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सामान्य अध्ययन पेपर  – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध

सामान्य अध्ययन पेपर – III  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन

संदर्भ

भारत में श्रम बाजार का ऐतिहासिक विकास 'दोहरी अर्थव्यवस्था' के रूप में हुआ है। एक ओर संगठित क्षेत्र है, वहीं दूसरी ओर एक विशाल अनौपचारिक क्षेत्र। पिछले कुछ दशकों में भारतीय श्रम बाजार मेंश्रम का अनुबंधीकरणकी प्रवृत्ति बढ़ी है।

  • विवाद का केंद्र: नियोक्ता लागत बचाने के लिए श्रमिकों को 'नियमित कर्मचारी' के बजाय 'अनुबंध' या 'स्वयंसेवक' के रूप में नियुक्त करते हैं।
  • आशा मॉडल: आशा कार्यकर्ता इस प्रणाली का सबसे अनूठा और विवादास्पद उदाहरण हैं। जहाँ वे सरकारी स्वास्थ्य लक्ष्यों को प्राप्त करने का प्राथमिक साधन हैं, वहीं कानूनी रूप से उन्हें 'स्वयंसेवकमानकर उन्हें वैधानिक न्यूनतम मजदूरी और पेंशन जैसे अधिकारों से वंचित रखा गया है।

आशा कार्यकर्ता:

ASHA का पूरा नाम है “Accredited Social Health Activist” इसे भारत सरकार द्वारा 2005 में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) के अंतर्गत गाँव-स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं को पहुंचाने के लिए लागू किया गया था। ये मुख्यतः ग्रामीण और शहरी स्वास्थ्य कार्यों, टीकाकरण, मातृ-शिशु स्वास्थ्य, जागरूकता और महामारी नियंत्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। लेकिन आधिकारिक रूप से इन्हेंस्वयंसेवकमाना गया है, कि नियमित सरकारी कर्मचारीइसका श्रमिक अधिकारों, वेतन और सामाजिक सुरक्षा पर बड़ा प्रभाव होता है।

  • योग्यता: गाँव की ही 25-45 वर्ष की विवाहित/विधवा महिला, जो कम से कम 10वीं पास हो।
  • भूमिका: स्वास्थ्य प्रणाली और समुदाय के बीच एक सेतु।
  • दायित्व: संस्थागत प्रसव, टीकाकरण, परिवार नियोजन, और ग्रामीण स्वच्छता को बढ़ावा देना।
  • भूमिका का विस्तार: 2005 में शुरुआत के समय इनका कार्य केवल रेफरल तक सीमित था, लेकिन आज ये प्रसव पूर्व देखभाल (ANC), टीकाकरण, गैर-संचारी रोगों (NCDs) की स्क्रीनिंग और डिजिटल हेल्थ रिकॉर्ड्स (ABHA) के प्रबंधन तक फैली हुई हैं।
  • लैंगिक आयाम: 10 लाख से अधिक की यह पूरी शक्ति महिलाओं की है। यह भारत कीकेयर इकोनॉमीका एक ऐसा हिस्सा है जिसका आर्थिक मूल्यांकन अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है।

चर्चा में क्यों

वर्तमान में (जनवरी 2026) भारत के विभिन्न राज्यों में हो रहे उग्र प्रदर्शनों के पीछे गहरे संरचनात्मक कारण हैं:

  • नीतिगत वादाखिलाफी: जुलाई 2025 में केंद्र सरकार द्वारा घोषित मानदेय वृद्धि का क्रियान्वयन होना विश्वास की कमी पैदा कर रहा है।
  • बजट 2026 की उच्च अपेक्षाएं: मुद्रास्फीति के कारण वर्तमान मानदेय में जीवन यापन असंभव हो गया है, जिससे कार्यकर्ता ₹15,000 से ₹28,000 की मांग पर अड़ी हैं।
  • प्रतीकात्मक विरोध: उत्तर प्रदेश में 'खून से पत्र' लिखना और कोलकाता में 'बर्बर' पुलिस कार्रवाई यह दर्शाती है कि यह मुद्दा अब केवल आर्थिक नहीं, बल्कि 'सम्मान और गरिमा' का बन चुका है।

राज्यवार असमानता:

राज्य

भुगतान मॉडल

वर्तमान स्थिति का विश्लेषण

प्रगतिशील (केरल, महाराष्ट्र)

उच्च मानदेय + राज्य बोनस

यहाँ मांग केवल वेतन की नहीं, बल्कि सेवानिवृत्ति लाभों की है।

औसत (कर्नाटक, हरियाणा)

₹5,000 - ₹8,000

भुगतान में देरी और केंद्र-राज्य फंड शेयरिंग विवाद मुख्य समस्या है।

निम्न/शून्य (बिहार, यूपी, पूर्वोत्तर)

केवल प्रोत्साहन आधारित

यहाँ न्यूनतम जीवन स्तर के लिए संघर्ष है। बदायूँ (UP) का विरोध इसी अभाव का परिणाम है।

भारत में अनौपचारिक श्रमिक: आर्थिक हिस्सेदारी एवं चुनौतियां

भारत के कार्यबल का लगभग 90% से अधिक हिस्सा अनौपचारिक है।

  • GDP में योगदान: अनौपचारिक क्षेत्र राष्ट्रीय आय में लगभग 50% का योगदान देता है, फिर भी इसे 'अदृश्य कार्यबल' माना जाता है।
  • असुरक्षा का चक्र: 82% से अधिक श्रमिकों के पास लिखित अनुबंध नहीं है। सामाजिक सुरक्षा (पेंशन, बीमा) का अभाव उन्हें बीमारी या वृद्धावस्था में गरीबी के दुष्चक्र में धकेल देता है।
  • लैंगिक असमानता: अनौपचारिक क्षेत्र में महिलाओं को समान कार्य के लिए पुरुषों की तुलना में 20-30% कम वेतन मिलता है।

