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सामान्य अध्ययन पेपर – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध
संदर्भ
जनवरी 2026 में संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान (MbZ) की संक्षिप्त किंतु ऐतिहासिक भारत यात्रा ने दोनों देशों के संबंधों को एक नई ऊंचाई पर पहुँचा दिया है। इस यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम भारत और यूएई के बीच 'सामरिक रक्षा साझेदारी' के लिए एक रूपरेखा समझौते की घोषणा है। यह समझौता ऐसे समय में हुआ है जब खाड़ी क्षेत्र अभूतपूर्व सुरक्षा और राजनीतिक परिवर्तनों से गुजर रहा है।
भारत-यूएई आर्थिक संबंधों की वर्तमान स्थिति
रक्षा समझौतों से परे, यूएई भारत का एक अपरिहार्य साझेदार बना हुआ है:
- व्यापार: यूएई भारत का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार और दूसरा सबसे बड़ा निर्यात गंतव्य है।
- निवेश: भारत में सातवां सबसे बड़ा विदेशी निवेशक।
- नवीन समझौते: द्विपक्षीय व्यापार को $200 बिलियन तक ले जाने का लक्ष्य और $3 बिलियन का महत्वपूर्ण LNG (तरलीकृत प्राकृतिक गैस) समझौता।
खाड़ी क्षेत्र में बदलती भू-राजनीति
लेख के अनुसार, खाड़ी क्षेत्र इस समय कई जटिलताओं का सामना कर रहा है, जिसे भारत को ध्यान में रखना होगा:
- नया शीत युद्ध: यूएई और सऊदी अरब के बीच बढ़ता शक्ति संघर्ष, विशेष रूप से सूडान संकट और क्षेत्रीय वर्चस्व को लेकर।
- नए सैन्य गठबंधन: इजरायल द्वारा कतर में की गई बमबारी (सितंबर 2025) के बाद संवर्धित सऊदी-पाकिस्तान रक्षा संधि और इसमें तुर्की के शामिल होने की संभावना ने क्षेत्र में एक नया सैन्य ध्रुवीकरण पैदा कर दिया है।
- अस्थिरता के केंद्र: ईरान में आंतरिक विरोध प्रदर्शन, गाजा में अनिश्चित युद्धविराम और अमेरिका की भावी 'बोर्ड ऑफ पीस' योजना।
सामरिक रक्षा साझेदारी:
भारत और यूएई के बीच प्रस्तावित रक्षा संधि के दूरगामी निहितार्थ हैं:
- सामरिक महत्व: यह पहली बार है जब भारत किसी खाड़ी देश के साथ इस स्तर की औपचारिक रक्षा साझेदारी कर रहा है।
- चिंताएं: इस गठबंधन को क्षेत्र के अन्य प्रतिस्पर्धी समूहों (जैसे सऊदी-पाकिस्तान-तुर्की) के विरुद्ध एक सैन्य मोर्चे के रूप में देखा जा सकता है।
- भारत का स्पष्टीकरण: भारतीय विदेश सचिव ने स्पष्ट किया है कि यह संधि किसी भविष्य के काल्पनिक सैन्य परिदृश्य में भारत की भागीदारी के लिए नहीं है, बल्कि द्विपक्षीय सुरक्षा सहयोग के लिए है।
भारत के लिए दांव पर क्या है?
भारत की विदेश नीति के लिए खाड़ी क्षेत्र का महत्व निम्नलिखित कारणों से सर्वोपरि है:
- प्रवासी सुरक्षा: लगभग 1 करोड़ भारतीय खाड़ी देशों में निवास करते हैं। वहां की अस्थिरता का सीधा प्रभाव उनके रोजगार और सुरक्षा पर पड़ता है।
- ऊर्जा सुरक्षा: पश्चिमी प्रतिबंधों के कारण रूस और अन्य स्रोतों से आपूर्ति बाधित होने की स्थिति में, GCC (खाड़ी सहयोग परिषद) क्षेत्र भारत की ऊर्जा जरूरतों का मुख्य आधार है।
- कनेक्टिविटी परियोजनाएं: चाबहार पोर्ट, INSTC और IMEC (भारत-मध्य पूर्व-यूरोप गलियारा) जैसी महत्वाकांक्षी परियोजनाओं की सफलता पूरी तरह से क्षेत्रीय शांति और सभी हितधारकों के सहयोग पर टिकी है।
विश्लेषण
भारत के लिए यह 'रणनीतिक संतुलन' की परीक्षा है। यूएई के साथ रक्षा संबंध बढ़ाना भारत के समुद्री सुरक्षा और रक्षा निर्यात (जैसे ब्रह्मोस, ध्रुव हेलिकॉप्टर) के लिए लाभकारी है, लेकिन इसे इस तरह से संतुलित करना होगा कि सऊदी अरब या ईरान जैसे अन्य महत्वपूर्ण साझेदार इसे अपने विरुद्ध न समझें। भारत की नीति 'गुट-निरपेक्षता' से बढ़कर अब 'बहु-संरेखण' की ओर है।
आगे की राह
- सतर्क कूटनीति: भारत को खाड़ी के आंतरिक मतभेदों (जैसे MbZ बनाम MbS) में पक्ष लेने से बचना चाहिए।
- बहुपक्षीय जुड़ाव: रक्षा सहयोग को केवल सुरक्षा तक सीमित न रखकर इसे आपदा प्रबंधन, समुद्री डकैती रोधी अभियानों और तकनीकी हस्तांतरण पर केंद्रित करना चाहिए।
- स्थानीय विवादों का समाधान: भारत को अपनी सौम्य शक्ति का उपयोग कर क्षेत्र में शांति के लिए एक 'मध्यस्थ' या 'स्थिरता कारक' के रूप में उभरना चाहिए।
निष्कर्ष
खाड़ी क्षेत्र की जटिल और अस्थिर सुरक्षा व्यवस्था के बीच भारत और यूएई की रक्षा साझेदारी एक साहसिक कदम है। हालांकि, भारत को अपनी आर्थिक आकांक्षाओं और ऊर्जा सुरक्षा को सुरक्षित रखने के लिए इस क्षेत्र की 'फाल्टलाइन्स' पर अत्यंत सावधानी से चलना होगा। भारत की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह कैसे अपनी सामरिक स्वायत्तता बनाए रखते हुए सभी प्रतिस्पर्धी शक्तियों के साथ समान दूरी और समान मित्रता का संतुलन साधता है।
खबर
दो दशकों की लंबी बातचीत के बाद, यह संधि 17 जनवरी, 2026 को अंतर्राष्ट्रीय कानून बन गई है। सितंबर 2025 में 60 देशों द्वारा इसकी पुष्टि किए जाने के बाद 120 दिनों का काउंटडाउन शुरू हुआ था, जो अब पूरा हो चुका है।
'हाई सी' क्या है?
- परिभाषा: किसी भी देश के तट से 200 समुद्री मील (EEZ) के बाद का विशाल समुद्री क्षेत्र 'हाई सी' कहलाता है।
- विस्तार: यह दुनिया के कुल महासागरों का लगभग दो-तिहाई (2/3) हिस्सा है।
- महत्व: अब तक यह क्षेत्र "नो-मैन्स लैंड" की तरह था, जहाँ नियम बहुत कम थे। यहाँ कोई भी देश मछली पकड़ सकता था या खनन कर सकता था।
संधि के मुख्य उद्देश्य और प्रावधान
इस संधि के चार मुख्य स्तंभ हैं:
- समुद्री संरक्षित क्षेत्र (MPAs): 2030 तक दुनिया के 30% महासागरों को सुरक्षित करने का लक्ष्य । इसके तहत हाई सी में ऐसे क्षेत्र बनाए जाएंगे जहाँ मछली पकड़ना या खनन करना प्रतिबंधित होगा।
- पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA): अब किसी भी व्यावसायिक गतिविधि (जैसे गहरे समुद्र में खनन) से पहले यह जांचना अनिवार्य होगा कि इससे पर्यावरण को क्या नुकसान होगा।
- समुद्री आनुवंशिक संसाधन (MGRs): समुद्र की गहराई में मिलने वाले जीवों के डीएनए से बनने वाली दवाओं या कॉस्मेटिक्स से होने वाले लाभ को अमीर और गरीब देशों के बीच समान रूप से साझा किया जाएगा।
- क्षमता निर्माण और तकनीक: विकसित देश विकासशील देशों को समुद्री तकनीक और अनुसंधान में मदद करेंगे।
इसकी आवश्यकता क्यों पड़ी?
