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सामान्य अध्ययन पेपर – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध।
सन्दर्भ
विगत दशक में भारत ने महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण प्रतिमान स्थापित किया है, जहाँ नीतियों को केवल 'सैद्धांतिक मंशा' तक सीमित न रखकर 'धरातलीय अवसंरचना' का रूप दिया गया है। वर्तमान नीतिगत ढांचे में विकास की मुख्यधारा में महिलाओं को केंद्रबिंदु बनाना महज एक सामाजिक सुधार नहीं, बल्कि एक सुनियोजित राष्ट्रीय रणनीति है। यह इस तथ्य को स्वीकार करता है कि राष्ट्र की प्रगति की गति महिला शक्ति की सक्रिय भागीदारी के बिना समग्र नहीं हो सकती।
सांख्यिकीय उपलब्धि एवं संरचनात्मक परिवर्तन
भारत की विकासात्मक यात्रा में महिलाओं की भूमिका को निम्नलिखित प्रमुख स्तंभों के माध्यम से समझा जा सकता है:
- वित्तीय समावेशन: जन धन योजना के अंतर्गत खोले गए 57 करोड़ से अधिक खातों में से 55% से अधिक महिलाओं के हैं। इसने औपचारिक बैंकिंग प्रणाली में उनकी पहुंच सुनिश्चित की है।
- उद्यमिता एवं स्वरोजगार: 'मुद्रा' (MUDRA) ऋणों का लगभग 70% महिला उद्यमियों को प्राप्त होना और 90 लाख से अधिक स्वयं सहायता समूहों (SHGs) के माध्यम से 10 करोड़ महिलाओं का संगठित होना ग्रामीण अर्थव्यवस्था में एक मूक क्रांति का परिचायक है।
- सामाजिक सुरक्षा एवं स्वास्थ्य: उज्ज्वला योजना और आयुष्मान भारत जैसी पहलों ने न केवल महिलाओं के 'जीवन की गुणवत्ता' में सुधार किया है, बल्कि उन्हें स्वास्थ्य संबंधी जोखिमों से सुरक्षा प्रदान कर सशक्त बनाया है।
- श्रम बल भागीदारी: महिला श्रम बल भागीदारी दर का बढ़कर लगभग 37% होना एक सकारात्मक संकेत है, जो लंबे समय से चली आ रही गिरावट को संबोधित करता है।
चुनौतियां: नीतिगत निर्माण से नीतिगत पैठ तक
यद्यपि योजनाओं का पैमाना विशाल है, किंतु 'अंतिम छोर तक पहुंच' अभी भी एक चुनौती बनी हुई है। जिला स्तरीय प्रशासन के लिए अब मुख्य कार्य 'पात्रता' को 'पहुंच' में बदलना है।
- जागरूकता अंतराल: कई महिलाएं अभी भी सूचना के अभाव में योजनाओं के लाभ से वंचित हैं।
- परिणाम-आधारित निगरानी: हमें केवल 'व्यय' या 'संख्या' को नहीं, बल्कि समाज पर पड़ने वाले वास्तविक 'प्रभाव' को मापने की आवश्यकता है।
नारी शक्ति वंदन अधिनियम: प्रतिनिधित्व से प्राधिकार तक
नारी शक्ति वंदन अधिनियम केवल एक विधायी सुधार नहीं है, बल्कि नीति निर्माण की प्रक्रिया में 'जीवंत अनुभवों' को शामिल करने का माध्यम है। जब नीति निर्माण में महिलाओं की भागीदारी बढ़ेगी, तो नीतियां अधिक संवेदनशील, व्यावहारिक और समावेशी बनेंगी। यह सुधार एक 'मल्टीप्लायर इफेक्ट' उत्पन्न करेगा, जिससे भविष्य में नेतृत्व की एक नई श्रृंखला तैयार होगी।
भविष्य की राह: 2047 की ओर
भारत जब अपनी स्वतंत्रता के शताब्दी वर्ष (2047) तक 'विकसित भारत' बनने का लक्ष्य रखता है, तो महिला नेतृत्व वाला विकास इसका आधार स्तंभ होना चाहिए। इसके लिए आगामी पांच वर्षों में निम्नलिखित क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करना अनिवार्य है:
- STEM में नेतृत्व: भारत में विज्ञान और प्रौद्योगिकी (STEM) की छात्राओं का उच्च प्रतिशत है, जिसे अब शासन और नवाचार के नेतृत्व में परिवर्तित करना होगा।
