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सामान्य अध्ययन पेपर – III  प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन

संदर्भ

वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में जलवायु परिवर्तन की चुनौतियां केवल वैज्ञानिक शोध तक सीमित नहीं रह गई हैं, बल्कि वे एक गहन 'संचार संकट' में तब्दील हो गई हैं। हालिया शोध और रिपोर्ट यह दर्शाते हैं कि भारत जैसे भाषाई विविधता वाले देश में, जलवायु परिवर्तन से जुड़ी जानकारी का प्रसार उसी भाषा और तकनीकी शब्दावली में हो रहा है जिसे आम जनता, विशेषकर ग्रामीण और तटीय समुदाय, समझने में असमर्थ हैं। भाषा का अभाव जलवायु सुरक्षा के प्रयासों को कमजोर कर रहा है।

जलवायु अंतरालभाषाई बाधा क्या है?

जलवायु अंतराल का तात्पर्य उस दूरी से है जो उपलब्ध वैज्ञानिक डेटा और उस डेटा के व्यावहारिक कार्यान्वयन के बीच मौजूद है। इसके प्रमुख आयाम निम्नलिखित हैं:

  • ज्ञान का अंतराल: वैज्ञानिकों के पास 'ग्लोबल वार्मिंग' का डेटा है, लेकिन किसान के पास उस 'हीटवेव' से फसल बचाने की सरल भाषा में जानकारी नहीं है।
  • संसाधन अंतराल: डेटा होने के बावजूद, स्थानीय समुदायों के पास उसे एक्शन में बदलने के लिए भाषाई और वित्तीय संसाधनों की कमी है।
  • अनुकूलन अंतराल: जब तक संचार प्रभावी नहीं होता, समुदाय जलवायु परिवर्तन के प्रति अनुकूलन विकसित नहीं कर पाते।

चर्चा में क्यों है?

  • यह विषय विशेष रूप से UNFCCC के COP सम्मेलनों और भारत की 'राष्ट्रीय जलवायु कार्य योजना' (NAPCC) के संदर्भ में चर्चा में है।
  • हाल ही में विज्ञान संचारकों ने चेतावनी दी है कि भारत के पास जिला स्तर तक का विस्तृत जलवायु डेटा उपलब्ध होने के बावजूद, लोगों में इस बात को लेकर स्पष्टता कम है कि यह डेटा उनके जीवन को कैसे प्रभावित करेगा।
  • 'नुकसान और क्षति' जैसे वैश्विक शब्दों का स्थानीयकरण हो पाना एक प्रमुख चिंता बनकर उभरा है।

विज्ञान संचार में भाषाई बाधा

विज्ञान संचार में भाषा केवल शब्दों का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति का हिस्सा होती है।

  • जटिल शब्दावली: ' डी-कार्बोनाइजेशन', 'एन्थ्रोपोजेनिक' और 'मिटिगेशन' जैसे शब्द अंग्रेजी से सीधे अनुवादित किए जाते हैं, जो स्थानीय बोलियों में अपना अर्थ खो देते हैं।
  • सांस्कृतिक संदर्भ का अभाव: विज्ञान अक्सर केवल संख्याओं में बात करता है, जबकि समुदायों को अपनी आजीविका, संस्कृति और भूमि के संदर्भ में सूचना चाहिए होती है।
  • गलत व्याख्या: प्रभावी संचार के अभाव में, वैज्ञानिक चेतावनियों को अक्सर केवल 'सरकारी आदेश' मान लिया जाता है, जिससे उनके पीछे के गंभीर वैज्ञानिक कारण अनसुने रह जाते हैं।

डेटा की प्रचुरता बनाम स्पष्टता का अभाव 

आज हमारे पास उपग्रहों, सेंसरों और एआई (AI) के माध्यम से प्राप्त डेटा का अंबार है।

  • डेटा का केंद्रीकरण: अधिकांश डेटा अकादमिक संस्थानों और नीति-निर्माताओं के कंप्यूटरों में कैद है।
  • एक्शन की कमी: डेटा हमें यह तो बताता है कि "औसत तापमान 2 डिग्री बढ़ेगा", लेकिन यह स्पष्ट नहीं करता कि "अगले मंगलवार को एक विशेष क्षेत्र के मछुआरों को समुद्र में जाना चाहिए या नहीं।" स्पष्टता के बिना डेटा केवल शोर बनकर रह जाता है।

