Read Current Affairs
संदर्भ
आज के आधुनिक युग में भी सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान होने वाली मौतें मानवता पर एक गहरा घाव हैं। इस अमानवीय प्रथा को जड़ से मिटाने और सफाई कर्मियों को सुरक्षा व सम्मानजनक जीवन देने हेतु NAMASTE योजना भारत की 'शून्य मृत्यु दर' की प्रतिबद्धता का आधार बन चुकी है।
वर्तमान चर्चा का विषय
फरवरी 2026 में संसद में पेश किए गए नवीनतम आँकड़ों के अनुसार, NAMASTE योजना के तहत अब तक लगभग 89,000 सीवर और सेप्टिक टैंक श्रमिकों (SSWs) का सफलतापूर्वक सत्यापन किया जा चुका है।
- स्वास्थ्य सुरक्षा: इनमें से 82% से अधिक श्रमिकों को आयुष्मान भारत (PM-JAY) योजना से जोड़कर उन्हें सुरक्षा कवच प्रदान किया गया है।
- पहली बार गणना: सरकार ने पहली बार कचरा बीनने वालों और स्वच्छता कर्मियों का व्यापक सामाजिक-आर्थिक डेटा साझा किया है, जिससे लक्षित कल्याणकारी योजनाओं का मार्ग प्रशस्त हुआ है।
नमस्ते (NAMASTE) योजना:
NAMASTE (यंत्रीकृत स्वच्छता पारिस्थितिकी तंत्र हेतु राष्ट्रीय कार्ययोजना) योजना भारत सरकार की एक महत्वाकांक्षी पहल है।
- शुभारंभ: इसे औपचारिक रूप से जुलाई 2023 में लॉन्च किया गया (इसने पूर्ववर्ती SRMS योजना का स्थान लिया)।
- नोडल मंत्रालय: यह सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय (MoSJE) और आवासन एवं शहरी कार्य मंत्रालय (MoHUA) की एक संयुक्त पहल है।
- प्रमुख उद्देश्य:
- हाथ से मैला ढोने की प्रथा का पूर्ण उन्मूलन।
- स्वच्छता कार्यों में होने वाली मृत्यु दर को 'शून्य' पर लाना।
- सफाई कर्मियों को आधुनिक मशीनों और सुरक्षा उपकरणों (PPE Kits) से लैस करना।
- 'सफाई मित्रों' को 'स्वच्छता उद्यमी' के रूप में परिवर्तित करना।
महत्व और प्रभाव
- मानवीय गरिमा: यह योजना श्रमिकों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ती है और उन्हें एक नई पहचान (NAMASTE ID) प्रदान करती है।
- आर्थिक सशक्तिकरण: मशीनों की खरीद के लिए 5 लाख रुपये तक की पूंजीगत सहायता (कैपिटल सब्सिडी) और कम ब्याज पर ऋण देकर उन्हें मालिक बनाया जा रहा है।
- स्वास्थ्य लाभ: खतरनाक गैसों और संक्रमण से होने वाली बीमारियों के जोखिम को कम कर उनकी औसत आयु और जीवन स्तर में सुधार करना।
- राष्ट्रीय एवं वैश्विक प्रभाव: भारत द्वारा मशीनीकृत स्वच्छता को अपनाना वैश्विक स्तर पर 'सतत विकास लक्ष्यों' (SDG-6: स्वच्छ जल और स्वच्छता) की प्राप्ति की दिशा में एक बड़ा कदम है।
निष्कर्ष
NAMASTE योजना केवल एक सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि समाज के सबसे वंचित वर्ग के प्रति राष्ट्र का संवेदीकरण है। संसद में पेश किए गए नए आँकड़े यह सिद्ध करते हैं कि भारत अब तकनीक के माध्यम से मानवीय गरिमा सुनिश्चित करने के पथ पर अग्रसर है। जब तक हर 'सफाई मित्र' सुरक्षित नहीं होगा, तब तक 'स्वच्छ भारत' का सपना अधूरा है।
सामान्य अध्ययन पेपर – III प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन
संदर्भ:
भारत ने अपनी रक्षा सीमाओं को अभेद्य बनाते हुए परमाणु सक्षम 'अग्नि-3' मिसाइल का सफल परीक्षण कर विश्व पटल पर अपनी सैन्य सर्वोच्चता सिद्ध की है। स्वदेशी तकनीक और अचूक मारक क्षमता का यह संगम भारत के 'न्यूनतम विश्वसनीय निवारण' के संकल्प को नई ऊँचाई प्रदान करता है।
अग्नि-3 मिसाइल: तकनीक और विशेषताएँ
अग्नि-3 भारत के रक्षा शस्त्रागार का वह मुख्य आधार है, जो अपनी मारक क्षमता से शत्रुओं के खेमे में भय उत्पन्न करता है। इसकी प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
