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विवेक अग्रवाल बने FATF के नए उपाध्यक्ष: वैश्विक वित्तीय सुरक्षा में भारत का बढ़ा कद
मुख्य समाचार:
फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (FATF) की हालिया प्लेनरी बैठक में भारत के केंद्रीय संस्कृति सचिव विवेक अग्रवाल को वर्ष 2026-2027 के कार्यकाल के लिए संगठन का अगला उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया है। वे जाइल्स थॉमसन का स्थान लेंगे। विवेक अग्रवाल ने इससे पहले FATF की 'म्युचुअल इवैल्यूएशन' प्रक्रिया के दौरान भारतीय प्रतिनिधिमंडल का सफलतापूर्वक नेतृत्व किया था। यह नियुक्ति वैश्विक वित्तीय शासन में भारत की बढ़ती साख और प्रभाव को दर्शाती है।
फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (FATF) क्या है?
FATF एक अंतर-सरकारी निकाय है जिसे 1989 में G7 देशों की पहल पर स्थापित किया गया था।
- मुख्यालय: इसका मुख्यालय पेरिस (फ्रांस) में स्थित है।
- कार्यप्रणाली: यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 'मनी लॉन्ड्रिंग' (धन शोधन) और 'आतंकवादी वित्तपोषण' को रोकने के लिए मानक निर्धारित करता है।
- सदस्यता: वर्तमान में इसमें दुनिया भर के प्रमुख देशों सहित 40 से अधिक सदस्य शामिल हैं। कुल मिलाकर, 200 से अधिक देशों और क्षेत्राधिकारों ने संगठित अपराध, भ्रष्टाचार और आतंकवाद को रोकने के लिए एक समन्वित वैश्विक प्रतिक्रिया के हिस्से के रूप में FATF के मानकों को लागू करने की प्रतिबद्धता जताई है। देशों और क्षेत्राधिकारों का आकलन नौ FATF सहयोगी सदस्य संगठनों और अन्य वैश्विक भागीदारों, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक की सहायता से किया जाता है।
- प्रभाव: FATF द्वारा जारी 'ग्रे लिस्ट' और 'ब्लैक लिस्ट' का संबंधित देशों की अर्थव्यवस्था पर सीधा असर पड़ता है, क्योंकि ये सूचियाँ उस देश की अंतरराष्ट्रीय साख और निवेश क्षमता को प्रभावित करती हैं।
FATF के उद्देश्य:
FATF का मुख्य उद्देश्य वैश्विक वित्तीय प्रणाली की अखंडता की रक्षा करना है। इसके प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं:
- मानकों का निर्धारण: मनी लॉन्ड्रिंग और आतंकवाद के वित्तपोषण से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय मानक तैयार करना।
- प्रभावी क्रियान्वयन: यह सुनिश्चित करना कि सदस्य देश इन मानकों को कानूनी और परिचालन स्तर पर लागू करें।
- सहयोग को बढ़ावा देना: वैश्विक स्तर पर वित्तीय अपराधों को रोकने के लिए देशों के बीच सूचनाओं के आदान-प्रदान और सहयोग को सुदृढ़ करना।
- खतरों की पहचान: नई उभरती चुनौतियों (जैसे क्रिप्टो-एसेट का दुरुपयोग) की पहचान करना और उनसे निपटने की रणनीति बनाना।
निष्कर्ष:
विवेक अग्रवाल का उपाध्यक्ष पद पर चुना जाना आतंकवाद विरोधी वैश्विक प्रयासों में भारत की प्रतिबद्धता की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता है। यह नियुक्ति न केवल भारत की रणनीतिक स्थिति को मजबूत करेगी, बल्कि अवैध वित्तीय प्रवाह को रोकने की वैश्विक मुहिम में भारत की भूमिका को और अधिक निर्णायक बनाएगी।
अभियान' ऐप
संदर्भ
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 'अभियान' ऐप लॉन्च किया है, जो पोर्टेबल फिंगरप्रिंट स्कैनर के माध्यम से सड़क पर ही संदिग्धों की तत्काल पहचान और आपराधिक रिकॉर्ड की जांच करने की सुविधा देगा। यह डिजिटल पहल NAFIS डेटाबेस से जुड़कर जमीनी स्तर की पुलिसिंग और जांच प्रक्रिया को अत्यंत प्रभावी और त्वरित बनाएगी।
वर्तमान घटनाक्रम
पुलिस और जांच एजेंसियां अब सड़क पर नियमित वाहन जांच के दौरान किसी भी संदिग्ध व्यक्ति के अंगूठे के निशान लेकर मात्र 35 सेकंड में उनके लंबित आपराधिक रिकॉर्ड की जांच कर सकेंगी।
- यह सुविधा वर्तमान में उपलब्ध 1,556 वर्कस्टेशनों की भौगोलिक सीमाओं को समाप्त कर पुलिस अधिकारियों को स्मार्टफोन के माध्यम से सीधे डेटाबेस तक पहुँच प्रदान करेगी।
अभियान ऐप:
क्या है और किसने बनाया: यह नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) द्वारा विकसित एक उन्नत मोबाइल एप्लिकेशन है, जो 'नेशनल ऑटोमेटेड फिंगरप्रिंट आइडेंटिफिकेशन सिस्टम' (NAFIS) का मोबाइल विस्तार है।
