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सामान्य अध्ययन पेपर – III  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन

संदर्भ

केंद्रीय बजट 2026-27 में ओडिशा, कर्नाटक और केरल के तटीय क्षेत्रों में 'टर्टल ट्रेल्स' विकसित करने का प्रस्ताव रखा गया है। जहाँ सरकार इसे ईकोटूरिज्म के नए द्वार के रूप में देख रही है, वहीं वैज्ञानिक इसे कछुओं के संवेदनशील प्रजनन स्थलों के लिए संकट मान रहे हैं।

टर्टल ट्रेल्स और ओलिव रिडले कछुए:

  • यह तटीय क्षेत्रों में कछुओं के घोंसले बनाने की प्रक्रिया को पर्यटकों को दिखाने के लिए विकसित किया जाने वाला एक पर्यटन पथ है।
  • यह पहल मुख्य रूप से ओलिव रिडले कछुओं पर केंद्रित है, जो अपने सामूहिक घोंसले बनाने की प्रक्रिया 'अरिबाडा' के लिए विश्व प्रसिद्ध हैं।
  • ये समुद्री कछुए समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के 'कीस्टोन' प्रजाति हैं; ये समुद्री घास के मैदानों को स्वस्थ रखने और खाद्य श्रृंखला को संतुलित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
  • ओलिव रिडले कछुए भारतीय वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची-I के तहत सूचीबद्ध हैं, जो इन्हें बाघों के समान ही उच्चतम स्तर की सुरक्षा प्रदान करती है।
  • IUCN की रेड लिस्ट में इन्हें 'अतिसंवेदनशील' श्रेणी में रखा गया है। तटीय प्रदूषण, मछली पकड़ने वाले जाल (ट्रॉलर) और अवैध शिकार इनके जीवन के लिए निरंतर खतरा बने हुए हैं।

चर्चा के कारण: वर्तमान समाचार

फरवरी 2026 में यह विषय दो प्रमुख घटनाओं के कारण सुर्खियों में है:

  • बजट प्रस्ताव पर संशय: संरक्षणवादियों ने चेतावनी दी है कि 'टर्टल ट्रेल्स' से होने वाला प्रकाश प्रदूषण और मानवीय हस्तक्षेप कछुओं को विचलित कर देगा, जिससे 'अरिबाडा' की प्रक्रिया बाधित हो सकती है।
  • तमिलनाडु की पहल: इसी दौरान चेन्नई के गिंडी में ₹14.50 करोड़ की लागत से तमिलनाडु के पहले 'समुद्री कछुआ संरक्षण केंद्र' की आधारशिला रखी गई है, जो विश्व बैंक समर्थित 'TN-SHORE' (तमिलनाडु कोस्टल रेस्टोरेशन मिशन ) परियोजना का हिस्सा है।

परियोजना का महत्व

  • जागरूकता: ईकोटूरिज्म के माध्यम से आम जनता में समुद्री जीवन के प्रति संवेदनशीलता बढ़ाई जा सकती है।
  • आर्थिक लाभ: तटीय समुदायों के लिए रोजगार के नए अवसर सृजित हो सकते हैं।
  • अनुसंधान: 'टर्टल ट्रेल्स' और संरक्षण केंद्रों के माध्यम से कछुओं के प्रवासी पथ और उनके व्यवहार पर वैज्ञानिक डेटा एकत्र करना आसान होगा।

पूर्व में उठाए गए कदम:

  • ऑपरेशन ओलिविया: भारतीय तटरक्षक बल द्वारा हर साल ओडिशा तट पर कछुओं की सुरक्षा के लिए चलाया जाने वाला अभियान।
  • TED का उपयोग: मछली पकड़ने वाले जालों में 'टर्टल एक्सक्लूडर डिवाइस' (TED) का अनिवार्य उपयोग।

विश्लेषण:

विशेषज्ञों का तर्क है कि कछुए रोशनी के प्रति अत्यंत संवेदनशील होते हैं। 'टर्टल ट्रेल्स' जैसे पर्यटन ढांचे यदि वैज्ञानिक परामर्श के बिना बनाए गए, तो यह संरक्षण के बजाय विनाश का कारण बनेंगे। जैसा कि रेनके और इदाते आयोग ने अन्य समुदायों के लिए डेटा के महत्व पर जोर दिया है, वैसे ही कछुओं के लिए भी 'हस्तक्षेप-मुक्त' डेटा और आवास की आवश्यकता है।