'नुकसान और क्षति' का संकुचित अर्थ

वैश्विक कूटनीति में 'नुकसान और क्षति का अर्थ बहुत व्यापक है, लेकिन स्थानीय स्तर पर इसका अर्थ संकुचित हो गया है:

  • वित्तीय बनाम मानवीय: प्रशासन इसे अक्सर केवल 'संपत्ति के नुकसान' और 'मुआवजे' के चश्मे से देखता है।
  • अपूरणीय क्षति: जलवायु परिवर्तन से केवल घर नहीं गिरते, बल्कि पूर्वजों की जमीन, पारंपरिक ज्ञान, जैव-विविधता और समुदायों की 'सांस्कृतिक स्मृति' भी लुप्त हो जाती है। इसे किसी भी आर्थिक मुआवजे से मापा नहीं जा सकता।

नीति-निर्माण और धरातल की हकीकत (गवर्नेंस गैप)

शासन व्यवस्था में एक स्पष्ट 'टॉप-डाउन' (ऊपर से नीचे) दृष्टिकोण दिखाई देता है:

  • कमांड और कंट्रोल: नीतियां दिल्ली या राज्यों की राजधानियों में बनती हैं जहाँ भाषा 'प्रशासनिक' होती है।
  • स्थानीय निकायों की अक्षमता: पंचायतों और नगर पालिकाओं के पास अक्सर वैज्ञानिक डेटा को स्थानीय कार्ययोजना में बदलने के लिए विशेषज्ञता या सरल अनुवाद की सुविधा नहीं होती।

सरकार द्वारा उठाए गए कदम

  • राष्ट्रीय जलवायु अनुकूलन कोष: स्थानीय परियोजनाओं को वित्तीय सहायता देना।
  • इंडिया क्लाइमेट पोर्टल: डेटा को सार्वजनिक करने का प्रयास।
  • कृषि विज्ञान केंद्र (KVKs): किसानों तक स्थानीय भाषा में सूचना पहुँचाने का एक महत्वपूर्ण तंत्र।
  • डिजास्टर अलर्ट सिस्टम: ओडिशा जैसे राज्यों में स्थानीय भाषाओं में एसएमएस (SMS) और सायरन के जरिए चेतावनी देना।

समाधान: विज्ञान का 'मानवीकरण'

विज्ञान को 'प्रयोगशाला' से निकालकर 'चौपाल' तक पहुँचाना अनिवार्य है:

  • कहानी सुनाना: डेटा को लोक कथाओं, गीतों और स्थानीय उदाहरणों के साथ जोड़ना।
  • नागरिक विज्ञान: स्थानीय लोगों को डेटा संग्रह में शामिल करना ताकि वे समाधान का हिस्सा महसूस करें।
  • द्विभाषी विशेषज्ञ: ऐसे 'अनुवादकों' की टीम तैयार करना जो वैज्ञानिक और ग्रामीण, दोनों की भाषा समझ सकें।

विश्लेषण

भारत की जलवायु चुनौती केवल 'कार्बन उत्सर्जन' को कम करना नहीं है, बल्कि 'सूचना की असमानता' को दूर करना भी है। एक भाषाई रूप से समृद्ध देश में, 'वन साइज फिट्स ऑल' (एक ही समाधान सबके लिए) वाली संचार नीति कभी सफल नहीं हो सकती। जब तक एक आदिवासी समुदाय को उसकी अपनी भाषा में यह समझ नहीं आएगा कि जंगल का बदलना उसकी पहचान का अंत है, तब तक संरक्षण के प्रयास केवल कागजी रहेंगे। विज्ञान को 'लोकतांत्रिक' बनाने की आवश्यकता है।

आगे की राह

  • क्षेत्रीय भाषा में प्रकाशन: सभी प्रमुख जलवायु रिपोर्टों का संविधान की 8वीं अनुसूची की सभी भाषाओं में अनुवाद होना चाहिए।
  • शिक्षा में एकीकरण: स्कूल के पाठ्यक्रम में जलवायु परिवर्तन को स्थानीय पारिस्थितिकी के उदाहरणों के साथ पढ़ाया जाए।
  • स्थानीय नेतृत्व: पंचायत स्तर पर 'जलवायु दूतों' की नियुक्ति की जाए जो वैज्ञानिक डेटा को सरल भाषा में समझा सकें।

