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सामान्य अध्ययन पेपर – III प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन
सन्दर्भ
हिमालय न केवल भारत की भौगोलिक सीमा है, बल्कि यह दक्षिण एशिया की 'वॉटर टॉवर' और जलवायु नियामक भी है। ऐतिहासिक रूप से, हिमालय को एक स्थिर और अभेद्य कवच माना जाता था। किंतु, पिछली आधी सदी में अनियंत्रित शहरीकरण, पर्यटन के दबाव और 'चारधाम सड़क परियोजना' जैसी मेगा-इन्फ्रास्ट्रक्चर योजनाओं ने इसकी भू-वैज्ञानिक स्थिरता को चुनौती दी है। वर्तमान में, यह क्षेत्र 'एंथ्रोपोसीन' (मानवीय हस्तक्षेप का युग) के सबसे खतरनाक दौर से गुजर रहा है, जहाँ विकास की परिभाषा प्रकृति के दोहन तक सीमित नजर आती है।
हिमालय की संवेदनशीलता:
हिमालय दुनिया की सबसे युवा और कच्ची पर्वत श्रृंखला है। इसकी संवेदनशीलता के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
- टेक्टोनिक सक्रियता: भारतीय प्लेट का यूरेशियन प्लेट के नीचे निरंतर खिसकना इस क्षेत्र को भूकंपीय रूप से 'ज़ोन IV' और 'V' (अत्यधिक संवेदनशील) में रखता है।
- अपरदन और ढलान की अस्थिरता: यहाँ की चट्टानें अवसादी और भंगुर हैं। भारी मशीनरी का कंपन और ब्लास्टिंग मिट्टी की पकड़ को ढीला कर देते हैं।
- ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF): तापमान बढ़ने से ग्लेशियर के पीछे बनी झीलें फटने के कगार पर हैं, जो नीचे बसे शहरों के लिए 'टाइम बम' जैसी हैं।
चर्चा में क्यों?
- हालिया विवाद उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में स्थित धराली और हर्षिल क्षेत्रों को लेकर है।
- ये क्षेत्र हाल ही में एक विनाशकारी हिमस्खलन और उसके बाद आई फ्लैश-फ्लड की चपेट में आए थे। इसके बावजूद, सरकार यहाँ एक व्यापक बुनियादी ढांचा परियोजना को आगे बढ़ा रही है, जिसके अंतर्गत लगभग 7,000 दुर्लभ देवदार के पेड़ों और स्थानीय जैव-विविधता को नष्ट किया जाना प्रस्तावित है।
- यह परियोजना 'पर्यावरण प्रभाव आकलन' (EIA) की निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्न खड़े करती है।
2025 का भयावह रिपोर्ट कार्ड
वर्ष 2025 हिमालयी इतिहास में एक चेतावनी के रूप में दर्ज हुआ है:
- निरंतरता: वर्ष के 331 दिन चरम मौसम की घटनाओं के प्रभाव में रहे।
- मृत्यु दर: अकेले इस वर्ष जलवायु प्रेरित आपदाओं से 4,000 से अधिक लोगों की मृत्यु हुई।
- प्रभावित क्षेत्र: हिमाचल का कुल्लू-मंडी बेल्ट और उत्तराखंड का अलकनंदा-भागीरथी बेसिन सबसे अधिक प्रभावित रहा।
- नया सामान्य: 'लैंड सबसिडेंस' (जमीन का धंसना) अब केवल जोशीमठ तक सीमित नहीं है, बल्कि किश्तवाड़ और चमोली के कई गांवों में दरारें देखी गई हैं।
विकास बनाम विनाश: नीतिगत विरोधाभास
भारतीय नीति-निर्माण में एक स्पष्ट 'पॉलिसी पैराडॉक्स' दिखाई देता है:
- EIA की अनदेखी: 100 किमी से लंबी सड़क परियोजनाओं को छोटे-छोटे टुकड़ों में बांटकर अनिवार्य 'पर्यावरण प्रभाव आकलन' से बचने की प्रवृत्ति।
- आपदा प्रबंधन बनाम आपदा सृजन: एक तरफ 'राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण' (NDMA) सतर्कता की बात करता है, वहीं दूसरी तरफ संवेदनशील ढलानों पर भारी निर्माण की अनुमति दी जा रही है।
- वृक्षारोपण का भ्रम: 7,000 पुराने देवदार के पेड़ों के बदले कहीं और नए पौधे लगाना 'पारिस्थितिकी प्रतिस्थापन' नहीं है, क्योंकि देवदार को पनपने में सदियाँ लगती हैं।
सामाजिक-आर्थिक प्रभाव
- पारिस्थितिक शरणार्थी: आपदाओं के कारण पहाड़ों से पलायन बढ़ा है, जिससे मैदानों पर जनसांख्यिकीय दबाव बढ़ रहा है।
- आजीविका का संकट: कृषि योग्य भूमि का भूस्खलन में बह जाना और सेब के बागानों का नष्ट होना पहाड़ी अर्थव्यवस्था को खोखला कर रहा है।
- सांस्कृतिक क्षति: सदियों पुराने मठों और गांवों का अस्तित्व मिटने से हिमालयी संस्कृति का ह्रास हो रहा है।
कूटनीतिक और रणनीतिक आयाम
हिमालय में बुनियादी ढांचा निर्माण का एक बड़ा हिस्सा सैन्य सुरक्षा से जुड़ा है:
- चीन की चुनौती: वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर चीनी निर्माण के जवाब में भारत को तीव्र कनेक्टिविटी की आवश्यकता है।
- रणनीतिक स्वायत्तता: यदि पहाड़ अस्थिर होते हैं, तो युद्ध की स्थिति में सेना की रसद लाइनें अवरुद्ध हो सकती हैं, जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जोखिम है।
- क्षेत्रीय नेतृत्व: भारत का 'नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर' का दर्जा उसके आपदा प्रबंधन कौशल पर निर्भर करता है। हिमालयी आपदाएं दक्षिण एशिया में भारत की सॉफ्ट पावर को प्रभावित करती हैं।
आगे का रास्ता:
- संचयी प्रभाव आकलन: केवल एक प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि पूरे रिवर बेसिन पर पड़ने वाले संयुक्त प्रभाव की जांच हो।
- ज़ोनिंग और सीमा निर्धारण: 'इको-सेंसिटिव ज़ोन' में किसी भी प्रकार के भारी निर्माण पर पूर्ण प्रतिबंध।
- वैकल्पिक तकनीक: ब्लास्टिंग के स्थान पर अत्याधुनिक टनलिंग तकनीक और 'स्लोप स्टेबलाइजेशन' के जैविक तरीकों का प्रयोग।
- हिमालयी परिषद का गठन: हिमालयी राज्यों के लिए एक एकीकृत निकाय जो केवल पारिस्थितिकी-अनुकूल विकास की निगरानी करे।
निष्कर्ष
हिमालय का संरक्षण केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि भारत की अस्तित्वगत सुरक्षा का विषय है। विकास की वह अवधारणा जो अपनी नींव में ही विनाश के बीज बोती हो, लंबे समय तक टिक नहीं सकती। धराली और हर्षिल के देवदार केवल पेड़ नहीं, बल्कि हिमालय के फेफड़े हैं। भारत को अपनी 'पहाड़ नीति' में 'इकोनॉमी' से ऊपर 'इकोलॉजी' को रखना होगा, क्योंकि जैसा कि गांधीजी ने कहा था— "प्रकृति के पास सबकी जरूरत के लिए पर्याप्त है, पर लालच के लिए नहीं।"