आगे की राह

  • नो-गो जोन: सामूहिक प्रजनन के समय (अरिबाडा) के दौरान इन स्थलों को पूरी तरह से पर्यटकों के लिए बंद रखा जाना चाहिए।
  • प्रौद्योगिकी का प्रयोग: पर्यटकों को प्रत्यक्ष भ्रमण के बजाय डिजिटल माध्यमों या दूरबीन केंद्रों से कछुओं को देखने की व्यवस्था हो।
  • प्रवर्तन तंत्र: ईकोटूरिज्म से होने वाली आय का एक बड़ा हिस्सा तटीय गश्त और संरक्षण कार्य बल को मजबूत करने में लगाया जाना चाहिए।

निष्कर्ष

'टर्टल ट्रेल्स' का विचार तभी सफल माना जाएगा जब वह पारिस्थितिकी और अर्थव्यवस्था के बीच संतुलन बनाए रखे। ओलिव रिडले कछुओं का संरक्षण केवल एक प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हमारी वैश्विक पर्यावरणीय प्रतिबद्धता का हिस्सा है। लोकतंत्र की सफलता इसी में है कि हम विकास की दौड़ में उन प्रजातियों के 'शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व' के अधिकार को भूलें जो स्वयं अपनी आवाज नहीं उठा सकतीं।

सामान्य अध्ययन पेपर – III  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन

संदर्भ

वैश्विक अनिश्चितताओं और उच्च सार्वजनिक ऋण के इस दौर में, बजट 2026-27 राजकोषीय अनुशासन की दिशा में भारत की अडिग प्रतिबद्धता को दर्शाता है। यह बजट केवल घाटे को कम करने का एक संख्यात्मक प्रयास है, बल्कि 'विकसित भारत 2047' के लक्ष्य की ओर एक सोची-समझी रणनीतिक छलांग है, जहाँ आर्थिक संवृद्धि और राजकोषीय स्थिरता का संतुलन अनिवार्य है।

राजकोषीय सुदृढ़ीकरण:

राजकोषीय सुदृढ़ीकरण उन नीतियों और उपायों का समूह है, जिसके माध्यम से सरकार अपने राजकोषीय घाटे और कुल संचित ऋण को कम करने का प्रयास करती है।

  • प्रमुख घटक: इसमें कर राजस्व में वृद्धि करना, गैर-जरूरी खर्चों में कटौती करना और सब्सिडी का तर्कसंगत पुनर्गठन करना शामिल है।
  • उद्देश्य: इसका मूल उद्देश्य अर्थव्यवस्था में मुद्रास्फीति को नियंत्रित करना, निवेश के लिए निजी क्षेत्र को पर्याप्त स्थान देना और राष्ट्र की ऋण भुगतान क्षमता को वैश्विक स्तर पर विश्वसनीय बनाना है।

चर्चा के कारण:

बजट 2026-27 में राजकोषीय मोर्चे पर कई महत्वपूर्ण घोषणाएँ की गई हैं:

  • घाटे का लक्ष्य: सरकार ने राजकोषीय घाटे को वित्त वर्ष 2025-26 के 4.4% से घटाकर 2026-27 के लिए 4.3% करने का लक्ष्य रखा है।
  • दीर्घकालिक ऋण पथ: आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, वर्ष 2030-31 तक कर्ज-जीडीपी अनुपात को 50% (+/- 1%) के स्तर पर लाने का रोडमैप तैयार किया गया है।
  • व्यय संरचना में बदलाव: पिछले एक दशक में राजस्व व्यय का हिस्सा 88% से गिरकर 77% हो गया है, जबकि पूंजीगत व्यय को बढ़ाकर 12.22 लाख करोड़ कर दिया गया है।

महत्व और प्रभाव:

  • आर्थिक संवृद्धि: बुनियादी ढांचे पर उच्च निवेश से 'गुणक प्रभाव' उत्पन्न होता है, जो रोजगार और मांग को बढ़ावा देता है।
  • मौद्रिक स्थिरता: राजकोषीय घाटा कम होने से सरकारी उधारी कम होती है, जिससे बाजार में ब्याज दरें स्थिर रहती हैं और 'क्राउडिंग आउट' की स्थिति नहीं बनती।
  • विदेशी निवेश (FDI): राजकोषीय अनुशासन अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियों को सकारात्मक संकेत भेजता है, जिससे भारत एक सुरक्षित निवेश गंतव्य के रूप में उभरता है।
  • तकनीकी संप्रभुता: एआई (AI), सेमीकंडक्टर और क्रिटिकल खनिजों पर खर्च से भारत भविष्य की तकनीकों में आत्मनिर्भर बनेगा।