निष्कर्ष

जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध युद्ध केवल अत्याधुनिक तकनीक या वित्तीय फंड से नहीं जीता जा सकता। इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि हम सबसे कमजोर व्यक्ति तक सूचना किस स्पष्टता और संवेदनशीलता के साथ पहुँचाते हैं। यदि हम 'भाषा के अंतराल' को पाटने में विफल रहे, तो हमारे पास डेटा तो श्रेष्ठ होगा, लेकिन उसे समझने और उस पर कार्य करने वाले लोग नहीं होंगे। विज्ञान और समाज के बीच का यह भाषाई सेतु ही भारत के सुरक्षित भविष्य की आधारशिला बनेगा।

सामान्य अध्ययन पेपर  – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध

संदर्भ

हाल ही में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने भारत के राज्यों की वित्तीय स्थिति और उनके बदलते जनसंख्या ढांचे पर एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट जारी की है। यह रिपोर्ट उस समय आई है जब भारत दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी होने का गौरव तो रखता है, लेकिन साथ ही इसके राज्यों के बीच जनसांख्यिकीय संक्रमण की दर में भारी असमानता देखी जा रही है। यह लेख इस बात का विश्लेषण करता है कि कैसे भारत का जनसांख्यिकीय लाभांश कुछ क्षेत्रों में 'बुजुर्गों के बोझ' में तब्दील होने के कगार पर है।

जनसांख्यिकीय लाभांश क्या है?

जनसांख्यिकीय लाभांश उस आर्थिक विकास की क्षमता को संदर्भित करता है जो तब उत्पन्न होती है जब किसी जनसंख्या में कामकाजी उम्र के लोगों (15 से 64 वर्ष) का हिस्सा आश्रित आबादी (बच्चों और बुजुर्गों) से अधिक होता है। सीधे शब्दों में कहें तो, जब काम करने वाले हाथ अधिक हों और उन पर निर्भर रहने वाले लोग कम, तो देश की उत्पादकता और बचत की दर बढ़ जाती है।

चर्चा में क्यों है?

  • चर्चा का मुख्य कारण RBI की जनवरी 2026 की रिपोर्ट है, जिसमें आगाह किया गया है कि केरल और तमिलनाडु जैसे दक्षिणी राज्य 2036 तक 'एजिंग स्टेट्स' (बुजुर्ग राज्य) बन जाएंगे।
  • जहाँ एक तरफ उत्तर भारत के राज्यों में युवाओं की संख्या बढ़ रही है, वहीं दक्षिण भारत में बुजुर्गों की संख्या का अनुपात कुल आबादी के 20% को पार करने वाला है।
  • यह असमानता देश के संघीय ढांचे और अर्थव्यवस्था के लिए नई चुनौतियाँ पेश कर रही है।

जनसांख्यिकीय लाभांश के मायने

भारत के लिए इसके मायने द्विआयामी हैं:

  • आर्थिक विकास: एक विशाल कार्यबल का मतलब है उच्च उत्पादन और उपभोग।
  • निवेश का अवसर: बचत बढ़ने से निवेश के लिए अधिक पूंजी उपलब्ध होती है।
  • वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला: चीन जैसे देशों की आबादी कम होने के कारण भारत दुनिया का 'वर्कशॉप' बन सकता है।
  • जोखिम: यदि इस कार्यबल को शिक्षा और कौशल नहीं मिला, तो यही लाभांश 'जनसांख्यिकीय आपदा' में बदल सकता है।

भारत में राज्यवार वितरण

भारत जनसांख्यिकीय रूप से दो हिस्सों में बंटा हुआ दिखता है:

  • अग्रणी राज्य (बुजुर्ग होने की ओर): केरल, तमिलनाडु, हिमाचल प्रदेश और आंध्र प्रदेश। यहाँ प्रजनन दर (TFR) प्रतिस्थापन स्तर (2.1) से काफी नीचे जा चुकी है।
  • युवा राज्य (लाभांश की ओर): बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड और मध्य प्रदेश। यहाँ कामकाजी उम्र की आबादी 2031 के बाद भी बढ़ती रहेगी।
  • मध्यवर्ती राज्य: कर्नाटक और महाराष्ट्र जैसे राज्य वर्तमान में संतुलन की स्थिति में हैं।