- संस्थागत समर्थन: महिलाओं को केवल निर्वाचित प्रतिनिधि के रूप में नहीं, बल्कि संस्थागत प्रमुखों के रूप में तैयार करने हेतु विशेष प्रशिक्षण और मेंटरशिप की आवश्यकता है।
- सरलीकृत प्रक्रियाएं: नीतियों तक पहुंच को इतना सरल बनाना चाहिए कि समाज का सबसे निचला तबका भी बिना किसी बाधा के लाभ प्राप्त कर सके।
निष्कर्ष
सशक्तिकरण अब केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि भारत की आर्थिक स्थिरता और सामाजिक सुदृढ़ता की पूर्व-शर्त है। 'नारी शक्ति' को प्राधिकार सौंपना भारत के विकास पथ को पुनः परिभाषित करेगा। नीति निर्माताओं और प्रशासकों के लिए यह स्पष्ट संदेश है कि नीतियों के 'संतृप्ति बिंदु' को प्राप्त करना ही विकसित भारत का मार्ग प्रशस्त करेगा।
सामान्य अध्ययन पेपर – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध
संदर्भ
भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' (128वाँ संविधान संशोधन विधेयक) पितृसत्तात्मक विधायी संरचनाओं को तोड़ने की दिशा में एक युगांतरकारी कदम है। यह न केवल आधी आबादी को नीति-निर्धारण के केंद्र में लाने का वैधानिक प्रयास है, बल्कि समावेशी शासन की दिशा में एक नैतिक उद्घोष भी है।
महिला आरक्षण अधिनियम-2023
इसे 106वाँ संविधान संशोधन अधिनियम के रूप में जाना जाता है। इसके मुख्य प्रावधान निम्नलिखित हैं:
- आरक्षण: लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और दिल्ली विधानसभा में महिलाओं के लिए 33% (एक-तिहाई) सीटें आरक्षित करना।
- उपरक्षण: आरक्षित सीटों के भीतर ही अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) की महिलाओं के लिए कोटा सुनिश्चित करना।
- अवधि: यह आरक्षण प्रारंभिक रूप से 15 वर्षों के लिए होगा, जिसे संसद आगे बढ़ा सकती है।
- रोटेशन: आरक्षित सीटों का आवंटन प्रत्येक परिसीमन अभ्यास के बाद रोटेशन के आधार पर किया जाएगा।
चर्चा में क्यों?
- कार्यान्वयन में विलंब: अधिनियम के पारित होने के बावजूद, इसके लागू होने की तिथि को आगामी जनगणना और परिसीमन से जोड़ दिया गया है।
- 2029 का चुनाव: नवीनतम आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 2029 के आम चुनाव से पूर्व परिसीमन प्रक्रिया पूर्ण होना कठिन है, जिससे यह 2034 तक टल सकता है।
- संवैधानिक स्पष्टता की मांग: नागरिक समाज और विपक्षी दलों द्वारा जनगणना और परिसीमन की शर्त को हटाकर इसे तत्काल लागू करने की मांग की जा रही है।
संवैधानिक एवं तार्किक बाधाएँ
- अनुच्छेद 82 और परिसीमन: अधिनियम की धारा के अनुसार, आरक्षण केवल तभी प्रभावी होगा जब 2026 के बाद की पहली जनगणना के आंकड़े प्रकाशित हो जाएंगे और उसके आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण (परिसीमन) होगा।
- प्रक्रियात्मक जटिलता: जनगणना (संभावित 2027) और उसके बाद परिसीमन आयोग की रिपोर्ट में कम से कम 4-5 वर्ष का समय लगता है।
- सीटों का असंतुलन: उत्तर और दक्षिण भारत के राज्यों के बीच जनसंख्या के आधार पर सीटों के आवंटन को लेकर राजनीतिक विवाद परिसीमन की प्रक्रिया को और जटिल बना सकता है।
अधिनियम का महत्व एवं प्रभाव
- राजनीतिक सशक्तिकरण: यह 'प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व' से 'सक्रिय भागीदारी' की ओर संक्रमण सुनिश्चित करेगा।
- नीतिगत बदलाव: शोध बताते हैं कि महिला प्रतिनिधि स्वास्थ्य, शिक्षा और पेयजल जैसे जमीनी मुद्दों पर अधिक संवेदनशील निर्णय लेती हैं।
