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सामान्य अध्ययन पेपर – III  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन।

संदर्भ

वर्तमान में बैटरियां हमारे आधुनिक जीवन का अभिन्न अंग बन चुकी हैं। मोबाइल फोन और लैपटॉप से लेकर इलेक्ट्रिक वाहन (EV) और बड़े पैमाने पर ऊर्जा भंडारण प्रणालियों (BESS) तक, बैटरियां आर्थिक विकास और स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण का आधार हैं। हालांकि, लिथियम-आयन बैटरियों पर अत्यधिक वैश्विक निर्भरता ने भारत जैसे देशों के लिए नई चुनौतियां पेश कर दी हैं।

लिथियम-आयन का प्रभुत्व और सीमाएं

पिछले दो दशकों में, लिथियम-आयन तकनीक अपनी उच्च ऊर्जा घनत्व और लंबे जीवन चक्र के कारण दुनिया भर में हावी रही है।

  • लागत में भारी गिरावट: 2010 में जो बैटरी $1,100/kWh थी, वह 2025 तक गिरकर $108/kWh पर गई है।
  • चुनौतियां: भारत के पास लिथियम, कोबाल्ट और निकल जैसे महत्वपूर्ण खनिजों के पर्याप्त भंडार नहीं हैं। यह हमें आयात और जटिल वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर निर्भर बनाता है, जो ऊर्जा सुरक्षा के लिए एक बड़ा जोखिम है।

सोडियम-आयन: एक सशक्त विकल्प क्यों?

सोडियम-आयन बैटरियां लिथियम-आयन की संरचनात्मक बाधाओं का एक ठोस समाधान पेश करती हैं:

  • सामग्री की प्रचुरता: सोडियम (नमक का मुख्य घटक) पृथ्वी पर प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। यह लिथियम की तुलना में सस्ता और सुलभ है, जिससे कच्चे माल का जोखिम कम हो जाता है।
  • सुरक्षा और स्थिरता: सोडियम-आयन बैटरियां अधिक सुरक्षित होती हैं। इन्हें 'जीरो वोल्ट' पर डिस्चार्ज करके सुरक्षित रूप से ट्रांसपोर्ट किया जा सकता है, जबकि लिथियम बैटरियों के साथ आग लगने का खतरा अधिक रहता है।
  • बुनियादी ढांचे की अनुकूलता: सबसे बड़ा लाभ यह है कि सोडियम-आयन बैटरियों का निर्माण मौजूदा लिथियम-आयन विनिर्माण लाइनों पर ही किया जा सकता है। इसके लिए नई फैक्ट्रियों की आवश्यकता नहीं है।
  • बेहतर प्रदर्शन: ये बैटरियां तेजी से चार्ज होती हैं और अत्यधिक ठंडे या गर्म तापमान में भी बेहतर दक्षता बनाए रखती हैं।

आयात निर्भरता और पर्यावरणीय प्रभाव:

सोडियम-आयन तकनीक केवल आर्थिक, बल्कि रणनीतिक और पर्यावरणीय दृष्टि से भी श्रेष्ठ है:

  • रणनीतिक स्वतंत्रता: वर्तमान में भारत लिथियम के लिए चीन और 'लिथियम ट्राएंगल' देशों पर निर्भर है। सोडियम की स्थानीय प्रचुरता इस आयात निर्भरता को समाप्त कर भारत की विदेशी मुद्रा बचाएगी और 'ऊर्जा संप्रभुता' सुनिश्चित करेगी।
  • सतत खनन: लिथियम और कोबाल्ट का खनन जल-गहन और विनाशकारी होता है। इसके विपरीत, सोडियम का निष्कर्षण पर्यावरण के लिए कम हानिकारक है और पारिस्थितिकी तंत्र पर कम दबाव डालता है।
  • विषाक्तता में कमी: इन बैटरियों में कोबाल्ट और निकल जैसे भारी जहरीले धातुओं का उपयोग नहीं होता, जिससे मिट्टी और भूजल के प्रदूषण का जोखिम न्यूनतम हो जाता है।
  • सर्कुलर इकोनॉमी: सोडियम-आयन बैटरियों को रीसायकल करना आसान और सुरक्षित है। साथ ही, स्थानीय स्तर पर सामग्री उपलब्ध होने से वैश्विक शिपिंग से होने वाला कार्बन उत्सर्जन भी कम होता है।