राज्यों की चिंताएं एवं गहरा प्रभाव

दक्षिणी राज्यों को अपनी सफलता की ही सजा मिलने का डर सता रहा है:

  • कर हस्तांतरण: जनसंख्या नियंत्रण में सफलता के कारण वित्त आयोग के फार्मूले में इन राज्यों का हिस्सा कम हो सकता है, क्योंकि जनसंख्या को अधिक वेटेज मिलता है।
  • सीमित कार्यबल: उद्योगों के लिए स्थानीय श्रमिकों की कमी, जिससे प्रवासी श्रमिकों पर निर्भरता बढ़ेगी।
  • बढ़ता व्यय: स्वास्थ्य और वृद्धावस्था देखभाल पर खर्च में भारी बढ़ोतरी।

लाभांश से 'बुजुर्गों के बोझ' तक की स्थिति

जब कोई राज्य जनसांख्यिकीय संक्रमण के अंतिम चरण में पहुँचता है, तो:

  • कार्यबल में गिरावट: कर राजस्व कम होने लगता है।
  • पेंशन का बोझ: सरकारी खजाने पर पेंशन और ग्रेच्युटी का भार बढ़ता है।
  • स्वास्थ्य अवसंरचना: सामान्य अस्पतालों के स्थान पर विशेष 'जेरियाट्रिक केयर' (वृद्धावस्था चिकित्सा) की आवश्यकता होती है।
  • बचत में कमी: बुजुर्ग आबादी अपनी बचत का उपभोग करती है, जिससे निवेश के लिए पूंजी कम हो जाती है।

राज्यों पर जनसंख्या का बहुआयामी प्रभाव

  • राजनीतिक दृष्टिकोण:
  • परिसीमन: आगामी परिसीमन के बाद, जनसंख्या के आधार पर सीटों के आवंटन से दक्षिण भारत की राजनीतिक शक्ति कम होने और उत्तर भारत का वर्चस्व बढ़ने की आशंका है।
  • आर्थिक दृष्टिकोण:
  • राजकोषीय दबाव: बुजुर्ग राज्यों को सब्सिडी में कटौती करनी होगी ताकि वे सामाजिक सुरक्षा प्रदान कर सकें।
  • उत्पादकता: युवा राज्यों में शिक्षा की कमी के कारण उनकी उत्पादकता कम है, जिससे "अमीर होने से पहले बूढ़ा होने" का खतरा बढ़ गया है।
  • सामाजिक दृष्टिकोण:
  • नारीकरण: महिलाएं पुरुषों की तुलना में अधिक जीवित रहती हैं, लेकिन उनके पास संपत्ति कम होती है, जिससे वे अधिक असुरक्षित हो जाती हैं।
  • परिवार का ढांचा: एकल परिवारों और प्रवास के कारण पारंपरिक 'पारिवारिक सुरक्षा जाल' टूट रहा है।

RBI की सलाह

RBI ने संतुलित वित्तीय दृष्टिकोण अपनाने का सुझाव दिया है:

  • बुजुर्ग राज्यों के लिए: सब्सिडी को तर्कसंगत बनाएं और संसाधनों को पेंशन स्वास्थ्य सेवाओं की ओर मोड़ें।
  • युवा राज्यों के लिए: मानव पूंजी (शिक्षा और स्वास्थ्य) में भारी निवेश करें ताकि भविष्य में जब वे बुजुर्ग हों, तो उनके पास पर्याप्त वित्तीय आधार हो।
  • श्रम-प्रधान क्षेत्र: एआई और ऑटोमेशन के दौर में भी ऐसे क्षेत्रों को बढ़ावा दें जहाँ अधिक लोगों को रोजगार मिल सके।

सरकार द्वारा उठाए गए कदम

  • नई शिक्षा नीति (NEP 2020): कौशल विकास और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए।
  • आयुष्मान भारत: बुजुर्गों के स्वास्थ्य खर्च को कम करने हेतु।
  • अटल पेंशन योजना: असंगठित क्षेत्र के लिए सामाजिक सुरक्षा।
  • PM कौशल विकास योजना: कार्यबल की रोजगार क्षमता बढ़ाने हेतु।