- लैंगिक अंतराल में कमी: ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स में भारत की रैंकिंग में सुधार होगा।
- नेतृत्व का लोकतंत्रीकरण: यह ग्रामीण स्तर (पंचायतों) के सफल महिला नेतृत्व को राष्ट्रीय स्तर पर मंच प्रदान करेगा।
प्रतीक्षा का लंबा इतिहास
- 1996: एचडी देवेगौड़ा सरकार द्वारा पहली बार 81वें संशोधन विधेयक के रूप में पेश किया गया।
- 1998-2003: वाजपेयी सरकार के दौरान कई बार प्रयास हुए लेकिन आम सहमति के अभाव में विफल रहे।
- 2010: मनमोहन सिंह सरकार के दौरान राज्यसभा में पारित हुआ, परंतु लोकसभा में लंबित रहने के कारण लैप्स हो गया।
- 2023: लगभग 27 वर्षों के विधायी संघर्ष के बाद यह कानून बना।
प्रमुख चिंताएँ
- 'प्रधान-पति' संस्कृति: पंचायतों की भांति राष्ट्रीय स्तर पर भी महिला प्रतिनिधियों के पीछे पुरुष रिश्तेदारों का नियंत्रण होने की आशंका।
- ओबीसी कोटा का अभाव: अधिनियम में अन्य पिछड़ा वर्ग की महिलाओं के लिए अलग से आरक्षण का प्रावधान नहीं है, जो समावेशिता पर प्रश्नचिह्न लगाता है।
- विलंब की राजनीति: आलोचकों का तर्क है कि इसे जनगणना से जोड़ना केवल राजनीतिक लाभ के लिए कार्यान्वयन को टालना है।
विश्लेषण
यह अधिनियम केवल सीटों का अंकगणित नहीं है, बल्कि भारतीय राजनीति के सामाजिक चरित्र का पुनर्गठन है। जहाँ एक ओर यह महिलाओं के 'एजेंसी' (निर्णय लेने की शक्ति) को स्वीकार करता है, वहीं दूसरी ओर परिसीमन की शर्त इसे एक 'भविष्योन्मुखी वादे' तक सीमित कर देती है। बिना तत्काल समयसीमा के, यह कानून अपनी नैतिक ऊर्जा खो सकता है।
आगे की राह
- शर्तों में संशोधन: सरकार को 'जनगणना और परिसीमन' की अनिवार्यता को हटाने के लिए एक पूरक संशोधन पर विचार करना चाहिए ताकि 2029 में ही इसका लाभ मिले।
- अस्थायी विस्तार: परिसीमन होने तक लोकसभा में कुल सीटों की संख्या बढ़ाकर अतिरिक्त महिला सीटें सृजित की जा सकती हैं।
- क्षमता निर्माण: निर्वाचित होने वाली महिलाओं के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए ताकि वे स्वतंत्र निर्णय ले सकें।
- दलों के भीतर कोटा: राजनीतिक दलों को स्वेच्छा से टिकट वितरण में 33% भागीदारी सुनिश्चित करनी चाहिए।
निष्कर्ष
महिला आरक्षण अधिनियम भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता का प्रतीक है। हालाँकि, इसकी सफलता केवल कानून पारित होने में नहीं, बल्कि इसके वास्तविक धरातल पर उतरने में निहित है। यदि इस 'ऐतिहासिक न्याय' को प्रक्रियागत बाधाओं के कारण एक दशक और टाला जाता है, तो यह देश की आधी आबादी के साथ किया गया एक अधूरा वादा ही कहलाएगा। समय की मांग है कि राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाते हुए इसे अविलंब प्रभावी बनाया जाए।
सामान्य अध्ययन पेपर – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध
संदर्भ
इतिहास में शिक्षा को हमेशा समाज की प्रगति का आधार माना गया है। 20वीं सदी तक शिक्षा का मुख्य लक्ष्य 'साक्षरता' और 'स्कूलों तक पहुंच' सुनिश्चित करना था। हालाँकि, 21वीं सदी के तीसरे दशक, विशेषकर 2026 तक आते-आते, वैश्विक विमर्श पूरी तरह बदल गया है। अब चुनौती बच्चों को केवल स्कूल भेजने की नहीं, बल्कि उन्हें भविष्य की अर्थव्यवस्था के अनुरूप 'सक्षम' बनाने की है। 2026 का यह समय 'सीखने के संकट' को दूर करने और तकनीक के मानवीयकरण का संधिकाल है।
यूनिवर्सल एजुकेशन क्या है?