विश्लेषण

भारत के लिए यह केवल एक तकनीकी बदलाव नहीं, बल्कि एक रणनीतिक आवश्यकता है।

  • आर्थिक पहलू: यदि भारत सोडियम-आयन को अपनाता है, तो वह 'आयात-निर्भर' देश से 'आत्मनिर्भर' ऊर्जा उत्पादक बन सकता है।
  • बाजार का दायरा: हालांकि सोडियम-आयन की ऊर्जा घनत्व लिथियम से थोड़ी कम हो सकती है, लेकिन यह टू-व्हीलर, -रिक्शा और ग्रिड स्टोरेज (जहां वजन से ज्यादा लागत मायने रखती है) के लिए सबसे उपयुक्त है।

आगे की राह

  • अनुसंधान और विकास: सरकार को सोडियम-आयन के ऊर्जा घनत्व को और बेहतर बनाने के लिए प्रयोगशालाओं और स्टार्टअप्स को प्रोत्साहित करना चाहिए।
  • PLI योजना का विस्तार: 'प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव' (PLI) योजना में विशेष रूप से सोडियम-आयन तकनीक को शामिल करना चाहिए ताकि कंपनियां इस ओर रुख करें।
  • मिश्रित रणनीति: भारत को 'एक ही तकनीक सबके लिए' के बजाय एक मिश्रित मॉडल अपनाना चाहिएलंबी दूरी की कारों के लिए लिथियम और घरेलू उपकरणों छोटे वाहनों के लिए सोडियम।
  • घरेलू आपूर्ति श्रृंखला: सोडियम निष्कर्षण और एनोड/कैथोड सामग्री के स्थानीय उत्पादन पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

निष्कर्ष

भविष्य बैटरियों से संतृप्त होगा। भारत की ऊर्जा सुरक्षा केवल लिथियम के भरोसे नहीं छोड़ी जा सकती। सोडियम-आयन तकनीक केवल सामग्री के जोखिम को कम करती है, बल्कि यह भारत को वैश्विक स्वच्छ ऊर्जा बाजार में एक अग्रणी खिलाड़ी के रूप में स्थापित करने की क्षमता रखती है। इस तकनीक को अपनाना भारत के लिए ऊर्जा स्वतंत्रता और 2070 तक 'नेट जीरो' लक्ष्य की प्राप्ति की दिशा में एक निर्णायक कदम होगा।

सामान्य अध्ययन पेपर – III  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन।

संदर्भ

वैश्विक बाजार की अस्थिरता के बीच भारतीय रिजर्व बैंक ने अपनी पहली मौद्रिक नीति समीक्षा के माध्यम से भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती का प्रमाण दिया है। गवर्नर संजय मल्होत्रा के नेतृत्व में 'विकास और स्थिरता' के बीच एक सटीक संतुलन बिठाते हुए भविष्य की आर्थिक दिशा तय की गई है।

मौद्रिक नीति समिति (MPC) क्या है?

मौद्रिक नीति समिति (MPC) भारत में ब्याज दरें तय करने वाली एक 6 सदस्यीय वैधानिक संस्था है। इसमें 3 सदस्य RBI से और 3 बाहरी विशेषज्ञ (भारत सरकार द्वारा नियुक्त) होते हैं। इसका मुख्य उद्देश्य मुद्रास्फीति (महंगाई) को 4% (±2%) के दायरे में रखते हुए आर्थिक विकास को गति देना है।

चर्चा में क्यों?

  • रेपो रेट 5.25% पर स्थिर
  • RBI के नए गवर्नर संजय मल्होत्रा की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में समिति ने सर्वसम्मति से रेपो रेट को 5.25% पर बरकरार रखने का फैसला किया है।
  • बैंकों को मिलने वाले कर्ज की दरें नहीं बढ़ेंगी, जिससे होम लोन और कार लोन की EMI फिलहाल स्थिर रहने की उम्मीद है।
  • आर्थिक विकास और मुद्रास्फीति का अनुमान
  • GDP ग्रोथ: RBI ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए भारत की विकास दर के अनुमान को बढ़ाकर 7.4% कर दिया है (पहले यह 7.3% था) भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था बना हुआ है।
  • महंगाई: खुदरा महंगाई (CPI) का अनुमान वित्त वर्ष 2025-26 के लिए 2.1% रखा गया है। गवर्नर ने कहा कि महंगाई अब नियंत्रण में है और लक्ष्य के करीब है।
  • विदेशी मुद्रा भंडार: जनवरी 2026 के अंत तक भारत का विदेशी मुद्रा भंडार $723.8 बिलियन के स्वस्थ स्तर पर था।

'न्यूट्रल' स्टैंस का क्या मतलब है?