- अत्यधिक मछली पकड़ना: बिना नियमों के समुद्री प्रजातियां खत्म हो रही थीं।
- प्रदूषण: प्लास्टिक और रसायनों का बढ़ता ढेर।
- जलवायु परिवर्तन: समुद्र का बढ़ता तापमान और अम्लीकरण।
चुनौतियाँ और भारत की स्थिति
- चुनौतियां: संधि को लागू करना कठिन है क्योंकि समुद्र बहुत विशाल है और इसकी निगरानी के लिए एक मजबूत अंतर्राष्ट्रीय एजेंसी की कमी है।
- भारत: भारत ने इस संधि पर हस्ताक्षर कर दिए हैं, जो समुद्री संसाधनों के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। हालांकि, पूर्ण क्रियान्वयन के लिए सभी प्रमुख देशों (जैसे अमेरिका, चीन) का सहयोग अनिवार्य होगा।
निष्कर्ष: यह संधि महासागरों के लिए "संविधान" की तरह है। यह सुनिश्चित करती है कि समुद्र केवल शोषण का जरिया न रहकर आने वाली पीढ़ियों के लिए भी सुरक्षित रहे।
सामान्य अध्ययन पेपर – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध
भूमिका
यमन, जिसे ऐतिहासिक रूप से 'अरब का खुशहाल देश' (अरबिया फेलिक्स) कहा जाता था, आज वैश्विक राजनीति के सबसे दुखद अध्याय में बदल गया है। दशक भर से जारी गृहयुद्ध ने न केवल यमन को तबाह किया है, बल्कि फारस की खाड़ी की दो प्रमुख शक्तियों सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के बीच रणनीतिक मतभेदों को भी सतह पर ला दिया है। 2026 की शुरुआत में हुए सैन्य और कूटनीतिक घटनाक्रमों ने इस संकट को एक नया और अधिक जटिल मोड़ दे दिया है।
घटनाक्रम का केंद्र: दक्षिण यमन में सैन्य संघर्ष
दिसंबर 2025 के अंत में यमन में एक नया आंतरिक मोर्च खुल गया, जब यूएई समर्थित सदर्न ट्रांजिशनल काउंसिल (एसटीसी ) ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार के खिलाफ विद्रोह कर दिया:
- सामरिक क्षेत्रों पर नियंत्रण: एसटीसी ने तेल और संसाधनों से संपन्न 'हधरामौत' और 'अल-महारा' प्रांतों पर अधिकार कर लिया।
- सऊदी सैन्य हस्तक्षेप: रियाद ने इसे यमन की अखंडता पर हमला माना। सऊदी वायुसेना के हस्तक्षेप और कूटनीतिक दबाव के बाद 7 जनवरी 2026 तक सरकारी सेनाओं ने अदन में पुनः प्रवेश किया और विद्रोह को नियंत्रित किया।
सऊदी अरब बनाम यूएई: कूटनीतिक गतिरोध
यमन युद्ध के शुरुआती दौर के सहयोगी अब विपरीत ध्रुवों पर खड़े हैं:
- विरोधाभासी रणनीतिक लक्ष्य: सऊदी अरब एक एकीकृत यमन का पक्षधर है ताकि उसकी दक्षिणी सीमा ईरान समर्थित हौथी विद्रोहियों से सुरक्षित रहे। इसके विपरीत, यूएई का झुकाव दक्षिण यमन के अलगाववादियों की ओर रहा है, ताकि वह बाब-अल-मंडेब जलडमरूमध्य और प्रमुख समुद्री मार्गों पर अपना प्रभाव सुरक्षित रख सके।
- हथियारों का विवाद: सऊदी अरब द्वारा मुकल्ला बंदरगाह पर हथियारों की खेप को निशाना बनाना और यूएई पर विद्रोहियों को हथियार देने का आरोप लगाना, दोनों देशों के बीच "ट्रस्ट डेफिसिट" (विश्वास की कमी) को दर्शाता है।
रियाद घोषणापत्र और एसटीसी का भविष्य
जनवरी 2026 के प्रथम सप्ताह में रियाद में आयोजित उच्चस्तरीय वार्ता के बाद एक महत्वपूर्ण बदलाव आया:
- विघटन और पलायन: सऊदी दबाव के तहत एसटीसी ने स्वयं को भंग करने की घोषणा की और इसके प्रमुख नेता ऐदरस अल-जुबैदी के अबू धाबी पलायन ने इस विद्रोह को कमजोर कर दिया है। हालांकि, स्थानीय समूहों के बीच असंतोष अभी भी बना हुआ है।
यमन संकट और भारत: सामरिक एवं आर्थिक हित
यमन की स्थिरता सीधे तौर पर भारत के राष्ट्रीय हितों को प्रभावित करती है:
- ऊर्जा सुरक्षा: भारत का कच्चा तेल और LNG आयात इसी क्षेत्र के समुद्री मार्गों से गुजरता है। लाल सागर में असुरक्षा का अर्थ है माल ढुलाई की लागत में वृद्धि और ऊर्जा संकट।
- प्रवासी सुरक्षा: सऊदी अरब और यूएई जैसे पड़ोसी देशों में करीब 90 लाख भारतीय कार्यरत हैं। इस क्षेत्र में बढ़ता तनाव भारत के लिए रेमिटेंस और प्रवासी सुरक्षा की दृष्टि से संवेदनशील है।
- आतंकवाद और समुद्री डकैती: यमन की अस्थिरता अल-कायदा (AQAP) और अन्य उग्रवादी समूहों को फलने-फूलने का मौका देती है, जो हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में भारत की सुरक्षा के लिए खतरा हैं।
भारत की कूटनीतिक स्थिति
भारत ने हमेशा एक संतुलित और "प्रिंसिपल्ड" (सैद्धांतिक) रुख अपनाया है:
- भारत यमन की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता का पूर्ण समर्थन करता है।
- भारत के सऊदी अरब और यूएई दोनों के साथ 'रणनीतिक साझेदारी' है, इसलिए भारत किसी एक का पक्ष लेने के बजाय क्षेत्रीय स्थिरता को प्राथमिकता देता है।
- भारत का मानना है कि समाधान 'यमन के नेतृत्व वाली' और 'समावेशी राजनीतिक प्रक्रिया' से ही संभव है।
मानवीय संकट: एक भयावह वास्तविकता
राजनीतिक शतरंज के बीच यमन की जनता सबसे बड़ी पीड़ित है:
- मानवीय सांख्यिकी: देश की 80% आबादी (लगभग 2.4 करोड़ लोग) मानवीय सहायता पर निर्भर है।
- आर्थिक पतन: बुनियादी ढांचा ध्वस्त हो चुका है और भीषण मुद्रास्फीति ने भोजन को आम जनता की पहुंच से बाहर कर दिया है।
विश्लेषण: भारत के लिए चुनौतियां और अवसर
यह संकट भारत की 'वेस्ट एशिया पॉलिसी' की परीक्षा है। भारत भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC) जैसे महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहा है, जिसके सफल कार्यान्वयन के लिए इस क्षेत्र में शांति अनिवार्य है। सऊदी-यूएई प्रतिद्वंद्विता भारत के लिए कूटनीतिक संतुलन बनाना कठिन बना सकती है।
आगे की राह
- समुद्री सुरक्षा: भारत को 'नेवल डिप्लोमेसी' के माध्यम से लाल सागर में सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए बहुपक्षीय सहयोग बढ़ाना चाहिए।
- मानवीय नेतृत्व: भारत को 'ग्लोबल साउथ' के नेता के रूप में यमन को बड़े पैमाने पर चिकित्सा और खाद्य सहायता भेजनी चाहिए।
- ब्रिक्स की भूमिका: चूंकि सऊदी अरब और यूएई अब ब्रिक्स के सदस्य हैं, भारत को 2026 की मेजबानी के दौरान इस मंच का उपयोग कर दोनों देशों के बीच मतभेदों को कम करने का प्रयास करना चाहिए।
निष्कर्ष
यमन का संकट अब केवल एक आंतरिक संघर्ष नहीं, बल्कि पश्चिम एशिया के भू-राजनीतिक वर्चस्व की प्रयोगशाला बन गया है। भारत के लिए इस क्षेत्र में शांति का अर्थ है सुरक्षित नागरिक और स्थिर अर्थव्यवस्था। 2026 में ब्रिक्स की मेजबानी करते हुए भारत को अपनी कूटनीतिक क्षमता का उपयोग यमन को "विफल राष्ट्र" बनने से बचाने और क्षेत्रीय शक्तियों के बीच सेतु के रूप में कार्य करने में करना होगा।
सामान्य अध्ययन पेपर – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध
संदर्भ
ऐतिहासिक रूप से, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से वैश्विक व्यापार पर 'ब्रेटन वुड्स' प्रणाली और अमेरिकी डॉलर का वर्चस्व रहा है। हालांकि, हाल के वर्षों में भू-राजनीतिक अस्थिरता, प्रतिबंधों का हथियार के रूप में उपयोग (जैसे रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद ‘SWIFT’ से रूस को हटाना और अमेरिकी फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीतियों के कारण विकासशील देशों में 'डी-डॉलराइज़ेशन की आवश्यकता महसूस की गई है। इसी पृष्ठभूमि में, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने ब्रिक्स देशों के बीच अपनी डिजिटल मुद्राओं (CBDCs) को जोड़ने का प्रस्ताव दिया है, जो न केवल तकनीकी प्रगति है बल्कि एक रणनीतिक कदम भी है।
ब्रिक्स क्या है?
ब्रिक्स दुनिया की उभरती हुई प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं का एक समूह है।
- स्थापना: 2009 (दक्षिण अफ्रीका 2010 में शामिल हुआ)।
- मूल सदस्य: ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका।
- विस्तार (ब्रिक्स +): हाल ही में इसमें संयुक्त अरब अमीरात (UAE), ईरान, मिस्र और इथियोपिया जैसे देशों को शामिल किया गया है, जबकि इंडोनेशिया जैसे देश भी इसके करीब हैं।
- महत्व: यह वैश्विक जनसंख्या का लगभग 45% और वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का 28% से अधिक प्रतिनिधित्व करता है।
चर्चा में क्यों?
- हालिया रिपोर्टों के अनुसार, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने भारत सरकार को सिफारिश की है कि 2026 के ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में सदस्य देशों की 'सेंट्रल बैंक डिजिटल मुद्राओं' (CBDCs) को आपस में जोड़ने का प्रस्ताव एजेंडे में शामिल किया जाए।
- यह पहली बार है जब भारत ने आधिकारिक तौर पर इस प्रकार के बहुपक्षीय डिजिटल भुगतान तंत्र का सुझाव दिया है, जिसका उद्देश्य सीमा पार व्यापार और पर्यटन को सुगम बनाना है।
इसकी आवश्यकता क्यों?