यूनिवर्सल एजुकेशन का अर्थ केवल 'सार्वभौमिक नामांकन' नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी समावेशी व्यवस्था है जहाँ जाति, लिंग, क्षेत्र या आर्थिक स्थिति की परवाह किए बिना प्रत्येक व्यक्ति को समान गुणवत्ता वाली शिक्षा प्राप्त हो। इसका उद्देश्य एक ऐसा वातावरण तैयार करना है जहाँ 'सीखने के अवसर' सभी के लिए सुलभ, वहन योग्य और प्रासंगिक हों।
चर्चा में क्यों?
यूनेस्को (UNESCO) ने 24 जनवरी 2026 को 'अंतरराष्ट्रीय शिक्षा दिवस' के अवसर पर दुनिया का ध्यान एक गंभीर तथ्य की ओर आकर्षित किया है।
- थीम: 2026 की थीम "शिक्षा के सह-निर्माण में युवाओं की शक्ति" रखी गई है।
- प्रमुख मुद्दा: यूनेस्को की रिपोर्ट के अनुसार, नामांकन बढ़ने के बावजूद दुनिया भर में लगभग 25 करोड़ बच्चे अभी भी औपचारिक शिक्षा से वंचित हैं। 2026 में चर्चा का मुख्य केंद्र 'स्कूलिंग विदाउट लर्निंग' (बिना सीख वाली स्कूली शिक्षा) बना हुआ है।
यह महत्वपूर्ण क्यों है?
शिक्षा वैश्विक स्थिरता की कुंजी है। यह न केवल गरीबी उन्मूलन और आर्थिक विकास के लिए आवश्यक है, बल्कि जलवायु परिवर्तन, स्वास्थ्य संकट और सामाजिक असमानता जैसे वैश्विक खतरों से लड़ने का सबसे प्रभावी हथियार है। 2026 की जटिल दुनिया में, एक शिक्षित और तकनीकी रूप से साक्षर पीढ़ी ही लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा कर सकती है।
सतत विकास लक्ष्य-4 और वैश्विक प्रगति समीक्षा
संयुक्त राष्ट्र की 2026 की प्रगति समीक्षा दर्शाती है कि 2030 तक सभी के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करने का लक्ष्य वर्तमान में संकट में है।
- दक्षता में गिरावट: रिपोर्ट के अनुसार, निम्न और मध्यम आय वाले देशों में बुनियादी साक्षरता और गणितीय दक्षता के स्तर में चिंताजनक गिरावट आई है।
- चुनौती: संघर्ष-ग्रस्त क्षेत्रों और शरणार्थी शिविरों में रहने वाले बच्चों के लिए शिक्षा अभी भी एक विलासिता बनी हुई है।
डिजिटल समानता: 2026 का मूल मंत्र
2026 में 'डिजिटल पहुंच' को एक मौलिक अधिकार के रूप में देखा जा रहा है।
- सार्थक पहुंच:अब केवल कंप्यूटर देना पर्याप्त नहीं है; सार्थक पहुंच का अर्थ है उच्च गति इंटरनेट, स्थानीय भाषा में डिजिटल सामग्री और शिक्षकों का डिजिटल प्रशिक्षण।
- डिजिटल न्याय: तकनीक तक सबकी समान पहुंच सुनिश्चित करना ही डिजिटल न्याय है, ताकि तकनीक अमीरों और गरीबों के बीच की खाई को और न बढ़ा दे।
भारत में यूनिवर्सल एजुकेशन: NEP 2020 का 'आउटकम फेज'
भारत ने 2026 में 'राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020' के कार्यान्वयन के सबसे महत्वपूर्ण चरण में प्रवेश किया है।
- FLN मिशन: भारत का ध्यान अब 'निपुण भारत' (NIPUN Bharat) के माध्यम से बुनियादी साक्षरता सुनिश्चित करने पर है।