संवैधानिक एवं विधिक ढांचा:

भारतीय संविधान में लेबर अधिकारों का प्रत्यक्ष उल्लेख नहीं है, किंतु संविधान के तहत आशा कार्यकर्ताओं और अनुबंध श्रमिकों के पक्ष में मजबूत आधार हैं:

  • अनुच्छेद 21: सम्मान के साथ जीवन जीने का अधिकार, जिसमें 'उचित पारिश्रमिक' भी शामिल है।
  • अनुच्छेद 39(d): 'समान कार्य के लिए समान वेतन' का सिद्धांत।
  • अनुच्छेद 42: राज्य का कर्तव्य है कि वह काम की मानवीय स्थितियां सुनिश्चित करे।
  • न्यायिक सक्रियता: सर्वोच्च न्यायालय ने कई फैसलों में कहा है कि 'न्यूनतम मजदूरी' देना 'बेगार' के समान है, जो अनुच्छेद 23 का उल्लंघन है।

इसके अतिरिक्त, अंतरराष्ट्रीय श्रम मानकों के अनुरूप भी भारत सरकार को कार्यकर्ताओं के लिए बेहतर प्रतिपूर्ति और सुरक्षा सुनिश्चित करनी होती है।

सरकारी पहल:

  • -श्रम  पोर्टल: असंगठित श्रमिकों के डेटा को औपचारिक रूप देने का पहला बड़ा प्रयास।
  • न्यू लेबर कोड्स (2025): ये कोड 'गिग  वर्कर्स ' और 'अनऑर्गनाइज़्ड वर्कर्सको सामाजिक सुरक्षा के दायरे में लाने का वादा करते हैं, लेकिन आशा कार्यकर्ताओं को 'श्रमिक' के रूप में स्पष्ट रूप से परिभाषित करने में अभी भी हिचकिचाहट है।
  • एनएचएम फिक्स्ड इन्सेन्टिव्स: केंद्र ने प्रोत्साहन राशि बढ़ाई है, लेकिन यह राज्यों के विवेकाधीन फंड पर निर्भर है।
  • कुछ राज्यों ने स्थिर मासिक मानदेय, भत्ते, मातृत्व लाभ, पेंशन जैसी सुविधाएँ प्रदान करने के लिए अधिसूचना जारी की है।

वैश्विक परिप्रेक्ष्य: अंतर्राष्ट्रीय श्रम मानक

  • ILO अभिसमय: अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन 'सभ्य कार्य' और 'सामाजिक सुरक्षा के न्यूनतम स्तर' की वकालत करता है।
  • वैश्विक उदाहरण: दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील जैसे देशों में सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को औपचारिक स्वास्थ्य प्रणाली में समाहित किया गया है और उन्हें न्यूनतम वेतन के साथ कानूनी सुरक्षा प्राप्त है।
  • विकसित देशों में अनियमित श्रमिकों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए कड़े कानून होते हैं, जिनमे न्यूनतम मजदूरी, सामाजिक सुरक्षा, हेल्थ इंश्योरेंस और पेंशन शामिल हैं।

  • यूरोप, ऑस्ट्रेलिया, जापान जैसे देशों में श्रमिक अधिकारों की सुरक्षा पर व्यापक कानूनी ढांचा है, जबकि भारत में यह धीरे-धीरे विकसित हो रहा है।

आशा कार्यकर्ताओं के महत्व की गहन समीक्षा

  • महामारी के 'अदृश्य योद्धा': COVID-19 के दौरान आशा कार्यकर्ताओं ने जोखिम भरे क्षेत्रों में 'फ्रंटलाइन' पर कार्य किया। WHO का 'ग्लोबल हेल्थ लीडर्स अवार्ड' उनके वैश्विक महत्व का प्रमाण है।
  • ग्रामीण स्वास्थ्य की जीवनरेखा: भारत की मातृ मृत्यु दर (MMR) में 70% से अधिक की गिरावट का श्रेय सीधे तौर पर इन कार्यकर्ताओं को जाता है।
  • आर्थिक प्रभाव: वे केवल स्वास्थ्य सुधारती हैं, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य पर होने वालेजेब से होने वाले खर्चको कम करके परिवारों को गरीबी से बचाती हैं।

आगे की राह

  • मान्यता और परिभाषा: 'स्वयंसेवक' शब्द को हटाकर उन्हें 'अर्ध-कुशल श्रमिक' या 'स्वास्थ्य सहायक' के रूप में परिभाषित किया जाए।
  • समान भुगतान ढांचा: 'एक राष्ट्र, एक मानदेय' की नीति लागू हो ताकि क्षेत्रीय असमानता खत्म हो।
  • सामाजिक सुरक्षा कवच: उन्हें अनिवार्य रूप से ESIC (स्वास्थ्य बीमा) और EPF (भविष्य निधि) के दायरे में लाया जाए।
  • करियर प्रोग्रेस: अनुभवी आशा कार्यकर्ताओं को ANM या नर्सिंग कोर्स के लिए आरक्षण और ब्रिज कोर्स की सुविधा दी जाए।

