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संदर्भ:
अपनी सांस्कृतिक जड़ों की ओर लौटता भारत: भाषाई पहचान को संवैधानिक मान्यता देने के लिए केंद्र सरकार का एक ऐतिहासिक और साहसिक कदम।
वर्तमान समाचार बिंदु
- मंत्रिमंडल की मंजूरी: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 'केरल' का नाम बदलकर 'केरलम' करने के प्रस्ताव को आधिकारिक हरी झंडी दे दी है।
- प्रक्रिया और विधेयक: अनुच्छेद 3 के तहत अब संसद में एक विधेयक पेश किया जाएगा, जिससे संविधान की पहली अनुसूची में संशोधन कर राज्य का नाम औपचारिक रूप से बदला जाएगा।
- राजनीतिक प्रतिक्रिया: पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस निर्णय को भाजपा और माकपा के बीच 'राजनीतिक समझ' करार दिया है, जबकि प्रधानमंत्री ने इसे जन-इच्छा का सम्मान बताया है।
- पश्चिम बंगाल का मुद्दा: केरल के प्रस्ताव को मंजूरी मिलने के बीच, पश्चिम बंगाल का 'बांग्ला' नाम करने का प्रस्ताव अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक कारणों (बांग्लादेश से समानता) और तकनीकी बाधाओं के कारण पुनः चर्चा और विवाद में आ गया है।
केरल से 'केरलम' क्यों और इसका महत्व:
- भाषाई न्याय: मलयालम भाषा में राज्य का नाम सदैव 'केरलम' रहा है; यह परिवर्तन 'अंग्रेजी' प्रभाव को हटाकर स्थानीय भाषाई अस्मिता को गौरव प्रदान करता है।
- सांस्कृतिक गौरव: यह निर्णय 'अपनी विरासत पर गर्व' करने के राष्ट्रीय दृष्टिकोण के अनुरूप है, जो औपनिवेशिक काल के नामकरण को भारतीय संस्कृति के अनुसार पुनर्गठित करता है।
- प्रशासनिक एकरूपता: राज्य विधानसभा द्वारा पारित दो सर्वसम्मत प्रस्तावों (2023 और 2024) को केंद्र द्वारा स्वीकार कर सहकारी संघवाद को मजबूती दी गई है।
राज्य का नाम बदलने की संवैधानिक प्रक्रिया |
विशेष नोट: राज्य की राय केवल 'सलाह' मात्र है; संसद उसे मानने के लिए बाध्य नहीं है।
आवश्यक संशोधन: नाम बदलने के साथ ही संविधान की पहली और चौथी अनुसूची में संशोधन किया जाता है। इसे अनुच्छेद 368 के तहत 'संविधान संशोधन' नहीं माना जाता (यह सामान्य विधायी प्रक्रिया है)। |
इतिहास और पृष्ठभूमि:
- प्राचीन साक्ष्य: 'केरलम' शब्द का इतिहास हजारों साल पुराना है; तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व के अशोक के शिलालेखों में इसे "केरलपुत्र" और प्राचीन तमिल ग्रंथ "अकनानुरु" में भी संदर्भित किया गया है।
- व्युत्पत्ति: विद्वानों के अनुसार, यह "चेर" (जुड़ना) और "अलम" (क्षेत्र) से बना है, जिसका अर्थ है 'समुद्र द्वारा निर्मित भूमि'। कुछ इसे "केरम" (नारियल) की प्रचुरता से जोड़ते हैं।
- ब्रिटिश प्रभाव: 'केरल' नाम ब्रिटिश शासन के दौरान अंग्रेजी उच्चारण की सुविधा के लिए प्रचलित हुआ था, जिसे अब मूल स्वरूप में लौटाया जा रहा है।
निष्कर्ष:
यह निर्णय केवल नाम का परिवर्तन नहीं, बल्कि भारत की भाषाई विविधता और प्राचीन सांस्कृतिक पहचान को संवैधानिक ढांचे में प्रतिष्ठित करने का एक सशक्त प्रयास है। जहाँ 'केरलम' अपनी सांस्कृतिक विजय के निकट है, वहीं पश्चिम बंगाल की प्रतीक्षा यह स्पष्ट करती है कि राज्यों के नामकरण में भौगोलिक और कूटनीतिक संवेदनशीलताएँ भी उतनी ही निर्णायक होती हैं।
सामान्य अध्ययन पेपर – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध।
सामान्य अध्ययन पेपर – III प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन।
सन्दर्भ
साल 2025 में वाशिंगटन द्वारा नए H-1B वीजा पर $1,00,000 (लगभग 84 लाख रुपये) का भारी-भरकम शुल्क लगाना केवल एक नीतिगत बदलाव नहीं, बल्कि एक 'भू-राजनीतिक भूकंप' है। इसने न केवल भारतीय इंजीनियरों के अमेरिकी सपनों पर वित्तीय बोझ डाला है, बल्कि भारत के लिए अपनी खोई हुई प्रतिभा को वापस पाने का एक ऐतिहासिक द्वार भी खोल दिया है। सवाल यह है कि क्या हम इस 'रिवर्स ब्रेन ड्रेन' के लिए तैयार हैं?