  • RBI ने अपनी नीति को 'न्यूट्रल' रखा है। इसका अर्थ है कि केंद्रीय बैंक भविष्य में आर्थिक आंकड़ों के आधार पर ब्याज दरों को बढ़ा भी सकता है और घटा भी सकता है यह एक लचीला रुख है जो स्थिरता को प्राथमिकता देता है।

आम आदमी और छोटे उद्योगों के लिए बड़ी घोषणाएं

  • MSME को राहत: सूक्ष्म और लघु उद्योगों (MSEs) के लिए बिना गारंटी वाले कर्ज की सीमा को 10 लाख से बढ़ाकर ₹20 लाख कर दिया गया है।
  • डिजिटल धोखाधड़ी पर मुआवजा: डिजिटल लेनदेन में धोखाधड़ी होने पर ग्राहकों को ₹25,000 तक का मुआवजा देने का प्रस्ताव रखा गया है।
  • REITs को कर्ज: अब कमर्शियल बैंक 'रियल एस्टेट इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट' (REITs) को भी कर्ज दे सकेंगे, जिससे रियल एस्टेट सेक्टर में निवेश बढ़ेगा।
  • NBFCs के लिए आसानी: गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFCs) के लिए शाखाएं खोलने के नियमों को सरल बनाया गया है।

प्रभाव

  • आम आदमी पर: रेपो रेट में बदलाव होने से होम लोन, कार लोन और पर्सनल लोन की EMI फिलहाल स्थिर रहेगी।
  • MSME सेक्टर: बिना गारंटी वाले लोन की सीमा 10 लाख से बढ़ाकर ₹20 लाख करना छोटे उद्योगों के लिए 'गेम चेंजर' साबित होगा।
  • बैंकिंग और डिजिटल सेक्टर: डिजिटल धोखाधड़ी पर 25,000 के मुआवजे के प्रस्ताव से ग्राहकों का डिजिटल बैंकिंग पर भरोसा बढ़ेगा।
  • रियल एस्टेट: REITs को बैंक कर्ज की अनुमति मिलने से निर्माण क्षेत्र में नकदी का प्रवाह बढ़ेगा।

विश्लेषण

  • RBI का यह निर्णय "रुको और देखो" की रणनीति पर आधारित है। पिछले वर्ष (2025) में ब्याज दरों में 125 बेसिस पॉइंट की कटौती के बाद, अब गवर्नर मल्होत्रा उन कटौतियों के वास्तविक असर को अर्थव्यवस्था में समाहित होने का समय दे रहे हैं।
  • 2.1% की कम महंगाई दर यह दर्शाती है कि भारत ने 'महंगाई के खिलाफ जंग' लगभग जीत ली है, जिससे अब पूरा ध्यान 'ग्रोथ' पर केंद्रित किया जा सकता है।

आगे की राह

  • मुद्रास्फीति की निगरानी: वैश्विक खाद्य कीमतों और कच्चे तेल की अस्थिरता पर नजर रखना जरूरी है ताकि महंगाई दोबारा बढ़े।
  • क्रेडिट डिलीवरी: बैंकों को यह सुनिश्चित करना होगा कि RBI द्वारा दी गई रियायतों का लाभ सीधे उपभोक्ताओं और छोटे व्यापारियों तक पहुँचे।
  • साइबर सुरक्षा: डिजिटल लेनदेन की बढ़ती मात्रा को देखते हुए साइबर सुरक्षा ढांचे को और अधिक सुदृढ़ बनाना होगा।

निष्कर्ष

RBI की यह मौद्रिक नीति भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रति विश्वास और परिपक्वता का प्रतिबिंब है। 5.25% पर स्थिर रेपो रेट और 7.4% की अनुमानित विकास दर भारत को वैश्विक मंदी के दौर में एक 'ब्राइट स्पॉट' के रूप में स्थापित करती है। यह नीति केवल निवेशकों के मनोबल को बढ़ाएगी, बल्कि आम नागरिक की जेब पर अतिरिक्त बोझ डाले बिना देश को उच्च विकास पथ पर बनाए रखेगी।