जोखिम और चुनौतियाँ

  • राजस्व घाटा: अभी भी उधारी का एक बड़ा हिस्सा (जीडीपी का 1.5%) नियमित खर्चों (वेतन, पेंशन) में जा रहा है, कि संपत्ति निर्माण में।
  • मानव पूंजी की अनदेखी: राजकोषीय लक्ष्यों को प्राप्त करने के दबाव में शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे सामाजिक क्षेत्रों के आवंटन में कमी होने का जोखिम रहता है।
  • राजस्व की अनिश्चितता: गैर-कर राजस्व के लिए आरबीआई (RBI) के लाभांश और विनिवेश लक्ष्यों पर अत्यधिक निर्भरता अस्थिर हो सकती है।

विश्लेषण

बजट 2026-27 का राजकोषीय सुदृढ़ीकरण पथ पिछले वर्षों की तुलना में अधिक 'शिथिल' या धीमा है। जहाँ पहले घाटे में 40 आधार अंकों की कमी की गई थी, वहीं इस बार केवल 10 आधार अंकों की कमी का प्रस्ताव है। यह दर्शाता है कि सरकार केवल आँकड़ों के पीछे नहीं भाग रही, बल्कि विकास की गति को बनाए रखने के लिए लचीलापन अपना रही है। हालांकि, उधारी द्वारा उपभोग का वित्तपोषण करना अभी भी एक संरचनात्मक कमजोरी बनी हुई है।

आगे की राह

  • कर आधार का विस्तार: प्रत्यक्ष करों के आधार को व्यापक बनाकर राजस्व में वृद्धि करना।
  • मानव निवेश: केवल भौतिक ढांचे पर नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और कौशल विकास पर भी समान ध्यान देना आवश्यक है।
  • व्यय प्रबंधन: सब्सिडी के लक्षित वितरण के लिए तकनीक का अधिकतम उपयोग करना।
  • राजकोषीय परिषद: राजकोषीय नीतियों की स्वतंत्र निगरानी के लिए एक 'स्वतंत्र राजकोषीय परिषद' का गठन किया जाना चाहिए।

निष्कर्ष

राजकोषीय सुदृढ़ीकरण केवल वित्तीय लेखा-जोखा नहीं, बल्कि राष्ट्र की आर्थिक संप्रभुता का कवच है। बजट 2026-27 के माध्यम से सरकार ने अनुशासन और विकास के बीच एक संतुलन साधने का प्रयास किया है। यदि भारत अपनी उधारी को उत्पादक निवेश में बदलने में सफल रहता है, तो यह सुदृढ़ीकरण 'विकसित भारत' की नींव को पत्थर की लकीर जैसा मजबूत बना देगा।

सामान्य अध्ययन पेपर  – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध

सामान्य अध्ययन पेपर – III  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन

संदर्भ

वैश्विक विनिर्माण और रक्षा क्षेत्र में बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच, अमेरिका ने अपनी 'खनिज सुरक्षा' को पुख्ता करने के लिए एक महत्वाकांक्षी योजना शुरू की है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा घोषित यह पहल चीन के एकाधिकार को चुनौती देने और भविष्य के औद्योगिक व्यवधानों से बचने की एक रणनीतिक ढाल है।

प्रोजेक्ट वॉल्ट क्या है?