गहरा विश्लेषण

भारत की चुनौती 'अद्वितीय' है। पश्चिमी देश अमीर होने के बाद बूढ़े हुए, जबकि भारत के कई राज्य अभी भी विकासशील अवस्था में ही 'एजिंग' की समस्या का सामना कर रहे हैं।

  • असमान विकास: उत्तरी राज्यों का युवा कार्यबल अगर दक्षिण के बुजुर्ग राज्यों में पलायन करता है, तो इससे भाषाई और सांस्कृतिक संघर्ष की संभावना बढ़ सकती है।
  • एआई (AI) का खतरा: विनिर्माण क्षेत्र में स्वचालन आने से युवा आबादी के लिए रोजगार सृजन और भी कठिन हो गया है।

आगे की राह

  • देखभाल अर्थव्यवस्था: बुजुर्गों की देखभाल के क्षेत्र में निवेश कर लाखों नौकरियां सृजित की जा सकती हैं।
  • राजकोषीय संघवाद: वित्त आयोग को उन राज्यों को पुरस्कृत करना चाहिए जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण और सामाजिक विकास में अच्छा प्रदर्शन किया है।
  • महिला सशक्तिकरण: बुजुर्ग महिलाओं के लिए विशेष वित्तीय और सामाजिक सुरक्षा योजनाएं अनिवार्य हैं।
  • औद्योगिक नीति: हरित ऊर्जा जैसे नए क्षेत्रों में रोजगार की संभावनाओं को तलाशना।

निष्कर्ष

भारत का जनसांख्यिकीय लाभांश कोई गारंटीशुदा लाभ नहीं है, बल्कि यह एक अवसर है जिसे केवल सही नीतियों के माध्यम से ही भुनाया जा सकता है। जनसंख्या की उम्र बढ़ने की गति और उसके आर्थिक परिणामों को नजरअंदाज करना आत्मघाती होगा। यदि हम चाहते हैं कि हमारे बुजुर्ग सम्मानजनक जीवन जिएं और हमारे युवा राष्ट्र निर्माण में योगदान दें, तो हमें आज ही एक सुदृढ़ सार्वजनिक 'जेरियाट्रिक केयर' प्रणाली और कौशल-आधारित शिक्षा तंत्र विकसित करना होगा।

सामान्य अध्ययन पेपर  – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध

संदर्भ

भारत में ग्रामीण गरीबी और बेरोजगारी के उन्मूलन के लिए 'महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम' (MGNREGA), 2005 एक ऐतिहासिक कदम था। इसने ग्रामीण परिवारों को साल में 100 दिन के अकुशल कार्य की कानूनी गारंटी प्रदान की। हाल ही में केंद्र सरकार ने इस व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन करते हुए एक नया अधिनियम प्रस्तावित किया है, जिसने देश के नीति-निर्माताओं और अर्थशास्त्रियों के बीच एक नई बहस को जन्म दे दिया है।

VB – G RAM G अधिनियम क्या है?

'विकसित भारत - गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) अधिनियम' (VB G RAM G Act) सरकार द्वारा मनरेगा के प्रतिस्थापन के रूप में लाया गया है। इसका उद्देश्य ग्रामीण रोजगार को केवल 'जीविका' तक सीमित रखकर 'विकसित भारत 2047' के व्यापक लक्ष्य से जोड़ना है। इसमें तकनीकी नवाचार, अधिक कार्य दिवस और उत्पादक संपत्तियों के निर्माण पर बल दिया गया है।

चर्चा में क्यों?

