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वस्तुओं के निर्यात में 20% का उछाल: नए बाजारों और वैकल्पिक मार्गों से मिली मजबूती लेकिन बढ़ता व्यापार घाटा बना नई चुनौती

सामान्य अध्ययन पेपर – III:  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन।

सामान्य अध्ययन पेपर – III:  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन।

संदर्भ

वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं और पश्चिम एशिया में जारी सैन्य संकट के बावजूद भारत के विदेश व्यापार में सकारात्मक बदलाव देखे गए हैं। वाणिज्य मंत्रालय के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, जुलाई 2026 में भारत के वस्तुओं के निर्यात में तीव्र वृद्धि दर्ज की गई है। वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल के अनुसार, यह सुधार रणनीतिक रूप से नए व्यापारिक मार्गों के चयन, नौवहन लाइनों के मार्ग परिवर्तन और नए बाजारों में विविधीकरण के कारण संभव हुआ है।

हालिया समाचार बिंदु

  • पश्चिम एशिया में सुधार: लाल सागर संकट और क्षेत्रीय तनाव के कारण मार्च में 57% और अप्रैल में 27% की भारी गिरावट के बाद, जुलाई 2026 में पश्चिम एशिया को होने वाला निर्यात सुधरकर $5.7 बिलियन (8.8% से 9% की वृद्धि) पर पहुँच गया।

  • नए बंदरगाहों का उपयोग: संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के जेबेल अली बंदरगाह पर दबाव के कारण ओमान के होर्मुज जलडमरूमध्य से बाहर स्थित बंदरगाहों तथा यूएई के फुजैराह एवं खोर फक्कन बंदरगाहों के माध्यम से माल की आवाजाही बढ़ाई गई।
  • चीन अफ्रीका के साथ व्यापार में वृद्धि: निम्न आधार के बावजूद जुलाई में चीन को निर्यात 65% बढ़कर $2.2 बिलियन हो गया। वहीं तंजानिया को होने वाले निर्यात में 130% की ऐतिहासिक वृद्धि दर्ज की गई।
  • सेवा क्षेत्र का प्रदर्शन: एचएसबीसी इंडिया सर्विसेज पीएमआई रिपोर्ट के अनुसार सेवा क्षेत्र के ऑर्डर में नरमी रही, जिससे सेवाओं का निर्यात धीमी गति से बढ़ा।

सांख्यिकी एवं आँकड़े

  • वस्तुओं का निर्यात: जुलाई 2026 में $44.2 बिलियन (19.6% की वृद्धि)

  • वस्तुओं का आयात: जुलाई 2026 में $76.2 बिलियन (17.5% की वृद्धि)
  • कुल व्यापार:
    • कुल निर्यात (जुलाई 2026): $80.14 बिलियन (जुलाई 2025 के $70.72 बिलियन की तुलना में 13.31% वृद्धि)
    • कुल आयात (जुलाई 2026): $95.16 बिलियन (जुलाई 2025 के $82.16 बिलियन की तुलना में 15.83% वृद्धि)
  • सेवा क्षेत्र (Services): सेवाओं का निर्यात $35.9 बिलियन (6.4% वृद्धि) तथा सेवाओं का आयात $18.9 बिलियन (9.5% वृद्धि) रहा।
  • व्यापार घाटा: सेवा आयात की गति तेज होने के कारण कुल व्यापार घाटा जुलाई 2025 के $11.4 बिलियन से बढ़कर जुलाई 2026 में $15 बिलियन हो गया।

अन्य महत्वपूर्ण बिंदु

  • नए निर्यात गंतव्य भारत पारंपरिक बाजारों से इतर सिंगापुर, जापान, दक्षिण कोरिया, ताइवान, वियतनाम, ऑस्ट्रिया, मलेशिया, केन्या तथा दक्षिण अफ्रीकी सीमा शुल्क संघ (SACU) जैसे क्षेत्रों में अपनी पहुँच का सफलतापूर्वक विस्तार कर रहा है।

  • लॉजिस्टिक्स और अवसंरचनात्मक बदलाव परंपरागत शिपिंग रूट पर बाधा आने के बाद बुनियादी ढाँचे का उन्नयन कर नए समुद्री मार्गों और बंदरगाहों से माल की आपूर्ति बहाल की गई है।

