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सन्दर्भ

आज की दुनिया एक ऐसे बदलाव के दौर से गुजर रही है जहाँ सत्ता के पुराने ढांचे दरक रहे हैं और विरोध की एक नई भाषा जन्म ले रही है। इस बदलाव के केंद्र में है 'जेनरेशन ज़ेड' (Gen Z) वह पीढ़ी जिसका जन्म 1997 से 2012 के बीच हुआ। जहाँ पिछली पीढ़ियाँ विचारधाराओं और स्थापित संगठनों के इर्द-गिर्द लामबंद होती थीं, वहीं जेन ज़ी अपनी 'डिजिटल नेटिव' पहचान और 'अकेले मगर एकजुट' होने के अनूठे अंदाज से दुनिया को चौंका रही है।

वैश्विक परिदृश्य: सड़कों से सोशल मीडिया तक

दुनिया भर में जहाँ भी लोकतंत्र पर संकट आया है, वहाँ जेन ज़ी की उपस्थिति दर्ज की गई है।

  • संयुक्त राज्य अमेरिका: 'मार्च फॉर अवर लाइव्स' जैसे आंदोलनों के जरिए इस पीढ़ी ने गन कंट्रोल जैसे जटिल मुद्दों पर अमेरिकी राजनीति को हिला कर रख दिया।
  • बांग्लादेश और नेपाल: हालिया वर्षों (2024-25) में इन देशों में हुए सत्ता-परिवर्तन और भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों में जेन ज़ी की भूमिका निर्णायक रही। उन्होंने दिखाया कि बिना किसी एक 'चेहरे' या नेता के भी बड़े से बड़े शासन को जवाबदेह ठहराया जा सकता है।

भारतीय संदर्भ: आत्मविश्वास और अनिश्चितता का संगम

भारत में जेन ज़ी एक अनोखे विरोधाभास में जी रही है। यह स्वतंत्र भारत की सबसे आत्मविश्वासी पीढ़ी है, जिसे तकनीक और सूचना तक सीधी पहुँच प्राप्त है।

  • जाति और धर्म से ऊपर: बाज़ार और वैश्वीकरण ने इस पीढ़ी को 'उपभोग' के जरिए एक समान धरातल दिया है। एक दलित युवा और एक सवर्ण युवा के पास यदि एक जैसा स्मार्टफोन है, तो वह उनके बीच की सदियों पुरानी सामाजिक खाई को कम करने का एक जरिया बनता है।
  • आर्थिक असुरक्षा: जहाँ एक तरफ तकनीक की ताकत है, वहीं दूसरी तरफ गायब होते रोजगार और 'गिग इकोनॉमी' ने इस पीढ़ी को गहरे मानसिक तनाव और 'भविष्य की चिंता' में धकेल दिया है।

विरोध का नया तरीका: 'छिटपुट' मगर 'प्रभावी'

जेन ज़ी के विरोध प्रदर्शन पुराने आंदोलनों (जैसे भारत का किसान आंदोलन) से बिल्कुल अलग हैं।

  • बिना नेता के आंदोलन: इनके प्रदर्शनों में कोई एक कमांडर नहीं होता। ये सोशल मीडिया पर एकजुट होते हैं, बिजली की तरह चमकते हैं, अपना प्रभाव छोड़ते हैं और फिर गायब हो जाते हैं।
  • व्यक्तिगत ही राजनीतिक है: उनके लिए राजनीति केवल वोट देना नहीं है, बल्कि वे क्या पहनते हैं, क्या खाते हैं और वे मानसिक स्वास्थ्य पर कितनी खुलकर बात करते हैं, यह भी उनकी राजनीति का हिस्सा है।

डिजिटल दुनिया और उग्र-राष्ट्रवाद

तकनीक जहाँ सशक्तिकरण का साधन है, वहीं यह एक 'इको-चेम्बर' भी बनाती है। सूचनाओं के तीव्र प्रवाह ने 'हाइपर-नेशनलिज्म' (उग्र-राष्ट्रवाद) को बढ़ावा दिया है। भारत जैसे देशों में जेन ज़ी अपनी सांस्कृतिक जड़ों पर गर्व करने के साथ-साथ भविष्य की आधुनिक संभावनाओं (जैसे स्पेस मिशन और सिलिकॉन वैली में भारतीय प्रभाव) को लेकर भी बेहद मुखर है।

निष्कर्ष: एक अनिश्चित मगर उज्ज्वल भविष्य

जेन ज़ी को अक्सर 'आभासी दुनिया में खोई हुई' पीढ़ी कहकर खारिज किया जाता है, लेकिन वास्तविकता इसके विपरीत है। वे दुनिया को नैतिकता के पुराने चश्मे से नहीं देखते। उनके लिए 'आईफोन' समानता का प्रतीक हो सकता है और 'थेरेपी' साहस का।

यह पीढ़ी हमें उन तरीकों से निराश करेगी जिसकी हम उम्मीद करते हैं, लेकिन उन तरीकों से आश्चर्यचकित भी करेगी जिसकी हमने कल्पना नहीं की थी। लोकतंत्र का भविष्य अब संसद की बहसों से ज्यादा, जेन ज़ी के स्मार्टफोन की स्क्रीन और उनकी सामूहिक भावनाओं पर टिका है।

सामान्य अध्ययन पेपर  – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध

सन्दर्भ

हाल ही में तमिलनाडु सरकार द्वारा नियुक्त न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ समिति ने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की है। यह रिपोर्ट भारत में पिछले कुछ दशकों से बढ़ते 'केंद्रीकरण' के रुझान पर एक गंभीर चेतावनी जारी करती है। समिति का मानना है कि भारतीय संघीय ढांचा वर्तमान में एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जहाँ राज्यों की स्वायत्तता कम हो रही है, जो लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए चिंताजनक है।