सामान्य अध्ययन पेपर – III  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन

संदर्भ

वैश्विक भू-राजनीतिक अस्थिरता और ऊर्जा सुरक्षा की अनिवार्यताओं के बीच, भारत अपनी तेल आयात रणनीति को पुनर्गिभाषित कर रहा है। हालिया 'भारत-अमेरिका अंतरिम द्विपक्षीय व्यापार समझौते' और रूस पर बढ़ते अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों ने भारत के ऊर्जा बाज़ार को एक नई कूटनीतिक बहस के केंद्र में खड़ा कर दिया है।

भारत का तेल आयात:

  • ऊर्जा निर्भरता: भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का लगभग 85% आयात करता है, जो इसे दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता बनाता है।
  • आयात की मात्रा: भारत प्रतिवर्ष लगभग 30 करोड़ टन कच्चे तेल का आयात करता है, जिसमें रूस की हिस्सेदारी वर्तमान में लगभग एक-तिहाई (32.7%) है।
  • आर्थिक भार: कच्चा तेल भारत के आयात बिल का सबसे बड़ा हिस्सा है, जो सीधे तौर पर व्यापार घाटे और रुपये की कीमत को प्रभावित करता है।

चर्चा में क्यों?

  • रूसी तेल बनाम अमेरिकी मांग: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक कार्यकारी आदेश में दावा किया गया है कि भारत रूसी तेल आयात को 'शून्य' करने पर सहमत हुआ है, हालांकि भारतीय आधिकारिक तंत्र ने इसकी पुष्टि नहीं की है।
  • प्रतिबंध और टैरिफ: अमेरिका द्वारा रूस पर लगाए गए कड़े प्रतिबंधों और व्यापारिक टैरिफ की धमकियों के बीच भारत पर अपने ऊर्जा स्रोतों को 'विविध' (Diversify) करने का भारी दबाव है।
  • सामरिक स्वायत्तता: भारत द्वारा अपनी ऊर्जा सुरक्षा को सर्वोपरि रखते हुए रूस के साथ व्यापार जारी रखना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना हुआ है।

आयात नीति और आर्थिक चुनौतियाँ

  • मूल्य तुलना : दिसंबर 2025 के आंकड़ों के अनुसार, रूसी तेल औसतन $469 प्रति टन है। इसके विपरीत, अमेरिकी तेल 7.9% प्रीमियम पर, सऊदी अरब का तेल 7.2% प्रीमियम पर और यूएई का तेल 12.8% अधिक महंगा है।
  • बढ़ते आयात बिल की संभावना: यदि भारत अमेरिकी दबाव में रूसी तेल (जो कि 7-12% सस्ता है) को छोड़ता है, तो भारत का वार्षिक तेल बिल $6-8 बिलियन तक बढ़ सकता है। यह अतिरिक्त वित्तीय बोझ सीधे तौर पर घरेलू मुद्रास्फीति और राजकोषीय घाटे को जन्म देगा।
  • नीतिगत बदलाव: भारत ने अपनी आयात नीति को 'लचीला' रखा है। वेनेजुएला और कोलंबिया जैसे देशों से भारी कच्चे तेल के विकल्प तलाशे जा रहे हैं, लेकिन रूस की जगह लेना आर्थिक रूप से चुनौतीपूर्ण है।

प्रभाव और भारत सरकार की कूटनीति

  • ऊर्जा सुरक्षा बनाम कूटनीति: भारत सरकार ने स्पष्ट किया है कि उसकी प्राथमिकता अपने नागरिकों को सस्ती ऊर्जा उपलब्ध कराना है। 'इंडिया फर्स्ट' की यह नीति पश्चिम के साथ संबंधों और रूस के साथ पुरानी दोस्ती के बीच संतुलन बनाती है।
  • रुपया-रुबल व्यापार: प्रतिबंधों के बावजूद भारत ने वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों पर काम किया है, जो वैश्विक वित्तीय प्रणाली में भारत की बढ़ती आत्मनिर्भरता को दर्शाता है।
  • आपूर्ति श्रृंखला पुनर्गठन: भारत अब केवल खाड़ी देशों पर निर्भर रहकर अपनी आपूर्ति श्रृंखला को वैश्विक स्तर पर फैला रहा है ताकि किसी भी एक क्षेत्र के संकट से बचा जा सके।