महत्व

यह वृद्धि दर्शाती है कि भारत का बाह्य व्यापार क्षेत्र वैश्विक भू-राजनीतिक झटकों को सहन करने में सक्षम है। गैर-पारंपरिक बाजारों में विविधीकरण से किसी एक क्षेत्र या देश पर भारत की आर्थिक निर्भरता कम हुई है, जिससे दीर्घकालिक व्यापारिक स्थिरता को बल मिलता है।

चिंताएं

  • बढ़ता व्यापार घाटा: वस्तुओं का आयात और सेवाओं का आयात तेज गति से बढ़ने के कारण व्यापार घाटा $15 बिलियन तक चौड़ा हो गया है।
  • सेवा निर्यात में सुस्ती: सेवाओं का आयात (9.5%), सेवाओं के निर्यात (6.4%) से अधिक गति से बढ़ा है, जो भारत के पारंपरिक रूप से मजबूत सेवा क्षेत्र के लिए चिंताजनक है।
  • शिपिंग लागत भू-राजनीतिक जोखिम: सुएज़ नहर और होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे क्षेत्रों में अनिश्चितता के कारण माल ढुलाई (Freight) लागत और लॉजिस्टिक्स संबंधी जोखिम बने हुए हैं।

आगे का रास्ता

  • भारत को नए बाजारों के साथ मुक्त व्यापार समझौतों (FTAs) को तेजी से लागू करना चाहिए।

  • लॉजिस्टिक्स लागत को घटाने के लिए वैकल्पिक समुद्री और हवाई गलियारों का स्थायी ढाँचा तैयार करने की आवश्यकता है।
  • सेवा क्षेत्र के निर्यात में आई सुस्ती को दूर करने के लिए वित्तीय, सूचना प्रौद्योगिकी और व्यावसायिक सेवाओं के अंतरराष्ट्रीय विस्तार को नए सिरे से प्रोत्साहन देना होगा।

निष्कर्ष

वैश्विक संकटों के बीच भारत का निर्यात विविधीकरण और 20% की वृद्धि देश की आर्थिक जुझारू क्षमता को दर्शाती है। हालाँकि, बढ़ते व्यापार घाटे और सेवा क्षेत्र की धीमी गति को संतुलित करने के लिए निरंतर नीतिगत सुधारों और बुनियादी ढाँचे के सुदृढ़ीकरण की आवश्यकता बनी रहेगी।


यूरोपीय संघ का AI अधिनियम: वैश्विक नियमन के बीच भारतीय IT उद्योग के लिए संभावनाओं का नया मार्ग

सामान्य अध्ययन पेपर – II:  शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध।

सामान्य अध्ययन पेपर – III:  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन।

संदर्भ

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) 21वीं सदी की सबसे परिवर्तनकारी प्रौद्योगिकियों में से एक बनकर उभरी है। जैसे-जैसे AI का उपयोग स्वास्थ्य, शिक्षा, वित्त और रोजगार जैसी संवेदनशील प्रणालियों में बढ़ रहा है, वैसे-वैसे इसके नैतिक उपयोग, गोपनीयता और डेटा सुरक्षा को लेकर वैश्विक स्तर पर नियमन की आवश्यकता महसूस की जा रही है। वैश्विक नियमन की इस दौड़ में यूरोपीय संघ (EU) ने दुनिया का पहला व्यापक AI ढांचा लागू किया है। यह कानून केवल यूरोप के तकनीकी बाजार को प्रभावित कर रहा है, बल्कि भारत सहित पूरे विश्व के सूचना प्रौद्योगिकी (IT) और AI पारिस्थितिकी तंत्र पर इसका दूरगामी प्रभाव पड़ रहा है।

यूरोपीय संघ का AI अधिनियम क्या है?