निष्कर्ष

आशा कार्यकर्ता भारत के "सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज" (UHC) के सपने की नींव हैं। अनुबंधवाद के नाम पर उनके श्रम का अवमूल्यन केवल संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ है, बल्कि यह भविष्य के स्वास्थ्य संकटों के प्रति हमारी संवेदनशीलता को भी बढ़ाता है। यदि भारत को 2047 तक 'विकसित भारत' बनना है, तो उसे अपने अनौपचारिक कार्यबल को 'मजबूत और सुरक्षित कार्यबल' में बदलना होगा।

सामान्य अध्ययन पेपर  – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध

संदर्भ:

वर्तमान वैश्विक व्यवस्था एक ऐतिहासिक 'संक्रमण काल' का अनुभव कर रही है। यूक्रेन और पश्चिम एशिया (गाजा) के संघर्षों ने जहाँ वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को झकझोर दिया है, वहीं अमेरिका की 'अमेरिका फर्स्ट' नीति और बढ़ते संरक्षणवाद ने व्यापारिक अनिश्चितता पैदा की है। इस परिदृश्य में, भारत ने अपनी 'रणनीतिक स्वायत्तता' को पुनर्भाषित करते हुए किसी एक गुट पर निर्भर रहने के बजाय अपने विकल्पों में विविधता लाने का विकल्प चुना है। 27 जनवरी 2026 को भारत-यूरोपीय संघ (EU) FTA का निष्कर्ष इसी दिशा में एक साहसिक और दूरगामी कदम है।

यूरोपीय संघ

यूरोपीय संघ (EU) 27 यूरोपीय देशों का एक अनूठा और शक्तिशाली राजनैतिक एवं आर्थिक मंच है। यह किसी एक देश की तरह काम नहीं करता, बल्कि एक 'संगठन' की तरह काम करता है जहां ये सभी देश मिलकर अपने साझा हितों के लिए फैसले लेते हैं।

इसकी मुख्य विशेषताएं

  • एक साझा बाजार : EU के भीतर लोग, सामान, सेवाएं और पैसा बिना किसी रोक-टोक या पासपोर्ट के एक देश से दूसरे देश जा सकते हैं। उदाहरण के लिए, जर्मनी का नागरिक फ्रांस में जाकर बिना किसी वीजा के काम कर सकता है।
  • साझा मुद्रा:EU के 27 में से 20 देश एक ही मुद्रा का इस्तेमाल करते हैं, जिसे 'यूरो' कहा जाता है। इन देशों के समूह को 'यूरोज़ोन' कहते हैं।

भारत-यूरोपीय संघ संबंध:

भारत और यूरोपीय संघ (तत्कालीन यूरोपीय आर्थिक समुदाय) के बीच औपचारिक संबंध 1960 के दशक में शुरू हुए।

  • 1994 का सहयोग समझौता: इसने संबंधों को व्यापार और आर्थिक सहयोग से आगे बढ़ाया।
  • 2004 रणनीतिक साझेदारी: भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल हुआ जिनके साथ EU की रणनीतिक साझेदारी है।
  • BTIA (2007-2013): व्यापक व्यापार और निवेश समझौते (BTIA) पर बातचीत 2007 में शुरू हुई थी, लेकिन कृषि, सेवाओं और डेटा सुरक्षा जैसे मुद्दों पर मतभेदों के कारण 2013 में यह रुक गई।
  • पुनरुद्धार (2022-वर्तमान): पिछले दो वर्षों में चीन की बढ़ती आक्रामकता और तकनीकी निर्भरता कम करने की आवश्यकता ने दोनों को फिर से करीब ला दिया है।

हालिया चर्चा:

  • 27 जनवरी 2026 को भारत और यूरोपीय संघ के बीच मुक्त व्यापार समझौते (FTA) के निष्कर्ष की घोषणा एक ऐतिहासिक मील का पत्थर है।
  • गणतंत्र दिवस पर यूरोपीय नेतृत्व की मौजूदगी ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारत अब यूरोपीय विदेश नीति के केंद्र में है।
  • प्रमुख समझौते: व्यापक रणनीतिक एजेंडा 2030: यह अगले दशक के लिए रक्षा, सुरक्षा और हरित ऊर्जा का रोडमैप है।
    • सेमीकंडक्टर और AI: चिप डिजाइन और 'ह्यूमन-सेंट्रिक एआई' के लिए यूरोपीय एआई कार्यालय और भारत के राष्ट्रीय एआई मिशन के बीच गठबंधन।

भारत और EU का एक-दूसरे के लिए महत्व

  • भारत के लिए EU:
  • आर्थिक: EU भारत का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है।
  • तकनीकी: नवाचार और हरित प्रौद्योगिकी (Green Tech) के लिए महत्वपूर्ण।
  • EU के लिए भारत:
  • सामरिक: हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता के लिए भारत एक अनिवार्य साथी है।
  • आर्थिक: चीन पर निर्भरता कम करने के लिए भारत सबसे बड़ा वैकल्पिक बाजार है।


ट्रेड एग्रीमेंट का महत्व एवं प्रभाव

  • निर्यात में वृद्धि: टेक्सटाइल, चमड़ा और रत्न-आभूषण जैसे श्रम-गहन क्षेत्रों को शून्य शुल्क पहुंच मिलेगी।
  • इनपुट लागत में कमी: यूरोपीय मशीनरी के सस्ते आयात से 'मेक इन इंडिया' को मजबूती मिलेगी।
  • रोजगार: MSME क्षेत्र में निर्यात बढ़ने से लाखों नए रोजगार सृजित होंगे।