- किसने लॉन्च किया: केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 19 जून 2026 को नई दिल्ली में आयोजित '26वीं अखिल भारतीय फिंगरप्रिंट सम्मेलन' के दौरान इसे लॉन्च किया।
- उद्देश्य: फील्ड पर तैनात पुलिसकर्मियों को कहीं भी, कभी भी अपराधियों की पहचान करने और उनके आपराधिक इतिहास को जांचने के लिए सशक्त बनाना।
- टेक्नोलॉजी और कार्यप्रणाली: यह ऐप पोर्टेबल फिंगरप्रिंट स्कैनर और स्मार्टफोन के जरिए काम करता है। यह टू-स्टेप ऑथेंटिकेशन (सुरक्षा) से सुरक्षित है। स्कैनर से फिंगरप्रिंट लेने पर यह NAFIS के विशाल डेटाबेस से मिलान कर 35 सेकंड में परिणाम देता है।
- अन्य महत्वपूर्ण बिंदु: यह NAFIS से जुड़ा है जिसमें 1.3 करोड़ से अधिक अपराधियों, दोषियों, जेल में बंद कैदियों, 9.91 लाख मादक पदार्थ तस्करों और 3.65 लाख मानव तस्करी के मामलों का डेटा स्टोर है।
आवश्यकता और महत्व
तत्काल पहचान: वर्कस्टेशन तक ले जाने की जटिल प्रक्रिया समाप्त होने से संदिग्धों की पहचान मौके पर ही संभव हो सकेगी।
- पुलिस की सुरक्षा: हार्डन अपराधियों (कुख्यात अपराधियों) की उपस्थिति के बारे में तुरंत अलर्ट मिलने से फील्ड ऑफिसर्स अपनी सुरक्षा सुनिश्चित कर सकेंगे।
- समयबद्ध न्याय: यह ऐप जांच के दौरान वैज्ञानिक साक्ष्यों को तेजी से जुटाने, चार्जशीट को सटीक बनाने और मामलों को समयबद्ध तरीके से सुलझाने में मदद करेगा।
चिंताएं
- कानूनी सीमाएं: 'क्रिमिनल प्रोसीजर (आइडेंटिफिकेशन) एक्ट, 2022' मुख्य रूप से गिरफ्तार या दोषी व्यक्तियों के बायोमेट्रिक डेटा के अनिवार्य संग्रह का प्रावधान करता है; बिना किसी अपराध से जुड़े साक्ष्य के आम नागरिकों के 'रैंडम टेस्ट' पर कानूनी स्थिति स्पष्ट नहीं है।
- निजता का अधिकार: बायोमेट्रिक डेटा का बड़े पैमाने पर संग्रह और स्मार्टफोन के माध्यम से उपयोग को लेकर डेटा सुरक्षा और निजता से जुड़ी चिंताएं बनी हुई हैं।
निष्कर्ष
'अभियान' ऐप आधुनिक डिजिटल पुलिसिंग और अपराध जांच के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी तकनीकी कदम है। हालांकि, इसकी पूर्ण सफलता के लिए इसके उपयोग को कानूनी मर्यादाओं और व्यक्तिगत निजता के अधिकारों के बीच संतुलित रखना अत्यंत आवश्यक होगा।
अभियान' ऐप
संदर्भ
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 'अभियान' ऐप लॉन्च किया है, जो पोर्टेबल फिंगरप्रिंट स्कैनर के माध्यम से सड़क पर ही संदिग्धों की तत्काल पहचान और आपराधिक रिकॉर्ड की जांच करने की सुविधा देगा। यह डिजिटल पहल NAFIS डेटाबेस से जुड़कर जमीनी स्तर की पुलिसिंग और जांच प्रक्रिया को अत्यंत प्रभावी और त्वरित बनाएगी।
वर्तमान घटनाक्रम
पुलिस और जांच एजेंसियां अब सड़क पर नियमित वाहन जांच के दौरान किसी भी संदिग्ध व्यक्ति के अंगूठे के निशान लेकर मात्र 35 सेकंड में उनके लंबित आपराधिक रिकॉर्ड की जांच कर सकेंगी।
- यह सुविधा वर्तमान में उपलब्ध 1,556 वर्कस्टेशनों की भौगोलिक सीमाओं को समाप्त कर पुलिस अधिकारियों को स्मार्टफोन के माध्यम से सीधे डेटाबेस तक पहुँच प्रदान करेगी।
अभियान ऐप:
क्या है और किसने बनाया: यह नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) द्वारा विकसित एक उन्नत मोबाइल एप्लिकेशन है, जो 'नेशनल ऑटोमेटेड फिंगरप्रिंट आइडेंटिफिकेशन सिस्टम' (NAFIS) का मोबाइल विस्तार है।
- किसने लॉन्च किया: केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 19 जून 2026 को नई दिल्ली में आयोजित '26वीं अखिल भारतीय फिंगरप्रिंट सम्मेलन' के दौरान इसे लॉन्च किया।
- उद्देश्य: फील्ड पर तैनात पुलिसकर्मियों को कहीं भी, कभी भी अपराधियों की पहचान करने और उनके आपराधिक इतिहास को जांचने के लिए सशक्त बनाना।
- टेक्नोलॉजी और कार्यप्रणाली: यह ऐप पोर्टेबल फिंगरप्रिंट स्कैनर और स्मार्टफोन के जरिए काम करता है। यह टू-स्टेप ऑथेंटिकेशन (सुरक्षा) से सुरक्षित है। स्कैनर से फिंगरप्रिंट लेने पर यह NAFIS के विशाल डेटाबेस से मिलान कर 35 सेकंड में परिणाम देता है।