विश्लेषण

वर्तमान डेटा दर्शाता है कि रूस से तेल आयात जून 2025 के 20 लाख bpd से घटकर जनवरी 2026 में 11 लाख bpd रह गया है। यह गिरावट भारत द्वारा अमेरिका के साथ व्यापारिक संतुलन बनाने की कोशिश को दर्शाती है, लेकिन आर्थिक रूप से रूस अभी भी सबसे व्यवहार्य विकल्प बना हुआ है।

आगे की राह

  • घरेलू उत्पादन में वृद्धि: भारत को अन्वेषण और उत्पादन (E&P) क्षेत्र में निवेश बढ़ाकर विदेशी निर्भरता कम करनी होगी।
  • रणनीतिक भंडार: कीमतों में गिरावट के समय तेल का भंडारण करना भविष्य के झटकों से सुरक्षा प्रदान करेगा।
  • हरित ऊर्जा की ओर संक्रमण: लंबी अवधि में इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) और हरित हाइड्रोजन को बढ़ावा देना ही तेल आयात की मजबूरी का एकमात्र स्थायी समाधान है।

निष्कर्ष

भारत की तेल आयात रणनीति वर्तमान में एक जटिल चौराहे पर है। जहाँ एक ओर रूस से मिलने वाला सस्ता तेल भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए ऑक्सीजन का काम कर रहा है, वहीं दूसरी ओर अमेरिका के साथ द्विपक्षीय संबंध सामरिक दृष्टि से अपरिहार्य हैं। भारत को अपनी 'सामरिक स्वायत्तता' को बनाए रखते हुए एक ऐसा मध्यम मार्ग अपनाना होगा जो केवल उसकी अर्थव्यवस्था को स्थिरता दे, बल्कि वैश्विक मंच पर उसकी स्वतंत्र विदेश नीति की साख को भी मजबूत करे।

सामान्य अध्ययन पेपर  – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध

संदर्भ

हाल ही में फरवरी 2026 में भारत के चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल अनिल चौहान की आर्मेनिया यात्रा और भारत-आर्मेनिया के बीच हस्ताक्षरित 'रक्षा सहयोग कार्यक्रम 2026' ने वैश्विक कूटनीति में एक नई हलचल पैदा कर दी है। यह दौरा केवल द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करता है, बल्कि दक्षिण काकेशस क्षेत्र में भारत की बढ़ती रणनीतिक भूमिका को भी रेखांकित करता है।

आर्मेनिया के बारे में

  • भौगोलिक स्थिति: आर्मेनिया पश्चिम एशिया और यूरोप के चौराहे पर स्थित एक भू-आबद्ध देश है। इसकी सीमाएं तुर्की, अजरबैजान, ईरान और जॉर्जिया से लगती हैं।
  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: सोवियत संघ का हिस्सा रहा आर्मेनिया पारंपरिक रूप से सुरक्षा के लिए रूस पर निर्भर रहा है।
  • हालिया संघर्ष: 2020 के नागोर्नो-काराबाख युद्ध में अजरबैजान से मिली हार के बाद आर्मेनिया ने अपनी सुरक्षा रणनीति का पुनर्मूल्यांकन शुरू किया है।

चर्चा के कारण:

आर्मेनिया का भारत और फ्रांस की ओर झुकाव निम्नलिखित प्रमुख कारणों से चर्चा में है:

  • आयात विविधीकरण: रूस द्वारा सुरक्षा गारंटी देने में विफलता के बाद आर्मेनिया अब अपनी रक्षा जरूरतों के लिए भारत और फ्रांस को मुख्य भागीदार बना रहा है।
  • भारत-आर्मेनिया रक्षा सौदे: आर्मेनिया भारत से पिनाका रॉकेट सिस्टम, आकाश मिसाइल डिफेंस और ATAGS तोपें खरीदने वाला प्रमुख देश बन गया है। (आर्मेनिया के कुल हथियार आयात का 43% अब भारत से आता है)
  • तुर्की-पाकिस्तान-अजरबैजान धुरी: इन तीनों देशों के बढ़ते सैन्य गठजोड़ ने आर्मेनिया को एक वैकल्पिक "काउंटर-बैलेंस" गुट (भारत और फ्रांस के साथ) बनाने पर मजबूर किया है।