- लेनदेन लागत में कमी: वर्तमान में क्रॉस-बॉर्डर भुगतान में कई मध्यस्थ बैंक शामिल होते हैं, जिससे लागत और समय दोनों बढ़ते हैं। CBDC इसे सीधे और सस्ता बनाएगा।
- डॉलर पर निर्भरता कम करना: डॉलर की विनिमय दर में उतार-चढ़ाव विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था को अस्थिर करता है। स्थानीय मुद्रा लिंकेज इससे सुरक्षा प्रदान करेगा।
- वित्तीय संप्रभुता: प्रतिबंधों के डर के बिना स्वतंत्र भुगतान तंत्र विकसित करना।
- पर्यटन को बढ़ावा: पर्यटकों के लिए मुद्रा विनिमय की जटिलता को खत्म करना।
प्रभाव
- आर्थिक प्रभाव: यदि सफल रहा, तो यह एक "समानांतर वैश्विक भुगतान प्रणाली" का निर्माण करेगा। व्यापारिक निपटान वास्तविक समय में हो सकेगा।
- रणनीतिक प्रभाव: भारत की 'डिजिटल रुपया' को वैश्विक स्वीकार्यता मिलेगी, जिससे भारत की 'सॉफ्ट पावर' और वित्तीय कूटनीति मजबूत होगी।
- बाजार गतिशीलता: यह स्थिर सिक्कों और अनियंत्रित क्रिप्टोकरेंसी के जोखिमों को कम कर सकता है, क्योंकि इसे केंद्रीय बैंकों का समर्थन प्राप्त होगा।
प्रमुख चुनौतियां और अमेरिका का रुख
- अमेरिकी प्रतिक्रिया: अमेरिका इसे अपनी आर्थिक हेजेमनी के लिए खतरा मानता है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसे "अमेरिका विरोधी" करार दिया है और ऐसे देशों पर भारी टैरिफ लगाने की चेतावनी दी है जो डॉलर को छोड़ने का प्रयास करेंगे।
- तकनीकी बाधा: विभिन्न देशों के CBDC प्लेटफॉर्म्स की तकनीक अलग-अलग है। उन्हें एक साझा नेटवर्क पर लाना कठिन है।
- विश्वास की कमी: चीन और भारत या रूस और भारत के बीच व्यापार असंतुलन एक बड़ी बाधा है। रूस के पास जमा भारतीय रुपये का उदाहरण यह दर्शाता है कि मुद्रा अधिशेष का प्रबंधन करना जटिल है।
ब्रिक्स 2026:
- भारत 2026 के ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी करने जा रहा है। यह शिखर सम्मेलन इस वर्ष के अंत में आयोजित होगा।
- भारत के लिए यह एक बड़ा अवसर है कि वह ग्लोबल साउथ के नेता के रूप में उभरे और डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे (DPI) के अपने सफल मॉडल को दुनिया के सामने पेश करे।
ब्रिक्स मुद्रा और पायलट प्रोजेक्ट
वर्तमान में कोई साझा "ब्रिक्स मुद्रा" अस्तित्व में नहीं है, लेकिन सभी पांच मुख्य सदस्य अपने-अपने CBDC के पायलट प्रोजेक्ट चला रहे हैं।
- भारत का e-Rupee, चीन का e-CNY, और रूस का डिजिटल रूबल परीक्षण के उन्नत चरणों में हैं।
- चर्चा अब एक नई मुद्रा बनाने की नहीं, बल्कि इन मौजूदा डिजिटल मुद्राओं को 'ब्रिज' के माध्यम से जोड़ने की है।
वैश्विक विश्लेषण
- विश्व स्तर पर, 'प्रोजेक्ट एमब्रिज' जैसी पहल पहले से ही चीन, यूएई और थाईलैंड के बीच चल रही है।
- यूरोप और अमेरिका भी अपनी डिजिटल मुद्रा पर काम कर रहे हैं।
- ब्रिक्स का यह कदम वैश्विक वित्त के "लोकतांत्रितकरण" की दिशा में एक प्रयास है, जो पश्चिमी प्रभुत्व वाले SWIFT तंत्र को चुनौती दे सकता है।
विश्लेषण
यह प्रस्ताव भारत की संतुलित विदेश नीति का परिचायक है। एक ओर भारत 'क्वाड' के माध्यम से अमेरिका के साथ है, वहीं दूसरी ओर ब्रिक्स के माध्यम से वह डॉलर के प्रभुत्व को तर्कसंगत चुनौती दे रहा है। हालांकि, भारत ने स्पष्ट किया है कि उसका उद्देश्य 'डी-डॉलराइज़ेशन नहीं, बल्कि 'रुपये का अंतर्राष्ट्रीयकरण' है।
आगे की राह
- तकनीकी मानक: सदस्य देशों को एक सामान्य 'प्रोटोकॉल' और डेटा सुरक्षा मानकों पर सहमत होना होगा।
- द्विपक्षीय स्वैप व्यवस्था: व्यापार असंतुलन को दूर करने के लिए केंद्रीय बैंकों के बीच 'करेंसी स्वैप' समझौते मजबूत करने होंगे।
- क्रमिक कार्यान्वयन: पहले पर्यटन और छोटे व्यापार से शुरुआत कर धीरे-धीरे बड़े व्यापारिक निपटान की ओर बढ़ना चाहिए।
निष्कर्ष
भारतीय रिजर्व बैंक का CBDC लिंकेज का प्रस्ताव वैश्विक वित्तीय ढांचे में एक क्रांतिकारी कदम साबित हो सकता है। यह न केवल व्यापार को आसान बनाएगा, बल्कि भविष्य के आर्थिक झटकों के खिलाफ एक सुरक्षा कवच भी प्रदान करेगा। 2026 का भारत शिखर सम्मेलन इस दिशा में निर्णायक साबित होगा, बशर्ते सदस्य देश राजनीतिक मतभेदों को पीछे छोड़कर तकनीकी और आर्थिक सहयोग को प्राथमिकता दें।
सामान्य अध्ययन पेपर – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध
भूमिका
जनवरी 2026 में संयुक्त अरब अमीरात के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान की नई दिल्ली यात्रा ने भारत की 'पश्चिम एशिया नीति' को एक नई गति प्रदान की है। एक ओर जहाँ वैश्विक व्यापारिक संबंधों में 'संरक्षणवाद' और 'टैरिफ युद्ध' का प्रभाव बढ़ रहा है, वहीं दूसरी ओर भारत और यूएई ने अपने द्विपक्षीय व्यापार को वर्ष 2032 तक दोगुना कर 200 अरब डॉलर करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है।
ऊर्जा सुरक्षा: LNG समझौता और ADNOC-HPCL साझेदारी
इस यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम 3 अरब डॉलर का 'तरलीकृत प्राकृतिक गैस' (LNG) आपूर्ति समझौता है:
- दीर्घकालिक स्थिरता: अबू धाबी की सरकारी तेल कंपनी (ADNOC) और भारत की हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन (HPCL) के बीच 10 वर्ष का समझौता हुआ है, जो 2028 से प्रभावी होगा।
- भारत का प्रभुत्व: इस सौदे के साथ भारत, यूएई की LNG का सबसे बड़ा वैश्विक ग्राहक बन जाएगा, जो 2029 तक यूएई की कुल LNG बिक्री का 20% साझा करेगा।
- रणनीतिक महत्व: यह समझौता भारत की ऊर्जा टोकरी में विविधता लाने और जीवाश्म ईंधन से स्वच्छ ऊर्जा की ओर संक्रमण के लक्ष्य के अनुकूल है।
व्यापारिक विविधीकरण: अमेरिका बनाम वैकल्पिक मार्ग
भारत की कूटनीति में यह बदलाव एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है:
- अमेरिकी टैरिफ का प्रभाव: अमेरिका द्वारा भारतीय निर्यातों पर लगाए गए दंडात्मक टैरिफ और एक व्यापक व्यापार समझौते की अनिश्चितता ने भारत को वैकल्पिक बाजारों की खोज के लिए प्रेरित किया है।
- बहु-आयामी साझेदारी: भारत ने केवल यूएई ही नहीं, बल्कि ब्रिटेन, ओमान और न्यूजीलैंड के साथ भी व्यापारिक समझौतों (FTAs/CEPA) के माध्यम से अपनी वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को सुरक्षित करने का प्रयास किया है।
भू-राजनीतिक विश्लेषण
यह समझौता भारत के लिए केवल आर्थिक लाभ तक सीमित नहीं है, इसके कई सामरिक आयाम हैं:
- सामरिक स्वायत्तता: महाशक्तियों (अमेरिका-चीन) के बीच बढ़ते तनाव के बीच भारत मध्य-पूर्व की शक्तियों के साथ सीधे और सुदृढ़ संबंध स्थापित कर अपनी कूटनीतिक स्वायत्तता को पुख्ता कर रहा है।
- लघु-पक्षीय कूटनीति: भारत-यूएई के मजबूत संबंध I2U2 (भारत, इजरायल, अमेरिका, यूएई) और भारत-मध्य पूर्व-यूरोप गलियारा (IMEC) जैसे समूहों की सफलता के लिए आधारभूत स्तंभ हैं।
- प्रवासी हित और प्रेषण: यूएई में रहने वाले 35 लाख भारतीयों के आर्थिक हितों और भारत की विदेशी मुद्रा प्राप्ति के लिए यह स्थिरता अनिवार्य है।
चुनौतियाँ और सीमाएँ
- क्षेत्रीय अस्थिरता: यमन संकट और लाल सागर में तनाव जैसे मुद्दे अभी भी व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा के लिए चुनौती बने हुए हैं।
- प्रतिस्पर्धा: खाड़ी के अन्य देश (जैसे सऊदी अरब) भी भारत के साथ ऊर्जा क्षेत्र में बड़े निवेश के लिए प्रयासरत हैं, जिससे भारत को एक जटिल संतुलन साधना होगा।
निष्कर्ष
भारत और यूएई के बीच 'नियमित उच्च-स्तरीय संवाद' अब एक नई सामान्य स्थिति बन चुकी है। यह दर्शाता है कि भारत की विदेश नीति अब केवल 'प्रतिक्रियात्मक' नहीं बल्कि 'सक्रिय' और 'परिणाम-उन्मुख' है। 200 अरब डॉलर के व्यापार लक्ष्य की प्राप्ति के लिए दोनों देशों को गैर-तेल व्यापार, डिजिटल भुगतान और रक्षा विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में भी सहयोग को और गहरा करना होगा।
सामान्य अध्ययन पेपर – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध
भूमिका:
वर्ष 2026 भारतीय कूटनीति के लिए एक युगांतरकारी वर्ष है। 26 जनवरी को 'कर्तव्य पथ' पर यूरोपीय संघ (EU) के संस्थागत नेतृत्व को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित करना इस बात का उद्घोष है कि भारत अब पारंपरिक द्विपक्षीय सीमाओं को तोड़कर 'डिप्लोमैटिक व्हाइट स्पेसेस' (कूटनीतिक रिक्त स्थान) को भरने के लिए तैयार है। यह एक ऐसी रणनीति है जहाँ भारत 'बहु-संरेखण' के माध्यम से एक विभाजित दुनिया में अपनी स्थिति सुदृढ़ कर रहा है।
सहयोगवाद से वर्चस्ववाद: बदलता वैश्विक परिदृश्य