- अन्य महत्वपूर्ण बिंदु: यह NAFIS से जुड़ा है जिसमें 1.3 करोड़ से अधिक अपराधियों, दोषियों, जेल में बंद कैदियों, 9.91 लाख मादक पदार्थ तस्करों और 3.65 लाख मानव तस्करी के मामलों का डेटा स्टोर है।
आवश्यकता और महत्व
तत्काल पहचान: वर्कस्टेशन तक ले जाने की जटिल प्रक्रिया समाप्त होने से संदिग्धों की पहचान मौके पर ही संभव हो सकेगी।
- पुलिस की सुरक्षा: हार्डन अपराधियों (कुख्यात अपराधियों) की उपस्थिति के बारे में तुरंत अलर्ट मिलने से फील्ड ऑफिसर्स अपनी सुरक्षा सुनिश्चित कर सकेंगे।
- समयबद्ध न्याय: यह ऐप जांच के दौरान वैज्ञानिक साक्ष्यों को तेजी से जुटाने, चार्जशीट को सटीक बनाने और मामलों को समयबद्ध तरीके से सुलझाने में मदद करेगा।
चिंताएं
- कानूनी सीमाएं: 'क्रिमिनल प्रोसीजर (आइडेंटिफिकेशन) एक्ट, 2022' मुख्य रूप से गिरफ्तार या दोषी व्यक्तियों के बायोमेट्रिक डेटा के अनिवार्य संग्रह का प्रावधान करता है; बिना किसी अपराध से जुड़े साक्ष्य के आम नागरिकों के 'रैंडम टेस्ट' पर कानूनी स्थिति स्पष्ट नहीं है।
- निजता का अधिकार: बायोमेट्रिक डेटा का बड़े पैमाने पर संग्रह और स्मार्टफोन के माध्यम से उपयोग को लेकर डेटा सुरक्षा और निजता से जुड़ी चिंताएं बनी हुई हैं।
निष्कर्ष
'अभियान' ऐप आधुनिक डिजिटल पुलिसिंग और अपराध जांच के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी तकनीकी कदम है। हालांकि, इसकी पूर्ण सफलता के लिए इसके उपयोग को कानूनी मर्यादाओं और व्यक्तिगत निजता के अधिकारों के बीच संतुलित रखना अत्यंत आवश्यक होगा।
अरुणाचल की झीलों का विस्तार: एक दशक का विश्लेषण और संभावित खतरे
सामान्य अध्ययन पेपर – III प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन।
सन्दर्भ
हाल ही में 'सुहोरा टेक्नोलॉजीज' द्वारा किए गए एक उपग्रह-आधारित विश्लेषण ने अरुणाचल प्रदेश के तवांग जिले में स्थित पांच प्रमुख हिमनद झीलों की स्थिति पर प्रकाश डाला है। रिपोर्ट के अनुसार, पिछले एक दशक (2016-2026) में इनमें से चार झीलों का दायरा बढ़ गया है। हालांकि विशेषज्ञ इसे तत्काल किसी बड़ी आपदा का संकेत नहीं मानते, लेकिन यह बढ़ते जलवायु खतरों और निरंतर निगरानी की आवश्यकता की ओर एक गंभीर इशारा है।
मुख्य बिंदु:
सुहोरा टेक्नोलॉजीज ने मागो चू बेसिन की उन पांच झीलों का अध्ययन किया है, जिन्हें राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) ने पहले ही 'उच्च-जोखिम' या 'अत्यंत उच्च-जोखिम' की श्रेणी में रखा है।
- विस्तार का दायरा: चार झीलों में विस्तार दर्ज किया गया है।
- प्रमुख झील - संहापो: यह अध्ययन की सबसे चिंताजनक झील है। 2019 में इसका क्षेत्रफल 78.07 हेक्टेयर था, जो जून 2026 तक बढ़कर 88.81 हेक्टेयर हो गया है।
- अन्य झीलें: दो 'अत्यंत उच्च-जोखिम' वाली झीलों में लगभग एक हेक्टेयर की वृद्धि हुई है, जबकि 'धारखा त्सो' झील ने भी क्रमिक विस्तार दिखाया है। केवल एक झील स्थिर बनी हुई है।
- यह रिपोर्ट नोएडा स्थित भू-स्थानिक खुफिया फर्म 'सुहोरा टेक्नोलॉजीज' द्वारा तैयार की गई है।
विशेषज्ञों की राय:
विशेषज्ञ इस डेटा को 'सावधानी का संकेत' मान रहे हैं, न कि 'आसन्न आपदा' का प्रमाण।
- अमित कुमार (COO, सुहोरा टेक्नोलॉजीज): उनके अनुसार, दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में जहां पहुंचना कठिन है, वहां उपग्रह डेटा (ICEYE, PlanetScope, LISS-IV) का उपयोग करके निगरानी करना अनिवार्य है। मानसून के निकट आते ही यह और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।
- अनिल कुलकर्णी (प्रसिद्ध हिमनद विज्ञानी, IISc बेंगलुरु): उन्होंने स्पष्ट किया है कि केवल झील के आकार का बढ़ना ही खतरे का एकमात्र पैमाना नहीं है। उन्होंने जोर दिया कि:
- झील के विस्तार के पीछे के वैज्ञानिक कारणों को समझना जरूरी है।
- मोराइन (मलबे से बने प्राकृतिक बांध) की मजबूती, भूस्खलन की संभावना, और हिमस्खलन जैसे अन्य कारक यह निर्धारित करते हैं कि झील कितनी जोखिम भरी है।
ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) का खतरा