  • यह विषय हाल ही में प्रसिद्ध अर्थशास्त्री जीन ड्रेज (Jean Drèze) के एक लेख के बाद चर्चा के केंद्र में आया है।
  • उन्होंने तर्क दिया है कि नया अधिनियम रोजगार गारंटी के "अधिकार-आधारित ढांचे" को कमजोर कर रहा है।
  • इसके साथ ही केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री द्वारा इस कानून के पक्ष में दिए गए तर्कों ने इस विमर्श को और अधिक प्रासंगिक बना दिया है।

जीन ड्रेज की मुख्य आपत्तियाँ

जीन ड्रेज, जो मनरेगा के वास्तुकारों में से एक रहे हैं, का तर्क है कि यह नया कानून वास्तव में रोजगार की "गारंटी" को खत्म कर रहा है। उनकी प्रमुख चिंताएँ इस प्रकार हैं:

  • 'स्विच-ऑफ' प्रावधान (सेक्शन  5(1)): नए कानून की धारा 5(1) के अनुसार, यह रोजगार गारंटी केवल उन्हीं ग्रामीण क्षेत्रों में लागू होगी जिन्हें केंद्र सरकार अधिसूचित करेगी इसका मतलब है कि केंद्र सरकार जब चाहे किसी भी क्षेत्र में इस योजना को बंद कर सकती है। ड्रेज का कहना है कि यह "गारंटी के बिना गारंटी" जैसा है।
  • 60 दिनों का 'ब्लैकआउट' : नए कानून में प्रावधान है कि खेती के पीक सीजन (बुवाई और कटाई) के दौरान साल में 60 दिनों तक कोई काम नहीं दिया जाएगा यह इसलिए किया गया है ताकि किसानों को मजदूर मिल सकें, लेकिन इससे उन मजदूरों का हक मारा जाएगा जिनके पास खेती का काम नहीं है।
  • फंडिंग का बोझ राज्यों पर: मनरेगा में मजदूरों की मजदूरी का 100% खर्च केंद्र उठाता था। नए कानून में इसे बदलकर 60:40 कर दिया गया है (यानी 40% खर्च राज्यों को देना होगा) गरीब राज्यों के लिए यह वित्तीय बोझ उठाना मुश्किल होगा, जिससे योजना ठप हो सकती है।
  • डिजिटलीकरण का अत्यधिक उपयोग: नए कानून में AI, बायोमेट्रिक्स और चेहरे की पहचान  जैसी तकनीकों पर बहुत जोर दिया गया है। ड्रेज के अनुसार, ग्रामीण इलाकों में खराब इंटरनेट और तकनीक की समझ होने के कारण कई मजदूर काम और मजदूरी से वंचित रह सकते हैं।

सरकार का पक्ष

सरकार के अनुसार, यह बदलाव समय की मांग है:

  • कार्य दिवसों में वृद्धि: सरकार ने 100 के स्थान पर 125 दिन का रोजगार देने का वादा किया है।
  • भ्रष्टाचार पर रोक: तकनीक और आधार आधारित प्रणालियों से 'फर्जी हाजिरी' और धन की हेराफेरी रुकेगी।
  • संपत्ति निर्माण: नए कानून का जोर गड्ढे खोदने के बजाय ऐसी संपत्तियां बनाने पर है (जैसे चेक डैम, नहरें) जो लंबे समय में ग्रामीण अर्थव्यवस्था को लाभ पहुंचाएं।

पुरानी और नई योजना में तुलना

विशेषता

मनरेगा (MGNREGA)

VB – G RAM G एक्ट

रोजगार की अवधि

100 दिन

125 दिन

प्रकृति

कानूनी अधिकार

अधिसूचित क्षेत्रों तक सीमित

फंडिंग

अधिकांश भार केंद्र पर

केंद्र और राज्य (60:40 का अनुमान)

तकनीक

न्यूनतम तकनीकी हस्तक्षेप

AI और बायोमेट्रिक्स पर आधारित

कार्य काल

पूरे वर्ष उपलब्ध

कृषि सत्र में 60 दिन का अवकाश

समीक्षा एवं प्रासंगिकता

जीन ड्रेज का पक्ष मजदूरों के 'अधिकारों की सुरक्षा' पर केंद्रित है, जबकि सरकार का पक्ष 'प्रशासनिक कुशलता' पर।

  • प्रासंगिकता: ग्रामीण संकट के समय मनरेगा ने हमेशा 'सुरक्षा जाल' (Safety Net) का काम किया है। यदि नए कानून से यह लचीलापन खत्म होता है, तो यह संकटपूर्ण होगा। हालांकि, उत्पादकता बढ़ाने का सरकार का विचार दीर्घकालिक विकास के लिए आवश्यक है।