- निर्माण एवं विकास: इस अत्याधुनिक मिसाइल का संपूर्ण निर्माण और विकास रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) द्वारा पूर्णतः स्वदेशी तकनीक से किया गया है।
- मारक क्षमता: यह मिसाइल 3000 से 3500 किलोमीटर की दूरी तक लक्ष्य को भेदने में सक्षम है।
- प्रणाली: यह दो चरणों वाली बैलिस्टिक मिसाइल है, जो ठोस ईंधन द्वारा संचालित होती है।
- पेलोड क्षमता: यह 1.5 टन तक के पारंपरिक और परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम है।
- सटीकता: अत्याधुनिक नेविगेशन और मार्गदर्शन प्रणाली के कारण यह उच्च सटीकता के साथ लक्ष्य पर प्रहार करती है।
- गतिशीलता: इसे रेल या सड़क आधारित मोबाइल लॉन्चर से लॉन्च किया जा सकता है, जिससे युद्ध की स्थिति में इसकी उत्तरजीविता बढ़ जाती है।
सामरिक महत्व: राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय प्रभाव
अग्नि-3 का सफल परीक्षण केवल एक सैन्य अभ्यास नहीं, बल्कि एक गहरा कूटनीतिक संदेश है:
- राष्ट्रीय सुरक्षा: यह भारत के 'परमाणु त्रय' को मजबूती प्रदान करता है। यह चीन और पाकिस्तान जैसे पड़ोसियों के विरुद्ध एक ठोस निवारक के रूप में कार्य करता है, क्योंकि इसकी सीमा में पड़ोसी देशों के लगभग सभी प्रमुख शहर आते हैं।
- आत्मनिर्भर भारत: डीआरडीओ (DRDO) द्वारा विकसित यह तकनीक रक्षा क्षेत्र में भारत की स्वदेशी शक्ति का प्रदर्शन करती है, जिससे विदेशी निर्भरता कम हुई है।
- वैश्विक प्रभाव: इस सफल परीक्षण ने दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन को भारत के पक्ष में झुका दिया है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह अपनी क्षेत्रीय अखंडता से समझौता नहीं करेगा।
निष्कर्ष
अग्नि-3 का यह सफल परीक्षण भारत के रक्षा इतिहास में एक मील का पत्थर है। यह न केवल हमारी तकनीकी प्रगति को दर्शाता है, बल्कि "अहिंसा परमो धर्मः" के साथ-साथ "धर्म हिंसा तथैव च" के उस सिद्धांत को भी पुष्ट करता है, जहाँ शांति बनाए रखने के लिए शक्ति का होना अनिवार्य है। आज का भारत अब केवल सीमाओं की रक्षा नहीं करता, बल्कि अपनी सुरक्षा के प्रति शत्रुओं के मन में भय सुनिश्चित करने की क्षमता भी रखता है।
सामान्य अध्ययन पेपर – III प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन
संदर्भ
पिछले पांच वर्षों (2020-2025) में वैश्विक स्तर पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बुनियादी ढांचे पर अभूतपूर्व निवेश किया गया। इसमें Nvidia जैसे चिप्स, विशाल डेटा सेंटर और फॉउण्डेशनल मॉडल्स (जैसे GPT-4, Claude) का प्रभुत्व रहा। 2025 तक अकेले इंफ्रास्ट्रक्चर पर लगभग $320 बिलियन खर्च किए गए। किंतु, 2026 की शुरुआत में वैश्विक बाजार और नीतिगत गलियारों में एक नया मोड़ आया है अब चर्चा केवल 'AI तकनीक के कार्य करने' पर नहीं, बल्कि उसकी 'लाभप्रदता' और 'व्यावहारिक उपयोग' पर केंद्रित हो गई है।
AI के नए निवेश चक्र
समाचार और आर्थिक विश्लेषणों के अनुसार, AI निवेश चक्र का अर्थ 'बुनियादी ढांचे' से 'एप्लिकेशन लेयर' की ओर संक्रमण है।
- पहला चरण: यहाँ उद्देश्य शक्तिशाली मॉडल बनाना और कंप्यूटिंग क्षमता (GPUs) जुटाना था।
- नया चरण: यहाँ मुख्य ध्यान उन सॉफ्टवेयर और टूल्स पर है जो किसी विशिष्ट उद्योग (उदा. स्वास्थ्य, कानून, शिक्षा) की समस्याओं को हल करते हैं। अब निवेशक यह देख रहे हैं कि क्या AI वास्तव में लागत घटा रहा है या राजस्व बढ़ा रहा है। इसे " एआई-वर्टिकलाइजेशन " भी कहा जाता है।
वर्तमान चर्चा का कारण
फरवरी 2026 में 'इंडिया-एआई इम्पैक्ट समिट-2026' और प्रमुख वैश्विक आर्थिक मंचों (जैसे WEF) की रिपोर्ट्स ने इस बदलाव को रेखांकित किया है:
- OpenAI का वित्तीय विरोधाभास: $13 बिलियन के राजस्व के बावजूद $5 बिलियन का वार्षिक घाटा यह संकेत दे रहा है कि सिर्फ 'मॉडल' बेचना टिकाऊ नहीं है।
- Niche स्टार्टअप्स की सफलता: 'Harvey' (Legal AI) जैसे स्टार्टअप्स द्वारा $460 मिलियन की बड़ी फंडिंग जुटाना यह दर्शाता है कि बाजार विशिष्ट क्षेत्रों के लिए बने AI समाधानों को प्राथमिकता दे रहा है।
- भारत की भूमिका: भारत सरकार द्वारा 'इंडिया एआई मिशन ' के तहत 10,000 से अधिक GPUs की तैनाती और ' भाषिणी ' जैसे अनुप्रयोगों पर जोर देना इसे राष्ट्रीय चर्चा का विषय बना चुका है।
महत्व एवं प्रभाव:
दृष्टिकोण | विवरण एवं महत्व |
आर्थिक (Economic) | यह चक्र 'निवेश-आधारित विकास' को 'राजस्व-आधारित विकास' में बदलेगा। MSMEs के लिए AI अब सुलभ और किफायती होगा। |
प्रौद्योगिकी (Technological) | जेनेरिक AI (Generic AI) के बजाय 'Domain-Specific' मॉडल विकसित होंगे, जो कम डेटा और बिजली की खपत करेंगे। |
रणनीतिक (Strategic) | जो देश एप्लिकेशन लेयर पर नियंत्रण रखेंगे, वे डेटा संप्रभुता और वैश्विक व्यापार में बढ़त हासिल करेंगे। |
सामाजिक (Social) | शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में AI के सीधे अनुप्रयोग से ‘समावेशी विकास’ के लक्ष्य को प्राप्त करना आसान होगा। |
विश्लेषण
यह बदलाव 'डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना' (DPI) के अगले चरण जैसा है। यदि बुनियादी ढांचा (Chips/Models) "सड़क" है, तो एप्लीकेशन्स उस पर चलने वाली "बसें" हैं। बिना बसों के सड़क का कोई आर्थिक मूल्य नहीं है।
- चुनौती: बुनियादी ढांचे पर खर्च इतना अधिक हो चुका है कि यदि 'एप्लिकेशन' से लाभ नहीं हुआ, तो यह 'डॉट-कॉम बबल' की तरह फूट सकता है।
- अवसर: भारत जैसे देशों के लिए यह वरदान है, क्योंकि हमारे पास दुनिया का सबसे बड़ा डेवलपर आधार है जो विशिष्ट स्थानीय समस्याओं (जैसे कृषि, भाषाई विविधता) के लिए ऐप बना सकता है।
आगे की राह
- कौशल विकास: केवल AI का उपयोग करना काफी नहीं है, बल्कि 'AI-Workflow' को समझने वाले मानव संसाधन तैयार करने होंगे।
- नैतिक नियम: एप्लिकेशन लेयर पर डेटा गोपनीयता और एल्गोरिथम पूर्वाग्रह को रोकने के लिए कड़े कानून आवश्यक हैं।
- प्रो-इनोवेशन रेगुलेशन: सरकारों को स्टार्टअप्स पर बहुत अधिक कर या नियमों का बोझ नहीं डालना चाहिए ताकि 'एप्लिकेशन लेयर' में नवाचार बना रहे।
निष्कर्ष
संक्षेप में, 2026 का निवेश चक्र AI के 'लोकतंत्रीकरण' का वर्ष है। अब शक्ति उन कंपनियों या देशों के पास नहीं होगी जिनके पास सबसे बड़े सर्वर हैं, बल्कि उनके पास होगी जिनके पास सबसे उपयोगी समाधान हैं। भारत के लिए यह अपनी 'सॉफ्टवेयर शक्ति' को 'AI शक्ति' में बदलने का स्वर्णिम अवसर है।
सामान्य अध्ययन पेपर – III प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन
संदर्भ
फरवरी 2026 के प्रथम सप्ताह में ऊर्जा विशेषज्ञों और उद्योग जगत के बीच एक नई बहस छिड़ी है, जिसका आधार श्रीकांत माधव वैद्य (पूर्व चेयरमैन, IOCL) का विश्लेषण है। ऐतिहासिक रूप से, औद्योगिक क्रांति "अणुओं" यानी जीवाश्म ईंधन (कोयला, तेल, गैस) के दहन पर आधारित रही है। किंतु, वैश्विक जलवायु लक्ष्यों और आर्थिक प्रतिस्पर्धात्मकता के बढ़ते दबाव के कारण अब विश्व "इलेक्ट्रॉन अर्थव्यवस्था" (बिजली आधारित उद्योग) की ओर स्थानांतरित हो रहा है। भारत के लिए यह संक्रमण केवल पर्यावरण की रक्षा नहीं, बल्कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में अपना स्थान सुरक्षित करने की अनिवार्यता है।
'अणु' बनाम 'इलेक्ट्रॉन': मूलभूत अंतर
इस बदलाव को समझने के लिए ऊर्जा के दो रूपों का विश्लेषण आवश्यक है:
- अणु आधारित मॉडल: यहाँ कारखानों, भट्टियों और वाहनों को चलाने के लिए पदार्थों (कोयला या डीजल) को जलाकर ऊष्मा पैदा की जाती है। यह मॉडल अत्यधिक प्रदूषणकारी और ऊर्जा की बर्बादी वाला है।
- इलेक्ट्रॉन आधारित मॉडल: इसमें उद्योगों को सीधे ग्रिड या सौर/पवन ऊर्जा से प्राप्त बिजली (इलेक्ट्रॉन) द्वारा संचालित किया जाता है।
- दक्षता लाभ: एक इलेक्ट्रिक मोटर अपनी ऊर्जा का 90% से अधिक कार्य में बदलती है, जबकि दहन इंजन मात्र 30-35% ही कार्य कर पाता है।
वर्तमान वैश्विक स्थिति और चीन का प्रभुत्व
चीन ने इस 'इलेक्ट्रॉन क्रांति' में निर्णायक बढ़त बना ली है:
- चीनी औद्योगिक ऊर्जा: 2024 तक चीन की औद्योगिक ऊर्जा का लगभग 50% हिस्सा बिजली से आ रहा है। उन्होंने अपने बुनियादी ढांचे को ग्रिड-आधारित बिजली के अनुकूल बना लिया है।
- भारतीय परिप्रेक्ष्य: भारत में यह आंकड़ा वर्तमान में 25% के आसपास है। भारत के अधिकांश भारी उद्योग (जैसे स्टील और सीमेंट) आज भी ऊष्मा के लिए सीधे कोयले या तेल के दहन पर निर्भर हैं।
महत्त्व एवं प्रभाव:
दृष्टिकोण | विश्लेषण एवं महत्त्व |
आर्थिक प्रतिस्पर्धात्मकता | यूरोपीय संघ का CBAM (कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म) उन उत्पादों पर कर लगाएगा जो 'अणुओं' (कोयले) से बने हैं। 'इलेक्ट्रॉन' आधारित स्टील/सीमेंट वैश्विक बाजार में सस्ते और स्वीकार्य होंगे। |
ऊर्जा सुरक्षा | भारत अपनी तेल आवश्यकता का 85% आयात करता है। 'इलेक्ट्रॉन' अर्थव्यवस्था का अर्थ है स्वदेशी अक्षय ऊर्जा पर निर्भरता और विदेशी तेल झटकों से मुक्ति। |
निवेश और रोजगार | भविष्य की कंपनियाँ (जैसे सेमीकंडक्टर, ईवी) उन्हीं स्थानों पर निवेश करेंगी जहाँ सस्ती, स्थिर और स्वच्छ बिजली उपलब्ध होगी। |
जलवायु प्रतिबद्धता | भारत के ‘नेट जीरो 2070' लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए औद्योगिक प्रक्रियाओं का विद्युतीकरण करना अनिवार्य है। |
विश्लेषण
यह संक्रमण केवल तकनीक का बदलाव नहीं, बल्कि "प्रतिस्पर्धात्मकता का नया व्याकरण" है।
- स्वचालित डीकार्बोनाइजेशन: यदि कोई फैक्ट्री बिजली से चलती है, तो जैसे-जैसे भारत का बिजली ग्रिड 'ग्रीन' (सौर/पवन) होगा, वह फैक्ट्री बिना किसी अतिरिक्त निवेश के अपने आप 'स्वच्छ' हो जाएगी।
- चुनौती: भारत में औद्योगिक बिजली की दरें (Tariffs) विश्व में सबसे अधिक हैं क्योंकि यहाँ घरेलू उपभोक्ताओं को सब्सिडी देने के लिए उद्योगों पर 'क्रॉस -सब्सिडी' का बोझ डाला जाता है। यह 'इलेक्ट्रॉन' की ओर संक्रमण में सबसे बड़ी बाधा है।
आगे की राह
- औद्योगिक बिजली दरों में सुधार: उद्योगों के लिए बिजली की कीमतों को प्रतिस्पर्धी बनाना ताकि वे कोयले के बजाय बिजली को चुनें।
- ग्रिड का आधुनिकीकरण: 24/7 बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए 'बैटरी स्टोरेज' और 'स्मार्ट ग्रिड' में निवेश बढ़ाना।
- क्षेत्र-विशिष्ट विद्युतीकरण: स्टील में 'इलेक्ट्रिक आर्क फर्नेस' और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSMEs) में इलेक्ट्रिक बॉयलरों के उपयोग को प्रोत्साहन (सब्सिडीज) देना।
- ओपन एक्सेस पॉलिसी: उद्योगों को यह स्वतंत्रता देना कि वे अपनी पसंद के अक्षय ऊर्जा उत्पादक से सीधे बिजली खरीद सकें।
निष्कर्ष
21वीं सदी की औद्योगिक श्रेष्ठता इस बात से तय नहीं होगी कि किसके पास अधिक ईंधन है, बल्कि इस बात से तय होगी कि कौन अपने उद्योगों को सबसे कुशलता से 'इलेक्ट्रॉन' प्रदान कर सकता है। भारत के लिए 'अणुओं' की आयात निर्भरता को छोड़कर 'इलेक्ट्रॉन' की आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ना ही "विकसित भारत" का वास्तविक आर्थिक पथ है।