अंतरराष्ट्रीय महत्व

  • यह समझौता वैश्विक स्तर पर बहुध्रुवीयता को सुदृढ़ करता है, जिससे यह संदेश जाता है कि भारत और यूरोप मिलकर अमेरिका और चीन के प्रभुत्व के बीच एक स्वतंत्र 'आर्थिक ध्रुव' बन सकते हैं।
  • अंतर्राष्ट्रीय रणनीतिकार इसे चीन पर निर्भरता कम करने वाली 'डी-रिस्किंग' नीति की एक बड़ी सफलता के रूप में देख रहे हैं, जो वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को अधिक लोकतांत्रिक और सुरक्षित बनाएगी।
  • साथ ही, यह समझौता भारत को अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के 'नियम बनाने वाले' देशों की श्रेणी में खड़ा करता है, जो भविष्य में जलवायु और डिजिटल मानकों (जैसे AI और Carbon Tax) पर विकासशील देशों का नेतृत्व कर सकेगा।

अमेरिका की प्रतिक्रिया और प्रभाव

विशेषज्ञों का मानना है कि इस समझौते के बाद अमेरिका पर भारत के साथ अपने स्वयं के व्यापारिक मुद्दों (जैसे GSP का दर्जा बहाल करना) को सुलझाने का मनोवैज्ञानिक दबाव बढ़ेगा। अमेरिका नहीं चाहेगा कि वह भारत जैसे विशाल बाजार में पीछे छूट जाए जबकि यूरोप अपनी पैठ बना रहा है।

  • सेमीकंडक्टर और AI क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा: अमेरिका ने 'iCET' (Initiative on Critical and Emerging Technology) के माध्यम से भारत के साथ रक्षा और तकनीक में गहरी साझेदारी की है। भारत-EU के बीच AI और सेमीकंडक्टर पर हुए समझौते को अमेरिका अपनी 'तकनीकी प्रधानता' के लिए एक छोटी चुनौती के रूप में देख सकता है, जिससे वह भारत को और अधिक उन्नत तकनीक देने के लिए प्रेरित हो सकता है।

समूहों के साथ समझौते: भारत की नई रणनीतिक सोच

भारत अब केवल एक देश से नहीं, बल्कि पूरे ब्लॉक (EFTA, EU, GCC) के साथ जुड़ रहा है।

  • हाल ही में भारत ने EFTA (नार्वे, स्विट्जरलैंड आदि) के साथ भी समझौता किया है।
  • यह रणनीति वियतनाम और दक्षिण कोरिया जैसे देशों ने भी अपनाई थी, जिससे उन्हें वैश्विक मूल्य श्रृंखला (GVC) में बड़ी भूमिका मिली। भारत अब इसी राह पर है।

आवश्यकता और उद्योगों पर प्रभाव

चीन से 'डिकपलिंग' के दौर में भारत को उच्च मानकों वाले बाजार की जरूरत थी।

  • भारतीय उद्योग: शुरुआत में यूरोपीय प्रतिस्पर्धा से घरेलू मशीनरी क्षेत्र को चुनौती मिल सकती है, लेकिन दीर्घकाल में यह दक्षता बढ़ाएगा।

विश्लेषण

यह समझौता केवल 'व्यापार' नहीं, बल्कि 'मूल्यों' का मिलन है।

  • यह समझौता चीन पर निर्भरता कम करने के लिए 'चीन प्लस वन' रणनीति को मजबूत करेगा और भारत को असेंबली हब के बजाय 'इनोवेशन हब' के रूप में स्थापित करेगा।
  • भू-राजनीतिक दृष्टि से, यह 'तीसरा ध्रुव' खड़ा कर भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को बल देता है।
  • तकनीकी मोर्चे पर, यह भारत के डेटा और यूरोप के अनुसंधान बुनियादी ढांचे को जोड़कर AI और सेमीकंडक्टर क्षेत्र में नई क्रांति लाएगा।
  • हालांकि, भारत के लिए 'ब्रसेल्स प्रभाव' (कठोर नियामक मानक) और CBAM (कार्बन टैक्स) जैसी चुनौतियां बनी रहेंगी, जिन्हें पार करना MSMEs के लिए आवश्यक होगा।
  • यह समझौता केवल व्यापार नहीं, बल्कि भविष्य की प्रौद्योगिकियों और साझा लोकतांत्रिक मूल्यों का एक रणनीतिक एकीकरण है।

आगे की राह

  • नियामक संरेखण: भारत को अपने मानकों को यूरोपीय मानकों के करीब लाना होगा।
  • लॉजिस्टिक्स: व्यापार का लाभ उठाने के लिए बुनियादी ढांचे (Ports, Roads) में सुधार की गति बढ़ानी होगी।
  • कौशल विकास: सेमीकंडक्टर और AI जैसे क्षेत्रों में कार्यबल को तैयार करना।

निष्कर्ष

भारत-यूरोपीय संघ FTA केवल आर्थिक लाभ का सौदा नहीं है, बल्कि यह बहुध्रुवीय विश्व की एक नई हकीकत है। यह भारत के 'विकसित भारत @2047' के लक्ष्य की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जो भारत को वैश्विक शासन और व्यापार की मेज पर एक निर्णायक शक्ति के रूप में स्थापित करता है।

सामान्य अध्ययन पेपर  – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध

संदर्भ

भारत में 'एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य' के लोकतांत्रिक सिद्धांत को बनाए रखने के लिए समय-समय पर चुनावी सीमाओं का पुनर्निर्धारण आवश्यक रहा है। स्वतंत्र भारत के इतिहास में 1976 तक यह प्रक्रिया नियमित रही। हालांकि, 1970 के दशक में महसूस किया गया कि केवल जनसंख्या आधारित सीटों का आवंटन उन राज्यों के लिए नुकसानदेह है जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में सफलता पाई है। इसके बाद, 42वें संविधान संशोधन (1976) द्वारा लोकसभा सीटों के आवंटन को वर्ष 2000 तक के लिए 'फ्रीज' कर दिया गया। बाद में 84वें संशोधन (2001) द्वारा इस रोक को 2026 तक बढ़ा दिया गया। वर्तमान में हम उसी निर्णायक मोड़ पर खड़े हैं जहाँ आधी सदी पुरानी व्यवस्था बदलने वाली है।

परिसीमन क्या है?