कुरियन जोसेफ समिति की रिपोर्ट के प्रमुख बिंदु

समिति ने केंद्र-राज्य संबंधों का गहन विश्लेषण किया है और निम्नलिखित प्रमुख पहलुओं को रेखांकित किया है:

  • संरचनात्मक पुनर्गठन की आवश्यकता: रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय संघवाद को वर्तमान में 1991 के आर्थिक सुधारों के स्तर के एक बड़े 'स्ट्रक्चरल रीसेट' (संरचनात्मक पुनर्गठन) की आवश्यकता है।
  • संविधान में संशोधन की सुगमता: समिति के अनुसार, भारतीय संविधान में संशोधन की प्रक्रिया काफी सरल है, जिसका लाभ उठाकर केंद्र अक्सर ऐसी नीतियां लागू करता है जो राज्यों के अधिकारों का अतिक्रमण करती हैं।
  • राज्यों की क्षेत्रीय अखंडता: 2019 में जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन का उदाहरण देते हुए रिपोर्ट बताती है कि राज्यों का अस्तित्व और उनकी सीमाएं केंद्र की इच्छा पर निर्भर हो गई हैं, जो संघीय भावना के विपरीत है।
  • वित्तीय स्वायत्तता का ह्रास: जीएसटी (GST) के आने के बाद राज्यों के पास कर जुटाने के अपने साधन सीमित हो गए हैं। वित्तीय संसाधनों का आवंटन अब केंद्र के पक्ष में अधिक झुका हुआ है।
  • संस्थागत हस्तक्षेप: रिपोर्ट में राज्यपाल के पद के राजनीतिकरण और शिक्षा स्वास्थ्य जैसे 'राज्य सूची' के विषयों पर केंद्र के बढ़ते नियंत्रण पर तीखी आलोचना की गई है।

संघवाद को प्रभावित करने वाले अन्य महत्वपूर्ण पहलू

रिपोर्ट के अलावा, वर्तमान परिदृश्य में कुछ ऐसे मुद्दे हैं जो राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा होने चाहिए:

  • परिसीमन की चिंता: आगामी लोकसभा सीटों का परिसीमन दक्षिण भारतीय राज्यों के लिए चिंता का विषय है। जनसंख्या नियंत्रण में सफल रहने वाले राज्यों को डर है कि संसद में उनकी राजनीतिक हिस्सेदारी कम हो जाएगी।
  • एक राष्ट्र, एक भाषा/चुनाव: 'एक राष्ट्र, एक भाषा' या 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' जैसे विचार भारत की विविधतापूर्ण पहचान और स्थानीय मुद्दों की महत्ता को कम कर सकते हैं।
  • एजेंसियों का उपयोग: केंद्रीय जांच एजेंसियों के कथित दुरुपयोग ने केंद्र और विपक्षी दलों द्वारा शासित राज्यों के बीच अविश्वास की खाई को बढ़ा दिया है।

विश्लेषण

भारतीय संविधान के निर्माताओं ने भारत की अखंडता को बनाए रखने के लिए 'लचीला संघवाद' बनाया था, जिसमें केंद्र को अधिक शक्तियां दी गई थीं। हालांकि, वर्तमान समय में यह 'सहकारी संघवाद' से हटकर 'प्रतिस्पर्धी और दंडात्मक संघवाद' की ओर बढ़ता दिख रहा है।

केंद्रीकरण से प्रशासनिक कुशलता तो बढ़ सकती है, लेकिन भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में 'स्थानीय समस्याओं का राष्ट्रीय समाधान' हमेशा सफल नहीं होता। विविधता का सम्मान करना ही भारतीय लोकतंत्र की असली ताकत है।

आगे की राह

  • अंतर-राज्य परिषद को मजबूत करना: अनुच्छेद 263 के तहत गठित इस परिषद को सक्रिय कर केंद्र और राज्यों के बीच विवादों को सुलझाने का मुख्य मंच बनाना चाहिए।
  • वित्तीय विकेंद्रीकरण: 16वें वित्त आयोग को राज्यों के राजकोषीय हितों की रक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए और राज्यों को अधिक वित्तीय स्वतंत्रता देनी चाहिए।
  • राज्यपाल के पद में सुधार: पुंछी आयोग और सरकारिया आयोग की सिफारिशों को लागू किया जाना चाहिए ताकि राज्यपाल का पद केवल एक संवैधानिक रक्षक के रूप में कार्य करे, कि केंद्र के प्रतिनिधि के रूप में।
  • साझा विमर्श: परिसीमन जैसे संवेदनशील मुद्दों पर सभी राज्यों के साथ सर्वसम्मति बनाना अनिवार्य है।

निष्कर्ष

न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ समिति की रिपोर्ट मात्र एक कानूनी दस्तावेज नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के लिए एक 'वेक-अप कॉल' (चेतावनी) है। एक सशक्त भारत के लिए एक सशक्त केंद्र और सशक्त राज्यों का होना अनिवार्य है। यदि भारत को अपनी विविधता को बनाए रखते हुए प्रगति करनी है, तो उसे केंद्रीकरण के बजाय सहकारी संघवाद की मूल भावना को पुनर्जीवित करना होगा। जैसा कि रिपोर्ट सुझाव देती है, अब समय गया है कि हम संघवाद पर एक नई राष्ट्रीय बहस शुरू करें।