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सामान्य अध्ययन पेपर – III  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन

संदर्भ

मेघालय और असम के कोयला बेल्ट में रैट-होल माइनिंग की जड़ें औपनिवेशिक काल के बाद के आर्थिक ढांचे में निहित हैं। 1970 के दशक से शुरू हुई यह प्रथा 1980 और 90 के दशक में अपने चरम पर पहुँची। हालाँकि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने 2014 में इस पर प्रतिबंध लगा दिया था, लेकिन यह प्रथा 'अदृश्य' रूप से आज भी फल-फूल रही है। हालिया 2025-26 की खदान दुर्घटनाओं ने यह सिद्ध कर दिया है कि कागजी प्रतिबंध और धरातलीय वास्तविकता के बीच एक गहरी खाई है, जो सीधे तौर पर मानव अधिकारों और पारिस्थितिकी का उल्लंघन है।

रैट-होल माइनिंग: तकनीक और सामान्य विधियों की अनुपलब्धता

रैट-होल माइनिंग क्या है?

यह एक ऐसी आदिम तकनीक है जिसमें ऊर्ध्वाधर शाफ्ट खोदने के बाद 3-4 फीट की क्षैतिज संकीर्ण सुरंगें बनाई जाती हैं।

सामान्य विधियों (ओपन-कास्ट /लार्ज स्केल) से खनन क्यों नहीं?

  • भौगोलिक संरचना: मेघालय में कोयले की परतें बहुत पतली (0.5 से 2 मीटर) हैं। यहाँ आधुनिक मशीनों या 'ओपन-कास्ट' माइनिंग के लिए बड़े स्तर पर पहाड़ों को काटना आर्थिक रूप से व्यावहारिक नहीं माना जाता।
  • भूमि स्वामित्व: यहाँ भूमि का स्वामित्व सरकार के पास होकर समुदायों या व्यक्तियों के पास है। बड़ी कंपनियाँ भूमि अधिग्रहण की जटिलताओं के कारण यहाँ सीधे निवेश से कतराती हैं, जिसके कारण छोटे स्तर के निजी मालिक रैट-होल पद्धति चुनते हैं।
  • लागत: आधुनिक खनन में सुरक्षा मानकों और पर्यावरण प्रबंधन पर भारी खर्च होता है, जिससे बचने के लिए 'चोरी-छिपे' रैट-होल खनन को प्राथमिकता दी जाती है।

हालिया घटनाक्रम और ज्वलंत मुद्दे

हाल की रिपोर्टों (फरवरी 2026) के अनुसार, मेघालय के ईस्ट जयंतिया हिल्स में हुए विस्फोट में 33 श्रमिकों की जान जाना इस बात का प्रमाण है कि सुरक्षा मानक शून्य हैं।

  • प्रमुख बिंदु: 15,000 टन अवैध कोयले की जब्ती दर्शाती है कि खनन का पैमाना 'कुटीर उद्योग' से बढ़कर एक संगठित 'माफिया सिंडिकेट' बन चुका है।
  • मुद्दा: असम-अरुणाचल सीमा पर आरक्षित वनों के भीतर अवैध खनन का विस्तार, जिसे अब वन्यजीव अभयारण्य घोषित करने की मांग उठ रही है। उन्होंने मांग की है कि कोयला बेल्ट में स्थित पाँच आरक्षित वनों को तत्काल वन्यजीव अभयारण्यों में अपग्रेड किया जाए।
  • उद्देश्य: इन वनों को वन्यजीव अभयारण्य का दर्जा मिलने से यहाँ किसी भी प्रकार की व्यावसायिक गतिविधि या खनन पर पूर्णतः कानूनी रोक लग जाएगी। यह कदम केवल अवैध खनन को रोकेगा, बल्कि हाथियों के गलियारों और जैव-विविधता को भी सुरक्षित करेगा।

आवश्यकता बनाम विवाद

यहाँ 'आवश्यकता' केवल गरीब मजदूर की नहीं, बल्कि एक बड़े आर्थिक तंत्र की है:

  • सरकारी और कंपनी की आवश्यकता: सरकार को राजस्व (Royalty) की आवश्यकता होती है, और सीमेंट तथा बिजली संयंत्रों (बड़ी कंपनियों) को सस्ते ईंधन की। औपचारिक माइनिंग की तुलना में रैट-होल माइनिंग से निकलने वाला कोयला सस्ता पड़ता है क्योंकि इसमें श्रम कानूनों और सुरक्षा मानकों का कोई खर्च नहीं होता।
  • स्थानीय आवश्यकता: मेघालय जैसे राज्यों में कृषि योग्य भूमि की कमी और औद्योगिक विकल्पों के अभाव में, स्थानीय आबादी के लिए यह एकमात्र 'कैश क्रॉप' की तरह है।
  • पर्यावरणीय असुरक्षा का स्वरूप:
    • एसिड माइन ड्रेनेज  (AMD): कोयले में मौजूद सल्फर जब ऑक्सीजन और पानी के संपर्क में आता है, तो सल्फ्यूरिक एसिड बनाता है। इससे कोपिल जैसी नदियाँ पूरी तरह 'नीली और मृत' हो चुकी हैं (pH मान अत्यंत कम)
    • भू-धंसाव: अनियंत्रित सुरंगों के कारण भविष्य में बड़े भूस्खलन और जमीन धंसने का खतरा बना रहता है।