नीतिगत प्रहार और बदलता परिदृश्य
अमेरिका की नई वीजा नीति ने उन युवा पेशेवरों को गहरे संकट में डाल दिया है जो मास्टर डिग्री और विशेषज्ञता के साथ वहां अपनी जगह बनाना चाहते थे। आंकड़े बताते हैं कि FY2024 में कुल H-1B अनुमोदनों में 71% हिस्सेदारी भारतीयों की थी। अब, आइवी लीग विश्वविद्यालयों से पढ़े 30% अधिक भारतीय छात्र स्वदेश वापसी की राह देख रहे हैं। भारत सरकार ने भी GATI, VAJRA और eMigrate V2.0 जैसी योजनाओं के जरिए इस प्रतिभा को 'स्वदेशी' विचार के साथ जोड़ने का संरचित प्रयास शुरू कर दिया है।
राज्यों का विरोधाभास: स्टार्टअप हब या रहने योग्य शहर?
लेख का सबसे कड़वा सच यह है कि भारत के महानगर स्टार्टअप ईकोसिस्टम बनाने में तो सफल रहे हैं, लेकिन वे 'पारिवारिक पुनर्निवेश' के मानकों पर खरे नहीं उतरते।
- महाराष्ट्र: देश का सबसे बड़ा स्टार्टअप क्लस्टर होने के बावजूद, यहाँ आवास की भारी लागत और स्कूल सीटों की अनिश्चितता एक बड़ी बाधा है।
- दिल्ली: यहाँ संस्थागत नेटवर्क तो मजबूत है, लेकिन यह केवल 'पहुंच वाले' लोगों का पक्ष लेता दिखता है।
- कर्नाटक: 'बियॉन्ड बेंगलुरु' जैसी नीतियों के जरिए विकास को मैसूरु और मंगलुरु तक ले जाने की कोशिश तो हो रही है, लेकिन वहां वैश्विक स्तर की स्वास्थ्य सेवा और अनुसंधान बुनियादी ढांचे की कमी है।
निष्कर्ष यह है कि राज्य 'कंपनियों' को तो आकर्षित कर रहे हैं, लेकिन 'इंसानों' के बसने की योजना बनाने में पीछे रह गए हैं।
R&D का सूखा: सबसे बड़ी चुनौती
प्रतिभा को वापस बुलाना एक बात है, लेकिन उसे थामे रखना दूसरी। भारत का अनुसंधान और विकास (R&D) निवेश उसके सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का मात्र 0.64% है। तुलनात्मक रूप से देखें तो अमेरिका (3.47%) और इजरायल (5.71%) हमसे कोसों आगे हैं। जब तक निजी क्षेत्र को R&D में निवेश के लिए ठोस प्रोत्साहन नहीं मिलेगा, तब तक उच्च-योग्यता वाले पेशेवर भारत को केवल एक 'अस्थायी पड़ाव' ही मानेंगे।
भविष्य की राह: नवाचार लाभांश
H-1B वीजा की अनिश्चितता भारत के लिए एक 'इनोवेशन डिविडेंड' बन सकती है, बशर्ते हम निम्नलिखित बिंदुओं पर काम करें:
- सोशल इंफ्रास्ट्रक्चर: लौटने वाले परिवारों के लिए आवास, जीवनसाथी के लिए रोजगार और बच्चों के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की गारंटी।