यह अध्ययन हिमालयी क्षेत्र में GLOF (ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड) के बढ़ते खतरे की पृष्ठभूमि में आया है। GLOF तब होता है जब:
- प्राकृतिक मोराइन बांध टूट जाते हैं।
- बड़ी मात्रा में मलबा, हिमस्खलन या भूस्खलन झील में गिरता है, जिससे पानी का स्तर अचानक विस्थापित होता है और विनाशकारी लहरें उठती हैं।
- ऐतिहासिक संदर्भ: अक्टूबर 2023 की सिक्किम आपदा (दक्षिण ल्होनक झील का टूटना) इसी प्रकार के खतरों का एक ज्वलंत उदाहरण है, जिसने जान-माल और बुनियादी ढांचे (जैसे चुंगथांग बांध) को भारी नुकसान पहुँचाया था।
आगे की राह
उच्च-जोखिम वाली झीलों के लिए विस्तृत 'हैज़र्ड मॉडलिंग' करना।
- निरंतर निगरानी के लिए समर्पित तंत्र विकसित करना।
- जल्द से जल्द प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों को इन दुर्गम इलाकों में स्थापित करना।
यह रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र में हो रहे बदलावों के प्रति 'सतर्कता' और 'निरंतर वैज्ञानिक अध्ययन' ही भविष्य की आपदाओं को रोकने का एकमात्र प्रभावी तरीका है।
निष्कर्ष
यद्यपि भारत ने उपग्रह निगरानी और मॉडलिंग के क्षेत्र में काफी तकनीकी क्षमता हासिल कर ली है, लेकिन वैज्ञानिक निष्कर्षों को धरातल पर 'जोखिम न्यूनीकरण' (Risk Reduction) के व्यावहारिक उपायों में बदलना अभी भी एक बड़ी चुनौती है।
मेकेदातु बाँध परियोजना: जल विवाद और संवैधानिक चुनौतियां
सामान्य अध्ययन पेपर – II: शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध।
संदर्भ
हाल ही में तमिलनाडु विधानसभा ने एक सर्वसम्मत प्रस्ताव पारित कर कर्नाटक सरकार द्वारा कावेरी नदी पर प्रस्तावित 'मेकेदातु बैलेंसिंग जलाशय परियोजना' का कड़ा विरोध किया है। यह विवाद कावेरी बेसिन के राज्यों के बीच जल-साझाकरण के पुराने संघर्ष को पुनः चर्चा में ले आया है।
मेकेदातु बाँध परियोजना क्या है?
मेकेदातु परियोजना कर्नाटक सरकार द्वारा कावेरी नदी पर प्रस्तावित एक महत्वाकांक्षी जल भंडारण और विद्युत उत्पादन परियोजना है। इसका मुख्य उद्देश्य बेंगलुरु शहर और आसपास के क्षेत्रों के लिए पेयजल आपूर्ति सुनिश्चित करना और जलविद्युत उत्पन्न करना है।
चर्चा के कारण
तमिलनाडु विधानसभा का हालिया प्रस्ताव: 4 मार्च 2026 को तमिलनाडु सरकार द्वारा भेजे गए पत्र के संदर्भ में, राज्य विधानसभा ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर मेकेदातु परियोजना का विरोध किया है। इस प्रस्ताव में केंद्र सरकार से किसी भी प्रकार की मंजूरी (तकनीकी या पर्यावरणीय) न देने का आग्रह किया गया है।
- न्यायिक निर्णयों का हवाला: तमिलनाडु सरकार ने यह तर्क दिया है कि मेकेदातु में बाँध का निर्माण 'कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण' के 5 फरवरी, 2007 के अंतिम निर्णय और सुप्रीम कोर्ट के 16 फरवरी, 2018 के फैसले का उल्लंघन करता है।
- कावेरी बेसिन की स्थिति: न्यायाधिकरण और सुप्रीम कोर्ट द्वारा पूर्व में यह माना जा चुका है कि कावेरी बेसिन एक 'घाटे वाला बेसिन' है। उपलब्ध जल पहले ही बेसिन राज्यों के बीच आवंटित किया जा चुका है, इसलिए किसी भी अतिरिक्त परियोजना के लिए तमिलनाडु की सहमति को आधारभूत माना जा रहा है।
- नए न्यायाधिकरण की मांग: तमिलनाडु सरकार ने अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 की धारा 4 के तहत केंद्र सरकार से एक नए न्यायाधिकरण के गठन की औपचारिक मांग की है।
- CWC पर दबाव: तमिलनाडु ने 'केंद्रीय जल आयोग' (CWC) को स्पष्ट रूप से आगाह किया है कि वह कर्नाटक सरकार द्वारा प्रस्तुत 'विस्तृत परियोजना रिपोर्ट' (DPR) की न तो समीक्षा करे और न ही उसे कोई मंजूरी प्रदान करे।
विवाद का मुख्य मुद्दा
विवाद का मूल बिंदु 'जल की उपलब्धता' और 'अधिकार' है। तमिलनाडु का तर्क है कि कावेरी बेसिन एक 'घाटे वाला बेसिन' है, जहाँ पानी पहले ही विभिन्न राज्यों के बीच आवंटित किया जा चुका है। कर्नाटक का एकतरफा बाँध निर्माण तमिलनाडु के निचले तटीय हिस्से के लिए जल प्रवाह को अनिश्चित बना सकता है, जिससे कृषि और पेयजल सुरक्षा पर संकट उत्पन्न हो सकता है।
तमिलनाडु विधानसभा का विरोध क्यों?