परिसीमन का शाब्दिक अर्थ है किसी देश या राज्य में विधायी निकाय वाले क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को तय करने की क्रिया।

  • उद्देश्य: जनसंख्या के समान प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करना ताकि निर्वाचन क्षेत्रों का भौगोलिक विभाजन निष्पक्ष रहे।
  • निकाय: यह कार्य एक उच्चाधिकार प्राप्त 'परिसीमन आयोग' द्वारा किया जाता है, जिसकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। इसके आदेशों को किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।

चर्चा में क्यों?

हालिया समाचारों के अनुसार, 2027 की जनगणना के परिणाम आने के बाद भारत में एक नया परिसीमन अभ्यास शुरू होगा।

  • 84वें संविधान संशोधन के अनुसार, 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना के आंकड़ों का उपयोग सीटों के पुनर्निर्धारण के लिए किया जाएगा।
  • सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के तहत नई संसद में लोकसभा की क्षमता 888 सीटों तक बढ़ाई गई है, जो इस बात का संकेत है कि भविष्य में सीटों की संख्या में भारी वृद्धि होने वाली है।

परिसीमन क्यों आवश्यक है?

  • जनसांख्यिकीय बदलाव: 1971 में भारत की जनसंख्या लगभग 54 करोड़ थी, जो अब 145 करोड़ पार कर चुकी है। वर्तमान सीटें पुराने आंकड़ों पर आधारित हैं, जो मतदाता प्रतिनिधित्व के साथ अन्याय है।
  • मतदान का समान मूल्य: उत्तर भारत के एक सांसद के पास वर्तमान में 25-30 लाख मतदाता हैं, जबकि दक्षिण के राज्यों में यह संख्या 15-18 लाख है। परिसीमन इस विसंगति को दूर करता है।

मुख्य चुनौतियां और 'उत्तर-दक्षिण' विवाद

यह परिसीमन का सबसे संवेदनशील पहलू है:

  • सफलता की सजा: दक्षिण भारतीय राज्यों (तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक) का तर्क है कि उन्होंने शिक्षा और स्वास्थ्य के माध्यम से जनसंख्या को सफलतापूर्वक नियंत्रित किया है। यदि केवल जनसंख्या को आधार बनाया गया, तो संसद में उनकी सीटें कम हो जाएंगी और राजनीतिक प्रभाव घट जाएगा।
  • उत्तरी राज्यों का वर्चस्व: उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में जनसंख्या वृद्धि अधिक रही है, जिससे परिसीमन के बाद लोकसभा में इनका दबदबा और बढ़ जाएगा।

सीटों के अनुमानित आंकड़े

विभिन्न शोध संस्थानों (जैसे विजन आईएएस और फोरम आईएएस) के विश्लेषण के अनुसार, यदि सीटें जनसंख्या अनुपात में बढ़ती हैं:

  • उत्तर प्रदेश: वर्तमान 80 से बढ़कर 140-150 तक पहुँच सकती हैं।
  • बिहार: 40 से बढ़कर लगभग 80 हो सकती हैं।
  • तमिलनाडु/केरल: इनकी सीटों में मामूली वृद्धि होगी, लेकिन कुल सदन में इनका 'शेयर प्रतिशत' गिर जाएगा।

संवैधानिक प्रावधान

  • अनुच्छेद 82: प्रत्येक जनगणना के बाद संसद एक परिसीमन अधिनियम पारित करती है।
  • अनुच्छेद 170: राज्यों के भीतर विधानसभा क्षेत्रों के विभाजन का आधार प्रदान करता है।
  • अनुच्छेद 81: लोकसभा की संरचना और सीटों के आवंटन के सिद्धांत तय करता है।

परिसीमन का इतिहास

भारत में अब तक चार बार परिसीमन आयोगों का गठन किया गया है:

  1. 1952: परिसीमन आयोग अधिनियम, 1952 के तहत।
  2. 1963: 1962 के अधिनियम के तहत।
  3. 1973: 1972 के अधिनियम के तहत (अंतिम बार सीटों का आवंटन यहीं हुआ)
  4. 2002: 2002 के अधिनियम के तहत (केवल सीमाओं का पुनर्निर्धारण हुआ, सीटों की संख्या नहीं बढ़ी)

गहन विश्लेषण

यह समझना जरूरी है कि परिसीमन केवल गणित नहीं है। यह सहकारी संघवाद की परीक्षा है। यदि दक्षिण के राज्यों को लगता है कि उनकी विकासवादी नीतियों के कारण उन्हें राजनीतिक रूप से हाशिए पर धकेला जा रहा है, तो यह देश की एकता और राष्ट्रीय नीतियों के क्रियान्वयन में अविश्वास पैदा कर सकता है।