- निजी R&D को बढ़ावा: सॉफ्टवेयर प्रोडक्ट्स, सेमीकंडक्टर और एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों में भारी निवेश।
- संस्थागत सुधार: सरकारी प्रयोगशालाओं और निजी स्टार्टअप्स के बीच की दूरी को कम करना।
निष्कर्ष:
भारत के पास आज 1,600 से अधिक ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCC) हैं जो लाखों लोगों को रोजगार दे रहे हैं। परिस्थितियां 'ब्रेन सर्कुलेशन' के लिए बिल्कुल अनुकूल हैं। यदि हम आज अपने शहरों को रहने योग्य और अपने अनुसंधान क्षेत्र को प्रतिस्पर्धी नहीं बनाते, तो यह प्रतिभाशाली पीढ़ी एक बार फिर किसी दूसरे देश का रुख कर लेगी।
यह समय केवल 'वापस बुलाने' का नहीं, बल्कि 'वापस रोकने' की ठोस नींव रखने का है।
सामान्य अध्ययन पेपर – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध
संदर्भ
भारत में महिलाओं के स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाली गंभीर समस्याओं और विशेष रूप से सर्वाइकल कैंसर (गर्भाशय ग्रीवा का कैंसर) की बढ़ती दर ने एक राष्ट्रीय संकट का रूप ले लिया है। इस समस्या के व्यापक प्रभाव और भविष्य की पीढ़ियों को इससे सुरक्षित करने की अनिवार्यता को देखते हुए, भारत सरकार ने एक निर्णायक कदम उठाया है। सार्वजनिक स्वास्थ्य ढांचे को सुदृढ़ करने और 'नारी शक्ति' के संरक्षण हेतु सरकार द्वारा उठाए गए ठोस कदमों ने इस विषय को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला दिया है।
मानव पेपिलोमावायरस (HPV) क्या है?
मानव पेपिलोमावायरस (HPV) विषाणुओं का एक बड़ा समूह है, जिसमें 200 से अधिक प्रकार के वायरस शामिल हैं। इसके महत्वपूर्ण बिंदु निम्नलिखित हैं:
- प्रसार: यह मुख्य रूप से त्वचा से त्वचा के संपर्क और यौन संपर्क के माध्यम से फैलता है।
- जोखिम: अधिकांश HPV संक्रमण स्वतः ठीक हो जाते हैं, लेकिन कुछ 'उच्च-जोखिम' वाले प्रकार (विशेषकर 16 और 18) शरीर में बने रहते हैं और भविष्य में कैंसर का कारण बनते हैं।
- प्रभाव: यह न केवल सर्वाइकल कैंसर, बल्कि योनि, गुदा और गले के कैंसर के लिए भी जिम्मेदार है।
- रोकथाम: टीकाकरण इसका सबसे प्रभावी बचाव है, जो संक्रमण होने से पहले (किशोर अवस्था में) दिया जाना चाहिए।
चर्चा में क्यों?