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की 'नियम-आधारित व्यवस्था' अब पतन की ओर है। वैश्विक राजनीति 'सहयोग' से हटकर पुनः 'वर्चस्व' और 'संरक्षणवाद' की ओर मुड़ गई है।
- अमेरिका की टैरिफ कूटनीति: अमेरिका अब आर्थिक शक्ति को एक हथियार की तरह उपयोग कर रहा है। डॉलर के विकल्प की तलाश करने वाले देशों पर 'टैरिफ' की धमकी और वेनेजुएला व ईरान जैसे देशों पर कठोर प्रतिबंधों ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को बाधित किया है।
- चीन का विस्तारवाद: चीन की 'वुल्फ वारियर' कूटनीति और बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के माध्यम से ऋण-जाल कूटनीति ने छोटे देशों की संप्रभुता के लिए खतरा पैदा कर दिया है।
बहुपक्षीय मंचों का संकट
संयुक्त राष्ट्र (UN) और विश्व व्यापार संगठन (WTO) जैसे विशाल मंच वर्तमान में अपनी प्रासंगिकता खोते नजर आ रहे हैं:
- यूक्रेन और गाजा संकट में UN सुरक्षा परिषद की विफलता ने यह सिद्ध कर दिया है कि ये मंच महाशक्तियों के 'वीटो' की राजनीति के बंधक हैं।
- जब बड़े मंच विफल होते हैं, तब भारत के लिए सफलता की संभावना 'लघु मंचों' में निहित होती है।
'डिप्लोमैटिक व्हाइट स्पेसेस' और लघु मंचों की रणनीति
'व्हाइट स्पेसेस' वे क्षेत्र हैं जहाँ कोई नियम स्पष्ट नहीं हैं (जैसे- AI नैतिकता, डेटा संप्रभुता, अंतरिक्ष कूटनीति)। भारत इन रिक्त स्थानों को भरने के लिए 'स्मॉल टेबल्स' का उपयोग कर रहा है:
- I2U2, क्वाड, और इंडिया -यूरोपियन यूनियन: ये मंच भारत को निर्णय लेने में स्वायत्तता और गति प्रदान करते हैं।
- चाबहार और आईएम्ईसी: ईरान के चाबहार बंदरगाह और 'भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा' (IMEC) के माध्यम से भारत अमेरिका-चीन के द्वंद्व के बीच अपना स्वतंत्र व्यापारिक मार्ग प्रशस्त कर रहा है, भले ही उसे अमेरिकी प्रतिबंधों (CAATSA) की चुनौतियों का सामना करना पड़े।
चीन और रूस के साथ संतुलन का समीकरण
भारत की विदेश नीति 'शून्य-संचय खेल' नहीं है:
- आरआईसी (रूस-भारत-चीन) बनाम क्वाड: भारत एक ओर रूस के साथ अपनी 'विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त' साझेदारी को बनाए हुए है, वहीं दूसरी ओर चीन को हिंद महासागर में प्रतिसंतुलित करने के लिए अमेरिका के साथ 'क्वाड' में सक्रिय है।
- आर्कटिक और ग्रीनलैंड: ग्रीनलैंड के संसाधनों पर अमेरिका-चीन की नज़र के बीच भारत अपनी 'आर्कटिक नीति' के माध्यम से भविष्य की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित कर रहा है।
वर्चस्ववाद के बीच भारत: 'विश्व मित्र' और 'ब्रिजिंग पावर'
भारत स्वयं को एक 'समाधान प्रदाता' के रूप में पेश कर रहा है:
- ब्रिक्स में संतुलन: रूस और चीन ब्रिक्स को 'पश्चिम-विरोधी' बनाना चाहते हैं, लेकिन भारत इसे 'गैर-पश्चिम' रखते हुए ग्लोबल साउथ की आवाज बना रहा है।
- आर्थिक संप्रभुता: अमेरिकी टैरिफ और डॉलर के वर्चस्व से बचने के लिए भारत अपनी डिजिटल मुद्रा और 'स्थानीय मुद्रा व्यापार' (LCT) को बढ़ावा दे रहा है।
आगे की राह
भारत के लिए आगामी समय 'रणनीतिक स्वायत्तता' की कठोर परीक्षा का होगा:
- संस्थागत क्षमता: लघु मंचों पर प्रभावी नेतृत्व के लिए भारत को अपने राजनयिक कोर और तकनीकी विशेषज्ञों की संख्या बढ़ानी होगी।
- आर्थिक आत्मनिर्भरता: टैरिफ युद्ध के इस युग में 'आत्मनिर्भर भारत' केवल एक नारा नहीं बल्कि सुरक्षा की ढाल है।
- परिणाम-आधारित कूटनीति: भारत को केवल चर्चाओं तक सीमित न रहकर चाबहार और AI इम्पैक्ट समिट जैसे प्रोजेक्ट्स से ठोस परिणाम निकालने होंगे।
निष्कर्ष
2026 का भारत कूटनीति के पुराने ढर्रे को त्याग चुका है। वर्चस्ववाद की चक्की में पिसती दुनिया के लिए भारत एक 'ब्रिजिंग पावर' के रूप में उभरा है। 'कर्तव्य पथ' पर यूरोपीय संघ का स्वागत इस बात का प्रतीक है कि भारत अब वैश्विक मेज पर केवल एक प्रतिभागी नहीं, बल्कि उन नियमों का निर्माता बनने की दिशा में अग्रसर है, जो एक न्यायपूर्ण और बहु-ध्रुवीय विश्व व्यवस्था का निर्माण करेंगे।
सामान्य अध्ययन पेपर – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध
संदर्भ
हाल के हफ्तों में वैश्विक राजनीति में एक अभूतपूर्व अस्थिरता देखी गई है, जिसकी शुरुआत वेनेजुएला में अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की नाटकीय गिरफ्तारी से हुई। इस घटना के तुरंत बाद, ट्रंप प्रशासन ने अपने 'अमेरिका फर्स्ट' एजेंडे को विस्तार देते हुए डेनमार्क सहित आठ प्रमुख यूरोपीय देशों के विरुद्ध आर्थिक आक्रामकता का परिचय देते हुए 1 फरवरी 2026 से सभी आयातित वस्तुओं पर 10% टैरिफ लगाने की घोषणा की है, जिसे जून तक 25% तक बढ़ाया जा सकता है। इस दबाव का मुख्य उद्देश्य डेनमार्क के अधीन स्वायत्त क्षेत्र ग्रीनलैंड पर अमेरिकी नियंत्रण स्थापित करना है। यह कदम न केवल व्यापारिक युद्ध को जन्म दे रहा है, बल्कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बने पश्चिमी गठबंधन की नींव को भी हिला रहा है।
ग्रीनलैंड का रणनीतिक महत्व
ग्रीनलैंड केवल एक बर्फ से ढका द्वीप नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरे सामरिक हित छिपे हैं:
- संसाधन प्रचुरता: यहाँ दुर्लभ मृदा तत्व और खनिजों के विशाल भंडार हैं, जो आधुनिक तकनीक के लिए अनिवार्य हैं।
- आर्कटिक नियंत्रण: जलवायु परिवर्तन के कारण आर्कटिक बर्फ पिघल रही है, जिससे नए व्यापारिक मार्ग खुल रहे हैं। ग्रीनलैंड पर नियंत्रण अमेरिका को रूस और चीन के विरुद्ध इस क्षेत्र में बढ़त प्रदान करता है।
- सैन्य अवस्थिति: अमेरिका का 'थुले एयर बेस' यहीं स्थित है, जो उत्तर अमेरिकी रक्षा प्रणाली के लिए महत्वपूर्ण है।
प्रमुख मुद्दे और उल्लंघन
ट्रंप प्रशासन की इस 'बुलिंग टैक्टिक्स' से कई कानूनी और नैतिक प्रश्न उठते हैं:
- अंतर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन: किसी संप्रभु राष्ट्र (डेनमार्क) के क्षेत्र को आर्थिक दबाव के माध्यम से हथियाने का प्रयास संयुक्त राष्ट्र चार्टर और अंतर्राष्ट्रीय संप्रभुता के सिद्धांतों के विरुद्ध है।
- शक्ति का केंद्रीकरण: अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा 'इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट' का एकतरफा उपयोग, विधायी (कांग्रेस) समर्थन के बिना किया जा रहा है, जो लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करता है।
- नव-साम्राज्यवाद: वेनेजुएला के राष्ट्रपति के साथ हुए हालिया घटनाक्रम और अब यूरोप पर दबाव, अमेरिका की 'हस्तक्षेपवादी' विदेश नीति के पुनरुत्थान को दर्शाता है।
यूरोप की प्रतिक्रिया और 'एंटी-कोअर्शन इंस्ट्रूमेंट'
यूरोपीय संघ (EU) ने इस बार केवल मौखिक विरोध नहीं किया है, बल्कि ठोस जवाबी कार्रवाई की तैयारी की है:
- प्रति-टैरिफ: यूरोपीय संघ अमेरिकी टेक दिग्गजों (गूगल,एप्पल,मेटा आदि) पर कर लगाकर जवाबी वार कर सकता है।
- स्वायत्तता की रक्षा: फ्रांस और जर्मनी जैसे देशों का मानना है कि अमेरिका पर सुरक्षा के लिए निर्भरता कम कर 'यूरोपीय रणनीतिक स्वायत्तता' को बढ़ाना चाहिए।
वैश्विक सुरक्षा और नाटो पर प्रभाव
- नाटो में फूट: यदि अमेरिका और यूरोप के बीच व्यापारिक युद्ध बढ़ता है, तो नाटो की एकता खंडित होगी।
- रूस-यूक्रेन संघर्ष: नाटो में आंतरिक कलह का सीधा लाभ रूस को मिलेगा। यूक्रेन की सहायता और पूर्वी मोर्चे पर सैन्य शक्ति कमजोर होने से वैश्विक सुरक्षा संतुलन बिगड़ सकता है।
भारत पर संभावित प्रभाव
भारत के लिए यह स्थिति एक 'दोधारी तलवार' के समान है:
- व्यापारिक चुनौतियां: यदि अमेरिका सभी देशों पर टैरिफ बढ़ाता है, तो भारतीय निर्यात भी प्रभावित हो सकता है।
- रणनीतिक अवसर: पश्चिमी गुट में फूट पड़ने पर भारत के लिए अपनी 'बहु-संरेखण' नीति को मजबूत करने और यूरोप के साथ स्वतंत्र व्यापार समझौते (FTA) की गति बढ़ाने का अवसर होगा।
- आर्कटिक काउंसिल: भारत आर्कटिक काउंसिल का पर्यवेक्षक सदस्य है; यहाँ बढ़ता तनाव भारत के वैज्ञानिक अनुसंधान हितों को प्रभावित कर सकता है।
विश्लेषण
यह घटना 'लोकतांत्रिक शांति सिद्धांत' और 'उदारवादी अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था' के पतन की ओर संकेत करती है। 'अमेरिका फर्स्ट' की नीति अब 'अमेरिका अलोन' में बदलती दिख रही है, जो बहुपक्षवाद के लिए बड़ा खतरा है।
निष्कर्ष