इस समाचार का महत्व

  • रणनीतिक महत्व: भारत के लिए आर्मेनिया INSTC (उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा) की एक महत्वपूर्ण कड़ी है, जो मध्य एशिया और यूरोप तक व्यापारिक पहुंच प्रदान करता है।
  • रक्षा निर्यात: भारत के रक्षा उद्योग के लिए यह एक बड़ी उपलब्धि है, जो भारत को एक वैश्विक हथियार निर्यातक के रूप में स्थापित करती है।
  • क्षेत्रीय स्थिरता: फ्रांस और भारत की उपस्थिति अजरबैजान की एकतरफा सैन्य कार्रवाई को रोकने के लिए एक 'निवारक' का काम करती है।

विश्लेषण

  • शक्ति संतुलन: यूरेशिया में शक्ति का केंद्र बदल रहा है। जहाँ एक तरफ तुर्की अपना प्रभाव बढ़ा रहा है, वहीं भारत और फ्रांस जैसी "मिडिल पावर्स" छोटे देशों की संप्रभुता की रक्षा के लिए आगे रही हैं।
  • भारत बनाम पाकिस्तान: पाकिस्तान द्वारा अजरबैजान को JF-17 लड़ाकू विमान देना और कश्मीर मुद्दे पर भारत के खिलाफ अजरबैजान का समर्थन करना, भारत को आर्मेनिया के साथ खड़े होने का रणनीतिक कारण देता है।
  • फ्रांस की भूमिका: फ्रांस इस क्षेत्र में 'डिटेरेंस बाई डिनायल' की नीति अपना रहा है, ताकि यथास्थिति को बलपूर्वक बदलने से रोका जा सके।

आगे की राह

  • संस्थागत सहयोग: केवल हथियार बेचने तक सीमित रहकर, भारत को आर्मेनिया के सैन्य प्रशिक्षण, साइबर सुरक्षा और खुफिया जानकारी साझा करने में सहयोग बढ़ाना चाहिए।
  • आर्थिक जुड़ाव: रक्षा के साथ-साथ आईटी, फार्मा और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में निवेश बढ़ाकर संबंधों को बहुआयामी बनाने की जरूरत है।
  • मिश्रित कूटनीति: भारत को ईरान के साथ मिलकर त्रिपक्षीय सहयोग (भारत-ईरान-आर्मेनिया) को और अधिक सक्रिय करना चाहिए।

निष्कर्ष

आर्मेनिया की सुरक्षा संरचना में रहा यह बदलाव केवल युद्ध की प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि एक सोची-समझी भू-राजनीतिक रणनीति है। भारत और फ्रांस के साथ आर्मेनिया की साझेदारी यह सिद्ध करती है कि बहुध्रुवीय विश्व में छोटे राज्य अब केवल महाशक्तियों के भरोसे नहीं हैं। भारत के लिए यह अवसर अपनी "सॉफ्ट पावर" को "हार्ड पावर" के साथ जोड़कर एक वैश्विक सुरक्षा प्रदाता  के रूप में उभरने का है।

सामान्य अध्ययन पेपर  – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध

संदर्भ

ईरान में स्थित रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण चाबहार बंदरगाह को लेकर भारत ने अपनी वित्तीय प्रतिबद्धताओं को समय से पहले पूरा कर एक बड़ा कदम उठाया है। 06 फरवरी 2026 को भारत सरकार ने संसद में स्पष्ट किया कि $120 मिलियन की कुल राशि का भुगतान कर दिया गया है, जो अमेरिकी प्रतिबंधों की संभावित वापसी से पहले भारत की 'रणनीतिक तत्परता' को दर्शाता है।

चाबहार बंदरगाह:

  • भौगोलिक स्थिति: यह ईरान के सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत में ओमान की खाड़ी के तट पर स्थित है।
  • महत्व: यह भारत को पाकिस्तान को दरकिनार कर अफगानिस्तान और मध्य एशियाई देशों तक सीधी पहुँच प्रदान करने वाला एकमात्र समुद्री मार्ग है।
  • भारतीय भूमिका: भारत 'इंडिया ग्लोबल पोर्ट्स लिमिटेड' (IGPL) के माध्यम से इसके 'शाहिद बेहिश्ती' टर्मिनल का संचालन और विकास कर रहा है।