कानूनी एवं संवैधानिक संरक्षण और विरोधाभास

  • छठी अनुसूची: संविधान की यह अनुसूची जनजातीय समुदायों को उनकी भूमि और संसाधनों पर अधिकार देती है। इसी का लाभ उठाकर खनन माफिया तर्क देते हैं कि राज्य के माइनिंग कानून उनकी निजी भूमि पर लागू नहीं होते।
  • कानूनी अनुमति: हाल के वर्षों में सुप्रीम कोर्ट ने 'साइंटिफिक माइनिंग प्लान' के तहत खनन की अनुमति देने की बात कही है, लेकिन इसके लिए कड़े लाइसेंसिंग की आवश्यकता है जिसे रैट-होल माइनिंग पूरा नहीं करती।
  • प्रवर्तन की विफलता: खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम (MMDR Act) के बावजूद, स्थानीय प्रशासन और खनन समूहों के बीच कथित सांठगांठ के कारण कानून का डर बेअसर है।

सामाजिक और आर्थिक प्रभाव

  • मानव तस्करी और बाल श्रम: संकरी सुरंगों में बच्चों की मांग अधिक होती है, जिससे मानव तस्करी को बढ़ावा मिलता है।
  • स्वास्थ्य संकट: श्रमिकों में सिलिकोसिस, तपेदिक (TB) और श्वसन संबंधी गंभीर बीमारियाँ आम हैं।
  • सामाजिक अस्थिरता: बाहरी राज्यों (असम, नेपाल, बांग्लादेश) से आने वाले सस्ते श्रमिकों और स्थानीय लोगों के बीच जनसांख्यिकीय तनाव और संघर्ष की स्थिति बनी रहती है।

अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य और वैश्विक चिंताएँ

  • अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, रैट-होल माइनिंग को 'आर्टिसनल एंड स्मॉल-स्केल माइनिंग' (ASM) की सबसे खतरनाक श्रेणी में रखा जाता है, जिसकी संयुक्त राष्ट्र (UN) और अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) द्वारा कड़ी आलोचना की जाती है।
  • वैश्विक मानवाधिकार संस्थाएँ इसे आधुनिक गुलामी और बाल श्रम के एक गंभीर रूप के रूप में देखती हैं, क्योंकि इसमें अक्सर तस्करी कर लाए गए बच्चों का उपयोग किया जाता है।
  • पर्यावरण के मोर्चे पर, अंतरराष्ट्रीय समुदाय इसे जैव-विविधता के लिए 'अपूरणीय क्षति' मानता है, जो वैश्विक जलवायु लक्ष्यों (जैसे पेरिस समझौता) के विरुद्ध है।
  • कई देशों में इसे पूरी तरह अवैध घोषित किया गया है, क्योंकि यह केवल श्रमिकों की सुरक्षा के वैश्विक मानकों का उल्लंघन करता है, बल्कि सीमा पार जल प्रदूषण का कारण भी बनता है।

भविष्य की पीढ़ी पर प्रभाव और चुनौतियाँ

आने वाली पीढ़ी के लिए यह एक 'पारिस्थितिक आपदा' है:

  • संसाधनों का अभाव: जल स्रोतों का जहरीला होना भविष्य की पीढ़ियों के लिए पीने के पानी का संकट पैदा करेगा।
  • शिक्षा का अभाव: खनन में लगे बच्चों की पीढ़ी शिक्षा से दूर होकर केवल शारीरिक श्रम के दुष्चक्र में फंस रही है।
  • भूमि की उर्वरता: एसिड वर्षा और मिट्टी के कटाव से भविष्य में कृषि करना असंभव हो जाएगा।

आगे की राह

  • साइंटिफिक माइनिंग का कार्यान्वयन: सरकार को छोटे खदान मालिकों को आधुनिक और सुरक्षित तकनीक (जैसे- Auger Mining) के लिए सब्सिडी और तकनीकी सहायता देनी चाहिए।
  • आर्थिक विविधीकरण: पर्यटन, हस्तशिल्प और औषधीय खेती जैसे वैकल्पिक रोजगार सृजित करना अनिवार्य है।
  • सख्त निगरानी: सैटेलाइट मैपिंग और ड्रोन सर्विलांस के जरिए अवैध परिवहन पर रोक लगाना।
  • पुनर्वास कोष: खनन से प्राप्त राजस्व का एक बड़ा हिस्सा पर्यावरण को पुनर्जीवित करने में खर्च होना चाहिए।

निष्कर्ष

रैट-होल माइनिंग एक जटिल मानवीय त्रासदी है जो आर्थिक मजबूरी और प्रशासनिक विफलता की कोख से जन्मी है। यह केवल कोयला निकालने की विधि नहीं, बल्कि पर्यावरण के साथ किया जा रहा एक ऐसा समझौता है जिसकी कीमत भविष्य की पीढ़ियाँ चुकाएंगी। यदि सरकार और कंपनियाँ केवल मुनाफे को प्राथमिकता देती रहीं, तो यह 'चूहों की बिल' जैसी सुरंगें पूरे उत्तर-पूर्व के पारिस्थितिक तंत्र को निगल जाएंगी। न्यायपूर्ण समाधान वही है जो 'खनिज' से अधिक 'मनुष्य' और 'प्रकृति' को महत्व दे।

सामान्य अध्ययन पेपर – III  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन

संदर्भ एवं पृष्ठभूमि

वैश्विक अस्थिरता और सीमाओं पर बढ़ते खतरों के बीच, भारत सरकार ने अपनी सैन्य क्षमता को 'भविष्य के युद्धों' के लिए तैयार करने की दिशा में अब तक का सबसे बड़ा कदम उठाया है। रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) द्वारा 114 राफेल जेट और उन्नत P-8I विमानों सहित 3.60 लाख करोड़ के प्रस्तावों को दी गई मंजूरी केवल वायुसेना की घटती स्क्वाड्रन संख्या को संबल प्रदान करेगी, बल्कि यह भारत के 'रणनीतिक स्वायत्तता' के संकल्प को भी मजबूती प्रदान करती है।

रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC):

रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) भारत के रक्षा मंत्रालय के भीतर शीर्ष निर्णय लेने वाली संस्था है।

  • अध्यक्षता: इसकी अध्यक्षता केंद्रीय रक्षा मंत्री करते हैं।
  • गठन: इसका गठन 2001 में 'कारगिल युद्ध' के बाद रक्षा प्रबंधन प्रणाली में सुधार के लिए किया गया था।
  • मुख्य कार्य: सशस्त्र बलों (थल, जल, वायु) के लिए पूंजीगत अधिग्रहण की नई नीतियों और सौदों पर निर्णय लेना।
    • एक्सेप्टेन्स ऑफ़ नेसेसिटी (AoN) प्रदान करना, जो किसी भी सैन्य खरीद की प्रक्रिया का पहला और अनिवार्य चरण है।
    • स्वदेशी रक्षा उत्पादन और 'मेक इन इंडिया' को बढ़ावा देने के लिए खरीद प्राथमिकताओं को निर्धारित करना।

चर्चा के कारण: हालिया महत्वपूर्ण घटनाक्रम

फरवरी 2026 में DAC की बैठक ने भारतीय रक्षा इतिहास के कुछ सबसे बड़े सौदों पर मुहर लगाई है:

  • राफेल डील (MRFA): भारतीय वायुसेना के लिए 3.25 लाख करोड़ की लागत से 114 राफेल लड़ाकू जेट की खरीद को मंजूरी। खास बात यह है कि इनका उत्पादन 'प्रौद्योगिकी हस्तांतरण' (ToT) के माध्यम से भारत में होगा।
  • नौसेना की ताकत: समुद्री निगरानी बढ़ाने के लिए अमेरिका से छह P-8I टोही विमानों की खरीद को स्वीकृति।
  • अत्याधुनिक तकनीक: वायुसेना के लिए 'एयर-शिप बेस्ड स्यूडो सैटेलाइट' के लिए AoN प्रदान किया गया, जो संचार और निगरानी में क्रांतिकारी बदलाव लाएगा।
  • मैक्रों की यात्रा: फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की भारत यात्रा (फरवरी 17) के दौरान इन समझौतों पर अंतिम हस्ताक्षर होने की संभावना है।

समाचार का महत्व, आवश्यकता और प्रभाव

  • वायुसेना की जरूरत: भारतीय वायुसेना वर्तमान में लड़ाकू विमानों की कमी (स्क्वाड्रन स्ट्रेंथ में गिरावट) से जूझ रही है। यह सौदा 42 स्क्वाड्रन के लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में निर्णायक है।
  • ऑपरेशन सिंदूर का संदर्भ: हालिया रक्षा तनावों (जैसे ऑपरेशन सिंदूर) के बाद उत्पन्न हुए सुरक्षा खतरों को देखते हुए, उन्नत रडार और स्वदेशी हथियार प्रणालियों से लैस विमानों की तत्काल आवश्यकता है।
  • सामरिक संतुलन: हिंद महासागर में चीन की बढ़ती पैठ को रोकने के लिए P-8I विमान नौसेना की 'आंखों' के रूप में कार्य करेंगे।

विश्लेषण

यह मेगा-रक्षा सौदा 'रणनीतिक संतुलन' और 'स्वदेशीकरण' का एक बेहतरीन मिश्रण है।

  • टू-फ्रंट वॉर की तैयारी: एक साथ दो मोर्चों (चीन और पाकिस्तान) पर बढ़ती चुनौतियों के बीच राफेल जैसे 'कॉम्बैट प्रूवन' विमान भारत को हवाई बढ़त प्रदान करते हैं।
  • प्रौद्योगिकी हस्तांतरण (ToT): डसॉल्ट एविएशन के साथ भारत में उत्पादन का समझौता 'डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग' के क्षेत्र में भारत को वैश्विक हब बनाने की दिशा में बड़ा कदम है।
  • वित्तीय प्रबंधन: वित्तीय वर्ष की अंतिम तिमाही में इतनी बड़ी मंजूरी दिखाना यह सुनिश्चित करता है कि आवंटित रक्षा बजट का पूर्ण और प्रभावी उपयोग हो सके।

आगे की राह

  • त्वरित कार्यान्वयन: AoN के बाद अब 'कैबिनेट समिति' (CCS) की मंजूरी और अनुबंध पर हस्ताक्षर की प्रक्रिया को तेज किया जाना चाहिए ताकि विमानों की डिलीवरी में देरी हो।
  • इंटीग्रेशन: स्वदेशी अस्त्र, मिसाइल और उत्तम रडार को इन विदेशी विमानों के साथ एकीकृत करना हमारी 'आत्मनिर्भरता' की असली परीक्षा होगी।
  • नौकरशाही बाधाओं का सरलीकरण: रक्षा खरीद की लंबी प्रक्रियाओं को और सरल बनाने की आवश्यकता है ताकि 'प्रौद्योगिकी' मिलने तक वह पुरानी पड़ जाए।

निष्कर्ष

₹3.60 लाख करोड़ के इन रक्षा सौदों की मंजूरी भारत की रक्षा नीति में 'पैराडाइम शिफ्ट' का प्रतीक है। यह स्पष्ट करता है कि भारत अपनी संप्रभुता से कोई समझौता नहीं करेगा। तकनीक हस्तांतरण और स्वदेशी हथियारों के साथ राफेल का भारतीय संस्करण केवल वायुसेना की मारक क्षमता बढ़ाएगा, बल्कि भविष्य में भारत को रक्षा निर्यातक बनाने के मार्ग को भी प्रशस्त करेगा।