वाशिंगटन की वर्तमान नीतियां प्रबुद्ध नेतृत्व के अभाव को दर्शाती हैं। ग्रीनलैंड को हथियाने के लिए आर्थिक हथियारों का उपयोग न केवल अटलांटिक के दोनों पार के संबंधों को दशकों पीछे धकेल देगा, बल्कि यह वैश्विक अर्थव्यवस्था में अस्थिरता का नया दौर शुरू करेगा। वर्तमान समय में सहयोग और कूटनीति की आवश्यकता है, न कि आर्थिक डराने-धमकाने की।
सामान्य अध्ययन पेपर – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध
संदर्भ:
अक्टूबर 2023 से शुरू हुआ इजरायल-हमास संघर्ष जनवरी 2026 तक आते-आते एक अत्यंत जटिल मोड़ पर पहुँच चुका है। यद्यपि तीन माह पूर्व एक अस्थिर युद्धविराम प्रभावी हुआ था, किंतु गज़ा में मानवीय संकट और छिटपुट हिंसा अभी भी जारी है। गज़ा की अवसंरचना पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है और करीब 20 लाख लोग बेघर हैं। इस अराजकता के बीच, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी 20-सूत्रीय शांति योजना के 'दूसरे चरण' की घोषणा की है, जिसका उद्देश्य गज़ा का प्रशासन एक अराजनीतिक 'तकनीकी समिति' (NCAG) को सौंपना और उसका पूर्ण पुनर्निर्माण करना है।
'बोर्ड ऑफ पीस' और चर्चा के मुख्य कारण
18 जनवरी 2026 को ट्रंप ने भारत सहित लगभग 60 देशों को इस 'बोर्ड ऑफ पीस' (BoP) में शामिल होने का निमंत्रण दिया। यह निकाय गज़ा के शासन और पुनर्निर्माण की निगरानी करेगा। यह वर्तमान में वैश्विक चर्चा का केंद्र है क्योंकि:
- समानांतर अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था: आलोचक इसे 'ट्रंप का अपना संयुक्त राष्ट्र' कह रहे हैं। यह बोर्ड संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) को दरकिनार कर सीधे वैश्विक संघर्षों में हस्तक्षेप करने का दावा करता है।
- आजीवन नेतृत्व: बोर्ड ऑफ पीस' के प्रस्तावित चार्टर के अनुसार, डोनाल्ड ट्रंप इसके उद्घाटन अध्यक्ष होंगे। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उनकी यह भूमिका उनके राष्ट्रपति पद से जुड़ी नहीं है; यानी राष्ट्रपति पद छोड़ने के बाद भी वे इसके चेयरमैन बने रह सकते हैं।
- वित्तीय अवरोध: स्थायी सदस्यता के लिए कथित तौर पर 1 बिलियन डॉलर की 'प्रवेश राशि' मांगी गई है, जो इसे अमीर देशों का एक विशिष्ट क्लब बनाता है।
अमेरिकी वर्चस्व की ओर एक और कदम
ट्रंप की यह नीति 'अमेरिका फर्स्ट' से बढ़कर 'अमेरिका अलोन' और 'ट्रंप अलोन' की ओर जाती दिख रही है।
- संस्थागत विखंडन: WHO, UNESCO और अब UN को दरकिनार करने की कोशिशें दर्शाती हैं कि अमेरिका अब बहुपक्षीय संस्थाओं के बजाय अपने नियंत्रण वाले 'ट्रांजेक्शनल' (लेन-देन आधारित) मंचों को प्राथमिकता दे रहा है।
- सैन्य और आर्थिक दबाव: जहाँ एक ओर 'शांति' का प्रस्ताव है, वहीं दूसरी ओर ग्रीनलैंड के मुद्दे पर यूरोप को टैरिफ की धमकी और वेनेजुएला में सैन्य हस्तक्षेप अमेरिका के आक्रामक 'वर्चस्ववादी' रवैये को सिद्ध करते हैं।
भारत की स्थिति: एक पेचीदा कूटनीतिक दुविधा
भारत के लिए ट्रंप का निमंत्रण 'सम्मान' और 'संकट' दोनों लेकर आया है:
- निमंत्रण बनाम आक्रामकता: हाल ही में ट्रंप ने रूस और ईरान के साथ व्यापार जारी रखने पर भारत को 25% अतिरिक्त टैरिफ की धमकी दी है। एक तरफ आर्थिक दंड का डर और दूसरी तरफ वैश्विक शांति बोर्ड में हिस्सेदारी का न्योता, भारत की 'रणनीतिक स्वायत्तता' की परीक्षा ले रहा है।
- फिलिस्तीन नीति पर प्रभाव: भारत पारंपरिक रूप से 'दो-राष्ट्र समाधान' का पक्षधर रहा है। इस बोर्ड में शामिल होना फिलिस्तीनी संप्रभुता को सीमित करने वाले अमेरिकी एजेंडे का समर्थन माना जा सकता है।
- ग्लोबल साउथ का नेतृत्व: भारत स्वयं को विकासशील देशों की आवाज मानता है। ऐसे में एक अमेरिकी-प्रभुत्व वाले और संयुक्त राष्ट्र को कमजोर करने वाले निकाय का हिस्सा बनना भारत की छवि को प्रभावित कर सकता है।
विश्लेषणात्मक आयाम
- न्यायिक बनाम राजनीतिक कूटनीति: क्या अंतरराष्ट्रीय विवादों का समाधान संयुक्त राष्ट्र के चार्टर के बजाय किसी 'बोर्ड' द्वारा किया जा सकता है? यह अंतरराष्ट्रीय कानून की नींव पर प्रहार है।
- यथार्थवाद: ट्रंप की नीति पूर्णतः यथार्थवादी है, जहाँ शांति को एक 'डील' के रूप में देखा जा रहा है। भारत को यह तय करना होगा कि क्या यह 'डील' उसके दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों के अनुकूल है।
समाधान और आगे की राह
- कैलिब्रेटेड एंगेजमेंट (सुलझा हुआ जुड़ाव): भारत को इस बोर्ड में 'पर्यवेक्षक' के रूप में शामिल होने पर विचार करना चाहिए, न कि तत्काल स्थायी सदस्य के रूप में, ताकि वह अपनी नीतियों से समझौता किए बिना प्रक्रिया पर नजर रख सके।
- बहुपक्षवाद की रक्षा: भारत को ब्रिक्स (BRICS) और जी-20 जैसे मंचों का उपयोग कर संयुक्त राष्ट्र में सुधार पर जोर देना चाहिए, न कि इसे पूरी तरह दरकिनार करने वाले प्रयासों का हिस्सा बनना चाहिए।
- संतुलन: अमेरिका के साथ सुरक्षा संबंधों और रूस-ईरान के साथ ऊर्जा हितों के बीच संतुलन बनाना ही भारत की प्राथमिकता होनी चाहिए।
निष्कर्ष
'बोर्ड ऑफ पीस' वैश्विक कूटनीति का एक नया और विवादास्पद प्रयोग है। यह शांति स्थापना के नाम पर अमेरिकी प्रभाव को संस्थागत रूप देने का प्रयास है। भारत को इस 'शांति बोर्ड' में शामिल होने के लिए जल्दबाजी के बजाय अपनी ऐतिहासिक विदेश नीति के सिद्धांतों और उभरते हुए वैश्विक समीकरणों का सूक्ष्म विश्लेषण करना होगा। अंततः, शांति वही स्थाई होती है जो न्यायसंगत और समावेशी हो, न कि केवल शक्ति के प्रदर्शन पर आधारित।
सामान्य अध्ययन पेपर – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध
संदर्भ
वर्ष 2026 की शुरुआत वैश्विक राजनीति में भारी उथल-पुथल के साथ हुई है। अमेरिकी प्रशासन (ट्रंप 2.0) द्वारा अंतरराष्ट्रीय कानूनों की परवाह किए बिना लिए जा रहे 'एकतरफा फैसलों' ने भारत जैसे देशों को एक कठिन कूटनीतिक चौराहे पर खड़ा कर दिया है। तमाम हालिया घटनाक्रमों ने भारत की वर्तमान चुप्पी पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
'ऑन म्यूट' नीति क्या है?
कूटनीति की शब्दावली में 'ऑन म्यूट' का अर्थ है—ऐसी स्थिति जब कोई राष्ट्र अपने हितों को प्रभावित करने वाली अंतरराष्ट्रीय घटनाओं पर कोई स्पष्ट स्टैंड लेने के बजाय चुप्पी साध लेता है या केवल 'प्रक्रियात्मक' प्रतिक्रिया देता है।
- भारत वर्तमान में महत्वपूर्ण वैश्विक मुद्दों पर "नाम लिए बिना चिंता जताना" या "केवल नागरिकों की सुरक्षा तक सीमित रहना" जैसी नीति अपना रहा है।
चर्चा का कारण:
पिछले कुछ दिनों में भारत के "नॉन-रिएक्टिव मोड" के पीछे निम्नलिखित घटनाएं प्रमुख हैं:
- वेनेजुएला संकट: अमेरिका द्वारा वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को पकड़ने के लिए की गई सैन्य कार्रवाई पर भारत ने केवल "गहरी चिंता" व्यक्त की, जबकि इसे अंतरराष्ट्रीय संप्रभुता का उल्लंघन माना जा रहा है।
- ईरान पर 25% टैरिफ: अमेरिका ने ईरान के साथ व्यापार करने वाले देशों पर 25% अतिरिक्त शुल्क की घोषणा की है। भारत ने इस पर कोई आधिकारिक विरोध दर्ज नहीं किया है, जबकि चाबहार पोर्ट में भारत का बड़ा निवेश दांव पर है।
- रूस और तेल पर दबाव: अमेरिका ने भारत को रूसी तेल की खरीद बंद करने की चेतावनी दी है, अन्यथा निर्यात पर 500% तक टैरिफ लगाने की धमकी दी गई है।
वर्तमान अमेरिकी विदेश नीति
ट्रंप 2.0 के तहत अमेरिकी विदेश नीति अब 'ट्रांजेक्शनल' (सौदाकारी) और 'एकतरफा' हो गई है:
- आर्थिक राष्ट्रवाद: अन्य देशों को टैरिफ के जरिए डराना।
- प्रशासनिक प्रभुत्व: मित्र देशों को भी अपनी भू-राजनीतिक प्राथमिकताओं (जैसे ईरान/रूस को अलग-थलग करना) के साथ चलने पर मजबूर करना।
- पैक्स सिलिका: अमेरिका तकनीक और सेमीकंडक्टर के क्षेत्र में 'पैक्स सिलिका' (Pax Silica) जैसी नई व्यवस्था बना रहा है, जिसमें वह भारत जैसे देशों को शामिल करने के बदले नीतिगत रियायतें चाहता है।
भारत की नीति और बदलाव:
भारत की नीति में पिछले कुछ वर्षों में आए बदलावों को इन बिंदुओं से समझा जा सकता है:
- अतीत: 2019 में भी भारत ने अमेरिकी दबाव में ईरान और वेनेजुएला से तेल खरीदना बंद कर दिया था। तब किए गए समझौतों से भारत को कोई दीर्घकालिक लाभ नहीं हुआ, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा प्रभावित हुई।
- वर्तमान बदलाव: भारत अब रणनीतिक स्वायत्तता के बजाय सामरिक तालमेल की ओर बढ़ रहा है।
- कारण: चीन के साथ सीमा विवाद और अमेरिका के साथ प्रस्तावित 'द्विपक्षीय व्यापार समझौते' के कारण भारत वर्तमान में अमेरिका को नाराज करने का जोखिम नहीं उठाना चाहता।
भारत क्यों चुप है?