अधिकारों का अतिक्रमण: तमिलनाडु इसे कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण के अंतिम अवार्ड (2007) और सुप्रीम कोर्ट के 2018 के फैसले का स्पष्ट उल्लंघन मानता है।
- सहमति का अभाव: तमिलनाडु का कहना है कि किसी भी अंतर-राज्यीय नदी परियोजना के लिए बेसिन राज्यों की पूर्व सहमति अनिवार्य है, जिसे कर्नाटक ने नजरअंदाज किया है।
- पारिस्थितिक चिंता: नदी के प्राकृतिक प्रवाह में बाधा आने से डेल्टा क्षेत्रों में खारे पानी के प्रवेश की समस्या बढ़ सकती है।
परियोजना का महत्व
पेयजल संकट: कर्नाटक का दावा है कि बेंगलुरु की बढ़ती आबादी के लिए पेयजल आपूर्ति हेतु यह परियोजना अपरिहार्य है।
- विद्युत उत्पादन: अतिरिक्त ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए जलविद्युत एक हरित विकल्प है।
- जल संरक्षण: अधिशेष मानसून जल को संचित कर सूखे के समय उपयोग में लाना इसका मुख्य लक्ष्य है।
नदी पर बाँध बनाने हेतु कानून और प्रावधान
किसी अंतर-राज्यीय नदी पर बाँध निर्माण हेतु 'केंद्रीय जल आयोग' (CWC) की तकनीकी मंजूरी और 'पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय' से पर्यावरणीय स्वीकृति आवश्यक है। साथ ही, अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम के तहत यदि कोई राज्य दूसरे राज्य के हितों को प्रभावित करता है, तो उसे बेसिन राज्यों की सहमति लेनी पड़ती है। हालाँकि कानून (जैसे ISRWD Act 1956) सीधे तौर पर यह नहीं कहता कि "हर परियोजना के लिए सहमति अनिवार्य है", लेकिन अंतर-राज्यीय नदी जल के उपयोग का सिद्धांत "न्यायसंगत आवंटन" पर आधारित है।
नदी विवाद के प्रावधान
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 262 संसद को अंतर-राज्यीय नदियों के विवादों के समाधान के लिए कानून बनाने की शक्ति देता है। इसके तहत 'अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956' अस्तित्व में आया है, जो न्यायाधिकरण के गठन और निर्णय को अंतिम मानने का प्रावधान करता है।
पुराने विवाद और न्यायालय के निर्णय
कावेरी जल विवाद भारत के सबसे पुराने विवादों में से एक है। 2007 के न्यायाधिकरण के फैसले और 2018 के ऐतिहासिक सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने राज्यों के बीच पानी के हिस्से को परिभाषित किया है।
- सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कावेरी को 'राष्ट्रीय संपत्ति' माना और राज्यों को जल के बंटवारे के लिए सहयोगात्मक रवैया अपनाने को कहा था।
- हालाँकि नवंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु की याचिका खारिज करते हुए कहा कि DPR (डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट ) के स्तर पर आपत्ति करना "प्रीमेच्योर" है और पहले विशेषज्ञ संस्थाएं (CWMA, CWC आदि) निर्णय लेंगी।
विश्लेषण
यह विवाद केवल तकनीकी नहीं, बल्कि संघीय राजनीति का एक जटिल हिस्सा है। जहाँ एक तरफ राज्य के अपने विकास के अधिकार हैं, वहीं दूसरी तरफ जल सुरक्षा का संवैधानिक अधिकार है। अतः एकतरफा कार्यवाही से संघीय ढाँचे को चोट पहुँचती है और संवैधानिक सीमाओं का उल्लंघन होता है।
आगे की राह
सहयोगात्मक संवाद: कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच एक उच्च-स्तरीय जल आयोग का गठन हो जो डेटा साझाकरण को पारदर्शी बनाए।
- न्यायाधिकरण का हस्तक्षेप: यदि परियोजना पर विवाद सुलझता नहीं है, तो न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से तकनीकी-आर्थिक व्यवहार्यता का स्वतंत्र मूल्यांकन अनिवार्य है।
- वैज्ञानिक जल प्रबंधन: केवल बाँध निर्माण के बजाय, बेसिन स्तर पर 'एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन' (IWRM) को अपनाना चाहिए।
निष्कर्ष
मेकेदातु विवाद हमारे सहकारी संघवाद के सामने एक गंभीर परीक्षा है। जल केवल एक संसाधन नहीं, बल्कि जीवन की जीवनरेखा है। संविधान प्रदत्त सीमाओं के भीतर रहते हुए यदि विकास के लक्ष्य को प्राप्त करना है, तो 'विवाद' के स्थान पर 'सहमति' का मार्ग ही एकमात्र विकल्प है। भविष्य में हमें ऐसे जल-साझाकरण मॉडल की आवश्यकता है जो न केवल राज्यों की प्यास बुझाए, बल्कि उनके बीच संवैधानिक विश्वास को भी मजबूत करे।