  • प्रोजेक्ट वॉल्ट अमेरिका की एक 12 बिलियन डॉलर की सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) योजना है। इसका मुख्य उद्देश्य दुर्लभ मृदा तत्वों और गैलियम कोबाल्ट जैसे महत्वपूर्ण खनिजों का एक विशाल भंडार तैयार करना है।
  • यह अमेरिका के 'रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व' की तर्ज पर बनाया गया है, जो संकट के समय नागरिक और रक्षा उद्योगों को कच्चे माल की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित करेगा।

चर्चा के कारण:

फरवरी 2026 में इस परियोजना के आधिकारिक अनावरण ने वैश्विक बाजार में हलचल पैदा कर दी है:

  • विशाल निवेश: इसमें अमेरिकी एक्सपोर्ट-इंपोर्ट बैंक से 10 बिलियन डॉलर और निजी क्षेत्र से 1.67 बिलियन डॉलर की बीज पूंजी शामिल है।
  • चीन पर निर्भरता कम करना: वर्तमान में चीन वैश्विक दुर्लभ खनिजों के प्रसंस्करण पर हावी है। प्रोजेक्ट वॉल्ट इस निर्भरता को शून्य करने की दिशा में अमेरिका का सबसे बड़ा कदम है।
  • प्रमुख कंपनियों की भागीदारी: गूगल, बोइंग, जनरल मोटर्स और गूगल जैसी दिग्गज कंपनियाँ पहले ही इस प्रोजेक्ट से जुड़ चुकी हैं।
  • मूल्य स्थिरता: यह प्रोजेक्ट खनिजों को निश्चित कीमतों पर खरीदकर बाजार में होने वाली कीमतों में स्थिरता लाने में सहायक हो सकता है

परियोजना का महत्व

  • आर्थिक सुरक्षा: स्मार्टफोन, इलेक्ट्रिक वाहन (EV) और जेट इंजन जैसे उद्योगों के लिए ये खनिज 'लाइफलाइन' हैं।
  • रक्षा क्षमता: कोबाल्ट और अन्य खनिज सैन्य विमानों और मिसाइल प्रणालियों के लिए अनिवार्य हैं।
  • आपूर्ति श्रृंखला का लचीलापन: वैश्विक युद्ध या कूटनीतिक तनाव की स्थिति में भी अमेरिकी विनिर्माण क्षेत्र ठप नहीं होगा।

भारत के संदर्भ में प्रासंगिकता

भारत के लिए प्रोजेक्ट वॉल्ट एक साथ अवसर और चुनौती दोनों पेश करता है:

  • रणनीतिक साझेदारी: भारत भी 'खनिज सुरक्षा साझेदारी' (MSP) का हिस्सा है। अमेरिका द्वारा खनिजों का भंडार बनाने से वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में जो विविधता आएगी, उसका लाभ भारत को भी मिल सकता है।
  • 'मेक इन इंडिया' और सेमीकंडक्टर मिशन: भारत को अपने चिप निर्माण और बैटरी उद्योग के लिए इन्हीं खनिजों की आवश्यकता है। अमेरिका का यह कदम भारत को भी अपना 'राष्ट्रीय खनिज रिजर्व' बनाने के लिए प्रेरित कर सकता है।
  • तकनीकी सहयोग: भारत के पास विशाल खनिज प्रसंस्करण क्षमता है; प्रोजेक्ट वॉल्ट के माध्यम से भारत-अमेरिका तकनीकी और व्यापारिक सहयोग और गहरा हो सकता है।

आगे की राह

  • विविधीकरण: केवल भंडार बनाना पर्याप्त नहीं है; अमेरिका और उसके सहयोगियों (जैसे भारत, ऑस्ट्रेलिया) को नए खनन स्थलों और प्रसंस्करण केंद्रों में निवेश बढ़ाना होगा।
  • पर्यावरणीय चुनौतियां: खनिज निष्कर्षण पर्यावरण के लिए हानिकारक हो सकता है। अतः, 'सस्टेनेबल माइनिंग' की दिशा में वैश्विक मानक तय करने होंगे।
  • भारत की भूमिका: भारत को चाहिए कि वह अपनी घरेलू खनिज खोज को तेज करे और अमेरिका के साथ 'प्रोजेक्ट वॉल्ट' जैसी द्विपक्षीय साझेदारी पर चर्चा करे।

निष्कर्ष

'प्रोजेक्ट वॉल्ट' केवल एक आर्थिक योजना नहीं, बल्कि 21वीं सदी की 'खनिज राजनीति' का मास्टरस्ट्रोक है। यह वैश्विक शक्तियों के बीच संसाधनों पर नियंत्रण की बढ़ती होड़ को दर्शाता है। यदि भारत इस बदलाव को पहचानकर अपनी खनिज नीति को इसके साथ संरेखित करता है, तो वह केवल अपनी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित कर पाएगा, बल्कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में एक अनिवार्य स्तंभ बनकर उभरेगा।

सामान्य अध्ययन पेपर  – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध

संदर्भ

हाल के वर्षों में वैश्विक भू-राजनीति 'सुरक्षित और विश्वसनीय आपूर्ति श्रृंखला' की ओर मुड़ गई है। भारत और अमेरिका के बीच हुआ नवीनतम व्यापारिक समझौता और भारत को 'पैक्स सिलिका' में शामिल होने का निमंत्रण, केवल द्विपक्षीय संबंधों की मजबूती को दर्शाता है, बल्कि चीन पर निर्भरता कम करने की दिशा में एक निर्णायक कदम है।

पैक्स सिलिका क्या है?