भारत की इस चुप्पी के पीछे ठोस कूटनीतिक कारण हैं:
- राष्ट्रीय सुरक्षा: चीन के खिलाफ अमेरिका का खुफिया और सैन्य सहयोग भारत के लिए अपरिहार्य है।
- आर्थिक हित: अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। भारत 'टैरिफ युद्ध' से बचकर अपने निर्यात को सुरक्षित रखना चाहता है।
- चाबहार की रियायत: भारत अमेरिका से चाबहार बंदरगाह के लिए 'प्रतिबंधों में छूट' के विस्तार पर चर्चा कर रहा है।
अंतर्राष्ट्रीय संबंधों पर भारत की ऐतहासिक पृष्ठभूमि आजादी के बाद से भारत की विदेश नीति का विकास एक 'आदर्शवाद' से शुरू होकर 'यथार्थवाद' की ओर बढ़ने की यात्रा है। इसे हम निम्नलिखित चार मुख्य चरणों में प्रभावी ढंग से समझ सकते हैं: नेहरूवादी युग (1947-1964): गुटनिरपेक्षता आजादी के तुरंत बाद दुनिया शीत युद्ध की चपेट में थी। भारत ने किसी भी सैन्य गुट (अमेरिका या सोवियत संघ) में शामिल न होने का फैसला किया।
यथार्थवाद की ओर (1964-1990): सुरक्षा और संप्रभुता नेहरू के बाद, भारत ने अपनी सुरक्षा को प्राथमिकता देना शुरू किया।
आर्थिक सुधार और रणनीतिक स्वायत्तता (1991-2014) सोवियत संघ के विघटन के बाद भारत को अपनी नीति बदलनी पड़ी।
वर्तमान युग (2014-अब तक): बहु-संरेखण वर्तमान नीति अब केवल गुटनिरपेक्ष रहने की नहीं, बल्कि सभी प्रमुख शक्तियों के साथ जुड़ने की है।
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विश्लेषण
चुप्पी हमेशा सुरक्षा नहीं देती। यदि भारत एक नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था का पक्षधर है, तो उसे अंतरराष्ट्रीय कानून के उल्लंघन पर बोलना होगा।
- प्रतिष्ठा की हानि: ग्लोबल साउथ (विकासशील देशों) के नेता के रूप में भारत की छवि प्रभावित हो सकती है।
- ब्रिक्स की चुनौती: 2026 में भारत को ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी करनी है, जहाँ ईरान और रूस जैसे देश मौजूद होंगे। वहाँ भारत का 'म्यूट मोड' उसके लिए असहज स्थिति पैदा कर सकता है।
आगे की राह
- बहु-संरेखण: भारत को किसी एक शक्ति के प्रति झुकने के बजाय अपनी 'मल्टी-एलाइनमेंट' की नीति को और मजबूत करना चाहिए।
- स्पष्ट संवाद: रूस और ईरान के साथ अपने संबंधों की अनिवार्यता को अमेरिका के सामने और अधिक स्पष्टता से रखना होगा।
- आर्थिक आत्मनिर्भरता: डॉलर पर निर्भरता कम करने के लिए स्थानीय मुद्राओं में व्यापार (जैसे रुपया-रुबल व्यापार) को तेजी से बढ़ाना चाहिए।
निष्कर्ष
कूटनीति में "मौन" कभी-कभी रणनीतिक हो सकता है, लेकिन यह लंबे समय तक "सिद्धांतहीनता" नहीं बनना चाहिए। भारत को यह समझना होगा कि एक महाशक्ति का तुष्टिकरण राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा की गारंटी नहीं है। भारत की असली ताकत उसकी स्वतंत्र सोच और रणनीतिक स्वायत्तता में है।
सामान्य अध्ययन पेपर – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध
सन्दर्भ
हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा ईरान के साथ व्यापार करने वाले देशों पर 25% टैरिफ लगाने की घोषणा और 26 अप्रैल 2026 को समाप्त हो रहे 'प्रतिबंध छूट' ने भारत के लिए एक नई कूटनीतिक चुनौती पेश कर दी है। भारत वर्तमान में वाशिंगटन के साथ चाबहार बंदरगाह को इन प्रतिबंधों से बाहर रखने के लिए गहन चर्चा कर रहा है।
चाबहार बंदरगाह
- यह बंदरगाह ईरान के दक्षिण-पूर्वी तट पर, ओमान की खाड़ी के किनारे सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत में स्थित है। यह ईरान का एकमात्र 'डीप-सी' (गहरे पानी का) बंदरगाह है, जहाँ बड़े जहाजों का आवागमन आसानी से हो सकता है।
भारत की भागीदारी
भारत का इस बंदरगाह से जुड़ाव पुराना है, लेकिन हाल के वर्षों में इसमें बड़ी प्रगति हुई है:
- शुरुआत (2003): भारत और ईरान के बीच इस बंदरगाह को विकसित करने पर पहली बार सहमति बनी थी।
- त्रिपक्षीय समझौता (2016): प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ईरान यात्रा के दौरान भारत, ईरान और अफगानिस्तान के बीच एक ऐतिहासिक समझौता हुआ।
- संचालन की शुरुआत (2018): भारत की कंपनी 'इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड' (IPGL) ने चाबहार के 'शहीद बेहिश्ती' टर्मिनल का परिचालन अपने हाथ में लिया।
- 10 वर्षीय ऐतिहासिक समझौता (मई 2024): भारत ने चाबहार के संचालन के लिए ईरान के साथ 10 साल के दीर्घकालिक अनुबंध पर हस्ताक्षर किए। यह भारत के लिए बहुत बड़ी जीत थी क्योंकि इससे पहले समझौतों का हर साल नवीनीकरण करना पड़ता था।
भारत के लिए चाबहार पोर्ट का महत्व
चाबहार केवल एक बंदरगाह नहीं, बल्कि भारत की 'कनेक्टिविटी' रणनीति का केंद्र बिंदु है:
- पाकिस्तान को बाईपास करना: भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुँचने के लिए पाकिस्तान के जमीनी रास्ते पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। यह भारत को एक स्वतंत्र व्यापारिक मार्ग प्रदान करता है।
- अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे का प्रवेश द्वार: चाबहार बंदरगाह अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो रूस और यूरोप तक माल पहुँचाने के समय और लागत को 30-40% तक कम कर सकता है।
- अफगानिस्तान में प्रभाव: तालिबान शासित अफगानिस्तान में मानवीय सहायता (जैसे गेहूं और दवाएं) पहुँचाने और वहां अपना कूटनीतिक प्रभाव बनाए रखने के लिए यह पोर्ट अनिवार्य है।
- चीन की घेराबंदी : यह पोर्ट पाकिस्तान में स्थित चीन द्वारा संचालित ग्वादर बंदरगाह से मात्र 72 किमी की दूरी पर है। यह अरब सागर में चीन की बढ़ती मौजूदगी के खिलाफ भारत का एक रणनीतिक जवाब है।
वर्तमान संकट और भारत की भूमिका
भारत इस मामले में एक "सक्रिय मध्यस्थ" और "रणनीतिक स्वायत्तता" के पैरोकार की भूमिका निभा रहा है:
- संवाद और समन्वय: विदेश मंत्रालय के माध्यम से भारत यह स्पष्ट कर रहा है कि चाबहार का उपयोग मानवीय उद्देश्यों और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए हो रहा है, न कि ईरान की सैन्य शक्ति बढ़ाने के लिए।
- वित्तीय प्रबंधन: भारत ने दूरदर्शिता दिखाते हुए चाबहार के लिए अपनी वित्तीय प्रतिबद्धताओं (लगभग $120 मिलियन) को समय से पहले व्यवस्थित करने की कोशिश की है ताकि बैंकिंग प्रतिबंधों का असर न पड़े।
- दीर्घकालिक प्रतिबद्धता: मई 2024 में भारत ने ईरान के साथ 10 साल के संचालन समझौते पर हस्ताक्षर किए, जो यह दर्शाता है कि भारत दबाव के बावजूद इस परियोजना से पीछे हटने वाला नहीं है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दृष्टिकोण
चाबहार और भारत के रुख को दुनिया अलग-अलग नजरियों से देख रही है:
हितधारक | दृष्टिकोण |
अमेरिका | ईरान पर "अधिकतम दबाव" की नीति, लेकिन भारत को एक महत्वपूर्ण सुरक्षा भागीदार के रूप में खोना नहीं चाहता। |
ईरान | भारत को एक विश्वसनीय आर्थिक साझेदार के रूप में देखता है जो उसे पश्चिमी अलगाव से बाहर निकलने में मदद कर सकता है। |
मध्य एशियाई देश | कजाकिस्तान, उजबेकिस्तान जैसे देश चाबहार को समुद्र तक पहुँचने के अपने सबसे सुरक्षित और छोटे मार्ग के रूप में देखते हैं। |
चीन | इसे अपने 'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव' (BRI) के लिए एक प्रतिस्पर्धा के रूप में देखता है। |
विश्लेषण: प्रमुख चुनौतियां
- प्रतिबंधों का दोहरा प्रभाव: यदि अमेरिका छूट नहीं बढ़ाता है, तो भारतीय शिपिंग कंपनियां और लॉजिस्टिक फर्म्स ईरान के साथ काम करने से डरेंगी।
- टैरिफ का दबाव: 25% टैरिफ भारतीय निर्यात (चावल, फार्मा) को महंगा बना देगा, जिससे द्विपक्षीय व्यापार ($1.6 बिलियन) प्रभावित हो सकता है।
- ईरान की आंतरिक अस्थिरता: ईरान में चल रहे विरोध प्रदर्शन और वहां की राजनीतिक अस्थिरता भविष्य के निवेश के लिए जोखिम पैदा करती है।
निष्कर्ष
भारत के लिए चाबहार एक 'भू-राजनीतिक आवश्यकता' है। 2026 की समय सीमा से पहले भारत को अपनी 'पड़ोस प्रथम' नीति और 'मध्य एशिया के साथ जुड़ाव' को बचाने के लिए अमेरिका को यह समझाने की जरूरत है कि चाबहार का विकास अफगानिस्तान को आतंकवाद और अस्थिरता से दूर रखने के लिए वैश्विक हित में है। भारत को अपनी "रणनीतिक स्वायत्तता" बरकरार रखते हुए अमेरिका के साथ व्यापार और ईरान के साथ कनेक्टिविटी के बीच संतुलन साधना होगा।
- चर्चा में क्यों?