सामान्य अध्ययन पेपर – III  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन

संदर्भ

भारत के केंद्रीय बजट 2026-27 ने देश की 'नेट जीरो' प्रतिबद्धताओं की ओर एक निर्णायक कदम बढ़ाया है। यह बजट केवल वित्तीय आवंटन नहीं, बल्कि औद्योगिक प्रदूषण को नियंत्रित करने वाली अत्याधुनिक तकनीकों के प्रति भारत के बदलते दृष्टिकोण का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है।

वर्तमान समाचार और प्रमुख घोषणा (CCUS प्रोजेक्ट)

हाल ही में घोषित बजट में सरकार ने कार्बन कैप्चर, यूटिलाइजेशन एंड स्टोरेज (CCUS) के लिए 5 वर्षों हेतु ₹20,000 करोड़ के परिव्यय की घोषणा की है।

  • CCUS क्या है?
  • यह एक ऐसी उन्नत तकनीक है जो औद्योगिक प्रक्रियाओं या बिजली उत्पादन से उत्पन्न होने वाली कार्बन डाइऑक्साइड CO2 को वायुमंडल में जाने से पहले ही कैप्चर (सोखना) कर लेती है। इसके बाद इस CO2 का या तो औद्योगिक रूप से पुन: उपयोग किया जाता है या इसे जमीन के नीचे सुरक्षित रूप से भंडारित कर दिया जाता है।

CCUS का महत्व

  • ग्लोबल वार्मिंग पर नियंत्रण: यह वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों के संचय को सीधे तौर पर कम करने में सहायक है।
  • अर्थव्यवस्था का डिकार्बोनाइजेशन: यह भारत को अपनी ऊर्जा सुरक्षा से समझौता किए बिना उत्सर्जन कम करने का मार्ग प्रशस्त करता है।
  • तकनीकी नेतृत्व: ₹20,000 करोड़ का निवेश भारत को वैश्विक हरित तकनीक बाजार में एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में स्थापित करेगा।

भारी उद्योग

CCUS तकनीक उन उद्योगों के लिए "गेम-चेंजर" है जहाँ नवीकरणीय ऊर्जा (सौर या पवन) के माध्यम से उत्सर्जन को कम करना तकनीकी रूप से कठिन है:

  • स्टील और सीमेंट: इन उद्योगों की रासायनिक प्रक्रियाओं में CO2 का उत्सर्जन अनिवार्य है, जिसे केवल CCUS द्वारा ही रोका जा सकता है।
  • एल्युमिनियम और रिफाइनरी: इन उच्च-तापमान वाले क्षेत्रों में ऊर्जा दक्षता बढ़ाने के बावजूद होने वाले उत्सर्जन को यह तकनीक शून्य की ओर ले जा सकती है।

चुनौतियाँ

सरकार के इरादे स्पष्ट हैं लेकिन कार्यान्वयन में कई बाधाएं हैं:

  • उच्च लागत: वैश्विक स्तर पर (नॉर्वे, कनाडा और अमेरिका) यह देखा गया है कि CCUS एक अत्यंत महंगी तकनीक है। 20,000 करोड़ की राशि पायलट प्रोजेक्ट्स के लिए तो ठीक है, लेकिन औद्योगिक स्तर पर इसे बड़े पैमाने पर लागू करने के लिए नाकाफी हो सकती है।
  • सतर्क आवंटन: बजट में "बड़ी घोषणाओं" के मुकाबले वास्तविक वित्तीय प्रवाह सीमित और "सावधानीपूर्ण" है, जो निजी निवेशकों को संशय में डाल सकता है।
  • बुनियादी ढांचा: कैप्चर की गई CO2 को ले जाने के लिए पाइपलाइनों और स्टोरेज साइटों का निर्माण एक बड़ी इंजीनियरिंग चुनौती है।

आगे की राह

  • पीपीपी मॉडल: सरकार को निजी क्षेत्र के निवेश को आकर्षित करने के लिए कर प्रोत्साहन और सब्सिडी देनी चाहिए।
  • अंतरराष्ट्रीय सहयोग: भारत को नॉर्वे और कनाडा जैसे देशों से तकनीकी विशेषज्ञता साझा करने के लिए द्विपक्षीय समझौते करने चाहिए।
  • अनुसंधान एवं विकास: इस तकनीक की लागत कम करने के लिए स्वदेशी अनुसंधान को प्राथमिकता देनी होगी।

निष्कर्ष

बजट 2026-27 भारत की "ग्रीन ट्रांजिशन" यात्रा का एक महत्वाकांक्षी अध्याय है। CCUS पर ध्यान केंद्रित करना यह दर्शाता है कि भारत जलवायु परिवर्तन के प्रति अपनी वैश्विक जिम्मेदारी को समझता है। हालाँकि, केवल वित्तीय परिव्यय पर्याप्त नहीं होगा; वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकार कितनी कुशलता से तकनीकी चुनौतियों और वैश्विक आर्थिक उतार-चढ़ाव के बीच इन नीतियों को धरातल पर उतारती है।

सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र-III: प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन

संदर्भ

वैश्विक भू-राजनीतिक अस्थिरता और सीमाओं पर बढ़ते तनाव के बीच, भारत का केंद्रीय बजट 2026-27 राष्ट्रीय सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देता है। यह बजट केवल सैन्य खर्च में वृद्धि नहीं है, बल्कि 'नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था' के ढहने और उभरती नई चुनौतियों के बीच भारत के रणनीतिक दृढ़ संकल्प का एक स्पष्ट संदेश है।