'पैक्स सिलिका' अमेरिका द्वारा दिसंबर 2025 में शुरू की गई एक रणनीतिक और तकनीकी पहल है।

  • उद्देश्य: इसका मुख्य लक्ष्य एक सुरक्षित, लचीला और नवाचार-संचालित सिलिकॉन (सेमीकंडक्टर) आपूर्ति श्रृंखला का निर्माण करना है।
  • कार्यक्षेत्र: यह महत्वपूर्ण खनिजों (क्रिटिकल मिनरल्स), अर्धचालक विनिर्माण, एआई (AI) बुनियादी ढांचे और ऊर्जा इनपुट से लेकर लॉजिस्टिक्स तक फैला हुआ है।
  • सदस्य: वर्तमान में इसमें ऑस्ट्रेलिया, जापान, दक्षिण कोरिया, सिंगापुर, यूएई, यूके, ग्रीस, इज़राइल और कतर जैसे देश शामिल हैं।

चर्चा के कारण:

फरवरी 2026 में अमेरिका के शीर्ष अधिकारियों के बयानों ने इस विषय को वैश्विक चर्चा में ला दिया है:

  • भारत को निमंत्रण: अमेरिका ने भारत को आधिकारिक तौर पर पैक्स सिलिका में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया है और जल्द ही इस पर हस्ताक्षर होने की संभावना है।
  • टैरिफ में कटौती: राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने रूसी तेल की खरीद के कारण भारत पर लगाए गए 25% के दंडात्मक टैरिफ को हटाने का कार्यकारी आदेश जारी किया है।
  • चीन का विकल्प: अमेरिका ने स्वीकार किया है कि मानवीय प्रतिभा के मामले में केवल भारत ही चीन का मुकाबला करने में सक्षम है।

यह पहल क्यों महत्वपूर्ण है?

  • आर्थिक सुरक्षा: महत्वपूर्ण खनिजों और सेमीकंडक्टर तक निर्बाध पहुंच आधुनिक अर्थव्यवस्था (स्मार्टफोन, कार, रक्षा उपकरण) के लिए अनिवार्य है।
  • तकनीकी नेतृत्व: यह पहल एआई और उन्नत विनिर्माण के क्षेत्र में भारत को वैश्विक नेतृत्व प्रदान कर सकती है।
  • टैरिफ लाभ: भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के तहत भारतीय वस्तुओं पर टैरिफ घटकर 18% रह गया है, जिससे निर्यात को बढ़ावा मिलेगा।

भारत का दृष्टिकोण

  • डी-रिस्किंग: विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने स्पष्ट किया है कि आपूर्ति श्रृंखलाओं का किसी एक देश (विशेषकर चीन) पर केंद्रित होना जोखिम भरा है।
  • मेक इन इंडिया: यह समझौता भारत के 'सेमीकंडक्टर मिशन' और 'मेक इन इंडिया' को नई ऊर्जा प्रदान करेगा।

विश्लेषण

पैक्स सिलिका में भारत का प्रवेश 'देर आए दुरुस्त आए' जैसा है। प्रारंभ में भारत को इसमें शामिल नहीं किया गया था, लेकिन भारत की जनसांख्यिकीय शक्ति और तकनीकी कौशल ने अमेरिका को यह मानने पर मजबूर कर दिया कि भारत के बिना कोई भी वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला सफल नहीं हो सकती। यह समझौता 'पारस्परिकता' पर आधारित है जहाँ अमेरिका को भारत की प्रतिभा चाहिए, वहीं भारत को अमेरिकी तकनीक और बाजार।