- एफएओ, आईएफएडी, यूनिसेफ, डब्ल्यूएफपी और डब्ल्यूएचओ द्वारा संयुक्त रूप से प्रकाशित विश्व में खाद्य सुरक्षा और पोषण की स्थिति (एसओएफआई) के 2025 संस्करण में वैश्विक भूख में 2022 से 2024 तक मामूली गिरावट के साथ 8.2% रहने की रिपोर्ट दी गई है।
- प्रमुख प्रावधान:-
- फिर भी, अफ्रीका और पश्चिमी एशिया के कुछ हिस्सों में भुखमरी अभी भी उच्च स्तर पर है। 2021 से, मध्यम या गंभीर खाद्य असुरक्षा धीरे-धीरे कम हुई है। हालाँकि, 2023-2024 में खाद्य पदार्थों की कीमतों में वृद्धि जारी रही, जिससे स्वस्थ आहार की लागत बढ़ गई। मुद्रास्फीति के बावजूद, ऐसे आहार का खर्च वहन करने में असमर्थ लोगों की संख्या 2019 में 2.76 अरब से घटकर 2024 में 2.60 अरब हो गई। चिंताजनक रूप से, महिलाओं में एनीमिया और वयस्कों में मोटापा बढ़ रहा है। भारत में, मोबाइल तकनीक ने केरल के मत्स्य पालन में अपव्यय और मूल्य भिन्नता को कम करने में मदद की है। प्रमुख सिफारिशों में समयबद्ध राजकोषीय उपाय, मजबूत सामाजिक सुरक्षा और बेहतर बाजार डेटा सिस्टम शामिल हैं। SOFI सतत विकास लक्ष्य 2 की प्रगति पर नज़र रखता है, जिसका लक्ष्य भुखमरी और सभी प्रकार के कुपोषण को समाप्त करना है।
- चर्चा में क्यों?
- वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट के 2025 संस्करण में, भारत 148 देशों में से 131वें स्थान पर आ गया है, जो कि 2024 की 129वीं रैंक से दो स्थान नीचे है। देश का समग्र लिंग समानता स्कोर 64.4% है, जो दक्षिण एशिया में सबसे कम है। इसके विपरीत, बांग्लादेश ने महत्वपूर्ण सुधार दिखाया, 75 स्थानों की छलांग लगाकर वैश्विक स्तर पर 24वां स्थान हासिल किया- जिससे वह इस क्षेत्र का शीर्ष प्रदर्शन करने वाला देश बन गया। वैश्विक स्तर पर, अभी तक कोई भी देश पूर्ण लिंग समानता हासिल नहीं कर पाया है। आइसलैंड लगातार 16वें साल रैंकिंग में सबसे ऊपर है, उसके बाद फिनलैंड, नॉर्वे, यूनाइटेड किंगडम और न्यूजीलैंड का स्थान है। वैश्विक लिंग अंतर में मामूली सुधार देखा गया है, जो 2024 में 68.4% से बढ़कर 2025 में 68.8% हो गया है
- प्रमुख प्रावधान:-
- वैश्विक लैंगिक अंतर सूचकांक चार आयामों के आधार पर देशों का मूल्यांकन करता है: आर्थिक भागीदारी, शिक्षा, स्वास्थ्य और राजनीतिक सशक्तिकरण।
- वैश्विक लैंगिक अंतर सूचकांक महिलाओं की समग्र भलाई का माप नहीं है, बल्कि संसाधनों और अवसरों तक पहुँच में लिंग-आधारित अंतर का माप है। निरपेक्ष स्तरों के बजाय सापेक्ष अंतरों पर ध्यान केंद्रित करके, सूचकांक उन क्षेत्रों को उजागर करता है जहाँ प्रगति हुई है और जहाँ अभी भी महत्वपूर्ण असमानताएँ मौजूद हैं।
- यह नीति निर्माताओं, शोधकर्ताओं और वकालत समूहों के लिए लैंगिक असमानताओं को समझने और दुनिया भर में लैंगिक समानता को बढ़ावा देने के लिए सूचित रणनीति विकसित करने हेतु एक बेंचमार्क उपकरण के रूप में कार्य करता है।
- चर्चा में क्यों?
- संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन के तहत डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो में 25 सदस्यीय महिला सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) की टुकड़ी तैनात की गई है। उनकी भूमिका में शांति बनाए रखना, स्थानीय समुदायों का समर्थन करना और संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में नागरिकों की सुरक्षा करना शामिल होगा।
- प्रमुख प्रावधान:-
- संयुक्त राष्ट्र शांति स्थापना की शुरुआत 1948 में मध्य पूर्व में संयुक्त राष्ट्र युद्धविराम पर्यवेक्षण संगठन (यूएनटीएसओ) के गठन के साथ हुई थी, जो तीन प्रमुख सिद्धांतों पर आधारित है: इसमें शामिल पक्षों की सहमति, निष्पक्षता, तथा बल का प्रयोग केवल आत्मरक्षा में या मिशन के अधिदेश की रक्षा के लिए किया जाना।
- शांति स्थापना मिशन राजनीतिक परिवर्तन, नागरिक सुरक्षा और चुनावों के दौरान सहायता प्रदान करते हैं। भारत ने संयुक्त राष्ट्र शांति स्थापना में एक प्रमुख भूमिका निभाई है, जिसने 1950 के दशक से 50 से अधिक मिशनों में 290,000 से अधिक कर्मियों का योगदान दिया है। यह भारत को वैश्विक स्तर पर सबसे बड़ा योगदानकर्ता बनाता है। बीएसएफ महिला टुकड़ी की तैनाती इस विरासत को जारी रखती है, जो वैश्विक शांति और सुरक्षा भूमिकाओं में लैंगिक समावेशन के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को उजागर करती है।
- चर्चा में क्यों?
- वार्षिक उच्चस्तरीय सुरक्षा शिखर सम्मेलन शांगरी-ला वार्ता इस समय सिंगापुर में चल रही है।
- प्रमुख प्रावधान:-
- रक्षा कूटनीति के बढ़ते महत्व के संदर्भ में की गई थी। शांगरी-ला होटल के नाम पर, जहाँ इसका पहला सत्र आयोजित किया गया था, इस संवाद का आयोजन सिंगापुर सरकार के मजबूत समर्थन के साथ लंदन के अंतर्राष्ट्रीय सामरिक अध्ययन संस्थान (आईआईएसएस) द्वारा किया जाता है।
- यह मंच "ट्रैक 1.5" बहुपक्षीय संवाद के रूप में कार्य करता है, जो नीति निर्माताओं, रक्षा अधिकारियों और रणनीतिक विचारकों के बीच अनौपचारिक बातचीत के साथ आधिकारिक सरकारी जुड़ाव को जोड़ता है। इसका प्राथमिक उद्देश्य क्षेत्रीय और वैश्विक सुरक्षा चिंताओं पर खुली चर्चा को बढ़ावा देना है। प्रतिभागियों में रक्षा मंत्री, सैन्य प्रमुख और एशिया-प्रशांत, उत्तरी अमेरिका, यूरोप और मध्य पूर्व के विशेषज्ञ शामिल हैं, जो दृष्टिकोणों का आदान-प्रदान करने, साझेदारी को मजबूत करने और तेजी से जटिल होते अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में साझा सुरक्षा चुनौतियों के लिए सहकारी प्रतिक्रियाओं का पता लगाने के लिए एकत्र होते हैं।
- चर्चा में क्यों?
- एशियाई विकास बैंक (एडीबी) ने भारत के शहरी बुनियादी ढांचे के विकास और मेट्रो नेटवर्क विस्तार के लिए 10 अरब डॉलर देने का संकल्प लिया है।
- प्रमुख प्रावधान:-
- इस प्रमुख निवेश का उद्देश्य तेजी से बढ़ते शहरों में रहने की सुविधा और कनेक्टिविटी को बढ़ाना है।
- इसके अतिरिक्त, एडीबी भारत के शहरी चुनौती कोष में योगदान देगा, जिसे शहरी विकास परियोजनाओं में निजी क्षेत्र की अधिक भागीदारी को प्रोत्साहित करने के लिए तैयार किया गया है।
- 1966 में 31 संस्थापक सदस्यों के साथ स्थापित, ADB में अब 69 सदस्य देश शामिल हैं - 50 एशिया-प्रशांत क्षेत्र से और 19 बाहर से। इसका मुख्यालय मनीला, फिलीपींस में स्थित है।
- एडीबी एशिया और प्रशांत क्षेत्र में समावेशी, टिकाऊ और लचीले विकास को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। 31 दिसंबर, 2023 तक, इसके पाँच सबसे बड़े शेयरधारक जापान और संयुक्त राज्य अमेरिका (प्रत्येक के पास कुल शेयरों का 15.6% हिस्सा है), उसके बाद चीन (6.4%), भारत (6.3%) और ऑस्ट्रेलिया (5.8%) हैं।
- भारत के प्रति यह नई प्रतिबद्धता, क्षेत्र में प्रमुख अवसंरचना और विकास प्राथमिकताओं को समर्थन देने पर एडीबी के सतत फोकस को दर्शाती है।
- बर्लिन में आयोजित एक उच्च स्तरीय मंत्रिस्तरीय शिखर सम्मेलन में, 74 संयुक्त राष्ट्र सदस्य देशों ने तीव्र तैनाती परिसंपत्तियों, एयरलिफ्ट समर्थन, उन्नत प्रशिक्षण, तकनीकी उन्नयन और महिला, शांति और सुरक्षा (डब्ल्यूपीएस) एजेंडे को बढ़ावा देने के प्रयासों जैसी बढ़ी हुई क्षमताओं का वचन देकर शांति स्थापना को मजबूत करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की।
- यह आयोजन 2015 के न्यूयॉर्क शांति स्थापना शिखर सम्मेलन की 10वीं वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित किया गया। भारत ने एक त्वरित प्रतिक्रिया बल (क्यूआरएफ) कंपनी, एक महिला-नेतृत्व वाली पुलिस इकाई, एक स्वाट इकाई, तथा विस्तारित शांति स्थापना प्रशिक्षण और साझेदारी पहल की प्रतिज्ञा करके अपनी दृढ़ प्रतिबद्धता की पुष्टि की।
- शिखर सम्मेलन में संयुक्त राष्ट्र शांति स्थापना को आधुनिक बनाने, तेजी से तैनाती सुनिश्चित करने, मिशन के प्रदर्शन में सुधार लाने और क्षेत्रीय सहयोग को बढ़ावा देने की तत्काल आवश्यकता पर जोर दिया गया। भारत संयुक्त राष्ट्र शांति स्थापना में सबसे बड़ा योगदान देने वाले देशों में से एक है, जिसके 290,000 से अधिक कर्मी 50 से अधिक मिशनों में सेवा दे चुके हैं।
- वर्तमान में चौथा सबसे बड़ा सैन्य योगदान देने वाला देश, भारत ने ऐतिहासिक तैनाती का नेतृत्व किया है, जिसमें लाइबेरिया में पहली महिला पुलिस इकाई (2007) भी शामिल है, और 2023 में उसे डैग हैमरशॉल्ड पदक भी प्राप्त हुआ है।
- संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम की 2025 मानव विकास रिपोर्ट, जिसका शीर्षक है "ए मैटर ऑफ चॉइस: पीपल एंड पॉसिबिलिटीज इन द एज ऑफ एआई", भविष्य के विकास को आकार देने में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते प्रभाव पर जोर देती है। भारत तीन पायदान ऊपर चढ़कर 193 देशों में से 130वें स्थान पर पहुंच गया है, जो 0.685 के एचडीआई मूल्य के साथ मध्यम मानव विकास श्रेणी में बना हुआ है।
- भारत में जीवन प्रत्याशा 2023 में रिकॉर्ड 72 वर्ष तक पहुंच जाएगी, और स्कूली शिक्षा के औसत वर्ष बढ़कर 13 हो जाएंगे। हालांकि, चुनौतियां बनी हुई हैं - भारत की प्रति व्यक्ति जीएनआई उसके एचडीआई रैंक से सात स्थान नीचे है, और लैंगिक असमानता चिंता का विषय बनी हुई है, भारत लैंगिक असमानता सूचकांक पर 102वें स्थान पर है।
- वैश्विक स्तर पर, मानव विकास की प्रगति 1990 के बाद से सबसे कम गति पर आ गई है, जिसमें असमानताएँ बढ़ रही हैं। एआई के मोर्चे पर, भारत स्व-रिपोर्ट किए गए एआई कौशल में सबसे आगे है, वैश्विक एआई सूचकांक में 4वें स्थान पर है, और घरेलू स्तर पर अपने एआई शोधकर्ताओं में से 20% को बनाए रखता है - जो 2019 में लगभग शून्य था।
- जियोपार्क्स (यूजीजीपी) की 10वीं वर्षगांठ पर , 11 देशों के 16 नए स्थलों को ग्लोबल जियोपार्क्स नेटवर्क (जीजीएन) में जोड़ा गया। जीजीएन यूनेस्को के तहत एक गैर-लाभकारी निकाय है जो जियोपार्क प्रबंधन के लिए नैतिक मानकों को बढ़ावा देता है।
- इन जियोपार्कों को उनके अंतर्राष्ट्रीय भूवैज्ञानिक महत्व के लिए मान्यता प्राप्त है और इनका प्रबंधन संरक्षण, शिक्षा और सतत विकास पर जोर देते हुए किया जाता है।
- नए प्रवेशों में चीन में कंबुला शामिल है , जो अपने संरक्षित मैक्सिउ ज्वालामुखियों और पीली नदी के लिए जाना जाता है; उत्तर कोरिया में माउंट पैक्टू , जिसने 1000 ई. के आसपास सबसे बड़े विस्फोटों में से एक देखा; और सऊदी अरब में उत्तरी रियाद, जो वाडी का घर है। ओबैथरन और प्राचीन प्रवाल भित्ति प्रणालियाँ।
- यूजीजीपी की स्थापना 2015 में यूनेस्को के अंतर्राष्ट्रीय भूविज्ञान और भू-पार्क के तहत की गई थी कार्यक्रम .