सामान्य अध्ययन पेपर – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध
संदर्भ
फरवरी 2026 में MPLADS (सांसद स्थानीय क्षेत्र विकास योजना) एक बार फिर राष्ट्रीय बहस का केंद्र बन गई है। हालिया विवाद तब शुरू हुआ जब राजस्थान के तीन कांग्रेस सांसदों पर अपनी निधि का एक हिस्सा हरियाणा के कैथल जिले में आवंटित करने का आरोप लगा। जहाँ आलोचक इसे 'निधि का दुरुपयोग' बताकर योजना को समाप्त करने की मांग कर रहे हैं, वहीं विशेषज्ञों का तर्क है कि छिटपुट घटनाओं के आधार पर इस महत्वपूर्ण विकास उपकरण को खत्म करना उचित नहीं है।
MPLADS का स्वरूप
- स्थापना: दिसंबर 1993 में शुरू की गई एक केंद्रीय क्षेत्र की योजना।
- वित्तपोषण: भारत सरकार द्वारा 100% वित्तपोषित।
- कार्यप्रणाली: इसके तहत सांसद अपने निर्वाचन क्षेत्र में 'टिकाऊ सामुदायिक संपत्ति' (जैसे पेयजल, प्राथमिक शिक्षा, स्वच्छता, सड़कें) के निर्माण की सिफारिश करते हैं।
- बजट: प्रत्येक सांसद को प्रति वर्ष ₹5 करोड़ आवंटित किए जाते हैं। यह निधि गैर-व्यपगत होती है।
वर्तमान विवाद: राजस्थान बनाम हरियाणा मामला
जनवरी-फरवरी 2026 में भाजपा ने निम्नलिखित सांसदों पर आरोप लगाए:
- सांसद: संजना जाटव (भरतपुर), राहुल कसवान (चूरू), और बृजेंद्र सिंह ओला (झुंझुनू)।
- विवाद: इन्होंने अपनी निधि से क्रमशः ₹45 लाख, ₹50 लाख और ₹25 लाख हरियाणा के कैथल में विकास कार्यों के लिए आवंटित किए।
- तकनीकी पहलू: सांसदों ने अगस्त 2024 के संशोधित दिशानिर्देशों का बचाव किया, जो एक सांसद को अपने निर्वाचन क्षेत्र के बाहर सालाना ₹50 लाख तक खर्च करने की अनुमति देते हैं। हालांकि, इसे 'राजनीतिक रूप से प्रेरित' बताकर इसकी आलोचना की जा रही है।
ऐतिहासिक उपयोगिता के आंकड़े
आंकड़े बताते हैं कि MPLADS का उपयोग समय के साथ प्रभावी रहा है:
लोकसभा | अप्रयुक्त निधि (%) | स्थिति |
14वीं लोकसभा | 0.99% | अत्यधिक प्रभावी उपयोग |
15वीं लोकसभा | 3.47% | बेहतर क्रियान्वयन |
16वीं लोकसभा | 8.7% | संतोषजनक |
17वीं लोकसभा | ~25% (अप्रयुक्त) | कोविड-19 महामारी के कारण बाधित |
18वीं लोकसभा (वर्तमान) | ₹1,453.69 करोड़ खर्च | ₹5,486 करोड़ के आवंटन में से (प्रगति पर) |
विश्लेषण
- शक्ति पृथक्करण : आलोचकों का तर्क है कि विधायिका का कार्य कानून बनाना है, विकास कार्य नहीं। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट (2010, भीम सिंह मामला) ने इसे वैध ठहराया क्योंकि अंतिम क्रियान्वयन जिला प्रशासन ही करता है।
- संघवाद: कुछ राज्यों का तर्क है कि यह राज्य सूची के विषयों में केंद्र का हस्तक्षेप है।
- सकारात्मक उदाहरण: पूर्व केंद्रीय मंत्री सत्यपाल सिंह ने अपनी निधि का 63% जल संकट दूर करने में लगाया, जबकि शशि थरूर जैसे सांसदों ने जियो-टैगिंग के जरिए पूर्ण पारदर्शिता सुनिश्चित की।
सुधार की राह
- मार्गदर्शन कार्यशालाएं: सांसदों को प्रभावी नियोजन के लिए तकनीकी प्रशिक्षण देना।
- पारदर्शिता: परियोजनाओं की रीयल-टाइम ऑनलाइन निगरानी और 'जियो-टैग्ड' छवियों का अनिवार्य प्रकाशन।
- सोशल ऑडिट: स्थानीय निवासियों द्वारा कार्यों का भौतिक सत्यापन सुनिश्चित करना।
- जवाबदेही: जिला अधिकारियों द्वारा निधि जारी करने में होने वाली देरी को कम करना।
निष्कर्ष
MPLADS को समाप्त करने का कोई ठोस आधार नहीं है। यह योजना सांसदों को उनके मतदाताओं की छोटी लेकिन महत्वपूर्ण जरूरतों (जैसे सामुदायिक भवन या हैंडपंप) के प्रति सीधे उत्तरदायी बनाती है। आवश्यकता इसे खत्म करने की नहीं, बल्कि इसके कार्यान्वयन में जवाबदेही, पारदर्शिता और बेहतर निगरानी तंत्र को मजबूत करने की है। भारत जैसे बड़े और विविध लोकतंत्र में, स्थानीय विकास के लिए यह एक अनिवार्य कड़ी है।