विश्लेषण

इस परिवर्तन का गहरा प्रभाव ग्रामीण श्रम बाजार पर पड़ेगा। जहाँ 125 दिन का प्रावधान आकर्षक है, वहीं 'स्विच-ऑफ' क्लॉज इसे एक अधिकार के बजाय सरकार की 'मर्जी' बना देता है। राज्यों पर वित्तीय बोझ बढ़ने से क्षेत्रीय असमानता बढ़ सकती है। डिजिटलीकरण अच्छा है, लेकिन इसे अंतिम छोर के व्यक्ति की पहुंच (Access) को ध्यान में रखकर लागू किया जाना चाहिए।

आगे की राह

सफलता का मार्ग मध्यमार्गी होना चाहिए:

  • कानूनी बाध्यता बनी रहे: रोजगार की गारंटी को अधिसूचित क्षेत्रों तक सीमित करने के बजाय सार्वभौमिक रखा जाए।
  • तकनीकी सरलीकरण: बायोमेट्रिक्स को अनिवार्य बनाने के बजाय वैकल्पिक रखा जाए ताकि तकनीकी खामियों से मजदूर भूखा रहे।
  • राज्यों का सहयोग: वित्तीय भार को इस तरह विभाजित किया जाए कि गरीब राज्य हतोत्साहित हों।

निष्कर्ष

अतः, किसी भी नई योजना का स्वागत तभी किया जा सकता है जब वह पुराने अधिकारों को छीनने के बजाय उनमें वृद्धि करे। ग्रामीण भारत की रीढ़ को मजबूत करने के लिए उत्पादकता और अधिकारिता के बीच संतुलन बनाना अनिवार्य है।

सामान्य अध्ययन पेपर  – II शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध

परिचय:

भारत ने अपना 77वां गणतंत्र दिवस एक ऐसे समय में मनाया है जब विश्व पटल पर भारत की भूमिका अत्यंत निर्णायक हो गई है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का राष्ट्र के नाम संबोधन केवल उपलब्धियों का लेखा-जोखा नहीं था, बल्कि यह भारत की लोकतांत्रिक यात्रा और 'संवैधानिक राष्ट्रवाद' के प्रति एक संकल्प था।

राष्ट्र के प्रति श्रद्धांजलि और सांस्कृतिक गौरव

राष्ट्रपति ने भारत की एकता और सांस्कृतिक चेतना को विशेष महत्व दिया:

  • सरदार पटेल और वंदे मातरम: सरदार वल्लभभाई पटेल की 150वीं जयंती और 'वंदे मातरम' की रचना के 150वें वर्ष का उल्लेख करते हुए उन्होंने राष्ट्र की एकता और अखंडता पर जोर दिया।
  • सभ्यतागत गर्व: उन्होंने भारत को शांति और स्थिरता के एक दूत के रूप में प्रस्तुत किया, जो युद्धग्रस्त दुनिया में एक संतुलित आवाज है।

आर्थिक एवं रक्षा उपलब्धियां: आत्मनिर्भर भारत की ओर

संबोधन में भारत की बढ़ती शक्ति के व्यावहारिक पहलुओं को रेखांकित किया गया:

  • आर्थिक महाशक्ति: भारत का विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में अग्रसर होना और GST नए श्रम संहिताओं जैसे ढांचागत सुधारों की सराहना की गई।
  • रक्षा स्वायत्तता (ऑपरेशन सिंदूर): आतंकी बुनियादी ढांचे के खिलाफ की गई सटीक सैन्य कार्रवाई 'ऑपरेशन सिंदूर' का उल्लेख रक्षा क्षेत्र में भारत की आत्मनिर्भरता और 'प्रो-एक्टिव' सुरक्षा नीति के प्रमाण के रूप में किया गया।

सामाजिक न्याय और समावेशी विकास

भाषण में उन वर्गों को विशेष सम्मान दिया गया जो राष्ट्र निर्माण की अदृश्य नींव हैं:

  • नारी शक्ति: अंतरिक्ष से लेकर कृषि तक महिलाओं की बढ़ती भागीदारी और एक निर्णायक 'वोटर' के रूप में उनकी भूमिका की सराहना की गई।
  • अंतिम छोर का व्यक्ति: किसान, सफाई कर्मी, शिक्षक और स्वास्थ्य पेशेवरों के योगदान को राष्ट्रीय प्रगति का मुख्य चालक बताया गया।