आईटी एक्ट की धारा 69A और टेलीग्राम: दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले के मायने और प्रभाव
सामान्य अध्ययन पेपर – II: शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध।
संदर्भ
हाल ही में आयोजित नीट (UG) 2026 की परीक्षा में कथित पेपर लीक और संगठित धोखाधड़ी के मामलों ने देश में भारी विवाद उत्पन्न कर दिया है। इसी पृष्ठभूमि में, केंद्र सरकार द्वारा मैसेजिंग प्लेटफॉर्म टेलीग्राम पर लगाया गया अस्थायी प्रतिबंध डिजिटल सुरक्षा और संवैधानिक अधिकारों के बीच एक महत्वपूर्ण बहस का विषय बन गया है।
सूचना प्रौद्योगिकी (IT) अधिनियम की धारा 69A
सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 69A सरकार को यह शक्ति देती है कि वह भारत की संप्रभुता, अखंडता, रक्षा, सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था के हित में किसी भी कंप्यूटर संसाधन (इंटरनेट प्लेटफॉर्म या वेबसाइट) के माध्यम से जनहित में किसी भी 'सूचना' तक पहुंच को अवरुद्ध करने का निर्देश दे सकती है। यह एक आपातकालीन प्रावधान है जिसके तहत एक निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य है।
चर्चा का मुख्य कारण
यह मामला 'कंटेंट' के बजाय 'पूरे प्लेटफॉर्म' को ब्लॉक करने का एक दुर्लभ उदाहरण है। मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
- पेपर लीक का आरोप: टेलीग्राम पर कथित तौर पर नीट के प्रश्न पत्र लीक करने वाले गिरोह सक्रिय थे।
- विफलता का तर्क: सरकार का मानना है कि केवल विशिष्ट चैनलों या लिंक को हटाने से धोखाधड़ी नहीं रुक रही थी, क्योंकि अपराधी तुरंत 'मिरर चैनल' या 'बैकअप ग्रुप' बना लेते थे।
- परीक्षा की अखंडता: करोड़ों छात्रों के भविष्य और परीक्षा की शुचिता को बचाना सरकार की प्राथमिकता है।
दिल्ली उच्च न्यायालय का रुख
दिल्ली उच्च न्यायालय ने टेलीग्राम की चुनौती को खारिज करते हुए केंद्र के प्रतिबंध को बरकरार रखा है। अदालत ने कहा कि:
- सरकार ने धारा 69A के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पूर्णतः पालन किया है।
- सरकार ने आपातकालीन शक्तियों के प्रयोग के लिए पर्याप्त और उचित कारण दर्ज किए हैं।
- चैनल-विशिष्ट टेक-डाउन के प्रयास विफल रहे, इसलिए पूरे प्लेटफॉर्म पर अस्थायी रोक लगाना एक 'आनुपातिक' और न्यायोचित कदम था।
अधिनियम के अनुसार "सूचना" की परिभाषा
अदालत ने स्पष्ट किया कि IT अधिनियम के तहत "सूचना" की परिभाषा अत्यंत व्यापक है। इसमें सॉफ्टवेयर, कंप्यूटर प्रोग्राम, डेटा, और वे सभी एप्लिकेशन शामिल हैं जो इलेक्ट्रॉनिक, चुंबकीय या ऑप्टिकल आवेगों के माध्यम से तार्किक, अंकगणितीय और मेमोरी कार्य करते हैं। चूँकि टेलीग्राम एक "कंप्यूटर संसाधन" के रूप में कार्य करता है, अतः सरकार इसे ब्लॉक करने के लिए कानूनी रूप से सशक्त है।
टेलीग्राम की आपत्तियाँ
टेलीग्राम ने अदालत में अपना पक्ष रखते हुए ये तर्क दिए:
- भेदभाव का आरोप: टेलीग्राम ने दावा किया कि उसे अन्य प्लेटफार्मों की तुलना में अनुचित रूप से निशाना बनाया जा रहा है।
- सहयोग का दावा: कंपनी ने कहा कि उसने एआई और मैन्युअल मॉडरेशन के जरिए नीट से संबंधित 900 से अधिक अवैध लिंक हटाए हैं।
- व्याख्या पर सवाल: टेलीग्राम का तर्क था कि कानून केवल विशिष्ट सामग्री को हटाने की अनुमति देता है, पूरे प्लेटफॉर्म को बंद करने की नहीं।
संवैधानिक अधिकार और कानूनी प्रावधान
इस मुद्दे का संवैधानिक पक्ष 'वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' बनाम 'उचित प्रतिबंध' है:
- अनुच्छेद 19(1)(a): नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है, लेकिन यह निरपेक्ष नहीं है।
- अनुच्छेद 19(2): राज्य सार्वजनिक व्यवस्था, सुरक्षा और अखंडता के हित में इस पर 'उचित प्रतिबंध' लगा सकता है।
- कानूनी संतुलन: कानून यह तय करता है कि कोई भी प्रतिबंध मनमाना न होकर तर्कसंगत और जनहित में होना चाहिए, जैसा कि इस मामले में अदालत ने सरकार की कार्रवाई को 'न्यायोचित' मानकर सिद्ध किया है।