आगे की राह

  • मिश्रित मानक: सीटों के आवंटन में केवल जनसंख्या नहीं, बल्कि विकास सूचकांक, साक्षरता और लिंगानुपात जैसे कारकों को भी महत्व दिया जाना चाहिए।
  • राज्यसभा का सशक्तिकरण: राज्यों के हितों के संरक्षण के लिए ऊपरी सदन की शक्तियों और वहां सीटों के समान वितरण (जैसे अमेरिका की सीनेट) पर विचार किया जा सकता है।
  • वित्तीय क्षतिपूर्ति: 16वें वित्त आयोग के माध्यम से दक्षिण के राज्यों को अधिक वित्तीय स्वायत्तता देकर राजनीतिक शक्ति की कमी को संतुलित किया जा सकता है।

निष्कर्ष

परिसीमन लोकतंत्र की एक अनिवार्य प्रक्रिया है, लेकिन भारत जैसे विविधतापूर्ण और विशाल देश में इसे केवल जनसंख्या के आंकड़ों तक सीमित नहीं रखा जा सकता। 2027 का परिसीमन भारत के लोकतांत्रिक 'सोशल कॉन्ट्रैक्ट' को नया रूप देगा। सरकार को सभी हितधारकों के साथ व्यापक परामर्श कर ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए जो 'प्रतिनिधित्व' और 'विकास' के बीच संतुलन बनाए रखे।

सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- I भारतीय विरासत और संस्कृति, विश्व का इतिहास एवं भूगोल और समाज

सामान्य अध्ययन पेपर – III  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन

संदर्भ

हिमालयी क्षेत्र में सर्दियों के दौरान जंगल की आग की घटनाएं ऐतिहासिक रूप से कम रही हैं, क्योंकि जनवरी-फरवरी में भारी बर्फबारी और नमी ईंधन (सूखी पत्तियों) को जलने से रोकती थी। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में जलवायु परिवर्तन और 'पश्चिमी विक्षोभ' की अनियमितता के कारण सर्दियों में शुष्क दौर बढ़ा है। वर्तमान में, सिक्किम के पांगोलाखा क्षेत्र में लगी आग इसी बदलते जलवायु पैटर्न का एक खतरनाक संकेत है।

पांगोलाखा वन्यजीव अभयारण्य

  • अवस्थिति: यह पूर्वी सिक्किम में स्थित है।
  • क्षेत्रफल: लगभग 124 वर्ग किलोमीटर।
  • विशेषता: यह सिक्किम, पश्चिम बंगाल और भूटान के ट्राई-जंक्शन पर स्थित है। यह दक्षिण में पश्चिम बंगाल के नेओरा वैली नेशनल पार्क से जुड़ा हुआ है।
  • ऊंचाई: यह समुद्र तल से 1,760 मीटर से 4,390 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है।

चर्चा में क्यों?

20 जनवरी 2026 को पांगोलाखा अभयारण्य के कुपूप क्षेत्र में 13,000 फीट की ऊंचाई पर भीषण आग लग गई।

  • कारण: सर्दियों में बर्फबारी की भारी कमी और लंबे समय तक शुष्क मौसम रहने के कारण झाड़ियाँ और घास "टिंडरबॉक्स" (अत्यंत ज्वलनशील) बन गई थीं।
  • स्थिति: आग ने लगभग 12 हेक्टेयर वन भूमि को प्रभावित किया है।

राहत और बचाव कार्य

  • संयुक्त प्रयास: सिक्किम वन विभाग, भारतीय सेना, अग्निशमन विभाग और स्थानीय स्वयंसेवकों ने मिलकर आग बुझाने का काम किया।
  • चुनौतियां: खड़ी ढलान, 30-40 किमी/घंटा की रफ्तार से चलने वाली हवाएं और ऑक्सीजन की कमी ने बचाव कार्य को मुश्किल बना दिया।
  • सुरक्षा: राहत की बात यह है कि किसी जनहानि या सेना के बुनियादी ढांचे को नुकसान नहीं पहुंचा।

अभयारण्य का महत्व

  • जैव-विविधता: यह लाल पांडा (सिक्किम का राजकीय पशु), स्नो लेपर्ड, हिमालयन मस्क डियर और रॉयल बंगाल टाइगर का प्राकृतिक आवास है। हाल ही में यहाँ 3,640 मीटर की ऊंचाई पर बाघ देखा गया था, जो भारत में सबसे अधिक ऊंचाई पर बाघ की रिकॉर्डिंग है।
  • जल स्रोत: रंगपो और जलढाका जैसी महत्वपूर्ण नदियाँ इसी क्षेत्र के आसपास के जलक्षेत्रों से निकलती हैं।
  • पक्षी विविधता: यह एक 'महत्वपूर्ण पक्षी क्षेत्र' (IBA) है, जहाँ ब्लड फीजेंट और हिमालयन मोनल पाए जाते हैं।