यूरोपीय संघ का AI अधिनियम (EU AI Act) अगस्त 2024 में लागू हुआ और 2 अगस्त 2026 से पूर्णतः प्रभावी हो गया है। इस कानून की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • जोखिम-आधारित दृष्टिकोण: अधिनियम एआई अनुप्रयोगों को उनके जोखिम के स्तर के आधार पर वर्गीकृत करता है:
    • अस्वीकार्य जोखिम: कुछ सामाजिक स्कोरिंग या हेरफेर करने वाले एआई सिस्टम पर पूर्ण प्रतिबंध।
    • उच्च जोखिम: रोजगार, शिक्षा, बायोमेट्रिक पहचान और कानून प्रवर्तन में प्रयुक्त सिस्टम पर कड़े नियम और मानव पर्यवेक्षण।
    • सीमित/निम्न जोखिम: केवल पारदर्शिता और बुनियादी जांच के नियम।
  • अनुरूपता मूल्यांकन (Article 43): उच्च-जोखिम वाले AI सिस्टम को यूरोपीय बाजार में प्रवेश करने से पहले यह साबित करना होगा कि वे सुरक्षा, परीक्षण, प्रलेखन (डॉक्यूमेंटेशन) और मानव पर्यवेक्षण के कड़े मानकों को पूरा करते हैं।
  • समयसीमा में ढील: जून 2026 में ईयू द्वारा दी गई मंजूरी के अनुसार, स्टैंडअलोन उच्च-जोखिम एआई सिस्टम के लिए अनुपालन की समयसीमा दिसंबर 2027 तक और विनियमित उत्पादों में एकीकृत एआई के लिए 2 अगस्त 2028 तक बढ़ा दी गई है।
  • महत्वपूर्ण संशोधन का नियम: यदि किसी एआई उत्पाद को अनुमोदन मिलने के बाद अनियोजित रूप से बदला या अपडेट किया जाता है, तो उसे पुनः अनुरूपता मूल्यांकन प्रक्रिया से गुजरना होगा।

चर्चा में क्यों?

  • वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर प्रभाव: यद्यपि यह कानून यूरोप का है, लेकिन इसका प्रभाव उन सभी अंतरराष्ट्रीय (भारतीय सहित) आईटी कंपनियों पर पड़ रहा है जो यूरोपीय ग्राहकों को सेवाएं प्रदान करती हैं।

  • भारत का स्वतंत्र AI कानून: भारत सरकार ने हाल ही में संकेत दिया है कि वह देश में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को विनियमित करने के लिए एक अलग कानून लाने पर विचार कर रही है।
  • अनुपालन का दबाव: भारतीय आईटी उद्योग, जो मुख्य रूप से ऑन-डिमांड सुधार और निरंतर सॉफ्टवेयर अपडेट पर आधारित है, के लिए ईयू अधिनियम के सख्त संशोधन नियम एक बड़ी नियामक चुनौती बनकर उभरे हैं।

भारत के लिए अवसर के रूप में

यूरोपीय संघ के कड़े एआई नियम भारत के लिए एक बड़ा आर्थिक और तकनीकी अवसर बन सकते हैं:

  • 'कागजी कार्रवाई और प्रमाणन' उद्योग का निर्माण: ईयू एआई एक्ट के तहत उच्च-जोखिम प्रणालियों के लिए भारी मात्रा में तकनीकी प्रलेखन, ऑडिटिंग, परीक्षण और अनुपालन रिपोर्ट की आवश्यकता होगी। भारत इस पूरी प्रक्रिया के लिए वैश्विक बैक-ऑफिस और अनुपालन केंद्र बन सकता है।
  • कुशल प्रतिभा का लाभ: भारत के पास कानून, प्रौद्योगिकी, डेटा सुरक्षा और वित्तीय विनियमन में दक्ष पेशेवरों का एक विशाल आधार है। भारतीय सेवा क्षेत्र अनुपालन ऑडिट और तकनीकी आश्वासन सेवाएं प्रदान करने में अग्रणी भूमिका निभा सकता है।
  • भारत-ईयू मुक्त व्यापार समझौता (FTA): हाल ही में संपन्न भारत-ईयू एफटीए में नियामक सहयोग के प्रावधान शामिल हैं। इसके माध्यम से भारत ईयू के अनुरूपता मूल्यांकन पारिस्थितिकी तंत्र  में एक आधिकारिक भागीदार बन सकता है, जिससे भारतीय निकायों को ईयू मानकों के तहत एआई प्रणालियों को प्रमाणित करने की कानूनी मान्यता मिल सकती है।

भारत का AI दृष्टिकोण बनाम यूरोपीय संघ का AI दृष्टिकोण

मानदंड

यूरोपीय संघ का AI दृष्टिकोण

भारत का AI दृष्टिकोण

मूल दर्शन

निवारक और नियमन-केंद्रित

नवाचार-अनुकूल और विकास-केंद्रित

दृष्टिकोण

जोखिम आधारित सख्त वर्गीकरण

उपयोग-आधारित लचीला ढांचा और डिजिटल समावेशन।

लागत और अनुपालन

अनुपालन लागत अत्यधिक उच्च है, जो स्टार्टअप्स के लिए कठिन है।

अनुपालन लागत को कम रखने और घरेलू नवाचार को बढ़ावा देने पर ध्यान।


भारत का एआई में मजबूत पक्ष

  • आईटी सेवा पारिस्थितिकी तंत्र: टीसीएस, इन्फोसिस जैसी दिग्गज कंपनियों से लेकर बेंगलुरु और हैदराबाद के ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) तक, भारत के पास लचीले सॉफ्टवेयर विकास का दशकों का अनुभव है।