सामान्य अध्ययन पेपर – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध
संदर्भ
मृत्युदंड, जिसे 'कैपिटल पनिशमेंट' भी कहा जाता है, मानवीय गरिमा और अपराध के निवारण के बीच एक चिरस्थायी बहस का विषय रहा है। फरवरी 2026 में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय के उदारवादी रुख और वैश्विक स्तर पर फांसी की बढ़ती घटनाओं ने इस मुद्दे को पुनः चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
वर्तमान समाचार
फरवरी 2026 में, नालसार (NALSAR) विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट "डेथ पेनल्टी इन इंडिया: एनुअल स्टैटिस्टिक्स रिपोर्ट 2025" ने एक चौंकाने वाला रुझान दिखाया है:
- सुप्रीम कोर्ट द्वारा शून्य पुष्टि: लगातार तीसरे वर्ष (2023-2025), भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक भी मृत्युदंड की सजा की पुष्टि नहीं की।
- बड़ी संख्या में दोषमुक्ति: वर्ष 2025 में, सुप्रीम कोर्ट ने 10 मृत्युदंड के कैदियों को दोषमुक्त किया, जो एक दशक में ऐसी दोषमुक्तियों की सबसे अधिक संख्या है।
- ट्रायल कोर्ट और ऊपरी अदालतों के बीच अंतर: जहाँ ऊपरी अदालतें अधिक सख्त हो रही हैं, वहीं सत्र न्यायालयों (ट्रायल कोर्ट) ने पिछले एक दशक में 1,310 मृत्युदंड दिए हैं। उच्च न्यायालयों ने इनमें से केवल 8% की पुष्टि की, जो ट्रायल स्तर पर "त्रुटिपूर्ण सजा" की ओर इशारा करता है।
- प्रक्रियात्मक उल्लंघन: रिपोर्ट में बताया गया कि ट्रायल कोर्ट में 95% सुनवाई ने सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों का उल्लंघन किया (जैसे मृत्युदंड देने से पहले मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन न करना)।
वैश्विक रुझान: फांसी की संख्या में "चिंताजनक" वृद्धि
जनवरी 2026 के अंत में, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय (OHCHR) ने 2025 के दौरान वैश्विक स्तर पर दी गई फांसी की संख्या में "भारी वृद्धि" पर चिंता जताई:
- ईरान और सऊदी अरब: रिपोर्ट के अनुसार ईरान ने 2025 में कम से कम 1,500 लोगों को फांसी दी (लगभग आधे नशीली दवाओं के अपराधों के लिए)। सऊदी अरब ने 350 से अधिक लोगों को फांसी दी, जो एक रिकॉर्ड संख्या है।
- संयुक्त राज्य अमेरिका: अमेरिका ने 2025 में 47 फांसी दीं, जो पिछले 16 वर्षों में सबसे अधिक है।
इज़राइल: विवादास्पद मृत्युदंड विधेयक
फरवरी 2026 में इज़राइल की नेसेट (संसद) में प्रस्तावित 'अनिवार्य मृत्युदंड विधेयक' अंतरराष्ट्रीय विवाद का कारण बना है:
- प्रस्ताव: आतंकवादी कृत्यों के लिए अनिवार्य मृत्युदंड का प्रावधान।
- विवाद का बिंदु: आलोचकों का तर्क है कि यह विधेयक मुख्य रूप से फिलिस्तीनियों को लक्षित करता है और एक 'दोहरी कानूनी प्रणाली' को जन्म देता है, जो न्याय के सार्वभौमिक सिद्धांतों के विरुद्ध है। संयुक्त राष्ट्र ने इसे 'प्रतिशोधात्मक कानून' करार दिया है।
हालिया निष्पादन
फरवरी के प्रथम दो सप्ताहों में कई महत्वपूर्ण मामले सामने आए:
- अमेरिका (फ्लोरिडा): 10 फरवरी को घातक इंजेक्शन के माध्यम से वर्ष की पहली सजा का क्रियान्वयन।
- सिंगापुर: 11 फरवरी को नशीली दवाओं की तस्करी के लिए एक विदेशी नागरिक को फांसी, जिसने वैश्विक स्तर पर 'कठोर औषधि कानूनों' पर बहस छेड़ दी।
- ईरान: किशोर पहलवान सालेह मोहम्मदी को सजा सुनाए जाने के बाद मानवाधिकार आंदोलनों में तेजी आई है।
त्वरित संदर्भ के लिए सारांश तालिका
क्षेत्र | समाचार का कारण | मुख्य बिंदु |
भारत | वार्षिक सांख्यिकी रिपोर्ट 2025 | 3 वर्षों में SC द्वारा शून्य पुष्टि; निचली और ऊपरी अदालतों के बीच विरोधाभास। |