28 फरवरी, 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राजस्थान के अजमेर से 'राष्ट्रीय HPV टीकाकरण अभियान' का शुभारंभ किया। इस अभियान के प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं:
- लक्ष्य: देश की लगभग 1.15 करोड़ किशोरियों (14 वर्ष की आयु) को लक्षित करना।
- रणनीति: 'गार्डासिल' (Gardasil-4) वैक्सीन की 'सिंगल-डोज' (एकल खुराक) नीति को अपनाना, जो वैज्ञानिक रूप से 93-100% प्रभावी सिद्ध हुई है।
- वैक्सीन का प्रकार: 'गार्डासिल' नामक क्वाड्रिवेलेंट वैक्सीन का उपयोग किया जाएगा, जो HPV प्रकार 6, 11, 16 और 18 से सुरक्षा प्रदान करती है।
- लागत: यह पूरी तरह मुफ्त होगा, ताकि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग की पहुंच सुनिश्चित हो सके।
- निगरानी: टीकाकरण सत्र प्रशिक्षित चिकित्सा अधिकारियों की देखरेख में होंगे ताकि किसी भी प्रतिकूल प्रभाव का प्रबंधन किया जा सके।
- कार्यान्वयन: यह अभियान 'U-WIN' डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से संचालित हो रहा है, जिससे पंजीकरण और ट्रैकिंग पारदर्शी बनी है।
- प्रारंभिक सफलता: मार्च 2026 के आंकड़ों के अनुसार, अभियान के पहले 15 दिनों के भीतर ही लगभग 3 लाख लड़कियों का सफल टीकाकरण किया जा चुका है।
- सहयोग: भारत ने 'गावी' (Gavi - Vaccine Alliance) के साथ साझेदारी कर पारदर्शी खरीद तंत्र के माध्यम से आपूर्ति सुनिश्चित की है।
आवश्यकता और भारत में स्थिति
- आवश्यकता क्यों?
- निवारक उपचार: सर्वाइकल कैंसर उन गिने-चुने कैंसरों में से है जिन्हें टीकाकरण और प्रारंभिक स्क्रीनिंग से पूरी तरह रोका जा सकता है।
- आर्थिक बोझ: कैंसर का उपचार परिवारों को गरीबी के दुष्चक्र में धकेल देता है; टीकाकरण इस दीर्घकालिक बोझ को कम करता है।
- भारत में स्थिति:
- व्यापकता: भारत में महिलाओं के बीच सर्वाइकल कैंसर दूसरा सबसे आम कैंसर है।
- सांख्यिकी: प्रतिवर्ष लगभग 80,000 नए मामले दर्ज किए जाते हैं।
- मृत्यु दर: वैश्विक स्तर पर होने वाली सर्वाइकल कैंसर की मौतों में भारत का हिस्सा लगभग एक-चौथाई है, जो एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट की ओर इशारा करता है।
- वैश्विक परिदृश्य
- WHO का लक्ष्य: विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने 2030 तक सर्वाइकल कैंसर को समाप्त करने के लिए '90-70-90' का लक्ष्य रखा है (90% लड़कियों का टीकाकरण, 70% महिलाओं की स्क्रीनिंग, और 90% का उपचार)।
- वैश्विक स्वीकार्यता: वर्तमान में विश्व के 90 से अधिक देश सिंगल-डोज नीति को अपना चुके हैं।
- प्रभावशीलता: अंतरराष्ट्रीय डेटा के अनुसार, जिन देशों में व्यापक टीकाकरण हुआ है, वहां सर्वाइकल कैंसर के मामलों में 90% तक की कमी देखी गई है।
अन्य समस्याएं: सर्वाइकल कैंसर के कारक
HPV के अलावा अन्य कारक जो सर्वाइकल कैंसर को बढ़ावा देते हैं:
- जागरूकता का अभाव: ग्रामीण क्षेत्रों में लक्षणों और स्क्रीनिंग (जैसे Pap Smear) के प्रति जानकारी की कमी।
- देरी से निदान: भारत में अधिकांश मामले तीसरे या चौथे चरण में पता चलते हैं, जब जीवित रहने की संभावना कम हो जाती है।
- स्वच्छता और पोषण: व्यक्तिगत स्वच्छता की कमी और कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली जोखिम बढ़ाती है।
