल स्टैंडर्ड ऑफ केयर' का महत्व स्थापित होगा।
- शोध को दिशा: अब संसाधन केवल वैज्ञानिक रूप से वैध क्लिनिकल ट्रायल्स की ओर निर्देशित होंगे।
भारत के बाहर प्रावधान
- USA (FDA): अमेरिका में केवल कुछ रक्त संबंधी रोगों के लिए स्टेम सेल उपचार अनुमोदित है। ऑटिज्म के लिए इसे 'अवैध' और 'असुरक्षित' माना जाता है जब तक कि वह FDA-अनुमोदित ट्रायल न हो।
- EU (EMA): यूरोपीय संघ में भी स्टेम सेल उत्पादों के लिए कड़े ‘उन्नत उपचारात्मक औषधि-उत्पाद ' (ATMP) नियम लागू हैं।
- ISSCR: 'इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर स्टेम सेल रिसर्च' वैश्विक स्तर पर बिना प्रमाण वाले उपचारों का विरोध करती है।
भारत में नियम एवं संवैधानिक प्रावधान
- संवैधानिक प्रावधान: * अनुच्छेद 21: जीवन का अधिकार (जिसमें सुरक्षित स्वास्थ्य देखभाल शामिल है)।
- अनुच्छेद 47: सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार करना राज्य का कर्तव्य है।
- कानूनी ढांचा:
- नेशनल गाइडलाइन्स फॉर स्टेम सेल रिसर्च (2017): इसके तहत केवल 'हेमटोपोइएटिक स्टेम सेल' का उपयोग रक्त विकारों के लिए मान्य है, अन्य सब 'प्रायोगिक' हैं।
- NMC अधिनियम/IMC विनियम 2002: अनैतिक अभ्यास के लिए डॉक्टरों का लाइसेंस रद्द करने का प्रावधान।
विश्लेषण
यह मामला 'आशा बनाम विज्ञान' का द्वंद्व है। जहां माता-पिता सुधार की एक छोटी सी किरण के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं, वहीं राज्य की जिम्मेदारी है कि वह भावनाओं के आधार पर असुरक्षित चिकित्सा पद्धतियों को पनपने न दे। भारत में 'विधिक रिक्तता' का लाभ उठाकर निजी क्लिनिक फल-फूल रहे थे। सुप्रीम कोर्ट का यह हस्तक्षेप एक 'सिस्टम फेलियर' को दुरुस्त करने का प्रयास है।
आगे की राह
- विशेष कानून: भारत को 'स्टेम सेल (नियमन) अधिनियम' की आवश्यकता है जो अनुसंधान और उपचार के बीच स्पष्ट रेखा खींचे।
- एकीकृत निगरानी: NAC-SCRT (नेशनल अपैक्स समिति फॉर स्टेम सेल रिसर्च एंड थेरेपी) जैसी संस्थाओं को अधिक शक्तियां प्रदान करना।
- जागरूकता: माता-पिता को साक्ष्य-आधारित उपचारों (जैसे बिहेवियरल थेरेपी) के प्रति जागरूक करना ताकि वे 'मिरेकल क्योर' के झांसे में न आएं।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय 'उपचारात्मक स्वायत्तता' और 'वैज्ञानिक साक्ष्यों' के मध्य एक आवश्यक संतुलन स्थापित करता है। यह आदेश केवल एक निषेध नहीं, बल्कि चिकित्सा क्षेत्र में 'सावधानी सिद्धांत' की पुष्टि है, जो अनियंत्रित व्यावसायिक प्रयोगों से ऑटिस्टिक बच्चों के स्वास्थ्य और मानवाधिकारों की रक्षा करता है। भविष्य में, एक सुदृढ़ नियामक ढांचे और साक्ष्य-आधारित चिकित्सा ही भारत को जैव-प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में नैतिक और वैश्विक नेतृत्व प्रदान कर सकती है।
सामान्य अध्ययन पेपर – III प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन
संदर्भ
हालिया रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली के पर्यावरण और स्वास्थ्य को लेकर एक बड़ी चिंता सामने आई है। 'द एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट' (TERI) द्वारा किए गए एक अपनी तरह के पहले अध्ययन में दिल्ली के भूजल में माइक्रो-प्लास्टिक्स के अंश मिले हैं। TERI ने पिछले नवंबर में इसकी अंतरिम रिपोर्ट दिल्ली सरकार को सौंपी थी, जो अब सार्वजनिक हो चुकी है।
माइक्रोप्लास्टिक क्या है?
माइक्रोप्लास्टिक्स प्लास्टिक के वे अत्यंत सूक्ष्म कण होते हैं जिनका आकार 5 मिलीमीटर से भी कम होता है। ये दो प्रकार के होते हैं:
- प्राथमिक माइक्रोप्लास्टिक: जो विशेष रूप से सौंदर्य प्रसाधनों (जैसे फेस वॉश में माइक्रोबीड्स) या औद्योगिक प्रक्रियाओं के लिए छोटे आकार में ही बनाए जाते हैं।
- द्वितीयक माइक्रोप्लास्टिक: जो प्लास्टिक की बड़ी वस्तुओं (बोतलें, टायर, कपड़े) के टूटने, घिसने या प्राकृतिक क्षरण के कारण उत्पन्न होते हैं।
चर्चा में क्यों है?