- मूल्यांकन में बदलाव: रटने की प्रवृत्ति को खत्म कर अब 'योग्यता-आधारित मूल्यांकन' को अपनाया जा रहा है।
- डिजिटल बुनियादी ढांचा: 'पीएम ई-विद्या' और 'दीक्षा 2.0' के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों तक शिक्षा पहुँचाई जा रही है।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI):
2026 शिक्षा में AI के व्यापक एकीकरण का वर्ष है।
- वरदान: AI के माध्यम से 'पर्सनलाइज्ड लर्निंग' (व्यक्तिगत शिक्षण) संभव हुआ है, जिससे हर छात्र अपनी गति से सीख सकता है।
- चुनौती: डेटा गोपनीयता, एल्गोरिथम का पक्षपात और शिक्षकों की भूमिका का सीमित होना प्रमुख चिंताएँ हैं। बहस अब "AI बनाम शिक्षक" पर नहीं, बल्कि "शिक्षक के साथ AI" पर केंद्रित है।
शिक्षा वित्तपोषण की स्थिति
2026 में शिक्षा के लिए धन जुटाना एक बड़ी चुनौती है।
- बजटीय कमी: यूनेस्को की चेतावनी के अनुसार, कई देश अभी भी अपनी जीडीपी का आवश्यक 4% से 6% हिस्सा शिक्षा पर खर्च नहीं कर रहे हैं।
- नया मॉडल: भारत और अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं में सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) और 'इम्पैक्ट बॉन्ड्स' के माध्यम से नवाचार के लिए धन जुटाया जा रहा है।
2026 का समग्र निष्कर्ष: तीन आधार स्तंभ
यूनिवर्सल एजुकेशन अब एक बहुआयामी अवधारणा है, जो इन तीन स्तंभों पर आधारित है:
- सीखने के परिणाम केवल उपस्थिति नहीं, बल्कि छात्र की वास्तविक दक्षता और कौशल।
- युवा सहभागिता:छात्रों और युवाओं को केवल 'उपभोक्ता' नहीं, बल्कि नीति-निर्माण में 'भागीदार' बनाना।
- डिजिटल न्याय: तकनीक का लोकतंत्रीकरण ताकि वह अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे।
भारतीय संविधान में शिक्षा और न्याय संबंधी मुख्य प्रावधान |
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विश्लेषण
गहन विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि 2026 की शिक्षा प्रणाली एक संक्रमण काल से गुजर रही है। जहाँ एक ओर तकनीक (AI, VR) शिक्षा को रोमांचक बना रही है, वहीं दूसरी ओर बुनियादी सुविधाओं का अभाव और 'लर्निंग लॉस' (सीखने की हानि) अभी भी एक कड़वी सच्चाई है। सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि हम तकनीक का उपयोग 'डिजिटल डिवाइड' को भरने के लिए करते हैं या इसे और गहरा होने देते हैं।
आगे की राह
- हाइब्रिड मॉडल: पारंपरिक कक्षा शिक्षण और डिजिटल लर्निंग का सही संतुलन।
- शिक्षक प्रशिक्षण: शिक्षकों को 'ज्ञान देने वाले' के बजाय 'सीखने के सुविधादाता' के रूप में प्रशिक्षित करना।
- वैश्विक सहयोग: विकसित देशों को तकनीक और संसाधनों के हस्तांतरण के माध्यम से विकासशील देशों की मदद करनी चाहिए।
निष्कर्ष