आगे की राह

  • बुनियादी ढांचा: भारत को अपने घरेलू लॉजिस्टिक्स और विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र को और अधिक प्रतिस्पर्धी बनाना होगा।
  • कौशल विकास: युवा तकनीकी प्रतिभा को पैक्स सिलिका के मानकों के अनुरूप प्रशिक्षित करना आवश्यक है।
  • नीतिगत निरंतरता: अमेरिका में नेतृत्व परिवर्तन के बावजूद इन दीर्घकालिक रणनीतिक समझौतों को बनाए रखने के लिए राजनयिक प्रयास जारी रखने चाहिए।

निष्कर्ष

पैक्स सिलिका और अमेरिका के साथ नया व्यापार ढांचा भारत के लिए केवल एक आर्थिक समझौता नहीं, बल्कि एक 'रणनीतिक ढाल' है। यह वैश्विक मंच पर भारत के बढ़ते कद और उसकी 'मानवीय प्रतिभा' की स्वीकृति है। यदि भारत इस अवसर का सही लाभ उठाता है, तो वह आने वाले दशकों में विश्व की 'सिलिकॉन फैक्ट्री' के रूप में उभर सकता है।

सामान्य अध्ययन पेपर  – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध

संदर्भ

पूर्वोत्तर के सामरिक रूप से महत्वपूर्ण राज्य मणिपुर में लगभग एक वर्ष के 'असाधारण' केंद्रीय शासन के बाद लोकतंत्र की बहाली हुई है। फरवरी 2025 में जातीय हिंसा और संवैधानिक मशीनरी के विफल होने के बाद लगा राष्ट्रपति शासन अब समाप्त हो चुका है। वर्तमान परिदृश्य में, यह केवल एक सत्ता परिवर्तन है, बल्कि गहरे सामाजिक घावों को भरने और समुदायों के बीच विश्वास बहाली की एक अनिवार्य आवश्यकता है।

राष्ट्रपति शासन: संवैधानिक प्रावधान

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 356 केंद्र सरकार को किसी राज्य का प्रत्यक्ष नियंत्रण लेने की शक्ति देता है, जिसे 'राष्ट्रपति शासन' कहा जाता है।

  • प्रमुख प्रावधान: यदि राष्ट्रपति को राज्यपाल की रिपोर्ट या अन्य माध्यमों से यह संतोष हो जाए कि राज्य की स्थिति ऐसी है कि वहाँ का शासन संविधान के प्रावधानों के अनुसार नहीं चलाया जा सकता, तो राष्ट्रपति शासन लगाया जा सकता है।
  • अनुच्छेद 355: यह केंद्र का कर्तव्य निर्धारित करता है कि वह बाहरी आक्रमण और आंतरिक अशांति से प्रत्येक राज्य की रक्षा करे।
  • अनुच्छेद 365: यदि कोई राज्य केंद्र द्वारा दिए गए संवैधानिक निर्देशों का पालन करने में विफल रहता है, तो भी इसे संवैधानिक तंत्र की विफलता माना जा सकता है।

चर्चा के कारण: नवीनतम घटनाक्रम

फरवरी 2026 में मणिपुर की राजनीति में आए बड़े बदलावों के कारण यह विषय पुनः चर्चा में है:

  • राष्ट्रपति शासन की समाप्ति: 4 फरवरी 2026 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने मणिपुर से राष्ट्रपति शासन हटाने की आधिकारिक अधिसूचना जारी की।
  • नए नेतृत्व का उदय: भाजपा ने युमनाम खेमचंद सिंह को नया मुख्यमंत्री नियुक्त किया है। उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह का स्थान लिया है।
  • समावेशी सरकार: राज्य के इतिहास में पहली बार 'संतुलन' बनाने के लिए दो उप-मुख्यमंत्री नियुक्त किए गए हैंनेमचा किपजेन (कुकी-ज़ो समुदाय से पहली महिला डिप्टी सीएम) और लोसी दिखो (नागा पीपल्स फ्रंट से)

मणिपुर: जातीय विवाद और हालिया घटनाक्रम

मणिपुर में संकट की जड़ें मई 2023 में तब गहरी हुईं जब मैतेई समुदाय को 'अनुसूचित जनजाति' (ST) का दर्जा देने के प्रस्ताव पर विवाद शुरू हुआ।