- पहली बार दिल्ली के सभी 11 जिलों के भूजल नमूनों में माइक्रोप्लास्टिक्स की पुष्टि हुई है।
- अध्ययन के अनुसार, यमुना नदी के किनारों की मिट्टी और नदी के पानी से प्लास्टिक रिसकर जमीन के नीचे स्थित जल स्रोतों तक पहुँच रहा है।
- यह रिपोर्ट दर्शाती है कि हमारा जल शोधन तंत्र इन सूक्ष्म कणों को छानने में सक्षम नहीं है।
माइक्रोप्लास्टिक के प्रभाव
माइक्रोप्लास्टिक्स केवल पर्यावरण ही नहीं, बल्कि मानव शरीर को भी भीतर से खोखला कर रहे हैं:
- स्वास्थ्य प्रभाव: ये कण रक्त, फेफड़ों और यहाँ तक कि गर्भनाल में भी पाए गए हैं। इनसे कैंसर, प्रजनन क्षमता में कमी हार्मोनल असंतुलन और श्वसन संबंधी गंभीर बीमारियाँ (जैसे फाइब्रोसिस) होने का खतरा रहता है।
- प्रदूषण का प्रकार: यह एक 'बायो-मैग्नीफिकेशन' प्रक्रिया है, जहाँ छोटे जीव इसे खाते हैं और खाद्य श्रृंखला के माध्यम से यह मानव शरीर तक पहुँचता है।
- मिट्टी की उर्वरता: ये कण मिट्टी की संरचना को बिगाड़ देते हैं जिससे भूमि की जल सोखने की क्षमता कम हो जाती है।
भारत में पूर्व परीक्षण एवं परिणाम
दिल्ली से पहले भी भारत के विभिन्न हिस्सों में ऐसे डरावने संकेत मिले हैं:
- पुणे (मुला नदी): मानसून से पूर्व यहाँ जल में अत्यधिक मात्रा में माइक्रोप्लास्टिक्स पाए गए।
- चेन्नई: तमिलनाडु प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने लैंडफिल साइटों के पास के भूजल में इनकी पुष्टि की थी।
- नागपुर: हालिया शोध में यहाँ की झीलों और बोतलबंद पानी में भी ये कण मिले हैं।
- समुद्र: हिंद महासागर के तटीय क्षेत्रों में मछलियों और समुद्री जीवों के भीतर बड़े पैमाने पर प्लास्टिक के अंश मिले हैं।
सरकारी कदम एवं संवैधानिक प्रावधान
भारत में प्लास्टिक प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए निम्नलिखित कानूनी ढाँचा मौजूद है:
- प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियम (2016 & 2021 संशोधन): इसके तहत एकल-उपयोग प्लास्टिक प्रतिबंध लगाया गया और प्लास्टिक बैग की मोटाई बढ़ाकर 120 माइक्रोन की गई।
- विस्तारित निर्माता उत्तरदायित्व (EPR): निर्माताओं को अपने द्वारा उत्पादित प्लास्टिक कचरे के पुनर्चक्रण की जिम्मेदारी दी गई है।
- संवैधानिक प्रावधान: भारतीय संविधान का अनुच्छेद 48A राज्य को पर्यावरण की रक्षा करने का निर्देश देता है, और अनुच्छेद 51A (g) नागरिकों का यह मूल कर्तव्य बताता है कि वे प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा करें।
अंतर्राष्ट्रीय प्रावधान
- UNEA संकल्प 5/14: 2022 में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण सभा में 175 देशों ने प्लास्टिक प्रदूषण को समाप्त करने के लिए एक कानूनी रूप से बाध्यकारी वैश्विक संधि पर सहमति व्यक्त की।
- बेसल कन्वेंशन: यह खतरनाक कचरे के सीमा पार संचलन और निपटान को नियंत्रित करता है, जिसमें प्लास्टिक कचरा भी शामिल है।
- MARPOL संधि: यह जहाजों द्वारा समुद्र में प्लास्टिक फेंकने पर रोक लगाती है।
विश्लेषण
दिल्ली की यह रिपोर्ट एक 'सिस्टम फेलियर' की ओर इशारा करती है। यदि भूजल, जो कि जीवन का आधार है, दूषित हो चुका है, तो इसका अर्थ है कि हमारा कचरा प्रबंधन तंत्र पूरी तरह विफल रहा है। प्लास्टिक का न गलना और सूक्ष्म रूप में जल चक्र में मिल जाना आने वाली पीढ़ियों के लिए एक स्वास्थ्य आपातकाल की स्थिति पैदा कर रहा है।
आगे की राह
- उन्नत शोधन तकनीक: वाटर ट्रीटमेंट प्लांट्स में नैनो-फिल्ट्रेशन और मेम्ब्रेन बायो-रिएक्टर जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग।
- विकल्पों को बढ़ावा: बायो-प्लास्टिक और टिकाऊ विकल्पों (जैसे जूट, कपड़ा, बांस) का उपयोग अनिवार्य करना।
- सख्त कार्यान्वयन: EPR और एकल-उपयोग प्लास्टिक प्रतिबंध का कड़ाई से पालन।
- जन जागरूकता: नागरिकों को प्लास्टिक के सूक्ष्म खतरों के प्रति जागरूक करना ताकि वे स्रोत पर ही कचरा अलग करें।
निष्कर्ष
निष्कर्षतः, दिल्ली के भूजल में माइक्रोप्लास्टिक्स की उपस्थिति केवल एक पर्यावरणीय खबर नहीं, बल्कि एक गंभीर चेतावनी है। यह हमारे विकास के मॉडल पर प्रश्नचिन्ह लगाता है। यदि समय रहते वैज्ञानिक समाधान और कड़े कानूनी प्रावधान लागू नहीं किए गए, तो 'साफ पानी' भविष्य में केवल किताबों तक ही सीमित रह जाएगा।