महत्वपूर्ण रिपोर्ट्स और अभियान का महत्व
- रिपोर्ट्स: 'लैंसेट' और 'WHO' की रिपोर्टें बार-बार भारत को इस दिशा में कड़े कदम उठाने की चेतावनी देती रही हैं।
- अभियान का महत्व:
- समानता: 'फ्री ऑफ कॉस्ट' मॉडल सामाजिक-आर्थिक असमानता को पाटता है।
- सक्षमता: सरकारी मेडिकल कॉलेजों और जिला अस्पतालों का उपयोग करना इसकी विश्वसनीयता बढ़ाता है।
- भविष्य की सुरक्षा: यह अगली पीढ़ी की महिलाओं को एक घातक बीमारी से सुरक्षित करने का निवेश है।
अन्य सरकारी पहल
- CERVAVAC: भारत की पहली स्वदेशी क्वाड्रिवेलेंट HPV वैक्सीन (SIII द्वारा विकसित), जो आत्मनिर्भर भारत का प्रतीक है।
- आयुष्मान भारत: कैंसर के उपचार के लिए 5 लाख रुपये तक का स्वास्थ्य बीमा कवर।
- राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM): इसके तहत गैर-संचारी रोगों (NCD) की स्क्रीनिंग पर जोर दिया जा रहा है।
विश्लेषण
भारत का यह निर्णय विज्ञान-आधारित और जन-केंद्रित है। हालांकि, केवल टीका उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं होगा। भारत की विविधता और सांस्कृतिक मान्यताओं के कारण 'टीकाकरण हिचकिचाहट' एक चुनौती बन सकती है। सुरक्षा रिकॉर्ड (50 करोड़ से अधिक वैश्विक खुराक) होने के बावजूद, अफवाहों को रोकना और ग्रामीण आबादी का विश्वास जीतना इस अभियान की सफलता की असली कसौटी होगी।
आगे की राह
- जागरूकता अभियान: आशा (ASHA) कार्यकर्ताओं और स्कूलों के माध्यम से अभिभावकों को शिक्षित करना।
- स्क्रीनिंग का विस्तार: 30 वर्ष से अधिक आयु की महिलाओं के लिए नियमित 'Pap Smear' या 'HPV DNA' टेस्ट को अनिवार्य या सुलभ बनाना।
- स्वदेशी उत्पादन: लागत कम करने के लिए स्वदेशी 'CERVAVAC' वैक्सीन के उत्पादन और वितरण को गति देना।
- पुरुषों की भागीदारी: भविष्य में लड़कों के टीकाकरण पर भी विचार करना चाहिए क्योंकि वे भी इस वायरस के वाहक होते हैं।
निष्कर्ष
14 वर्ष की बालिकाओं के लिए निःशुल्क HPV टीकाकरण कार्यक्रम भारत की स्वास्थ्य नीति में एक मील का पत्थर है। यह न केवल महिलाओं के 'स्वास्थ्य के अधिकार' को सुदृढ़ करता है, बल्कि देश के मानव संसाधन को दीर्घकालिक सुरक्षा प्रदान करता है। यदि इसे प्रभावी ढंग से लागू किया जाता है, तो भारत आने वाले दशकों में सर्वाइकल कैंसर मुक्त राष्ट्र बनने के वैश्विक लक्ष्य को प्राप्त कर सकेगा।
सामान्य अध्ययन पेपर – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध
संदर्भ
भारत में गौ-संरक्षण के नाम पर होने वाली हिंसा और 'मॉब लिंचिंग' (भीड़ द्वारा हत्या) की समस्या दशकों पुरानी है, लेकिन पिछले एक दशक में इसने एक भयानक और संगठित रूप ले लिया है। 2018 में 'तहसीन पूनावाला बनाम भारत संघ' मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जारी कड़े दिशा-निर्देशों के बाद यह उम्मीद जगी थी कि इस अराजकता पर लगाम लगेगी। हालाँकि, हाल ही में (फरवरी 2026) सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणियों ने इस मुद्दे को फिर से राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला दिया है, जहाँ न्यायालय ने अपने ही पूर्ववर्ती निर्देशों को लागू करने में असमर्थता जताई है।
गौ-सतर्कता क्या है?