  • विवाद का केंद्र: यह संघर्ष मुख्य रूप से घाटी में रहने वाले मैतेई और पहाड़ियों में रहने वाले कुकी-ज़ो समुदायों के बीच है।
  • प्रभाव: 250 से अधिक मौतें, हजारों घरों का विनाश और लगभग 60,000 लोगों का विस्थापन। इस हिंसा ने राज्य को भौगोलिक और भावनात्मक रूप से दो हिस्सों में बाँट दिया है।
  • राजनीतिक परिणाम: एन. बीरेन सिंह की सरकार पर हिंसा रोकने में विफल रहने के आरोप लगे, जिसके कारण फरवरी 2025 में उन्हें इस्तीफा देना पड़ा और राज्य में केंद्रीय शासन लागू हुआ।

विश्लेषण

राष्ट्रपति शासन का हटना यह संकेत देता है कि केंद्र सरकार अब राज्य में सुरक्षा की स्थिति को नियंत्रण में मान रही है। हालांकि, युमनाम खेमचंद सिंह की चुनौती केवल सरकार चलाना नहीं है, बल्कि 'इम्फाल' और 'पहाड़ियों' के बीच टूटे हुए संवाद को फिर से शुरू करना है। कुकी विधायकों की 'अलग प्रशासन' की मांग अभी भी एक बड़ा राजनीतिक गतिरोध बनी हुई है।

आगे की राह

  • विश्वास बहाली: दोनों समुदायों के बीच एक 'शांति समिति' के माध्यम से निरंतर संवाद की आवश्यकता है।
  • पुनर्वास: विस्थापित लोगों को उनके घरों में सुरक्षित वापस लाना और क्षतिपूर्ति सुनिश्चित करना प्राथमिकता होनी चाहिए।
  • प्रशासनिक तटस्थता: नई सरकार को बिना किसी भेदभाव के सभी समुदायों के प्रति जवाबदेह होना होगा ताकि 'पक्षपात' के आरोपों को समाप्त किया जा सके।

निष्कर्ष

मणिपुर में राष्ट्रपति शासन का अंत लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की जीत तो है, लेकिन शांति की मंज़िल अभी दूर है। 'नमस्ते' योजना की तर्ज पर ही यहाँ 'सद्भावना और न्याय' के तंत्र की आवश्यकता है। युमनाम खेमचंद सिंह के नेतृत्व वाली नई सरकार के पास यह अवसर है कि वह मणिपुर को हिंसा के काले अध्याय से बाहर निकालकर विकास और आपसी भाईचारे के नए युग में ले जाए।

सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- I भारतीय विरासत और संस्कृति, विश्व का इतिहास एवं भूगोल और समाज

सामान्य अध्ययन पेपर  – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध

संदर्भ

ऐतिहासिक रूप से 'जन्मजात अपराधी' के कलंक से जूझ रहे विमुक्त और घुमंतू समुदाय आज अपनी स्वतंत्र संवैधानिक पहचान के लिए संघर्षरत हैं। 2027 की आगामी जातिगत जनगणना इनके लिए केवल एक संख्यात्मक गणना नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और अस्तित्व की स्वीकृति का एक ऐतिहासिक अवसर है।

चर्चा के कारण:

फरवरी 2026 में इन समुदायों की लंबे समय से लंबित मांगों ने पुनः जोर पकड़ा है:

  • स्वतंत्र कॉलम की मांग: देशभर के विमुक्त जनजातीय संगठनों ने 2027 की जनगणना में SC, ST और OBC के अतिरिक्त एक 'स्वतंत्र कॉलम' की मांग की है। उनका तर्क है कि वर्तमान त्रि-स्तरीय वर्गीकरण में उनकी विशिष्ट पहचान और पिछड़ापन दबकर रह गया है।
  • सामाजिक न्याय मंत्रालय की सिफारिश: सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने आधिकारिक तौर पर भारत के महापंजीयक (ORGI) को इन समुदायों को जनगणना प्रपत्र में शामिल करने की सिफारिश की है। यह 1931 के बाद पहली बार होगा जब भारत में इतने व्यापक स्तर पर जातिगत गणना की जाएगी।
  • राजनीतिक वर्गीकरण का विरोध: समुदायों का दावा है कि उन्हें विभिन्न राज्यों में अलग-अलग श्रेणियों (कहीं SC, कहीं ST) में रखने से उनके लिए एकीकृत केंद्रीय कल्याणकारी योजनाएं बनाना कठिन हो गया है।
  • उप-वर्गीकरण की आवश्यकता: वे चाहते हैं कि उनके लिए एक अलग अनुसूची बनाई जाए ताकि आरक्षण का लाभ उन तक प्रभावी ढंग से पहुँच सके।

