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भारतीय अर्थव्यवस्था के समक्ष वर्तमान चुनौतियाँ: सुस्त मांग, बढ़ते आयात और कोर सेक्टर की हकीकत

सामान्य अध्ययन पेपर – III:  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन।

संदर्भ

किसी भी अर्थव्यवस्था की सेहत का अंदाजा उसके बुनियादी (कोर) औद्योगिक क्षेत्रों और विनिर्माण गतिविधियों से लगाया जाता है। जब हम अतीत के सांख्यिकीय रुझानों और कम आधार प्रभाव से लेकर वर्तमान के आंकड़ों तक की यात्रा पर नजर डालते हैं, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था इस समय एक महत्वपूर्ण और चुनौतीपूर्ण मोड़ पर खड़ी है। जहाँ एक तरफ कुछ क्षेत्रों में सुधार के संकेत दिखते हैं, वहीं दूसरी तरफ बढ़ती घरेलू सुस्ती और वैश्विक अनिश्चितताएं एक नया संकट पैदा कर रही हैं।

भारतीय अर्थव्यवस्था

भारतीय अर्थव्यवस्था वर्तमान में मिश्रित दौर से गुजर रही है, जहाँ एक ओर कुछ बुनियादी क्षेत्र  सकारात्मक वृद्धि दिखा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर समग्र मांग में सुस्ती और बाह्य दबाव अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय बने हुए हैं।

वर्तमान चर्चा के कारण

  • कोर सेक्टर के विकास में सुस्ती: जुलाई महीने में भारत के कोर औद्योगिक क्षेत्रों की वृद्धि दर घटकर 5.4% रह गई, जो पिछले महीने 6% थी।

  • मैन्युफैक्चरिंग पीएमआई में गिरावट: कमजोर घरेलू मांग के कारण मैन्युफैक्चरिंग पर्चेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (PMI) अगस्त 2021 के बाद के अपने सबसे निचले स्तर पर गया है।
  • वैश्विक और बाह्य कारक: कच्चे तेल की ऊंची कीमतें, अमेरिका द्वारा रूसी तेल आयातकों पर 100% टैरिफ लगाने की तैयारी, और वैश्विक अनिश्चितताएं इस चर्चा का मुख्य केंद्र हैं।

भारत की वर्तमान अर्थव्यवस्था की स्थिति और आंकड़े

  • कोर इंडस्ट्रीज इंडेक्स (ICI): जुलाई में वृद्धि दर घटकर 5.4% पर गई, हालांकि यह पिछले सात महीनों में दूसरी सबसे ऊंची वृद्धि दर थी।

  • कोयला सेक्टर: इसमें 11 महीने का उच्च स्तर (7.6% की वृद्धि) देखा गया, लेकिन इसका मुख्य कारण पिछले वर्ष जुलाई की 12.3% की बड़ी गिरावट (लो बेस इफ़ेक्ट) था।
  • रिफाइनरी उत्पाद और लौह अयस्क: रिफाइनरी उत्पादों में 2.7% की वृद्धि दर्ज की गई (जो जुलाई 2025 की गिरावट पर आधारित थी), जबकि लौह अयस्क क्षेत्र में 29.5% की मजबूत वृद्धि रही।
  • स्टील सेक्टर: स्टील क्षेत्र की वृद्धि में भारी गिरावट आई और यह घटकर 2.9% (जून के 5.6% और पिछले साल के 15.7% से कम) पर गया।
  • ऊर्जा और आयात: जुलाई में कच्चे तेल का आयात आयतन के हिसाब से 13.3% बढ़ा, जिससे आयात बिल में 41% की भारी उछाल आई। एलएनजी (LNG) आयात में 1.5% की मामूली वृद्धि दर्ज हुई।
  • उज्ज्वल बिंदु: सीमेंट क्षेत्र की वृद्धि गति पकड़कर 13.1% हो गई, और बिजली क्षेत्र में 9% की मजबूत वृद्धि दर्ज की गई।

इन स्थितियों के कारण

  • सांख्यिकीय कम आधार प्रभाव: कई सेक्टरों की मौजूदा ऊंची वृद्धि दर वास्तव में पिछले साल के बेहद कमजोर प्रदर्शन के आंकड़ों पर टिकी हुई है।

  • घरेलू मांग में कमी: कमजोर घरेलू मांग और क्रय शक्ति में कमी के कारण विनिर्माण और अन्य उद्योग प्रभावित हुए हैं।
  • कच्चे तेल की बढ़ती लागत और आयात पर निर्भरता: घरेलू कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस क्षेत्र पिछले 14 महीनों से लगातार संकुचन का शिकार हैं, जिससे आयात बिल अप्रत्याशित रूप से बढ़ गया है।
  • भू-राजनीतिक दबाव: अमेरिका जैसे देशों द्वारा रूस से तेल आयात करने वाले देशों पर लगाए जाने वाले भारी टैरिफ का खतरा।

भविष्य की स्थिति को लेकर चिंताएँ

  • निर्यातकों पर भारी बोझ: अमेरिकी टैरिफ नीतियों के कारण भारतीय निर्यातकों की राह कठिन हो सकती है।

  • बाह्य निर्भरता की उच्च लागत: तेल की लगातार बढ़ती कीमतों और महंगे आयात से देश का विदेशी मुद्रा भंडार और राजकोषीय घाटा दबाव में सकता है।
  • व्यापक मंदी का खतरा: यदि घरेलू मांग में सुधार नहीं हुआ, तो यह सुस्ती अन्य क्षेत्रों में भी फैल सकती है, जिससे बेरोजगारी और औद्योगिक ठहराव का जोखिम बढ़ जाएगा।

विश्लेषण:

आंकड़ों से स्पष्ट है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की सतह के नीचे कई संरचनात्मक और सांख्यिकीय कमजोरियां छिपी हैं। कुछ क्षेत्रों (जैसे सीमेंट और बिजली) को छोड़कर अधिकांश क्षेत्र या तो कमजोर आधार प्रभाव पर चल रहे हैं या फिर वैश्विक अनिश्चितताओं से घिरे हैं।

आगे की राह:

  • घरेलू मांग को पुनर्जीवित करने के लिए लक्षित राजकोषीय उपायों की आवश्यकता है।

  • ऊर्जा सुरक्षा के लिए नवीकरणीय ऊर्जा और घरेलू तेल-गैस के उत्पादन में तेजी लानी होगी।
  • भू-राजनीतिक व्यापारिक जोखिमों से निपटने के लिए निर्यात बाजारों में विविधता लानी चाहिए।


निष्कर्ष

भारतीय अर्थव्यवस्था वर्तमान में सुस्त मांग, उच्च लागत और संभलती हुई वृद्धि के एक नाजुक दौर से गुजर रही है। यदि समय रहते नीतिगत स्तर पर प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में देश को कड़े आर्थिक दबावों का सामना करना पड़ सकता है।