गौ-सतर्कता का अर्थ है—स्वयं घोषित 'गौ-रक्षकों' के समूहों द्वारा कानून को अपने हाथ में लेना और गायों की तस्करी या गौ-मांस के संदेह में व्यक्तियों पर हमला करना या उनकी हत्या कर देना।
- प्रमुख बिंदु: यह अक्सर अफवाहों, सांप्रदायिक द्वेष और बिना किसी कानूनी आधार के किया जाता है।
- प्रभाव: यह न केवल कानून के शासन का उल्लंघन है, बल्कि अल्पसंख्यक समुदायों और हाशिए के वर्गों के मन में भय का वातावरण पैदा करता है।
चर्चा में क्यों?
23 फरवरी, 2026 को भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने एक महत्वपूर्ण और विवादास्पद टिप्पणी की:
- निर्देशों को बताया 'असंभालने योग्य': न्यायालय ने कहा कि 2018 में जारी किए गए "सामान्य निर्देश" राज्यों द्वारा लागू किए जाने के लिए व्यावहारिक नहीं हैं।
- केस-दर-केस दृष्टिकोण: CJI ने सुझाव दिया कि हर अपराध को उसके विशिष्ट तथ्यों के आधार पर देखा जाना चाहिए, न कि एक व्यापक निगरानी तंत्र के माध्यम से।
- अवमानना याचिकाओं पर इनकार: न्यायालय ने उन राज्यों के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू करने से इनकार कर दिया, जिन्होंने 2018 के निवारक और दंडात्मक उपायों को लागू नहीं किया था।
- न्यायिक पीछे हटना: विशेषज्ञों ने इसे न्यायपालिका का ‘पीछे हटना’ करार दिया है, जहाँ न्यायालय अब 'प्रहरी' की भूमिका से हटना चाहता है।
सर्वोच्च न्यायालय के पुराने निर्देश (2018) विस्तार में
2018 में 'तहसीन पूनावाला' फैसले में न्यायालय ने तीन प्रकार के उपाय बताए थे:
- निवारक उपाय: प्रत्येक जिले में एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी (SP रैंक) को 'नोडल अधिकारी' नियुक्त करना और संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान कर गश्त बढ़ाना।
- दंडात्मक उपाय: लिंचिंग के मामलों के लिए 'फास्ट ट्रैक कोर्ट' का गठन करना और दोषियों को अधिकतम सजा सुनिश्चित करना। कर्तव्यों में लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई।
- उपचारात्मक उपाय: पीड़ितों के लिए एक महीने के भीतर मुआवजा योजना लागू करना।
भारत में भीड़ जनित हिंसा: नवीतम रिपोर्ट्स और आंकड़े
- सांख्यिकी (2014-2023): आंकड़ों के अनुसार, भारत में पिछले दशक में मॉब लिंचिंग के 189 से अधिक मामले दर्ज किए गए हैं।
- रिपोर्ट (2025-26): हालिया 'स्टेटस ऑफ पोलिसिंग इन इंडिया रिपोर्ट 2025' के अनुसार, कई पुलिस अधिकारी भीड़ द्वारा दी जाने वाली सजा को आंशिक रूप से जायज मानते हैं, जो एक खतरनाक प्रवृत्ति है।
- ताज़ा घटनाएं (2025-26): मई 2025 में अलीगढ़ और विजय नगर (दिल्ली) में गौ-मांस के संदेह में भीड़ द्वारा हिंसक हमलों की खबरें आईं, जिनमें बाद में आरोपों को आधारहीन पाया गया।
प्रमुख चिंताएं
- संवैधानिक विफलता: यदि राज्य नागरिकों के जीवन की रक्षा (अनुच्छेद 21) नहीं कर पाता, तो यह शासन व्यवस्था की विफलता है।
- अर्ध-न्यायिक शक्तियां: कई राज्यों में गौ-रक्षकों को कानूनी संरक्षण और 'सद्भावना' के नाम पर अर्ध-पुलिस शक्तियां मिल गई हैं, जो सीधे तौर पर 2018 के निर्देशों का उल्लंघन है।