चर्चा के मुख्य कारण

  • पूर्ण भुगतान: भारत ने अपनी $120 मिलियन की कुल प्रतिबद्धता का भुगतान 26 अप्रैल 2026 (अमेरिकी छूट की अंतिम तिथि) से पहले ही पूरा कर लिया है।
  • बजट में कटौती: केंद्रीय बजट 2026-27 में चाबहार के लिए कोई नया फंड आवंटित नहीं किया गया है, जिसे विपक्ष 'प्रोजेक्ट से पीछे हटने' के संकेत के रूप में देख रहा है।
  • ईरान का बयान: ईरानी राजदूत मोहम्मद फथाली ने कहा कि भारत ने भविष्य के प्रबंधन पर अभी कोई आधिकारिक सूचना नहीं दी है, लेकिन चाबहार एक 'स्थायी भौगोलिक सत्य' है जिसे बदला नहीं जा सकता।

त्वरित भुगतान के कारण और वैश्विक दबाव

  • प्रतिबंधों का डर: अमेरिका में ट्रंप प्रशासन की वापसी के बाद ईरान पर कड़े प्रतिबंधों का खतरा मंडरा रहा है। भारत ने भुगतान जल्दी इसलिए किया ताकि अप्रैल के बाद कोई कानूनी या बैंकिंग अड़चन आए।
  • अमेरिका का रुख: अमेरिका ने चाबहार को मानवीय सहायता और क्षेत्रीय संपर्क के लिए सशर्त छूट दी थी, जिसकी अवधि 26 अप्रैल 2026 को समाप्त हो रही है।
  • ईरान-अमेरिका तनाव: पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य तनाव और विमान वाहक पोतों की तैनाती ने भारत के लिए चाबहार के संचालन को जोखिम भरा बना दिया है।

भारत के लिए चाबहार का महत्व

  • आर्थिक महत्व: यह INSTC (अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा) का एक प्रमुख बिंदु है, जिससे रूस और यूरोप तक व्यापारिक समय और लागत में 30-40% की कमी आएगी।
  • रणनीतिक महत्व: यह पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट (चीन द्वारा विकसित) का मुकाबला करने और मध्य एशिया में चीन के 'बेल्ट एंड रोड' प्रभाव को संतुलित करने के लिए भारत का मुख्य हथियार है।
  • अफगानिस्तान कनेक्टिविटी: अफगानिस्तान को मानवीय सहायता और खाद्यान्न पहुँचाने के लिए यह भारत का सबसे भरोसेमंद रास्ता है।

विश्लेषण

संसद में भारत का यह कहना कि "भुगतान पूरा हो गया है" और बजट में "शून्य आवंटन" करना, एक सोची-समझी 'रणनीतिक वापसी' की ओर इशारा करता है। भारत अपनी औपचारिक देनदारियों को समाप्त कर चुका है ताकि यदि अमेरिका कड़े प्रतिबंध लगाता है, तो भारत पर कोई वित्तीय डिफ़ॉल्ट का आरोप लगे। हालांकि, भौतिक रूप से बंदरगाह को छोड़ना भारत के लिए एक बड़ा सामरिक नुकसान होगा।

आगे की राह

  • त्रिपक्षीय कूटनीति: भारत को अमेरिका के साथ बातचीत कर चाबहार के 'मानवीय' और 'गैर-ईरानी' हितों को रेखांकित करना होगा ताकि छूट जारी रहे।
  • क्षेत्रीय सहयोग: उज्बेकिस्तान और कजाकिस्तान जैसे देशों को इस प्रोजेक्ट में जोड़ना चाहिए ताकि यह केवल भारत-ईरान का मुद्दा रहकर एक क्षेत्रीय आर्थिक आवश्यकता बन जाए।
  • निजी क्षेत्र की भागीदारी: परिचालन को सरकारी क्षेत्र से हटाकर अधिक लचीले अंतरराष्ट्रीय कंसोर्टियम को सौंपने पर विचार किया जा सकता है।

निष्कर्ष

चाबहार बंदरगाह केवल एक बुनियादी ढांचा परियोजना नहीं, बल्कि भारत की 'सामरिक स्वायत्तता' का प्रतीक है। पूर्ण भुगतान करके भारत ने अपनी ईमानदारी साबित की है, लेकिन अब असली चुनौती कूटनीतिक स्तर पर है। भारत को एक ऐसा मध्यम मार्ग चुनना होगा जहाँ वह अमेरिकी प्रतिबंधों की आंच से भी बचे और यूरेशिया तक अपनी पहुँच के इस 'प्रवेश द्वार' को भी सुरक्षित रख सके।