  • विशाल प्रतिभा कोष : भारत में स्टेम (STEM) स्नातकों, डेटा इंजीनियरों और सॉफ्टवेयर डेवलपर्स की संख्या दुनिया में सबसे अधिक है।
  • डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचा (DPI): इंडिया स्टैक (UPI, Aadhaar, DigiLocker) की सफलता दर्शाती है कि भारत बड़े पैमाने पर प्रौद्योगिकी के सुरक्षित कार्यान्वयन में सक्षम है।

बेस्पोक मॉडल बनाम मानकीकृत मॉडल

ईयू एआई एक्ट उन उत्पादों के अनुकूल है जिनका रोडमैप पहले से तय होता है। इसके विपरीत, भारतीय आईटी उद्योग ग्राहक की आवश्यकता के अनुसार अनुकूलित सेवाएं देता है। यदि कोई भारतीय फर्म किसी मौजूदा एआई सिस्टम में ग्राहक की मांग पर अनियोजित सुधार करती है, तो ईयू कानून के तहत उसे 'नए प्रदाता' के रूप में माना जा सकता है, जिससे उस पर मूल निर्माता के सभी नियामक दायित्व जाएंगे।

ग्रैंडफादरिंग क्लॉज

ईयू एक्ट के तहत 2027/2028 की समयसीमा से पहले बाजार में मौजूद सिस्टम्स को तब तक छूट प्राप्त है जब तक उनमें कोई 'महत्वपूर्ण संशोधन' किया जाए।

चिंताएं एवं चुनौतियां

  • व्यावसायिक मॉडल पर संकट: भारतीय आईटी कंपनियों का मूल आधार "मांग पर अनियोजित सुधारहै। ईयू एक्ट के तहत हर छोटे बदलाव पर नए सिरे से पंजीकरण कराने से परिचालन लागत बढ़ सकती है।

  • कानूनी देयता: यदि कोई भारतीय कंपनी यूरोपीय ग्राहक के एआई मॉडल में बदलाव करती है, तो वह अनजाने में मूल निर्माता की सभी कानूनी देयताओं और जुर्मानों के दायरे में सकती है।
  • तकनीकी मानकों की अस्पष्टता: ईयू के सामंजस्यपूर्ण तकनीकी मानक अभी भी लिखे जा रहे हैं, जिससे कंपनियों के लिए अनिश्चितता की स्थिति बनी हुई है।

विश्लेषण

यूरोपीय संघ ने अपने लिए अनुपालन और नियमों का एक विशाल ढांचा तैयार किया है, जिसे पूरा करना यूरोपीय कंपनियों के लिए महंगा और कठिन है। भारत के पास इस बात का विकल्प है कि वह इन नियमों से डरने के बजाय, अपनी तकनीकी दक्षता के दम पर ईयू अनुपालन को ही एक निर्यात योग्य सेवा में बदल दे।

आगे का रास्ता

  • नियामक संस्थाओं का निर्माण: भारत को अपने देश में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त 'अनुरूपता मूल्यांकन निकायों' की स्थापना और प्रमाणन करना चाहिए।

  • संधि वार्ताओं का उपयोग: भारत-ईयू एफटीए के तहत नियामक सहयोग का उपयोग करके भारतीय प्रमाणन निकायों को ईयू के 'अधिसूचित निकायोंके रूप में मान्यता दिलवानी चाहिए।
  • कौशल विकास: कानूनी और तकनीकी क्षेत्र के पेशेवरों को ईयू एआई एक्ट, डेटा गवर्नेंस और एआई ऑडिटिंग के लिए प्रशिक्षित करने हेतु विशेष कार्यक्रम शुरू करने चाहिए।
  • संतुलित स्वदेशी कानून: भारत को अपने आगामी एआई कानून को इतना लचीला बनाना चाहिए कि वह नवाचार को रोके बिना यूरोपीय और वैश्विक मानकों के साथ तालमेल बिठा सके।