प्रभाव

  • पारिस्थितिक और पर्यावरणीय प्रभाव
  • ब्लैक कार्बन और ग्लेशियर: आग से निकलने वाला धुआं और राख (ब्लैक कार्बन) पास के ग्लेशियरों पर जमा हो जाते हैं। यह सूरज की रोशनी को सोख लेते हैं, जिससे बर्फ तेजी से पिघलने लगती है। यह सिक्किम की जल सुरक्षा के लिए खतरा है।
  • जैव-विविधता की हानि: पांगोलाखा लाल पांडा और स्नो लेपर्ड का घर है। आग से छोटे जीव, रेंगने वाले प्राणी और पक्षियों के घोंसले पूरी तरह नष्ट हो जाते हैं।
  • मिट्टी का कटाव: आग के कारण वनस्पतियां जल गई हैं, जिससे मिट्टी की पकड़ कमजोर हो जाती है। मानसून आने पर इस क्षेत्र में भूस्खलन का खतरा कई गुना बढ़ जाएगा।
  • वन्यजीव गलियारे पर प्रभाव
  • बाघों का प्रवास: पांगोलाखा भारत (सिक्किम-बंगाल) और भूटान के बीच बाघों के लिए एक महत्वपूर्ण 'ट्रांजिट कॉरिडोर' है। आग के कारण यह रास्ता बाधित होता है, जिससे बाघ और अन्य बड़े जानवर आबादी वाले क्षेत्रों की ओर रुख कर सकते हैं, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ सकता है।
  • आर्थिक प्रभाव
  • पर्यटन: सिक्किम की अर्थव्यवस्था पर्यटन पर टिकी है। ऐसी आपदाएं कुपूप, बाबा मंदिर और नाथुला जैसे पर्यटन क्षेत्रों में पर्यटकों के प्रवाह को कम कर देती हैं।
  • कृषि: आग से निकली राख और धुएं का असर आसपास की बड़ी इलायची की खेती पर पड़ सकता है, जो सिक्किम का मुख्य नकदी स्रोत है।
  • जलवायु परिवर्तन का फीडबैक लूप
  • आग के कारण बड़ी मात्रा में CO2 वायुमंडल में मुक्त होती है, जो स्थानीय स्तर पर 'वार्मिंग' को बढ़ाती है। यह एक दुष्चक्र बनाता है जहाँ बढ़ती गर्मी से भविष्य में और अधिक आग लगने की संभावना बढ़ जाती है।

सिक्किम के अन्य वन्यजीव अभयारण्य

  1. खांगचेंदजोंगा नेशनल पार्क: (UNESCO मिश्रित विरासत स्थल)
  2. बरसे रोडोडेंड्रोन अभयारण्य: (पश्चिम सिक्किम)
  3. फामबोंग ल्हो अभयारण्य: (गंगटोक के पास)
  4. माएनम अभयारण्य: (दक्षिण सिक्किम)
  5. शिंगबा रोडोडेंड्रोन अभयारण्य: (उत्तर सिक्किम)
  6. क्यॉन्गनोसला अल्पाइन अभयारण्य: (त्सोमगो झील के पास)
  7. किटम पक्षी अभयारण्य: (सिक्किम का एकमात्र पक्षी अभयारण्य)

भारत-चीन सीमा पर प्रासंगिकता

यह अभयारण्य रणनीतिक रूप से अत्यंत संवेदनशील डोकलाम और नाथुला के करीब है।

  • भारत का दृष्टिकोण: सीमावर्ती सुरक्षा के लिए यहाँ सेना की भारी मौजूदगी है। जंगल की आग सेना के संचार नेटवर्क और निगरानी पोस्टों के लिए खतरा पैदा करती है।
  • लैंडमाइन्स का मुद्दा: इस क्षेत्र में सुरक्षा कारणों से बिछाई गई बारूदी सुरंगें आग बुझाने के कार्यों में सबसे बड़ी बाधा बनती हैं, क्योंकि आग की गर्मी से इनके फटने का डर रहता है।

विश्लेषण

  • पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रभाव: ऊंचे हिमालयी क्षेत्रों में आग लगने से 'ब्लैक कार्बन' जमा होता है, जो ग्लेशियरों के पिघलने की दर को बढ़ा देता है।
  • पारगमन गलियारा: पांगोलाखा भारत और भूटान के बीच वन्यजीवों (विशेषकर बाघों) के लिए एक महत्वपूर्ण गलियारा है। ऐसी आग वन्यजीवों के प्रवास को बाधित करती है।
  • अनुकूलन की कमी: उच्च ऊंचाई वाले क्षेत्रों के लिए हमारे पास विशिष्ट 'अग्निशमन प्रोटोकॉल' की कमी है।

आगे की राह

  • तकनीक का उपयोग: उपग्रह आधारित 'रियल-टाइम फायर अलर्ट' (MODIS/VIIRS) का अधिकतम उपयोग।
  • सेना-वन विभाग समन्वय: सीमावर्ती क्षेत्रों के लिए एक विशेष 'आपदा रिस्पॉन्स टीम' का गठन।
  • ईंधन प्रबंधन: सर्दियों से पहले सूखी पत्तियों और ज्वलनशील पदार्थों का नियंत्रित निपटान।

निष्कर्ष

पांगोलाखा वन्यजीव अभयारण्य की आग केवल एक पर्यावरणीय आपदा नहीं है, बल्कि यह हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के बदलते स्वास्थ्य का गंभीर लक्षण है। रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण और जैव-विविधता से भरपूर इस क्षेत्र की सुरक्षा के लिए सीमा सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण के बीच एक संतुलित तालमेल अनिवार्य है।

सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- I भारतीय विरासत और संस्कृति, विश्व का इतिहास एवं भूगोल और समाज

सामान्य अध्ययन पेपर – III  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन


संदर्भ

भारतीय उपमहाद्वीप में सर्दियों का मौसम पारंपरिक रूप से शुष्क और ठंडा रहता है, लेकिन उत्तर-पश्चिम भारत (जैसे दिल्ली, पंजाब, हरियाणा) में जनवरी और फरवरी के महीनों में होने वाली वर्षा हमेशा से चर्चा का विषय रही है। पिछले कुछ वर्षों में, जलवायु परिवर्तन के कारण इन विक्षोभों के पैटर्न में अनिश्चितता देखी गई हैकभी लंबे समय तक शुष्क दौर रहता है, तो कभी अचानक तीव्र वर्षा। वर्तमान में, जनवरी 2026 में दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में हुई वर्षा ने एक लंबे शुष्क अंतराल को समाप्त किया है, जो इस मौसमी घटना की निरंतरता और परिवर्तनशीलता को दर्शाता है।

पश्चिमी विक्षोभ क्या है?