भारत का रक्षा बजट: वैश्विक तुलना और स्थिति

स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) की 2025-26 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत सैन्य खर्च के मामले में विश्व स्तर पर 5वें स्थान पर बना हुआ है।

देश

सैन्य खर्च (अनुमानित 2024-25/26)

GDP का हिस्सा (%)

अमेरिका

~$997 बिलियन

~3.4%

चीन

~$314 बिलियन

~1.3%

रूस

~$149 बिलियन

~5.9%

जर्मनी

~$$108 - $115 बिलियन (फंड सहित)

~2.5%

भारत

~$93.5 बिलियन (7.85 लाख करोड़)

~2.0%


नोट: यद्यपि भारत 5वें स्थान पर है, लेकिन चीन का रक्षा बजट भारत की तुलना में लगभग 4 गुना अधिक है, जो क्षेत्रीय असंतुलन को चुनौती देता है।

वर्तमान समाचार: रक्षा बजट 2026-27 की प्रमुख घोषणाएं

वित्त मंत्री ने रक्षा मंत्रालय के लिए ₹7.85 लाख करोड़ के ऐतिहासिक आवंटन की घोषणा की है, जो पिछले बजट (BE 2025-26) की तुलना में 15.2% की वृद्धि है।

  • आधुनिकीकरण की ओर झुकाव: पूंजीगत व्यय में 22% की भारी वृद्धि की गई है, जो कुल ₹2.19 लाख करोड़ है। इसका उपयोग नए हथियार, लड़ाकू विमान और उन्नत सैन्य तकनीकों के लिए किया जाएगा।
  • वायु सेना और थल सेना: भारतीय वायु सेना के बजट में 32% और थल सेना के भारी वाहनों के लिए 30% की बढ़ोतरी की गई है।
  • DRDO का सशक्तिकरण: रक्षा अनुसंधान एवं विकास के लिए आवंटन बढ़ाकर ₹29,100 करोड़ कर दिया गया है।

प्रभाव: विश्लेषण

  • सामरिक प्रभाव: यह आवंटन भारत को अपनी सीमाओं (विशेषकर उत्तरी सीमा) पर निवारक क्षमता बढ़ाने में मदद करेगा।
  • आर्थिक प्रभाव (स्वदेशीकरण): बजट का लगभग 75% हिस्सा घरेलू उद्योगों से खरीद के लिए आरक्षित है। यह 'मेक इन इंडिया' और 'आत्मनिर्भर भारत' को बढ़ावा देकर रोजगार सृजन करेगा।
  • तकनीकी प्रभाव: AI, साइबर सुरक्षा और ड्रोन तकनीक में निवेश भारत को भविष्य के युद्ध के लिए तैयार करेगा।
  • चुनौती: बजट का एक बड़ा हिस्सा (लगभग 44%) अभी भी वेतन और पेंशन  में चला जाता है, जो आधुनिकीकरण के लिए उपलब्ध फंड को सीमित करता है।

निष्कर्ष

बजट 2026-27 भारत की रक्षा नीति में एक "स्थिरीकरण" से "परिवर्तनकारी" चरण की ओर बदलाव का प्रतीक है। 7.85 लाख करोड़ का यह आवंटन भारत की सुरक्षा जरूरतों और आर्थिक आकांक्षाओं के बीच संतुलन बनाने का प्रयास है। हालाँकि, केवल धन का आवंटन पर्याप्त नहीं होगा; वास्तविक सफलता रक्षा खरीद की जटिल प्रक्रियाओं में सुधार और आवंटित धन के समयबद्ध और पारदर्शी उपयोग पर निर्भर करेगी।

सामान्य अध्ययन पेपर – III  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन

संदर्भ

भारत सरकार ने वायु, जल और पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम के तहत वसूले जाने वाले दंड और मुआवजे को एकीकृत करने के लिए एक केंद्रीय कोष लॉन्च किया है। इसका मुख्य उद्देश्य देश भर में प्रदूषण नियंत्रण के लिए जमा किए गए धन की पारदर्शिता और प्रभावशीलता को बढ़ाना है।

फंड का वितरण मॉडल (75:25 का अनुपात)

पुरानी व्यवस्था को बदलते हुए, अब सभी जुर्माने सीधे इस केंद्रीय कोष में जमा होंगे। वितरण इस प्रकार होगा:

  • राज्यों का हिस्सा (75%): एकत्रित राशि का 75% हिस्सा संबंधित राज्यों या केंद्र शासित प्रदेशों को वापस दिया जाएगा। इसे राज्य के 'पब्लिक अकाउंट' के तहत एक सुरक्षित 'रिजर्व फंड' में रखा जाएगा।
  • केंद्र का हिस्सा (25%): शेष 25% हिस्सा केंद्र सरकार के पास रहेगा।

फंड का उपयोग:

सरकार ने स्पष्ट रूप से 11 गतिविधियों की पहचान की है जहाँ इस धन का उपयोग किया जा सकता है:

  1. प्रदूषण की रोकथाम और नियंत्रण: वायु, जल और मृदा प्रदूषण को रोकने के लिए नई तकनीकों और प्रणालियों को लागू करना।
  2. पर्यावरणीय क्षति का उपचार: उन प्रदूषित स्थलों (जैसे जहरीले कचरे के ढेर या प्रदूषित झीलें) की सफाई करना जहाँ औद्योगिक गतिविधियों के कारण नुकसान हुआ है।
  3. स्वच्छ तकनीक अनुसंधान: प्रदूषण कम करने वाली नई और सस्ती तकनीकों के विकास के लिए वैज्ञानिक संस्थानों को अनुसंधान हेतु अनुदान देना।
  4. निगरानी तंत्र का सुदृढ़ीकरण: देश भर में वायु और जल की गुणवत्ता मापने वाले स्टेशनों का जाल बिछाना और उन्हें आधुनिक बनाना।
  5. प्रयोगशालाओं का उन्नयन: पर्यावरण परीक्षण प्रयोगशालाओं के लिए अत्याधुनिक उपकरणों की खरीद और उनकी क्षमता बढ़ाना।
  6. जागरूकता और शिक्षा: प्रदूषण नियंत्रण और पर्यावरण संरक्षण के प्रति आम जनता और उद्योगों को शिक्षित करने के लिए अभियान चलाना।
  7. पुनर्स्थापन कार्य: पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में वनस्पतियों और जलीय जीवन को पुनर्जीवित करना।
  8. अपशिष्ट प्रबंधन: खतरनाक कचरे और -कचरे के वैज्ञानिक निपटान के लिए बुनियादी ढांचा तैयार करना।
  9. क्षमता निर्माण: प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों के अधिकारियों और तकनीकी कर्मचारियों को आधुनिक तकनीकों के लिए प्रशिक्षित करना।
  10. विशेष अध्ययन और डेटा प्रबंधन: प्रदूषण के स्रोतों की पहचान करने के लिए 'सोर्स अपोर्शन्मेंट' अध्ययन और राष्ट्रीय डेटाबेस तैयार करना।
  11. प्रशासनिक व्यय (सीमित): संविदात्मक कर्मचारियों का वेतन, लेकिन यह कुल खर्च का 5% से अधिक नहीं हो सकता।

केंद्रीकरण की आवश्यकता क्यों पड़ी?

  • निधि का कम उपयोग: 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) को बताया था कि एकत्र किए गए धन का 80% हिस्सा बिना खर्च किए पड़ा था।
  • पारदर्शिता की कमी: पहले राज्य और केंद्र के बीच फंड के प्रबंधन में निरंतरता नहीं थी।

जवाबदेही और निगरानी तंत्र

इस नए ढांचे की सबसे बड़ी विशेषता CAG (भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक) की भूमिका है:

  • CAG इस फंड के संग्रह और संवितरण का ऑडिट करेगा।
  • इसकी रिपोर्ट संसद और राज्य विधानसभाओं के पटल पर रखी जाएगी।
  • इससे फंड के दूसरे उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल होने की संभावना खत्म हो जाएगी।

विश्लेषण

  • यह केंद्रीकृत कोष 'प्रदूषक भुगतान करे' सिद्धांत को प्रभावी बनाकर 80% अप्रयुक्त फंड की समस्या को सुलझाता है, जिसमें CAG ऑडिट और 75:25 के वितरण मॉडल से पारदर्शिता जवाबदेही सुनिश्चित होगी।
  • 11 विशिष्ट गतिविधियों के बाहर खर्च पर प्रतिबंध और प्रशासनिक व्यय को 5% तक सीमित करना, राज्यों द्वारा धन के डायवर्जन को रोककर सीधे प्रदूषण नियंत्रण और पर्यावरणीय सुधार को प्राथमिकता देता है।

निष्कर्ष:

यह कदम भारत के प्रदूषण नियंत्रण तंत्र को 'कागजी कार्रवाई' से हटाकर 'धरातलीय कार्रवाई' पर लाने का प्रयास है। यह सुनिश्चित करेगा कि जो उद्योग पर्यावरण को नुकसान पहुँचा रहे हैं, उनके द्वारा दिया गया जुर्माना वास्तव में पर्यावरण को सुधारने में ही खर्च हो।

सामान्य अध्ययन पेपर  – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध

सामान्य अध्ययन पेपर – III  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन

संदर्भ

भारत की 'लिंक वेस्ट' नीति को एक नई ऊंचाई देते हुए, भारत और खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) ने मुक्त व्यापार समझौते (FTA) की दिशा में अपनी प्रतिबद्धता को औपचारिक रूप दिया है। यह कदम केवल ऊर्जा सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि भारत के सबसे बड़े व्यापारिक गुट के साथ व्यापारिक बाधाओं को हटाकर एक नए 'आर्थिक युग' की शुरुआत का संकेत देता है।

खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) क्या है?

खाड़ी सहयोग परिषद मध्य पूर्व के छह अरब देशों का एक राजनीतिक और आर्थिक संघ है।

  • स्थापना: इसकी स्थापना 25 मई, 1981 को रियाद (सऊदी अरब) में हुई थी।
  • सदस्य देश: इसमें छह देश शामिल हैं सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), कतर, कुवैत, ओमान और बहरीन।
  • मुख्यालय: रियाद, सऊदी अरब।
  • उद्देश्य: सदस्य देशों के बीच वैज्ञानिक अनुसंधान, तकनीकी प्रगति, और आर्थिक औद्योगिक सहयोग को बढ़ावा देना।
  • भारत के लिए महत्व: GCC सामूहिक रूप से भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है, जो भारत की कच्चे तेल की 35% और प्राकृतिक गैस (LNG) की 70% जरूरतों को पूरा करता है।

वर्तमान समाचार: मुख्य बिंदु

5 फरवरी, 2026 को भारत और GCC के बीच व्यापार वार्ता में एक महत्वपूर्ण प्रगति हुई है:

  • टर्म्स ऑफ रेफरेंस (ToR) पर हस्ताक्षर: वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल की उपस्थिति में दोनों पक्षों ने FTA वार्ता के लिए 'टर्म्स ऑफ रेफरेंस' पर हस्ताक्षर किए।
  • वार्ताकार: भारत की ओर से मुख्य वार्ताकार अतिरिक्त सचिव अजय भादू और GCC सचिवालय की ओर से राजा अल मरज़ूकी ने इस दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर किए।
  • FTA का मार्ग प्रशस्त: ToR पर हस्ताक्षर होना औपचारिक वार्ताओं की शुरुआत के लिए अनिवार्य कानूनी और तकनीकी कदम है।
  • व्यापारिक डेटा: रिपोर्ट के अनुसार, भारत का GCC के साथ कुल व्यापार, यूरोपीय संघ (EU) और अमेरिका के साथ किए जाने वाले व्यापार से भी अधिक हो गया है। वित्त वर्ष 2024-25 में यह आंकड़ा लगभग $178 बिलियन को पार कर चुका है।
  • रणनीतिक महत्व: यह समझौता वस्तुओं, सेवाओं और निवेश के क्षेत्रों में व्यापक सहयोग का रोडमैप तैयार करेगा।

टर्म्स ऑफ रेफरेंस (ToR):

किसी भी आधिकारिक परियोजना, वार्ता या समझौते की शुरुआत में तैयार किया गया एक बुनियादी दस्तावेज़ होता है। सरल शब्दों में, यह वह 'नियम पुस्तिका' या 'ब्लूप्रिंट' है जो यह तय करती है कि आगे की बातचीत या काम कैसे होगा।

समझौते का महत्व और प्रभाव

  • निर्यात में वृद्धि: FTA के बाद भारतीय इंजीनियरिंग सामान, रत्न और आभूषण, कृषि उत्पाद और वस्त्रों पर सीमा शुल्क कम होगा, जिससे निर्यात बढ़ेगा।
  • रेमिटेंस (विदेशी मुद्रा): खाड़ी देशों में लगभग 90 लाख से 1 करोड़ भारतीय रहते हैं। बेहतर आर्थिक संबंधों से वहां भारतीय कार्यबल के लिए नए अवसर पैदा होंगे।
  • ऊर्जा सुरक्षा: यह समझौता ऊर्जा आपूर्ति की स्थिरता सुनिश्चित करेगा और लंबी अवधि के गैस अनुबंधों को सस्ता बना सकता है।
  • निवेश: सऊदी अरब और UAE जैसे देश भारत के बुनियादी ढांचे और ऊर्जा क्षेत्र में भारी निवेश के लिए प्रतिबद्ध हैं।

विश्लेषण

  • यह समझौता भारत की 'रणनीतिक स्वायत्तता' और 'आर्थिक कूटनीति' के बीच एक आदर्श संतुलन को दर्शाता है।
  • जहाँ यह FTA भारत की ऊर्जा असुरक्षा के जोखिमों को कम करेगा, वहीं चीन के 'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव' (BRI) के मुकाबले पश्चिम एशिया में भारत के भू-आर्थिक प्रभाव को पुन: स्थापित करेगा।
  • वस्तुतः, यह समझौता केवल व्यापारिक शुल्क कम करने के बारे में नहीं है, बल्कि यह भारत को वैश्विक मूल्य श्रृंखला के एक विश्वसनीय केंद्र के रूप में खाड़ी के संप्रभु धन कोष से जोड़ने का एक रणनीतिक सेतु है।

आगे की राह

  • संवेदनशील क्षेत्रों का संरक्षण: वार्ता के दौरान डेयरी और कृषि जैसे संवेदनशील घरेलू क्षेत्रों के हितों की रक्षा करते हुए 'विन-विन' (Win-Win) संतुलन बनाना अनिवार्य है।
  • गैर-टैरिफ बाधाओं का समाधान: केवल सीमा शुल्क कम करना पर्याप्त नहीं होगा; स्वच्छता और पादप स्वच्छता (SPS) जैसे तकनीकी मानकों और गैर-टैरिफ बाधाओं को सुव्यवस्थित करने पर ध्यान देना चाहिए।
  • डिजिटल और सेवा क्षेत्र पर जोर: भारत को पारंपरिक व्यापार से आगे बढ़कर फिनटेक, स्वास्थ्य सेवा और डिजिटल बुनियादी ढांचे जैसे उभरते क्षेत्रों में अपनी 'सॉफ्ट पावर' का लाभ उठाना चाहिए।
  • समयबद्ध कार्यान्वयन: 'टर्म्स ऑफ रेफरेंस' (ToR) को एक निश्चित समय सीमा के भीतर अंतिम समझौते में बदलने के लिए निरंतर उच्च-स्तरीय राजनीतिक संवाद और नौकरशाही सक्रियता की आवश्यकता है।

निष्कर्ष

भारत और GCC के बीच FTA वार्ता के लिए ToR पर हस्ताक्षर होना केवल एक व्यापारिक समझौता नहीं, बल्कि एक सामरिक साझेदारी का विस्तार है। यह भारत को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में स्थापित करेगा और 'विकसित भारत 2047' के लक्ष्य को प्राप्त करने में मदद करेगा।

सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 1 भारतीय विरासत और संस्कृति, विश्व का इतिहास एवं भूगोल और समाज

संदर्भ

भारत के सामाजिक परिवेश में मातृत्व को अक्सर नारीत्व की एकमात्र पहचान और सार्थकता मान लिया जाता है। बांझपन केवल एक चिकित्सा स्थिति नहीं, बल्कि एक गहरा सामाजिक कलंक है, जहाँ विज्ञान की प्रगति तो द्रुत गति से हुई है, लेकिन प्रजनन स्वास्थ्य के प्रति सामाजिक विमर्श आज भी पितृसत्तात्मक रूढ़ियों में जकड़ा हुआ है।

भारत में बांझपन:

भारत में बांझपन की समस्या एक मूक महामारी का रूप ले रही है।

  • व्यापकता: विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, भारत में लगभग 10% से 15% विवाहित जोड़े बांझपन से प्रभावित हैं।
  • शहरी बनाम ग्रामीण: शहरी क्षेत्रों में जीवनशैली, तनाव और विलंबित विवाह के कारण यह दर अधिक है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में संक्रमण और कुपोषण मुख्य कारण हैं।
  • अग्रणी शोध: राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) के आंकड़े बताते हैं कि बांझपन के 40% मामलों में कारण पुरुष होते हैं, लेकिन सामाजिक जांच का केंद्र 90% से अधिक केवल महिलाएं होती हैं।

चर्चा में क्यों?