2026 का यूनिवर्सल एजुकेशन नैरेटिव एक जागृति का आह्वान है। यह समय केवल स्कूल के निर्माण का नहीं, बल्कि 'सीखने के केंद्रों' के निर्माण का है। जब तक शिक्षा में 'डिजिटल न्याय' और 'सीखने की गुणवत्ता' सुनिश्चित नहीं होती, तब तक विकास का पहिया अधूरा रहेगा। भारत जैसे देशों के लिए, अपनी युवा आबादी का लाभ उठाने का यही एकमात्र मार्ग है—एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था जो समावेशी, तकनीकी रूप से सक्षम और मानवीय मूल्यों से ओत-प्रोत हो।
सामान्य अध्ययन पेपर – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध
सामान्य अध्ययन पेपर – IV नीतिशास्त्र, सत्यनिष्ठा और अभिरुचि
भूमिका
जनवरी 2026 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा राजस्थान उच्च न्यायालय के उस आदेश पर स्थगन लगाना, जिसमें राजमार्गों से 500 मीटर के भीतर 1,102 शराब दुकानों को हटाने का निर्देश दिया गया था, भारत में 'लोक सुरक्षा' बनाम 'राज्य के आर्थिक यथार्थवाद' के पुराने द्वंद्व को पुनः केंद्र में ले आया है। यह मामला न केवल न्यायिक सक्रियता का उदाहरण है, बल्कि कार्यपालिका की व्यावहारिक सीमाओं और नीतिगत जटिलताओं को भी रेखांकित करता है।
ऐतिहासिक एवं विधिक परिप्रेक्ष्य
भारत में शराब के विनियमन को लेकर संवैधानिक और न्यायिक ढांचा सदैव 'लोक कल्याण' की ओर झुका रहा है:
- संवैधानिक अधिदेश (अनुच्छेद 47): राज्य के नीति निदेशक तत्वों के अंतर्गत, राज्य का यह कर्तव्य है कि वह लोक स्वास्थ्य के सुधार हेतु मादक पेयों और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक नशीले पदार्थों के सेवन पर प्रतिषेध लगाने का प्रयास करे।
- न्यायिक मिसाल (द स्टेट ऑफ तमिलनाडु बनाम के. बालू , 2016): सर्वोच्च न्यायालय ने 'ड्रंक ड्राइविंग' से होने वाली मृत्यु दर को कम करने हेतु राजमार्गों के किनारे 500 मीटर तक शराब की बिक्री पर प्रतिबंध लगाया था। हालांकि, 2017 के स्पष्टीकरण में नगर पालिकाओं को इससे छूट प्रदान की गई, जो वर्तमान विवाद का मुख्य केंद्र है।
- व्यापार का अधिकार: न्यायालय ने कई बार स्पष्ट किया है कि शराब का व्यापार करना कोई मौलिक अधिकार नहीं है बल्कि यह राज्य द्वारा प्रदत्त एक विशेषाधिकार है।
बहुआयामी सामाजिक-आर्थिक विश्लेषण
- सामाजिक एवं नैतिक आयाम
- घरेलू हिंसा और महिला सुरक्षा: NFHS-5 के आंकड़े पुष्टि करते हैं कि मद्यपान का सीधा संबंध घरेलू हिंसा और लैंगिक अपराधों से है। यह परिवारों की आर्थिक सुरक्षा को नष्ट कर बच्चों के पोषण और शिक्षा को बाधित करता है।
- नैतिक द्वंद्व: एक 'लोक कल्याणकारी राज्य' के लिए यह नैतिक प्रश्न विचारणीय है कि क्या उसे अपने नागरिकों के व्यसन से राजस्व अर्जित करना चाहिए। गांधीवादी दर्शन पूर्ण निषेध का समर्थन करता है, जबकि आधुनिक उदारवादी दृष्टिकोण 'व्यक्तिगत स्वतंत्रता' (अनुच्छेद 21) और 'जिम्मेदार उपभोग' पर बल देता है।