पश्चिमी विक्षोभ एक अतिरिक्त-उष्णकटिबंधीय चक्रवात है, जो भूमध्य सागर में उत्पन्न होता है।

  • उत्पत्ति और यात्रा: यह भूमध्य सागर, कैस्पियन सागर और काला सागर से नमी ग्रहण करता है और 'वेस्टरली जेट स्ट्रीम' के साथ पूर्व की ओर यात्रा करते हुए ईरान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान को पार कर भारत पहुँचता है।
  • नामकरण: इसे 'पश्चिमी' इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह पश्चिम से आता है, और 'विक्षोभ' इसलिए क्योंकि यह निम्न वायुदाब का क्षेत्र होता है जो सामान्य वायुमंडलीय स्थिति को विचलित कर देता है।

चर्चा में क्यों?

23 जनवरी 2026 को एक तीव्र पश्चिमी विक्षोभ के प्रभाव से दिल्ली, पंजाब और हरियाणा में गरज के साथ बारिश और तेज हवाएं चलीं।

  • तात्कालिक कारण: हिमालयी क्षेत्र के ऊपर एक सक्रिय निम्न दबाव का क्षेत्र बना, जिसने मैदानी इलाकों में नमी को बारिश में बदल दिया।
  • तापमान में बदलाव: इस घटना के कारण न्यूनतम तापमान सामान्य से ऊपर चला गया है, क्योंकि बादलों की चादर धरती की गर्मी को वापस अंतरिक्ष में जाने से रोकती है (ग्रीनहाउस  इफ़ेक्ट की तरह)

भारत में पश्चिमी विक्षोभ का प्रभाव

  • शीतकालीन वर्षा: यह उत्तर-पश्चिम भारत में सर्दियों की बारिश का प्राथमिक स्रोत है।
  • बर्फबारी: हिमालयी राज्यों (J&K, हिमाचल, उत्तराखंड) में भारी बर्फबारी के लिए यही जिम्मेदार है, जो ग्लेशियरों के पुनर्भरण के लिए आवश्यक है।
  • तापमान में उतार-चढ़ाव: इसके आने से पहले रात का तापमान बढ़ता है और इसके जाने के बाद 'शीत लहर' की स्थिति बनती है।

प्रभावित क्षेत्र और महत्व

  • कृषि (रबी की फसलें): यह वर्षा गेहूँ, सरसों और चने जैसी रबी फसलों के लिए 'अमृत' के समान है। स्थानीय भाषा में इसे 'मावट' भी कहा जाता है।
    • यह सिंचाई की लागत कम करती है और फसल की गुणवत्ता में सुधार करती है।
  • प्रदूषण नियंत्रण: दिल्ली-NCR में सर्दियों के दौरान 'स्मॉग' और 'पार्टिकुलेट मैटर' (PM2.5/PM10) एक बड़ी समस्या होते हैं।
    • बारिश इन प्रदूषकों को हवा से नीचे बैठा देती है और तेज हवाएं हवा को साफ करने में मदद करती हैं, जिससे AQI में सुधार होता है।
  • प्रमुख प्रभावित क्षेत्र: जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश।

विश्लेषण

पश्चिमी विक्षोभ के बदलते व्यवहार का विश्लेषण आवश्यक है:

  • अनियमितता: अब विक्षोभों की संख्या तो बढ़ रही है, लेकिन उनसे होने वाली बारिश कम या बेमौसम हो रही है।
  • चरम मौसमी घटनाएं: हाल के वर्षों में पश्चिमी विक्षोभ और मानसूनी हवाओं के आपस में टकराने से 'क्लाउडबर्स्ट' (बादल फटना) जैसी घटनाएं बढ़ी हैं।
  • आर्थिक प्रभाव: बेमौसम ओलावृष्टि से खड़ी फसलों को नुकसान होता है, जो खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए खतरा है।

आगे की राह

  • सटीक पूर्वानुमान: IMD की पूर्वानुमान क्षमता को और अधिक 'माइक्रो-लेवल' पर मजबूत करना ताकि किसान तैयार रह सकें।
  • अनुकूल कृषि पद्धतियां: जलवायु-लचीली फसलों की किस्मों को बढ़ावा देना जो बेमौसम बारिश को झेल सकें।
  • शहरी नियोजन: दिल्ली जैसे शहरों में अचानक होने वाली बारिश से निपटने के लिए ड्रेनेज सिस्टम में सुधार, ताकि 'अर्बन फ्लडिंग' हो।

निष्कर्ष

पश्चिमी विक्षोभ भारतीय मौसम विज्ञान का एक अभिन्न हिस्सा है, जो केवल उत्तर भारत की कृषि और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करता है, बल्कि सर्दियों में बढ़ते प्रदूषण से राहत भी दिलाता है। हालांकि, जलवायु परिवर्तन के दौर में इसकी अनिश्चितता एक नई चुनौती पेश कर रही है। इसके वैज्ञानिक प्रबंधन और समयबद्ध चेतावनी प्रणालियों के माध्यम से हम इसके लाभों को अधिकतम और नुकसान को न्यूनतम कर सकते हैं।