  • मानसिक स्वास्थ्य का एकीकरण: वर्तमान में मांग उठ रही है कि फर्टिलिटी केयर (जैसे IVF) में मानसिक स्वास्थ्य परामर्श को 'पेरिफेरल' नहीं बल्कि 'अनिवार्य' हिस्सा बनाया जाए।
  • तकनीकी बनाम सामाजिक अंतर: चिकित्सा विज्ञान (ART - सहायक प्रजनन प्रौद्योगिकी) तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन समाज अब भी निःसंतान महिलाओं को 'अपशकुन' मानने जैसी कुरीतियों से बाहर नहीं निकल पाया है।

गहरा प्रभाव: सामाजिक, नैतिक और मानसिक आयाम

महिलाओं पर बोझ और सामाजिक कुरीतियाँ:

  • सामाजिक बहिष्कार: निःसंतान महिलाओं को शुभ कार्यों, शादियों और गोद भराई जैसे समारोहों से दूर रखा जाता है। दक्षिण भारत में 'मालदी' (Maladi) जैसे अपमानजनक शब्द उनकी गरिमा को चोट पहुँचाते हैं।
  • पहचान का विखंडन: समाज महिला की पहचान को केवल 'माँ' के रूप में देखता है, जिससे वह गहरी शर्म, अलगाव और हीन भावना का शिकार हो जाती है।

पुरुषों के मानसिक स्वास्थ्य की अनदेखी:

  • मौन पीड़ा: पुरुष बांझपन पर चर्चा को 'मर्दानगी' पर चोट माना जाता है। इस कारण पुरुष अपनी मानसिक स्थिति साझा नहीं कर पाते।
  • जैविक दुष्चक्र: वैज्ञानिक रूप से, तनाव और अवसाद पुरुष प्रजनन क्षमता (Sperm quality) को और भी खराब कर देते हैं। यानी जिस तनाव के लिए समाज महिला को प्रताड़ित करता है, वही तनाव पुरुष की जैविक स्थिति को बिगाड़ रहा होता है।

पितृसत्ता और रूढ़िवादिता:

  • पितृसत्तात्मक ढांचा गर्भधारण की विफलता का सारा दोष महिला के गर्भ पर मढ़ देता है, जबकि विज्ञान कहता है कि गर्भाधान एक साझा प्रक्रिया है।

सरकारी प्रावधान और अंतरराष्ट्रीय स्थिति

  • भारत सरकार के प्रयास: 'सहायक प्रजनन प्रौद्योगिकी (विनियमन) अधिनियम, 2021' (ART Act 2021) और 'सरोगेसी (विनियमन) अधिनियम' के माध्यम से प्रक्रिया को विनियमित किया गया है। आयुष्मान भारत के तहत भी प्रजनन स्वास्थ्य पर ध्यान दिया जा रहा है।
  • अंतरराष्ट्रीय स्थिति: विकसित देशों में 'इनफर्टिलिटी काउंसलिंग' अनिवार्य है। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून प्रजनन स्वास्थ्य को 'मानव अधिकार' के रूप में मान्यता देते हैं, जिसमें मानसिक गरिमा भी शामिल है।

विश्लेषण: विज्ञान की गति बनाम समाज की सोच

समस्या यह है कि हमारे पास IVF की महंगी मशीनें तो हैं, लेकिन उस मानसिकता का अभाव है जो एक निःसंतान महिला को सम्मान दे सके। बांझपन का उपचार केवल दवाओं से नहीं, बल्कि उस 'सामाजिक प्रताड़ना' को खत्म करने से शुरू होना चाहिए जो दंपत्तियों को अवसाद की ओर धकेलती है।

आगे की राह

  • अनिवार्य परामर्श: प्रत्येक फर्टिलिटी क्लिनिक में मनोवैज्ञानिकों की उपस्थिति अनिवार्य होनी चाहिए।
  • शिक्षा और जागरूकता: स्कूली पाठ्यक्रम और सामाजिक अभियानों के माध्यम से 'प्रजनन स्वास्थ्य' के बारे में वैज्ञानिक समझ विकसित करना।
  • पुरुषों की भागीदारी: पुरुषों को जांच और परामर्श प्रक्रिया का सक्रिय हिस्सा बनाना ताकि 'ब्लेम-गेम' खत्म हो सके।
  • कानूनी सुधार: मानसिक प्रताड़ना और सामाजिक बहिष्कार के खिलाफ सख्त कानूनी प्रावधान।

निष्कर्ष

नारीत्व मातृत्व का पर्याय नहीं है; यह अपने आप में पूर्ण और स्वतंत्र है। जब तक हम बांझपन को एक 'सामाजिक पाप' के बजाय एक 'चिकित्सा स्थिति' के रूप में नहीं स्वीकारेंगे, तब तक कोई भी तकनीक समाज के घावों को नहीं भर पाएगी। एक प्रगतिशील राष्ट्र वही है जहाँ विज्ञान की उन्नति के साथ-साथ मानवीय संवेदनाओं और मानसिक स्वास्थ्य का भी विकास हो।