अंतर्राष्ट्रीय कानून के प्रावधान
वैश्विक स्तर पर डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के लिए अब कड़े मानक तय किए जा रहे हैं:
- डिजिटल जवाबदेही: यूरोप के 'डिजिटल सर्विसेज एक्ट' जैसे कानूनों के समान, अब वैश्विक स्तर पर यह माना जा रहा है कि प्लेटफॉर्म अपने बुनियादी ढांचे के जरिए होने वाले अपराधों के लिए 'निष्क्रिय' नहीं रह सकते।
- प्लेटफॉर्म जिम्मेदारी: यदि कोई प्लेटफॉर्म बार-बार अवैध गतिविधियों का केंद्र बनता है और 'मिररिंग' जैसी प्रवृत्तियों को रोकने में विफल रहता है, तो अंतरराष्ट्रीय कानून भी उसे जवाबदेह ठहराने का समर्थन करते हैं।
विश्लेषण
तकनीक की तटस्थता के नाम पर आपराधिक गतिविधियों को बढ़ावा नहीं दिया जा सकता। जब अपराधी एक-के-बाद-एक 'बैकअप ग्रुप' बनाकर कानून को चुनौती देते हैं, तो 'टारगेटेड रिमूवल' की प्रभावशीलता समाप्त हो जाती है। ऐसी स्थिति में, सरकार का 'प्लेटफॉर्म-स्तरीय' हस्तक्षेप एक आवश्यक कानूनी और प्रशासनिक कदम बन जाता है।
आगे की राह
प्रोएक्टिव मॉडरेशन: टेलीग्राम जैसे प्लेटफार्मों को अपनी एआई एल्गोरिदम को और अधिक सख्त करना होगा ताकि अवैध लिंक पोस्ट होते ही डिलीट हो जाएं।
- डेटा साझाकरण: सरकारी एजेंसियों और तकनीकी प्लेटफार्मों के बीच सूचना साझा करने के लिए एक 'फास्ट-ट्रैक' तंत्र विकसित किया जाए।
- तकनीकी समाधान: केवल प्रतिबंध के बजाय, प्लेटफॉर्म को ऐसा डिजिटल ढांचा तैयार करना चाहिए जिससे अपराधी बार-बार नए अकाउंट न बना सकें।
निष्कर्ष
दिल्ली उच्च न्यायालय का यह निर्णय स्पष्ट करता है कि तकनीक की गोपनीयता कानून से ऊपर नहीं है। परीक्षा की शुचिता बनाए रखना राष्ट्रीय प्राथमिकता है और न्यायालय ने डिजिटल सुरक्षा को महत्व देते हुए सरकार के अधिकारों को पुष्ट किया है। यह भविष्य के लिए एक मिसाल है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को अपनी जवाबदेही बढ़ानी होगी अन्यथा उन्हें कानूनी कार्रवाइयों का सामना करना पड़ेगा।
फुटपाथ पर चलने का अधिकार: एक मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता
सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- I: भारतीय विरासत और संस्कृति, विश्व का इतिहास एवं भूगोल और समाज।
सामान्य अध्ययन पेपर – II: शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध।
संदर्भ
हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण निर्णय में यह स्पष्ट किया है कि नागरिकों का सुरक्षित फुटपाथ पर चलना उनका मौलिक अधिकार है। यह निर्णय शहरी नियोजन में मानवीय गरिमा और जीवन के अधिकार को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है।
मौलिक अधिकार और भारतीय संविधान
भारतीय संविधान के भाग-III (अनुच्छेद 12 से 35) में 'मौलिक अधिकारों' का वर्णन है। मौलिक अधिकार वे बुनियादी अधिकार हैं जो व्यक्ति के सर्वांगीण विकास के लिए आवश्यक हैं और जिन्हें राज्य की मनमानी शक्तियों से सुरक्षा प्राप्त है। ये अधिकार राज्य के विरुद्ध न्याय योग्य हैं, जिसका अर्थ है कि इनके उल्लंघन पर नागरिक सीधे उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय की शरण ले सकते हैं। इस मामले में, न्यायालय ने अनुच्छेद 21 (प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार) को आधार बनाया है, जो जीवन के अधिकार के साथ-साथ गरिमामय जीवन जीने के अधिकार की गारंटी देता है।
चर्चा के कारण
सड़क दुर्घटना: यह फैसला एक 5 वर्षीय बच्चे की हृदयविदारक मृत्यु के बाद आया है, जो अपने पिता के साथ स्कूल जाते समय ट्रक की चपेट में आ गया था।
- शहरी अव्यवस्था: तीव्र शहरीकरण और बढ़ते मोटर वाहनों के दबाव के कारण शहरों में पैदल चलने वालों के लिए जगह लगभग समाप्त हो गई है, जिससे वे असुरक्षित हो गए हैं।
- उत्तरदायित्व का अभाव: स्थानीय निकायों द्वारा फुटपाथों के रखरखाव में लगातार बरती जा रही लापरवाही को संज्ञान में लेना इस चर्चा का मुख्य केंद्र है।
सर्वोच्च न्यायालय के महत्वपूर्ण कथन