विश्लेषणात्मक समीक्षा: उपलब्धि बनाम चुनौतियां

जहाँ सरकार की उपलब्धियां प्रेरक हैं, वहीं कुछ महत्वपूर्ण चुनौतियों भी है:

  • संवैधानिक राष्ट्रवाद: राष्ट्रपति ने संविधान के प्रति निष्ठा का आह्वान किया, लेकिन वास्तविक प्रगति केवल सैन्य या आर्थिक शक्ति से नहीं, बल्कि नागरिक अधिकारों की सुरक्षा से मापी जानी चाहिए।
  • संघीय ढांचा: गणतंत्र की मजबूती के लिए केंद्र और राज्यों के बीच संतुलित संबंधों (को बनाए रखना अनिवार्य है। सांप्रदायिक राजनीति और भ्रष्टाचार इन संवैधानिक आदर्शों के समक्ष बड़ी बाधाएं हैं।

आलोचनात्मक परिप्रेक्ष्य: क्या छूट रहा है?

आलोचकों का तर्क है कि 'आत्म-बधाई' की मुद्रा में सरकार को नागरिकों के दैनिक संघर्षों जैसे बढ़ती असमानता, बेरोजगारी और सामाजिक ध्रुवीकरण की अनदेखी नहीं करनी चाहिए। सभ्यतागत गौरव का उपयोग वर्तमान की भौतिक समस्याओं को ढकने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।

आगे की राह

एक जीवंत गणतंत्र के रूप में भारत को निम्नलिखित बिंदुओं पर ध्यान देना होगा:

  • संवैधानिक सिद्धांतों का क्रियान्वयन: केवल संविधान की प्रशंसा करना पर्याप्त नहीं है; राज्य को अपने नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करने और नीति-निर्देशक तत्वों को धरातल पर उतारने के प्रति अपनी जवाबदेही सुनिश्चित करनी होगी। विकास का पैमाना केवल जीडीपी नहीं, बल्कि अंतिम व्यक्ति की खुशहाली होनी चाहिए।
  • संवैधानिक राष्ट्रवाद को बढ़ावा: 'सभ्यतागत गौरव' को वर्तमान की वास्तविक समस्याओं (जैसे गरीबी, बेरोजगारी और असमानता) का विकल्प नहीं बनने देना चाहिए। सच्चा राष्ट्रवाद वही है जो समावेशी हो और देश के लोकतांत्रिक मूल्यों को हर स्तर पर सुरक्षित रखे।
  • संघीय ढांचे की मजबूती: भारत की विविधता और इसकी शक्ति इसके संघीय स्वरूप में निहित है। केंद्र और राज्यों के बीच सहयोगपूर्ण संघवाद को बढ़ावा दिया जाना चाहिए ताकि सत्ता का विकेंद्रीकरण बना रहे और क्षेत्रीय आकांक्षाओं का सम्मान हो।
  • संस्थागत शुचिता और भ्रष्टाचार पर प्रहार: भ्रष्टाचार और संकीर्ण राजनीति लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर करती है। पारदर्शी शासन व्यवस्था और स्वतंत्र संस्थाओं की मजबूती से ही गणतंत्र के आदर्शों को बचाया जा सकता है।
  • आत्म-चिंतन और सुधार: सरकार को अपनी उपलब्धियों के साथ-साथ अपनी कमियों पर भी आत्म-चिंतन करना चाहिए। नागरिक समाज और विपक्ष की आवाजों को अनसुना करने के बजाय, उन्हें सुधार के अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए।

निष्कर्ष

77वां गणतंत्र दिवस भारत के लिए एक गौरवमयी क्षण है। भारत की सैन्य शक्ति और आर्थिक बढ़त सराहनीय है, लेकिन गणतंत्र की असली सफलता इस बात में निहित है कि वह अपने प्रत्येक नागरिक को न्याय, स्वतंत्रता और समानता का अनुभव कितनी गहराई से करा पाता है। 'विकसित भारत' का मार्ग केवल आर्थिक आंकड़ों से नहीं, बल्कि संवैधानिक आदर्शों के सफल कार्यान्वयन से होकर गुजरता है।