संयुक्त राष्ट्र | OHCHR रिपोर्ट | वैश्विक स्तर पर फांसी की संख्या में खतरनाक वृद्धि (ईरान, सऊदी अरब, अमेरिका)। |
इज़राइल | नया विधायी विधेयक | फिलिस्तीनियों को लक्षित करने वाला अनिवार्य मृत्युदंड बिल; UN ने वापसी की मांग की। |
सिंगापुर/अमेरिका | हालिया फांसी | ड्रग तस्करी और हत्या के मामलों में फरवरी में निष्पादन किया गया। |
रिपोर्ट का महत्व
'एनुअल स्टैटिस्टिक्स रिपोर्ट 2025' नीति निर्माताओं के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि:
- यह 'डेटा-आधारित न्याय' की आवश्यकता पर बल देती है।
- यह उजागर करती है कि 95% मामलों में ट्रायल कोर्ट ने आरोपी की मानसिक स्थिति और 'मिटिगेटिंग परिस्थितियों' का अध्ययन किए बिना सजा सुनाई।
- यह सजा की 'पुष्टि दर' में भारी गिरावट को दर्शाकर न्यायिक सुधार की मांग करती है।
विश्लेषण
मृत्युदंड की वर्तमान स्थिति 'न्यायिक विसंगति' को दर्शाती है। भारत में 'विरलतम से विरल' सिद्धांत के बावजूद, ट्रायल कोर्ट अक्सर प्रतिशोधात्मक न्याय के दबाव में सजा सुना देते हैं, जिसे ऊपरी अदालतें प्रक्रियात्मक खामियों के कारण रद्द कर देती हैं। वैश्विक स्तर पर, मृत्युदंड का उपयोग अपराध नियंत्रण के बजाय राजनीतिक शक्ति के प्रदर्शन और सामाजिक नियंत्रण के उपकरण के रूप में अधिक किया जा रहा है।
आगे की राह
- प्रक्रियात्मक शुद्धता: सुप्रीम कोर्ट के 'मनोज बनाम मध्य प्रदेश' (2022) मामले के दिशानिर्देशों का सख्ती से पालन सुनिश्चित किया जाए, जिसमें सजा से पूर्व आरोपी का सामाजिक-आर्थिक और मनोवैज्ञानिक अध्ययन अनिवार्य है।
- लीगल एड: मृत्युदंड के मामलों में गुणवत्तापूर्ण कानूनी सहायता प्रदान करना, क्योंकि अधिकांश दोषी गरीब पृष्ठभूमि से होते हैं।
- वैश्विक संवाद: अनिवार्य मृत्युदंड जैसे कानूनों को अंतरराष्ट्रीय संधियों के अनुरूप संशोधित करने हेतु कूटनीतिक दबाव।
निष्कर्ष
न्याय का उद्देश्य केवल अपराधी को दंडित करना नहीं, बल्कि समाज में न्याय के प्रति विश्वास बनाए रखना है। भारत में सुप्रीम कोर्ट का 'शून्य पुष्टि' का रुझान यह स्पष्ट करता है कि मृत्युदंड की अपरिवर्तनीय प्रकृति को देखते हुए अत्यधिक सावधानी अनिवार्य है। जब तक ट्रायल कोर्ट और उच्च न्यायपालिका के बीच समन्वय स्थापित नहीं होता और वैश्विक स्तर पर मानवाधिकारों को प्राथमिकता नहीं दी जाती, तब तक मृत्युदंड एक न्यायपूर्ण समाज के लिए चुनौती बना रहेगा।
सामान्य अध्ययन पेपर – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध
संदर्भ
फरवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने व्हाट्सएप की 2021 की विवादास्पद निजता नीति और मेटा द्वारा डेटा के व्यावसायिक शोषण पर कड़ा रुख अपनाया है। यह मामला भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) द्वारा मेटा पर लगाए गए ₹213.14 करोड़ के जुर्माने को चुनौती देने वाली अपीलों से उत्पन्न हुआ है, जिसमें 'निजता के अधिकार' को व्यापारिक लाभ से ऊपर रखने की मांग की गई है।
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य बिंदु
मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई के दौरान अत्यंत तीखी टिप्पणियाँ कीं:
- "चोरी का शालीन तरीका": कोर्ट ने निजी डेटा साझा करने की तुलना शालीन तरीके से की गई चोरी से की।
- "देश छोड़ दें": कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि यदि कंपनियाँ निजता की रक्षा नहीं कर सकतीं, तो उन्हें भारत से अपना कारोबार समेट लेना चाहिए।