- पुलिस की मिलीभगत: अक्सर पुलिस मूकदर्शक बनी रहती है या पीड़ितों के खिलाफ ही मामले दर्ज कर लेती है।
बहुआयामी प्रभाव
- सामाजिक: सांप्रदायिक सद्भाव का बिगड़ना और असुरक्षा की भावना।
- कानूनी: 'कानून के शासन' के प्रति जनता का विश्वास कम होना।
- आर्थिक: चमड़ा और डेयरी उद्योग पर प्रतिकूल प्रभाव, विशेषकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था में।
संवैधानिक एवं कानूनी प्रावधान
- अनुच्छेद 48: राज्य कृषि और पशुपालन को आधुनिक बनाने और गायों व बछड़ों के वध को रोकने का प्रयास करेगा (DPSP)।
- अनुच्छेद 21: जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार।
- भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023, धारा 103(2): पाँच या अधिक व्यक्तियों के समूह द्वारा नस्ल, जाति या समुदाय के आधार पर की गई हत्या को 'मॉब लिंचिंग' माना गया है, जिसमें मृत्युदंड या आजीवन कारावास का प्रावधान है।
विश्लेषण:
न्यायालय का वर्तमान रुख यह दर्शाता है कि वह इस जटिल मुद्दे को राज्यों की कानून-व्यवस्था पर छोड़कर स्वयं को दूर रखना चाहता है। लेकिन जब राज्य की मशीनरी स्वयं गौ-रक्षकों को संरक्षण देने लगे, तो सर्वोच्च न्यायालय का पीछे हटना उन नागरिकों के लिए घातक है जो न्याय की अंतिम उम्मीद लेकर वहां पहुंचते हैं।
आगे की राह
- विशिष्ट कानून: संसद को एक समर्पित 'एंटी-लिंचिंग कानून' (जैसा कि राजस्थान और मणिपुर ने प्रयास किया) बनाना चाहिए।
- अधिकारियों की जवाबदेही: घटना को रोकने में विफल रहने वाले नोडल अधिकारियों पर तत्काल कार्रवाई होनी चाहिए।
- तकनीकी निगरानी: भड़काऊ संदेशों और अफवाहों को रोकने के लिए पारदर्शी डिजिटल मॉनिटरिंग सिस्टम का उपयोग सुरक्षा व्यवस्था में किया जाना चाहिए।
निष्कर्ष
लोकतंत्र में 'भीड़तंत्र' के लिए कोई स्थान नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय को अपने 2018 के ऐतिहासिक निर्णय की गरिमा बनाए रखनी चाहिए। यदि न्यायपालिका पीछे हटती है, तो यह बहुसंख्यकवादी राजनीति को कानून से ऊपर होने का लाइसेंस देने जैसा होगा। कानून का शासन तभी जीवित रहेगा जब वह हर नागरिक को, चाहे वह बहुमत में हो या अल्पमत में, समान सुरक्षा प्रदान करे।
सामान्य अध्ययन पेपर – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध
संदर्भ
हाल ही में संपन्न हुई विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया ने भारत की लोकतांत्रिक नींव—'सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार' पर कई गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। मतदाता सूची से नामों के बड़े पैमाने पर हटाए जाने और इस प्रक्रिया में मौजूद संरचनात्मक खामियों ने यह बहस छेड़ दी है कि क्या निर्वाचन आयोग द्वारा अपनाई गई पद्धतियाँ वास्तव में समावेशी हैं।
SIR प्रक्रिया और आंकड़ों का विश्लेषण
निर्वाचन आयोग द्वारा जारी अंतिम मतदाता सूची के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। तमिलनाडु, गुजरात और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में मतदाता सूची से हटाए गए नामों की संख्या 11% से 13% के बीच है।