- इन साइटों को कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त होनी चाहिए और हर चार साल में इनका पुनर्मूल्यांकन किया जाना चाहिए। सभी UGGP के लिए GGN में सदस्यता अनिवार्य है।
- वर्तमान में, 50 देशों में 229 यूनेस्को ग्लोबल जियोपार्क हैं - इनमें से कोई भी भारत में स्थित नहीं है।
- ब्राजील में आयोजित 15वीं ब्रिक्स कृषि मंत्रियों की बैठक में ब्रिक्स भूमि पुनरुद्धार साझेदारी की आधिकारिक रूप से शुरुआत की गई। भारत ने समावेशी, न्यायसंगत और टिकाऊ कृषि के प्रति अपनी दृढ़ प्रतिबद्धता दोहराई, जबकि सभी ब्रिक्स देशों ने एक लचीली और टिकाऊ कृषि-खाद्य प्रणाली के निर्माण के महत्व पर जोर दिया।
- साझेदारी के बारे में:
- इस पहल का उद्देश्य भूमि क्षरण, मरुस्थलीकरण और घटती मिट्टी की उर्वरता से निपटना है। यह पारंपरिक कृषि ज्ञान को आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोणों के साथ मिलाकर छोटे किसानों, आदिवासी समुदायों और स्थानीय कृषकों को सहायता प्रदान करने पर केंद्रित है।
- यह क्यों मायने रखती है:
- भूमि क्षरण एक गंभीर समस्या है - एफएओ के अनुसार, भारत की लगभग 32% भूमि क्षरित हो चुकी है तथा 25% भूमि बंजर होने की कगार पर है।
- टिकाऊ कृषि में भारत के प्रयास:
- प्रमुख पहलों में राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन (एनएमएसए), शून्य बजट प्राकृतिक खेती (जेडबीएनएफ) और "प्रति बूंद अधिक फसल" जैसी जल-बचत योजनाएं शामिल हैं। भारत दीर्घकालिक स्थिरता का समर्थन करने के लिए जलवायु-लचीली फसलों, सटीक खेती और एग्रीस्टैक जैसे डिजिटल प्लेटफार्मों को भी बढ़ावा देता है।
- दवा कंपनी फाइजर ने हाल ही में सिकल सेल रोग के उपचार के लिए अपनी दवा ऑक्सब्राइटा को वैश्विक बाजारों से स्वेच्छा से वापस लेने की घोषणा की है, क्योंकि इस दवा को "घातक घटनाओं" से जोड़ने वाले नैदानिक डेटा सामने आए हैं।
- अंतर्राष्ट्रीय रेड क्रॉस एवं रेड क्रीसेंट सोसायटी फेडरेशन (आईएफआरसी) के बारे में:
- आईएफआरसी दुनिया का सबसे बड़ा मानवीय नेटवर्क है, जिसकी स्थापना 1919 में हुई थी और इसका मुख्यालय जिनेवा में है। यह दुनिया भर में 192 रेड क्रॉस और रेड क्रिसेंट सोसाइटियों के साथ-साथ लगभग 100 मिलियन स्वयंसेवकों को एकजुट करता है।
- आईएफआरसी का प्राथमिक मिशन सबसे कमजोर आबादी की स्थिति में सुधार लाना है, तथा प्राकृतिक और मानव निर्मित आपदाओं से प्रभावित लोगों को अंतर्राष्ट्रीय आपातकालीन सहायता प्रदान करना है, जिनमें संघर्ष और स्वास्थ्य संकटों से विस्थापित लोग भी शामिल हैं।
- अपने आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रयासों के अलावा, आईएफआरसी कमज़ोर समुदायों में आपदा की तैयारी को बढ़ाने के लिए काम करता है, जिससे उन्हें भविष्य के संकटों का सामना करने में अधिक लचीला बनने में मदद मिलती है। संघ अपने सदस्य समाजों की क्षमताओं को प्रभावी आपातकालीन राहत, आपदा तैयारी, और स्वास्थ्य और सामुदायिक देखभाल कार्यक्रम प्रदान करने के लिए मजबूत करता है।
- आईएफआरसी अंतर्राष्ट्रीय मंच पर अपने सदस्य समाजों का प्रतिनिधित्व भी करता है तथा तीव्र शहरीकरण, जलवायु परिवर्तन, प्रवासन और हिंसा जैसे वैश्विक मानवीय मुद्दों पर भी ध्यान देता है।
- वित्तपोषण: आईएफआरसी सरकारों, गैर सरकारी संगठनों, कॉर्पोरेट दाताओं और जनता से प्राप्त स्वैच्छिक योगदान पर निर्भर करता है।
- आई.सी.आर.सी. के साथ संबंध: आई.एफ.आर.सी., रेड क्रॉस की अंतर्राष्ट्रीय समिति (आई.सी.आर.सी.) के साथ निकटता से सहयोग करता है, जो मानवीय कानून और संघर्ष क्षेत्रों में सहायता पर ध्यान केंद्रित करता है।
- हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के प्रमुख ने वैश्विक नेताओं से आग्रह किया कि वे संयुक्त राष्ट्र स्वास्थ्य एजेंसी से अमेरिका को वापस लेने के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के फैसले पर पुनर्विचार करने के लिए वाशिंगटन पर दबाव डालें।
- विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के बारे में:
- डब्ल्यूएचओ संयुक्त राष्ट्र की एक विशेष एजेंसी है जो सार्वजनिक स्वास्थ्य पर केंद्रित है।
- 1948 में स्थापित विश्व स्वास्थ्य संगठन का उद्देश्य वैश्विक स्तर पर सभी लोगों के लिए स्वास्थ्य का उच्चतम स्तर सुनिश्चित करना है।
- विश्व स्वास्थ्य संगठन के संविधान के अनुसार, स्वास्थ्य को सम्पूर्ण शारीरिक, मानसिक और सामाजिक कल्याण के रूप में परिभाषित किया गया है, न कि केवल बीमारी या दुर्बलता की अनुपस्थिति के रूप में।
- यह संगठन वैश्विक स्वास्थ्य नेतृत्व, स्वास्थ्य अनुसंधान एजेंडा को आकार देने, मानदंड और मानक निर्धारित करने, देशों को तकनीकी सहायता प्रदान करने और दुनिया भर में स्वास्थ्य प्रवृत्तियों की निगरानी और आकलन करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
- वर्तमान में विश्व स्वास्थ्य संगठन के 193 सदस्य देश और दो सहयोगी सदस्य हैं।
- विश्व स्वास्थ्य संगठन का प्रशासनिक मुख्यालय जिनेवा, स्विटजरलैंड में स्थित है।
- संरचना:
- शासन: विश्व स्वास्थ्य संगठन का शासन विश्व स्वास्थ्य सभा के माध्यम से संचालित होता है, जो नीतियों पर चर्चा करने और उन्हें निर्धारित करने के लिए प्रतिवर्ष मिलती है, तथा इसमें एक कार्यकारी बोर्ड होता है, जिसमें सभा द्वारा तीन वर्ष के कार्यकाल के लिए चुने गए स्वास्थ्य विशेषज्ञ शामिल होते हैं।
- विश्व स्वास्थ्य संगठन का नेतृत्व एक महानिदेशक करता है, जिसे कार्यकारी बोर्ड द्वारा नामित किया जाता है और विश्व स्वास्थ्य सभा द्वारा नियुक्त किया जाता है।
- वित्तपोषण:
- विश्व स्वास्थ्य संगठन के बजट का लगभग 16% उसके सदस्य देशों द्वारा भुगतान किए जाने वाले अनिवार्य शुल्क से आता है, जबकि शेष राशि सरकारों और निजी भागीदारों से प्राप्त स्वैच्छिक दान से प्राप्त होती है।
- हाल के वर्षों में सबसे बड़े योगदानकर्ताओं में संयुक्त राज्य अमेरिका, जर्मनी, यूनाइटेड किंगडम और बिल एवं मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन शामिल हैं।
- विश्व स्वास्थ्य दिवस:
- प्रत्येक वर्ष 7 अप्रैल को, इसकी स्थापना की वर्षगांठ को विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा विश्व स्वास्थ्य दिवस के रूप में मनाया जाता है ।