निष्कर्ष

संक्षेप में, यूरोपीय संघ का सख्त एआई विनियमन यद्यपि भारतीय आईटी उद्योग के पारंपरिक परिचालन मॉडल के लिए चुनौतियां पेश करता है, लेकिन यह एआई गवर्नेंस, सुरक्षा ऑडिटिंग और अनुपालन सेवाओं के क्षेत्र में एक विशाल नया अवसर भी खोलता है। यदि भारत सरकार और निजी क्षेत्र रणनीतिक रूप से मिलकर काम करते हैं, तो यूरोपीय संघ के जिन नियमों को लेकर वैश्विक स्तर पर आशंकाएं हैं, वे भारत के लिए व्यापार और रोजगार सृजन का एक नया और समृद्ध जरिया बन सकते हैं।


यौन अपराधों के मुकदमों में पीड़िताओं का यौन इतिहास: वैधानिक प्रतिबंध बनाम व्यावहारिक चुनौतियाँ

सामान्य अध्ययन पेपर – II:  शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबं


संदर्भ

यौन हिंसा के मामलों में निष्पक्ष सुनवाई का सिद्धांत पीड़िता की गरिमा और आरोपी के अधिकारों के बीच संतुलन पर आधारित है। हालाँकि, ऐतिहासिक रूप से मुकदमों के दौरान पीड़िताओं के अतीत के यौन इतिहास को उनकी विश्वसनीयता पर हमला करने का माध्यम बनाया जाता रहा है। कानून में सुधारों के बावजूद, न्याय प्रणाली में रूढ़िवादिता और सामाजिक पूर्वाग्रहों का प्रभाव आज भी एक गंभीर संवैधानिक प्रश्न खड़ा करता है।

यौन इतिहास क्या है?

यौन इतिहास से तात्पर्य किसी पीड़िता के अतीत के यौन संबंधों, अनुभवों या उसके तथाकथित "चरित्र" से जुड़े विवरणों से है।

  • दुरुपयोग का तरीका: मुकदमों के दौरान बचाव पक्ष द्वारा पीड़िता के पिछले संबंधों का हवाला देकर यह सिद्ध करने का प्रयास किया जाता है कि वह "अनैतिक चरित्र" की है या उसने अपराध के समय अपनी सहमति दी होगी।
  • संवैधानिक उल्लंघन: यह प्रक्रिया पीड़िता के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता तथा गरिमा के अधिकार (अनुच्छेद 21) पर सीधा प्रहार करती है।

चर्चा में क्यों?

  • बॉम्बे उच्च न्यायालय की सख्त टिप्पणी: बॉम्बे उच्च न्यायालय ने वर्ष 2013 के यौन उत्पीड़न मामले में पूर्व पत्रकार तरुण तेजपाल को बरी करने के निचली अदालत के फैसले को उलटते हुए तीखी टिप्पणी की।

  • निचली अदालत की चुप्पी पर सवाल: उच्च न्यायालय ने पाया कि जिरह के दौरान पीड़िता से उसके अतीत के यौन इतिहास को लेकर "आक्रामक और अपमानजनक सवाल" पूछे गए, और इस पर निचली अदालत की "स्पष्ट चुप्पी" चौंकाने वाली थी।
  • वैधानिक प्रतिबंध के बावजूद उल्लंघन: कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह मामला दर्शाता है कि कानून में सख्त प्रतिबंध होने के बावजूद वास्तविक अदालती कार्यवाहियों में पीड़िता के यौन इतिहास को ढाल बनाकर इस्तेमाल करने का चलन बना हुआ है।

मूल मामला क्या है?

  • आचरण बनाम अपराध: मुख्य मुद्दा यह है कि किसी अपराध का परीक्षण घटना के साक्ष्यों के आधार पर होना चाहिए, कि पीड़िता के अतीत या उसके आचरण के आधार पर।

  • चरित्र हनन द्वारा सहमति साबित करना: कानूनन प्रतिबंध के बावजूद, जिरह के दौरान ऐसे अप्रत्यक्ष सवाल पूछे जाते हैं जो पीड़िता की छवि को धूमिल करते हैं ताकि उसकी गवाही को संदेहास्पद बनाया जा सके।

साक्ष्य कानून: धारा 155(4) और नए नियम

  • भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की पुरानी धारा 155(4):