- एकाधिकार पर प्रहार: कोर्ट ने व्हाट्सएप की 'मानो या छोड़ो' (Take it or leave it) नीति को 'शेर और मेमने के बीच समझौता' बताया, जहाँ उपभोक्ता के पास वास्तव में कोई विकल्प नहीं है।
- "हम उत्पाद हैं": कोर्ट ने सॉलिसिटर जनरल की इस बात से सहमति जताई कि उपभोक्ता अब ग्राहक नहीं बल्कि बेचे जाने वाले 'उत्पाद' बन गए हैं।
सुप्रीम कोर्ट के निर्णय/टिप्पणियों के मायने
- उपभोक्ता सुरक्षा: यह संकेत देता है कि डिजिटल युग में 'मूक उपभोक्ताओं' के पास भी संवैधानिक संरक्षण है।
- न्यायिक सक्रियता: कोर्ट अब केवल कानूनी प्रक्रियाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि वह तकनीकी शब्दावली (Opt-out) की जटिलता को एक 'आम आदमी' के नजरिए से देख रहा है।
- संवैधानिक सर्वोच्चता: यह स्पष्ट संदेश है कि कोई भी वैश्विक तकनीकी कंपनी भारत के संविधान और नागरिकों के मौलिक अधिकारों से ऊपर नहीं है।
मेटा/व्हाट्सएप का पक्ष और उन पर प्रभाव
- कंपनियों का तर्क: वरिष्ठ अधिवक्ता सिबल ने तर्क दिया कि डेटा साझाकरण केवल उपयोगकर्ता की 'सहमति' से होता है और उनके पास 'ऑप्ट-आउट' का विकल्प है। उन्होंने विज्ञापनों के जरिए सूचना देने का दावा किया।
- प्रभाव: वित्तीय जोखिम: जुर्माना बरकरार रहने से मेटा को भारी वित्तीय बोझ उठाना पड़ेगा।
- व्यावसायिक मॉडल पर संकट: यदि डेटा साझाकरण पर पूर्ण प्रतिबंध लगता है, तो मेटा का 'टारगेटेड एडवरटाइजिंग' मॉडल भारत में विफल हो सकता है।
- प्रतिष्ठा की हानि: "चोरी" जैसी टिप्पणियों से ब्रांड वैल्यू पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
निजता और डेटा पर संवैधानिक प्रावधान
- अनुच्छेद 21: पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ (2017) मामले के बाद, निजता का अधिकार अनुच्छेद 21 के तहत एक 'मौलिक अधिकार' है।
- अनुच्छेद 14 और 19: डेटा साझा करने की अनिवार्य शर्तें समानता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अप्रत्यक्ष उल्लंघन के रूप में देखी जा रही हैं।
- डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम (DPDP Act, 2023): यह कानून डेटा के उद्देश्यपूर्ण उपयोग और उपयोगकर्ता की स्पष्ट सहमति पर जोर देता है।
विश्लेषण
यह विवाद "डेटा उपनिवेशवाद" की आधुनिक समस्या को दर्शाता है। व्हाट्सएप ने अपनी बाजार प्रधानता का उपयोग करके एक ऐसी स्थिति पैदा कर दी है जहाँ उपयोगकर्ता सेवाओं पर निर्भर है, और इसी निर्भरता का उपयोग उसे अपनी निजता से समझौता करने के लिए मजबूर करने में किया जा रहा है। कोर्ट का 'शेर और मेमने' वाला उदाहरण "असमान सौदेबाजी की शक्ति" को रेखांकित करता है।
आगे की राह
- सरल भाषा में शर्तें: कंपनियों को 'कानूनी जटिलता' के बजाय सरल क्षेत्रीय भाषाओं में अपनी नीतियां स्पष्ट करनी चाहिए।
- CCI की सशक्त भूमिका: प्रतिस्पर्धा आयोग को यह सुनिश्चित करना होगा कि डेटा शेयरिंग से बाजार में प्रतिस्पर्धा खत्म न हो।
- तकनीकी समाधान: 'ऑप्ट-आउट' विकल्प को मोबाइल स्क्रीन पर स्पष्ट और सुलभ बनाया जाना चाहिए, न कि अखबार के विज्ञापनों तक सीमित।
- शपथ पत्र: कोर्ट के निर्देशानुसार प्रबंधन को एक विश्वसनीय वचन देना होगा कि डेटा का उपयोग केवल मैसेजिंग सेवाओं के लिए होगा, न कि व्यावसायिक व्यापार के लिए।
निष्कर्ष
डिजिटल युग में डेटा ही नई मुद्रा है, लेकिन इसकी कीमत नागरिकों की निजता नहीं हो सकती। सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख यह सुनिश्चित करता है कि भारत एक 'डेटा मंडी' मात्र नहीं है, बल्कि एक जीवंत लोकतंत्र है जहाँ संवैधानिक मूल्यों की रक्षा तकनीकी उन्नति से अधिक महत्वपूर्ण है। मेटा और व्हाट्सएप के लिए अब अपनी नीतियों को 'भारत-केंद्रित' और 'निजता-हितैषी' बनाना अनिवार्य हो गया है।