- प्रवासन बनाम विलोपन: तमिलनाडु और गुजरात जैसे राज्य 'नेट इन-प्रवासी' राज्य हैं, जहाँ अन्य राज्यों से लोग काम के लिए आते हैं। इसके बावजूद यहाँ बिहार (जहाँ से पलायन अधिक होता है) की तुलना में विलोपन दर कहीं अधिक है।
- लैंगिक असमानता: आंकड़ों से स्पष्ट है कि पुरुषों की तुलना में महिला मतदाताओं के नाम अधिक काटे गए हैं। यह विशेष रूप से उन विवाहित महिलाओं को प्रभावित करता है जिन्होंने विवाह के बाद अपना निवास स्थान बदला है।
प्रमुख विसंगतियां और चुनौतियाँ
- जनगणना के आंकड़ों का अभाव: एक सटीक मतदाता सूची के लिए जनसंख्या के अद्यतन आंकड़ों की आवश्यकता होती है। चूँकि केंद्र सरकार द्वारा जनगणना में अत्यधिक विलंब किया गया है, निर्वाचन आयोग अभी भी 2011 के पुराने आंकड़ों पर निर्भर है। इससे वास्तविक वयस्क जनसंख्या और पंजीकृत मतदाताओं के बीच एक बड़ा अंतराल पैदा हो गया है।
- प्रमाणीकरण का बोझ: SIR प्रक्रिया की सबसे बड़ी खामी यह है कि इसने पात्रता सिद्ध करने का पूरा बोझ मतदाताओं पर डाल दिया है। 'घर-घर जाकर गणना' के बजाय डिजिटल और क्लस्टर-आधारित सत्यापन पर निर्भरता ने उन प्रवासियों और गरीब वर्गों को हाशिए पर धकेल दिया है, जिनके पास सूचना या संसाधनों का अभाव है।
- पहचान दस्तावेजों की प्रकृति: आधार या राशन कार्ड जैसे दस्तावेजों का उपयोग दैनिक जीवन में होता है, इसलिए नागरिक उन्हें अद्यतन रखते हैं। इसके विपरीत, 'वोटर आईडी' का उपयोग केवल पांच साल में एक बार होता है। इस 'उपयोगिता की कमी' के कारण आम नागरिक मतदाता सूची में अपना नाम सुनिश्चित करने के प्रति उदासीन रहते हैं।
न्यायपालिका की भूमिका और 'बैंड-एड' समाधान
पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में निर्वाचन आयोग के खराब क्रियान्वयन के कारण स्थिति इतनी जटिल हो गई है कि सर्वोच्च न्यायालय को अन्य राज्यों के न्यायिक अधिकारियों की सहायता लेनी पड़ी है। शीर्षक 'बैंड-एड' इसी ओर संकेत करता है कि न्यायालय और आयोग केवल सतही सुधार कर रहे हैं, जबकि समस्या की जड़ प्रक्रिया की संवैधानिकता और सुदृढ़ता पर ठोस प्रहार नहीं किया जा रहा है।
आगे की राह
- संविधान सम्मत पुनरीक्षण: सर्वोच्च न्यायालय को SIR प्रक्रिया की संवैधानिकता पर शीघ्र निर्णय लेना चाहिए ताकि भविष्य में ऐसी त्रुटिपूर्ण प्रक्रियाओं को रोका जा सके।
- प्रौद्योगिकी: डिजिटल प्लेटफॉर्म प्रभावी हैं, लेकिन ग्रामीण और प्रवासी आबादी के लिए 'घर-घर जाकर सत्यापन' का कोई विकल्प नहीं हो सकता।
- राजनीतिक जवाबदेही: राजनीतिक दलों को केवल चुनावी जीत तक सीमित न रहकर, प्रत्येक पात्र नागरिक का नाम मतदाता सूची में सुनिश्चित करने के लिए 'नागरिक सहायता' की भूमिका निभानी चाहिए।
निष्कर्ष
लोकतंत्र की सफलता केवल मतदान के प्रतिशत पर नहीं, बल्कि मतदाता सूची की शुद्धता और समावेशिता पर निर्भर करती है। निर्वाचन आयोग को 'जल्दबाजी' के बजाय 'सटीकता' पर ध्यान देना चाहिए ताकि भारत का कोई भी नागरिक अपने मताधिकार से वंचित न रहे। केवल जख्मों पर पट्टी बांधने से लोकतंत्र का स्वास्थ्य नहीं सुधरेगा, इसके लिए गहरी सुधारात्मक सर्जरी की आवश्यकता है।