    • पूर्व में इस धारा के तहत यह प्रावधान था कि यदि किसी महिला पर बलात्कार या उसके प्रयास का आरोप हो, तो यह दिखाया जा सकता था कि पीड़िता "सामान्यतः अनैतिक चरित्र" की थी।
    • इसे 2003 में विधि आयोग की सिफारिशों के बाद निरस्त कर दिया गया था।
  • क्रिमिनल लॉ (संशोधन) अधिनियम, 2013 एवं नए प्रावधान:
    • धारा 146 का परंतुक: 2013 के संशोधन के माध्यम से स्पष्ट रूप से जोड़ा गया कि जिरह के दौरान पीड़िता से उसके "सामान्य अनैतिक चरित्र" या "पूर्व यौन अनुभवों" के संबंध में कोई सवाल नहीं पूछा जा सकता।
    • भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA), 2023 की धारा 149: नए आपराधिक कानूनों के तहत भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) की धारा 149 में भी इस प्रतिबंध को यथावत बनाए रखा गया है। इसके तहत सहमति या सहमति की गुणवत्ता साबित करने के लिए पीड़िता के पिछले यौन इतिहास से जुड़े साक्ष्य या प्रश्न पूरी तरह से वर्जित हैं।

कानूनों की प्रासंगिकता

  • गरिमापूर्ण निष्पक्ष सुनवाई: ये संशोधन सुनिश्चित करते हैं कि अदालतें केवल अपराध के तथ्यों पर ध्यान केंद्रित करें, कि पीड़िता के व्यक्तिगत जीवन पर।

  • संविधान का अनुच्छेद 21: उच्चतम न्यायालय के विभिन्न निर्णयों के अनुसार, पीड़िता को द्वितीयक उत्पीड़न से बचाना और गरिमा बनाए रखना अनुच्छेद 21 का अभिन्न अंग है।
  • एकल गवाही की मान्यता: पंजाब राज्य बनाम गुरमीत सिंह (1996) मामले में उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि यदि पीड़िता का बयान विश्वसनीय है, तो केवल उसी के आधार पर दोषसिद्धि हो सकती है।

चिंताएं

  • कानूनी प्रतिबंध का अप्रत्यक्ष उल्लंघन: बचाव पक्ष के वकील अक्सर सीधे सवाल पूछने के बजाय घुमावदार सवाल पूछकर कानून की सीमाओं का उल्लंघन करते हैं।
  • न्यायिक पूर्वाग्रह: कई अध्ययनों से यह सामने आया है कि निचली अदालतों में 'अच्छी महिला' (जैसे- बिना देरी के शिकायत, कोई पूर्व संबंध होना) की पारंपरिक सोच के आधार पर फैसलों और सजा की अवधि को प्रभावित किया जाता है।
  • संस्थागत सुधारों की कमी: केवल कानून बना देने से सामाजिक और न्यायिक मानसिकता में बदलाव नहीं आया है।

प्रभाव

  • पीड़िताओं में भय और न्याय से दूरी: अदालतों में होने वाली अपमानजनक जिरह के डर से कई पीड़िताएं मामलों की रिपोर्ट दर्ज कराने से पीछे हट जाती हैं।
  • न्याय प्रणाली पर विश्वास में कमी: जब रूढ़िवादिता के आधार पर आरोपी बरी होते हैं, तो इससे जनमानस का कानूनी प्रक्रिया से विश्वास उठता है।
  • पुनः उत्पीड़न: अदालत के भीतर पूछे जाने वाले आक्रामक सवाल पीड़िता को मानसिक रूप से दोबारा उसी आघात से गुजारते हैं।

विश्लेषण

यौन अपराधों में न्याय की न्यायशास्त्रीय अवधारणा केवल दंडात्मक नहीं होनी चाहिए। कानून में बदलाव के बावजूद यह स्थिति यह दर्शाती है कि समस्या कानून की अनुपस्थिति में नहीं, बल्कि उसके कार्यान्वयन और सामाजिक-न्यायिक मानसिकता में है। जब तक अदालती प्रक्रियाएं लैंगिक रूप से संवेदनशील नहीं होंगी, तब तक वैधानिक सुधार कागजी साबित होंगे।

आगे का रास्ता

  • संवेदनशीलता और प्रशिक्षण: न्यायिक अधिकारियों, वकीलों और पुलिस बल के लिए नियमित रूप से 'जेंडर सेंसिटाइजेशन' प्रशिक्षण अनिवार्य किया जाए।

  • उच्चतम न्यायालय की गाइडलाइंस का पालन: उच्चतम न्यायालय द्वारा जारी लैंगिक रूढ़िवादिता पर हैंडबुक का कड़ाई से पालन हो।
  • जिरह पर न्यायिक नियंत्रण: पीठासीन न्यायाधीशों को जिरह के दौरान सक्रिय भूमिका निभाते हुए ऐसे अनुचित सवालों को तुरंत रोकना चाहिए जो कानूनन वर्जित हैं।
  • प्रक्रियात्मक सुरक्षा: पीड़ितों के बयानों को दर्ज करने और सुनवाई के दौरान इन-कैमरा कार्यवाही और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग का अधिक से अधिक उपयोग किया जाना चाहिए।

