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सामान्य अध्ययन पेपर – III प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन।
संदर्भ
वर्तमान में बैटरियां हमारे आधुनिक जीवन का अभिन्न अंग बन चुकी हैं। मोबाइल फोन और लैपटॉप से लेकर इलेक्ट्रिक वाहन (EV) और बड़े पैमाने पर ऊर्जा भंडारण प्रणालियों (BESS) तक, बैटरियां आर्थिक विकास और स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण का आधार हैं। हालांकि, लिथियम-आयन बैटरियों पर अत्यधिक वैश्विक निर्भरता ने भारत जैसे देशों के लिए नई चुनौतियां पेश कर दी हैं।
लिथियम-आयन का प्रभुत्व और सीमाएं
पिछले दो दशकों में, लिथियम-आयन तकनीक अपनी उच्च ऊर्जा घनत्व और लंबे जीवन चक्र के कारण दुनिया भर में हावी रही है।
- लागत में भारी गिरावट: 2010 में जो बैटरी $1,100/kWh थी, वह 2025 तक गिरकर $108/kWh पर आ गई है।
- चुनौतियां: भारत के पास लिथियम, कोबाल्ट और निकल जैसे महत्वपूर्ण खनिजों के पर्याप्त भंडार नहीं हैं। यह हमें आयात और जटिल वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर निर्भर बनाता है, जो ऊर्जा सुरक्षा के लिए एक बड़ा जोखिम है।
सोडियम-आयन: एक सशक्त विकल्प क्यों?
सोडियम-आयन बैटरियां लिथियम-आयन की संरचनात्मक बाधाओं का एक ठोस समाधान पेश करती हैं:
- सामग्री की प्रचुरता: सोडियम (नमक का मुख्य घटक) पृथ्वी पर प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। यह लिथियम की तुलना में सस्ता और सुलभ है, जिससे कच्चे माल का जोखिम कम हो जाता है।
- सुरक्षा और स्थिरता: सोडियम-आयन बैटरियां अधिक सुरक्षित होती हैं। इन्हें 'जीरो वोल्ट' पर डिस्चार्ज करके सुरक्षित रूप से ट्रांसपोर्ट किया जा सकता है, जबकि लिथियम बैटरियों के साथ आग लगने का खतरा अधिक रहता है।
- बुनियादी ढांचे की अनुकूलता: सबसे बड़ा लाभ यह है कि सोडियम-आयन बैटरियों का निर्माण मौजूदा लिथियम-आयन विनिर्माण लाइनों पर ही किया जा सकता है। इसके लिए नई फैक्ट्रियों की आवश्यकता नहीं है।
- बेहतर प्रदर्शन: ये बैटरियां तेजी से चार्ज होती हैं और अत्यधिक ठंडे या गर्म तापमान में भी बेहतर दक्षता बनाए रखती हैं।
आयात निर्भरता और पर्यावरणीय प्रभाव:
सोडियम-आयन तकनीक न केवल आर्थिक, बल्कि रणनीतिक और पर्यावरणीय दृष्टि से भी श्रेष्ठ है:
- रणनीतिक स्वतंत्रता: वर्तमान में भारत लिथियम के लिए चीन और 'लिथियम ट्राएंगल' देशों पर निर्भर है। सोडियम की स्थानीय प्रचुरता इस आयात निर्भरता को समाप्त कर भारत की विदेशी मुद्रा बचाएगी और 'ऊर्जा संप्रभुता' सुनिश्चित करेगी।
- सतत खनन: लिथियम और कोबाल्ट का खनन जल-गहन और विनाशकारी होता है। इसके विपरीत, सोडियम का निष्कर्षण पर्यावरण के लिए कम हानिकारक है और पारिस्थितिकी तंत्र पर कम दबाव डालता है।
- विषाक्तता में कमी: इन बैटरियों में कोबाल्ट और निकल जैसे भारी व जहरीले धातुओं का उपयोग नहीं होता, जिससे मिट्टी और भूजल के प्रदूषण का जोखिम न्यूनतम हो जाता है।
- सर्कुलर इकोनॉमी: सोडियम-आयन बैटरियों को रीसायकल करना आसान और सुरक्षित है। साथ ही, स्थानीय स्तर पर सामग्री उपलब्ध होने से वैश्विक शिपिंग से होने वाला कार्बन उत्सर्जन भी कम होता है।
विश्लेषण
भारत के लिए यह केवल एक तकनीकी बदलाव नहीं, बल्कि एक रणनीतिक आवश्यकता है।
- आर्थिक पहलू: यदि भारत सोडियम-आयन को अपनाता है, तो वह 'आयात-निर्भर' देश से 'आत्मनिर्भर' ऊर्जा उत्पादक बन सकता है।
- बाजार का दायरा: हालांकि सोडियम-आयन की ऊर्जा घनत्व लिथियम से थोड़ी कम हो सकती है, लेकिन यह टू-व्हीलर, ई-रिक्शा और ग्रिड स्टोरेज (जहां वजन से ज्यादा लागत मायने रखती है) के लिए सबसे उपयुक्त है।
आगे की राह
- अनुसंधान और विकास: सरकार को सोडियम-आयन के ऊर्जा घनत्व को और बेहतर बनाने के लिए प्रयोगशालाओं और स्टार्टअप्स को प्रोत्साहित करना चाहिए।
- PLI योजना का विस्तार: 'प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव' (PLI) योजना में विशेष रूप से सोडियम-आयन तकनीक को शामिल करना चाहिए ताकि कंपनियां इस ओर रुख करें।
- मिश्रित रणनीति: भारत को 'एक ही तकनीक सबके लिए' के बजाय एक मिश्रित मॉडल अपनाना चाहिए— लंबी दूरी की कारों के लिए लिथियम और घरेलू उपकरणों व छोटे वाहनों के लिए सोडियम।
- घरेलू आपूर्ति श्रृंखला: सोडियम निष्कर्षण और एनोड/कैथोड सामग्री के स्थानीय उत्पादन पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
निष्कर्ष
भविष्य बैटरियों से संतृप्त होगा। भारत की ऊर्जा सुरक्षा केवल लिथियम के भरोसे नहीं छोड़ी जा सकती। सोडियम-आयन तकनीक न केवल सामग्री के जोखिम को कम करती है, बल्कि यह भारत को वैश्विक स्वच्छ ऊर्जा बाजार में एक अग्रणी खिलाड़ी के रूप में स्थापित करने की क्षमता रखती है। इस तकनीक को अपनाना भारत के लिए ऊर्जा स्वतंत्रता और 2070 तक 'नेट जीरो' लक्ष्य की प्राप्ति की दिशा में एक निर्णायक कदम होगा।