"यदि सड़क मौजूद है, तो पैदल चलने वालों के लिए फुटपाथ को चिन्हित करना और बनाए रखना एक प्रवर्तनीय कर्तव्य है।"
- "चिन्हित फुटपाथ पर चलने का मौलिक अधिकार, मोटर चालित वाहनों के विशेषाधिकार पर सदैव हावी होगा।"
- "पैदल चलना सुरक्षित और निश्चिंत होना चाहिए, हर मोड़ पर खतरे का भय नहीं होना चाहिए।"
- अदालत ने इसे "जीवन से गहराई से जुड़ी सबसे सरल मानवीय गतिविधि" करार दिया है।
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा परिभाषित अनुच्छेद
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21, जो 'प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार' की गारंटी देता है, सुप्रीम कोर्ट ने उसी के विस्तार के रूप में 'फुटपाथ पर चलने के अधिकार' को एक मौलिक अधिकार माना है। इसके अतिरिक्त, अनुच्छेद 19(1) के तहत नागरिकों को देश भर में स्वतंत्र रूप से घूमने का अधिकार प्राप्त है, जो बिना सुरक्षित फुटपाथ के अधूरा है।
- इसके साथ ही, न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा ने स्पष्ट किया कि पैदल चलना केवल एक शारीरिक क्रिया नहीं है, बल्कि यह अनुच्छेद 19(1)(a) (वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता), 19(1)(b) (शांतिपूर्वक सभा करने की स्वतंत्रता) और 19(1)(c) (संघ या संगठन बनाने की स्वतंत्रता) के व्यापक दायरे में आता है, क्योंकि यह सामाजिक अंतःक्रिया और सार्वजनिक जीवन का आधार है।
अन्य महत्वपूर्ण बिंदु
फुटपाथ का अभाव सामाजिक असमानता का सूचक है, जहाँ मशीनें (वाहन) पैदल यात्रियों के अधिकारों पर हावी हो गई हैं।
- अदालत ने जोर दिया कि यह केवल सड़क निर्माण का मुद्दा नहीं है, बल्कि एक स्पष्ट 'वैधानिक ढांचे' की तत्काल आवश्यकता है।
- न्यायालय ने इस प्रकरण में पीड़ित परिवार को 1 लाख रुपये से अधिक के मुआवजे का निर्देश दिया है।
संवैधानिक और विधिक प्रावधान
अनुच्छेद 21: 'जीवन के अधिकार' के तहत सुरक्षित पर्यावरण और सुरक्षित आवागमन का अधिकार।
- राज्य के नीति निर्देशक तत्व (DPSP): राज्य के नीति निर्देशक तत्वों के अंतर्गत अनुच्छेद 38 एवं 39 राज्य को सामाजिक-आर्थिक न्याय, जनकल्याण, पर्याप्त आजीविका तथा कमजोर वर्गों के संरक्षण हेतु नीतियाँ बनाने का निर्देश देते हैं, जो नागरिकों के गरिमापूर्ण जीवन के संवर्धन में सहायक हैं।
- स्थानीय निकाय कानून: नगर निगम अधिनियमों के अंतर्गत सार्वजनिक सड़कों और फुटपाथों का रखरखाव अनिवार्य विधिक कर्तव्य है।
विश्लेषण
यह निर्णय शहरी नियोजन के 'वाहन-केंद्रित' मॉडल से 'मानव-केंद्रित' मॉडल की ओर एक आवश्यक और क्रांतिकारी बदलाव है। यह सरकार और प्रशासनिक निकायों को उनके संवैधानिक उत्तरदायित्वों का बोध कराता है, ताकि भविष्य में होने वाली दुर्घटनाओं को रोका जा सके और नागरिकों के जीवन के अधिकार की प्रभावी रक्षा की जा सके।
आगे की राह
अनिवार्य कार्यान्वयन: नगर निगमों को नई सड़कों के निर्माण में पैदल यात्रियों के लिए 'डेडिकेटेड लेन' को अनिवार्य बनाना चाहिए।
- सुरक्षा ऑडिट और जवाबदेही: फुटपाथों का नियमित 'सुरक्षा ऑडिट' किया जाना चाहिए और लापरवाही के लिए संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय होनी चाहिए।
- अतिक्रमण मुक्त अभियान: केंद्र और राज्य सरकारों को फुटपाथों पर होने वाले स्थायी और अस्थायी अतिक्रमण के विरुद्ध सख्त कानूनी कार्यवाही करनी चाहिए।
निष्कर्ष
सर्वोच्च न्यायालय का यह ऐतिहासिक निर्णय केवल एक न्यायिक निर्देश नहीं, बल्कि भारत में समावेशी शहरी विकास का नया विमर्श है। 'जीवन के अधिकार' की परिभाषा में फुटपाथ की सुरक्षा को जोड़ना यह सिद्ध करता है कि लोकतंत्र में नागरिक की सुरक्षा, किसी भी विकास परियोजना या वाहनों की गति से कहीं अधिक मूल्यवान है। अब समय आ गया है कि हमारी सड़कें केवल वाहनों के लिए नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए सुरक्षित हों जो पैदल चलकर अपनी जीविका और शिक्षा के मार्ग पर अग्रसर है। एक न्यायपूर्ण और मानवीय समाज वही है जो अपने सबसे कमजोर और पैदल चलने वाले नागरिक को सुरक्षित गलियारा प्रदान करे।