संवैधानिक मान्यता की आवश्यकता

इन समुदायों की मांग है कि उन्हें SC और ST की तरह ही एक अलग 'संवैधानिक अनुसूची' में रखा जाए। वे चाहते हैं कि उनके पिछड़ेपन को उजागर करने के लिए उप-वर्गीकरण किया जाए ताकि उन्हें आरक्षण और सरकारी योजनाओं का सीधा लाभ मिल सके।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

  • 1871 का काला कानून: ब्रिटिश शासन के दौरान 1871 में एक औपनिवेशिक कानून (क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट) के तहत कई घुमंतू समुदायों को जन्मजात "अपराधी" घोषित कर दिया गया था।
  • 1952 में आजादी: आजादी के बाद, 1952 में इस कानून को निरस्त कर दिया गया, जिसके बाद ये समुदाय "विमुक्त" कहलाए। हालांकि, कानूनी तौर पर मुक्त होने के बावजूद सामाजिक कलंक और आर्थिक पिछड़ापन आज भी बरकरार है।

राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव

इन समुदायों का तर्क है कि अलग पहचान होने के कारण वे राजनीतिक रूप से अदृश्य हैं। एक अलग जनगणना प्रविष्टि उन्हें निम्नलिखित लाभ दे सकती है:

  • सटीक जनसंख्या डेटा।
  • लक्षित कल्याणकारी योजनाएं।
  • संवैधानिक सुरक्षा और आरक्षण के भीतर स्पष्ट हिस्सेदारी।

विश्लेषण

विमुक्त और घुमंतू समुदायों का मुद्दा भारतीय लोकतंत्र की एक गहरी विसंगति को दर्शाता है। 1871 के दमनकारी कानून ने उन्हें समाज के हाशिए पर धकेला, और 1952 के बाद भी प्रशासनिक रिकॉर्ड में सटीक जानकारी के अभाव ने उन्हें "अदृश्य" बनाए रखा है। रेनके आयोग (2008) और इदाते आयोग (2015) जैसी समितियों ने बार-बार कहा है कि बिना ठोस जनगणना डेटा के इन समुदायों का उत्थान संभव नहीं है। जब तक जनगणना में उनके लिए अलग कॉलम सुनिश्चित नहीं होता, तब तक उनका राज्य-दर-राज्य अलग-अलग संवैधानिक वर्गीकरण (कहीं SC, कहीं OBC) एक बड़ा विरोधाभास बना रहेगा, जो उनके एकीकृत विकास में बाधक है।

आगे की राह

  • वैज्ञानिक जनगणना: 2027 की जनगणना में केवल अलग कॉलम हो, बल्कि प्रगणकों को इन समुदायों की सांस्कृतिक विशिष्टताओं के प्रति संवेदनशील बनाया जाए।
  • संवैधानिक दर्जा: जिस प्रकार 1936 में SC सूची बनी, उसी तर्ज पर इन समुदायों के लिए एक 'स्वतंत्र संवैधानिक अनुसूची' पर विचार किया जाना चाहिए।
  • सीड (SEED) योजना का सुदृढ़ीकरण: 'विमुक्त समुदायों के आर्थिक अधिकारिता की योजना' (SEED) को पर्याप्त बजट और डेटा आधारित लक्ष्य प्रदान किए जाने चाहिए।
  • सामाजिक जागरूकता: इन समुदायों के प्रति पुलिस और समाज में व्याप्त 'आपराधिक छवि' के पूर्वाग्रह को खत्म करने के लिए शैक्षिक सुधार किए जाएं।

निष्कर्ष

विमुक्त और घुमंतू जनजातियों की मांग महज एक प्रशासनिक परिवर्तन नहीं, बल्कि एक मानवीय गरिमा का प्रश्न है। 1931 के बाद होने वाली यह पहली व्यापक जातिगत गणना यदि इन समुदायों को उचित स्थान देती है, तो यह भारत के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति तक न्याय पहुँचाने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम होगा। लोकतंत्र तभी सफल है जब 'घुमंतू' पैरों को भी 'संवैधानिक' जमीन प्राप्त हो।