- आर्थिक यथार्थवाद और राजस्व
- राजस्व की अपरिहार्यता: शराब GST के दायरे से बाहर है, जिससे यह राज्यों के लिए 'स्टेट एक्साइज ड्यूटी' के माध्यम से आय का सबसे बड़ा स्रोत (15-25%) बनी हुई है।
- व्यावहारिक बाधाएँ: राजस्थान जैसे राज्यों में जहाँ शहरी नियोजन राजमार्गों के समानांतर है, वहां 500 मीटर का प्रतिबंध पूरे व्यावसायिक क्षेत्रों को 'ड्राई ज़ोन' में बदल सकता है, जिससे पर्यटन और रोजगार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
अपराध विज्ञान और सुरक्षा संबंधी तथ्य
- NCRB एवं सड़क सुरक्षा: भारत में सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों में 'ड्रंक ड्राइविंग' का अनुपात सांख्यिकीय रूप से कम (2-3%) दिख सकता है, किंतु इन दुर्घटनाओं की घातकता दर अन्य कारणों की तुलना में 40% अधिक होती है।
- प्रवर्तन की विफलता (भारतीय जुगाड़): प्रत्यक्ष विज्ञापनों पर प्रतिबंध के बावजूद 'प्रतीकात्मक संकेतों' (जैसे तीर के निशान) और 'शैडो एडवरटाइजिंग' (सोडा, पानी के नाम पर ब्रांडिंग) के माध्यम से नियमों की अवहेलना की जाती है।
शराबबंदी वाले राज्यों की समीक्षा:
बिहार, गुजरात और नगालैंड जैसे राज्यों के अनुभव मिश्रित रहे हैं:
- सफलता: ग्रामीण आर्थिक सुदृढ़ीकरण और सामाजिक चेतना में वृद्धि।
- विफलता: 'भूमिगत अर्थव्यवस्था' का उदय, जहरीली शराब से मृत्यु, सीमावर्ती राज्यों से तस्करी और प्रशासनिक भ्रष्टाचार में वृद्धि।
आगे की राह:
न्यायपालिका और कार्यपालिका को एक 'मध्यम मार्ग' अपनाने की आवश्यकता है:
- राजस्व विविधीकरण: राज्यों को अपनी वित्तीय निर्भरता शराब से हटाकर सेवा क्षेत्र और अन्य कर स्रोतों पर बढ़ानी चाहिए।
- तकनीकी हस्तक्षेप: राजमार्गों पर 'अल्कोहल इंटरलॉक' युक्त वाहनों को प्रोत्साहन और डिजिटल निगरानी।
- व्यवहार परिवर्तन: शराबबंदी को केवल कानून के बजाय एक सामाजिक आंदोलन के रूप में विकसित करना, जिसमें नशामुक्ति केंद्रों की भूमिका प्रमुख हो।
- न्यायिक संतुलन: राजस्थान मामले की तरह, अदालतों को व्यापक आदेश जारी करने से पूर्व सभी हितधारकों की व्यावहारिक समस्याओं को सुनना चाहिए।
निष्कर्ष
शराब का मुद्दा अर्थशास्त्र, नैतिकता और सार्वजनिक स्वास्थ्य के चौराहे पर स्थित है। राजस्थान का वर्तमान विधिक प्रकरण यह स्पष्ट करता है कि 'शून्य दुर्घटना' का लक्ष्य केवल दुकानों को विस्थापित करने से नहीं, बल्कि सख्त प्रवर्तन, जिम्मेदार उपभोग और राज्य की आर्थिक नीतियों के पुनर्गठन से ही प्राप्त किया जा सकता है। न्यायपालिका का आदर्शवाद और कार्यपालिका का यथार्थवाद जब एक दिशा में कार्य करेंगे, तभी अनुच्छेद 47 के वास्तविक लक्ष्यों की प्राप्ति संभव होगी।