निष्कर्ष

किसी भी सभ्य समाज में न्याय की कसौटी पीड़िता की गरिमा की रक्षा करना है। साक्ष्य कानून में धारा 146 का परंतुक और भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 149 इसी दिशा में उठाए गए कदम हैं। निचली अदालतों द्वारा इन वैधानिक प्रतिबंधों का कठोरता से पालन कराना ही यह सुनिश्चित करेगा कि अदालती कार्यवाहियाँ पीड़िताओं के लिए न्याय का स्थान बनें, कि उनके पुनः उत्पीड़न का मंच।


संसदीय विशेषाधिकार बनाम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता: शक्तियों का पृथक्करण बनाम नागरिक स्वतंत्रता

सामान्य अध्ययन पेपर – II:  शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध।


संदर्भ

संसदीय विशेषाधिकारों का मुख्य उद्देश्य विधायिका की स्वतंत्रता और उसकी गरिमा को बनाए रखना है, ताकि जनप्रतिनिधि बिना किसी भय के अपने कर्तव्यों का पालन कर सकें। हालाँकि, जब इन विशेषाधिकारों का प्रयोग नागरिकों और प्रेस की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने के लिए किया जाता है, तो न्यायपालिका के समक्ष मौलिक अधिकारों और विधायी विशेषाधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करने की एक बड़ी संवैधानिक चुनौती खड़ी हो जाती है।

संसदीय विशेषाधिकार क्या हैं?

संसदीय (या विधायी) विशेषाधिकार वे विशेष अधिकार, उन्मुक्तियां और छूट हैं जो संसद (और राज्य विधानसभाओं), उनकी समितियों तथा उनके सदस्यों (सांसदों/विधायकों) को प्राप्त हैं।

  • उद्देश्य: इनका प्राथमिक उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सदन बिना किसी बाहरी हस्तक्षेप या बाधा के स्वतंत्र रूप से और प्रभावी ढंग से कार्य कर सके।
  • प्रकार: ये मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं:
    1. व्यक्तिगत अधिकार: जैसे कि सदन में भाषण देने की पूर्ण स्वतंत्रता और कुछ मामलों में गिरफ्तारी से छूट।
    2. सामूहिक अधिकार: जैसे कि अपनी कार्यवाहियों को प्रकाशित करने या करने का अधिकार, और सदन की अवमानना या विशेषाधिकार हनन के लिए किसी भी व्यक्ति को दंडित करने का अधिकार।

चर्चा में क्यों?

  • 7-जजों की संविधान पीठ का गठन: मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने 6 अक्टूबर 2026 से 7-जजों की संविधान पीठ के समक्ष वर्षों से लंबित याचिकाओं की सुनवाई निर्धारित की है।

  • 2003 का तमिल नाडु मामला: यह मामला अप्रैल 2003 में हिंदू द्वारा तत्कालीन तमिलनाडु मुख्यमंत्री जयललिता की आलोचना करने वाले संपादकीय के प्रकाशन.और उसके बाद विधानसभा द्वारा पत्रकारों के खिलाफ जारी गिरफ्तारी वारंट से उत्पन्न हुआ था।
  • पूर्व मिसालों में विरोधाभास: पूर्व मिसालों में विरोधाभास: 2004 में 5-जजों की संविधान पीठ के समक्ष यह तर्क रखा गया कि 1959 के एम.एस.एम. शर्मा मामले (सर्चलाइट केस) और 1964 के राष्ट्रपति संदर्भ (केशव सिंह मामला) में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और विधायी विशेषाधिकारों के संबंध में विरोधाभासी दृष्टिकोण दिखाई देते हैं। इसके बाद 5-जज पीठ ने मामले को कानून के आधिकारिक निर्धारण के लिए 7-जज पीठ को संदर्भित किया।

मूल मुद्दा क्या है?

  • मौलिक अधिकार बनाम विशेषाधिकार: मुख्य कानूनी और संवैधानिक प्रश्न यह है कि क्या विधायिका के विशेषाधिकार (अनुच्छेद 194/105) नागरिकों और प्रेस के मौलिक अधिकार वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता [अनुच्छेद 19(1)(a)] और जीवन तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता (अनुच्छेद 21) पर हावी हो सकते हैं।

  • विशेषाधिकारों का -संहिताकरण: भारत में संसदीय विशेषाधिकारों को स्पष्ट रूप से संहिताबद्ध नहीं किया गया है, जिसके कारण विधायिका और मीडिया/नागरिकों के बीच अक्सर शक्ति और अधिकार क्षेत्र का टकराव होता है।

संवैधानिक प्रावधान

  • अनुच्छेद 105: यह संसद के दोनों सदनों, उनके सदस्यों और समितियों के विशेषाधिकारों, शक्तियों और उन्मुक्तियों का प्रावधान करता है।

  • अनुच्छेद 194: यह राज्य विधानसभाओं, उनके सदस्यों और समितियों के विशेषाधिकारों और उन्मुक्तियों को रेखांकित करता है।
  • अनुच्छेद 19(1)(a): सभी नागरिकों को वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार देता है, जिसमें प्रेस की स्वतंत्रता भी शामिल है।
  • अनुच्छेद 21: प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण प्रदान करता है।

न्यायालय की सुनवाई का महत्व

  • कानूनी स्पष्टता: यह सुनवाई दशकों से चली रही इस संवैधानिक अनिश्चितता को हमेशा के लिए समाप्त करेगी कि मौलिक अधिकार और विधायी विशेषाधिकार में से किसे प्राथमिकता दी जाएगी।

  • प्रेस की स्वतंत्रता का संरक्षण: यदि न्यायपालिका यह तय करती है कि विशेषाधिकार मौलिक अधिकारों के अधीन हैं, तो इससे लोकतंत्र के चौथे स्तंभ (मीडिया) को विधायिका की दंडात्मक कार्रवाइयों से सुरक्षा मिलेगी।
  • शक्तियों के पृथक्करण पर प्रभाव: यह फैसला न्यायपालिका, विधायिका और नागरिकों के अधिकारों के बीच के शक्ति संतुलन को नए सिरे से परिभाषित करेगा।

चिंताएं

  • विशेषाधिकारों का दुरुपयोग: अक्सर राजनीतिक आलोचनाओं को 'सदन की अवमानना' या 'विशेषाधिकार हनन' का नाम देकर पत्रकारों और राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ दंडात्मक कदम उठाए जाते हैं।

  • जवाबदेही का अभाव: संहिताबद्ध होने के कारण विशेषाधिकारों की सीमा तय नहीं है, जिससे विधायिका अपनी शक्तियों का असीमित इस्तेमाल कर सकती है।
  • नागरिकों के अधिकारों पर आघात: विशेषाधिकारों के अतिरेक प्रयोग से नागरिकों के अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकार का हनन होने का गंभीर खतरा रहता है।

विश्लेषण  

यह मामला केवल दो कानूनी अनुच्छेदों का टकराव नहीं है, बल्कि यह संसदीय संप्रभुता और नागरिक अधिकारों के बीच के संतुलन की परीक्षा है। सात जजों की संविधान पीठ का आने वाला फैसला भारतीय लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के भविष्य को दिशा प्रदान करेगा।

आगे का रास्ता

  • संसदीय विशेषाधिकारों का संहिताकरण: संसद और राज्य विधानसभाओं को अपने विशेषाधिकारों को संहिताबद्ध करना चाहिए ताकि उनकी सीमाएं स्पष्ट हो सकें और मौलिक अधिकारों का हनन हो।

  • संवैधानिक संतुलन: न्यायपालिका को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि विशेषाधिकार केवल सदन के सुचारू संचालन तक सीमित रहें और वे मौलिक अधिकारों (अनुच्छेद 19 और 21) के ऊपर जाएं।
  • न्यायिक समीक्षा: विशेषाधिकार हनन के नाम पर ली जाने वाली किसी भी दंडात्मक कार्रवाई को न्यायिक समीक्षा के अधीन लाया जाना चाहिए।

निष्कर्ष

विधायी विशेषाधिकार और प्रेस की स्वतंत्रता दोनों ही एक जीवंत लोकतंत्र के अनिवार्य स्तंभ हैं। उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ द्वारा इस कानूनी अनिश्चितता का समाधान किए जाने से केवल शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत को मजबूती मिलेगी, बल्कि यह भारत में विशेषाधिकारों के संभावित दुरुपयोग के विरुद्ध एक मजबूत संवैधानिक तंत्र का निर्माण करेगा।